पूर्वार्चिकः
आग्नेयं काण्डम्
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्न꣣ आ꣡ या꣢हि वी꣣त꣡ये꣢ गृणा꣣नो꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये । नि꣡ होता꣢꣯ सत्सि ब꣣र्हि꣡षि꣢ ॥१॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (अग्ने) सर्वाग्रणी, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वसुखप्रापक, सर्वप्रकाशमय, सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! आप (गृणानः) कर्तव्यों का उपदेश करते हुए (वीतये) हमारी प्रगति के लिए, हमारे विचारों और कर्मों में व्याप्त होने के लिए, हमारे हृदयों में सद्गुणों को उत्पन्न करने के लिए, हमसे स्नेह करने के लिए, हमारे अन्दर उत्पन्न काम-क्रोध आदि को बाहर फेंकने के लिए और (हव्य-दातये) देय पदार्थ श्रेष्ठ बुद्धि, श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ धर्म, श्रेष्ठ धन आदि के दान के लिए (आ याहि) आइए। (होता) शक्ति आदि के दाता एवं दुर्बलता आदि के हर्ता होकर (बर्हिषि) हृदयरूप अन्तरिक्ष में (नि सत्सि) बैठिए ॥ द्वितीय—विद्वान् के पक्ष में। विद्वान् भी अग्नि कहलाता है। इसमें 'विद्वान् अग्नि है, जो ऋत का संग्रहीता और सत्यमय होता है।’ ऋ० १।१४५।५।, 'विद्वान् अग्नि है, जो बल प्रदान करता है।' ऋ० ३।२५।२ इत्यादि मन्त्र प्रमाण हैं। हे (अग्ने) विद्वन् ! (गृणानः) यज्ञविधि और यज्ञ के लाभों का उपदेश करते हुए आप (वीतये) यज्ञ को प्रगति देने के लिए, और (हव्य-दातये) हवियों को यज्ञाग्नि में देने के लिए (आ याहि) आइये। (होता) होम के निष्पादक होकर (बर्हिषि) कुशा से बने यज्ञासन पर (नि सत्सि) बैठिए। इस प्रकार हम यजमानों के यज्ञ को निरुपद्रव रूप से संचालित कीजिए। ॥ तृतीय—राजा के पक्ष में। राजा भी अग्नि कहलाता है। इसमें 'हे नायक ! तुम प्रजापालक, उत्तम दानी को प्रजाएँ राष्ट्रगृह में राजा रूप में अलंकृत करती हैं।' ऋ० २।१।८, 'राजा अग्नि है, जो राष्ट्ररूप गृह का अधिपति और राष्ट्रयज्ञ का ऋत्विज् होता है।' ऋ० ६।१५।१३ इत्यादि प्रमाण है। हे (अग्ने) अग्रनायक राजन् ! आप (गृणानः) राजनियमों को घोषित करते हुए (वीतये) राष्ट्र को प्रगति देने के लिए, अपने प्रभाव से प्रजाओं में व्याप्त होने के लिए, प्रजाओं में राष्ट्र-भावना और विद्या, न्याय आदि को उत्पन्न करने के लिए तथा आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को परास्त करने के लिए, और (हव्य-दातये) राष्ट्रहित के लिए देह, मन, राजकोष आदि सर्वस्व को हवि बनाकर उसका उत्सर्ग करने के लिए (आ याहि) आइये। (होता) राष्ट्रयज्ञ के निष्पादक होकर (बर्हिषि) राज-सिंहासन पर या राजसभा में (नि सत्सि) बैठिए ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। 'तये, तये' में छेकानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःजैसे विद्वान् पुरोहित यज्ञासन पर बैठकर यज्ञ को संचालित करता है, जैसे राजा राजसभा में बैठकर राष्ट्र की उन्नति करता है, वैसे ही परमात्मा रूप अग्नि हमारे हृदयान्तरिक्ष में स्थित होकर हमारा महान् कल्याण कर सकता है, इसलिए सबको उसका आह्वान करना चाहिए। सब लोगों के हृदय में परमात्मा पहले से ही विराजमान है, तो भी लोग क्योंकि उसे भूले रहते हैं, इस कारण वह उनके हृदयों में न होने के बराबर है। इसलिए उसे पुनः बुलाया जा रहा है। आशय यह है कि सब लोग अपने हृदय में उसकी सत्ता का अनुभव करें और उससे सत्कर्म करने की प्रेरणा ग्रहण करें ॥१॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
त्व꣡म꣢ग्ने य꣣ज्ञा꣢ना꣣ꣳ हो꣢ता꣣ वि꣡श्वे꣢षाꣳ हि꣣तः꣢ । दे꣣वे꣢भि꣣र्मा꣡नु꣢षे꣣ ज꣡ने꣢ ॥२॥
पदार्थःहे (अग्ने) परमात्मन् ! (त्वम्) आप (विश्वेषाम्) सब (यज्ञानाम्) उपासकों से किये जानेवाले ध्यानरूप यज्ञों के (होता) निष्पादक ऋत्विज् हो, अतः (देवेभिः) विद्वानों के द्वारा (मानुषे) मनुष्यों के (जने) लोक में (हितः) स्थापित अर्थात् प्रचारित किये जाते हो ॥२॥ इस मन्त्र की श्लेष द्वारा सूर्य-पक्ष में भी अर्थ-योजना करनी चाहिए। तब परमात्मा सूर्य के समान है, यह उपमा ध्वनित होगी ॥२॥
भावार्थःजैसे सूर्य सौर-लोक में सब अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, दक्षिणायन, उत्तरायण, वर्ष आदि यज्ञों का निष्पादक है, वैसे ही परमात्मा अध्यात्ममार्ग का अवलम्बन करनेवाले जनों से किये जाते हुए सब आन्तरिक यज्ञों को निष्पन्न करके उन योगी जनों को कृतार्थ करता है और जैसे सूर्य अपनी प्रकाशक किरणों से मनुष्य-लोक में अर्थात् पृथिवी पर निहित होता है, वैसे ही परमात्मा विद्वानों से मनुष्य-लोक में प्रचारित किया जाता है ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्निं꣢ दू꣣तं꣡ वृ꣢णीमहे꣣ हो꣡ता꣢रं वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । अ꣣स्य꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ सु꣣क्र꣡तु꣢म् ॥३॥
पदार्थःहम (होतारम्) दिव्य गुणों का आह्वान करनेवाले, (विश्ववेदसम्) विश्व के ज्ञाता, विश्व-भर में विद्यमान तथा सब आध्यात्मिक एवं भौतिक धन के स्रोत, (अस्य) इस अनुष्ठान किये जा रहे (यज्ञस्य) अध्यात्म-यज्ञ के (सुक्रतुम्) सुकर्ता, सुसंचालक ऋत्विग्रूप (अग्निम्) परमात्मा को (दूतं वृणीमहे) दिव्य गुणों के अवतरण में दूतरूप से वरते हैं ॥३॥
भावार्थःजैसे दूतरूप में वरा हुआ कोई जन हमारे सन्देश को प्रियजन के समीप ले जाकर और प्रियजन के सन्देश को हमारे पास पहुँचाकर उसके साथ हमारा मिलन करा देता है, वैसे ही सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, न्याय, विद्या, श्रद्धा, सुमति इत्यादि दिव्य गुणों के और हमारे बीच में दूत बनकर परमात्मा हमारे पास दिव्य गुणों को बुलाकर लाता है, इसलिए सब उपासकों को उसे दूतरूप में वरण करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣢र्वृ꣣त्रा꣡णि꣢ जङ्घनद्द्रविण꣣स्यु꣡र्वि꣢प꣣न्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢द्धः शु꣣क्र꣡ आहु꣢꣯तः ॥४॥
पदार्थः(द्रविणस्युः) उपासकों को आध्यात्मिक धन और बल देने का अभिलाषी (अग्निः) तेजोमय परमात्मा (विपन्यया) विशेष स्तुति से (समिद्धः) संदीप्त, (शुक्रः) प्रज्वलित और (आहुतः) उपासकों की आत्माहुति से परिपूजित होकर (वृत्राणि) अध्यात्म-प्रकाश के आच्छादक पापों को (जङ्घनत्) अतिशय पुनः-पुनः नष्ट कर दे ॥४॥ श्लेष से यज्ञाग्नि-पक्ष में भी इस मन्त्र की अर्थ-योजना करनी चाहिए ॥४॥
भावार्थःयाज्ञिक जनों द्वारा हवियों से आहुत प्रदीप्त यज्ञाग्नि जैसे रोग आदिकों को निःशेषरूप से विनष्ट कर देता है, वैसे ही परमात्मा-रूप अग्नि योगाभ्यासी जनों के द्वारा हार्दिक स्तुति से बार-बार संदीप्त तथा प्राण, इन्द्रिय, आत्मा, मन, बुद्धि आदि की हवियों से आहुत होकर उनके पाप-विचारों को सर्वथा निर्मूल कर देता है ॥४॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
प्रे꣡ष्ठं꣢ वो꣣ अ꣡ति꣢थिꣳ स्तु꣣षे꣢ मि꣣त्र꣡मि꣢व प्रि꣣य꣢म् । अ꣢ग्ने꣣ र꣢थं꣣ न꣡ वेद्य꣢꣯म् ॥५॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रणी परमात्मन् ! (प्रेष्ठम्) सबसे अधिक प्रिय (अतिथिम्) अतिथिरूप, (मित्रम् इव) मित्र के समान (प्रियम्) प्रिय, (रथं न) रथ के समान, (वेद्यम्) प्राप्तव्य (वः) आपकी, मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥५॥ यहाँ 'मित्र के समान प्रिय' और 'रथ के समान प्राप्तव्य' में उपमालङ्कार है। अग्नि में अतिथित्व के आरोप में रूपक है ॥५॥
भावार्थःमित्र जैसे सबको प्रिय होता है, वैसे परमात्मा उपासकों को प्रिय है। रथ जैसे गन्तव्य स्थान पर पहुँचने के लिए प्राप्तव्य होता है, वैसे ही परमात्मा प्रेय-मार्ग और श्रेय-मार्ग के लक्ष्यभूत ऐहिक और पारलौकिक उत्कर्ष को पाने के लिए सबसे प्राप्त करने योग्य तथा स्तुति करने योग्य है। हृदयप्रदेश में विद्यमान परमात्मा साक्षात् घर में आया हुआ सबसे अधिक प्रिय अतिथि ही है, अतः वह अतिथि के समान सत्कार करने योग्य है ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
त्वं꣡ नो꣢ अग्ने꣣ म꣡हो꣢भिः पा꣣हि꣡ विश्व꣢꣯स्या꣣ अ꣡रा꣢तेः । उ꣣त꣢ द्वि꣣षो꣡ मर्त्य꣢꣯स्य ॥६॥
पदार्थःहे (अग्ने) सबके नायक तेजःस्वरूप परमात्मन् ! (त्वम्) जगदीश्वर आप (महोभिः) अपने तेजों से (विश्वस्याः) सब (अ-रातेः) अदान-भावना और शत्रुता से, (उत) और (मर्त्यस्य) मनुष्य के (द्विषः) द्वेष से (नः) हमारी (पाहि) रक्षा कीजिए ॥६॥ इस मन्त्र की श्लेष द्वारा राजा तथा विद्वान् के पक्ष में भी अर्थ-योजना करनी चाहिए ॥६॥
भावार्थःअदानवृत्ति से ग्रस्त मनुष्य अपने पेट की ही पूर्ति करनेवाला होकर सदा स्वार्थ ही के लिए यत्न करता है। उससे कभी सामाजिक और आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती। दान और परोपकार की तथा मैत्री की भावना से ही पारस्परिक सहयोग द्वारा लक्ष्यपूर्ति हो सकती है। अतः हे जगदीश्वर, हे राजन् और हे विद्वन् ! आप अपने तेजों से, अपने क्षत्रियत्व के प्रतापों से और अपने विद्याप्रतापों से सम्पूर्ण अदान-भावना तथा शत्रुता से हमारी रक्षा कीजिए। और जो मनुष्य हमसे द्वेष करता है तथा द्वेषबुद्धि से हमारी प्रगति में विघ्न उत्पन्न करता है, उसके द्वेष से भी हमारी रक्षा कीजिए, जिससे सूत्र में मणियों के समान परस्पर सांमनस्य में पिरोये रहते हुए हम उन्नत होवें ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ए꣢ह्यू꣣ षु꣡ ब्रवा꣢꣯णि꣣ ते꣡ऽग्न꣢ इ꣣त्थे꣡त꣢रा꣣ गि꣡रः꣢ । ए꣣भि꣡र्व꣢र्धास꣣ इ꣡न्दु꣢भिः ॥७॥
पदार्थःहे (अग्ने) परमात्मन् ! आप (आ इहि उ) मेरे हृदय-प्रदेश में आइये। मैं (ते) आपके लिए (इत्था) सत्य भाव से (इतराः) सामान्य-विलक्षण (गिरः) वेदवाणियों को (सु) सम्यक् प्रकार से, पूर्ण मनोयोग से (ब्रवाणि) बोलूँ, अर्थात् वेदवाणियों से आपकी स्तुति करूँ। आप (एभिः) इन मेरे द्वारा समर्पित किये जाते हुए (इन्दुभिः) भावपूर्ण भक्तिरस-रूप सोमरसों से (बर्धासे) वृद्धि को प्राप्त करें। जैसे चन्द्र-किरणों से समुद्र और वनस्पति बढ़ते हैं, यह ध्वनित होता है, क्योंकि इन्दु चन्द्र-किरणों का भी वाचक होता है ॥७॥
भावार्थःमनुष्यकृत वाणियाँ सामान्य होती हैं, पर वेदवाणियाँ परमेश्वरकृत होने के कारण उनसे विलक्षण हैं। उनमें प्रत्येक पद साभिप्राय तथा विविध अर्थों का प्रकाशक है। उपासक लोग यदि उन वाणियों से परमात्मा को भजें और उसके प्रति अपने भक्तिरस-रूप सोमरसों को प्रवाहित करें, तो वह चन्द्र-किरणों से जैसे समुद्र, वनस्पति आदि बढ़ते हैं, वैसे उन भक्तिरसों से तृप्त होकर उन उपासकों के हृदय में अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त करके उन्हें कृतकृत्य कर दे ॥७॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
आ꣡ ते꣢ व꣣त्सो꣡ मनो꣢꣯ यमत्पर꣣मा꣡च्चि꣢त्स꣣ध꣡स्था꣢त् । अ꣢ग्ने꣣ त्वां꣢ का꣢मये गि꣣रा꣢ ॥८॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगत्पिता परमात्मन् ! (ते) तेरा (वत्सः) प्रिय पुत्र (परमात् चित्) सुदूरस्थ भी (सधस्थात्) प्रदेश से (मनः) अपने मन को (आयमत्) लाकर तुझ में केन्द्रित कर रहा है। अर्थात् मैं तेरा प्रिय पुत्र तुझमें मन को केन्द्रित कर रहा हूँ। मैं (गिरा) स्तुति-वाणी से (त्वाम्) तुझ परमात्मा की (कामये) कामना कर रहा हूँ, अर्थात् तेरे प्रेम में आबद्ध हो रहा हूँ ॥८॥
भावार्थःजब मनुष्य सांसारिक विषयों की निःसारता को देख लेता है, तब दूर-से-दूर भू-प्रदेशों में भटकते हुए अपने मन को सभी प्रदेशों से लौटा कर परमात्मा में ही संलग्न कर लेता है और वाणी से परमात्मा के ही गुण-धर्मों का बारम्बार स्तवन करता है और उसके प्रेम से परिप्लुत हृदयवाला होकर सम्पूर्ण पृथिवी के भी राज्य को उसके समक्ष तुच्छ गिनता है ॥८॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
त्वा꣡म꣢ग्ने꣣ पु꣡ष्क꣢रा꣣द꣡ध्यथ꣢꣯र्वा꣣ नि꣡र꣢मन्थत । मू꣣र्ध्नो꣡ विश्व꣢꣯स्य वा꣣घ꣡तः꣢ ॥९॥
पदार्थःहे (अग्ने) तेजःस्वरूप परमात्मन् ! (अथर्वा) चलायमान न होनेवाला स्थितप्रज्ञ योगी (त्वाम्) आपको (विश्वस्य) सकल ज्ञानों के (वाहकात्) वाहक (पुष्करात् मूर्ध्नः अधि) कमलाकार मस्तिष्क में (निरमन्थत) मथकर प्रकट करता है। परमात्मा रूप अग्नि को मथकर प्रकट करने की प्रक्रिया बताते हुए श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा है—“अपने आत्मा को निचली अरणी बनाकर और ओंकार को उपरली अरणी बनाकर ध्यान-रूप मन्थन के अभ्यास से छिपे हुए परमात्मा-रूप अग्नि को प्रकट करे (श्वेता० २।१४)।” कमल के पत्ते (पुष्करपर्ण) के ऊपर अग्नि उत्पन्न हुआ था, यह कथा इसी मन्त्र के आधार पर रच ली गयी है ॥९॥
भावार्थःजैसे अरणियों के मन्थन से यज्ञवेदि-रूप कमलपत्र के ऊपर यज्ञाग्नि उत्पन्न की जाती है, वैसे ही स्थितप्रज्ञ योगियों को ध्यान-रूप मन्थन से कमलाकार मस्तिष्क में परमात्मा-रूप अग्नि को प्रकट करना चाहिए ॥९॥१ विवरणकार माधव ने इस मन्त्र के भाष्य में यह इतिहास लिखा है—“सर्वत्र घोर अन्धकार छाया हुआ था, तब मातरिश्वा वायु को आकाश में सूक्ष्म अग्नि दिखाई दी। उसने और अथर्वा ऋषि ने उस अग्नि को मथकर प्रकट किया।” उसका किया हुआ मन्त्रार्थ साररूप में इस प्रकार है— “(अग्ने) हे अग्नि ! (अथर्वा) अथर्वा ऋषि ने (त्वाम्) तुझे (मूर्ध्नः) प्रधानभूत (पुष्करात्) अन्तरिक्ष से (विश्वस्य वाघतः) सब ऋत्विज् यजमानों के लिए (निरमन्थत) अतिशरूप से मथकर निकाला।” वस्तुतः विवरणकार- प्रदत्त कथानक सृष्ट्युत्पत्ति-प्रक्रिया में अग्नि के जन्म का इतिहास समझना चाहिए। आकाश के बाद वायु और वायु के बाद अग्नि, यह उत्पत्ति का क्रम है। उत्पन्न हो जाने के बाद आकाश में सूक्ष्म रूप से अग्नि भी विद्यमान था, उसे अथर्वा परमेश्वर ने पूर्वोत्पन्न वायु के साहचर्य से मथकर प्रकट किया, यह अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए। भरतस्वामी के भाष्य का यह आशय है—'अथर्वा ने (मूर्ध्नः) धारक, (विश्वस्य वाघतः) सबके निर्वाहक (पुष्करात्) अन्तरिक्ष से या कमलपत्र से, अग्नि को मथकर निकाला।' सायण का अर्थ है—'(अग्ने) हे अग्नि ! (अथर्वा) अथर्वा नाम के ऋषि ने (मूर्ध्नः) मूर्धा के समान धारक (विश्वस्य) सब जगत् के (वाघतः) वाहक (पुष्करात् अधि) पुष्करपर्ण अर्थात् कमलपत्र के ऊपर (त्वाम्) तुझे (निरमन्थत) अरणियों में से उत्पन्न किया।' यहाँ भी पुष्करपर्ण सचमुच का कमलपत्र नहीं है, किन्तु यज्ञवेदि का आकाश है और अथर्वा है स्थिर चित्त से यज्ञ करनेवाला यजमान, जो यज्ञकुण्ड में अरणियों से अग्नि उत्पन्न करता है, यह तात्पर्य जानना चाहिए। उवट ने य० ११।३२ के भाष्य में 'जल ही पुष्कर है, प्राण अथर्वा है' श० ४।२।२।२ यह शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण देकर मन्त्रार्थ किया है—'तुझे हे अग्नि, (पुष्करात्) जल में से (अथर्वा) सतत गतिमान् प्राण ने (निरमन्थत) मथकर पैदा किया।' यही अर्थ महीधर को भी अभिप्रेत है। यहाँ प्राण से प्राणवान् परमेश्वर या विद्वान् मनुष्य, जल से बादल में स्थित जल और अग्नि से विद्युत् जानने चाहिए। अथवा शरीरस्थ प्राण खाये-पिये हुए रसों से जीवनाग्नि को उत्पन्न करता है, यह तात्पर्य समझना चाहिए। महीधर ने दूसरा वैकल्पिक अर्थ पुष्करपर्ण (कमलपत्र) के ऊपर अग्नि को मथने परक ही किया है। भाष्यकारों ने तात्पर्य प्रकाशित किये बिना ही कथाएँ लिख दी हैं, जो भ्रम की उत्पत्ति का कारण बनी हैं। वस्तुतः अथर्वा नामक किसी ऋषि का इतिहास इस मन्त्र में नहीं है, क्योंकि वेदमन्त्र ईश्वरप्रोक्त हैं तथा सृष्टि के आदि में प्रादूर्भूत हुए थे और पश्चाद्वर्ती ऋषि आदिकों के कार्यकलाप का पूर्ववर्ती वेद में वर्णन नहीं हो सकता ॥९॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡व꣢स्व꣣दा꣡ भ꣢रा꣣स्म꣡भ्य꣢मू꣣त꣡ये꣢ म꣣हे꣢ । दे꣣वो꣡ ह्यसि꣢꣯ नो दृ꣣शे꣢ ॥१०
पदार्थःहे (अग्ने) परम पिता परमात्मन् ! आप (महे) महान् (ऊतये) रक्षा के लिए (अस्मभ्यम्) हमें (विवस्वत्) अविद्यान्धकार को निवारण करनेवाला अध्यात्म-प्रकाश (आ भर) प्रदान कीजिए। (हि) क्योंकि, आप (नः) हमारे (दृशे) दर्शन के लिए, हमें विवेकदृष्टि प्रदान करने के लिए (हि) निश्चय ही (देवः) प्रकाश देनेवाले (असि) हैं ॥१०॥ श्लेषालङ्कार से मन्त्र की सूर्यपरक अर्थयोजना भी करनी चाहिए ॥१०॥
भावार्थःसूर्यरूप अग्नि जैसे जीवों की रक्षा के लिए अन्धकार-निवारक ज्योति प्रदान करता है, वैसे ही परमेश्वर अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, मोह आदि रूप अन्धकार के निवारण के लिए हमें आध्यात्मिक तेज प्रदान करे ॥१०॥ प्रथम प्रपाठक, प्रथम अर्ध में प्रथम दशति समाप्त। प्रथम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त।
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
न꣡म꣢स्ते अग्न꣣ ओ꣡ज꣢से गृ꣣ण꣡न्ति꣢ देव कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मै꣢र꣣मि꣡त्र꣢मर्दय ॥११॥
पदार्थःहे (देव) ज्योतिर्मय तथा विद्या आदि ज्योति के देनेवाले (अग्ने) लोकनायक जगदीश्वर अथवा राजन् ! (कृष्टयः) मनुष्य (ते) आपके (ओजसे) बल के लिए (नमः) नमस्कार के वचन (गृणन्ति) उच्चारण करते हैं, अर्थात् बार-बार आपके बल की प्रशंसा करते हैं। आप (अमैः) अपने बलों से (अमित्रम्) शत्रु को (अर्दय) नष्ट कर दीजिए ॥१॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःहे जगदीश्वर तथा हे राजन् ! कैसा आप में महान् बल है, जिससे आप निःसहायों की रक्षा करते हो और जिस बल के कारण आपके आगे बड़े-बड़े दर्पवालों के भी दर्प चूर हो जाते हैं। आप हमारे अध्यात्ममार्ग में विघ्न उत्पन्न करनेवाले काम, क्रोध आदि षड्रिपुओं को और संसार-मार्ग में बाधाएँ उपस्थित करनेवाले मानव शत्रु-दल को अपने उन बलों से समूल उच्छिन्न कर दीजिए, जिससे शत्रु-रहित होकर हम निष्कण्टक आत्मिक तथा बाह्य स्वराज्य का भोग करें ॥१॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
दू꣣तं꣡ वो꣢ वि꣣श्व꣡वे꣢दसꣳ हव्य꣣वा꣢ह꣣म꣡म꣢र्त्यम् । य꣡जि꣢ष्ठमृञ्जसे गि꣣रा꣢ ॥१२॥
पदार्थःहे परमात्मन् ! (दूतम्) दूत अर्थात् सद्गुणों को हमारे पास लाने के लिए दूत के समान आचरण करनेवाले, (विश्ववेदसम्) पूर्वजन्म तथा इस जन्म में किये हुए सब कर्मों को जाननेवाले, (हव्यवाहम्) दातव्य कर्मफल प्राप्त करानेवाले, (अमर्त्यम्) अमर, (यजिष्ठम्) सबसे अधिक यज्ञकर्ता—महान् सृष्टिचक्रप्रवर्तनरूप यज्ञ के संचालक (वः) आपको, मैं (गिरा) वेदवाणी से (ऋञ्जसे) रिझाता हूँ ॥२॥
भावार्थःमनुष्य शुभ या अशुभ जो भी कर्म करता है, परमेश्वर उसी क्षण उन्हें जान लेता है और समय आने पर उनका फल अवश्य देता है। बुढ़ापे और मृत्यु से रहित, सृष्टि-रूप यज्ञ के परम याज्ञिक परमेश्वर की हमें श्रद्धा के साथ वेदमन्त्रों के उच्चारणपूर्वक सदा वन्दना करनी चाहिए ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ त्वा जा꣣म꣢यो꣣ गि꣢रो꣣ दे꣡दि꣢शतीर्हवि꣣ष्कृ꣡तः꣢ । वा꣣यो꣡रनी꣢꣯के अस्थिरन् ॥१३॥
पदार्थःहे अग्ने ! हे ज्योतिर्मय परमात्मन् ! (हविष्कृतः) अपने आत्मा को हवि बनाकर आपको समर्पित करनेवाले मुझ यजमान की (जामयः) बहिनें अर्थात् बहिनों के समान प्रिय और हितकर (गिरः) स्तुति-वाणियाँ (त्वा) आपका (देदिशतीः) पुनः पुनः अधिकाधिक बोध कराती हुई (वायोः) प्राणप्रद आपके (अनीके) समीप (उप अस्थिरन्) उपस्थित हुई हैं ॥३॥ इस मन्त्र में वाणियों में जामित्व (भगिनीत्व) के आरोप से रूपकालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःहे परमात्मन् ! आन्तरिक यज्ञ का अनुष्ठान करने की इच्छावाला मैं श्रद्धालु होकर अपने आत्मा, मन, प्राण आदि को हवि-रूप से आपको समर्पित करता हुआ स्तुति-वाणियों से आपके गुणों का कीर्तन कर रहा हूँ। मेरे प्रेमोपहार को स्वीकार कीजिए ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ त्वाग्ने दि꣣वे꣡दि꣢वे꣣ दो꣡षा꣢वस्तर्धि꣣या꣢ व꣣य꣢म् । न꣢मो꣣ भ꣡र꣢न्त꣣ ए꣡म꣢सि ॥१४॥
पदार्थःहे (दोषावस्तः) मोह-रात्रि को निवारण करनेवाले (अग्ने) प्रकाशमय परमात्मन् ! (वयम्) हम उपासक लोग (दिवे दिवे) प्रत्येक ज्ञानप्रकाश के लिए (धिया) ध्यान, बुद्धि और कर्म के साथ (नमः) नम्रता को (भरन्तः) धारण करते हुए (त्वा) आपकी (उप एमसि) उपासना करते हैं ॥४॥
भावार्थःजो लोग मोह-रात्रि से ढके हुए हैं, उन्हें अपने अन्तःकरण में अध्यात्म-ज्ञान का प्रकाश पाने के लिए नमस्कार की भेंटपूर्वक योगमार्ग का अनुसरण करके ध्यान, बुद्धि और कर्म के साथ परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए ॥४॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ज꣡रा꣢बोध꣣ त꣡द्वि꣢विड्ढि वि꣣शे꣡वि꣢शे य꣣ज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢ꣳ रु꣣द्रा꣡य꣢ दृशी꣣क꣢म् ॥१५
पदार्थःहम उपासक लोग (विशेविशे) सब मनुष्यों के हितार्थ (यज्ञियाय) पूजायोग्य, (रुद्राय) सत्योपदेश प्रदान करनेवाले, अविद्या, अहंकार, दुःख आदि को दूर करनेवाले तथा काम, क्रोध आदि शत्रुओं को रुलानेवाले परमात्मा-रूप अग्नि के लिए (दृशीकम्) दर्शनीय (स्तोमम्) स्तोत्र को [उपहाररूप में देते हैं।] हे (जराबोध) स्तुति को तारतम्यरूप से जाननेवाले अथवा स्तुति के द्वारा हृदय में उद्बुद्ध होनेवाले परमात्मन् ! आप (तत्) उस हमारे स्तोत्र को (विविड्ढि) स्वीकार करो। अथवा इस प्रकार अर्थयोजना करनी चाहिए। उपासक स्वयं को कह रहा है—हे (जराबोध) स्तुति करना जाननेवाले मेरे अन्तरात्मन् ! तू (विशे विशे) मन, बुद्धि आदि सब प्रजाओं के हितार्थ (यज्ञियाय) पूजायोग्य (रुद्राय) सत्य उपदेश देनेवाले, दुःख आदि को दूर करनेवाले, शत्रुओं को रुलानेवाले परमात्मा रूप अग्नि के लिए (तत्) उस प्रभावकारी, (दृशीकम्) दर्शनीय (स्तोमम्) स्तोत्र को (विविड्ढि) कर, अर्थात् उक्त गुणोंवाले परमात्मा की स्तुति कर ॥५॥
भावार्थःहे जगदीश्वर ! आप सबके पूजायोग्य हैं। आप ही रुद्र होकर हमारे हृदय में सद्गुणों को प्रेरित करते हैं, अविवेक, आलस्य आदिकों को निरस्त करते हैं, अन्तःकरण में जड़ जमाये हुए कामादि शत्रुओं को रुलाते हैं। अतः हम आपको हृदय में जगाने के लिए आपके लिए बहुत-बहुत स्तोत्रों को उपहाररूप में लाते हैं। किसी के स्तोत्र हार्दिक हैं या कृत्रिम हैं, यह आप भले प्रकार जानते हैं। इसलिए हमारे द्वारा किये गये स्तोत्रों की हार्दिकता, दर्शनीयता तथा चारुता को जानकर आप उन्हें कृपा कर स्वीकार कीजिए। हे मेरे अन्तरात्मन् ! तू परमात्मा की स्तुति से कभी विमुख मत हो ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ति꣣ त्यं꣡ चारु꣢꣯मध्व꣣रं꣡ गो꣢पी꣣था꣢य꣣ प्र꣡ हू꣢यसे । म꣣रु꣡द्भि꣢रग्न꣣ आ꣡ ग꣢हि ॥१६॥
पदार्थः(त्यम्) उस हमारे द्वारा किये जाते हुए (चारुम्) श्रेष्ठ (अध्वरम्) हिंसा, अधर्म आदि दोषों से रहित उपासनायज्ञ या जीवनयज्ञ के (प्रति) प्रति (गोपीथाय) विषयों में भटकती हुई इन्द्रिय-रूप गौओं की रक्षा के लिए, अथवा हमारे श्रद्धारस-रूप सोमरस के पान के लिए (प्र हूयसे) आप बुलाये जा रहे हो। (अग्ने) हे ज्योतिर्मय परमात्मन् ! आप (मरुद्भिः) प्राणों द्वारा अर्थात् हमसे की जाती हुई प्राणायाम-क्रियाओं द्वारा (आ गहि) हमारे यज्ञ में आओ ॥६॥
भावार्थःहे परमात्मन् ! जैसे पवनों से प्रज्वलित यज्ञाग्नि नाना ज्वालाओं से नृत्य करती हुई सी यज्ञवेदि में हमारे सम्मुख उपस्थित होती है, वैसे ही हमारे प्राणायामरूप पवनों से प्रज्वलित किये हुए आप हमारे जीवनयज्ञ या उपासनायज्ञ में आओ, और मन, वाणी, चक्षु आदि इन्द्रियों को विषयों से निरन्तर बचाते हुए हमारे श्रद्धारस का रिझकर पान करो ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣢श्वं꣣ न꣢ त्वा꣣ वा꣡र꣢वन्तं व꣣न्द꣡ध्या꣢ अ꣣ग्निं꣡ नमो꣢꣯भिः । स꣣म्रा꣡ज꣢न्तमध्व꣣रा꣡णा꣢म् ॥१७॥
पदार्थः(वारवन्तम्) डाँस, मच्छर आदि को निवारण करनेवाले बालों से युक्त (अश्वं न) घोड़े के समान (वारवन्तम्) विपत्तिनिवारण के सामर्थ्यों से युक्त, (अध्वराणाम्) हिंसादि दोषों से रहित यज्ञों के (सम्राजन्तम्) सम्राट् के समान (त्वा) आप (अग्निम्) तेजस्वी परमात्मा को (नमोभिः) नमस्कारों से (वन्दध्यै) वन्दना करने के लिए [(आहुवे) पुकारता हूँ] ॥७॥ 'अश्वं न त्वा वारवन्तम्' में श्लिष्टोपमाङ्कार है। 'सम्राजन्तम् अध्वराणाम्' में लुप्तोपमा है ॥७॥
भावार्थःघोड़ा जैसे बालों से डाँस, मच्छर आदि का निवारण करता है, वैसे परमेश्वर अपने निवारणसामर्थ्यों से विपत्ति आदि का निवारण करता है। जैसे सम्राट् का अपने राज्य में सब पर प्रभुत्व होता है, वैसे ही परमात्मा विविध यज्ञों का प्रभु है। अतः ध्यान-यज्ञ में श्रद्धा के साथ सबको उसे पुकारना चाहिए ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
औ꣣र्वभृगुव꣡च्छुचि꣢꣯मप्नवान꣣व꣡दा हु꣢꣯वे । अ꣣ग्नि꣡ꣳ स꣢मु꣣द्र꣡वा꣢ससम् ॥१८॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। मैं (और्वभृगुवत्) पार्थिव पदार्थों को तपानेवाले सूर्य के समान, और (अप्नवानवत्) क्रियासेवी वायु के समान (शुचिम्) पवित्र व पवित्रताकारक, और (समुद्रवाससम्) हृदयाकाश में व ब्रह्माण्डाकाश में निवास करनेवाले (अग्निम्) ज्योतिष्मान् तथा ज्योतिष्प्रद परमात्मा को (आहुवे) पुकारता हूँ ॥ द्वितीय—विद्युत् के पक्ष में। बिजली के प्रयोग के विषय में कहते हैं। मैं (और्वभृगुवत्) जैसे सूर्य को अर्थात् सूर्य के ताप को यन्त्रों आदि में प्रयुक्त करता हूँ, और (अप्नवानवत्) जैसे पाकादि कर्मों का सेवन करनेवाले पार्थिव अग्नि को यन्त्रों आदि में प्रयुक्त करता हूँ, वैसे ही (शुचिम्) प्रदीप्त, (समुद्रवाससम्) अन्तरिक्षनिवासी (अग्निम्) वैद्युत अग्नि को (आहुवे) प्रकाश के लिए तथा यान आदि में प्रयुक्त करने के लिए अपने समीप लाता हूँ ॥८॥ इस मन्त्र में उपमा और श्लेष अलङ्कार हैं ॥८॥
भावार्थःजैसे सूर्य और वायु पवित्र, पवित्रताकारक और सबके जीवनाधार हैं, वैसे ही परमात्मा भी है। जैसे सूर्य और वायु आकाश में निवास करते हैं, वैसे ही परमात्मा हृदयाकाश में और विश्वब्रह्माण्ड के आकाश में निवास करता है। ऐसे परमात्मा का सबको साक्षात्कार करना चाहिए। साथ ही सूर्याग्नि, पार्थिवाग्नि तथा वैद्युत अग्नि के द्वारा यान आदि चलाने चाहिएँ ॥८॥ 'जैसे और्व ऋषि, भृगु ऋषि और अप्नवान ऋषि शुचि अग्नि को बुलाते हैं, वैसे ही मैं बुला रहा हूँ', यह विवरणकार की व्याख्या है। भरतस्वामी का भी यही अभिप्राय है। सायण ने 'और्व' और 'भृगु' अलग-अलग नाम न मानकर एक 'और्वभृगु' नाम माना है। यह सब व्याख्यान असंगत है, क्योंकि सृष्टि के आदि में प्रादुर्भूत वेदों में पश्चाद्वर्ती ऋषि आदिकों का इतिहास नहीं हो सकता ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣡मि꣢न्धा꣣नो꣡ मन꣢꣯सा꣣ धि꣡य꣢ꣳ सचेत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । अ꣣ग्नि꣡मि꣢न्धे वि꣣व꣡स्व꣢भिः ॥१९॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (मनसा) मन से (अग्निम्) हृदय में छिपे परमात्मा-रूप अग्नि को (इन्धानः) प्रदीप्त अर्थात् प्रकट करता हुआ (मर्त्यः) मरणधर्मा मनुष्य (धियम्) कर्म को (सचेत) सेवे—यह वैदिक प्रेरणा है। उस प्रेरणा से प्रेरित हुआ मैं (विवस्वभिः) अज्ञान को विध्वस्त करनेवाली, आदित्य के समान भासमान मनोवृत्तियों से (अग्निम्) ज्योतिर्मय परमात्माग्नि को तथा कर्म की अग्नि को (इन्धे) प्रदीप्त करता हूँ, हृदय में प्रकट करता हूँ ॥ द्वितीय—यज्ञाग्नि के पक्ष में। यज्ञकर्म के लिए प्रेरणा है। (मनसा) श्रद्धा के साथ (अग्निम्) यज्ञाग्नि को (इन्धानः) प्रदीप्त करता हुआ (मर्त्यः) यजमान मनुष्य (धियम्) यज्ञविधियों को भी (सचेत) करे—यह वेद का आदेश है। तदनुसार मैं भी यज्ञकर्म करने के लिए (विवस्वभिः) प्रातः सूर्यकिरणों के उदय के साथ ही (अग्निम्) यज्ञाग्नि को (इन्धे) प्रदीप्त करता हूँ। इससे यह सूचित होता है कि प्रातः यज्ञ का समय सूर्यकिरणों का उदय-काल है ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःयहाँ 'मर्त्य' पद साभिप्राय है। मनुष्य मरणधर्मा है, न जाने कब मृत्यु की पकड़ में आ जाये। इसलिए जैसे यज्ञकर्म करने के लिए अग्नि को प्रज्वलित करता है, वैसे ही इसी जन्म में योगाभ्यास से हृदय में परमात्मा को प्रकाशित करके जीवन-पर्यन्त अग्निहोत्र आदि तथा समाज-सेवा आदि कर्मों को करे। यह न समझे कि यदि परमेश्वर का साक्षात्कार कर लिया, तो फिर कर्मों से क्या प्रयोजन, क्योंकि 'कर्मों को करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे' (य० ४०।२), यही वैदिक मार्ग है ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
आ꣢꣫दित्प्र꣣त्न꣢स्य꣣ रे꣡त꣢सो꣣ ज्यो꣡तिः꣢ पश्यन्ति वास꣣र꣢म् । प꣣रो꣢꣫ यदि꣣ध्य꣡ते꣢ दि꣣वि꣢ ॥२०॥
पदार्थः(आत् इत्) उसके अनन्तर ही (प्रत्नस्य) सनातन, (रेतसः) वीर्यवान् परमसामर्थ्यशाली परमात्म-सूर्य की (वासरम्) राग, द्वेष, मोह आदि के अन्धकार को दूर करनेवाली, अथवा अणिमा आदि ऐश्वर्यों की निवासक, अथवा दिव्य दिन उत्पन्न कर देनेवाली (ज्योतिः) ज्योति को—योगदर्शनोक्त ज्योतिष्मती वृत्ति को, ज्ञानदीप्ति को या (विवेकख्याति) को, योगीजन (पश्यन्ति) देख पाते हैं, (यत्) जब, वह परमात्म-सूर्य (परः) परे (दिवि) आत्मारूप द्युलोक में (इध्यते) प्रदीप्त हो जाता है ॥१०॥ श्लेष से सूर्य के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥१०॥
भावार्थःजैसे प्रातःकाल उदित सूर्य जब मध्याह्न के आकाश में पहुँच जाता है, तभी लोग उसके अन्धकार-निवारक, देदीप्यमान, दिन को उत्पन्न करनेवाले सम्पूर्ण प्रभामण्डल को देख पाते हैं, वैसे ही जब योगियों से ध्यान किया गया परमात्मा उनके आत्म-लोक में जगमगाने लगता है, तभी वे उसके राग, द्वेष आदि के विनाशक, योगसिद्धियों के निवासक, जीवन्मुक्तिरूप दिन के जनक दिव्य प्रकाश का साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं ॥१०॥ इस दशति में परमात्मा के गुण-कर्म-स्वभाव का वर्णन करते हुए उसे रिझाने का, उसके प्रति नमस्कार करने का, उसे स्तोत्र अर्पण करने का, मनुष्यों को परमेश्वर की स्तुति के साथ-साथ कर्म में भी प्रेरित करने का और परम ज्योति के दर्शन का वर्णन है, अतः इस दशति के अर्थ की पूर्व दशति के अर्थ के साथ संगति है ॥ प्रथम प्रपाठक, प्रथम अर्ध में द्वितीय दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्निं꣡ वो꣢ वृ꣣ध꣡न्त꣢मध्व꣣रा꣡णां꣢ पुरू꣣त꣡म꣢म् । अ꣢च्छा꣣ न꣢प्त्रे꣣ स꣡ह꣢स्वते ॥२१॥
पदार्थःहे मनुष्यो, (वः) आप लोग (सहस्वते) प्रशस्त बल से युक्त (नप्त्रे) पतन को प्राप्त न होनेवाली तथा पतित न करनेवाली भौतिक सन्तान तथा सद्गुणादिरूप दिव्य सन्तान की प्राप्ति के लिए, (वृधन्तम्) वृद्धि करनेवाले, (अध्वराणाम्) अग्निहोत्रादि-अश्वमेधपर्यन्त, हिंसा-रहित, कर्मकाण्डमय यज्ञों के अथवा स्तुति, प्रार्थना, उपासना, स्वाध्याय, ब्रह्मयज्ञादि ज्ञानयज्ञों के (पुरूतमम्) अतिशय पूरक (अग्निम्) तेजोमय, अग्रणी परमात्मा के (अच्छ) अभिमुख होवो, अर्थात् उसकी आराधना करो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर उपासकों की उन्नति करता है, उनसे किये जानेवाले ज्ञानयज्ञ, भक्तियज्ञ और कर्मयज्ञों को पूर्ण करता है और उन्हें सुप्रशस्त सन्तान तथा सद्गुण प्राप्त कराता है ॥१॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣢स्ति꣣ग्मे꣡न꣢ शो꣣चि꣢षा꣣ य꣢ꣳ स꣣द्वि꣢श्वं꣣ न्या꣢३꣱त्रि꣡ण꣢म् । अ꣣ग्नि꣡र्नो꣢ वꣳसते र꣣यि꣢म् ॥२२॥
पदार्थः(अग्निः) तेजोमय परमात्मा (तिग्मेन) तीक्ष्ण (शोचिषा) तेज से (विश्वम्) समस्त (अत्रिणम्) भक्षक काम-क्रोधादि अन्तःशत्रुवर्ग को और चोर, लुटेरे आदि सामाजिक शत्रुवर्ग को (नियंसत्) नियन्त्रित करे। (अग्निः) वह अग्निपदवाच्य परमात्मा (नः) हमारे लिए (रयिम्) सोना-चाँदी, प्रजा-पशु आदि लौकिक धन तथा सत्य, अहिंसा आदि आध्यात्मिक धन (वंसते) बाँटकर देवे ॥२॥ श्लेष से भौतिक अग्नि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥२॥
भावार्थःजैसे पार्थिव अग्नि या विद्युत् तीक्ष्ण तेज से अपने पास आयी वस्तु को दग्ध करता है और शिल्पादि कर्मों में प्रयुक्त होकर धन प्रदान करता है, वैसे ही परमात्मा-रूप अग्नि उपासकों के आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं का निग्रह करता है और उन उपासकों को सांसारिक एवं आध्यात्मिक सम्पत्ति वितीर्ण करता है ॥२॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡ग्ने꣢ मृ꣣ड꣢ म꣣हा꣢ꣳ अ꣣स्य꣢य꣣ आ꣡ दे꣢व꣣युं꣡ जन꣢꣯म् । इ꣣ये꣡थ꣢ ब꣣र्हि꣢रा꣣स꣡द꣢म् ॥२३॥
पदार्थःहे (अग्ने) प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप मुझे (मृड) सुखी कीजिए। आप (महान्) महान् (असि) हो। आप (देवयुम्) दिव्यगुणों की कामना करनेवाले अथवा परमात्माभिलाषी (जनम्) मुझ जन को (अयः) प्राप्त हुए हो। मेरे (बर्हिः) हृदयरूप आसन पर (आसदम्) बैठने के लिए (आ इयेथ) आये हो ॥३॥
भावार्थःहे परमेश्वर, हे अन्तर्यामिन् ! आप बड़ी कृपा करके मुझ अपने भक्त के हृदयासन पर आसीन होने के लिए आये हैं। निरन्तर दिव्यगुणों का सान्निध्य चाहता हुआ मैं आपके अनुग्रह की याचना करता हूँ। आप महान् हैं, मेरे विषय में भी अपनी महत्ता को चरितार्थ करें। सदा मुझे आनन्दित करते रहें ॥३॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्ने꣣ र꣡क्षा꣢ णो꣣ अ꣡ꣳह꣢सः꣣ प्र꣡ति꣢ स्म देव रीष꣣तः꣢ । त꣡पि꣢ष्ठैर꣣ज꣡रो꣢ दह ॥२४॥
पदार्थःहे (अग्ने) ज्योतिष्मन् परमात्मन् ! आप (नः) हमारा (अंहसः) पापाचरण से (रक्ष त्राण) कीजिए। हे (देव) दिव्यगुणकर्मस्वभाव, सकलैश्वर्यप्रदाता, प्रकाशमान, सर्वप्रकाशक जगदीश्वर ! (अजरः) स्वयं नश्वरता, जर्जरता आदि से रहित आप (रिषतः) हिंसापरायण आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को (तपिष्ठैः) अतिशय संतापक स्वकीय सामर्थ्यों से (प्रति दह स्म) भस्मसात् कर दीजिए ॥४॥ इस मन्त्र की श्लेष से भौतिक अग्नि तथा राजा के पक्ष में भी अर्थ-योजना करनी चाहिए ॥४॥
भावार्थःजैसे भौतिक अग्नि शीत से, अन्धकार से और बाघ आदिकों से रक्षा करता है, अथवा राजा पापियों को दण्डित कर, आक्रमणकारियों और शत्रुओं को पराजित कर प्रजा की पाप तथा शत्रुओं से रक्षा करता है, वैसे ही परमात्मा हमें आत्मरक्षा करने का सामर्थ्य प्रदान कर पापाचरण से तथा आन्तरिक एवं बाह्य शत्रुओं से हमारी रक्षा करे ॥४॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡ग्ने꣢ यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि ये तवाश्वा꣢꣯सो देव सा꣣ध꣡वः꣢ । अ꣢रं꣣ व꣡ह꣢न्त्या꣣श꣡वः꣢ ॥२५॥
पदार्थःहे (देव) कर्मोपदेशप्रदाता (अग्ने) जगन्नायक परमेश्वर ! ये जो (तव) आपके अर्थात् आप द्वारा रचित (साधवः) कार्यसाधक (आशवः) वेगवान् (अश्वासः) इन्द्रिय, प्राण, मन एवं बुद्धिरूप घोड़े (अरम्) पर्याप्त रूप से (वहन्ति) हमें निर्धारित लक्ष्य पर पहुँचाते हैं, उनको आप (हि) अवश्य (युङ्क्ष्व) कर्म में नियुक्त कीजिए ॥५॥
भावार्थःहे परमात्मदेव ! किये हुए कर्मफल के भोगार्थ तथा नवीन कर्म के सम्पादनार्थ शरीररूप रथ तथा इन्द्रिय, प्राण, मन एवं बुद्धि रूप घोड़े आपने हमें दिए हैं। आलसी बनकर हम कभी निरुत्साही और अकर्मण्य हो जाते हैं। आप कृपा कर हमारे इन्द्रिय, प्राण आदि रूप घोड़ों को कर्म में तत्पर कीजिए, जिससे वैदिक कर्मयोग के मार्ग का आश्रय लेते हुए हम निरन्तर अग्रगामी होवें ॥५॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
नि꣡ त्वा꣢ नक्ष्य विश्पते द्यु꣣म꣡न्तं꣢ धीमहे व꣣य꣢म् । सु꣣वी꣡र꣢मग्न आहुत ॥२६॥
पदार्थःहे (नक्ष्य) प्राप्तव्य, शरणागतों के हितकर, (विश्पते) प्रजापालक, (आहुत) बहुतों से सत्कृत (अग्ने) सबके अग्रणी, ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! (वयम्) हम उपासक (द्युमन्तम्) दीप्तिमान्, (सुवीरम्) श्रेष्ठ वीरतादि गुणों को प्राप्त करानेवाले (त्वा) आपको (निधीमहे) निधिवत् अपने अन्तःकरण में धारण करते हैं अथवा आपका ध्यान करते हैं ॥६॥
भावार्थःसबको चाहिए कि शरणागतवत्सल, प्रजाओं के पालनकर्त्ता, बहुत जनों से वन्दित, वीरता को देनेवाले, तेज के निधि परमेश्वर को अपने हृदय में धारण करें और उसका ध्यान करें ॥६॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣢र्मू꣣र्धा꣢ दि꣣वः꣢ क꣣कु꣡त्पतिः꣢꣯ पृथि꣣व्या꣢ अ꣣य꣢म् । अ꣣पा꣡ꣳ रेता꣢꣯ꣳसि जिन्वति ॥२७॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (अग्निः) सबका अग्रनेता परमेश्वर (मूर्द्धा) शरीर में मूर्द्धा के समान जगत् का शिरोमणि है, (दिवः) प्रकाशमान द्युलोक का (ककुत्) सर्वोन्नत स्वामी है, और (पृथिव्याः) पृथिवी का (पतिः) पालक है। (अयम्) यह परमेश्वर (अपाम्) अन्तरिक्ष के (रेतांसि) जलों को (जिन्वति) वर्षा द्वारा भूमि पर पहुँचाता है ॥ द्वितीय—सूर्य के पक्ष में। (अग्निः) प्रकाशक सूर्यरूप अग्नि (मूर्द्धा) त्रिलोकी का सिर-सदृश, (दिवः) द्युलोकरूपी बैल का (ककुत्) कुब्ब-सदृश और (पृथिव्याः) भूमि का (पतिः) पालनकर्त्ता स्वामी है। यह (अपाम्) अन्तरिक्ष के (रेतांसि) जलों को (जिन्वति) भूमि पर प्रेरित करता है, बरसाता है ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर सूर्य के समान है, यह उपमाध्वनि है। मूर्द्धा के समान, ककुत् के समान, इस प्रकार लुप्तोपमा है, अथवा अग्नि में मूर्द्धत्व तथा ककुत्त्व का आरोप होने से रूपकालङ्कार है। अग्नि में ककुत्त्व का आरोप शाब्द तथा द्युलोक में वृषभत्व का आरोप आर्थ है, अतः एकदेशविवर्ती रूपक है ॥७॥
भावार्थःजैसे सूर्य सौरलोक का मूर्धातुल्य, द्युलोक का कुब्ब-तुल्य और भूमि का पालनकर्त्ता है, वैसे ही हमारे द्वारा उपासना किया जाता हुआ यह परमेश्वर सकल ब्रह्माण्ड का शिरोमणि है, उज्ज्वल नाना नक्षत्रों से जटित द्युलोक का अधिपति है और विविध पर्वत, नदी, नद, सागर, सरोवर, लता, वृक्ष, पत्र, पुष्प आदि की शोभा से युक्त भूमण्डल का पालक है। वही सूर्य के समान आकाश में स्थित मेघजलों को भूमि पर बरसाता है। अतः वह सबका धन्यवाद-योग्य है ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
इ꣣म꣢मू꣣ षु꣢꣫ त्वम꣣स्मा꣡क꣢ꣳ स꣣निं꣡ गा꣢य꣣त्रं꣡ नव्या꣢꣯ꣳसम् । अ꣡ग्ने꣢ दे꣣वे꣢षु꣣ प्र꣡ वो꣢चः ॥२८॥
पदार्थःहे (अग्ने) अनन्तविद्यामय जगदीश्वर! (त्वम्) सब मङ्गलों को देनेवाले आप (इमम्) इस, (अस्माकम्) हम मनुष्यों के (सनिम्) बहुत बोधप्रद, (नव्यांसम्) नवीनतर (गायत्रम्) गायत्र्यादि छन्दों से युक्त चारों वेदों का (देवेषु) दिव्यगुणयुक्त विद्वान् ऋषियों के प्रति (सुप्रवोचः) सम्यक्तया सृष्टि के आदि में प्रवचन करते हो ॥८॥
भावार्थःजगत्पिता, परम कारुणिक परमेश्वर मनुष्यों के कर्त्तव्यबोध के लिए सृष्टि के आदि में महर्षियों के हृदयों में चारों वेदों का उपदेश करता है, जिनका अध्ययन करके हम ज्ञानी बनते हैं। उसकी इस महती कृपा का कौन अभिनन्दन नहीं करेगा? ॥८॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
तं꣡ त्वा꣢ गो꣣प꣡व꣢नो गि꣣रा꣡ जनि꣢꣯ष्ठदग्ने अङ्गिरः । स꣡ पा꣢वक श्रुधी꣣ ह꣡व꣢म् ॥२९॥
पदार्थःहे (अङ्गिरः) मेरे प्राणभूत (अग्ने) ज्ञान के सूर्य, जगन्नेता परमात्मन् ! (तम्) उस समस्त गुणगणों से युक्त (त्वा) आपको (गो-पवनः) इन्द्रियरूप या वाणीरूप गौओं का शोधक, पवित्रेन्द्रिय, पूतवाक् स्तोता, अथवा (गोप-वनः) आत्मसेवी स्तोता (गिरा) स्तुतिवाणी या वेदवाणी से (जनिष्ठत्) अपने अन्तःकरण में प्रकट करता है। हे (पावक) शुद्धिकर्त्ता देव ! (सः) वह तू (हवम्) मेरे आह्वान को (श्रुधि) सुन ॥९॥
भावार्थःपरमेश्वर अव्यक्तरूप से सबके हृदय में सन्निविष्ट है। उसे पवित्रेन्द्रिय, पवित्र वाणीवाला, आत्मसेवी मनुष्य ही वेदमन्त्रों से स्तुति करता हुआ प्रकट करने में समर्थ होता है और परमेश्वर प्रकट होकर हृदय को पवित्र करता है ॥९॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
प꣢रि꣣ वा꣡ज꣢पतिः क꣣वि꣢र꣣ग्नि꣢र्ह꣣व्या꣡न्य꣢क्रमीत् । द꣢ध꣣द्र꣡त्ना꣢नि दा꣣शु꣡षे꣢ ॥३०॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (वाजपतिः) आत्मिक बलों का अधीश्वर, (कविः) मेधावी, दूरदर्शी (अग्निः) प्रकाशस्वरूप परमेश्वर (दाशुषे) अपने आत्मा को हवि बनाकर ईश्वरार्पण करनेवाले आत्मदानी स्तोता के लिए (रत्नानि) रमणीय सद्गुणरूप धन (दधत्) प्रदान करता हुआ, उसकी (हव्यानि) आत्मसमर्पणरूप हवियों को (परि अक्रमीत्) सब ओर से प्राप्त करता है अर्थात् स्वीकार करता है ॥ द्वितीय—यज्ञाग्नि के पक्ष में। (वाजपतिः) अन्नों और बलों का प्रदाता तथा पालक, (कविः) गतिमान् (अग्निः) यज्ञाग्नि (दाशुषे) हवि देनेवाले यजमान के लिए (रत्नानि) आरोग्य आदि रूप रमणीय फलों को (दधत्) देता हुआ (हव्यानि) सुगन्धित, मधुर, पुष्टिकर तथा रोगनाशक घृत, केसर, कस्तूरी आदि हवियों को (परि अक्रमीत्) सूक्ष्म करके चारों ओर फैला देता है ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है और उपमानोपमेयभाव ध्वनित होता है ॥१०॥
भावार्थःजैसे अन्नों और बलों की उत्पत्ति का निमित्त यज्ञाग्नि हवि देनेवाले यजमान को दीर्घायुष्य, आरोग्य आदि फल प्रदान करता है, वैसे ही उपासनायज्ञ में आत्मसमर्पणरूप हवि देनेवाले स्तोता को परमेश्वर सद्गुण आदि रूप फल देता है ॥१०॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣢दु꣣ त्यं꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसं दे꣣वं꣡ व꣢हन्ति के꣣त꣡वः꣢ । दृ꣣शे꣡ विश्वा꣢꣯य꣣ सू꣡र्य꣢म् ॥३१॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य के पक्ष में। (केतवः) किरणें (त्यम्) उस प्रसिद्ध, (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों को प्रकाशित करनेवाले, (देवम्) प्रकाशमान, प्रकाशक, दिन-रात आदि के प्रदाता तथा द्युलोक में स्थित (सूर्यम्) सूर्य-रूप अग्नि को (विश्वाय दृशे) सब प्राणियों के दर्शन के लिए (उद् वहन्ति) पृथिवी आदि लोकों में पहुँचाती हैं, अर्थात् सूर्य ऊपर स्थित हुआ भी किरणों द्वारा सब लोकों में पहुँच जाता है ॥ द्वितीय—परमेश्वर के पक्ष में। (केतवः) जिन्हें ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त हो गई है, वे योगी लोग (त्यम्) स्वयं अनुभव किये गये उस प्रसिद्ध, (जातवेदसम्) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, धनों के उत्पादक और ज्ञानप्रदायक, (देवम्) दिव्यगुणप्रदाता (सूर्यम्) सूर्य के सदृश ज्योतिर्मय परमेश्वर-रूप अग्नि को (विश्वाय दृशे) सबके साक्षात्कार के लिए (उद् वहन्ति) सर्वत्र प्रचारित करते हैं ॥११॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सूर्य और परमेश्वर का उपमानोपमेयभाव व्यंग्य है ॥११॥
भावार्थःजैसे सूर्य के प्रकाश को उसकी किरणें भूमि आदि लोकों में पहुँचाती हैं, जिससे सब लोग देख सकें, वैसे ही योगी विद्वान् जन परमेश्वर का स्वयं साक्षात्कार करके अन्यों के दर्शनार्थ उसे सर्वत्र प्रचारित करते हैं ॥११॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
क꣣वि꣢म꣣ग्नि꣡मुप꣢꣯ स्तुहि स꣣त्य꣡ध꣢र्माणमध्व꣣रे꣢ । दे꣣व꣡म꣢मीव꣣चा꣡त꣢नम् ॥३२॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। हे मनुष्य, तू (अध्वरे) हिंसादिरहित जीवनयज्ञ में (कविम्) वेदकाव्य के कवि एवं क्रान्तदर्शी, (सत्यधर्माणम्) सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, (देवम्) सुख आदि के दाता, (अमीवचातनम्) अज्ञान आदि तथा व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि योगविघ्नकारी मानस रोगों को विनष्ट करनेवाले (अग्निम्) तेजस्वी परमेश्वर की (उप स्तुहि) उपासना कर ॥ द्वितीय—भौतिक अग्नि के पक्ष में। हे मनुष्य, तू (अध्वरे) शिल्पयज्ञ में (कविम्) गतिमान्, (सत्यधर्माणम्) सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, (देवम्) प्रकाशमान, प्रकाशक और व्यवहार-साधक, (अमीवचातनम्) ज्वरादि रोगों को नष्ट करनेवाले, (अग्निम्) आग, बिजली और सूर्य के (उप स्तुहि) गुणों का वर्णन कर ॥१२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१२॥
भावार्थःमनुष्यों को शिल्पविद्या की सिद्धि के लिए जैसे भौतिक आग, बिजली और सूर्य का गुणज्ञानपूर्वक सेवन करना चाहिए, वैसे ही धर्म-प्राप्ति के लिए परमेश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का ज्ञान, वर्णन और अनुकरण करना चाहिए ॥१२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
शं꣡ नो꣢ दे꣣वी꣢र꣣भि꣡ष्ट꣢ये꣣ शं꣡ नो꣢ भवन्तु पी꣣त꣡ये꣢ । शं꣢꣫ योर꣣भि꣡ स्र꣢वन्तु नः ॥३३॥
पदार्थः(देवीः) भौतिक अग्नि की दिव्य ज्वालाओं के समान परमात्माग्नि की दिव्य शक्तियाँ (अभिष्टये) अभीष्ट की प्राप्ति के अर्थ (नः) हमारे लिए (शम्) कल्याणकारिणी हों, (पीतये) प्राप्त के रक्षार्थ (नः) हमारे लिए (शम्) कल्याणकारिणी (भवन्तु) हों। (नः) हमारे (शं योः) आगत कष्टों के शमनार्थ तथा अनागत कष्टों को दूर रखने के लिए (अभिस्रवन्तु) चारों ओर प्रवाहित होती रहें ॥१३॥
भावार्थःअभिष्टि' और 'पीति' शब्दों से क्रमशः योग और क्षेम का ग्रहण होता है। अप्राप्त की प्राप्ति को 'अभिष्टि' या 'योग' कहते हैं और प्राप्त की रक्षा को 'पीति' या 'क्षेम'। परमेश्वर की दिव्य शक्तियाँ हमें योग-क्षेम प्रदान करें, यह अभिप्राय है। साथ ही जिन आपदाओं से ग्रस्त होकर हम पीड़ित होते हैं और जिन अनागत आपदाओं के भय से संत्रस्त होते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि वे हमें धर-दबोचें, वे सब आपत्तियाँ परमेश्वर की दिव्य शक्तियों के प्रभाव से और हमारे पुरुषार्थ से दूर हो जाएँ ॥१३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
क꣡स्य꣢ नू꣣नं꣡ प꣢꣯रीणसि꣣ धि꣡यो꣢ जिन्वसि सत्पते । गो꣡षा꣢ता꣣ य꣡स्य꣢ ते꣣ गि꣡रः꣢ ॥३४॥
पदार्थःहे (सत्पते) सज्जनों के पालक ज्योतिर्मय परमात्मन् ! आप (नूनम्) निश्चय ही (कस्य) किस मनुष्य की (धियः) बुद्धियों को (परीणसि) बहुत अधिक (जिन्वसि) सन्मार्ग में प्रेरित करते हो? यह प्रश्न है। इसका उत्तर देते हैं—(यस्य) जिस मनुष्य को (ते) आपकी (गिरः) उपदेशवाणियाँ (गोसाता) श्रेष्ठ गायों, श्रेष्ठ इन्द्रियबलों, श्रेष्ठ पृथिवी-राज्यों और श्रेष्ठ आत्म-किरणों को प्राप्त कराने में सफल होती हैं, उसी की बुद्धियाँ सन्मार्ग में आप द्वारा प्रेरित की गयी हैं, यह मानना चाहिए ॥१४॥
भावार्थःजो मनुष्य परमात्मा के उपदेश को सुनकर अधिकाधिक भौतिक और आध्यात्मिक सम्पदा को प्राप्त कर लेता है, वही परमात्मा का कृपापात्र है, यह समझना चाहिए ॥१४॥ इस दशति में परमात्मा आदि के महत्त्व का वर्णन करते हुए उनकी स्तुति के लिए प्रेरणा होने से इसके विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ प्रथम प्रपाठक में प्रथम अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
य꣣ज्ञा꣡य꣢ज्ञा वो अ꣣ग्न꣡ये꣢ गि꣣रा꣡गि꣢रा च꣣ द꣡क्ष꣢से । प्र꣡प्र꣢ व꣣य꣢म꣣मृ꣡तं꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसं प्रि꣣यं꣢ मि꣣त्रं꣡ न श꣢꣯ꣳसिषम् ॥३५॥
पदार्थःहे मनुष्यो, (यज्ञायज्ञा) प्रत्येक यज्ञ में (वः) तुम लोगों को (अग्नये) सद्गुणप्रेरक परमात्मा की आराधना करने के लिए, मैं नियुक्त करता हूँ। (गिरागिरा च) और प्रत्येक वाणी से अर्थात् प्रभावजनक वाक्यावली के विन्यास से (दक्षसे) बढ़ने अर्थात् उन्नति करन के लिए, प्रेरित करता हूँ। इस प्रकार (वयम्) तुम-हम सब मिलकर (अमृतम्) अमरणधर्मा, अविनाशी (जातवेदसम्) सर्वज्ञ और सर्वव्यापक परमेश्वर की (प्र प्र) पुनः पुनः प्रशंसा करते हैं। मैं पृथक् भी (प्रियम्) प्रिय (मित्रं न) मित्र के समान, उस परमेश्वर की (प्र प्र शंसिषम्) पुनः पुनः प्रशंसा करता हूँ ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों द्वारा जो भी नित्य या नैमित्तिक यज्ञ आयोजित किये जाते हैं, उनमें परमेश्वर का अवश्य स्मरण और आराधन करना चाहिए। महापुरुष मनुष्यों को यह प्रेरणा दें कि तुम निरन्तर वृद्धि और समुन्नति के लिए प्रयत्न करो। इस प्रकार उपदेश देनेवाले और उपदेश सुननेवाले सब मिलकर एकमति से सर्वज्ञ, सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति करें तथा ऐहलौकिक और पारलौकिक अभ्युदय को प्राप्त करें ॥१॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
पा꣣हि꣡ नो꣢ अग्न꣣ ए꣡क꣢या पा꣣ह्यू꣡३꣱त꣢ द्वि꣣ती꣡य꣢या । पा꣣हि꣢ गी꣣र्भि꣢स्ति꣣सृ꣡भि꣢रूर्जां पते पा꣣हि꣡ च꣢त꣣सृ꣡भि꣢र्वसो ॥३६॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (ऊर्जां पते) अन्नों, रसों, बलों और प्राणों के अधिपति, (वसो) सर्वत्र बसनेवाले सर्वान्तर्यामी तथा निवासप्रदायक (अग्ने) परमात्मन् ! आप (नः) हमारी (एकया) एक ऋग्-रूप वाणी से (रक्ष) रक्षा कीजिए; (उत) और (द्वितीयया) दूसरी यजुःरूप वाणी से (पाहि) रक्षा कीजिए; (तिसृभिः) तीन ऋग्, यजुः और सामरूप सम्मिलित (गीर्भिः) वाणियों से (पाहि) रक्षा कीजिए; (चतसृभिः) चार ऋग्, यजुः, साम और अथर्वरूप सम्मिलित वाणियों से (पाहि) रक्षा कीजिए। यहाँ चार बार 'पाहि' के प्रयोग से परमेश्वर द्वारा करणीय रक्षा की निरन्तरता सूचित होती है ॥ द्वितीय—विद्वान् के पक्ष में। हे (ऊर्जां पते) बलों के पालक, (वसो) उत्तम निवास देनेवाले, (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्या-प्रकाश से युक्त विद्वन् ! आप (एकया) एक उत्तम शिक्षा से (नः) हमारी (पाहि) रक्षा कीजिए; (उत) और (द्वितीयया) दूसरी अध्यापन-क्रिया से (पाहि) रक्षा कीजिए; (तिसृभिः) कर्म-काण्ड, उपासना-काण्ड और ज्ञान-काण्ड को जतानेवाली तीन (गीर्भिः) वाणियों से (पाहि) रक्षा कीजिए; (चतसृभिः) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनका विज्ञान करानेवाली चार प्रकार की वाणियों से (पाहि) रक्षा कीजिए ॥२॥४
भावार्थःचार वेदवाणियाँ परमेश्वर ने हमारे हित के लिए प्रदान की हैं। यदि हम वेदवर्णित ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान विषयों को पढ़कर कर्तव्य कर्मों का आचरण करें, तो निस्सन्देह हमारी रक्षा होगी। विद्वानों को चाहिए कि वेद पढ़ाकर वेदविहित धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उपदेश देकर हमारी रक्षा करें ॥२॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
बृ꣣ह꣡द्भि꣢रग्ने अ꣣र्चि꣡भिः꣢ शु꣣क्रे꣡ण꣢ देव शो꣣चि꣡षा꣢ । भ꣣र꣡द्वा꣢जे समिधा꣣नो꣡ य꣢विष्ठ्य रे꣣व꣡त्पा꣢वक दीदिहि ॥३७॥
पदार्थःहे (यविष्ठ्य) अतिशय युवा, (पावक) पवित्रकर्ता, (देव) दाता (अग्ने) तेजस्वी परमेश्वर ! (बृहद्भिः) महान् (अर्चिभिः) तेजों से, और (शुक्रेण) शुद्ध (शोचिषा) ज्ञान-प्रकाश से (भरद्वाजे) अपने आत्मा में बल भरनेवाले पुरुषार्थप्रिय मुझ स्तोता के अन्दर अथवा बल एवं उत्साह से सम्पन्न मेरे मन के अन्दर (समिधानः) प्रकाशित होते हुए आप (रेवत्) समृद्धिपूर्वक (दीदिहि) देदीप्यमान हों ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को पुरुषार्थी होकर ही परमेश्वर का आह्वान करना चाहिए। अकर्मण्य की प्रार्थना वह नहीं सुनता ॥३॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
त्वे꣡ अ꣢ग्ने स्वाहुत प्रि꣣या꣡सः꣢ सन्तु सू꣣र꣡यः꣢ । य꣣न्ता꣢रो꣣ ये꣢ म꣣घ꣡वा꣢नो꣣ ज꣡ना꣢नामू꣣र्वं꣡ दय꣢꣯न्त꣣ गो꣡ना꣢म् ॥३८॥
पदार्थःहे (स्वाहुत) श्रद्धारसों की हवियों से सम्यक् आहुतिप्राप्त (अग्ने) तेजोमय परमात्मन् ! आपके (सूरयः) स्तोता विद्वान् जन (त्वे) आपकी दृष्टि में (प्रियासः) प्रिय (सन्तु) होवें, (मघवानः) लौकिक एवं आध्यात्मिक धनों से सम्पन्न (ये) जो (जनानाम्) मनुष्यों के (यन्तारः) शुभ एवं अशुभ कर्मों में नियन्त्रणकर्ता होते हुए (गोनाम्) चक्षु आदि इन्द्रियों के (ऊर्वम्) हिंसक दोष को (दयन्त) नष्ट करते हैं, अथवा (गोनाम्) वेदवाणियों के (ऊर्वम्) समूह को (दयन्त) अन्यों को प्रदान करते हैं; अथवा (गोनाम्) गायों की (ऊर्वम्) गोशाला की (दयन्त) रक्षा करते हैं ॥४॥
भावार्थःजो विद्वान् श्रद्धालु लौकिक और आध्यात्मिक सब प्रकार के धन को उपार्जित कर, योग्य होकर, लोगों का नियन्त्रण करते हैं, अपने और दूसरों के इन्द्रिय-दोषों को दूर करते हैं, वेद-वाणियों का प्रसार करते हैं और अमृत प्रदान करनेवाली गायों की रक्षा करते हैं, वे ही परमात्मा के प्रिय होते हैं ॥४॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
अ꣢ग्ने꣣ ज꣡रि꣢तर्वि꣣श्प꣡ति꣢स्तपा꣣नो꣡ दे꣢व र꣣क्ष꣡सः꣢ । अ꣡प्रो꣢षिवान्गृहपते म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि दि꣣व꣢स्पा꣣यु꣡र्दु꣢रोण꣣युः꣢ ॥३९॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। हे (जरितः) सज्जनों के गुणों के प्रशंसक (अग्ने) परमात्मन् ! आप (विश्पतिः) प्रजापालक हो। हे (देव) ज्योतिर्मय ! आप (रक्षसः) राक्षसी वृत्तिवाले मनुष्यों के (तपानः) सन्तापक हो। हे (गृहपते) ब्रह्माण्डरूप गृह के स्वामिन्! (अप्रोषिवान्) ब्रह्माण्डरूप गृह से कभी प्रवास न करनेवाले, (दिवः पायुः) प्रकाशमान द्युलोक के अथवा प्रकाशमान जीवात्मा के रक्षक, (दुरोणयुः) सबको निवास गृह दिलाना चाहनेवाले आप (महान्) महान् (असि) हो ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (जरितः) परमेश्वर के स्तोता (अग्ने) राष्ट्रनायक राजन् ! आप (विश्पतिः) प्रजाओं के पालक हो। हे (देव) दानादि गुणों से देदीप्यमान राजन् ! आप (रक्षसः) दुष्ट शत्रुओं के (तपानः) सन्तापक हो। हे (गृहपते) राष्ट्र-गृह के स्वामिन् ! (अप्रोषिवान्) राष्ट्र से प्रवास न करनेवाले, (दिवः पायुः) विद्या आदि के प्रकाश के रक्षक, (दुरोणयुः) राष्ट्र-रूप घर की उन्नति चाहनेवाले आप (महान्) महान् (असि) हो ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर सज्जनों की रक्षा करता हुआ, दुर्जनों को दण्ड देता हुआ सबकी समुन्नति चाहता है, वैसे ही राजा भी प्रजाओं का पालन करता हुआ, दुष्टों का उन्मूलन करता हुआ राष्ट्र को उत्कर्ष की ओर ले जाए ॥५॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡व꣢स्वदु꣣ष꣡स꣢श्चि꣣त्र꣡ꣳ राधो꣢꣯ अमर्त्य । आ꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ जातवेदो वहा꣣ त्व꣢म꣣द्या꣢ दे꣣वा꣡ꣳ उ꣢ष꣣र्बु꣡धः꣢ ॥४०॥
पदार्थःहे (अमर्त्य) स्वरूप से मरणधर्मरहित, (जातवेदः) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, ज्ञाननिधि, (अग्ने) प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (त्वम्) आप (अद्य) आज (दाशुषे) धन-धान्य, विद्या आदि का दान करनेवाले मुझे (उषसः) उषा के (चित्रम्) अद्भुत, (विवस्वत्) अज्ञान, दरिद्रता आदि के अन्धकार को दूर करनेवाले (राधः) सत्यरूप अथवा ज्योति-रूप धन को और (उषर्बुधः) उषःकाल में स्वयं जागने तथा अन्यों को जगानेवाले (देवान्) उत्तम विद्वानों तथा दिव्यगुणों को (आ वह) प्राप्त कराओ ॥६॥
भावार्थःसब मनुष्य उषःकाल में प्रबुद्ध होनेवाले दिव्यगुणों को हृदय में धारण करते हुए उषा के समान तेज की किरणों से युक्त, प्राणवान्, यज्ञवान्, प्रबोधवान् और सत्यवान् होकर विद्वानों के संग से सदा जागरूक, सदाचारी और धर्मात्मा होवें ॥६॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
त्वं꣡ न꣢श्चि꣣त्र꣢ ऊ꣣त्या꣢꣫ वसो꣣ रा꣡धा꣢ꣳसि चोदय । अ꣣स्य꣢ रा꣣य꣡स्त्वम꣢꣯ग्ने र꣣थी꣡र꣢सि वि꣣दा꣢ गा꣣धं꣢ तु꣣चे꣡ तु नः꣢꣯ ॥४१॥
पदार्थःहे (वसो) निवासक (अग्ने) परमात्मन् ! (चित्रः) अद्भुत गुण-कर्म-स्वभाववाले, पूज्य और दर्शनीय (त्वम्) आप (ऊत्या) रक्षा के साथ (नः) हमारे लिए (राधांसि) विद्या, सुवर्ण, चक्रवर्ती राज्य, मोक्ष आदि धनों को (चोदय) प्रेरित कीजिए। (त्वम्) आप (अस्य) इस दृश्यमान (रायः) लौकिक तथा पारमार्थिक धन के (रथीः) स्वामी (असि) हो। अतः (नः) हमें तथा (तुचे) हमारे पुत्र-पौत्र आदि सन्तान को (तु) शीघ्र व अवश्य (गाधम्) पूर्वोक्त धन की थाह को, अर्थात् अपरिमित उपलब्धि को, (विदाः) प्राप्त कराओ ॥७॥
भावार्थःहे जगदीश्वर ! सब प्राणियों के तथा नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह आदिकों के निवासक होने से आप 'वसु' कहलाते हो। वह आप जगत् में दिखायी देनेवाले चाँदी-सोना-मोती-मणि-हीरे आदि,, कन्द-मूल-फल आदि, दूध-दही-मक्खन आदि, अहिंसा-सत्य-अस्तेय आदि, शौच-सन्तोष-तप-स्वाध्याय आदि और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष आदि धनों के परम अधिपति हो। आप कृपा कर हमारे अन्दर पुरुषार्थ उत्पन्न करो, जिससे हम भी उन भौतिक और आध्यात्मिक धनों के अधिपति हो सकें ॥७॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
त्व꣢꣯मित्स꣣प्र꣡था꣢ अ꣣स्य꣡ग्ने꣢ त्रातरृ꣣तः꣢ क꣣विः꣢ । त्वां꣡ विप्रा꣢꣯सः समिधान दीदिव꣣ आ꣡ वि꣢वासन्ति वे꣣ध꣡सः꣢ ॥४२॥
पदार्थःहे (व्रातः) रक्षक (अग्ने) अग्रणी परमेश्वर ! (त्वम् इत्) आप निश्चय ही (सप्रथाः) परमयशस्वी एवं सर्वत्र विस्तीर्ण, (ऋतः) सत्यस्वरूप, और (कविः) वेदकाव्य के रचयिता एवं (मेधावियों) में अतिशय मेधावी (असि) हो। हे (समिधान) सम्यक् प्रकाशमान, (दीदिवः) प्रकाशक परमेश्वर ! (वेधसः) कर्मयोगी (विप्रासः) ज्ञानीजन (त्वाम्) आपकी (आ विवासन्ति) सर्वत्र पूजा करते हैं ॥८॥
भावार्थःपरमेश्वर सज्जनों का रक्षक, सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाला, अतिशय मेधावी, वेदकाव्य का कवि, परम कीर्तिमान्, सर्वत्र व्यापक, ज्योतिष्मान् और प्रकाशकों का भी प्रकाशक है। उसके इन गुणों से युक्त होने के कारण कर्म-कुशल विद्वान् जन सदा ही उसकी पूजा करते हैं ॥८॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
आ꣡ नो꣢ अग्ने वयो꣣वृ꣡ध꣢ꣳ र꣣यिं꣡ पा꣢वक꣣ श꣡ꣳस्य꣢म् । रा꣡स्वा꣢ च न उपमाते पु꣣रु꣢स्पृह꣣ꣳ सु꣡नी꣢ती꣣ सु꣡य꣢शस्तरम् ॥४३॥
पदार्थःहे (पावक) चित्तशोधक, पतितपावन (अग्ने) सन्मार्गदर्शक परमात्मन् ! आप (वयोवृधम्) आयु को बढ़ानेवाले, (शंस्यम्) प्रशंसायोग्य (रयिम्) धन को (नः) हमारे लिए (आ) लाइए, और लाकर, हे (उपमाते) उपमानभूत, सर्वोपमायोग्य परमात्मन् ! (पुरुस्पृहम्) बहुत अधिक चाहने योग्य अथवा बहुतों से चाहने योग्य, (सुयशस्तरम्) अतिशय कीर्तिजनक उस धन को (सुनीती) सन्मार्ग पर चलाकर (नः) हमें (रास्व च) प्रदान भी कीजिए ॥९॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से और अपने पुरुषार्थ से सन्मार्ग का अनुसरण करते हुए हम चाँदी, सोना, पृथिवी का राज्य आदि भौतिक तथा विद्या, विनय, योगसिद्धि, मोक्ष आदि आध्यात्मिक धन का संचय करें, जो भरपूर धन हमारी आयु को बढ़ानेवाला तथा उजली कीर्ति को उत्पन्न करनेवाला हो ॥९॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
यो꣢꣫ विश्वा꣣ द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ जना꣢꣯नाम् । म꣢धो꣣र्न꣡ पात्रा꣢꣯ प्रथ꣣मा꣡न्य꣢स्मै꣣ प्र꣡ स्तोमा꣢꣯ यन्त्व꣣ग्न꣡ये꣢ ॥४४॥
पदार्थः(होता) विविध वस्तुओं और शुभ गुणों का प्रदाता, (जनानाम्) मनुष्यों का (मन्द्रः) आनन्दजनकः (यः) जो परमेश्वर (विश्वा) समस्त (वसु) धनों को (दयते) प्रदान करता है, (अस्मै) ऐसे इस (अग्नये) नायक परमेश्वर के लिए (मधोः) शहद के (प्रथमा) श्रेष्ठ (पात्रा न) पात्रों के समान (स्तोमाः) मेरे स्तोत्र (प्रयन्तु) भली-भाँति पहुँचें ॥१०॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःजैसे घर में आये हुए विद्वान् अतिथि को मधु, दही, दूध आदि से भरे हुए पात्र सत्कारपूर्वक समर्पित किये जाते हैं, वैसे ही परम दयालु, परोपकारी के लिए भक्तिभाव से भरे हुए स्तोत्र समर्पित करने चाहिएँ ॥१०॥ इस दशति में परमात्मा के गुणवर्णनपूर्वक उससे समृद्धि आदि की याचना की गयी है, अतः इसके विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ प्रथम प्रपाठक में पूर्व अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
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ए꣣ना꣡ वो꣢ अ꣣ग्निं꣡ नम꣢꣯सो꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣मा꣡ हु꣢वे । प्रि꣣यं꣡ चेति꣢꣯ष्ठमर꣣ति꣡ꣳ स्व꣢ध्व꣣रं꣡ विश्व꣢꣯स्य दू꣣त꣢म꣣मृ꣡त꣢म् ॥४५॥
पदार्थःमैं (एना) इस (नमसा) नमस्कार द्वारा (ऊर्जः नपातम्) बल एवं प्राणशक्ति के पुत्र अर्थात् अतिशय बलवान् और प्राणवान् (प्रियम्) प्रिय, (चेतिष्ठम्) सबसे अधिक ज्ञानी और ज्ञानप्रदाता, (अरतिम्) सर्वव्यापक वा सुखप्रापक, (स्वध्वरम्) उत्कृष्ट, अहिंसामय सृष्टिसंचालन-रूप यज्ञ के कर्ता, (विश्वस्य) सबके (दूतम्) दुःख, दोष आदि को दूर करनेवाले, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करानेवाले तथा काम-क्रोधादि शत्रुओं को उपतप्त करनेवाले, (अमृतम्) स्वरूप से नाश-रहित (वः) आप (अग्निम्) परमात्मा को (आहुवे) पुकारता हूँ ॥१॥
भावार्थःजो परमात्मा बल और प्राण का खजाना, भक्तवत्सल, पूर्णज्ञानी, सर्वव्यापक, सुखज्ञान आदि का प्रदाता, दुःख-दारिद्र्य आदि का विनाशक, विविध यज्ञ करने में कुशल, दोषों को दग्ध करनेवाला, गुणों को प्राप्त करानेवाला और मरणधर्म से रहित है, उसकी सबको प्रेम से श्रद्धापूर्वक स्तुति करनी चाहिए ॥१॥
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शे꣢षे꣣ वने꣡षु꣢ मा꣣तृ꣢षु꣣ सं꣢ त्वा꣣ म꣡र्ता꣢स इन्धते । अ꣡त꣢न्द्रो ह꣣व्यं꣡ व꣢हसि हवि꣣ष्कृ꣢त꣣ आ꣢꣫दिद्दे꣣वे꣡षु꣢ राजसि ॥४६॥
पदार्थःप्रथम—यज्ञाग्नि के पक्ष में। हे यज्ञाग्नि ! तू (वनेषु) वनों में, वन के काष्ठों में, और (मातृषु) अपनी माता-रूप अरणियों के गर्भ में (शेषे) सोता है, छिपे रूप से विद्यमान रहता है। (त्वा) तुझे (मर्तासः) याज्ञिक मनुष्य (समिन्धते) अरणियों को मथकर प्रज्वलित करते हैं। प्रज्वलित हुआ तू (अतन्द्रः) तन्द्रारहित होकर, निरन्तर (हविष्कृतः) हवि देनेवाले यजमान की (हव्यम्) आहुत हवि को (वहसि) स्थानान्तर में पहुँचाता है। (आत् इत्) उसके अनन्तर ही, तू (देवेषु) विद्वान् जनों में (राजसि) राजा के समान प्रशंसित होता है ॥ यहाँ अचेतन यज्ञाग्नि में चेतन के समान व्यवहार आलङ्कारिक है। अचेतन में शयन और तन्द्रा का सम्बन्ध सम्भव न होने से शयन की प्रच्छन्नरूप से विद्यमानता होने में लक्षणा है, इसी प्रकार अतन्द्रत्व की नैरन्तर्य में लक्षणा है। 'वनों में शयन करता है,' इससे 'अग्नि एक वनवासी मुनि के समान है,' यह व्यञ्जना निकलती है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। हे परमात्मन् ! आप (वनेषु) वनों में और (मातृषु) वनों की मातृभूत नदियों में (शेषे) शयन कर रहे हो, अदृश्यरूप से विद्यमान हो। (त्वा) उन आपको (मर्तासः) मनुष्य, योगाभ्यासी जन (समिन्धते) संदीप्त करते हैं, जगाते हैं, योगसाधना द्वारा आपका साक्षात्कार करते हैं। अन्यत्र कहा भी है—पर्वतों के एकान्त में और नदियों के संगम पर ध्यान द्वारा वह परमेश्वर प्रकट होता है। साम० १४३। (अतन्द्रः) निद्रा, प्रमाद, आलस्य आदि से रहित आप, उनकी (हव्यम्) आत्मसमर्पणरूप हवि को (वहसि) स्वीकार करते हो। (आत् इत्) तदनन्तर ही, आप (देवेषु) उन विद्वान् योगी जनों में, अर्थात् उनके जीवनों में (विराजसि) विशेषरूप से शोभित होते हो ॥ यहाँ भी परमात्मा के निराकार होने से उसमें शयन और संदीपन रूप धर्म संगत नहीं हैं, इस कारण शयन की गूढरूप से विद्यमानता होने में और संदीपन की योग द्वारा साक्षात्कार करने में लक्षणा है ॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, और भौतिक अग्नि एवं परमेश्वर का उपमानोपमेयभाव ध्वनित हो रहा है ॥२॥
भावार्थःजैसे भौतिक अग्नि वन के काष्ठों में अथवा अरणियों में अदृश्य हुआ मानो सो रहा होता है और अरणियों के मन्थन से यज्ञकुण्ड में प्रदीप्त हो जाता है, वैसे ही परमेश्वर भी वनों के तरु, लता, पत्र, पुष्प, नदी, सरोवर आदि के सौन्दर्य में प्रच्छन्न रूप से स्थित रहता है और वहाँ ध्यानस्थ योगियों द्वारा हृदय में प्रदीप्त किया जाता है। जैसे यज्ञवेदि में प्रदीप्त किया हुआ भौतिक अग्नि सुगन्धित, मधुर, पुष्टिदायक और आरोग्यवर्धक घी, कस्तूरी, केसर, कन्द, किशमिश, अखरोट, खजूर, सोमलता, गिलोय आदि की आहुति को वायु के माध्यम से स्थानान्तर में पहुँचाकर वहाँ आरोग्य की वृद्धि करता है, वैसे ही परमेश्वर उपासकों की आत्मसमर्पण-रूप हवि को स्वीकार करके उनमें सद्गुणों को बढ़ाता है ॥२॥
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अ꣡द꣢र्शि गातु꣣वि꣡त्त꣢मो꣣ य꣡स्मि꣢न्व्र꣣ता꣡न्या꣢द꣣धुः꣢ । उ꣢पो꣣ षु꣢ जा꣣त꣡मार्य꣢꣯स्य व꣡र्ध꣢नम꣣ग्निं꣡ न꣢क्षन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ ॥४७॥
पदार्थः(गातुवित्तमः) सबसे बढ़कर कर्तव्य-मार्ग का प्रदर्शक वह अग्रणी परमेश्वर (अदर्शि) हमारे द्वारा साक्षात् कर लिया गया है, (यस्मिन्) जिस परमेश्वर में, मुमुक्षुजन (व्रतानि) अपने-अपने कर्मों को (आदधुः) समर्पित करते हैं अर्थात् ईश्वरार्पण-बुद्धि से निष्काम कर्म करते हैं। (उ) और (सुजातम्) भली-भाँति हृदय में प्रकट हुए, (आर्यस्य) धार्मिक गुण-कर्म-स्वभाववाले, ईश्वर-पुत्र आर्यजन के (वर्द्धनम्) बढ़ानेवाले (अग्निम्) ज्योतिर्मय, नायक परमेश्वर को (नः) हमारी (गिरः) स्तुति-वाणियाँ (उप-नक्षन्तु) समीपता से प्राप्त करें ॥३॥
भावार्थःमोक्षार्थी मनुष्य फल की इच्छा का परित्याग करके परमेश्वर में अपने समस्त कर्म समर्पित कर देते हैं और परमेश्वर सदैव प्रज्वलित दीपक के समान उनके मन में कर्तव्याकर्तव्य का विवेक पैदा करता है। सब आर्य गुण-कर्म-स्वभाववालों के उन्नायक उसकी स्तुति से हमें अपने हृदय को पवित्र करना चाहिए ॥३॥
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अ꣣ग्नि꣢रु꣣क्थे꣢ पु꣣रो꣡हि꣢तो꣣ ग्रा꣡वा꣢णो ब꣣र्हि꣡र꣢ध्व꣣रे꣢ । ऋ꣣चा꣡ या꣢मि मरुतो ब्रह्मणस्पते꣣ दे꣢वा꣣ अ꣢वो꣣ व꣡रे꣢ण्यम् ॥४८॥
पदार्थः(उक्थे) स्तुतिमय (अध्वरे) हिंसादि के दोष से रहित उपासना-यज्ञ में (अग्निः) ज्योतिर्मय परमात्मा (पुरोहितः) संमुख निहित है; (ग्रावाणः) स्तुति-शब्द-रूप यज्ञिय सिल-बट्टे भी (पुरोहिताः) संमुख निहित हैं; (बर्हिः) हृदय-रूप पवित्र कुशा-निर्मित आसन भी (पुरोहितम्) संमुखस्थ है। हे (मरुतः) प्राणो ! हे (ब्रह्मणः पते) ज्ञानगुणविशिष्ट जीवात्मन् ! हे (देवाः) इन्द्रिय-मन-बुद्धि-रूप ऋत्विजो ! मैं (ऋचा) ईश-स्तुति-रूप वाणी के साथ आपकी (वरेण्यम्) वरणीय (अवः) रक्षा को (यामि) माँग रहा हूँ ॥४॥
भावार्थःजैसे बाह्य यज्ञ में यज्ञ-वेदि में अग्नि प्रज्वलित की जाती है, वहाँ सोम-आदि ओषधियों को पीसने के साधनभूत सिल-बट्टे तथा ऋत्विजों के बैठने के लिए कुशानिर्मित आसन भी तैयार रहते हैं; वैसे ही उपासना-यज्ञ में परमात्मा-रूप अग्नि समिद्ध की जाती है; स्तुतिशब्द ही सिल-बट्टे होते हैं; हृदय की कुशानिर्मित आसन होता है, ब्रह्मणस्पति नामक जीवात्मा ही यजमान बनता है; प्राण-इन्द्रिय-मन-बुद्धि ऋत्विज् बनकर हृदयासन पर बैठकर उस यज्ञ को फैलाते हैं, जिनकी सहायता और जिनकी रक्षा यज्ञ की सफलता के लिए अनिवार्य है। इसलिए सब उपासकों को आभ्यन्तर यज्ञ में उनकी रक्षा की याचना करनी चाहिए ॥४॥
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अ꣣ग्नि꣡मी꣢डि꣣ष्वा꣡व꣢से꣣ गा꣡था꣢भिः शी꣣र꣡शो꣢चिषम् । अ꣣ग्नि꣢ꣳ रा꣣ये꣡ पु꣢रुमीढ श्रु꣣तं꣢꣫ नरो꣣ऽग्निः꣡ सु꣢दी꣣त꣡ये꣢ छ꣣र्दिः꣢ ॥४९॥
पदार्थःहे (पुरुमीढ) अनेक गुणों से सिक्त स्तोता ! तू (अवसे) रक्षा, प्रगति, सर्वजनप्रीति और तृप्तिलाभ के लिए (शीरशोचिषम्) सर्वत्र व्यापक ज्योतिवाले (अग्निम्) तेजस्वी परमात्मा की (गाथाभिः) मन्त्रवाणियों से (ईडिष्व) स्तुति और आराधना कर। (श्रुतम्) महिमा वर्णन करनेवाले वेदादि शास्त्रों से सुने हुए (अग्निम्) उस परमात्मा की, तू (राये) भौतिक एवं आध्यात्मिक सब प्रकार के धनों की प्राप्ति के लिए (ईडिष्व) स्तुति और आराधना कर। हे (नरः) पौरुषवान् मनुष्यो ! (अग्निः) जगत् का नायक परमात्मा (सुदीतये) उत्तम कर्मवाले पुरुषार्थी जन के लिए (छर्दिः) शरण होता है ॥५॥
भावार्थःधन आदि समस्त कल्याणों के अभिलाषी मनुष्यों को चाहिए कि वे पुरुषार्थी होकर सर्वत्र व्याप्त तेजोंवाले परमगुरु परमात्मा का भजन करें ॥५॥
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श्रु꣣धि꣡ श्रु꣢त्कर्ण꣣ व꣡ह्नि꣢भिर्दे꣣वै꣡र꣢ग्ने स꣣या꣡व꣢भिः । आ꣡ सी꣢दतु ब꣣र्हि꣡षि꣢ मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣡ प्रा꣢त꣣र्या꣡व꣢भिरध्व꣣रे꣢ ॥५०॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (श्रुत्कर्ण) सुननेवाले कानों से युक्त अर्थात् अपरिमित श्रवणशक्तिवाले (अग्ने) परमात्मन् ! आप (वह्निभिः) घोड़ों के समान वहनशील अर्थात् जैसे घोड़े अपनी पीठ पर बैठाकर लोगों को लक्ष्य पर पहुँचा देते हैं, वैसे ही जो स्तोता को उन्नति के शिखर पर पहुँचा देते हैं, ऐसे (सयावभिः) आपके साथ ही आगमन करनेवाले (देवैः) दिव्य गुणों के साथ, आप (श्रुधि) मेरी प्रार्थना को सुनिए। (अध्वरे) हिंसा आदि मलिनता से रहित, प्रातः किये जानेवाले मेरे उपासना-यज्ञ में (प्रातर्यावभिः) प्रातःकाल यज्ञ में आनेवाले दिव्य गुणों के साथ (मित्रः) मित्र के समान स्नेहशील, (अर्यमा) न्यायशील आप (बर्हिषि) हृदयासन पर (आसीदतु) बैठें ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (श्रुत्कर्ण) बहुश्रुत कानोंवाले राजनीतिशास्त्रवेत्ता (अग्ने) विद्याप्रकाशयुक्त राजन् ! आप (वह्निभिः) राज्यभार को वहन करने में समर्थ (सयावभिः) आपके साथ आगमन करनेवाले (देवैः) विद्वान् मन्त्री आदि राजपुरुषों के साथ (श्रुधि) हमारे निवेदन को सुनिए। (अध्वरे) राष्ट्रयज्ञ में (प्रातर्यावभिः) जो प्रजा का सुख-दुःख सुनने के लिए प्रातःकाल सभा में उपस्थित होते हैं, ऐसे राज्याधिकारियों सहित (मित्रः) मित्रवत् व्यवहार करनेवाले राजसचिव और (अर्यमा) श्रेष्ठों को सम्मानित तथा अन्य अश्रेष्ठों को दण्डित करनेवाले न्यायाधीश (बर्हिषि) राज्यासन पर (आसीदतु) बैठें ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःउपासक लोग पवित्र भावों के प्रेरक प्रभातकाल में जो उपासना-यज्ञ करते हैं, उसमें परमात्मा के साथ शम, दम, तप, स्वाध्याय, दान, दया, न्याय आदि विविध गुण भी हृदय में प्रादुर्भूत होते हैं। उस काल में अनुभव किये गये परमात्मा को और सद्गुणों को स्थिररूप से हृदय में धारण कर लेना चाहिए और प्रजापालक राजा को यह उचित है कि वह राज्य-संचालन में समर्थ, योग्य मन्त्री, न्यायाधीश आदि राजपुरुषों को नियुक्त करके उनके साथ प्रजा के सब कष्टों को सुनकर उनका निवारण करे ॥६॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
प्र꣡ दैवो꣢꣯दासो अ꣣ग्नि꣢र्दे꣣व꣢꣫ इन्द्रो꣣ न꣢ म꣣ज्म꣡ना꣢ । अ꣡नु꣢ मा꣣त꣡रं꣢ पृथि꣣वीं꣡ वि वा꣢꣯वृते त꣣स्थौ꣡ नाक꣢꣯स्य꣣ श꣡र्म꣢णि ॥५१॥
पदार्थः(दैवोदासः) धार्मिक जनों का प्रिय, (देवः) प्रकाशक (अग्निः) जगन्नायक परमेश्वर (इन्द्रः न) बलवान् राजा के समान (मज्मना) बल से (प्र) प्रभावशाली और समर्थ बना हुआ है। आगे उसके सामर्थ्य का ही वर्णन है—वह (मातरम्) माता (पृथिवीम्) भूमि को (अनु वि वावृते) अनुकूलता से सूर्य के चारों ओर घुमा रहा है। वही परमेश्वर (नाकस्य) सूर्य के (शर्मणि) घर, सूर्यमण्डल में (तस्थौ) स्थित है अर्थात् सूर्य का संचालक भी वही है ॥७॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजैसे कोई मानव राजा अपने बल से राष्ट्रभूमि को नियमों में चलाता है, वैसे ही परमात्मा भूमि को सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण कराता है और आदित्य में भी निवास करता हुआ उसके द्वारा पृथिवी आदि ग्रहोपग्रहों को प्रकाशित करता है ॥७॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣢ध꣣ ज्मो꣡ अध꣢꣯ वा दि꣣वो꣡ बृ꣢ह꣣तो꣡ रो꣢च꣣ना꣡दधि꣢꣯ । अ꣣या꣡ व꣢र्धस्व त꣣꣬न्वा꣢꣯ गि꣣रा꣢꣫ ममा जा꣣ता꣡ सु꣢क्रतो पृण ॥५२॥
पदार्थः(अध) और, हे इन्द्र परमात्मन् ! आप (ज्मः) पृथिवी लोक से, (अध वा) तथा (दिवः) द्युलोक से, और (बृहतः) महान् (रोचनात् अधि) प्रदीप्त चन्द्रलोक अथवा अन्तरिक्षलोक से उन-उन लोकों की वस्तुएँ लाकर हमें (आ पृण) परिपूर्ण कीजिए। अभिप्राय यह है कि पृथिवी, द्यौ तथा अन्तरिक्ष में जो अग्नि, वायु, प्रकाश, ओषधि, वनस्पति, फल, मूल, सोना, चाँदी, मणि, मोती आदि वस्तुएँ हैं, उन्हें आप मुक्त हस्त से हमें प्रदान कीजिए। आप (मम) मेरी (अया) इस (तन्वा) विस्तीर्ण (गिरा) स्तुति-वाणी से (वर्धस्व) मेरे अन्तःकरण में वृद्धि को प्राप्त होइए। हे (सुक्रतो) उत्कृष्ट प्रज्ञावाले और उत्कृष्ट कर्मोंवाले ! आप (जाता) उत्पन्न सन्तानों को (आ पृण) प्रज्ञाओं, कर्मों और सम्पदाओं से तृप्त कीजिए ॥८॥
भावार्थःभूलोक के पर्वत, नदी, नद, सागर, वृक्ष, वनस्पति, लता, पत्र, पुष्प आदि में, द्युलोक के नक्षत्र, आकाशगंगा, सूर्य, सूर्यकिरण आदि में और अन्तरिक्ष-लोक के चन्द्रमा, वायु, बादल आदि में जो ऐश्वर्य है, उस सबको परमेश्वर हमें निःशुल्क प्रदान करता है। इसलिए हमें वाणी से उसकी महिमा का प्रकाश करनेवाले गीत गाने चाहिए ॥८॥
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का꣡य꣢मानो व꣣ना꣢꣫ त्वं यन्मा꣣तॄ꣡रज꣢꣯गन्न꣣पः꣢ । न꣡ तत्ते꣢꣯ अग्ने प्र꣣मृ꣡षे꣢ नि꣣व꣡र्त꣢नं꣣ य꣢द्दू꣣रे꣢꣫ सन्नि꣣हा꣡भुवः꣢ ॥५३॥
पदार्थःहे (अग्ने) प्रकाशक परमात्मारूप अग्नि ! (त्वम्) आप (वना) अपनी तेज की किरणों को (कायमानः) प्रकट करना चाहते हुए अर्थात् स्वयं हमारे आत्मा, मन, बुद्धि आदि में प्रज्वलित होना चाहते हुए भी (यत्) जो (मातॄः अपः) मातृभूत जलों में (अजगन्) प्रविष्ट हो अर्थात् जलों से अग्नि के समान शान्त हुए पड़े हो, (तत्) वह (ते) आपकी (निवर्तनम्) निवृत्ति अर्थात् मेरे प्रति उदासीनता को, मैं (न) नहीं (प्रमृष्ये) सह सकता हूँ, (यत्) क्योंकि (दूरे सन्) इस समय दूर होते हुए भी आप, पहले (इह) यहाँ मेरे समीप (अभुवः) रह चुके हो। पहले के समान अब भी आपकी तेजोरश्मियाँ मेरे अन्दर क्यों नहीं प्रकाशित होतीं? ॥९॥ इस मन्त्र में 'प्रदीप्त होना चाहते हुए भी प्रदीप्त नहीं हो रहे हो, प्रत्युत शान्त हो गये हो' यहाँ कारण विद्यमान होने पर भी कार्य का उत्पन्न न होना रूप विशेषोक्ति अलङ्कार है। 'दूर होते हुए यहाँ विद्यमान हो' में विरोधालङ्कार व्यङ्ग्य है, व्याख्यात प्रकार से विरोध का परिहार हो जाता है ॥९॥
भावार्थःजो परमात्मा का साक्षात्कार कर चुका है ऐसा मनुष्य असावधानी के कारण उसे भूल जाने पर अपने उद्गार प्रकट कर रहा है—हे देव ! पहले आप सदा ही मेरे आत्मा, मन, बुद्धि आदि में प्रदीप्त रहते थे। पर अब दुःख है कि जलों से बुझे भौतिक अग्नि के समान शान्त हो गये हो। आपकी मेरे प्रति इस उदासीनता को मैं नहीं सह सकता हूँ। कृपा करके प्रसुप्तावस्था को छोड़कर पहले के समान मेरे अन्दर प्रदीप्त होवो ॥९॥
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नि꣡ त्वाम꣢꣯ग्ने꣣ म꣡नु꣢र्दधे꣣ ज्यो꣢ति꣣र्ज꣡ना꣢य꣣ श꣡श्व꣢ते । दी꣣दे꣢थ꣣ क꣡ण्व꣢ ऋ꣣त꣡जा꣢त उक्षि꣣तो꣡ यं न꣢꣯म꣣स्य꣡न्ति꣢ कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ ॥५४॥
पदार्थःहे (अग्ने) प्रकाशस्वरूप प्रकाशक परमात्मन् ! (मनुः) मननशील जन (त्वाम्) अत्युच्च महिमावाले आपको (निदधे) निधि के समान अपने अन्तःकरण में धारण करता है। आप (शश्वते) शाश्वत, सनातन (जनाय) जीवात्मा के लिए (ज्योतिः) दिव्य ज्योति प्रदान करते हो। (ऋतजातः) सत्य में प्रसिद्ध, (उक्षितः) हृदय में सिक्त आप (कण्वे) मुझ मेधावी के अन्दर (दीदेथ) प्रकाशित होवो, (यम्) जिस आपको (कृष्टयः) उपासक जन (नमस्यन्ति) नमस्कार करते हैं ॥१०॥
भावार्थःसब मेधावी जनों को चाहिए कि मननशीलों के सबसे बड़े खजाने, जीवात्माओं को दिव्य ज्योति प्रदान करनेवाले परमेश्वर को अपने हृदय में प्रदीप्त करें और उसकी उपासना करें ॥१०॥ इस दशति में परमात्मा के कर्तृत्व और महत्त्व के वर्णनपूर्वक मनुष्यों को उसकी स्तुति के लिए प्रेरित किया गया है और हृदय में उसकी समीपता एवं वृद्धि की याचना की गयी है, इसलिए इसके विषय की पूर्व दशति में वर्णित विषय के साथ संगति है, यह जानना चाहिए ॥ प्रथम प्रपाठक में, प्रथम अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में पाँचवाँ खण्ड समाप्त ॥
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दे꣣वो꣡ वो꣢ द्रविणो꣣दाः꣢ पू꣣र्णां꣡ वि꣢वष्ट्वा꣣सि꣡च꣢म् । उ꣡द्वा꣢ सि꣣ञ्च꣢ध्व꣣मु꣡प꣢ वा पृणध्व꣣मा꣡दिद्वो꣢꣯ दे꣣व꣡ ओ꣢हते ॥५५॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (द्रविणोदाः) धन और बल का दाता (देवः) दिव्यगुणमय परमेश्वर (वः) तुम्हारी (पूर्णाम्) भक्तिरसरूप सोम से परिपूर्ण (आसिचम्) मन रूप स्रुवा की (विवष्टु) कामना करे। तुम (उत् सिञ्चध्वं वा) श्रद्धारस से उस परमेश्वर को स्नान कराओ, (उप पृणध्वं वा) और तृप्त करो। (आत् इत्) तदनन्तर ही (देवः) परमेश्वर (वः) तुम्हें (ओहते) वहन करेगा अर्थात् लक्ष्य पर पहुँचाएगा ॥१॥
भावार्थःसब उपासक जनों को चाहिए कि प्रेमरस से भरी हुई अपनी मनरूप स्रुवाओं से परमेश्वर को श्रद्धारस से सींचें और तृप्त करें। इस प्रकार सींचा हुआ और तृप्त किया हुआ वह उपासकों को उनके निर्धारित लक्ष्य की ओर ले जाता है ॥१॥
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छन्द -बृहती| देवता -ब्रह्मणस्पतिः| स्वर - मध्यमः
प्रै꣢तु꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣢तिः꣣ प्र꣢ दे꣣꣬व्ये꣢꣯तु सू꣣नृ꣡ता꣢ । अ꣡च्छा꣢ वी꣣रं꣡ न꣢꣯र्यं प꣣ङ्क्ति꣡रा꣢धसं दे꣣वा꣢ य꣣ज्ञं꣡ न꣢यन्तु नः ॥५६॥
पदार्थः(ब्रह्मणस्पतिः) वेद, ब्रह्माण्ड तथा सकल ऐश्वर्य का स्वामी जगदीश्वर (प्र एतु) हमें प्राप्त हो। (देवी) दिव्यगुणयुक्त (सूनृता) प्यारी सच्ची वाणी (प्र एतु) हमें प्राप्त हो। (देवाः) विद्वान् और विदुषियाँ (नः) हमारे (यज्ञम्) राष्ट्ररूप यज्ञ के (अच्छ) प्रति (नर्यम्) नरहितकारी, (पङ्क्तिराधसम्) धर्मात्मा वीर मनुष्यों की पंक्तियों के सेवक और पंक्तियों के हितार्थ अपने धन को लगानेवाले, (वीरम्) शरीर और आत्मा के पूर्ण बल से युक्त सन्तान को (नयन्तु) प्राप्त करायें ॥२॥
भावार्थःवेद, ब्रह्माण्ड और सकल ऐश्वर्य का स्वामी जगदीश्वर, मधुर-प्रिय-सत्य वाणी और नरहितकर्ता, धर्मात्माओं का सेवक, सत्कार्यों में धन का दान करनेवाला पुत्र यदि प्राप्त हो जाता है तो निश्चय ही सभी सिद्धियाँ हाथ में आ जाती हैं ॥२॥
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छन्द -बृहती| देवता -यूप| स्वर - मध्यमः
ऊ꣣र्ध्व꣢ ऊ꣣ षु꣡ ण꣢ ऊ꣣त꣢ये꣣ ति꣡ष्ठा꣢ दे꣢वो꣡ न स꣢꣯वि꣣ता꣢ । ऊ꣣र्ध्वो꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ स꣡नि꣢ता꣣ य꣢द꣣ञ्जि꣡भि꣢र्वा꣢घ꣡द्भि꣢र्वि꣣ह्व꣡या꣢महे ॥५७॥
पदार्थःहे यज्ञस्तम्भ के समान उन्नत परमात्मन् ! आप (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिए (देवः) प्रकाशक (सविता न) सूर्य के समान (उ) निश्चय ही (सु) भली-भाँति (ऊर्ध्वः) हमारे हृदय में समुन्नत होते हुए (वाजस्य) आत्मिक बल के (सनिता) प्रदाता होवो, (यत्) क्योंकि (अञ्जिभिः) स्वच्छ किये हुए (वाघद्भिः) स्तुति का वहन करनेवाले मन-बुद्धि-इन्द्रिय रूप ऋत्विजों के द्वारा, हम आपको (विह्वयामहे) विशेष रूप से पुकार रहे हैं, आपकी स्तुति कर रहे हैं ॥३॥ इस मन्त्र में उपमेय के निगरणपूर्वक उपमेय परमात्मा में यूपत्व का आरोप होने से अतिशयोक्ति अलङ्कार है। 'देव सविता के समान उन्नत' में पूर्णोपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा को यज्ञस्तम्भ के समान और सूर्य के समान जब अपने हृदय में हम समुन्नत करते हैं, तब वह हमें महान् फल प्रदान करता है ॥३॥
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प्र꣢꣫ यो रा꣣ये꣡ निनी꣢꣯षति꣣ म꣢र्तो꣣ य꣡स्ते꣢ वसो꣣ दा꣡श꣢त् । स꣢ वी꣣रं꣡ ध꣢त्ते अग्न उक्थशꣳ꣣सि꣢नं꣣ त्म꣡ना꣢ सहस्रपो꣣षि꣡ण꣢म् ॥५८॥
पदार्थःहे (वसो) सर्वान्तर्यामिन्, सबके निवासक (अग्ने) जगन्नायक परमात्मन् ! (यः) जो कोई (मर्तः) मनुष्य (राये) विद्या-विवेक-विनय आदि धन के लिए, श्रेष्ठ सन्तानरूप धन के लिए और सुवर्ण आदि धन के लिए (प्र निनीषति) अपने-आपको प्रगति के मार्ग पर ले जाना चाहता है, पुरुषार्थ में नियुक्त करना चाहता है, और (यः) जो (ते) आपके लिए (दाशत्) आत्मसमर्पण करता है, (सः) वह मनुष्य (त्मना) अपने आप (सहस्रपोषिणम्) सहस्रों निर्धनों को धनदान से और सहस्रों अविद्याग्रस्तों को विद्यादान से परिपुष्ट करनेवाले (वीरम्) वीर सन्तान को (धत्ते) प्राप्त करता है ॥४॥
भावार्थःपुरुषार्थी परमेश्वरोपासक मनुष्य सुयोग्य सन्तान, विद्या, धन, चक्रवर्ती राज्य, मोक्ष आदि बहुत प्रकार के ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेत है ॥४॥
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प्र꣡ वो꣢ य꣣ह्वं꣡ पु꣢रू꣣णां꣢ वि꣣शां꣡ दे꣢वय꣣ती꣡ना꣢म् । अ꣣ग्नि꣢ꣳ सू꣣क्ते꣢भि꣣र्व꣡चो꣢भिर्वृणीमहे꣣ य꣢꣫ꣳसमिद꣣न्य꣢ इ꣣न्ध꣡ते꣢ ॥५९॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (देवयतीनाम्) अपने लिए दिव्य भोग, दिव्य गुण और दिव्य आनन्दों को चाहनेवाली, (पुरूणाम्) बहुत-सी (विशां वः) तुम प्रजाओं के हितार्थ (यह्वम्) गुणों से महान् (अग्निम्) परमेश्वर को, हम (सूक्तेभिः) उत्तम प्रकार से गाये गये (वचोभिः) साम-मन्त्रों तथा अन्य स्तोत्रों से (प्र वृणीमहे) प्रकष्टरूप से भजते हैं, (यम्) जिस परमेश्वर को (अन्ये इत्) अन्य भी भक्तजन (सम् इन्धते) भली-भाँति अपने अन्तःकरणों में प्रदीप्त करते हैं ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (देवयतीनाम्) अपने लिए विजयाभिलाषी राजा को चाहनेवाली (पुरूणाम्) बहुत-सी (विशां वः) तुम प्रजाओं के मध्य से (यह्वम्) महान् (अग्निम्) अग्नि के समान तेजस्वी वीर पुरुष को, हम (सूक्तैः) भली-भाँति उच्चारित (वचोभिः) उद्बोधक वचनों के साथ (प्र वृणीमहे) प्रकृष्टतया राजपद पर निर्वाचित करते हैं, (यम्) जिस गुणी पुरुष को (अन्ये) अन्य भी राष्ट्रवासी जन (सम् इन्धते) इस पद के लिए समुत्साहित या समर्थित करते हैं ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे राष्ट्र के उत्कर्ष के लिए राजोचित सकल गुणगणों से विभूषित कोई महान् पुरुष राजपद के लिए चुना जाता है, वैसे ही सुमहान् परमेश्वर को हमें भली-भाँति उच्चारण किये गये स्तुतिवचनों द्वारा मार्गप्रदर्शकरूप में वरण करना चाहिए ॥५॥
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अ꣣य꣢म꣣ग्निः꣢ सु꣣वी꣢र्य꣣स्ये꣢शे꣣ हि꣡ सौभ꣢꣯गस्य । रा꣡य꣣ ई꣢शे स्वप꣣त्य꣢स्य꣣ गो꣡म꣢त꣣ ई꣡शे꣢ वृत्र꣣ह꣡था꣢नाम् ॥६०॥
पदार्थः(अयम्) यह संमुख विद्यमान (अग्निः) जगत् का अग्रनायक परमेश्वर और प्रजाओं से चुना गया राष्ट्रनायक राजा (सुवीर्यस्य) शारीरिक और आध्यात्मिक बल का तथा (सौभगस्य) धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य आदि सौभाग्यों का (हि) निश्चय ही (ईशे) अधीश्वर है, (स्वपत्यस्य) उत्कृष्ट सन्तान से युक्त तथा (गोमतः) गाय, पृथिवी, सूर्यकिरण, वेदवाणी आदि से युक्त (रायः) ऐश्वर्य का (ईशे) अधीश्वर है। (वृत्रहथानाम्) पापसंहारों का व शत्रु-संहारों का (ईशे) अधीश्वर है ॥६॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है। 'ईशे' की आवृत्ति में लाटानुप्रास है ॥६॥
भावार्थःजैसे राजा अपनी राष्ट्रभूमि का तथा राष्ट्रभूमि में विद्यमान धन, धान्य, वीर पुरुष आदिकों का और गाय आदि पशुओं का अधीश्वर होता है, वैसे ही परमेश्वर सब भौतिक और आध्यात्मिक धनों का अधीश्वर है। वही शारीरिक बल, आत्मिक बल, धृति, धर्म, कीर्ति, श्री, ज्ञान, वैराग्य, श्रेष्ठ सन्तान, गाय, भूमि, सूर्य और वेदवाणी हमें प्रदान करता है। वही जीवन के विनाशकारी पापों से हमारी रक्षा करता है। इसलिए उसे भूरि-भूरि धन्यवाद हमें देने चाहिएँ ॥६॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
त्व꣡म꣢ग्ने गृ꣣ह꣡प꣢ति꣣स्त्व꣡ꣳ होता꣢꣯ नो अध्व꣣रे꣢ । त्वं꣡ पोता꣢꣯ विश्ववार꣣ प्र꣡चे꣢ता꣣ य꣢क्षि꣣ या꣡सि꣢ च꣣ वा꣡र्य꣢म् ॥६१॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान, सबके अग्रनेता परमात्मन् ! (त्वम्) जगदीश्वर आप (गृहपतिः) ब्रह्माण्ड रूप गृह के स्वामी और पालक हो। (त्वम्) आप (नः) हमारे (अध्वरे) हिसांदिदोषरहित जीवनयज्ञ में (होता) सुख आदि के दाता हो। हे (विश्ववार) सबसे वरणीय ! (प्रचेताः) प्रकृष्ट चित्तवाले (त्वम्) आप (पोता) सांसारिक पदार्थों के अथवा भक्तों के चित्तों के शोधक हो। आप (वार्यम्) वरणीय सब वस्तुएँ (यक्षि) प्रदान करते हो, (यासि च) और उनमें व्याप्त होते हो ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेष से यज्ञाग्नि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥७॥
भावार्थःजैसे यज्ञाग्नि यजमान के घर का रक्षक होता है, वैसे परमेश्वर ब्रह्माण्डरूप घर का रक्षक है। जैसे यज्ञाग्नि अग्निहोत्र में स्वास्थ्य का प्रदाता होता है, वैसे परमेश्वर जीवन-यज्ञ में सुख-सम्पत्ति आदि का प्रदाता होता है। जैसे यज्ञाग्नि वायुमण्डल का शोधक होता है, वैसे परमेश्वर सूर्य आदि के द्वारा सांसारिक पदार्थों का और दिव्यगुणों के प्रदान द्वारा भक्तों के चित्तों का शोधक होता है ॥७॥
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छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
स꣡खा꣢यस्त्वा ववृमहे दे꣣वं꣡ मर्ता꣢꣯स ऊ꣣त꣡ये꣢ । अ꣣पां꣡ नपा꣢꣯तꣳ सु꣣भ꣡ग꣢ꣳ सु꣣द꣡ꣳस꣢सꣳ सु꣣प्र꣡तू꣢र्तिमने꣣ह꣡स꣢म् ॥६२॥
पदार्थः(मर्तासः) मरणधर्मा, (सखायः) समान ख्यातिवाले हम साथी लोग (देवम्) ज्योतिर्मय और ज्योति देनेवाले, (अपां नपातम्) व्याप्त प्रकृति का और जीवात्माओं का विनाश न करनेवाले, (सुभगम्) उत्तम ऐश्वर्यवाले, (सुदंससम्) शुभ कर्मोंवाले, (सुप्रतूर्तिम्) अत्यन्त शीघ्रता से कार्यों को करनेवाले, (अनेहसम्) हिंसा न किये जा सकने योग्य, निष्पाप, सज्जनों के प्रति क्रोध न करनेवाले (त्वा) तुझ परमेश्वररूप अग्नि को (ऊतये) आत्मरक्षा और प्रगति के लिए (ववृमहे) वरण करते हैं ॥८॥ इस मन्त्र में विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकरालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःकल्याण की इच्छा करनेवाले मनुष्यों को चाहिए कि वे मिलकर परम तेजस्वी, तेजः-प्रदाता, प्रलयकाल में नश्वर पदार्थों के विनाशक, नित्य पदार्थों के अविनाशक, सर्वैश्वर्यवान्, शुभकर्मकर्ता, विचारे हुए कार्यों को शीघ्र पूर्ण करनेवाले, किसी से हिंसित या पराजित न होनेवाले, निष्पाप, सज्जनों पर क्रोध न करनेवाले, दुष्टों पर कुपित होनेवाले, जगद्व्यवस्थापक, सबके मङ्गलकारी परमेश्वर की श्रद्धा से उपासना करें ॥८॥ इस दशति में अग्नि, यूप, द्रविणोदस् और बृहस्पति नामों से परमेश्वर के गुण-कर्मों का वर्णन होने से और उसके प्रति आत्म-समर्पण करने का फल वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है, यह जानना चाहिए ॥ प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
आ꣡ जु꣢होता ह꣣वि꣡षा꣢ मर्जय꣣ध्वं नि꣡ होता꣢꣯रं गृ꣣ह꣡प꣢तिं दधिध्वम् । इ꣣ड꣢स्प꣣दे꣡ नम꣢꣯सा रा꣣त꣡ह꣢व्यꣳ सप꣣र्य꣡ता꣢ यज꣣तं꣢ प꣣꣬स्त्या꣢꣯नाम् ॥६३
पदार्थःहे स्तोताओ ! तुम (हविषा) आत्मसमर्पणरूप हवि से (आजुहोत) परमात्माग्नि में अग्निहोत्र करो, (मर्जयध्वम्) अपने आत्मा को शुद्ध और अलंकृत करो। (होतारम्) यज्ञ का फल देनेवाले (गृहपतिम्) शरीररूप घर के रक्षक उस परमात्माग्नि को (निदधिध्वम्) हृदय में धारण करो—अर्थात्, उसका निरन्तर ध्यान करो। (रातहव्यम्) दातव्य सांसारिक वस्तुओं को और सद्गुणों को देनेवाले, (पस्त्यानाम्) प्रजाओं के (यजतम्) पूजनीय उस परमात्माग्नि को (इडः पदे) हृदयरूप यज्ञवेदि-स्थल में (नमसा) नमस्कार द्वारा (सपर्यत) पूजो ॥१॥ इस मन्त्र में 'आजुहोत, मर्जयध्वम्, निदधिध्वम्, सपर्यत' इन अनेक क्रियाओं का एक कर्ता कारक से सम्बन्ध होने के कारण दीपक अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःआत्म-कल्याण चाहनेवाले मनुष्यों को अपने आत्मा को परमात्मारूप अग्नि में समर्पित करके आत्मशुद्धि करनी चाहिए ॥१॥
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छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
चि꣣त्र꣢꣫ इच्छिशो꣣स्त꣡रु꣢णस्य व꣣क्ष꣢थो꣣ न꣢꣫ यो मा꣣त꣡रा꣢व꣣न्वे꣢ति꣣ धा꣡त꣢वे । अ꣣नूधा꣡ यदजी꣢꣯जन꣣द꣡धा꣢ चि꣣दा꣢ व꣣व꣡क्ष꣢त्स꣣द्यो꣡ महि꣢꣯ दू꣣त्यां꣢३꣱च꣡र꣢न् ॥६४॥
पदार्थःप्रथम—यज्ञाग्नि के पक्ष में। (शिशोः) नवजात शिशु होते हुए भी (तरुणस्य) जो युवक है, युवक के समान कार्य करनेवाला है, उस यज्ञाग्नि का (वक्षथः) हवि वहन करने का गुण (चित्रः इत्) अद्भुत ही है; (यः) जो यज्ञाग्नि (धातवे) दूध पीने के लिए (मातरौ) माता-पिता बनी हुई अरणियों का (न अन्वेति) अनुसरण नहीं करता। (अनूधाः) बिना ऊधस् वाली माता अरणी (यत्) जब, यज्ञाग्नि को (अजीजनत्) उत्पन्न करती है (अध चित्) उसके बाद ही (सद्यः) तुरन्त (महि) महान् (दूत्यम्) दूत-कर्म को (चरन्) करता हुआ, वह (आववक्षत्) होम की हुई हवि को वहन करने लगता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (शिशोः) शिशु के समान प्रिय, और (तरुणस्य) युवक के समान महान् कर्मों को करनेवाले परमात्मा का (वक्षथः) जगत् के भार को वहन करने का गुण (चित्रः) आश्चर्यकारी है, (यः) जो परमात्मा, अन्य प्राणियों के समान (धातवे) दूध पीने के लिए अर्थात् पुष्टि पाने के लिए (मातरौ) माता-पिता को (न अन्वेति) प्राप्त नहीं करता, प्रत्युत स्वयं परिपुष्ट है। (अनूधाः) ऊधस्-रहित प्रकृति (यत्) जब (अजीजनत्) इस जगत् को उत्पन्न करती है (अध चित्) उसके बाद ही (सद्यः) तुरन्त (महि) महान् (दूत्यम्) दूत-कर्म को (चरन्) करता हुआ, वह परमात्मा (आ ववक्षत्) जगत् के भार को वहन करना आरम्भ कर देता है ॥२॥ यहाँ 'वह कौन है जो शिशु होते हुए भी तरुण है, शिशु होते हुए भी पोषण पाने या दूध पीने के लिए माता-पिता के पास नहीं जाता और पैदा होते ही महान् दूत-कर्म करने लगता है’—इस प्रकार प्रहेलिकालङ्कार है। अथवा विरोधालङ्कार व्यङ्ग्य है ॥२॥
भावार्थःशिशु होते हुए कोई भी शक्तिसाध्य कार्य नहीं करता है, किन्तु माता का दूध पीने से और पिता के संरक्षण से पुष्ट होकर ही भारी काम करने में समर्थ होता है। परन्तु यह आश्चर्य है कि अरणी-रूप माता-पिताओं से उत्पन्न यज्ञाग्नि शिशु होता हुआ भी उत्पन्न होते ही हवि-वहन रूप दुष्कर दूत-कर्म को करने लगता है। वैसे ही परमेश्वर भी शिशु होते हुए भी युवक है, क्योंकि वह भक्तों को शिशु के समान प्रिय है और युवक के समान जगत् के भार को उठाने रूप महान् कार्य को करने में समर्थ है। सब लोग माता-पिता से रसपान करके ही अपने शरीर में बल संचित करते हैं, किन्तु परमेश्वर उनसे रसपान किये बिना ही स्वभाव से परम बलवान् है और प्रकृति से उत्पन्न विशाल ब्रह्माण्ड के भार को उठानेवाला है। परमेश्वर का यह सामर्थ्य और कर्म बड़ा ही अद्भुत है ॥२॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
इ꣣दं꣢ त꣣ ए꣡कं꣢ प꣣र꣡ उ꣢ त꣣ ए꣡कं꣢ तृ꣣ती꣡ये꣢न꣣ ज्यो꣡ति꣢षा꣣ सं꣡ वि꣢शस्व । सं꣣वे꣡श꣢नस्त꣣न्वे꣢३꣱चा꣡रु꣢रेधि प्रि꣣यो꣢ दे꣣वा꣡नां꣢ पर꣣मे꣢ ज꣣नि꣡त्रे꣢ ॥६५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे परमात्मन् ! (इदम्) यह, मेरे समीप विद्यमान पार्थिव अग्निरूप (ते) तेरी (एकम्) एक ज्योति है, (उ) और (परः) द्युलोक में विद्यमान, सूर्यरूप (ते) तेरी (एकम्) एक दूसरी ज्योति है। तू उससे भिन्न (तृतीयेन ज्योतिषा) तीसरी ज्योति से, निज ज्योतिर्मय स्वरूप से (संविशस्व) मेरे आत्मा मे भली-भाँति प्रविष्ट हो। (परमे) श्रेष्ठ (जनित्रे) आविर्भाव-स्थान मेरे आत्मा में (संवेशनः) प्रवेशकर्ता तू (तन्वे) अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोशों सहित शरीर के लिए (चारुः) हितकारी, तथा (देवानाम्) इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि देवों का (प्रियः) प्रियकारी (एधि) हो ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। हे जीवात्मन् ! (इदम्) यह चक्षु आदि इन्द्रिय रूप (ते) तेरी (एकम्) एक ज्योति है, (उ) और (परः) उससे परे मन रूप (ते) तेरी (एकम्) एक दूसरी ज्योति है। तू (तृतीयेन) तीसरी परमात्मा रूप (ज्योतिषा) ज्योति से (संविशस्व) संगत हो। (परमे) सर्वोत्कृष्ट (जनित्रे) उत्पादक परमात्मा में (संवेशनः) संगत हुआ तू (तन्वे) अपने आश्रयभूत देह-संघात के लिए (चारुः) कल्याणकारी, और (देवानाम्) दिव्य गुणों का (प्रियः) स्नेहपात्र (एधि) हो ॥३॥
भावार्थःपार्थिव अग्नि तथा सूर्यरूप अग्नि में परमात्मा की ही ज्योति प्रदीप्त हो रही है, जैसा कि कहा भी है—'अग्नि में परमेश्वररूप अग्नि प्रविष्ट होकर विचर रहा है’, ऋ० ४।३९।९; 'जो आदित्य में पुरुष बैठा है, वह मैं परमेश्वर ही हूँ’, य० ४०।१७; 'उसी की चमक से यह सब-कुछ चमक रहा है’, कठ० ५।१५। इसलिए पार्थिव अग्नि और सूर्याग्नि दोनों परमात्मा की ही ज्योतियाँ हैं। परन्तु परमात्मा की वास्तविक तीसरी ज्योति उसका अपना स्वाभाविक तेज ही है। उसी तेज से भक्तों के आत्मा में प्रवेश करके वह उनका कल्याण करता है और शरीर, प्राण, मन, बुद्धि आदि का हित-सम्पादन करता है। अतः उसकी तीसरी ज्योति को प्राप्त करने के लिए योगाभ्यास की विधि से सबको प्रयत्न करना चाहिए। मन्त्र के द्वितीय अर्थ में जीवात्मा को सम्बोधित किया गया है। हे जीवात्मन् ! तेरी एक ज्योति चक्षु, श्रोत्र आदि हैं, दूसरी ज्योति मन है, जैसा कि वेद में अन्यत्र कहा है—प्राणियों के अन्दर सबसे अधिक वेगवान् एक मनरूप ध्रुव ज्योति दर्शन करने के लिए निहित है, ऋ० ६।९।५। पर ये दोनों ज्योतियाँ साधनरूप हैं, साध्यरूप ज्योति तो तीसरी परमात्म-ज्योति ही है। अतः उसे ही प्राप्त करने के लिए प्राणपण से यत्न कर ॥३॥
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छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
इ꣣म꣢꣫ꣳ स्तो꣣म꣡मर्ह꣢ते जा꣣त꣡वे꣢दसे र꣡थ꣢मिव꣣ सं꣡ म꣢हेमा मनी꣣ष꣡या꣢ । भ꣣द्रा꣢꣫ हि नः꣣ प्र꣡म꣢तिरस्य स꣣ꣳस꣡द्यग्ने꣢꣯ स꣣ख्ये꣡ मा रि꣢꣯षामा व꣣यं꣡ तव꣢꣯ ॥६६॥
पदार्थः(अर्हते) पूजायोग्य (जातवेदसे) सब उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता, सब उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान, सकल धन के उत्पादक और वेदज्ञान को प्रकट करनेवाले परमेश्वर के लिए (मनीषया) मनोयोग के साथ (स्तोमम्) स्तोत्र को (संमहेम) सत्कारपूर्वक भेजें, (रथम् इव) जैसे किसी पूज्य जन को बुलाने के लिए उसके पास रथ भेजा जाता है। (अस्य) इस परमेश्वर की (संसदि) संगति में (नः) हमारी (प्रमतिः) प्रखर बुद्धि (भद्रा हि) भद्र ही होती है। हे (अग्ने) तेजस्वी परमात्मन् ! (वयम्) हम प्रजाजन (तव) आपकी (सख्ये) मित्रता में (मा) मत (रिषाम) हिंसित होवें ॥४॥ 'स्तोत्र को रथ के समान सत्कारपूर्वक भेजें'—यहाँ पूर्णोपमा अलङ्कार है। जैसे किसी सुयोग्य विद्वान् को अपने उत्सवों में लाने के लिए उसके निमित्त रथ भेजा जाता है, वैसे ही पूज्य परमेश्वर को अपने हृदय-गृह में लाने के लिए उसके निमित्त स्तोत्र भेजा जाए। यह भाषा आलङ्कारिक समझनी चाहिए क्योंकि परमेश्वर तो पहले से ही हमारे हृदयों में विद्यमान है ॥४॥
भावार्थःअव्यक्तरूप से हृदय में स्थित परमेश्वर हमारे स्तोत्र से जाग जाता है और हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर चलनेवाली भद्र बनाकर विनाश से हमारी रक्षा करता है ॥४॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
मू꣣र्धा꣡नं꣢ दि꣣वो꣡ अ꣢र꣣तिं꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ वै꣢श्वान꣣र꣢मृ꣣त꣢꣫ आ जा꣣त꣢म꣣ग्नि꣢म् । क꣣वि꣢ꣳ स꣣म्रा꣢ज꣣म꣡ति꣢थिं꣣ ज꣡ना꣢नामा꣣स꣢न्नः꣣ पा꣡त्रं꣢ जनयन्त दे꣣वाः꣢ ॥६७॥
पदार्थः(दिवः) द्युलोक के (मूर्धानम्) शिरोमणि, (पृथिव्याः) भूमि के (अरतिम्) सूर्य के चारों ओर तथा अपनी धुरी पर घुमानेवाले, (वैश्वानरम्) सब नरों के हितकारी, सबके नेता, (ऋते) सत्य में (आ जातम्) सर्वत्र प्रसिद्ध, (कविम्) मेधावी, (सम्राजम्) ब्रह्माण्डरूप साम्राज्य के सम्राट्, (जनानाम्) प्रजाओं के (अतिथिम्) अतिथितुल्य सत्कार करने योग्य (नः) हमारे (पात्रम्) रक्षक (अग्निम्) तेजस्वी परमेश्वर को (देवाः) विद्वान् उपासकजन (आसन्) मुख में जप द्वारा और हृदय-गुहा में ध्यान द्वारा (जनयन्त) प्रकट करते हैं, अर्थात् जप द्वारा और ध्यान द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं ॥५॥ इस मन्त्र में विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजो परमात्मा द्यावापृथिवी का सञ्चालक, सबका हित करनेवाला, उत्कृष्ट सत्य नियमोंवाला, महाकवि, विश्व का सम्राट् और सबका विपदाओं से त्राण करनेवाला है, उसका ध्यान करके मनुष्यों को सब सुख प्राप्त करने चाहिए ॥५॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
वि꣢꣫ त्वदापो꣣ न꣡ पर्व꣢꣯तस्य पृ꣣ष्ठा꣢दु꣣क्थे꣡भि꣢रग्ने जनयन्त दे꣣वाः꣢ । तं꣢ त्वा꣣ गि꣡रः꣢ सुष्टु꣣त꣡यो꣢ वाजयन्त्या꣣जिं꣡ न गि꣢꣯र्व꣣वा꣡हो꣢ जिग्यु꣣र꣡श्वाः꣢ ॥६८॥
पदार्थःहे (अग्ने) सबके नायक परमात्मन् ! (पर्वतस्य) बादल अथवा पहाड़ के (पृष्ठात्) पृष्ठ से (देवाः) सूर्यकिरणें और पवन (आपः न) जैसे वर्षाजल और नदियों को उत्पन्न करते हैं, बहाते हैं, वैसे ही (देवाः) विद्वान् स्तोता लोग (उक्थेभिः) वेदमन्त्रों द्वारा (त्वत्) आपके पास से (आपः) आनन्द-धाराओं को (विजनयन्त) विशेषरूप से उत्पन्न करते हैं, अपने आत्मा में प्रवाहित करते हैं। (तम्) उस परोपकारी (त्वा) आपको (सुष्टुतयः) उनकी उत्तम स्तुतिरूप (गिरः) वाणियाँ (वाजयन्ति) पूजती हैं। (अश्वाः) घोड़े (आजिं न) जैसे युद्ध को जीते लेते हैं, वैसे ही (गिर्व-वाहः) स्तोत्रों को आपके प्रति पहुँचानेवाले स्तोता जन आपको (जिग्युः) जीत लेते हैं, पा लेते हैं ॥६॥ इस मन्त्र में 'आपो न पर्वतस्य पृष्ठात्' और 'आजिं न जिग्युरश्वाः' इन दोनों स्थलों में उपमालङ्कार है। 'देवाः' और 'आपः' पद श्लिष्ट हैं ॥६॥
भावार्थःजैसे सूर्यकिरणें और पवन मेघों से वृष्टि-जलों को और पर्वतों से नदियों को प्रवाहित करते हैं, वैसे ही परमेश्वर के उपासक विद्वान् लोग परमेश्वर के पास से शुद्ध परमानन्द की धाराओं को अपने अन्तःकरण में प्रवाहित करते हैं और जैसे शिक्षित घोड़े संग्राम-भूमि को जीत लेते हैं, वैसे ही परमेश्वरोपासक लोग परमेश्वर को जीत लेते हैं ॥६॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
आ꣢ वो꣣ रा꣡जा꣢नमध्व꣣र꣡स्य꣢ रु꣣द्र꣡ꣳ होता꣢꣯रꣳ सत्य꣣य꣢ज꣣ꣳ रो꣡द꣢स्योः । अ꣣ग्निं꣢ पु꣣रा꣡ त꣢नयि꣣त्नो꣢र꣣चि꣢त्ता꣣द्धि꣡र꣢ण्यरूप꣣म꣡व꣢से कृणुध्वम् ॥६९॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! आप लोग (वः) अपने (अध्वरस्य) जीवन-यज्ञ के (राजानम्) सम्राट्, (रुद्रम्) पापियों को रुलानेवाले और पुण्यात्माओं के दुःख को दूर करनेवाले, सत्योपदेशकर्ता, (होतारम्) सृष्टि के प्रदाता और संहर्ता, (रोदस्योः) द्यावापृथिवी में (सत्ययजम्) सच्चा सामंजस्य स्थापित करनेवाले, (हिरण्यरूपम्) ज्योतिर्मय (अग्निम्) नायक परमात्मा को (अवसे) आत्मरक्षा के लिए (तनयित्नोः) बिजली के समान अचानक आक्रमण कर देनेवाले, (अचित्तात्) मोहावस्था के प्रापक मृत्यु के आने से पुरा पहले ही (आकृणुध्वम्) सेवन कर लो ॥७॥
भावार्थःमृत्यु बिजली की चकाचौंध के समान न जाने कब अचानक आकर हमारा गला पकड़ ले, इस कारण उसके आने से पहले ही विविध गुणों से समृद्ध परमात्मा का सेवन करके हमें आत्मोद्धार कर लेना चाहिए ॥७॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
इ꣣न्धे꣢꣫ राजा꣣ स꣢म꣣र्यो꣡ नमो꣢꣯भि꣣र्य꣢स्य꣣ प्र꣡ती꣢क꣣मा꣡हु꣢तं घृ꣣ते꣡न꣢ । न꣡रो꣢ ह꣣व्ये꣡भि꣢रीडते स꣣बा꣢ध꣡ आ꣡ग्निरग्र꣢꣯मु꣣ष꣡सा꣢मशोचि ॥७०॥
पदार्थःप्रथम—यज्ञाग्नि के पक्ष में। (अर्यः) हवि-वहन के कर्म का स्वामी (राजा) वेदि में विराजमान यज्ञाग्नि (नमोभिः) सुगन्धित, मधुर, पुष्टिवर्धक और आरोग्यवर्द्धक हवि के अन्नों से (सम् इन्धे) भली-भाँति प्रदीप्त किया जाता है, (यस्य) जिस यज्ञाग्नि का (प्रतीकम्) ज्वाला-रूप मुख (घृतेन) घृत से (आहुतम्) आहुत होता है। (सबाधः) ऋत्विज (नरः) मनुष्य, उस यज्ञाग्नि का (हव्येभिः) हवियों से (ईडते) सत्कार करते हैं। (अग्निः) वह यज्ञाग्नि (उषसाम्) उषाओं के (अग्रम्) सामने (आ अशोचि) चारों ओर यज्ञवेदि में प्रदीप्त किया जाता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (अर्यः) सबका स्वामी (राजा) सम्राट् परमात्मा (नमोभिः) नमस्कारों द्वारा (सम् इन्धे) हृदय में भली-भाँति प्रकाशित होता है, (यस्य) जिस परमात्मा का (प्रतीकम्) स्वरूप (घृतेन) तेज से (आहुतम्) व्याप्त है। (सबाधः) बाधाओं से आक्रान्त (नरः) मनुष्य (हव्येभिः) आत्म-समर्पण रूप हवियों से, उस परमात्मा की (ईडते) पूजा करते हैं। (अग्निः) वह परमात्मा (उषसाम्) उषाओं के (अग्रम्) आगे (आ अशोचि) उपासकों के हृदय में प्रदीप्त होता है। अभिप्राय यह है कि प्रभात काल में धारणा, ध्यान एवं समाधि के सुगम होने से हृदय में परमेश्वर के तेज का अनुभव सुलभ होता है ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। यज्ञाग्नि और परमेश्वराग्नि में उपमानोपमेयभाव व्यङ्ग्य है ॥८॥
भावार्थःजैसे यज्ञवेदि में यज्ञाग्नि को हवियों से प्रदीप्त करते हैं, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि हृदय में परमात्मा को नमस्कारों द्वारा प्रदीप्त करें ॥८॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
प्र꣢ के꣣तु꣡ना꣢ बृह꣣ता꣡ या꣢त्य꣣ग्नि꣡रा रोद꣢꣯सी वृष꣣भो꣡ रो꣢रवीति । दि꣣व꣢श्चि꣣द꣡न्ता꣢दुप꣣मा꣡मुदा꣢꣯नड꣣पा꣢मु꣣पस्थे꣢ महि꣣षो꣡ व꣢वर्ध ॥७१॥
पदार्थः(अग्निः) ज्योतिर्मय जगन्नायक परमेश्वर (बृहता) विशाल (केतुना) ज्ञानराशि के साथ (प्रयाति) उपासक को प्राप्त होता है, (रोदसी) आकाश और भूमि में (आ) व्याप्त होता है, (वृषभः) सुख आदि को बरसानेवाला वह (रोरवीति) सबको बार-बार उपदेश करता है। वह (दिवः) द्युलोक के (चित्) भी (अन्तात्) प्रान्त से (उपमाम्) सूर्य के समान प्रकाशक, नक्षत्रों के समान कान्तिमान्, ध्रुव तारे के समान अचल इत्यादि रूप से उपमा को (उदानट्) प्राप्त करता है। (महिषः) महान् वह (अपाम्) जलों के (उपस्थे) स्थिति-स्थान अन्तरिक्ष में भी (ववर्ध) महिमा को प्राप्त किये हुए है ॥९॥ इस मन्त्र में 'याति, रोरवीति, उदानट्, ववर्ध' इन अनेक क्रियाओं का एक कर्ता-कारक से सम्बन्ध होने के कारण दीपक अलङ्कार है ॥९॥
भावार्थःएक ही अग्नि जैसे द्युलोक में सूर्य-रूप में, अन्तरिक्ष में विद्युत्-रूप में और पृथिवी पर अग्नि के रूप में भासित होता है, वैसे ही एक ही परमात्मा सूर्य, तारा-मण्डल, बिजली, बादल, अग्नि आदि सब स्थानों में प्रकाशित होता है ॥९॥
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छन्द -त्रिपाद विराड् गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्निं꣢꣫ नरो꣣ दी꣡धि꣢तिभिर꣣र꣢ण्यो꣣र्ह꣡स्त꣢च्युतं जनयत प्रश꣣स्त꣢म् । दूरे꣣दृ꣡शं꣢ गृ꣣ह꣡प꣢तिमथ꣣व्यु꣢म् ॥७२॥
पदार्थः(नरः) आप उपासक लोग (हस्तच्युतम्) हाथ, पैर, आँख, कान आदि से रहित, (प्रशस्तम्) प्रशस्तियुक्त, (दूरेदृशम्) दूरदर्शी, (गृहपतिम्) ब्रह्माण्ड-रूप अथवा शरीर-रूप घर के पालनकर्ता, (अथव्युम्) अचल, स्थिरमति (अग्निम्) परमात्मा-रूप अग्नि को (दीधितिभिः) ध्यानक्रिया रूप अंगुलियों से (अरण्योः) मन और आत्मा रूप अरणियों के मध्य में (जनयत) प्रकट करो ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेष से यज्ञाग्नि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥१०॥
भावार्थःअरणियों को रगड़कर जैसे यज्ञवेदि में यज्ञाग्नि को प्रदीप्त करते हैं, वैसे ही ध्यानरूप रगड़ से परमात्मा को हृदय में प्रकाशित करना चाहिए ॥१०॥ इस दशति में परमेश्वर का माहात्म्य वर्णित होने से, और उसकी पूजा के लिए, उसकी ज्योति का साक्षात्कार करने के लिए तथा ध्यान-रूप मन्थन-क्रियाओं से उसे प्रकाशित करने के लिए मनुष्यों को प्रेरित किये जाने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣡बो꣢ध्य꣣ग्निः꣢ स꣣मि꣢धा꣣ ज꣡ना꣢नां꣣ प्र꣡ति꣢ धे꣣नु꣡मि꣢वाय꣣ती꣢मु꣣षा꣡स꣢म् । य꣣ह्वा꣡ इ꣢व꣣ प्र꣢ व꣣या꣢मु꣣ज्जि꣡हा꣢नाः꣣ प्र꣢ भा꣣न꣡वः꣢ सस्रते꣣ ना꣢क꣣म꣡च्छ꣢ ॥७३॥
पदार्थःप्रथम—यज्ञाग्नि के पक्ष में। (धेनुम् इव) दुधारू गाय के समान (आयतीम्) आती हुई (उषासं प्रति) उषा के काल में (जनानाम्) यजमान-जनों के (समिधा) समिदाधान द्वारा (अग्निः) यज्ञाग्नि (अबोधि) यज्ञवेदि में प्रबुद्ध हुआ है। (वयाम्) शाखा को (उज्जिहानाः) ऊपर ले जाते हुए (यह्वाः इव) विशाल वृक्षों के समान (भानवः) यज्ञाग्नि की ज्वालाएँ (नाकम् अच्छ) सूर्य की ओर (प्र सस्रते) प्रसरण कर रही हैं ॥ द्वितीय—परमात्माग्नि के पक्ष में। (धेनुम् इव) दुधारू गाय के समान (आयतीम्) आती हुई (उषासं प्रति) उषा के काल में (जनानाम्) उपासक जनों के (समिधा) आत्मसमर्पण रूप समिदाधान द्वारा (अग्निः) परमात्माग्नि (अबोधि) हृदय-वेदि में प्रबुद्ध हुआ है। (वयाम्) शाखा को (उज्जिहानाः) ऊपर ले जाते हुए (यह्वाः इव) विशाल वृक्षों के समान (भानवः) परमात्माग्नि के तेज (नाकम् अच्छ) जीवात्मा की ओर (प्र सस्रते) प्रसरण कर रहे हैं ॥१॥ इस मन्त्र में यज्ञाग्नि और परमात्माग्नि रूप दो अर्थों के प्रकाशित होने के कारण श्लेषालङ्कार है और 'धेनुम् इव', 'यह्वाः इव' में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःदूध से परिपूर्ण गायों के समान प्रकाश से परिपूर्ण उषाएँ आकाश और भूमि में बिखर गयी हैं। इस शान्तिदायक प्रभात में जैसे अग्निहोत्री लोग यज्ञवेदि में यज्ञाग्नि को प्रदीप्त करते हैं, वैसे ही अध्यात्मयाजी लोग हृदय में परमात्मा को प्रबुद्ध करते हैं। जैसे विशाल वृक्षों की चोटी की शाखाएँ आकाश की ओर जाती हैं, वैसे ही यज्ञवेदि में प्रज्वलित यज्ञाग्नि की ज्वालाएँ सूर्य की ओर और हृदय में जागे हुए परमात्मा के तेज जीवात्मा की ओर जाते हैं ॥१॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
प्र꣢ भू꣣र्ज꣡य꣢न्तं म꣣हां꣡ वि꣢पो꣣धां꣢ मू꣣रै꣡रमू꣢꣯रं पु꣣रां꣢ द꣣र्मा꣡ण꣢म् । न꣡य꣢न्तं गी꣣र्भि꣢र्व꣣ना꣡ धियं꣢꣯ धा꣣ ह꣡रि꣢श्मश्रुं꣣ न꣡ वर्मणा꣢꣯ धन꣣र्चि꣢म् ॥७४॥
पदार्थःहे मनुष्य ! तू (प्र भूः) समर्थ बन, प्रकृष्ट गुणोंवाला हो। और (जयन्तम्) विजेता, (महाम्) महान्, (विपोधाम्) बुद्धिमानों के सहायक, (मूरैः) मारनेवालों से (अमूरम्) न मारे जा सकनेवाले, (पुराम्) शत्रु-नगरियों के (दर्माणम्) विदारक, (गीर्भिः) स्तुति-वाणियों से (वना) भजने-योग्य, (धियम्) प्रज्ञा व कर्म को (नयन्तम्) प्राप्त करानेवाले, (हरिश्मश्रुं न) स्वर्णिम किरणोंवाले सूर्य के समान (वर्मणा) रक्षा के हेतु से (धनर्चिम्) ज्योतिरूप धनवाले (अग्निम्) परमात्मा को (धाः) अपने हृदय में धारण कर, और उक्त गुणोंवाले (अग्निम्) वीर पुरुष को (धाः) राजा के पद पर प्रतिष्ठित कर ॥२॥ इस मन्त्र में उपमा और अर्थश्लेष अलङ्कार हैं ॥२॥
भावार्थःसब प्रजाजनों को चाहिए कि वे समर्थ और गुणवान् होकर सब शत्रुओं के विजेता, महामहिमाशाली, बुधजनों के मित्र, हिंसकों से भी हिंसा न किये जा सकने योग्य, शत्रु की किलेबन्दियों को तोड़नेवाले, स्तुतियों से सम्भजनीय, ज्ञानप्रदाता, सत्कर्मों में प्रेरित करनेवाले, सूर्य के सदृश ज्योतिष्मान् परमात्मा को पूजें और उक्त गुणोंवाले वीर पुरुष को राजा के पद पर प्रतिष्ठित करें ॥२॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पूषा| स्वर - धैवतः
शु꣣क्रं ते꣢ अ꣣न्य꣡द्य꣢ज꣣तं꣡ ते꣢ अ꣣न्य꣡द्वि꣢꣯षुरूपे꣣ अ꣡ह꣢नी꣣ द्यौ꣡रि꣢वासि । वि꣢श्वा꣣ हि꣢ मा꣣या꣡ अव꣢꣯सि स्वधावन्भ꣣द्रा꣡ ते꣢ पूषन्नि꣣ह꣢ रा꣣ति꣡र꣢स्तु ॥७५॥
पदार्थःहे (पूषन्) सब दृष्टियों से परिपुष्ट तथा पुष्टि देनेवाले परमात्मन् ! (ते) आपका, आप द्वारा रचा हुआ (अन्यत्) एक अर्थात् दिन (शुक्रम्) सफेद है, (ते) आपकी रची हुई (अन्यत्) दूसरी अर्थात् रात्रि (यजतम्) यज्ञ-धूम के समान कृष्णवर्ण भी है। इस प्रकार आपके रचे हुए (अहनी) दिन-रात (विषुरूपे) विषम रूपवाले हैं। किन्तु स्वयं आप (द्यौः इव) सूर्य के समान प्रकाशमान (असि) हैं। हे (स्वधावन्) सब भोग्य पदार्थों के स्वामिन् ! आप (विश्वाः हि) सभी (मायाः) बुद्धिकौशलपूर्ण जगत्प्रपंचों की (अवसि) रक्षा करते हो। (ते) आपका (भद्रा) कल्याणकारी (रातिः) दान (इह) हमारे जीवन में (अस्तु) हमें प्राप्त हो ॥३॥ इस मन्त्र में स्वयं सूर्य के समान भास्वर भी परमेश्वर सफेद और काली दोनों रूपोंवाली सृष्टि करता है, इस प्रकार कारण और कार्य के गुणों में आंशिक विरोध वर्णित होने से विषम अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजिस परमात्मा ने दिन-रात आदि विलक्षण वस्तुएँ बनायी हैं और जो सारे जगत्प्रपंच का रक्षक है, उसके उपकार हमें सदा स्मरण करने चाहिएँ ॥३॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
इ꣡डा꣢मग्ने पुरु꣣द꣡ꣳस꣢ꣳ स꣣निं꣡ गोः श꣢꣯श्वत्त꣣म꣡ꣳ हव꣢꣯मानाय साध । स्या꣡न्नः꣢ सू꣣नु꣡स्तन꣢꣯यो वि꣣जा꣢꣫वाग्ने꣣ सा꣡ ते꣢ सुम꣣ति꣡र्भू꣢त्व꣣स्मे꣢ ॥७६॥
पदार्थःहे (अग्ने) सबके अग्रनायक परमात्मन् ! आप (हवमानाय) अग्निहोत्र करनेवाले तथा आत्मसमर्पण-रूप हवि देनेवाले मेरे लिए (इडाम्) भूमि, अन्न और प्रशस्त वाणी तथा (गोः) गाय की (पुरुदंसम्) अनेकों यज्ञकर्मों को सिद्ध करनेवाली (सनिम्) दूध, दही, मक्खन आदि देनों को (शश्वत्तमम्) निरन्तर (साध) प्रदान करते रहिए। (नः) हमारा (सूनुः) पुत्र (तनयः) वंश, धन, सुख, कीर्ति आदि का विस्तार करनेवाला, (विजावा) विजयशील और विविध ऐश्वर्यों का उत्पादक (स्यात्) होवे। हे (अग्ने) ज्योतिष्प्रदाता परमात्मन् ! (सा) वह प्रसिद्ध (ते) आपकी (सुमतिः) अनुग्रहात्मक बुद्धि (अस्मे) हमें (भूतु) प्राप्त होवे ॥४॥
भावार्थःहे परमपिता परमात्मन् ! अग्निहोत्ररूप देवयज्ञ को तथा स्तुति, प्रार्थना, उपासना, समर्पणरूप ब्रह्मयज्ञ को करनेवाले मुझे कृपा कर कृषि एवं साम्राज्य के लिए भूमि, भोजन के लिए भोज्य अन्न आदि, ज्ञान-प्रसार के लिए प्रशस्त वाणी और शरीर की पुष्टि तथा दान के लिए गाय का दूध-दही-घी आदि प्रदान कीजिए। हमारी सन्तान को कुल, धन, धर्म, सुख, सामर्थ्य, न्याय, कीर्ति, चक्रवर्ती राज्य आदि का विस्तार करनेवाला और सब रिपुओं को जीतनेवाला बनाइये ॥४॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ होता꣢꣯ जा꣣तो꣢ म꣣हा꣡न्न꣢भो꣣वि꣢न्नृ꣣ष꣡द्मा꣢ सीदद꣣पां꣡ वि꣢व꣣र्ते꣢ । द꣢ध꣣द्यो꣢ धा꣣यी꣢ सु꣣ते꣡ वया꣢꣯ꣳसि य꣣न्ता꣡ वसू꣢꣯नि विध꣣ते꣡ त꣢नू꣣पाः꣢ ॥७७॥
पदार्थः(महान्) महान्, (नभोवित्) द्युलोक, सूर्य तथा अन्तरिक्ष में विद्यमान परमात्मा-रूप अग्नि (होता) हमारे लिए सब सुखों का दाता (प्र जातः) हुआ है। (नृषद्मा) मनुष्यों के अन्दर निवास करनेवाला वह (अपाम्) नदियों के (विवर्ते) भँवर में भी (सीदत्) स्थित है। (धायी) जगत् को धारण करनेवाला (यः) जो परमात्मा-रूप अग्नि (सुते) उत्पन्न जगत् में (वयांसि) भोग्य पदार्थों को स्थापित करता है, (वसूनि) नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह आदि लोकलोकान्तरों को (यन्ता) नियम में रखनेवाला वही (विधते) पूजा करनेवाले मनुष्य के लिए (तनूपाः) स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का रक्षक होता है ॥५॥ इस मन्त्र में 'नभ में विद्यमान होता हुआ भी मनुष्यों में विद्यमान है, मनुष्यों में विद्यमान होता हुआ भी नदियों के भँवर में विद्यमान है'—इस प्रकार विरोधालङ्कार ध्वनित हो रहा है। परमेश्वराग्नि के सर्वव्यापी होने से विरोध का परिहार हो जाता है ॥५॥
भावार्थःपरमेश्वर गगन में भी, पृथिवी में भी, मनुष्यों में भी, पशु-पक्षी आदिकों में भी, बादलों में भी, सूर्यकिरणों में भी, पर्वतों में भी, नदियों के प्रवाहों में भी, नक्षत्रों में भी, ग्रहोपग्रहों में भी—सभी जगह विद्यमान होता हुआ विश्व का संचालन कर रहा है ॥५॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
प्र꣢ स꣣म्रा꣢ज꣣म꣡सु꣢रस्य प्रश꣣स्तं꣢ पु꣣ꣳसः꣡ कृ꣢ष्टी꣣ना꣡म꣢नु꣣मा꣡द्य꣢स्य । इ꣡न्द्र꣢स्येव꣣ प्र꣢ त꣣व꣡स꣢स्कृ꣣ता꣡नि꣢ व꣣न्द꣡द्वा꣢रा꣣ व꣡न्द꣢माना विवष्टु ॥७८॥
पदार्थःहे मित्रो ! तुम (असुरस्य) दोषनाशक, प्राणप्रदाता, (पुंसः) पौरुषवान्, (कृष्टीनाम्) मनुष्यों के (अनुमाद्यस्य) प्रसादनीय अग्निनामक प्रकाशप्रदाता नेता परमात्मा के (प्रशस्तम्) कीर्तियुक्त (सम्राजम्) साम्राज्य की (प्र) प्रकृष्टरूप से स्तुति करो। (वन्दमाना) वन्दनाशील नारी भी (इन्द्रस्य इव) सूर्य के समान (तवसः) महान् उस परमात्मा के (कृतानि) यशोमय कर्मों को (वन्दद्वारा) वन्दना द्वारा (प्र विवष्टु) भली-भाँति गाने की इच्छा करे ॥६॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःसब नर-नारियों को दोषापहारक, प्राणप्रद, बलवान् परमेश्वर की वन्दना सदा करनी चाहिए और उसके गुणों को ग्रहण करना चाहिए ॥६॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣣र꣢ण्यो꣣र्नि꣡हि꣢तो जा꣣त꣡वे꣢दा꣣ ग꣡र्भ꣢ इ꣣वे꣡त्सुभृ꣢꣯तो ग꣣र्भि꣡णी꣢भिः । दि꣣वे꣡दि꣢व꣣ ई꣡ड्यो꣢ जागृ꣣व꣡द्भि꣢र्ह꣣वि꣡ष्म꣢द्भिर्मनु꣣꣬ष्ये꣢꣯भिर꣣ग्निः꣢ ॥७९॥
पदार्थः(जातवेदाः) प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ को जाननेवाला परमात्मा (अरण्योः) अरणियों के तुल्य विद्यमान जीवात्मा-प्रकृति, जीवात्मा-शरीर, द्युलोक-पृथिवीलोक और बुद्धि-मन में (निहितः) स्थित है। (गर्भिणीभिः) गर्भिणी स्त्रियों द्वारा (गर्भ इव) जैसे गर्भ धारण किया जाता है, (इत्) वैसे ही, वह (सुभृतः) उनके द्वारा सम्यक् प्रकार से धारण किया हुआ है। (अग्निः) वह परमात्मा (जागृवद्भिः) जागरूक (हविष्मद्भिः) आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदि को हवि बनाकर समर्पित करनेवाले (मनुष्येभिः) अध्यात्मयाजी मनुष्यों द्वारा (ईड्यः) पूजा करने योग्य है ॥७॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। गर्भ-गर्भि, दिवे-दिवे में छेकानुप्रास है ॥७॥
भावार्थःजैसे गर्भिणीयों में प्रच्छन्न-रूप से गर्भ स्थित होता है, वैसे ही परमात्मा-रूप अग्नि सब पदार्थों में प्रच्छन्नरूप से विद्यमान है। जैसे गर्भ के बाहर आने पर सम्बन्धी जन पुत्र-पुत्री के जन्म का उत्सव रचाते हैं, और पुत्र-पुत्री का लालन-पालन करते हैं, वैसे ही गुह्यरूप से सर्वत्र स्थित परमात्मा-रूप अग्नि को अपने सम्मुख प्रकट करके आध्यात्मिक जनों को महोत्सव मनाना चाहिए और परमात्माग्नि की आत्मसमर्पण-रूप हवि देकर पूजा करनी चाहिए ॥७॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
स꣣ना꣡द꣢ग्ने मृणसि यातु꣣धा꣢ना꣣न्न꣢ त्वा꣣ र꣡क्षा꣢ꣳसि꣣ पृ꣡त꣢नासु जिग्युः । अ꣡नु꣢ दह स꣣ह꣡मू꣢रान्क꣣या꣢दो꣣ मा꣡ ते꣢ हे꣣त्या꣡ मु꣢क्षत꣣ दै꣡व्या꣢याः ॥८०॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रणी परमात्मन् ! अथवा शत्रुसंहारक राजन् ! आप (सनात्) चिरकाल से (यातुधानान्) पीड़ादायक, घात-पात, हिंसा, उपद्रव आदि दोषों को और दुष्टजनों को (मृणसि) विनष्ट करते आये हो। (रक्षांसि) काम-क्रोध-लोभ आदि और ठग-लुटेरे-चोर आदि राक्षस (त्वा) आपको (पृतनासु) आन्तरिक और बाह्य देवासुर-संग्रामों में (न जिग्युः) नहीं जीत पाते। आप (कयादः) सुख-नाशक दुर्विचारों तथा दुष्टजनों को (सहमूरान्) समूल (अनुदह) एक-एक करके भस्म कर दीजिए। (ते) वे दुष्टभाव और दुष्टजन (ते) आपके (दैव्यायाः) विद्वज्जनों का हित करनेवाले (हेत्याः) दण्डशक्तिरूप वज्र से एवं शस्त्रास्त्रों से (मा मुक्षत) न छूट सकें ॥८॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है, वीर रस है ॥८॥
भावार्थःहे धर्मपालक, विधर्मविध्वंसक, सद्गुणप्रसारक जगदीश्वर वा राजन् ! आपके प्रशंसक हम जब-जब मानसिक या बाह्य देवासुर-संग्राम में काम-क्रोध-लोभ-मोह आदिकों में और ठग-लुटेरे-हिंसक-चोर-शराबी-व्यभिचारी-भ्रष्टाचारी आदि दुष्टजनों से पीड़ित हों, तब-तब आप हमारे सहायक होकर उन्हें जड़-समेत नष्ट करके हमारी रक्षा कीजिए। दुर्जनों का यदि हृदय-परिवर्तन सम्भव हो तो उनका राक्षसत्व नष्ट करके उन्हें शुद्ध अन्तःकरणवाला कर दीजिए, जिससे संसार में सज्जनों की वृद्धि से सर्वत्र सुख और सौहार्द की धारा प्रवाहित हो ॥८॥ इस दशति में परमात्माग्नि को जागृत करने का, अग्नि, पूषन् और जातवेदस् नामों से परमात्मा के गुणों का और उसके द्वारा किये जानेवाले राक्षस-विनाश का वर्णन होने से तथा मनुष्यों को परमात्मा की पूजा की प्रेरणा किये जाने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
अ꣢ग्न꣣ ओ꣡जि꣢ष्ठ꣣मा꣡ भ꣢र द्यु꣣म्न꣢म꣣स्म꣡भ्य꣢मध्रिगो । प्र꣡ नो꣢ रा꣣ये꣡ पनी꣢꣯यसे꣣ र꣢त्सि꣣ वा꣡जा꣢य꣣ प꣡न्था꣢म् ॥८१॥
पदार्थःहे (अध्रिगो) बेरोक गतिवाले और अप्रविरुद्ध तेजवाले (अग्ने) अग्रनेता परमात्मन् राजन् और आचार्य ! आप (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (ओजिष्ठम्) अतिशय ओजयुक्त, अतिप्रबल (द्युम्नम्) यश, तेज और अन्न (आ भर) प्रदान कीजिए। (नः) हमारे लिए (पनीयसे) अतिशय प्रशंसा के योग्य (राये) ऐहिक एवं पारमार्थिक धन की प्राप्ति के लिए और (वाजाय) शारीरिक एवं आध्यात्मिक बल की प्राप्ति के लिए (पन्थाम्) मार्ग को (प्र रत्सि) तैयार कीजिए ॥१॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा, राजा और विद्वान् आचार्य हमें उस सन्मार्ग का उपदेश करें, जिस पर चलते हुए हम प्रबल जगद्व्यापिनी कीर्ति को, अनतिक्रमणीय श्लाघ्य दीप्ति को, सकल भोज्य पदार्थों को, सोना-चाँदी-हीरे-मोती-मणि-गाय-पुत्र-पौत्र-रथ-महल-शस्त्रास्त्र-विद्या-धर्म-आरोग्य-चक्रवर्तीराज्य-मोक्ष आदि रूपवाले अनेक प्रकार के धन को और शारीरिक तथा आत्मिक बल को अपने पुरुषार्थ से व उनके अनुग्रह से प्राप्त कर लें ॥१॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
य꣡दि꣢ वी꣣रो꣢꣫ अनु꣣ ष्या꣢द꣣ग्नि꣡मि꣢न्धीत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । आ꣣जु꣡ह्व꣢द्ध꣣व्य꣡मा꣢नु꣣ष꣡क्शर्म꣢꣯ भक्षीत꣣ दै꣡व्य꣢म् ॥८२
पदार्थः(यदि) यदि (वीरः) पुत्र (अनु) वेदानुकूल व्रतोंवाला (स्यात्) हो, (मर्त्यः) मरणधर्मा वह (अग्निम्) यज्ञाग्नि को, राष्ट्रियता की अग्नि को और परमात्माग्नि को (इन्धीत) अपने अन्दर प्रदीप्त किया करे, और (आनुषक्) निरन्तर नैत्यिक कर्त्तव्य के रूप में (हव्यम्) यज्ञाग्नि के प्रति सुगन्धित-मधुर-पुष्टिवर्धक और आरोग्य-वर्धक हवि को, राजा के प्रति राजदेय कर रूप हवि को तथा परमात्मा के प्रति मन-बुद्धि-प्राण आदि की हवि को (आजुह्वत्) समर्पित करता रहे तो वह (दैव्यम्) प्रकाशक यज्ञाग्नि, राजा वा परमात्मा से प्रदत्त (शर्म) सुख को (भक्षीत) सेवन कर सकता है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःहमारे पुत्र और पुत्रियाँ अपनी मरणधर्मता को विचारकर यदि वेदानुकूल आचरण रखकर नित्य यज्ञाग्नि में घी-कस्तूरी-केसर आदि हवि, राजाग्नि में राजदेय कर रूप हवि और परमात्माग्नि में अपने आत्मा-अग्नि-बुद्धि-प्राण-इन्द्रिय आदि की हवि होमें, तो वे समस्त अभ्युदय और निःश्रेयस-रूप सुख को भोग सकते हैं ॥२॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
त्वे꣣ष꣡स्ते꣢ धू꣣म꣡ ऋ꣢ण्वति दि꣣वि꣢꣫ सं च्छु꣣क्र꣡ आत꣢꣯तः । सू꣢रो꣣ न꣢꣫ हि द्यु꣣ता꣢꣫ त्वं कृ꣣पा꣡ पा꣢वक꣣ रो꣡च꣢से ॥८३॥
पदार्थःहे परमात्मारूप अग्नि ! (ते) आपका (त्वेषः) दीप्त (धूमः) धूएँ के समान प्रसरणशील शत्रुप्रकम्पक प्रभाव (ऋण्वति) सर्वत्र पहुँचता है, जो (दिवि) आत्माकाश में (आततः) विस्तीर्ण (सन्) होता हुआ (शुक्रः) शुद्धिकारी होता है। हे (पावक) शुद्धिकर्ता परमात्मन् ! (द्युता) दीप्ति से (सूरः न) जैसे सूर्य चमकता है वैसे (हि) निश्चय ही (त्वम्) आप (कृपा) अपने प्रभाव के सामर्थ्य से (रोचसे) रोचमान हो ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। श्लेष से यज्ञाग्नि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥३॥
भावार्थःजैसे यज्ञाग्नि का ज्वालाओं से जटिल, प्रदीप्त, सुगन्धित धुआँ आकाश में फैलकर शुद्धिकर्ता और रोगहर्ता होता है, वैसे ही परमात्मा का प्रभाव मनुष्य के आत्मा और हृदय में फैलकर अज्ञान आदि दोषों को कँपानेवाला और शोधक होता है। साथ ही जैसे सूर्य अपने तेज से चमकता है, वैसे परमात्माग्नि अपने प्रभाव-सामर्थ्य से चमकता है ॥३॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
त्व꣡ꣳहि क्षैत꣢꣯व꣣द्य꣡शोऽग्ने꣢꣯ मि꣣त्रो꣡ न पत्य꣢꣯से । त्वं꣡ वि꣢चर्षणे꣣ श्र꣢वो꣣ व꣡सो꣢ पु꣣ष्टिं꣡ न पु꣢꣯ष्यसि ॥८४॥
पदार्थःहे (अग्ने) परमात्मन् ! (त्वम्) आप (हि) निश्चय ही (क्षैतवत्) राजा के समान, और (मित्रः न) सूर्य के समान (यशः) यश के (पत्यसे) स्वामी हो। हे (विचर्षणे) सर्वद्रष्टा, (वसो) निवासक सर्वव्यापी परब्रह्म ! (त्वम्) आप (पुष्टिं न) जैसे शारीरिक और आत्मिक पुष्टि को देते हो, वैसे ही हमें (श्रवः) कीर्ति को भी (पुष्यसि) देते हो ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘क्षैतवत्, मित्रः न, पुष्टिं न’ ये तीन उपमाएँ हैं ॥४॥
भावार्थःजैसे राजा राष्ट्र का संचालक होने से और सूर्य पृथिवी आदि ग्रहोपग्रहों का संचालक होने से यश से प्रख्यात होता है, वैसे ही परमेश्वर जड़-चेतन ब्रह्माण्ड का संचालक होने से जगद्व्यापिनी परम कीर्ति को प्राप्त किये हुए है और वह प्रार्थी मनुष्यों को भी कीर्ति प्रदान करता है ॥४॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
प्रा꣣त꣢र꣣ग्निः꣡ पु꣢रुप्रि꣣यो꣢ वि꣣श꣡ स्त꣢वे꣣ता꣡ति꣢थिः । वि꣢श्वे꣣ य꣢स्मि꣣न्न꣡म꣢र्त्ये ह꣣व्यं꣡ मर्ता꣢꣯स इ꣣न्ध꣡ते꣢ ॥८५॥
पदार्थः(प्रातः) प्रभातकाल में (पुरुप्रियः) बहुत प्यारा (अतिथिः) अतिथि के समान पूज्य तथा सन्मार्गप्रदर्शक (अग्निः) अग्रणी परमेश्वर (विशः) अध्यात्म-यज्ञ में संलग्न प्रजाओं को (स्तवेत) यथायोग्य साधुवाद दे तथा उपदेश देता रहे, (यस्मिन्) जिस (अमर्त्ये) अमर परमात्माग्नि में (विश्वे) सब (मर्तासः) मरणधर्मा उपासक मनुष्य (हव्यम्) अपनी आत्मारूप हवि को (इन्धते) समर्पित करके प्रदीप्त करते हैं ॥५॥
भावार्थःजैसे घर में आये विद्वान् अतिथि का जो लोग प्रदान करने योग्य वस्तुओं से सत्कार करते हैं, उन्हें वह वेदादि शास्त्रों का उपदेश करता है, वैसे ही अतिथि के तुल्य परमात्मा को जो लोग श्रद्धा से आत्मसमर्पण करते हैं उन्हें वह साधुवाद और आशीर्वाद देता हुआ सन्मार्ग का उपदेश करता है ॥५॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
य꣡द्वाहि꣢꣯ष्ठं꣣ त꣢द꣣ग्न꣡ये꣢ बृ꣣ह꣡द꣢र्च विभावसो । म꣡हि꣢षीव꣣ त्व꣢द्र꣣यि꣢꣫स्त्वद्वाजा꣣ उ꣡दी꣢रते ॥८६॥
पदार्थः(यत्) जो स्तोत्र (वाहिष्ठम्) हृदयगत भक्तिभाव का अतिशय वाहक हो (तत्) वही (अग्नये) तेजःस्वरूप परमात्मा के लिए, देय होता है। तदनुसार, हे (विभावसो) तेजोधन जीवात्मन् ! तू उस परमात्मा की (बृहत्) बहुत (अर्च) पूजा कर। हे परमात्मन् ! (त्वत्) आपके पास से (महिषी इव) महती भूमि के समान (रयिः) समस्त धन तथा (त्वत्) आपके पास से (वाजाः) अन्न और बल (उदीरते) उत्पन्न होते हैं ॥६॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विशाल पृथिवी तुझसे उत्पन्न होती है, वैसे ही तुझसे 'रयि' और 'वाज' भी उत्पन्न होते हैं, यह भाव है ॥६॥
भावार्थःजैसे परमात्मा ने हमारे उपकार के लिए भूमि रची है, वैसे ही सब धन-धान्य आदि और बल-पराक्रम, सद्गुण आदि भी हमें दिए हैं। इसलिए हार्दिक भक्तिभाव से उसकी वन्दना करनी चाहिए ॥६॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
वि꣣शो꣡वि꣢शो वो꣣ अ꣡ति꣢थिं वाज꣣य꣡न्तः꣢ पुरुप्रि꣣य꣢म् । अ꣣ग्निं꣢ वो꣣ दु꣢र्यं꣣ व꣡चः꣢ स्तु꣣षे꣢ शू꣣ष꣢स्य꣣ म꣡न्म꣢भिः ॥८७॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (वः) तुम (विशः विशः) प्रत्येक मनुष्य के (अतिथिम्) अतिथि के समान पूज्य, (पुरुप्रियम्) बहुत प्रिय परमेश्वर रूप अग्नि की (वाजयन्तः) अर्चना करो। (दुर्यम्) घर के समान शरणभूत (अग्निम्) उस अग्रनायक जगदीश्वर को (वः) तुम्हारा (वचः) स्तुति-वचन, प्राप्त हो। मैं भी उस जगदीश्वर की (शूषस्य मन्मभिः) बल और सुख के स्तोत्रों से अर्थात् सबल और सुखजनक स्तोत्रों से (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥७॥
भावार्थःसबके हृदय में अतिथि-रूप से विराजमान भक्तवत्सल परमेश्वर का सब मनुष्यों को स्तुतिवचनों से अभिनन्दन करना चाहिए ॥७॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
बृ꣣हद्व꣢꣫यो꣣ हि꣢ भा꣣न꣡वेऽर्चा꣢꣯ दे꣣वा꣢या꣣ग्न꣡ये꣢ । यं꣢ मि꣣त्रं꣡ न प्रश꣢꣯स्तये꣣ म꣡र्ता꣢सो दधि꣣रे꣢ पु꣣रः꣢ ॥८८॥
पदार्थःहे मनुष्य ! तू (भानवे) आदित्य के समान भास्वर, (देवाय) दिव्य गुण-कर्मों से युक्त (अग्नये) परमात्मा के लिए (बृहत्) बड़ी (वयः) आयु को (अर्च) समर्पित कर, (यम्) जिस परमात्मा को (मित्रं न) मित्र के समान (प्रशस्तये) प्रशस्त जीवन के लिए (मर्तासः) उपासक मनुष्य (पुरः) सम्मुख (दधिरे) स्थापित करते हैं ॥८॥ इस मन्त्र में 'मित्रं न' में उपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजो जगत् के नेता, उत्कृष्ट ज्ञानी, सदाचार-प्रेमी महान् लोग होते हैं, वे सदा ही परमात्मा को संमुख रखकर और उससे शुभ प्रेरणा प्राप्त करके सब कार्य करते हैं, जिससे उनकी प्रशस्ति और ख्याति सब जगह फैल जाती है। वैसे ही हे नर-नारियो ! तुम्हें भी चाहिए कि अपनी सम्पूर्ण आयु दिव्य गुण-कर्मोंवाले, ज्योतिष्मान् परमात्मा को समर्पित करके उसकी प्रेरणा से कर्त्तव्य कर्मों में बुद्धि लगाकर संसार में प्रशस्ति प्राप्त करो ॥८॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
अ꣡ग꣢न्म वृत्र꣣ह꣡न्त꣢मं꣣ ज्ये꣡ष्ठ꣢म꣣ग्नि꣡मान꣢꣯वम् । य꣡ स्म꣢ श्रु꣣त꣡र्व꣢न्ना꣣र्क्षे꣢ बृ꣣ह꣡द꣢नीक इ꣣ध्य꣡ते꣢ ॥८९॥
पदार्थःहम (वृत्रहन्तमम्) पापों के अतिशय विनाशक, (ज्येष्ठम्) सर्वाधिक प्रशंसनीय और महान् (आनवम्) मनुष्यों के हितकारी (अग्निम्) तेजस्वी परमेश्वर को (अगन्म) प्राप्त हुए हैं। (यः स्म) जो (श्रुतर्वन्) प्रसिद्ध किरणरूप अश्वोंवाले ज्योतिर्मय सूर्य में तथा (आर्क्षे) तारापुंज में (बृहदनीकः) विशाल तेजवाला होकर (इध्यते) भासमान होता है ॥९॥
भावार्थःप्रचण्ड दीप्तिवाले सूर्य में, तारामण्डल में, सारे ही ब्रह्माण्ड में जिसका कर्तृत्व, जिसकी दी हुई शक्ति, जिसका उत्पन्न किया तेज द्योतमान है, जो पापों का संहारक, मनुष्यों का हितकर्ता, सर्वाधिक प्रशंसनीय पुराण-पुरुष है, उसकी सबको वन्दना, प्राप्ति और उपासना करनी चाहिए ॥९॥ इस मन्त्र पर कुछ लोगों की यह व्याख्या असंगत है कि श्रुतर्वा नाम का कोई राजा था, जो ऋक्ष का पुत्र था, जिसके पास अग्नि प्रदीप्त रहती थी, क्योंकि वेदों में लौकिक इतिहास नहीं है ॥९॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
जा꣣तः꣡ परे꣢꣯ण꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ य꣢त्स꣣वृ꣡द्भिः꣢ स꣣हा꣡भु꣢वः । पि꣣ता꣢꣫ यत्क꣣श्य꣡प꣢स्या꣣ग्निः꣢ श्र꣣द्धा꣢ मा꣣ता꣡ मनुः꣢꣯ क꣣विः꣢ ॥९०
पदार्थःहे जीवात्मन् ! तू (परेण) उत्कृष्ट (धर्मणा) धर्मनामक संस्कार के कारण (जातः) मानवयोनि में जन्मा है, (यत्) क्योंकि तू (सवृद्भिः सह) साथ रहनेवाले सूक्ष्मशरीरस्थ पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच सूक्ष्मभूत और मन तथा बुद्धि, इन सत्रह तत्त्वों के साथ (अभुवः) विद्यमान था। (यत्) क्योंकि (कश्यपस्य) तुझ द्रष्टा का (पिता) पिता अर्थात् मनुष्यशरीरदाता (अग्निः) अग्रणी तेजोमय परमात्मा है, अतः (श्रद्धा) श्रद्धा (माता) तेरी माता के तुल्य हो और तू (स्वयम् मनुः) मननशील, तथा (कविः) मेधावी बन ॥१०॥
भावार्थःजब जीवात्मा मृत्यु के समय शरीर से निकलता है, तब सूक्ष्म शरीर उसके साथ विद्यमान होता है, और सूक्ष्मशरीरस्थ चित्त में धर्माधर्म नामक शुभाशुभ कर्म-संस्कार आत्मा के साथ जाते हैं। धर्म से वह मनुष्य-जन्म और अधर्म से पशु-पक्षी आदि का जन्म पाता है। जीवात्मा ज्ञानग्रहण के सामर्थ्यवाला होने से कश्यप अर्थात् द्रष्टा है। इसलिए उसे सकल ज्ञान-विज्ञान का संचय करना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर उसका शरीर में जन्म-दाता होता है, अतः पिता की महत्ता का विचार करके उसे जीवन में श्रद्धा को माता के समान स्वीकार करना चाहिए और स्वयं मननशील तथा मेधावी बनना चाहिए ॥१०॥ जो लोग यह कहते हैं कि कश्यप ऋषि का नाम है, श्रद्धा देवी का नाम है और मनु से वैवस्वत मनु का ग्रहण है, उनका मत वेदों में लौकिक इतिहास न होने से संगत नहीं है ॥ इस दशति में परमात्मा से यश, तेज, धन, बल आदि की प्रार्थना, परमात्मा के प्रभाव का वर्णन, अतिथि परमात्मा के प्रति हव्य-समर्पण और उसके पूजन की प्रेरणा होने से तथा परमात्मा को पिता और श्रद्धा को माता के रूप में वर्णित करने से इसके विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति है, ऐसा जानो। प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त। प्रथम अध्याय में नवम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - गान्धारः
सो꣢म꣣ꣳ रा꣡जा꣢नं꣣ व꣡रु꣢णम꣣ग्नि꣢म꣣न्वा꣡र꣢भामहे । आ꣣दित्यं꣢꣫ विष्णु꣣ꣳ सू꣡र्यं꣢ ब्र꣣ह्मा꣡णं꣢ च꣣ बृ꣢ह꣣स्प꣡ति꣢म् ॥९१॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हम (राजानम्) सबके राजा, (सोमम्) चन्द्रमा के समान आह्लाद देनेवाले, चराचर जगत् के उत्पादक सोम नामक परमात्मा का, (वरुणम्) सब शिष्ट, मुमुक्षु, धर्मात्मा जनों को वरनेवाले और उन सबके द्वारा वरे जानेवाले वरुण नामक परमात्मा का, (अग्निम्) सबके अग्रनायक, प्रकाशस्वरूप अग्निनामक परमात्मा का, (आदित्यम्) प्रलयकाल में सब जगत् को प्रकृति के गर्भ में ग्रहण कर लेनेवाले, अविनाशीस्वरूप, सूर्य के समान सत्य, न्याय और धर्म के प्रकाशक आदित्य नामक परमात्मा का, (विष्णुम्) चराचर में व्यापक विष्णु नामक परमात्मा का, (ब्रह्माणम्) सबसे महान् ब्रह्मा नामक परमात्मा का, (बृहस्पतिं च) और विशाल आकाशादिकों के स्वामी, वृद्धि के अधिपति बृहस्पति नामक परमात्मा का (अनु आ रभामहे) आश्रय लेते हैं ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। मन्त्रोक्त सब देव विभिन्न राज्यमन्त्री अथवा राज्याधिकारी हैं, यह समझना चाहिए, जैसा कि मनु ने कहा है—राजा को चाहिए कि अपने देश के मूल निवासी, वेदादिशास्त्रों के ज्ञाता, शूरवीर, लक्ष्य को पा लेनेवाले, कुलीन, सुपरीक्षित सात या आठ मन्त्री बनाये (मनु० ७।५४)। हम प्रजाजन (सोमम्) चन्द्रमा के समान प्रजाओं को आह्लाद देनेवाले (राजानम्) राजा का, (वरुणम्) दण्डाधिकारी का, (अग्निम्) सेना के अग्रनायक सेनाध्यक्ष का, (आदित्यम्) कर-अधिकारी का, (विष्णुम्) व्यापकरूप से प्रजाओं का कार्य सिद्ध करनेवाले प्रधानमन्त्री का, (सूर्यम्) सूर्य के समान रोग-निवारक स्वास्थ्य-मन्त्री का, (ब्रह्माणम्) यज्ञाधिकारी का, (बृहस्पतिं च) ओर शिक्षा-मन्त्री का, (अनु आरभामहे) राष्ट्र के उत्कर्ष के लिए आश्रय लेते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःअग्नि, सोम, वरुण, आदित्य, विष्णु, सूर्य, ब्रह्मा, बृहस्पति आदि अनेक नामों से वेदों में जिसकी कीर्ति गायी गयी है, उस एक परमेश्वर का सबको आश्रय लेना चाहिए। उसी प्रकार राष्ट्र में अनेक मन्त्रियों और राज्याधिकारियों के साथ मिलकर राष्ट्र का संचालन करनेवाले राजा का भी सब प्रजाजनों को आश्रय ग्रहण करना चाहिए तथा अपना सहयोग देकर उसका सत्कार करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अङ्गिराः| स्वर - गान्धारः
इ꣣त꣢ ए꣣त꣢ उ꣣दा꣡रु꣢हन्दि꣣वः꣢ पृ꣣ष्ठा꣡न्या रु꣢꣯हन् । प्र꣢ भू꣣र्ज꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थो꣡द्यामङ्गि꣢꣯रसो ययुः ॥९२
पदार्थः(एते) ये (अङ्गिरसः) अग्निस्वरूप, अंगारे के समान तेजस्वी, अंगों के रसभूत, प्राणप्रिय परमेश्वर का ध्यान करनेवाले तपस्वी योगजन (इतः) इस अन्नमय कोश से या मूलाधार चक्र से (उत् आरुहन्) ऊर्ध्वारोहण करते हैं, क्रमशः (दिवः पृष्ठानि) अन्तरिक्ष के सोपानों पर, अर्थात् मध्यवर्ती कोशों या मध्यवर्ती चक्रों पर (आरुहन्) चढ़ जाते हैं, और फिर (द्याम्) द्युलोक पर अर्थात् आनन्दमयरूप सर्वोच्च कोश पर या सहस्रार-रूप सर्वोच्च चक्र पर (उद् ययुः) पहुँच जाते हैं। हे सखे ! तू भी वैसे ही (प्र भूः) उत्कृष्ट बन अथवा समर्थ बन, (यथा) जिससे (पथा) सन्मार्ग पर चलकर, तुझे (जयः) विजय प्राप्त हो ॥२॥
भावार्थःमानव-शरीर में अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय ये पाँच कोश और मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, ललित, आज्ञा, सहस्रार ये आठ चक्र हैं। योगाभ्यासी लोग स्थूल कोश से सूक्ष्म-सूक्ष्मतर कोशों के प्रति आरोहण करते हुए सूक्ष्मतम आनन्दमय कोश को प्राप्त कर परम ब्रह्मानन्द का अनुभव करते हैं। इसी प्रकार निचले चक्र मूलाधार से प्राणों का ऊर्ध्व चङ्क्रमण करते-करते अन्त में सहस्रार चक्र में प्राणों को केन्द्रित कर मस्तिष्क और हृदय में परमात्म-ज्योति की अविच्छिन्न धारा को प्रवाहित कर लेते हैं। हे मित्र ! तुम भी वैसा ही सामर्थ्य संग्रह करो, जिससे उत्तरोत्तर अधिकाधिक उत्कृष्ट मार्ग पर चलते हुए तुम्हें विजय हस्तगत हो सके ॥२॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
रा꣣ये꣡ अ꣢ग्ने म꣣हे꣢ त्वा꣣ दा꣡ना꣢य꣣ स꣡मि꣢धीमहि । ई꣡डि꣢ष्वा꣣ हि꣢ म꣣हे꣡ वृ꣢ष꣣न् द्या꣡वा꣢ हो꣣त्रा꣡य꣢ पृथि꣣वी꣢ ॥९३
पदार्थःहे (अग्ने) शरीरस्थ मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि देवों में अग्रणी हमारे जीवात्मन् ! हम (महे राये) प्रचुर सोना, चाँदी, विद्या, विवेक आदि धन को कमाने के लिए और (दानाय) उसके दान के लिए (त्वा) तुझे (समिधीमहि) प्रदीप्त-प्रबुद्ध करते रहें। हे (वृषन्) बली जीवात्मन् ! तू (द्यावापृथिवी) द्युलोक और भूलोक की (महे होत्राय) महान् होम के लिए (ईडिष्व) स्तुति कर, प्रशंसा कर। ये द्यावापृथिवी जगत् के हितार्थ सृष्टि-संचालन-यज्ञ में सर्वस्व-होम कर रहे हैं, इस रूप में उनके गुणों का वर्णन कर और उनसे प्रेरणा लेकर स्वयं भी परोपकारार्थ होम कर, यह भाव है ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि अपने आत्मा को प्रबोधन देकर दानशील आकाश-भूमि से शिक्षा लेकर धनों के कमाने तथा दान देने में प्रवृत्त हों ॥३॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
द꣣धन्वे꣢ वा꣣ य꣢दी꣣म꣢नु꣣ वो꣢च꣣द्ब्र꣢꣫ह्मेति꣣ वे꣢रु꣣ त꣢त् । प꣢रि꣣ वि꣡श्वा꣢नि꣣ का꣡व्या꣢ ने꣣मि꣢श्च꣣क्र꣡मि꣢वाभुवत् ॥९४॥
पदार्थः(यत्) जब, उपासक (ईम्) इस परमात्मा-रूप अग्नि को (अनु दधन्वे) अनुकूलतापूर्वक अपने हृदय में धारण कर लेता है, (वा) और (ब्रह्म इति) यह साक्षात् ब्रह्म है, ऐसा (वोचत्) कह सकता है, (तत् उ) तभी, वह उसे (वेः) जानता है, जो परमात्मा रूप अग्नि (विश्वानि) सब (काव्या) वेद-काव्यों अथवा सृष्टि-काव्यों को (परि अभुवत्) चारों ओर व्याप्त किये हुए है, (नेमिः) रथ के पहिए की परिधि (चक्रम् इव) जैसे रथ के पहिए को चारों ओर व्याप्त किये होती है ॥४॥ इस मन्त्र में 'नेमिश्चक्रमिव' में उपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजब परमात्मा के ध्यान में संलग्न योगी परमात्मा को धारणा, ध्यान, समाधि के मार्ग से अपने हृदय के अन्दर भली-भाँति धारण कर लेता है और हस्तामलकवत् उसकी अनुभूति करता हुआ 'यह ब्रह्म है, जिसका मैं साक्षात् कर रहा हूँ', इस प्रकार कहने में समर्थ होता है, तभी वस्तुतः उसने ब्रह्म जान लिया है, यह मानना चाहिए ॥४॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡त्य꣢ग्ने꣣ ह꣡र꣢सा꣣ ह꣡रः꣢ शृणा꣣हि꣢ वि꣣श्व꣢त꣣स्प꣡रि꣢ । या꣣तुधा꣡न꣢स्य र꣣क्ष꣢सो꣣ ब꣢लं꣣꣬ न्यु꣢꣯ब्ज वी꣣꣬र्यम्꣢꣯ ॥९५॥
पदार्थःहे (अग्ने) ज्योतिर्मय परमेश्वर, मेरे अन्तरात्मा, राजा, सेनापति और आचार्यप्रवर ! आप (यातुधानस्य) यातना देनेवाले (रक्षसः) पापरूप राक्षस के तथा पापी दुष्ट शत्रु के (बलम्) सैन्य को, और (वीर्यम्) पराक्रम को (न्युब्ज) निर्मूल कर दीजिए। (विश्वतः परि) सब ओर से (तस्य) उसके (हरः) हरणसामर्थ्य, क्रोध और तेज को (हरसा) अपने हरणसामर्थ्य, मन्यु और तेज से (प्रतिशृणाहि) विनष्ट कर दीजिए ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःसब मनुष्यों का कर्त्तव्य है कि वे परमेश्वर की उपासना से, अपने अन्तरात्मा को जगाने से, राजा और सेनापति की सहायता से तथा गुरुओं के सदुपदेश-श्रवण से, अपने हृदय और समाज में से सब पापों को तथा राष्ट्र के सब शत्रुओं को निर्मूल करें ॥५॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
त्व꣡म꣢ग्ने꣣ व꣡सू꣢ꣳरि꣣ह꣢ रु꣣द्रा꣡ꣳ आ꣢दि꣣त्या꣢ꣳ उ꣣त꣢ । य꣡जा꣢ स्वध्व꣣रं꣢꣫ जनं꣣ म꣡नु꣢जातं घृत꣣प्रु꣡ष꣢म् ॥९६॥
पदार्थःहे (अग्ने) परमात्मन् ! (त्वम्) जगदीश्वर आप (इह) हमारे इस राष्ट्र में (वसून्) धन-धान्य आदि सम्पत्ति से अन्य वर्णों को बसानेवाले उत्कृष्ट वैश्यों को, (रुद्रान्) शत्रुओं को रुलानेवाले वीर क्षत्रियों को, (आदित्यान्) प्रकाशित सूर्यकिरणों के समान विद्याप्रकाश से युक्त ब्राह्मणों को, (उत) और (स्वध्वरम्) शुभ यज्ञ करनेवाले, (मनुजातम्) मनुष्य-समाज के कल्याणार्थ जन्म लेनेवाले, (घृतप्रुषम्) यज्ञाग्नि में अथवा सत्पात्रों में घृत आदि को सींचनेवाले (जनम्) पुत्र को (यज) प्रदान कीजिए ॥६॥ अब वसुओं, रुद्रों और आदित्यों के उपर्युक्त अर्थ करने में प्रमाण लिखते हैं। 'वसवः' से वैश्यजन गृहीत होते हैं, क्योंकि यजुर्वेद ८।१८ में वसुओं से धन की याचना की गयी है। रुद्रों से क्षत्रिय अभिप्रेत हैं, क्योंकि रुद्रों का वर्णन वेदों में इस रूप में मिलता है—'हे रुद्र, तेरी सेनाएँ हमसे भिन्न हमारे शत्रु को विनष्ट करें' (ऋ० २।३३।११); 'उस रुद्र के सम्मुख अपनी वाणियों को प्रेरित करो, जिसके पास स्थिर धनुष् है, वेगगामी बाण हैं, जो स्वयं आत्म-रक्षा करने में समर्थ है, किसी से पराजित नहीं होता, शत्रुओं का पराजेता है और तीव्र शस्त्रास्त्रों से युक्त है’ (ऋ० ७।४६।१)। आदित्यों से ब्राह्मण ग्राह्य हैं, क्योंकि तै० संहिता में कहा है कि 'ब्राह्मण ही आदित्य हैं' (तै० सं० १।१।९।८) ॥६॥
भावार्थःहे जगत्-साम्राज्य के संचालक, देवाधिदेव, परमपिता परमेश्वर ! ऐसी कृपा करो कि हमारे राष्ट्र में धन-दान से सब वर्णाश्रमों का पालन करनेवाले उत्तम कोटि के वैश्य, युद्धों में शत्रुओं को जीतनेवाले वीर क्षत्रिय और आदित्य के समान ज्ञान-प्रकाश से पूर्ण विद्वद्वर ब्राह्मण उत्पन्न हों और सब लोग तरह-तरह के परोपकार-रूप यज्ञों का अनुष्ठान करनेवाली, मानवसमाज का कल्याण करनेवाली, अग्निहोत्र-परायण, अतिथियों का घृतादि से सत्कार करनेवाली सुयोग्य सन्तान को प्राप्त करें ॥६॥ इस दशति में सोम, अग्नि, वरुण, विष्णु आदि विविध नामों से परमेश्वर का स्मरण होने से, परमेश्वर के आश्रय से अंगिरस योगियों की उत्कर्ष-प्राप्ति का वर्णन होने से, परमेश्वर के गुणों का वर्णन करते हुए उससे राक्षसों के संहार तथा राष्ट्रोत्थान के लिए प्रार्थना करने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है। प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त। यह प्रथम प्रपाठक समाप्त हुआ ॥ प्रथम अध्याय में दशम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
पु꣣रु꣡ त्वा꣢ दाशि꣣वा꣡ꣳ वो꣢चे꣣ऽरि꣡र꣢ग्ने꣣ त꣡व꣢ स्वि꣣दा꣢ । तो꣣द꣡स्ये꣢व शर꣣ण꣢꣫ आ म꣣ह꣡स्य꣢ ॥९७॥
पदार्थः(दाशिवान्) आत्म-समर्पण किये हुए मैं (त्वा) आप परमात्मा की (पुरु) बहुत (वोचे) स्तुति करता हूँ। (अग्ने) हे तेजस्वी जगदीश्वर ! आप (अरिः) समर्थ हैं। मैं (तव स्वित्) आपका ही हूँ, अतः मेरे समीप (आ) आइए। (तोदस्य इव) अमृत-जल से परिपूर्ण कुएँ के समान (महस्य) महिमाशाली आपकी (शरणे) शरण में, मैं (आ) आया हूँ ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःहे जगत्पति ! हे परमपिता ! मैं आपका ही हूँ। आपको छोड़कर अन्यत्र कहाँ जाऊँ ! आपके ही गुण गाता हूँ, आपको ही स्वयं को समर्पित करता हूँ। स्वच्छ जल से भरे हुए कुएँ के सदृश आप अमृतमय आनन्द-रस से परिपूर्ण हैं। उस आनन्द-रस से कुछ रस की बूँदें मेरे भी हृदय में छिड़क-कर मुझे रस-सिक्त कर दीजिए। मैं आपकी शरण में आया हूँ ॥१॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
प्र꣡ होत्रे꣢꣯ पू꣣र्व्यं꣢꣫ वचो꣣ऽग्न꣡ये꣢ भरता बृ꣣ह꣢त् । वि꣣पां꣡ ज्योती꣢꣯ꣳषि꣣ बि꣡भ्र꣢ते꣣ न꣢ वे꣣ध꣡से꣢ ॥९८॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (विपाम्) मेधावी छात्रों के (ज्योतींषि) विद्या-तेजों को (बिभ्रते) परिपुष्ट करनेवाले, (वेधसे न) द्विज बनाने के लिए द्वितीय जन्म देनेवाले आचार्य के लिए जैसे स्तुति-वचन उच्चारण किये जाते हैं, वैसे ही (विपाम्) व्याप्त सूर्य-चन्द्र, नक्षत्र आदि के (ज्योतींषि) तेजों को (बिभ्रते) परिपुष्ट करनेवाले (वेधसे) जगद्-विधाता, (होत्रे) सुख-समृद्धि-प्रदाता (अग्नये) तेजस्वी परमेश्वर के लिए (बृहत्) महान् (पूर्व्यम्) श्रेष्ठ (वचः) वेद के स्तोत्र को (प्र भरत) प्रकृष्ट रूप से उच्चारण करो ॥२॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे कोई विद्वान् शिक्षक अपने उपदेश और शिक्षा से बुद्धिमान् विद्यार्थियों को विद्या-तेज प्रदान करता है, वैसे ही जो परमेश्वर सूर्य-चन्द्र, नक्षत्र, बिजली आदिकों को ज्योति देता है, उस परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर में सबको श्रद्धा करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
अ꣢ग्ने꣣ वा꣡ज꣢स्य꣣ गो꣡म꣢त꣣ ई꣡शा꣢नः सहसो यहो । अ꣣स्मे꣡ दे꣢हि जातवेदो꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥९९॥
पदार्थःहे (सहसः यहो) बल के पुतले, बलियों में बली, (जातवेदः) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सब धन और ज्ञान के उत्पादक (अग्ने) ज्योतिर्मय परमात्मन् ! अथवा, हे (सहसः यहो) शत्रुपराजयशील, बलवान् पिता के पुत्र, (जातवेदः) शास्त्रों के ज्ञाता (अग्ने) विद्वन् वा राजन् ! (गोमतः) प्रशस्त गाय, पृथिवी, वेदवाणी आदि से युक्त (वाजस्य) ऐश्वर्य के (ईशानः) अधीश्वर आप (अस्मे) हमें (महि) महान् (श्रवः) कीर्ति, प्रशंसा और धन-धान्य आदि (देहि) प्रदान कीजिए ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि जगदीश्वर की उपासना से पुरुषार्थी होकर अपने पुरुषार्थ से और सब शास्त्र पढ़े हुए विद्वानों तथा राजनीतिज्ञ राजा की सहायता से समस्त धन, धान्य, विद्या, साम्राज्य आदि ऐश्वर्य और अत्यन्त विस्तीर्ण यश को प्राप्त करें ॥३॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
अ꣢ग्ने꣣ य꣡जि꣢ष्ठो अध्व꣣रे꣢ दे꣣वा꣡न् दे꣢वय꣣ते꣡ य꣢ज । हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ वि रा꣢꣯ज꣣स्य꣢ति꣣ स्रि꣡धः꣢ ॥१००॥
पदार्थःपदार्थः हे अग्ने! ज्ञानप्रकाशयुक्त परमेश्वर अथवा आचार्य! (यजिष्ठ) अतिशय रूप से जीवन यज्ञ वा अध्ययन-अध्यापन रूप यज्ञ के साधक आप अध्वरे हिंसादिदोष से रहित जीवन-यज्ञ वा अध्ययन-अध्यापन-रूप यज्ञ में (देवयते) दिव्य गुण-कर्म-स्वभावों के अभिलाषी मुझे (देवान्) दिव्य गुण-कर्म-स्वभाव (यज्ञ) प्राप्त कराइए। (होता) विद्या, सदाचार आदि के दाता, (मन्द्रः) आह्लादकारी आप (विराजसि) विशेष रूप से शोभित हो। आप (स्रिधः) हिंसको को अर्थात विद्या के विघातक आलस्य, मद मोह आदि को तथा ब्रह्मचर्य के विघातक काम-क्रोध आदि को (अति) हमसे दूर कर दीजिए।
भावार्थःभावार्थः जैसे परमेश्वर उपासकों को दिव्य गुण-कर्म-स्वभाव प्रदान करता है और पापों से उन्हें बचाता है, वैसे ही आचार्य शिष्यों को विद्या, सच्चरित्रता और दिव्य गुण-कर्म-स्वभावों की शिक्षा देकर ब्रह्मचर्चय-विघातक तथा विद्या-विघातक दुर्व्यसनों से दूर रक्खे।
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
ज꣣ज्ञानः꣢ स꣣प्त꣢ मा꣣तृ꣡भि꣢र्मे꣣धा꣡माशा꣢꣯सत श्रि꣣ये꣢ । अ꣣यं꣢ ध्रु꣣वो꣡ र꣢यी꣣णां꣡ चि꣢केत꣣दा꣢ ॥१०१॥
पदार्थःपवमान सोम अर्थात् चित्तशोधक परमात्मा (सप्त) सात (मातृभिः) माता के तुल्य गायत्री आदि छन्दों से युक्त वेदवाणियों द्वारा (जज्ञानः) उपासक के हृदय में प्रादुर्भूत होकर (श्रिये) सम्पदा की प्राप्ति के लिए (मेधाम्) धारणावती बुद्धि को (आ अशासत) प्रदान करता है, जिससे (ध्रुवः) स्थितप्रज्ञ हुआ (अयम्) यह उपासक (रयीणाम्) श्रेष्ठ अध्यात्म-सम्पत्तियों को (आ चिकेतत्) प्राप्त कर लेता है ॥५॥
भावार्थःगायत्री आदि सात छन्दों में बद्ध वेदवाणियों के गान से परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त किये हुए योगी को ऋतम्भरा प्रज्ञा के उत्पन्न हो जाने से सब अध्यात्मसम्पदाएँ प्राप्त हो जाती हैं ॥५॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अदितिः| स्वर - ऋषभः
उ꣣त꣢꣫ स्या नो꣣ दि꣡वा꣢ म꣣ति꣡रदि꣢꣯तिरू꣣त्या꣡ग꣢मत् । सा꣡ शन्ता꣢꣯ता꣣ म꣡य꣢स्कर꣣द꣢प꣣ स्रि꣣धः꣢ ॥१०२॥
पदार्थः(उत) और (स्या) वह (मतिः) सब कुछ जाननेवाली (अदितिः) अखण्डनीय जगन्माता (ऊत्या) रक्षा के साथ (नः) हमारे समीप (आ गमत्) आये। (सा) वह (शन्ताता) शान्तिकर्म में (मयः) सुख (करत्) करे, और (स्रिधः) हिंसा-वृत्तियों तथा हिंसकों को (अप) दूर करे ॥६॥
भावार्थः‘हे शतकर्मन् ! तू ही हमारा पिता है, तू ही हमारी माता है’ (साम ११७), यहाँ परमात्मा को माता कहा गया है। उसके माता होने का ही यहाँ 'अदिति' नाम से वर्णन है। जगन्माता अदिति है क्योंकि वह कभी खण्डित नहीं होती तथा अदीन, अजर, अमर और नित्य रहती है। विलाप, लूटपाट, हाहाकार से पीड़ित इस जगत् में वह कृपा करके शान्तिप्रिय सज्जनों से किये जाते हुए शान्ति के प्रयत्नों को सफल करके सारे भूमण्डल में सुख की वर्षा करे और हिंसकों को भी अपनी शुभ प्रेरणा से धर्मात्मा बना दे ॥६॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
ई꣡डि꣢ष्वा꣣ हि꣡ प्र꣢ती꣣व्याँ꣢३ य꣡ज꣢स्व जा꣣त꣡वे꣢दसम् । च꣣रिष्णु꣡धू꣢म꣣म꣡गृ꣢भीतशोचिषम् ॥१०३॥
पदार्थःहे मनुष्य ! तू (प्रतीव्यम्) प्रत्येक वस्तु में व्यापक, (चरिष्णुधूमम्) जिसका धुएँ के तुल्य शत्रु-प्रकम्पक प्रभाव संचरणशील है ऐसे, (अगृभीतशोचिषम्) अप्रतिरुद्ध तेजवाले (जातवेदसम्) सद्गुणरूप दिव्य धन को उत्पन्न करनेवाले परमात्माग्नि की, (ईडिष्व हि) अवश्य ही स्तुति कर और (यजस्व) उसकी पूजा कर ॥७॥ श्लेष से भौतिक अग्नि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥७॥
भावार्थःजैसे धूमशिखाओं को उठानेवाले, चमकीली ज्वालाओंवाले भौतिक अग्नि का शिल्पीजन शिल्पयज्ञों में प्रयोग करते हैं, वैसे ही प्रतापरूप धूम से शोभित, दीप्त तेजोंवाले, सत्य-अहिंसा-अस्तेय आदि दिव्य धनों के जनक परमात्माग्नि की उत्कर्ष चाहनेवाले मनुष्यों को स्तुति और पूजा करनी चाहिए ॥७॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
न꣡ तस्य꣢꣯ मा꣣य꣡या꣢ च꣣ न꣢ रि꣣पु꣡री꣢शीत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । यो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ द꣣दा꣡श꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये ॥१०४॥
पदार्थः(मायया च न) छल से भी (तस्य) उस परमात्मोपासक को (मर्त्यः) मानव (रिपुः) शत्रु (न ईशीत) वश में नहीं कर सकता, (यः) जो उपासक (हव्यदातये) देय पराक्रम, विजय आदि को देनेवाले (अग्नये) परमेश्वर के लिए (ददाश) आत्मसमर्पण रूप हवि को देता है ॥८॥
भावार्थःतरह-तरह के विघ्न-बाधा और संकटो से घिरे हुए इस जगत् में अनेक मानव शत्रु विद्वेषरूप विष से लिप्त होकर सज्जनों को ठगने, लूटने, जलाने व मारने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु जो लोग परमात्मा को आत्मसमर्पण करके उससे शत्रु-पराजय के लिए बल की याचना करते हैं, उन्हें वह पुरुषार्थ में नियुक्त करके विजय पाने में ऐसा समर्थ कर देता है कि बलवान् और बड़ी संख्यावाले भी शत्रु माया से भी उन्हें वश में नहीं कर पाते ॥८॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - ऋषभः
अ꣢प꣣ त्यं꣡ वृ꣢जि꣣न꣢ꣳ रि꣣पु꣢ꣳ स्ते꣣न꣡म꣢ग्ने दुरा꣣꣬ध्य꣢꣯म् । द꣡वि꣢ष्ठमस्य सत्पते कृ꣣धी꣢ सु꣣ग꣢म् ॥१०५॥
पदार्थःहे (सत्पते) सज्जनों के पालनकर्ता (अग्ने) पराक्रमशाली परमात्मन्, विद्वान् जन अथवा राजन् ! आप (त्यम्) उस (वृजिनम्) छोड़ने योग्य पाप को, (रिपुम्) कामक्रोधादि षड्रिपुवर्ग को, अथवा बाह्य शत्रु को, (स्तेनम्) चोर को, और (दुर्-आध्यम्) बुरा चिन्तन करनेवाले द्वेषी को (दविष्ठम्) दूर से दूर (अप अस्य) फेंक दीजिए ॥९॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥९॥
भावार्थःपाप विचार या पापीजन, काम-क्रोध आदि आन्तरिक रिपु या बाह्य शत्रु, चोरी के विचार या चोर लोग, दुश्चिन्ताएँ या दुश्चिन्तनकारी मनुष्य, जो भी हम पर आक्रमण करते हैं, उन्हें हम परमात्मा, विद्वान् लोगों और राजा की सहायता से दूर कर दें। सद्विचार और सद्विचारशील लोग सहयोगी बनकर हमारे साथ विचरें ॥९॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
श्रु꣣꣬ष्ट्य꣢꣯ग्ने꣣ नव꣢स्य मे स्तो꣡म꣢स्य वीर विश्पते । नि꣢ मा꣣यि꣢न꣣स्त꣡प꣢सा र꣣क्ष꣡सो꣢ दह ॥१०६॥
पदार्थः(श्रुष्टी) शीघ्र ही, हे (वीर) पराक्रमशाली, (विश्पते) प्रजापालक (अग्ने) तेजस्वी परमात्मन् वा राजन् ! आप (मे) मेरे (नवस्य) प्रशंसायोग्य (स्तोमस्य) आन्तरिक सद्गुणों की सेना के तथा बाह्य योद्धाओं की सेना के (तपसा) तेज से (मायिनः) मायावी, छल-कपटपूर्ण (रक्षसः) राक्षसी भावों और राक्षसजनों को (नि दह) पूर्णतः भस्म कर दीजिए ॥१०॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःजो कोई पाप-रूप अथवा पापी-रूप मायावी राक्षस हमें सताते हैं, उन्हें हम अपनी शुभ मनोवृत्तियों से और बलवान् योद्धाओं से तथा परमात्मा और राजा की सहायता से पराजित करके आन्तरिक और बाह्य सुराज्य का उपभोग करें ॥१०॥ इस दशति में अग्नि, पवमान और अदिति नामों से परमात्मा का स्मरण होने से, परमात्मा से धन-कीर्ति आदि की याचना होने से तथा उससे शत्रु-विनाश, राक्षसदाह आदि की प्रार्थना होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में ग्यारहवाँ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
प्र꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठाय गायत ऋ꣣ता꣡व्ने꣢ बृह꣣ते꣢ शु꣣क्र꣡शो꣢चिषे । उ꣣पस्तुता꣡सो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥१०७॥
पदार्थःहे (उपस्तुतासः) प्रशंसा-प्राप्त मनुष्यो ! तुम (मंहिष्ठाय) सबसे बढ़कर दानी, (ऋताव्ने) सत्य नियमोंवाले, (बृहते) महान्, (शुक्रशोचिषे) उज्ज्वल और पवित्र तेजवाले (अग्नये) परमेश्वर के लिए (प्र गायत) भली-भाँति स्तुति-गीत गाओ ॥१॥
भावार्थःप्रशंसित जनों को चाहिए कि वे परमेश्वर की उपासना कर, उसके समान दान, सत्य, तेजस्विता, पवित्रता आदि गुणों को धारण कर यशस्वी हों ॥१॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
प्र꣡ सो अ꣢꣯ग्ने꣣ त꣢वो꣣ति꣡भिः꣢ सु꣣वी꣡रा꣢भिस्तरति꣣ वा꣡ज꣢कर्मभिः । य꣢स्य꣣ त्व꣢ꣳ स꣣ख्य꣡मावि꣢꣯थ ॥१०८॥
पदार्थःहे (अग्ने) प्रकाशमय, प्रकाशदाता परमात्मन् ! (सः) वह मनुष्य (सुवीराभिः) उत्कृष्ट वीर भावों वा वीर पुत्रों को प्राप्त करानेवाली, (वाजकर्मभिः) बल एवं उत्साह को उत्पन्न करनेवाली (तव) आपकी (ऊतिभिः) रक्षाओं के द्वारा (प्र तरति) भली-भाँति विघ्नों को या भवसागर को पार कर जाता है, (यस्य) जिस मनुष्य की (त्वम्) आप (सख्यम्) मैत्री को (आविथ) प्राप्त हो जाते हो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा जिसका सखा हो जाता है उस पुरुषार्थी को काम, क्रोध आदि वा ठग, लुटेरा, चोर आदि कोई भी शत्रु पीड़ित नहीं कर सकता ॥२॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
तं꣡ गू꣢र्धया꣣꣬ स्व꣢꣯र्णरं दे꣣वा꣡सो꣢ दे꣣व꣡म꣢र꣣तिं꣡ द꣢धन्विरे । दे꣣वत्रा꣢ ह꣣व्य꣡मू꣢हिषे ॥१०९॥
पदार्थःहे मनुष्य ! तू (तम्) उस प्रसिद्ध, (स्वर्णरम्) मोक्ष के आनन्द को प्राप्त करानेवाले परमात्मा-रूप अग्नि की (गूर्धय) आराधना कर, जिस (देवम्) तेज से देदीप्यमान तथा तेज से प्रदीप्त करनेवाले, (अरतिम्) सर्वान्तर्यामी, पुरुषार्थ में प्रेरित करनेवाले, पाप आदि के संहारक परमात्मा-रूप अग्नि को (देवासः) विद्वान् लोग (दधन्विरे) अपने अन्तःकरण में धारण करते हैं। अब परमात्माग्नि को सम्बोधन करते हैं—हे परमात्माग्ने ! आप (देवत्रा) विद्वानों में (हव्यम्) दातव्य बल को (ऊहिषे) प्राप्त कराते हो ॥३॥
भावार्थःमनीषी लोग जिस देवाधिदेव, जगत् की रचना करनेहारे जगदीश्वर की आराधना करके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि के सुख को प्राप्त करते हैं, उसकी सभी जन उपासना क्यों न करें? ॥३॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
मा꣡ नो꣢ हृणीथा꣣ अ꣡ति꣢थिं꣣ व꣡सु꣢र꣣ग्निः꣡ पु꣢रुप्रश꣣स्त꣢ ए꣣षः꣢ । यः꣢ सु꣣हो꣡ता꣢ स्वध्व꣣रः꣢ ॥११०॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे भाई ! तू (नः) हम सबके (अतिथिम्) अतिथिरूप, अतिथि के समान पूज्य अग्नि नामक परमात्मा को (मा हृणीथाः) उपेक्षा या वेदविरुद्ध आचरण से क्रुद्ध मत कर। (एषः) यह (वसुः) निवासक (अग्निः) तेजस्वी, अग्रनायक परमात्मा (पुरुप्रशस्तः) बहुतों से स्तुति किया गया है, (यः) जो (सुहोता) उत्तम दाता, और (स्वध्वरः) शुभ रूप से हमारे जीवन-यज्ञ का संचालक है ॥ द्वितीय—अतिथि के पक्ष में। हे गृहिणी ! तू (नः) हमारे (अतिथिम्) अतिथिरूप, आचार्य, उपदेशक, संन्यासी आदि को (मा हृणीथाः) यथायोग्य सत्कार न करके रुष्ट मत कर। (एषः) यह (अग्निः) धर्म, विद्या आदि के प्रकाश से प्रकाशित अतिथि (वसुः) गृहस्थों का निवास-दाता, और (पुरुप्रशस्तः) अतिथि-सत्कार को यज्ञ घोषित करनेवाले बहुत से वेदादि शास्त्रों से प्रशंसित है, (यः) जो विद्वान् अतिथि (सुहोता) सदुपदेष्टा, और (स्वध्वरः) श्रेष्ठ विद्याप्रचार रूप यज्ञवाला है ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजैसे उत्तम प्रकार पूजा किया गया परमेश्वर पूजा करनेवाले को सद्गुण आदि की सम्पत्ति देकर उसका कल्याण करता है, वैसे ही भली-भाँति सत्कार किया गया अतिथि आशीर्वाद, सदुपदेश आदि देकर गृहस्थ का उपकार करता है। इसलिए परमेश्वर की उपासना में और अतिथि के सत्कार में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए ॥४॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
भ꣣द्रो꣡ नो꣢ अ꣣ग्नि꣡राहु꣢꣯तो भ꣣द्रा꣢ रा꣣तिः꣡ सु꣢भग भ꣣द्रो꣡ अ꣢ध्व꣣रः꣢ । भ꣣द्रा꣢ उ꣣त꣡ प्रश꣢꣯स्तयः ॥१११॥
पदार्थः(आहुतः अग्निः) जिसमें सुगन्धित, मधुर, पुष्टिवर्धक तथा आरोग्यवर्धक हवियों की आहुति दी गयी है, ऐसा यज्ञाग्नि, सत्कार किया गया अतिथि और जिसमें उपासक द्वारा आत्मसमर्पण की आहुति दी गयी है, ऐसा परमात्मा (नः) हमारे लिए (भद्रः) भद्र को देनेवाला हो। (रातिः) हमारे द्वारा दिया गया दान (भद्रा) भद्र अथवा भद्र को देनेवाला हो। हे (सुभग) सौभाग्यशाली मेरे अन्तरात्मन् ! तुझसे किया गया (अद्धवरः) यज्ञ (भद्रः) भद्र अथवा भद्रजनक हो । (उत) और (प्रशस्तयः) तुझसे अर्जित प्रशस्तियाँ वा कीर्तियाँ भी (भद्राः) भद्र अथवा भद्रजनक हों ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःसब मनुष्यों को अग्निहोत्रादिरूप, अतिथिसत्काररूप और परमात्मा की पूजारूप यज्ञ नित्य करना चाहिए, जिससे भद्र प्राप्त हो और उनकी उज्ज्वल कीर्तियाँ सर्वत्र फैलें ॥५॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
य꣡जि꣢ष्ठं त्वा ववृमहे दे꣣वं꣡ दे꣢व꣣त्रा꣡ होता꣢꣯र꣣म꣡म꣢र्त्यम् । अ꣣स्य꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ सु꣣क्र꣡तु꣢म् ॥११२॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे अग्रणी परब्रह्म परमात्मन् ! (यजिष्ठम्) अतिशयरूप से सृष्टियज्ञ के विधाता, सुख-ऐश्वर्य आदि के दाता, सूर्य-पृथिवी आदि का परस्पर संगम करानेवाले, (देवत्रा देवम्) प्रकाशक सूर्य, बिजली, चन्द्रमा आदि तथा चक्षु, श्रोत्र, मन आदि में सर्वश्रेष्ठ प्रकाशक (होतारम्) मोक्षसुख के प्रदाता, (अमर्त्यम्) अमरणशील, (अस्य यज्ञस्य) इस मेरे ध्यान-यज्ञ के (सुक्रतुम्) सुसंचालक, सफलताप्रदायक (त्वा) आपको, हम (ववृमहे) उपास्य रूप से वरण करते हैं ॥६॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे अग्रगन्ता वीरपुरुष ! (यजिष्ठम्) अतिशय परोपकार-यज्ञ करनेवाले, (देवत्रा देवम्) दिव्यगुणयुक्त मनुष्यों में विशेषरूप से दिव्य गुणोंवाले, (होतारम्) प्रजाओं को सुख देनेवाले (अमर्त्यम) अमर कीर्तिवाले, (अस्य यज्ञस्य) इस राष्ट्रयज्ञ के (सुक्रतुम्) सुकर्ता (त्वा) तुझे, हम प्रजाजन (ववृमहे) राजा के पद के लिए चुनते हैं ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। 'देवं, देव' में छेकानुप्रास है ॥६॥
भावार्थःजैसे प्रजाजनों को दिव्य गुण-कर्म-स्वभाववाले परमेश्वर का उपास्य रूप में वरण करना चाहिए, वैसे ही वीर, परोपकारी, श्लाघ्य गुणोंवाले, सुखप्रदाता, कीर्तिमान्, सुशासक, शत्रु-विजेता पुरुष को राजा के पद पर प्रतिष्ठित करने के लिए चुनना चाहिए ॥६॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
त꣡द꣢ग्ने द्यु꣣म्न꣡मा भ꣢꣯र꣣ य꣢त्सा꣣सा꣢हा꣣ स꣡द꣢ने꣣ कं꣡ चि꣢द꣣त्रि꣡ण꣢म् । म꣣न्युं꣡ जन꣢꣯स्य दू꣣꣬ढ्य꣢꣯म् ॥११३॥
पदार्थःहे (अग्ने) तेजस्वी परमात्मन् ! आप (तत्) वह (द्युम्नम्) तेज (आभर) हमें प्रदान कीजिए, (यत्) जो (सदने) हृदय-सदन और राष्ट्र-सदन में (कंचित्) जिस किसी भी (अत्रिणम्) भक्षक पाप-रूप अथवा पापी-रूप राक्षस को और (जनस्य) मनुष्य के (दूढ्यम्) दुर्बुद्धिकारी (मन्युम्) क्रोध को (सासाह) नष्ट कर दे ॥७॥
भावार्थःमनुष्य के हृदय-सदन को बहुत से पाप-रूप राक्षस और राष्ट्र-सदन को भ्रष्टाचार में संलग्न पापी-रूप राक्षस आक्रान्त करके बिगाड़ना चाहते हैं। क्रोध भी मनुष्य का और राष्ट्र का महान् शत्रु है, जिससे ग्रस्त हुए प्रजाजन और राज्य के अधिकारी सहृदयता को छोड़कर नरपिशाच हो जाते हैं। परमेश्वर की प्रेरणा से मनुष्यों को ऐसा तेज धारण करना चाहिए, जिससे वे सभी पाप विचारों को, पापी लोगों को और क्रोध के नग्न ताण्डव को खण्डित करके अपने हृदय को, जन-हृदय को और राष्ट्र-हृदय को पवित्र करें ॥७॥
काण्ड -आग्नेयं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -आग्नेयं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
य꣡द्वा उ꣢꣯ वि꣣श्प꣡तिः꣢ शि꣣तः꣡ सुप्री꣢꣯तो꣣ म꣡नु꣢षो वि꣣शे꣢ । वि꣢꣫श्वेद꣣ग्निः꣢꣫ प्रति꣣ र꣡क्षा꣢ꣳसि सेधति ॥११४॥
पदार्थः(यत् वै उ) जब (विश्पतिः) प्रजापालक (अग्निः) यज्ञाग्नि, अतिथि, आचार्य, राजा वा परमात्मा (शितः) हवि देने से तीक्ष्ण, भली-भाँति उद्बोधित वा उत्साहित होकर (मनुषः) सत्कार करनेवाले मनुष्य के (विशे) यज्ञगृह, स्व-गृह, गुरुकुल-रूप गृह, राष्ट्र-गृह वा हृदय-गृह में (सुप्रीतः) भली-भाँति तृप्त हो जाता है, तब (विश्वा इत्) सभी (रक्षांसि) अविद्या, रोग, दुराचार, दुर्गुण आदि राक्षसों तथा शत्रुओं को (प्रतिसेधति) दूर कर देता है ॥८॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजैसे घृत आदि की आहुति देने से तीक्ष्ण तथा सुतृप्त हुई यज्ञाग्नि रोगरूप राक्षसों को विनष्ट करती है, अथवा जैसे घर में सत्कार से प्रसन्न किया गया विद्वान् अतिथि गृहस्थ के सब अविद्या आदि राक्षसों का विनाश करता है, अथवा जैसे शिष्यों की शुश्रूषा तथा उनके व्रतपालन से वश में किया गया आचार्य उनके सब दोषों को दूर करता है, अथवा जैसे प्रजाजनों से उत्साहित तथा कर आदि के प्रदान से सन्तुष्ट किया गया राजा उनके संकटों को हटाता है, वैसे ही समर्पणरूप हवि देकर उपासना किया गया तथा सुप्रसन्न किया गया परमात्मा उपासकों के सब विघ्नों को और काम, क्रोध आदि राक्षसों को समूल नष्ट कर देता है ॥८॥ इस दशति में परमात्मा की मित्रता का फल प्रतिपादन करते हुए उसकी स्तुति की प्रेरणा होने से, उससे तेज आदि की प्रार्थना होने से, उसके द्वारा राक्षसों के निवारण आदि का वर्णन होने से और अग्नि नाम से यज्ञाग्नि, अतिथि, आचार्य, राजा आदि के चरित का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में बारहवाँ खण्ड समाप्त ॥ यह प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ॥
ऐन्द्रं काण्डम्
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त꣡द्वो꣢ गाय सु꣣ते꣡ सचा꣢꣯ पुरुहू꣣ता꣢य꣣ स꣡त्व꣢ने । शं꣢꣫ यद्गवे꣣ न꣢ शा꣣कि꣡ने꣢ ॥११५॥
पदार्थःहे उपासको ! (वः) तुम (सुते) श्रद्धा-रूप सोमरस के अभिषुत होने पर (सचा) साथ मिलकर (पुरुहूताय) बहुत या बहुतों से स्तुति किये गये (सत्वने) बलशाली इन्द्र परमात्मा के लिए (तत्) वह स्तोत्र (गाय) गान करो, (यत्) जो (शाकिने) शाक अर्थात् घास-चारे से युक्त (गवे न) बैल के समान (शाकिने) शक्तिशाली (गवे) स्तोता के लिए (शम्) सुख-शान्ति को देनेवाला हो। आशय यह है कि जैसे बैल के लिए घास-चारा सुखकर होता है, वैसे वह स्तोत्र स्तोता के लिए सुखकर हो ॥१॥ इस मन्त्र में ‘गवे न शाकिने’ में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःस्तुति करने से परमात्मा को कुछ उपलब्धि नहीं होती, प्रत्युत स्तुतिकर्ता को ही आत्मा में सुख, शान्ति और बल प्राप्त होता है ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡स्ते꣢ नू꣣न꣡ꣳ श꣢तक्रत꣣वि꣡न्द्र꣢ द्यु꣣म्नि꣡त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ । ते꣡न꣢ नू꣣नं꣡ मदे꣢꣯ मदेः ॥११६॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) बहुत प्रज्ञाओं, कर्मों, यज्ञों और संकल्पोंवाले (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (यः) जो (ते) आपका (नूनम्) निश्चय ही (द्युम्नितमः) सबसे अधिक यशोमय (मदः) आनन्द है, (तेन) उससे (नूनम्) आज हमें भी (मदे) आनन्द में (मदेः) मग्न कर दीजिए ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा का आनन्द-रस जिन्होंने चख लिया है, वे उस रस की कीर्ति को गाते नहीं थकते। 'वह रस-रूप है' यह तत्त्ववेत्ताओं का अनुभव है। सबको चाहिए कि उसके रस को प्राप्त कर अपने आपको धन्य करें ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
गा꣢व꣣ उ꣡प꣢ वदाव꣣टे꣢ म꣣हि꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ र꣣प्सु꣡दा꣢ । उ꣣भा꣡ कर्णा꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡या꣢ ॥११७॥
पदार्थःहे (गावः) स्तोताओ ! तुम (अवटे) रसों के कूप-तुल्य परमेश्वर के विषय में (उप वद) महिमा-गान करो। (मही) महान् धरती-आकाश (यज्ञस्य) उस पूजनीय परमेश्वर के (रप्सुदा) स्वरूप को प्रकाशित करनेवाले हैं। (उभा) दोनों (हिरण्यया) सुनहरे सूर्य और चन्द्रमा, जिन धरती-आकाश के (कर्णा) कर्ण-कुण्डलों के समान हैं ॥३॥ इस मन्त्र में 'सुनहरे सूर्य-चन्द्र मानो कर्ण-कुण्डल हैं' इस कथन में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षालङ्कार है। कर्ण-कुण्डलों के अर्थ में 'कर्णौ' के प्रयोग में लक्षणा है। इन्द्र में अवट (कूप) का आरोप होने से रूपक है ॥३॥
भावार्थःजो परमेश्वर दया, वीरता, आनन्द आदि रसों के कूप के समान है, उसकी सब मनुष्यों को अपनी वाणियों से महिमा अवश्य गान करनी चाहिए। यद्यपि वह निराकार तथा गोरे, काले, हरे, पीले आदि रूपों से रहित है, तो भी उसके भक्तजन धरती-आकाश के अनेकविध चित्र-विचित्र पदार्थों में उसी के रूप को देखते हैं और उसी की चमक से यह सब-कुछ चमक रहा है, यह बुद्धि करते हैं। इसीलिए धरती-आकाश को उसके स्वरुप-प्रकाशक कहा गया है ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣢र꣣म꣡श्वा꣢य गायत꣣ श्रु꣡त꣢क꣣क्षा꣢रं꣣ ग꣡वे꣢ । अ꣢र꣣मि꣡न्द्र꣢स्य꣣ धा꣡म्ने꣢ ॥११८॥
पदार्थःहे (श्रुतकक्ष) वेद को अपनी बगल में या मनरूप कोठे में रखनेवाले वेदानुगामी मनुष्य ! तू और तेरे सखा मिलकर (अरम्) पर्याप्तरूप से (अश्वाय) घोड़े, वायु, विद्युत्, अग्नि, बादल, प्राण आदि के लिए (गायत) वाणी को प्रेरित करो अर्थात् इनके गुण-कर्मों का वर्णन करो। (अरम्) पर्याप्त रूप से (गवे) गाय, बैल, द्युलोक, सूर्य, भूमि, चन्द्रमा, जीवात्मा, वाणी, इन्द्रियों आदि के लिए (गायत) वाणी को प्रेरित करो अर्थात् इनके गुण-कर्मों का वर्णन करो। (अरम्) पर्याप्त रूप से (इन्द्रस्य) परमेश्वर के (धाम्ने) तेज के लिए(गायत) वाणी को प्रेरित करो अर्थात् उसके महत्त्व का वर्णन करो ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर की सृष्टि में उसके रचे हुए जो विविध पदार्थ हैं उनका और परमेश्वर के तेज का ज्ञान तथा महत्त्व का वर्णन सबको करना चाहिए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त꣡मिन्द्रं꣢꣯ वाजयामसि म꣣हे꣢ वृ꣣त्रा꣢य꣣ ह꣡न्त꣢वे । स꣡ वृषा꣢꣯ वृष꣣भो꣡ भु꣢वत् ॥११९॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (महे) विशाल, (वृत्राय) सूर्यप्रकाश और जल-वृष्टि को रोकनेवाले मेघ के समान धर्म के बाधक पाप को (हन्तवे) नष्ट करने के लिए (तम्) उस प्रसिद्ध (इन्द्रम्) महापराक्रमी परमात्मा की हम (वाजयामसि) पूजा करते हैं। (वृषा) वर्षक (सः) वह परमेश्वर (वृषभः) धर्म की वर्षा करनेवाला (भुवत्) होवे ॥५॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (महे वृत्राय) महान् शत्रु को (हन्तवे) मारने के लिए, हम (तम्) प्रजा से निर्वाचित उस (इन्द्रम्) अत्यन्त वीर राजा को (वाजयामसि) सहायता-प्रदान द्वारा बलवान् बनाते हैं, अथवा उत्साहित करते हैं। (वृषा) मेघतुल्य (सः) वह राजा (वृषभः) शत्रुओं के ऊपर आग्नेयास्त्रों की और प्रजा के ऊपर सुखों की वर्षा करनेवाला (भुवत्) होवे ॥५॥ इस मन्त्र में 'वृषा, वृष' में छेकानुप्रास अलङ्कार है। 'वृषा वृषभः' दोनों शब्द बैल के वाचक होने से पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार भी है, यौगिक अर्थ करने से प्रतीयमान पुनरुक्ति का समाधान हो जाता है ॥५॥
भावार्थःअनावृष्टि के दिनों में बादल जैसे सूर्य के प्रकाश को और जल को नीचे आने से रोककर भूमि पर अन्धकार और अवर्षण उत्पन्न कर देता है, वैसे ही पापविचार और पापकर्म भूमण्डल में प्रसार प्राप्त कर सत्य के प्रकाश को और धर्मरूप स्वच्छ जल को रोककर असत्य का अन्धकार और अधर्मरूप अवर्षण उत्पन्न कर देते हैं। इन्द्र नामक परमेश्वर जैसे मेघरूप वृत्र को मारकर सूर्य के प्रकाश को तथा वर्षाजल को निर्बाधगति से भूमि के प्रति प्रवाहित करता है, वैसे ही पापरूप वृत्र का विनाश कर संसार में सत्य के प्रकाश को और धर्म की वर्षा को मुक्तहस्त से प्रवाहित करे, जिससे सब भूमण्डल-निवासी लोग सत्य-ज्ञान और सत्य-आचरण में तत्पर तथा धार्मिक होकर अत्यन्त सुखी हों। इसी प्रकार राष्ट्र में राजा का भी कर्त्तव्य है कि दुष्ट शत्रुओं को विनष्ट कर सुख उत्पन्न करे ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ ब꣢ला꣣द꣢धि꣣ स꣡ह꣢सो जा꣣त꣡ ओज꣢꣯सः । त्वꣳ सन्वृ꣢꣯ष꣣न्वृ꣡षेद꣢꣯सि ॥१२०॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमवीर परमैश्वर्यवन् परमात्मन् और राजन् ! (त्वम्) आप (बलात्) अत्याचारियों के वध और सज्जन लोगों के धारण आदि के हेतु बल के कारण, (सहसः) मनोबलरूप साहस के कारण, और (ओजसः) आत्मबल के कारण (अधिजातः) प्रख्यात हो। (सन्) श्रेष्ठ (त्वम्) आप, हे (वृषन्) सुखों के वर्षक ! (वृषा इत्) वृष्टिकर्ता मेघ ही (असि) हो ॥६॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है। इन्द्र में वर्षक मेघ का आरोप होने से रूपक है। 'वृष-वृषे' में छेकानुप्रास है ॥६॥
भावार्थःपरमेश्वर और राजा के राक्षसवधादिरूप और पृथिवी, सूर्य आदि लोकों के तथा राष्ट्र के धारणरूप बहुत से बल के कार्य प्रसिद्ध हैं। उनका मनोबल और आत्मबल भी अनुपम है। उनका वृषा (बादल) नाम सार्थक है, क्योंकि वे बादल के समान सबके ऊपर सुख की वर्षा करते हैं। ऐसे अत्यन्त महिमाशाली परमेश्वर और राजा का हमें दिन-रात अभिनन्दन करना चाहिए ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣣ज्ञ꣡ इन्द्र꣢꣯मवर्धय꣣द्य꣢꣫द्भूमिं꣣ व्य꣡व꣢र्तयत् । च꣣क्राण꣡ ओ꣢प꣣शं꣢ दि꣣वि꣢ ॥१२१॥
पदार्थः(यज्ञः) परोपकार के लिए किये जानेवाले महान् कर्म ने (इन्द्रम्) परमात्मा को अर्थात् उसकी महिमा को (अवर्धयत्) बढ़ाया हुआ है। परमात्मा के यज्ञ कर्म का एक दृष्टान्त यह है (यत्) कि (दिवि) द्युलोक में (ओपशम्) सूर्यरूप मुकुट को (चक्राणः) रचनेवाला वह परमात्मा (भूमिम्) भूमि को (व्यवर्तयत्) सूर्य के चारों ओर घुमा रहा है ॥७॥
भावार्थःपरमेश्वर यज्ञ का आदर्शरूप है। उसके किये जाते हुए यज्ञ का ही उदाहरण है कि वह द्युलोक में महान् मुकुटमणि सूर्य को संस्थापित करके उसके चारों ओर भूमि को अण्डाकार मार्ग से चक्ररूप में घुमा रहा है, जिससे छहों ऋतुओं का चक्र चलता है ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡दि꣢न्द्रा꣣हं꣢꣫ यथा꣣ त्व꣡मीशी꣢꣯य꣣ व꣢स्व꣣ ए꣢क꣣ इ꣢त् । स्तो꣣ता꣢ मे꣣ गो꣡स꣢खा स्यात् ॥१२२॥
पदार्थः(यत्) यदि (इन्द्र) हे परमेश्वर ! (अहम्) आपका उपासक मैं (यथा त्वम्) जैसे आप हैं, वैसे (वस्वः) विद्याधन या भौतिकधन का (एकः इत्) एकमात्र (ईशीय) स्वामी हो जाऊँ, तो (मे) मेरा (स्तोता) प्रशंसक, शिष्य या सेवक (गोसखा) वेदवाणियों का पण्डित अथवा गाय आदि धन का धनी (स्यात्) हो जाए ॥८॥
भावार्थःपरमेश्वर सम्पूर्ण विद्याधन का और भौतिकधन का एकमात्र परम अधीश्वर है और उससे अपने विद्याधन को वेदरूप में तथा भौतिकधन को सोने, चाँदी, सूर्य, वायु, जल, फल, मूल आदि के रूप में हमें दिया है। वैसे ही मैं भी यदि परमेश्वर की कृपा से विद्यादि धन का और भौतिक धन का अधिपति हो जाऊँ तो मैं भी अपने प्रशंसक शिष्यों को विद्यादान देकर वेदादि श्रेष्ठ शास्त्रों में पण्डित और सेवकों को धन देकर गाय आदि ऐश्वर्यों से भरपूर, अत्यन्त धनी कर दूँ ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
प꣡न्यं꣢पन्य꣣मि꣡त्सो꣢तार꣣ आ꣡ धा꣢वत꣣ म꣡द्या꣢य । सो꣡मं꣢ वी꣣रा꣢य꣣ शू꣡रा꣢य ॥१२३॥
पदार्थःहे (सोतारः) भक्तिरूप सोम-रस को अभिषुत करनेवाले उपासको ! तुम (मद्याय) तृप्ति प्रदान किये जाने योग्य, (वीराय) विशेष रूप से सद्गुणों के प्रेरक, (शूराय) शूर परमात्मा के लिए (पन्यं पन्यम् इत्) प्रशंसनीय-प्रशंसनीय ही (सोमम्) श्रद्धा-रस को (आ धावत) समर्पित करो ॥९॥ इस मन्त्र में ‘पन्यं, पन्यम्' तथा 'राय, राय' में छेकानुप्रास और 'वीराय, शूराय' में पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार है। य की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥९॥
भावार्थःपरमेश्वर प्रशंसनीय, हृदय को मोह लेनेवाले श्रद्धा-रस को प्राप्त कर स्तोता के हृदय में सद्गुणों को प्रेरित करता है और अपनी शूरता से उसके दुर्गुणों का संहार करता है ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣दं꣡ व꣢सो सु꣣त꣢꣫मन्धः꣣ पि꣢बा꣣ सु꣡पू꣢र्णमु꣣द꣡र꣢म् । अ꣡ना꣢भयिन्ररि꣣मा꣡ ते꣢ ॥१२४॥
पदार्थःहे (वसो) सद्गुणों के निवासक अतिथि अथवा परमात्मन् ! आप (इदम्) इस हमारे द्वारा समर्पित किये जाते हुए (सुतम्) तैयार (अन्धः) अन्न या भक्तिरस को (सुपूर्णम् उदरम्) खूब पेट भरकर (पिब) पीजिए। हे (अनाभयिन्) निर्भीक ! हम (ते) आपको (ररिम) अर्पित कर रहे हैं ॥१०॥
भावार्थःजैसे कोई विद्वान् अतिथि हमसे दिये जाते हुए अन्न, रस, घी, दूध आदि को पेट भरकर पीता है, वैसे ही हे परमात्मन् ! आप हमारे द्वारा श्रद्धापूर्वक निवेदित किये जाते हुए भक्तिरस को छककर पीजिए। यहाँ निराकार एवं मुख-पेट आदि से रहित भी परमेश्वर के विषय में 'पेट भरकर पीजिए' यह कथन आलङ्कारिक है ॥१०॥ इस दशति में परमात्मा के स्तुतिगान के लिए प्रेरणा, उससे सुख की प्रार्थना और उसकी महिमा का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥१०॥ द्वितीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣢꣫द्घेद꣣भि꣢ श्रु꣣ता꣡म꣢घं वृष꣣भं꣡ नर्या꣢꣯पसम् । अ꣡स्ता꣢रमेषि सूर्य ॥१२५॥
पदार्थःहे (सूर्य) सूर्य के तुल्य प्रकाशमान और प्रकाशकर्ता, चराचर के अन्तर्यामी, सद्बुद्धि के प्रेरक, तमोगुण को प्रकंपित करनेवाले परमात्मन् ! (त्वम्) आप (घ) निश्चय ही (श्रुतामघम्) वेदादि शास्त्रों का ज्ञान ही जिसका धन है, ऐसे (वृषभम्) विद्या, धन आदि की वर्षा करनेवाले (नर्यापसम्) जनहित के कर्मों में संलग्न, (अस्तारम्) सब विघ्न-बाधाओं को प्रक्षिप्त कर देनेवाले मनुष्य को ही (अभि) लक्ष्य करके (उद् एषि) उदित होते हो, अर्थात् उसके हृदय में प्रकट होते हो ॥१॥
भावार्थःभौतिक सूर्य तो विद्वान्-अविद्वान्, दाता-कृपण, परोपकारी-स्वार्थी, जीते-हारे सबके प्रति उदित होता है। परन्तु परमात्मा-रूप सूर्य उन्हीं के हृदय में प्रकाशित होता है जो वेदादि श्रेष्ठ शास्त्रों के श्रवण को ही धन मानते हैं, जो अपने उपार्जित विद्यादि वैभव को और भौतिक धन को बादल के समान सब जगह बरसाते हैं, जिनके कर्म जन-कल्याणकारी होते हैं और जो बड़े से बड़े शत्रु को और बड़ी से बड़ी बाधा को अपने बल से परास्त कर देने का साहस रखते हैं ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣢द꣣द्य꣡ कच्च꣢꣯ वृत्रहन्नु꣣द꣡गा꣢ अ꣣भि꣡ सू꣢र्य । स꣢र्वं꣣ त꣡दि꣢न्द्र ते꣣ व꣡शे꣢ ॥१२६॥
पदार्थःहे (वृत्रहन्) अविद्या, पाप दुराचार आदि, जो धर्म की गति को रोकनेवाले हैं, उनके विनाशक, (सूर्य) प्रकाशमय, प्रकाशदाता (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! (अद्य) आज, आप (यत् कत् च) जिस किसी भी मनुष्य को अथवा जिस किसी भी मेरे मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि को (अभि) लक्ष्य करके (उदगाः) उदित होते हो, (सर्वं तत्) वे सभी मनुष्य अथवा वे सभी मन, बुद्धि आदि (ते) आपके (वशे) वश में हो जाते हैं ॥२॥
भावार्थःजैसे भौतिक सूर्य जिन किन्हीं भी पदार्थों के प्रति उदित होता है, वे सभी पदार्थ उसके प्रकाश से परिप्लुत हो जाते हैं, वैसे ही परमात्मारूप सूर्य जिसके अन्तःकरण में उदय को प्राप्त होता है, वह उसके दिव्य प्रकाश से परिपूर्ण होकर उसके वश में हो जाता है ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡ आन꣢꣯यत्परा꣣व꣢तः꣢ सु꣡नी꣢ती तु꣣र्व꣢शं꣣ य꣡दु꣢म् । इ꣢न्द्रः꣣ स꣢ नो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१२७॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (यः) जो (परावतः) दूर से भी (यदुम्) यत्नशील मनुष्य को (सुनीती) उत्तम नीति की शिक्षा देकर (तुर्वशम्) अपने समीप (आनयत्) ले आता है, (सः) वह (युवा) सदा युवा की तरह सशक्त रहनेवाला (इन्द्रः) परमेश्वर (नः) हमारा (सखा) सहायक मित्र होवे ॥ द्वितीय—विद्युत् के पक्ष में। (यः) जो विमानादियानों में प्रयोग किया गया विद्युत् (यदुम्) पुरुषार्थी मनुष्य को (परावतः) अत्यन्त दूर देश से भी (तुर्वशम्) मनोवाञ्छित वेग से (सुनीती) उत्तम यात्रा के साथ, अर्थात् कुछ भी यात्रा-कष्ट न होने देकर (आनयत्) देशान्तर में पहुँचा देता है, (सः) वह प्रसिद्ध (युवा) यन्त्रों में प्रयुक्त होकर पदार्थों के संयोजन या वियोजन की क्रिया द्वारा विभिन्न पदार्थों के रचने में साधनभूत (इन्द्रः) विद्युत् (नः) हमारा (सखा) सखा के समान कार्यसाधक होवे ॥ तृतीय—राजा के पक्ष में। (यः) जो राजा (परावतः) अधममार्ग से हटाकर (यदुम्) प्रयत्नशील, उद्योगी, (तुर्वशम्) हिंसकों को वश में करनेवाले मनुष्य को (सुनीती) उत्तम धर्ममार्ग पर (आनयत्) ले आता है, (सः) वह (युवा) शरीर, मन और आत्मा से युवक (इन्द्रः) अधर्मादि का विदारक राजा (नः) हम प्रजाओं का (सखा) मित्र होवे ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे विमानादि यानों में प्रयुक्त विद्युद्रूप अग्नि सुदूर प्रदेश से भी विमानचालकों की इच्छानुकूल गति से लोगों को देशान्तर में पहुँचा देता है, अथवा जैसे कोई सुयोग्य राजा अधर्ममार्ग पर दूर तक गये हुए लोगों को उससे हटाकर धर्ममार्ग में प्रवृत्त करता है, वैसे ही परमेश्वर उन्नति के लिए प्रयत्न करते हुए भी कभी कुसङ्ग में पड़कर सन्मार्ग से दूर गये हुए मनुष्य को कृपा कर अपने समीप लाकर धार्मिक बना देता है ॥३॥ इस मन्त्र की व्याख्या में विवरणकार ने लिखा है कि तुर्वश और यदु नाम के कोई राजपुत्र थे। इसी प्रकार भरतस्वामी और सायण का कथन है कि तुर्वश और यदु नामक दो राजा थे, जिन्हें शत्रुओं ने दूर ले जाकर छोड़ दिया था। उन्हें इन्द्र उत्तम नीति से दूर देश से ले आया था, यह उन सबका अभिप्राय है। यह सब प्रलापमात्र है, क्योंकि वेद सृष्टि के आदि में परब्रह्म परमेश्वर से प्रादुर्भूत हुए थे, अतः उनमें परवर्ती किन्हीं राजा आदि का इतिहास नहीं हो सकता। साथ ही वैदिककोष निघण्टु में ‘तुर्वश’ मनुष्यवाची तथा समीपवाची शब्दों में पठित है, और ‘यदु’ भी मनुष्यवाची शब्दों में पठित है, इस कारण भी इन्हें ऐतिहासिक राजा मानना उचित नहीं है ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
मा꣡ न꣢ इन्द्रा꣣भ्या꣢३꣱दि꣢शः꣣ सू꣡रो꣢ अ꣣क्तु꣡ष्वा य꣢꣯मत् । त्वा꣢ यु꣣जा꣡ व꣢नेम꣣ त꣢त् ॥१२८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमवीर परमात्मन् अथवा राजन् ! (आदिशः) किसी भी दिशा से (सूरः) अवसर देखकर चुपके से आजानेवाला काम-क्रोधादि राक्षसगण या चोर आदि का समूह (अक्तुषु) अज्ञान-रात्रियों में अथवा अँधेरी रातों में (नः) हमें (मा) मत (अभि आ यमत्) आक्रान्त करे। यदि आक्रान्त करे तो (त्वा) आप (युजा) सहायक के द्वारा हम (तत्) उस कामादि राक्षसगण को अथवा चोरों के गिरोह को (वनेम) विनष्ट कर दें, समूल उन्मूलन करने में समर्थ हों ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःइस संसार में अज्ञानान्धकार में अथवा अँधियारी रात में पड़े हुए हम लोगों की न्यूनता देखकर जो कोई काम-क्रोधादि या चोर-लुटेरा आदि हम पर आक्रमण कर हमे विनष्ट करना चाहे, उसे परमात्मा और राजा की सहायता से हम धूल में मिला दें ॥४॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ए꣡न्द्र꣢ सान꣣सि꣢ꣳ र꣣यि꣢ꣳ स꣣जि꣡त्वा꣢नꣳ सदा꣣स꣡ह꣢म् । व꣡र्षि꣢ष्ठमू꣣त꣡ये꣢ भर ॥१२९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली, परम ऐश्वर्य के दाता परमात्मन् और राजन् ! आप (सानसिम्) संभजनीय, (सजित्वानम्) सहोत्पन्न शत्रुओं को जीतनेवाले, (सदासहम्) सदा दुष्ट शत्रुओं का अभिभव करानेवाले और दुःखों को सहन करानेवाले, (वर्षिष्ठम्) अतिशय बढ़े हुए और बढ़ानेवाले (रयिम्) अहिंसा, सत्य, शम, दम आदि दैवी सम्पदा को तथा विद्या, धन, बल, चक्रवर्ती राज्य आदि भौतिक ऐश्वर्य को (ऊतये)) हमारी रक्षा, प्रगति, प्रीति और तृप्ति के लिए (आ भर) प्रदान कीजिए ॥५॥
भावार्थःसब मनुष्यों को परमधनी परमात्मा और राजा से याचना करके और अपने पुरुषार्थ द्वारा अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान, शम, दम, तेज तप, क्षमा, धृति आदि दैवी सम्पदा और विद्या, धन, बल, दीर्घायुष्य, पशु, पुत्र, पौत्र, कलत्र, चक्रवर्ती राज्य आदि भौतिक सम्पदा का उपार्जन करना चाहिए ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रं꣢ व꣣यं꣡ म꣢हाध꣣न꣢꣫ इन्द्र꣣म꣡र्भे꣢ हवामहे । यु꣡जं꣢ वृ꣣त्रे꣡षु꣢ व꣣ज्रि꣡ण꣢म् ॥१३०॥
पदार्थः(वयम्) परमेश्वर के उपासक और राजभक्त हम लोग (वृत्रेषु) धर्म के आच्छादक दुष्टजनों व दुर्गुणों पर (वज्रिणम्) वज्रदण्ड उठानेवाले, (युजम्) सहयोगी सखा (इन्द्रम्) वीर परमेश्वर और राजा को (महाधने) योग-सिद्धिरूप बड़े धन जिससे प्राप्त होते हैं, उस आन्तरिक महासंघर्ष में और सोना, चाँदी आदि महार्घ धन जिससे प्राप्त होते हैं, उस बाह्य विकराल संग्राम में (हवामहे) पुकारें, (इन्द्रम्) उसी परमेश्वर और राजा को (अर्भे) छोटे आध्यात्मिक और वाह्य संघर्ष में भी पुकारें। विद्युत्-पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए। (इन्द्रम्) विद्युत् का हम बड़े-बड़े संग्रामों और छोटे संग्रामो में भी (हवामहे) उपयोग करें। कैसी विद्युत् का? (युजम्) विमानादियानों में और शस्त्रास्त्रों में जिसे प्रयुक्त किया जाता है, और जो (वृत्रेषु) शत्रुओं पर (वज्रिणम्) बिजली के गोले आदि रूप वज्रों को फेंकने का साधन है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि साधारण या विकट, बाह्य और आन्तरिक देवासुर-संग्रामों में विजय के लिए अत्यन्त वीर परमेश्वर तथा राजा का आह्वान करें। साथ ही बिजली से चलनेवाले अस्त्रों का निर्माण करके शत्रुओं का समूल उच्छेद करें ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡पि꣢बत्क꣣द्रु꣡वः꣢ सु꣣त꣡मिन्द्रः꣢꣯ स꣣ह꣡स्र꣢बाह्वे । त꣡त्रा꣢ददिष्ट꣣ पौ꣡ꣳस्य꣢म् ॥१३१॥
पदार्थः(इन्द्रः) विघ्नविदारक, बलदायक परमेश्वर (सहस्रबाह्वे) काम, कोध्र आदि हजार भुजाओंवाले पापरूप दैत्य को मारने के लिए (कद्रुवः) क्रियाशील अथवा स्तुतिशील मनुष्य के (सुतम्) भक्तिरूप सोमरस को (अपिबत्) पीता है, और (तत्र) उस मनुष्य को (पौंस्यम्) बल, पौरुष (अददिष्ट) प्रदान करता है ॥७॥
भावार्थःमनुष्य बड़ा ही निर्बल है, काम-कोध्र आदि सहस्र बाहुओंवाला पापरूप दैत्य उसे अपने वश में करना चाहता है। मनुष्य क्रियाशील और पुरुषार्थी होकर भक्तवत्सल, विपत्तिभञ्जक, शक्तिदायक परमात्मा की उपासना करके उससे बल का सञ्चय कर उस सहस्रबाहु शत्रु को प्रताडित करे ॥७॥ यहाँ अपनी कल्पना से ही किसी ने कद्रु नाम की भार्या, किसी ने कद्रु नामक यजमान, किसी ने कद्रु नाम का ऋषि और किसी ने कद्रु नाम का राजा मान लिया है। परस्पर विरुद्ध उनके वचन ही एक-दूसरे की बात को काट देते हैं। असल में तो वेद में लौकिक इतिहास को खोजना खरगोश के सींग लगाने के प्रयत्न के समान निरर्थक ही है, अतः नैरुक्त पद्धति ही श्रेयस्कर है ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
व꣣य꣡मि꣢न्द्र त्वा꣣य꣢वो꣣ऽभि꣡ प्र नो꣢꣯नुमो वृषन् । वि꣣द्धी꣢ त्वा३꣱स्य꣡ नो꣢ वसो ॥१३२॥
पदार्थःहे (वृषन्) अभीष्ट सुखों, शक्तियों और धन आदि की वर्षा करनेवाले (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली, दुःखविदारक, शत्रुसंहारक परमात्मन् ! (वयम्) हम उपासक (त्वायवः) आपकी कामनावाले, हम आपके प्रेम के वश होते हुए (अभि प्र नोनुमः) आपकी भली-भाँति अतिशय पुनः-पुनः स्तुति करते हैं। हे (वसो) सर्वान्तर्यामी, निवासक देव ! आप (अस्य) इस किये जाते हुए स्तोत्र को (विद्धि) जानिए ॥८॥
भावार्थःहे इन्द्र ! परमैश्वर्यशालिन् ! हे परमैश्वर्यप्रदातः ! हे विपत्तिविदारक ! हे धर्मप्रसारक ! हे अधर्मध्वंसक ! हे मित्रों को सहारा देनेवाले ! हे शत्रुविनाशक ! हे आनन्दधारा को प्रवाहित करनेवाले ! हे सद्गुणों की वर्षा करनेवाले ! हे मनोरथों के पूर्णकर्ता ! हे हृदय में बसनेवाले ! हे निवासक ! आपके प्रेमरस में मग्न, आपकी प्राप्ति के लिए उत्सुक हम बार-बार आपकी वन्दना करते हैं, आपको प्रणाम करते हैं, आपके गुणों का कीर्तन करते हैं। नतमस्तक होकर हमसे किये जाते हुए वन्दन, प्रणाम और गुणकीर्तन को आप जानिए, स्वीकार कीजिए और हमें उद्बोधन दीजिए ॥८॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣢ घा꣣ ये꣢ अ꣣ग्नि꣢मि꣣न्ध꣡ते꣢ स्तृ꣣ण꣡न्ति꣢ ब꣣र्हि꣡रा꣢नु꣣ष꣢क् । ये꣢षा꣣मि꣢न्द्रो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१३३॥
पदार्थःये जो लोग (घ) निश्चय ही (अग्निम्) यज्ञ की अग्नि, उत्साह की अग्नि, संकल्प की अग्नि, महत्त्वाकांक्षा की अग्नि और आत्मा की अग्नि को (आ इन्धते) अभिमुख होकर प्रदीप्त करते हैं और (येषाम्) जिन लोगों का (युवा) सदा युवा अर्थात् सदा सशक्त रहनेवाला (इन्द्रः) पराक्रमशाली परमात्मा (सखा) सहायक हो जाता है, वे लोग (आनुषक्) क्रमशः (बर्हिः) कुशा आदि यज्ञ साधनों और यज्ञ को (स्तृणन्ति) फैलाते हैं अर्थात् निरन्तर यज्ञकर्मों में संलग्न रहते हैं ॥९॥
भावार्थःजिनके हृदय में अग्नि जाज्वल्यमान नहीं है, वे लोग आलसी होकर जीवन बिताते हैं। वे तो स्वार्थसाधन में भी मन्द होते हैं, फिर परार्थसाधनरूप यज्ञ-कर्म करने का तो कहना ही क्या है। परन्तु जो नित्य अग्निहोत्र की अग्नि को और उससे प्रेरणा प्राप्त कर उत्साह, संकल्प और महत्वाकांक्षा की अग्नि को तथा आत्मारूप अग्नि को प्रज्वलित करते हैं और जो सदा युवक, दूसरों की दुःख-दरिद्रता को दूर करनेवाले, शत्रुविजयी, सृष्टियज्ञकर्ता, शतक्रतु इन्द्र परमेश्वर को सखा बना लेते हैं, वे सदा ही मन में स्फूर्ति, कर्मण्यता और उदारता को धारण करते हुए निरन्तर परोपकार के कामों में लगे रहते हैं ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
भि꣣न्धि꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣢षः꣣ प꣢रि꣣ बा꣡धो꣢ ज꣣ही꣡ मृधः꣢꣯ । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१३४॥
पदार्थःहे इन्द्र ! विद्यावीर, दयावीर, बलवीर परमात्मन् राजन् व आचार्य ! आप (विश्वाः) सब (द्विषः) द्वेष-वृत्तियों को और काम, क्रोध, लोभ आदि असुरों तथा मानव राक्षसों की सेनाओं को (अप भिन्धि) विदीर्ण कर दीजिए। (बाधः) बाधक, सन्मार्ग में विघ्न डालनेवाले (मृधः) संग्राम करनेवाले पापों को (परि जहि) सर्वत्र नष्ट कर दीजिए। (तत्) वह प्रसिद्ध (स्पार्हम्) स्पृहणीय (वसु) सत्य, अहिंसा, आरोग्य, विद्या, सुवर्ण आदि आध्यात्मिक और भौतिक धन (आभर) हमें प्रदान कीजिए ॥१०॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा, राजा और आचार्य की सहायता द्वारा रास्ते से राग, द्वेष, पाप, विघ्न-बाधा आदि को हटाकर और सब प्रकार का धन प्राप्त करके विजयी हों ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र नामक परमेश्वर आदि के गुणों का वर्णन होने से उसके पास से ऐश्वर्यों की प्रार्थना होने से, उसके प्रति प्रणाम अर्पित होने से और उससे शत्रु-विनाश तथा स्पृहणीय धन की याचना होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ द्वितीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣हे꣡व꣢ शृण्व एषां꣣ क꣢शा꣣ ह꣡स्ते꣢षु꣣ य꣡द्वदा꣢꣯न् । नि꣡ यामं꣢꣯ चि꣣त्र꣡मृ꣢ञ्जते ॥१३५॥
पदार्थःप्रथम—सैनिकों के पक्ष में। (एषाम्) इन सैनिकों के (हस्तेषु) हाथों में, युद्धकाल में (यत्) जो (कशाः) चाबुकें (वदान्) बोलती हैं, वह इनका शब्द (इह इव) मानो यहीं, युद्ध से भिन्न स्थल में भी (शृण्वे) मैं सुन रहा हूँ। यह सैनिकों का गण (यामन्) संग्राम में (चित्रम्) अद्भुत (निऋञ्जते) प्रसाधन करता है ॥ वेद में सैनिकों का वेशप्रसाधन इस रूप में वर्णित हुआ है—“तुम्हारे कंधों पर ऋष्टियाँ हैं, पैरों में पादत्राण हैं, वक्षःस्थलों पर सोने के तमगे हैं, तुम रथ पर शोभायमान हो। तुम्हारी बाहुओं में अग्नि के समान चमकनेवाले विद्युदस्त्र हैं, सिरों पर सुनहरी पगड़ियाँ हैं। ऋ० ५।५४।११, तुम उत्कृष्ट हथियारों से युक्त हो, गतिमान् हो, उत्कृष्ट स्वर्णालङ्कार धारण किये हो। ऋ० ७।५६।११।'' द्वितीय—प्राणों के पक्ष में। (एषाम्) इन प्राणों के (हस्तेषु) पूरक-कुम्भक क्रियारूप हाथों में (यत्) जो (कशाः) कानों से न सुनायी देनेवाली सूक्ष्म वाणियों (वदान्) ध्वनित होती हैं, उस आवाज को (इह इव) मानो यहीं, प्राणाभ्यास से अतिरिक्त दशा में भी (शृण्वे) सुन रहा हूँ। यह प्राणगण (यामन्) अभ्यास मार्ग में (चित्रम्) अद्भुत रूप से (निऋञ्जते) प्राणायामाभ्यासी योगी को योगैश्वर्यों से अलंकृत कर देता है ॥१॥ इस मन्त्र में भूतकाल की वस्तु को वर्तमान काल में प्रत्यक्ष घटित के समान वर्णन करने के कारण भाविक अलङ्कार है। सैनिक तथा प्राण इन दो अर्थों को अभिहित करने से श्लेष भी है ॥१॥
भावार्थःजैसे राजा के सहायक सैनिक लोग राष्ट्र की रक्षा करते हैं, वैसे ही योगी के सहायक प्राण योगी के योग की रक्षा करते हैं। युद्धों में शत्रुओं के सम्मुख सैनिकों की चाबुकें आवाज करती हैं, उस दृश्य को जिन्होंने देखा होता है, उससे चमत्कृत होने के कारण युद्ध से भिन्न स्थलों में भी उन्हें ऐसा लगता है कि वे आवाजें सुनायी दे रही हैं। सैनिकों का वीरोचित वेश-विन्यास भी अद्भुत ही प्रतीत होता है। प्राण भी योगियों के सैनिक ही हैं, जो शरीर में उत्पन्न सब दोषों को बाहर निकाल देते हैं, इन्द्रियों को निर्मल करते हैं और योगैश्वर्य की प्राप्ति के प्रयास को सफल बनाते हैं ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣म꣡ उ꣢ त्वा꣣ वि꣡ च꣢क्षते꣣ स꣡खा꣢य इन्द्र सो꣣मि꣡नः꣢ । पु꣣ष्टा꣡व꣢न्तो꣣ य꣡था꣢ प꣣शु꣢म् ॥१३६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (इमे उ) ये (सोमिनः) भक्तिरसरूप सोम को परिस्रुत किये हुए (सखायः) आपके मित्र उपासक (त्वा) आपकी (विचक्षते) प्रतीक्षा कर रहे हैं, (पुष्टावन्तः) पशुओं के खाने योग्य परिपुष्ट घास आदि से युक्त पशुपालक (यथा) जिस प्रकार (पशुम्) गाय आदि पशु की प्रतीक्षा करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे पशुओं के खाने योग्य घास आदि को तैयार किये हुए पशुपालक लोग गाय आदि पशु की प्रतीक्षा करते हैं कि वह आकर भक्ष्य को खाकर उसकी अपेक्षा अधिक मूल्यवान् दूध हमें दे, वैसे ही भक्तिरूप सोमरस को तैयार किये हुए उपासक लोग परमात्मा की प्रतीक्षा करते हैं कि वह उनके हृदय- सदन में आकर भक्तिरस का पान करे और उसकी अपेक्षा हजार गुणा मूल्यवाला आनन्दरसरूप दूध हमें प्रदान करे ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स꣡म꣢स्य म꣣न्य꣢वे꣣ वि꣢शो꣣ वि꣡श्वा꣢ नमन्त कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡ये꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः ॥१३७॥
पदार्थः(अस्य) इस परमैश्वर्यवान् पराक्रमशाली इन्द्र परमेश्वर के (मन्यवे) अन्याय, पाप अदि को सहन न करनेवाले तेज के लिए अर्थात् उस तेज को पाने के लिए (विश्वाः) सब (कृष्टयः) कृषि करनेवाली, अर्थात् मनोभूमि में सद्गुणरूप बीजों को बोनेवाली (विशः) प्रजाएँ, (सं नमन्त) परमेश्वर के प्रति नत हो जाती हैं, (समुद्राय) समुद्र को प्राप्त करने लिए (सिन्धवः इव) जैसे नदियाँ नत होती हैं अर्थात् नीचे की ओर बहती हैं ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमन्यु उस मानसिक तेज को कहते हैं, जिसके कारण कोई अधर्म, दुराचार, पाप आदि को सहन नहीं कर सकता। इन्द्र नामक परमेश्वर उस मन्यु का आदर्श है। मन्यु के खजाने उस परमेश्वर के मन्यु को प्राप्त करने के लिए नम्रतापूर्वक सबको यत्न करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
दे꣣वा꣢ना꣣मि꣡दवो꣢꣯ म꣣ह꣡त्तदा वृ꣢꣯णीमहे व꣣य꣢म् । वृ꣡ष्णा꣢म꣣स्म꣡भ्य꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥१३८॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। इन्द्र परमेश्वर है, उसके दिव्य सामर्थ्य देव हैं। (देवानाम्) इन्द्र परमेश्वर के दिव्य सामर्थ्यों का (इत्) ही (अवः) संरक्षण (महत्) महान् है। (वृष्णाम्) सुखों की वर्षा करनेवाले उन दिव्य सामर्थ्यों के (तत्) उस संरक्षण को (वयम्) हम उपासक लोग (ऊतये) प्रगति के प्राप्त्यर्थ (अस्मभ्यम्) अपने लिए (आवृणीमहे) प्राप्त करते हैं ॥ द्वितीय—विद्वानों के पक्ष में। इन्द्र आचार्य है, उसके विद्वान् शिष्य देव हैं। (देवानाम्) विद्वानों का (इत्) ही (अवः) शास्त्रज्ञान (महत्) विशाल होता है। (वृष्णाम्) विद्या की वर्षा करनेवाले उन विद्वानों के (तत्) उस शास्त्रज्ञान को (वयम्) हम अल्पश्रुत लोग (ऊतये) प्रगति के प्राप्त्यर्थ (अस्मभ्यम्) अपने लिए (आवृणीमहे) भजते हैं ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःइन्द्र नाम से वेदों में जिसकी कीर्ति गायी गयी है, उस परमेश्वर के दिव्य सामर्थ्य बहुमूल्य हैं, जिनका संरक्षण पाकर क्षुद्र शक्तिवाला मनुष्य भी सब विघ्नों और संकटों को पार करके विविध कष्टों से आकुल भी इस संसार में सुरक्षित हो जाता है। अतः परमेश्वर के दिव्य सामर्थ्यों का संरक्षण सबको प्राप्त करना चाहिए। साथ ही विद्वान् लोग भी देव कहलाते हैं। उनका उपदेश सुनकर ज्ञानार्जन भी करना चाहिए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
सो꣣मा꣢ना꣣ꣳ स्व꣡र꣢णं कृणु꣣हि꣡ ब्र꣢ह्मणस्पते । क꣣क्षी꣡व꣢न्तं꣣ य꣡ औ꣢शि꣣जः꣢ ॥१३९॥
पदार्थःहे (ब्रह्मणःपते) वेद, ब्रह्माण्ड और सकल ऐश्वर्य के स्वामिन् इन्द्र जगदीश्वर ! (यः) जो मैं (औशिजः) मेधावी आचार्य का विद्यापुत्र हूँ, उस (कक्षीवन्तम्) मुझ क्रियावान् को (सोमानाम्) ज्ञानों का (स्वरणम्) प्रकाश करनेवाला तथा उपदेश करनेवाला (कृणुहि) बना दीजिए ॥५॥ इस मन्त्र की यास्काचार्य ने निरु० ६।१० में व्याख्या की है ॥
भावार्थःगुरुकुल में विद्या पढ़कर आचार्य का विद्यापुत्र होकर मैं विद्या के अनुरूप कर्म कर रहा हूँ, ऐसे मुझको हे परमेश्वर ! आप विद्या का प्रकाशक और उपदेशक बना दीजिए, जिससे मैं भी सत्पात्रों को विद्यादान करूँ ॥५॥ विवरणकार माधव, भरतस्वामी और सायणाचार्य ने यहाँ “औशिजः” से उशिक् नामक माता का पुत्र कक्षीवान् ऋषि कल्पित किया है और दीर्घतमा को उसका पिता बताया है। लुप्तोपमा मानकर यह व्याख्यान किया है कि उशिक् माता के पुत्र कक्षीवान् ऋषि के समान मुझे कीर्तिमान् कर दीजिए। विचार करने पर यह यथार्थ प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वेदों के सृष्टि के आदि में परमेश्वर द्वारा प्रोक्त होने से उनमें परवर्ती इतिहास नहीं हो सकता ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
बो꣡ध꣢न्मना꣣ इ꣡द꣢स्तु नो वृत्र꣣हा꣡ भूर्या꣢꣯सुतिः । शृ꣣णो꣡तु꣢ श꣣क्र꣢ आ꣣शि꣡ष꣢म् ॥१४०॥
पदार्थः(वृत्रहा) पापों का विनाशक (भूर्यासुतिः) बहुत रसमय इन्द्र परमेश्वर (नः) हमारे लिए (बोधन्मनाः) मन को प्रबुद्ध करनेवाला (इत्) ही (अस्तु) होवे। वह (शक्रः) शक्तिशाली परमेश्वर (आशिषम्) हमारी महत्त्वाकांक्षा को (शृणोतु) सुने, पूर्ण करे ॥६॥ इस मन्त्र में ‘वृत्रहा’ और ‘शक्रः’ शब्द क्योंकि इन्द्र अर्थ में प्रसिद्धि पा चुके हैं, अतः पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार है। यौगिक अर्थ लेने पर पुनरुक्ति का परिहार हो जाता है। ‘शृणोतु’ में श्रु धातु की पूर्ण करने अर्थ में लक्षणा है ॥६॥
भावार्थःजो परमात्मा दोषों का हन्ता, अधर्मों का पराजेता, पापों का विनाशक, आनन्दरस का सागर और सर्वशक्तिमान् है, वह हमारे मन को प्रबुद्ध करके हमारी दीर्घायुष्य, समृद्धि, विजय, मोक्ष आदि की महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करे ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣द्य꣡ नो꣢ देव सवितः प्र꣣जा꣡व꣢त्सावीः꣣ सौ꣡भ꣢गम् । प꣡रा꣢ दुः꣣ष्व꣡प्न्य꣢ꣳ सुव ॥१४१॥
पदार्थःमन्त्र का देवता इन्द्र होने से मन्त्रोक्त ‘देव’ और ‘सवितः’ उसी के विशेषण हैं। हे (देव) ऐश्वर्यप्रदायक, प्रकाशमय, प्रकाशक, सर्वोपरि विराजमान, (सवितः) उत्तम बुद्धि आदि के प्रेरक इन्द्र परमात्मन् ! (अद्य) आज, आप (नः) हमारे लिए (प्रजावत्) सन्ततियुक्त अर्थात् उत्तरोत्तर बढ़नेवाले (सौभगम्) धर्म, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य आदि का धन (सावीः) प्रेरित कीजिए, (दुःष्वप्न्यम्) दिन का दुःस्वप्न, रात्रि का दुःस्वप्न और उनसे होनेवाले कुपरिणामों को (परासुव) दूर कर दीजिए ॥७॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से मनुष्य निरन्तर बढ़नेवाले सद्गुणरूप बहुमूल्य धन को और दोषों से मुक्ति को पा लेता है ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क्वा꣢३꣱स्य꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ युवा꣢꣯ तुवि꣣ग्री꣢वो꣣ अ꣡ना꣢नतः । ब्र꣣ह्मा꣡ कस्तꣳ स꣢꣯पर्यति ॥१४२॥
पदार्थः(क्व) कहाँ है (स्यः) वह (वृषभः) आनन्द की वर्षा करनेवाला, (युवा) नित्य युवा, अर्थात् युवक के समान सदा शक्तिशाली, (तुविग्रीवः) अतिशय रूप से प्रलयकाल में जगत् को निगलनेवाला अर्थात् प्रकृति में लय करनेवाला और बहुत उपदेश देनेवाला, (अनानतः) शत्रु के संमुख कभी न झुकनेवाला, इन्द्र परमेश्वर? (कः) कौन सा (ब्रह्मा) विद्या-वृद्ध जन (तम्) पूर्वोक्त विशेषताओं से युक्त उस इन्द्र परमेश्वर को (सपर्यति) पूजता है? ॥८॥
भावार्थःतुम कहते हो कि ब्रह्माण्ड का कोई शासक है, जो बादल के समान सबके ऊपर सुख बरसाता है जो न कभी बालक होता है, न कभी बूढ़ा, किन्तु सदा युवा ही रहता है, जो मानो हजार ग्रीवाओंवाला होकर प्रलयकाल में सब पदार्थों को निगलता है और सृष्टिकाल में सहस्रों जनों को ज्ञान का उपदेश करता है, जो कभी शत्रुओं के सम्मुख झुकता नहीं, अपितु उन्हें ही झुका लेता है। हम पूछते हैं कि वह कहाँ है? यदि है, तो दिखाओ। तुम कहते हो कि वह पूजनीय है। हम पूछते हैं कि भला कौन विद्वान् है जो उस निराकार, अशरीरी, अदृश्य, अश्रव्य की पूजा कर सके? इसलिए वह है ही नहीं, न ही कोई उसकी पूजा कर सकता है, यह प्रश्नकर्ता का अभिप्राय है ॥८॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣣पह्वरे꣡ गि꣢री꣣णा꣡ꣳ स꣢ङ्ग꣣मे꣡ च꣢ न꣣दी꣡ना꣢म् । धि꣣या꣡ विप्रो꣢꣯ अजायत ॥१४३॥
पदार्थः(गिरीणाम्) पर्वतों के (उपह्वरे) एकान्त में अथवा समीप में (नदीनां च) और नदियों के (सङ्गमे) सङ्गम-स्थल पर (धिया) ध्यान द्वारा (विप्रः) वह सर्वव्यापक और मेधावी इन्द्र परमेश्वर (अजायत) प्रकट होता है ॥९॥
भावार्थःतुम्हारा प्रश्न है कि वह इन्द्र परमेश्वर कहाँ है? उस पर हमारा उत्तर है—वह सर्वव्यापक है, किन्तु उसका दर्शन बाह्य आँख से होना संभव नहीं है, ध्यान द्वारा आन्तरिक चक्षु से ही वह साक्षात्कार किये जाने योग्य है और ध्यान कोलाहल-भरे वातावरण में नहीं, अपितु पर्वतों और नदियों के शान्त प्रदेश में सुगम होता है। उन्हीं ध्यानयोग्य प्रदेशों में ध्यान करनेवालों को परमेश्वर का साक्षात्कार होता है। तुम्हारा दूसरा प्रश्न यह है कि कौन उसकी पूजा कर सकता है? इसका उत्तर भी पहले उत्तर में आ जाता है। निराकार, शरीर-रहित, आँख से अगोचर परमेश्वर की भी पूर्वोक्त प्रकार से ध्यान करता हुआ मनुष्य पूजा कर सकता है, उसकी मूर्ति रचकर उस पर पत्र, पुष्प, जल आदि चढ़ानेवाला उसका वास्तविक पूजक नहीं है ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ स꣣म्रा꣡जं꣢ चर्षणी꣣ना꣡मिन्द्र꣢꣯ꣳ स्तोता꣣ न꣡व्यं꣢ गी꣣र्भिः꣢ । न꣡रं꣢ नृ꣣षा꣢हं꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठम् ॥१४४॥
पदार्थःहे भाइयो ! तुम (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के (सम्राजम्) सम्राट्, (नव्यम्) नवीन वा स्तवनयोग्य, (नरम्) नेता, पौरुषवान्, (नृषाहम्) दुष्टजनों को पराजित करनेवाले, (मंहिष्ठम्) अतिशय दानी (इन्द्रम्) वीर परमात्मा और राजा का (गीर्भिः) वेद-वाणियों तथा निज वाणियों से (प्र स्तोत) भली-भाँति कीर्तिगान करो ॥१०॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा और राजा की धवल कीर्ति का गान करें और उनके गुणों को अपने जीवन में धारण करें ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र के सहायक मरुतों के वर्णनपूर्वक इन्द्र का महत्त्व प्रतिपादित होने से; ब्रह्मणस्पति, वृत्रहा, सविता, शक्र नामों से इन्द्र की स्तुति होने से, इन्द्र से दुःस्वप्न-विनाश की प्रार्थना होने से और इन्द्र की स्तुति के लिए प्रेरणा होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की पञ्चम दशति समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡पा꣢दु शि꣣प्र्य꣡न्ध꣢सः सु꣣द꣡क्ष꣢स्य प्रहो꣣षि꣡णः꣢ । इ꣢न्द्रो꣣रि꣢न्द्रो꣣ य꣡वा꣢शिरः ॥१४५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष मे। (शिप्री) सर्वव्यापक (इन्द्रः) परमात्मा (सुदक्षस्य) अतिकुशल, (प्रहोषिणः) प्रकृष्ट रूप से आत्मसमर्पण रूप हवि का होम करनेवाले, (इन्दोः) चन्द्रमा के समान सौम्य उपासक के (यवाशिरः) यवों के तुल्य सात्त्विक ज्ञान और कर्मों के साथ परिपक्व (अन्धसः) भक्ति-रूप सोमरस का (अपात् उ) निश्चय ही पान करता है, अर्थात् ज्ञान-कर्म-पूर्वक की गयी भक्ति को अवश्य स्वीकार करता है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (शिप्री) राजमुकुटधारी (इन्द्रः) राजा (सुदक्षस्य) सुसमृद्ध, (प्रहोषिणः) कर-रूप से राजा के लिए देय भाग को कर-विभाग में देनेवाले, (इन्दोः) राष्ट्र को सींचनेवाले प्रजाजन के (यवाशिरः) जौ, गेहूँ, तिल, चावल, मूँग उड़द आदि सहित (अन्धसः) खाद्य, पेय, वस्त्र, सोना, चाँदी, मुद्रा आदि रूप में प्रदत्त राज-कर को (अपात् उ) अवश्य ग्रहण करता है ॥ तृतीय—सूर्य के पक्ष में। (शिप्री) किरणोंवाला (इन्द्रः) सूर्य (सुदक्षस्य) अतिशय समृद्ध, (प्रहोषिणः) अपने जल रूप हवि का होम करनेवाले भूमण्डल के (यवाशिरः) संयोगविभागकारी ताप से पककर भापरूप में परिणत होनेवाले (अन्धसः) भोज्यरूप (इन्दोः) जल का (अपात् उ) अवश्य पान करता है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे राजा प्रजाजनों के कररूप उपहार को और सूर्य भूमण्डल के जलरूप उपहार को स्वीकार करता है, वैसे ही परमात्मा उपासकों के ज्ञानकर्ममय भक्तिरस के उपहार को प्रेमपूर्वक स्वीकार करता है ॥१॥ इस मन्त्र की व्याख्या में सायणाचार्य ने जो ‘सुदक्ष’ शब्द से सुदक्ष नाम के ऋषि का ग्रहण किया है, वह अन्य भाष्यकारों के विरुद्ध होने से ही खण्डित हो जाता है, क्योंकि ‘सुदक्ष’ का अर्थ विवरणकार माधव ने ‘भले प्रकार उत्सादित’ और भरतस्वामी ने ‘अतिशय बलवान्’ किया है। इस प्रकार के प्रसिद्धार्थक शब्दों को भी नाम मान लेने पर तो वेदों के सभी सुबन्त पद किसी ऋषि या राजा के नाम हो जाएँगे ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा पुरूवसो꣣ऽभि꣡ प्र नो꣢꣯नुवु꣣र्गि꣡रः꣢ । गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥१४६॥
पदार्थःहे (पुरूवसो) विद्या, सुवर्ण, सद्गुण आदि बहुत से धनों के स्वामी परमात्मन् ! (इमाः उ) ये हमारे द्वारा उच्चारण की जाती हुई (गिरः) भावपूर्ण स्तुतिवाणियाँ (त्वा अभि) आपको लक्ष्य करके (प्र नोनुवुः) प्रकृष्ट रूप से अतिशय पुनः-पुनः शब्दायमान हो रही हैं, (धेनवः) अपना दूध पिलाने के लिए उत्सुक (गावः) गौएँ (वत्सं न) जैसे अपने बछड़े को लक्ष्य करके रँभाती हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःहे जगदीश्वर ! जैसे गौएँ अपने प्यारे बछड़े को देखकर पौस कर उसे अपना दूध पिलाने के लिए रँभाती हैं, वैसे ही हमारी रस-भरी स्तुति-वाणियाँ भक्ति-रस को उद्वेल्लित सा करती हुई प्राणों से भी प्रिय आपको वह रस पिलाने के लिए आपके प्रति बहुत अधिक शब्दायमान हो रही हैं और आपकी स्तुति कर रही हैं ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣢꣫त्राह꣣ गो꣡र꣢मन्वत꣣ ना꣢म꣣ त्व꣡ष्टु꣢रपी꣣꣬च्य꣢꣯म् । इ꣣त्था꣢ च꣣न्द्र꣡म꣢सो गृ꣣हे꣢ ॥१४७॥
पदार्थःप्रथमः—सूर्य से चन्द्रमा के प्रकाशित होने के पक्ष में। (त्वष्टुः) विच्छेदक, प्रकाश द्वारा शीघ्र व्याप्तिशील, देदीप्यमान सूर्य की (गोः) सुषुम्णनामक रश्मि के (अत्र अह) इस (चन्द्रमसः गृहे) चन्द्रमण्डल में (अपीच्यम्) प्रच्छन्न रूप से (नाम) अवस्थान को, विद्वान् लोग (इत्था) सत्य रूप में (अमन्वत) जानते हैं। अर्थात् चन्द्रमा सूर्य से प्रकाशित होता है, इस रहस्य को विद्वान् लोग भली-भाँति समझते हैं ॥ निरुक्त में कहा है कि आदित्य का एक रश्मिसमूह चन्द्रमा में जाकर दीप्त होता है, अर्थात् आदित्य से चन्द्रमा की दीप्ति होती है, जैसा कि वेद में कहा है “सुषुम्ण नामक सूर्य रश्मियाँ हैं, चन्द्रमा उन रश्मियों को धारण करने के कारण गन्धर्व है’’ (य० १८।४०)। ‘अत्राह गोरमन्वत’ आदि मन्त्र में ‘गोः’ पद चन्द्रमा को प्रकाशित करनेवाली उन सुषुम्ण नामक सूर्यरश्मियों के लिए ही आया है ॥ द्वितीय—परमात्मापरक अर्थ। (त्वष्टुः) दुःखों के विच्छेदक, सर्वत्र व्यापक, तेज से प्रदीप्त और जगत् के रचयिता इन्द्र नामक परमेश्वर की (गोः) दिव्य प्रकाशरश्मि का (अत्र अह) इस (चन्द्रमसः गृहे) मन रूप चन्द्र के निवासस्थान हृदय में (अपीच्यं नाम) आगमन को, उपासक लोग (इत्था) सत्य रूप में (अमन्वत) अनुभव करते हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमा प्रकाशित होता है, वैसे ही परमेश्वर के प्रकाश से स्तुतिकर्ताओं के हृदय प्रकाशित होते हैं ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣢꣫दिन्द्रो꣣ अ꣡न꣢य꣣द्रि꣡तो꣢ म꣣ही꣢र꣣पो꣡ वृष꣢꣯न्तमः । त꣡त्र꣢ पू꣣षा꣡भु꣢व꣣त्स꣡चा꣢ ॥१४८॥
पदार्थः(वृषन्तमः) अतिशय बलवान् अथवा वृष्टिकर्ता (इन्द्रः) परमेश्वर (यत्) जब (रितः) गति करनेवाली (महीः) पृथिवी, चन्द्र आदि ग्रह-उपग्रह रूप भूमियों को (अनयत्) अपनी-अपनी कक्षाओं में सूर्य के चारों ओर घुमाता है, और (अपः) जलों को (अनयत्) भाप बनाकर ऊपर और वर्षा द्वारा नीचे पहुँचाता है, तब (तत्र) उस कर्म में (पूषा) पुष्टिप्रद सूर्य (सचा) सहायक (अभुवत्) होता है ॥४॥
भावार्थःमहामहिमाशाली जगदीश्वर ही सूर्य, विद्युत्, बादल, आदि को साधन बनाकर सब प्राकृतिक नियमों का संचालन कर रहा है ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मरुतः| स्वर - षड्जः
गौ꣡र्ध꣢यति म꣣रु꣡ता꣣ꣳ श्रव꣣स्यु꣢र्मा꣣ता꣢ म꣣घो꣡ना꣢म् । यु꣣क्ता꣢꣫ वह्नी꣣ र꣡था꣢नाम् ॥१४९॥
पदार्थःप्रथमः—भूमि के पक्ष में। (मघोनाम्) ऐश्वर्यवान् (मरुताम्) मनुष्यों को (श्रवस्युः) मानो अन्न प्रदान करना चाहती हुई (माता) माता (गौः) भूमि (धयति) वर्षाजल को पीती है। (युक्ता) सूर्य से सम्बद्ध वह (रथानाम्) गतिमान् अग्नि, वायु, जल, पशु, पक्षी, मनुष्य आदिकों को (वह्निः) एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जानेवाली होती है ॥ द्वितीय—गाय के पक्ष में। (मघोनाम्) यज्ञ रूप ऐश्वर्य से युक्त (मरुताम्) यजमान मनुष्यों को (श्रवस्युः) दूध-घी प्रदान करना चाहती हुई (माता गौः) गौ माता के तुल्य गाय (धयति) स्वच्छ जल पीती है। (युक्ता) यज्ञ के लिए नियुक्त वह (रथानाम्) यज्ञ-रूप रथों की (वह्निः) चलानेवाली होती है ॥ तृतीय—विद्युत् के पक्ष में। (मघोनाम्) साधनवान् (मरुताम्) मनुष्यों को (श्रवस्युः) मानो धन प्रदान करना चाहती हुई (माता) निर्माण करनेवाली (गौः) अन्तरिक्ष में स्थित विद्युत् (धयति) मेघ के जलों को पीती है और (युक्ता) शिल्पकर्म में प्रयुक्त हुई वह (रथानाम्) कलायन्त्र, भूयान, जलयान, विमान आदिकों की (वह्निः) चलानेवाली होती है ॥ चतुर्थ—वाणी के पक्ष में। (मघोनाम्) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि के ऐश्वर्य से युक्त (मरुताम्) मनुष्यो को (श्रवस्युः) मानो अन्न, धन, विद्या, कीर्ति, आदि प्रदान करने की इच्छुक (माता गौः) माता वेदवाणी (धयति) ज्ञानरस का पान कराती है। (युक्ता) अध्ययन-अध्यापन में उपयोग लायी हुई वह (रथानाम्) रमणीय आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मवर्चस आदि की (वह्निः) प्राप्त करानेवाली होती है ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘श्रवस्यु—मानो अन्न, धन, कीर्ति आदि प्राप्त कराना चाहती हुई’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥५॥
भावार्थःइन्द्र परमात्मा से रची हुई भूमि, गाय, विद्युत्, वेदवाणी रूप गौओं का उपयोग लेकर सबको आध्यात्मिक, शारीरिक, भौतिक, वैज्ञानिक, याज्ञिक, सामाजिक और राष्ट्रिय उन्नति करनी चाहिए ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣तं꣢ या꣣हि꣡ म꣢दानां पते । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१५०॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (मदानां पते) आनन्दों के अधिपति परमात्मन् ! आप (नः) हमारे (हरिभिः) ज्ञान को आहरण करनेवाली ज्ञानेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पन्न किये ज्ञान को (उप याहि) प्राप्त हों। (नः) हमारे (हरिभिः) कर्म को आहरण करनेवाली कर्मेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पादित कर्म को (उप याहि) प्राप्त हों ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। हे (मदानां पते) हर्षप्रदायक ज्ञानों के अधिपति, विविध विद्याओं में विशारद आचार्यप्रवर ! आप (हरिभिः) ज्ञान का आहरण करानेवाले अन्य गुरुजनों के साथ (नः) हमारे (सुतम्) गुरुकुल में प्रविष्ट पुत्र के (उप याहि) पास पहुँचिए। (हरिभिः) दोषों को हरनेवाले अन्य गुरुओं के साथ (नः) हमारे (सुतम्) गुरुकुल में प्रविष्ट पुत्र के (उप याहि) पास पहुँचिए ॥५॥ इस मन्त्र श्लेषालङ्कार है, ‘उप नः हरिभिः सुतम्’ की आवृत्ति में पादावृत्ति यमक है ॥६॥
भावार्थःउपासक लोग परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि हमारे प्रत्येक ज्ञान और प्रत्येक कर्म में यदि आप व्याप्त हो जाते हैं, तभी हमारा जीवन-यज्ञ सफ़ल होगा। और अपने पुत्र को गुरुकुल में प्रविष्ट कर माता-पिता कुलपति से प्रार्थना करते हैं कि आप विद्याओं को पढ़ाने और चरित्र-निर्माण के लिए अन्य गुरुजनों सहित कृपा करके प्रतिदिन हमारे पुत्र के साथ सान्निध्य करते रहना ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣ष्टा꣡ होत्रा꣢꣯ असृक्ष꣣ते꣡न्द्रं꣢ वृ꣣ध꣡न्तो꣢ अध्व꣣रे꣢ । अ꣡च्छा꣢वभृ꣣थ꣡मोज꣢꣯सा ॥१५१॥
पदार्थः(अध्वरे) हिंसादि दोषों से रहित अग्निहोत्र में, जीवन-यज्ञ में अथवा उपासना-यज्ञ में (इन्द्रम्) परमैश्वर्यशाली, दुःखविदारक, मुक्तिदायक परमात्मा को (वृधन्तः) बढ़ाते हुए अर्थात् उत्तरोत्तर हृदय में विकसित करते हुए यजमानगण (ओजसा) बलपूर्वक अर्थात् पूरे प्रयास से (अवभृथम् अच्छ) यज्ञान्त स्नान को लक्ष्य करके अर्थात् हम शीघ्र यज्ञ को पूर्ण करके यज्ञान्त स्नान करें, इस बुद्धि से (इष्टाः) अभीष्ट (होत्राः) आहुतियों को (असृक्षत) छोड़ते हैं ॥ यहाँ यह अर्थ भी ग्रहण करना चाहिए कि राष्ट्रयज्ञ को पूर्णता तक पहुँचाने के लिए पूरे प्रयत्न से राजा को बढ़ाते हुए अर्थात् अपने सहयोग से शक्तिशाली करते हुए प्रजाजन राष्ट्र के लिए सब प्रकार का त्याग करने के लिए उद्यत होते हैं ॥७॥
भावार्थःअग्निहोत्र, जीवनयज्ञ, ध्यानयज्ञ, राष्ट्रयज्ञ, सभी यज्ञ आहुति देने से, परार्थ त्याग करने से या आत्मबलिदान करने से पूर्णता को प्राप्त होते हैं ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣ह꣢꣫मिद्धि पि꣣तु꣡ष्परि꣢ मे꣣धा꣢मृ꣣त꣡स्य꣢ ज꣣ग्र꣡ह꣢ । अ꣣ह꣡ꣳ सूर्य꣢꣯ इवाजनि ॥१५२॥
पदार्थः(अहम्) मैंने (इत् हि) सचमुच (पितुः परि) पिता इन्द्र परमेश्वर से (ऋतस्य मेधाम्) सत्याचरण की मेधा को अथवा ऋतम्भरा प्रज्ञा को (जग्रह) ग्रहण कर लिया है। उससे प्रकाशमान हुआ (अहम्) अध्यात्मपथ का पथिक मैं (सूर्यः इव) सूर्य के समान (अजनि) हो गया हूँ ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःपिता परमेश्वर की उपासना से मनुष्य सत्यज्ञान, सत्य आचरण और ऋतम्भरा प्रज्ञा को प्राप्त करके सूर्य के समान प्रकाशमान होकर मुक्ति उपलब्ध कर सकता है ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
रे꣣व꣡ती꣢र्नः सध꣣मा꣢द꣣ इ꣡न्द्रे꣢ सन्तु तु꣣वि꣡वा꣢जाः । क्षु꣣म꣢न्तो꣣ या꣢भि꣣र्म꣡दे꣢म ॥१५३॥
पदार्थः(नः) हमारी (रेवतीः) प्रशस्त ऐश्वर्यवाली प्रजाएँ (सधमादे) जिसके साथ रहते हुए लोग आनन्द प्राप्त करते हैं, ऐसे (इन्द्रे) परमैश्वर्यशाली परमात्मा और राजा के आश्रय में (तुविवाजाः) बहुत बल और विज्ञान से सम्पन्न (सन्तु) होवें, (याभिः) जिन प्रजाओं के साथ (क्षुमन्तः) प्रशस्त अन्नादि भोग्य सामग्री से सम्पन्न, प्रशस्त निवास से सम्पन्न और प्रशस्त कीर्ति से सम्पन्न हम (मदेम) आनन्दित हों ॥९॥
भावार्थःसब प्रजाजनों को चाहिए कि वे इन्द्रनामक परमात्मा और राजा के मार्गदर्शन में सब कार्य करें, जिससे वे रोग, भूख, अकालमृत्यु आदि से पीड़ित न हों, प्रत्युत सब सात्त्विक खाद्य, पेय आदि पदार्थों को और बल, विज्ञान आदि को प्राप्त करते हुए समृद्ध होकर अधिकाधिक आनन्द को उपलब्ध करें ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
सो꣡मः꣢ पू꣣षा꣡ च꣢ चेततु꣣र्वि꣡श्वा꣢साꣳ सुक्षिती꣣ना꣢म् । दे꣣वत्रा꣢ र꣣꣬थ्यो꣢꣯र्हि꣣ता꣢ ॥१५४
पदार्थः(सोमः पूषा च) चन्द्रमा और सूर्य अथवा मन और आत्मा (विश्वासाम् सुक्षितीनाम्) सब उत्कृष्ट प्रजाओं का (चेततुः) उपकार करना जानते हैं, वे (देवत्रा) विद्वज्जनों में (रथ्योः) रथारुढों के समान उन्नति के लिए प्रयत्नशील गुरु-शिष्य, माता-पिता, पिता-पुत्र, पत्नी-यजमान, स्त्री-पुरुष, शास्य-शासक आदि के (हिता) हितकारी होते हैं ॥१०॥
भावार्थःइन्द्र नामक परमेश्वर की ही यह महिमा है कि उसकी रची हुई सृष्टि में सौम्य चन्द्रमा और तैजस सूर्य तथा मानव शरीर में सौम्य मन और तैजस आत्मा दोनों प्राण आदि के प्रदान द्वारा सब प्रजाओं का उपकार करते हैं। जैसे रथारूढ़ रथस्वामी और सारथि अथवा रानी और राजा क्रमशः मार्ग को पार करते चलते हैं, वैसे ही जो भी गुरु-शिष्य, माता-पिता, पिता-पुत्र, पत्नी-यजमान, स्त्री-पुरुष, शास्य-शासक आदि उन्नति के लिए प्रयत्न करते हैं, उनके लिए पूर्वोक्त दोनों चन्द्र-सूर्य और मन-आत्मा परम हितकारी होते हैं ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र और इन्द्र द्वारा रचित भूमि, गाय, वेदवाणी, चन्द्र, सूर्य आदि का महत्त्व वर्णित होने से और इन्द्र के पास से ऋत की मेधा की प्राप्ति का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ द्वितीय—प्रपाठक में द्वितीय—अर्ध की प्रथमः—दशति समाप्त ॥ द्वितीय—अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
पा꣢न्त꣣मा꣢ वो꣣ अ꣡न्ध꣢स꣣ इ꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । वि꣣श्वासा꣡ह꣢ꣳ श꣣त꣡क्र꣢तुं꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठं चर्षणी꣣ना꣢म् ॥१५५॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (वः) तुम (अन्धसः) भोग्य वस्तुओं के (आ पान्तम्) सब ओर से रक्षक, (विश्वासाहम्) समस्त शत्रुओं के विजेता, (शतक्रतुम्) बहुत बुद्धिमान्, बहुत कर्मण्य, बहुत से यज्ञों को करनेवाले, (चर्षणीनाम्) मनुष्यों को (मंहिष्ठम्) अतिशय दान करनेवाले (इन्द्रम्) परमैश्वर्यशाली वीर परमात्मा और राजा को (अभि) लक्षित करके (प्र गायत) प्रकृष्ट रूप से गान करो अर्थात् उनके गुण-कर्म-स्वभावों का वर्णन करो ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष और परिकर अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःसब मनुष्यों को योग्य है कि वे जगत् के रक्षक, समस्त काम-क्रोधादि रिपुओं के विजेता, असंख्य प्रज्ञाओं, असंख्य कर्मों और असंख्य यज्ञों से युक्त, सब मनुष्यों को विद्या, धन, धर्म आदि का अतिशय दान करनेवाले परमात्मा के और राष्ट्र के रक्षक, शत्रु-सेनाओं को हरानेवाले, विद्वान्, कर्मठ, अनेक यज्ञों के याज्ञिक, प्रजाओं को अतिशय विद्या, आरोग्य, धन आदि देनेवाले राजा के प्रति उनके गुण-कर्म-स्वभाव का वर्णन करनेवाले स्तुति-गीत और उद्बोधन-गीत गायें ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य꣣ मा꣡द꣢न꣣ꣳ ह꣡र्य꣢श्वाय गायत । स꣡खा꣢यः सोम꣣पा꣡व्ने꣢ ॥१५६॥
पदार्थःप्रथमः—परमात्मा के पक्ष में। हे (सखायः) साथियो ! (वः) तुम (हर्यश्वाय) जिसके द्वारा रचित घोड़े पशु या सूर्य-चन्द्र-वायु-बादल प्राण आदि बड़े वेगवान् हैं, ऐसे (सोमपाव्ने) भक्तिरूप सोमरस का पान करनेवाले और चन्द्रादि लोकों के रक्षक (इन्द्राय) परमैश्वर्यवान् परमात्मा के लिए (मादनम्) आनन्ददायक तृप्तिकारी स्तोत्र को (प्र गायत) प्रकृष्ट रूप से गाओ ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (सखायः) मित्रभूत प्रजाजनो ! (वः) तुम (हर्यश्वाय) जिसके अश्वयान, अग्नियान, वायुयान, विद्युत्-यान आदि बहुत वेगवान् हैं, उस (सोमपाव्ने) राष्ट्र में ब्रह्म-क्षत्र के रक्षक, और यज्ञ के रक्षक (इन्द्राय) ऐश्वर्यशाली शत्रुविदारक राजा के लिए (मादनम्) हर्षप्रद और उत्साहकारी उद्बोधनगीत या विजयगीत (प्र गायत) भली-भाँति गान करो ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःसब सखाओं को मिलकर परमेश्वर के प्रति स्तुति-गीत और प्रजाओं को मिलकर युद्धारम्भ, विजयोत्सव आदि में राजा के प्रति उद्बोधन-गीत तथा विजय-गीत लयपूर्वक गाने चाहिएँ ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
व꣣य꣡मु꣢ त्वा त꣣दि꣡द꣢र्था꣣ इ꣡न्द्र꣢ त्वा꣣य꣢न्तः꣣ स꣡खा꣢यः । क꣡ण्वा꣢ उ꣣क्थे꣡भि꣢र्जरन्ते ॥१५७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमात्मन् ! (त्वायन्तः) आपके पाने की कामना करते हुए (सखायः) आपके सखा (वयम् उ) हम उपासक लोग (तदिदर्थाः) आपके दर्शन को ही प्रयोजन मानते हुए (त्वा) आपकी स्तुति करते हैं। न केवल हम, प्रत्युत (कण्वाः) सभी मेधावी जन (उक्थेभिः) स्तोत्रों से आपकी (जरन्ते) स्तुति करते हैं ॥३॥
भावार्थःहे परमानन्दप्रदायक परमेश्वर ! आपके दर्शनों की लालसावाले हम सभी बड़ी उत्सुकता से आपकी चाहना करते हैं और बार-बार भक्ति से गद्गद होकर आपकी स्तुति करते हैं ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ म꣡द्व꣢ने सु꣣तं꣡ परि꣢꣯ ष्टोभन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ । अ꣣र्क꣡म꣢र्चन्तु का꣣र꣡वः꣢ ॥१५८॥
पदार्थः(मद्वने) आनन्दमय (इन्द्राय) परमैश्वर्यवान् परमात्मा के लिए (सुतम्) अभिषुत भक्तिरूप सोमरस को (नः) हमारी (गिरः) वाणियाँ (परिष्टोभन्तु) तरंगित करें। (अर्कम्) उस अर्चनीय देव की (कारवः) अन्य स्तोता जन भी (अर्चन्तु) मिलकर अर्चना करें ॥४॥
भावार्थःआनन्द प्राप्त करने की कामनावाला मैं प्रेमरस से परिप्लुत हृदयवाला होकर परमानन्दमय परमात्मा के लिए जिन भक्तिरसों को प्रवाहित कर रहा हूँ, उनमें मेरी स्तुति-वाणियाँ मानो तरंगें उत्पन्न कर रही हैं। अन्य स्तोता जन भी उसी प्रकार परमात्मा की अर्चना करें, जिससे सारा ही वातावरण भक्तिमय और संगीत से तरंगित हो जाए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣यं꣡ त꣢ इन्द्र꣣ सो꣢मो꣣ नि꣡पू꣢तो꣣ अ꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ए꣡ही꣢म꣣स्य꣢꣫ द्रवा꣣ पि꣡ब꣢ ॥१५९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! (अयम्) यह (सोमः) श्रद्धारस (तुभ्यम्) तेरे लिए (बर्हिषि अधि) हृदयरूप अन्तरिक्ष में (निपूतः) पूर्णतः पवित्र कर लिया गया है। (एहि) आ, (ईम्) इसके प्रति (द्रव) दौड़, (अस्य) इसके भाग को (पिब) पान कर ॥५॥
भावार्थःजैसे अन्तरिक्षस्थ मेघ-जल पवित्र होता है, वैसे ही हृदयान्तरिक्ष में स्थित श्रद्धा-रस को तेरे भक्त मैंने पूर्णतः पवित्र कर लिया है। उस मेरे पवित्र श्रद्धा-रस का पान करने के लिए तू शीघ्र ही आ और उत्कंठित होकर पी, जिससे मैं कृतार्थ हो जाउँ। यहाँ परमात्मा के सर्वव्यापक और निरवयव होने के कारण उसमें शीघ्र आने, पीने आदि का व्यवहार नहीं घट सकता, इसलिए आगमन का अर्थ प्रकट होना तथा पीने का अर्थ स्वीकार करना लक्षणावृत्ति से समझना चाहिए ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
सु꣣रूपकृत्नु꣢मू꣣त꣡ये꣢ सु꣣दु꣡घा꣢मिव गो꣣दु꣡हे꣢ । जु꣣हूम꣢सि꣣ द्य꣡वि꣢द्यवि ॥१६०॥
पदार्थःहम उपासक लोग, प्रजाजन अथवा शिष्यगण (सुरूपकृत्नुम्) सृष्ट्युत्पत्ति-स्थिति आदि सुरूप कर्मों के कर्ता परमात्मा को, प्रजापालन-राष्ट्रनिर्माण आदि सुरूप कर्मों के कर्ता राजा को और विद्याप्रदान-सदाचारनिर्माण आदि सुरूप कर्मों के कर्ता आचार्य को (ऊतये) क्रमशः उपासना के फल की प्राप्ति के लिए, राष्ट्ररक्षा के लिए और विद्याप्राप्ति के लिए (द्यविद्यवि) प्रतिदिन (जुहूमसि) पुकारते हैं, (गोदुहे) गाय दुहनेवाले गोदुग्ध के इच्छुक मनुष्य के लिए (सुदुघाम् इव) जैसे दुधारू गाय को बुलाया जाता है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेष तथा उपमालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजैसे दूध के इच्छुक लोग दूध प्राप्त करने के लिए दुधारू गाय को बुलाते हैं, वैसे ही उपासक लोग उपासनाजन्य आनन्द की प्राप्ति के लिए परमात्मा को, प्रजाजन राष्ट्र की रक्षा के लिए राजा को और शिष्यजन विद्याग्रहण के लिए आचार्य को प्रतिदिन सत्कारपूर्वक बुलाया करें ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ वृषभा सु꣣ते꣢ सु꣣त꣡ꣳ सृ꣢जामि पी꣣त꣡ये꣢ । तृ꣣म्पा꣡ व्य꣢श्नुही꣣ म꣡द꣢म् ॥१६१॥
पदार्थःप्रथमः—परमात्मा के पक्ष में। हे (वृषभ) सुखशान्ति की वर्षा करनेवाले परमात्मन् ! (सुते) इस उपासना-यज्ञ में (पीतये) आपके पीने अर्थात् स्वीकार करने के लिए (सुतम्) निष्पादित भक्तिरस को (त्वा अभि) आपके प्रति (सृजामि) समर्पित करता हूँ, आप इससे (तृम्प) तृप्त हों। अपने भक्त को अपने प्रेम में डूबे हुए हृदयवाला देखकर (मदम्) आनन्द को (वि अश्नुहि) प्राप्त करें, जैसे पिता पुत्र को अपने प्रति श्रद्धालु देखकर प्रमुदित होता है ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। गुरुकुल में अपने बालक को आचार्य के हाथों में सौंपते हुए पिता कह रहा है—हे (वृषभ) ज्ञान-वर्षक आचार्यप्रवर ! (सुते) इस अध्ययन-अध्यापन रूप सत्र के प्रवृत्त होने पर (पीतये) विद्यारस के पान के लिए (सुतम्) अपने पुत्र को (त्वा अभि) आपके प्रति (सृजामि) छोड़ता हूँ अर्थात् आपके अधीन करता हूँ। आगे पुत्र को कहता है—हे पुत्र ! तू आचार्य के अधीन रहकर (तृम्प) ज्ञानरस से तृप्तिलाभ कर, (मदम्) आनन्दप्रद सदाचार को भी (वि अश्नुहि) प्राप्त कर, इस प्रकार आचार्य से विद्या की शिक्षा और व्रतपालन की शिक्षा ग्रहण करके विद्यास्नातक और व्रतस्नातक बन ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेष और ‘सुते-सुतं’ में छेकानुप्रास अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर भूमि पर मेघ-जल और उपासकों के हृदय में सुख-शान्ति की वर्षा करता है, वैसे ही आचार्य शिष्य के हृदय में विद्या और सदाचार को बरसाता है। अतः सबको परमेश्वर की उपासना और आचार्य की सेवा करनी चाहिए ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡ इ꣢न्द्र चम꣣से꣡ष्वा सोम꣢꣯श्च꣣मू꣡षु꣢ ते सु꣣तः꣢ । पि꣡बेद꣢꣯स्य꣣ त्व꣡मी꣢शिषे ॥१६२॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा और जीवात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) दुःखविदारक, सुखप्रदाता परमात्मन् अथवा शक्तिशाली जीवात्मन् ! (यः) जो यह (सोमः) भक्तिरस अथवा ज्ञानरस और कर्मरस (चमसेषु) ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियरूप चमसपात्रों में, और (चमूषु) प्राण-मन-बुद्धिरूप अधिषवणफलकों में (आ सुतः) चारों ओर से अभिषुत किया हुआ तैयार है, (तम्) उसे (पिब इत्) अवश्य पान कर, (अस्य) इस भक्तिरस का और इस ज्ञान एवं कर्म के रस का हे परमात्मन् और हे जीवात्मन् ! (त्वम्) तू (ईशिषे) अधीश्वर है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) शत्रु को दलन करने में समर्थ पराक्रमशाली राजन् ! (यः) जो यह (ते) आपके (चमसेषु) मेघों के समान ज्ञान की वर्षा करनेवाले ब्राह्मणों में, और (चमूषु) आपकी क्षत्रिय सेनाओं में (सोमः) क्रमशः ब्रह्मरूप और क्षत्ररूप सोमरस (आ सुतः) अभिषुत है, उसका (पिब इत्) अवश्य पान कीजिए अर्थात् आप भी ब्रह्मबल और क्षत्रबल से युक्त होइए। (अस्य) इस ब्रह्मक्षत्ररूप सोम के (त्वम्) आप (ईशिषे) अधीश्वर हो जाइए ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःपरमात्मा स्तोताओं के भक्तिरूप सोमरूप को, जीवात्मा ज्ञान और कर्मरूप सोमरस को तथा राजा ब्रह्म-क्षत्र-रूप सोम-रस को यदि ग्रहण कर लें, तो स्तोताओं, जीवों और राष्ट्रों का बड़ा कल्याण हो सकता है ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
यो꣡गे꣢योगे त꣣व꣡स्त꣢रं꣣ वा꣡जे꣢वाजे हवामहे । स꣡खा꣢य꣣ इ꣡न्द्र꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥१६३॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (योगे योगे) योग को विभिन्न स्तरों यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, सविकल्पक-निर्विकल्पक समाधि में (तवस्तरम्) क्रमशः बढ़नेवाले, योग-विघ्नों को नष्ट करनेवाले तथा साधक की उन्नति करनेवाले (इन्द्रम्) सिद्धिप्रदायक परमेश्वर को (सखायः) हम साथी योगी-जन (वाजे वाजे) प्रत्येक आन्तरिक देवासुर-संग्राम में (ऊतये) रक्षा वा विजय-प्राप्ति के लिए (हवामहे) पुकारें ॥ द्वितीय—सेनाध्यक्ष के पक्ष में। (योगे योगे) राष्ट्र के प्रत्येक अप्राप्त की प्राप्तिरूप उत्कर्ष के निमित्त (तवस्तरम्) अतिशय क्रियाशील, बलवृद्ध, विघ्नविनाशक (इन्द्रम्) दुष्ट शत्रुओं के विदारक, विजय-प्रद, धार्मिक, वीर सेनाध्यक्ष को (सखायः) परस्पर सखिभाव से निवास करते हुए हम प्रजाजन (वाजे वाजे) प्रत्येक युद्ध में (ऊतये) रक्षा और विजय की प्राप्ति के लिए (हवामहे) पुकारें, उद्बोधन दें ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘योगे योगे, वाजे वाजे’ इस आवृत्ति में छेकानुप्रास है ॥९॥
भावार्थःयोगाभ्यास करते हुए मनुष्य के सम्मुख व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि बहुत से विघ्न आते हैं। ईश्वरप्रणिधान या प्रणवजप से वे हटाये जा सकते हैं। इसलिए जब-जब हमारे अन्तःकरण में देवासुर-संघर्ष प्रवृत्त होता है, तब-तब हम विघ्नों को पराजित करने और योगसिद्धि को प्राप्त करने के लिए बलवृद्ध परमेश्वर को पुकारते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र में भी जब-जब शत्रुओं का आक्रमण होता है तब-तब उन्हें जीतने के लिए और राष्ट्र की रक्षा के लिए हम शूरवीर सेनापति को उद्बोधन दें, जिससे राष्ट्र शत्रुरहित और उन्नतिशील हो ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣢꣫ त्वेता꣣ नि꣡ षी꣢द꣣ते꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । स꣡खा꣢यः꣣ स्तो꣡म꣢वाहसः ॥१६४॥
पदार्थःहे (स्तोमवाहसः) उपास्य के प्रति स्तोत्रों को ले जानेवाले अथवा जनता का नेतृत्व करनेवाले (सखायः) मित्रो ! तुम (तु) शीघ्र ही (आ इत) आओ, (आ निषीदत) आकर उपासना के लिए अथवा राष्ट्रोत्थान के लिए बैठो, (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान्, दुःखविदारक, सुखप्रद परमात्मा को और राष्ट्र को (अभि) लक्ष्य करके (प्र गायत) गीत गाओ ॥१०॥
भावार्थःसबको उपासनागृह में एकत्र होकर दुःखभंजक, सुखोत्पादक इन्द्र परमेश्वर के प्रति सामगीत गाने चाहिएँ और राष्ट्रोत्थान के लिए कृतसंकल्प होकर तथा कमर कसकर राष्ट्रगीत गाने चाहिएँ ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र नाम से परमात्मा के गुणवर्णनपूर्वक उसके प्रति स्तुतिगीत गाने के लिए और उसे भक्तिरस एवं कर्मरस रूप सोम अर्पित करने के लिए प्रेरणा होने से तथा उपासकों द्वारा उसका आह्वान होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥१०॥ द्वितीय—प्रपाठक में द्वितीय—अर्ध की द्वितीय—दशति समाप्त ॥ द्वितीय—अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣द꣡ꣳ ह्यन्वोज꣢꣯सा सु꣣त꣡ꣳ रा꣢धानां पते । पि꣢बा꣣ त्वा꣣३꣱स्य꣡ गि꣢र्वणः ॥१६५॥
पदार्थःहे (राधानां पते) आध्यात्मिक तथा भौतिक धनों के स्वामी परमात्मन् ! (इदं हि) यह भक्ति और कर्म का सोमरस (ओजसा) सम्पूर्ण बल और वेग के साथ (अनुसुतम्) हमने अनुक्रम से अभिषुत किया है। हे (गिर्वणः) वाणियों द्वारा संभजनीय और याचनीय देव ! आप (तु) शीघ्र ही (अस्य) इस मेरे भक्तिरस को और कर्मरस को (पिब) स्वीकार करें ॥१॥
भावार्थःहे परमेश्वर ! आप आध्यात्मिक और भौतिक सकल ऋद्धि-सिद्धियों के परम अधिपति हैं। आपके पास किसी वस्तु की कमी नहीं है, तो भी हमारे प्रति प्रेमाधिक्य के कारण ही आप हमारे प्रेमोपहार को स्वीकार करते हैं। हे देव ! आपके लिए हमने सम्पूर्ण बल के साथ भक्तिरस और कर्मरस तैयार किया है। उसे स्वीकार कर हमें अनुगृहीत कीजिए ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
म꣣हा꣡ꣳ इन्द्रः꣢꣯ पु꣣र꣡श्च꣢ नो महि꣣त्व꣡म꣢स्तु व꣣ज्रि꣡णे꣢ । द्यौ꣡र्न प्र꣢꣯थि꣣ना꣡ शवः꣢꣯ ॥१६६॥
पदार्थः(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान्, दुःखविदारक सुखशान्तिप्रदाता परमेश्वर वा राजा (महान्) अतिशय महान् है, (च) और वह (नः) हमारे (पुरः) समक्ष ही है। (वज्रिणे) उस न्यायदण्डधारी का (महित्वम्) महिमागान, जयजयकार (अस्तु) हो। (शवः) उसका बल (प्रथिना) विस्तार में (द्यौः न) विस्तीर्ण सूर्यप्रकाश के समान है ॥२॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःन्यायकारी, परमबली परमेश्वर और राजा का यशोगान करके स्वयं भी सबको न्यायकारी और बलवान् बनना चाहिए ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ तू न꣢꣯ इन्द्र क्षु꣣म꣡न्तं꣢ चि꣣त्रं꣢ ग्रा꣣भ꣡ꣳ सं गृ꣢꣯भाय । म꣣हाहस्ती꣡ दक्षि꣢꣯णेन ॥१६७॥
पदार्थःप्रथम—राजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली राजन् ! (महाहस्ती) बड़ी सूँडवाले हाथी के समान विशाल भुजावाले आप (तु) शीघ्र ही (दक्षिणेन) दाहिने हाथ से (नः) हमारे लिए अर्थात् हमें दान करने के लिए (क्षुमन्तम्) प्रशस्त अन्नों से युक्त (चित्रम्) आश्चर्यकारी (ग्राभम्) ग्राह्य धन को (आ) चारों ओर से (संगृभाय) संग्रह कीजिए ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! आप (तु) शीघ्र ही (नः) हमें देने के लिए (क्षुमन्तम्) भौतिक धन, अन्न आदि से युक्त (चित्रम्) अद्भुत (ग्राभम्) ग्राह्य अध्यात्मसम्पत्ति रूप धन को (संगृभाय) संगृहीत कीजिए, जैसे (महाहस्ती) विशाल भुजाओंवाला कोई मनुष्य (दक्षिणेन) अपने दाहिने हाथ से वस्तुओं का संग्रह करता है, अथवा, जैसे (महाहस्ती) प्रशस्त किरणोंवाला हिरण्यपाणि सूर्य (दक्षिणेन) अपने समृद्ध किरणजाल से भूमि पर स्थित जलों का संग्रह करता है अथवा जैसे (महाहस्ती) विशाल हाथी (दक्षिणेन) अपने बलवान् सूँड-रूप हाथ से विविध वस्तुओं का संग्रह करता है ॥३॥ इस मन्त्र श्लेषालङ्कार है। ‘महाहस्ती’ में लुप्तोपमा है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर और राजा सब प्रजाजनों को पुरुषार्थी करके प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न, विद्यावान्, धार्मिक और योगविद्या के ऐश्वर्य से युक्त करें ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ प्र गोप꣢꣯तिं गि꣣रे꣡न्द्र꣢मर्च꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ । सू꣣नु꣢ꣳ स꣣त्य꣢स्य꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥१६८॥
पदार्थःहे मनुष्य ! तू (गोपतिम्) सूर्य, पृथिवी आदि लोकों के अथवा राष्ट्रभूमि के स्वामी और पालनकर्ता, (सत्यस्य सूनुम्) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म के प्रेरक, (सत्पतिम्) सज्जनों के रक्षक एवं दुष्टों को दण्ड देनेवाले (इन्द्रम्) परमात्मा और राजा को (अभि) लक्ष्य करके (गिरा) वाणी से (प्र अर्च) भली-भाँति स्तुति कर अर्थात् इनके गुण-कर्मों का वर्णन कर, (यथा) जैसे वे (विदे) उस स्तुति को जान लें ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥४॥
भावार्थःमनुष्यों को योग्य है कि वे विविध गुणगणों से विभूषित परमेश्वर और राजा को लक्ष्य करके उनके यथार्थ गुण-कर्म-स्वभावों का ऐसा वर्णन करें कि वे उसे जान लें, क्योंकि स्तोतव्य की स्तुति तभी फलदायक होती है जब वह उसके अन्तःकरण को छू लेती है ॥४॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क꣡या꣢ नश्चि꣣त्र꣡ आ भु꣢꣯वदू꣣ती꣢ स꣣दा꣡वृ꣢धः꣣ स꣡खा꣢ । क꣢या꣣ श꣡चि꣢ष्ठया वृ꣣ता꣢ ॥१६९॥
पदार्थः(चित्रः) अद्भुत गुण-कर्म-स्वभाववाला वह इन्द्रनामक परमेश्वर और राजा (कया) कैसी अद्भुत (ऊती) रक्षा के द्वारा, और (कया) कैसी अद्भुत (शचिष्ठया) अतिशय बुद्धिपूर्ण (वृता) विद्यमान क्रिया के द्वारा (नः) हमारा (सदावृधः) सदा बढ़ानेवाला (सखा) सखा (आ भुवत्) बना हुआ है ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर अपनी विलक्षण रक्षा से और विलक्षण क्रियाशक्ति से सबकी रक्षा और उपकार करता है, वैसे ही राजा प्रजाजनों का रक्षण और उपकार करे ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्य꣡मु꣢ वः सत्रा꣣साहं꣣ वि꣡श्वा꣢सु गी꣣र्ष्वा꣡य꣢तम् । आ꣡ च्या꣢वयस्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१७०॥
पदार्थःहे स्तोता ! तू (सत्रासाहम्) जो सत्य को ही सहन करता है, असत्य को नहीं, अथवा जो सत्य से शत्रुओं को परास्त करता है, ऐसे (विश्वासु) सब (गीर्षु) वेदवाणियों में (आयतम्) विस्तीर्ण (त्यम्) उस इन्द्र नामक वीर परमेश्वर और राजा को (वः) वरण कर, स्वात्मशासन और राष्ट्रशासन के लिए चुन, और (ऊतये) रक्षा के लिए (आ च्यावयसि) स्वाभिमुख प्रेरित कर ॥६॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजैसे राष्ट्र की प्रगति और रक्षा के लिए सुयोग्य राजा को चुनना आवश्यक होता है, वैसे ही अपने आत्मा की प्रगति और रक्षा के लिए सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले परमात्मा को वरण करना चाहिए ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स꣡द꣢स꣣स्प꣢ति꣣म꣡द्भु꣢तं प्रि꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ का꣡म्य꣢म् । स꣣निं꣢ मे꣣धा꣡म꣢यासिषम् ॥१७१॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। मैं (अद्भुतम्) आश्चर्यमय गुण-कर्म-स्वभाववाले, (इन्द्रस्य) शरीर के अधिष्ठाता जीवात्मा के (प्रियम्) प्रिय, (काम्यम्) उपासकों के स्पृहणीय, (सनिम्) कृत पाप-पुण्य-रूप कर्मों के फलप्रदाता (सदसः पतिम्) हृदयरूप अथवा ब्रह्माण्डरूप यज्ञसदन के स्वामी परमात्मा से (मेधाम्) धारणावती बुद्धि को (अयासिषम्) माँगता हूँ ॥ द्वितीय—सभाध्यक्ष के पक्ष में। मैं (अद्भुतम्) अन्यों की अपेक्षा विशिष्ट गुण-कर्म-स्वभाववाले, इसीलिए (इन्द्रस्य) परमात्मा के (प्रियम्) प्रिय, (काम्यम्) सब प्रजाजनों द्वारा चाहने योग्य, (सनिम्) राष्ट्र में धन का संविभाग करनेवाले, प्रजाओं को सत्कर्मों का पुरस्कार देनेवाले और असत्कर्मों का यथायोग्य दण्ड देनेवाले (सदसः पतिम्) राष्ट्रसभा के अध्यक्ष राजा से (मेधाम्) विद्याप्रचार और धन की (अयासिषम्) याचना करता हूँ ॥ तृतीय—आचार्य के पक्ष में। मैं (अद्भुतम्) ज्ञान-विज्ञान के अद्भुत भण्डार, (इन्द्रस्य) विद्याप्रचारक राजा के (प्रियम्) प्रिय, (काम्यम्) सब विद्यार्थियों द्वारा चाहने योग्य, (सनिम्) विविध विद्याओं और व्रतों के दाता (सदसः पतिम्) विद्यार्थी-कुल के अध्यक्ष आचार्य से (मेधाम्) विद्याबोध की (अयासिषम्) याचना करता हूँ ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजो मनुष्य अद्भुत गुण-कर्म-स्वभाववाले, अद्भुत ज्ञानविज्ञान की राशि, न्यायकारी, प्रिय परमात्मा, सभाध्यक्ष राजा और आचार्य की शरण में जाते हैं, वे मेधावी, शास्त्रवेत्ता, पुण्यकर्ता और धनवान् होकर सुखी होते हैं ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ये꣢ ते꣣ प꣡न्था꣢ अ꣣धो꣢ दि꣣वो꣢꣫ येभि꣣꣬र्व्य꣢꣯श्व꣣मै꣡र꣢यः । उ꣣त꣡ श्रो꣢षन्तु नो꣣ भु꣡वः꣢ ॥१७२॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे इन्द्र ! लोकलोकान्तरों के व्यवस्थापक परमेश्वर ! (ये) जो (ते) आपके रचे हुए (पन्थाः) मार्ग (दिवः) द्युलोक के (अधः) नीचे, अन्तरिक्ष में हैं (येभिः) जिनसे (व्यश्वम्) बिना घोड़ों के चलनेवाले पृथिवी, चन्द्र, मंगल, बुध आदि ग्रहोपग्रहसमूह को (ऐरयः) आप चलाते हो, उन मार्गों को (नः) हमारी (भुवः) भूलोकवासी प्रजाएँ भी (श्रोषन्तु) सुनें, और सुनकर जानें ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे इन्द्र राजन् ! (ये) जो (ते) आपके निर्धारित (पन्थाः) आकाश-मार्ग (दिवः) द्युलोक से (अधः) नीचे अर्थात् भूमि, समुद्र और अन्तरिक्ष में हैं, (येभिः) जिन (व्यश्वम्) बिना घोड़ों से चलनेवाले भूयान, जलयान और विमानों को (ऐरयः) आप चलवाते हैं, उन भूमि-समुद्र-आकाश के मार्गों के विषय में (नः) हमारी (भुवः उत) जन्मधारी राष्ट्रवासी प्रजाएँ भी (श्रोषन्तु) वैज्ञानिकों के मुख से सुनें, और सुनकर भूयान, जलयान, विमान, कृत्रिम उपग्रह आदि के बनाने और चलाने की विद्या को भली-भाँति जानें ॥८॥ अन्तरिक्ष मार्गों का वर्णन अथर्ववेद के एक मन्त्र में इस प्रकार है—“जो विद्वान् लोगों के यात्रा करने योग्य बहुत से मार्ग द्युलोक और पृथिवीलोक के मध्य में बने हुए हैं, वे मुझे सुलभ हों, जिससे मैं उनसे यात्रा करके विदेशों में दूध-घी बेचकर धन इकट्ठा करके लाऊँ’’, (अथ० ३।१५।२)। समुद्र और अन्तरिक्ष में चलनेवाले यानों का वर्णन भी वेद में बहुत स्थलों पर मिलता है, जैसे “हे ब्रह्मचर्य द्वारा परिपुष्ट युवक ! जो तेरे लिए सोने जैसी उज्ज्वल नौकाएँ अर्थात् नौका जैसी आकृतिवाले जलपोत और विमान समुद्र में और अन्तरिक्ष में चलते हैं, उनके द्वारा यात्रा करके तू सूर्यपुत्री उषा के तुल्य ब्रह्मचारिणी कन्या को विवाह द्वारा प्राप्त करने के लिए जाता है’’ (ऋ० ६।५८।३)। बिना घोड़ों के चलनेवाले वेगवान् यान का वर्णन वेद में अन्यत्र भी है, यथा—“एक तीन पहियोंवाला रथ है, जिसमें न घोड़े जुते हैं, न लगामें हैं, जो बड़ा प्रशंसनीय है और जो आकाश में किसी लोक की परिक्रमा करता है” (ऋ० ४।३६।१) ॥
भावार्थःपरमेश्वर अन्तरिक्ष-मार्ग में सूर्य को और भूमण्डल-चन्द्रमा-मंगल-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनि आदि ग्रहोपग्रहों को जैसा चाहिए, वैसा उनकी धुरी पर या उनकी अपनी-अपनी कक्षाओं में संचालित करता है, और राष्ट्र का कुशल राजा भूयान, जलयान, विमान, कृत्रिम उपग्रह आदिकों को कुशल वैज्ञानिकों के द्वारा चलवाता है। तद्विषयक सारी विद्या राष्ट्रवासियों को पढ़नी-पढ़ानी और प्रयोग करनी चाहिए ॥८॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
भ꣣द्रं꣡भ꣢द्रं न꣣ आ꣢ भ꣣रे꣢ष꣣मू꣡र्ज꣢ꣳ शतक्रतो । य꣡दि꣢न्द्र मृ꣣ड꣡या꣢सि नः ॥१७३॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) अनन्त शुभ कर्मों को करनेवाले प्रभु ! तुम (भद्रंभद्रम्) भद्र-भद्र (इषम्) अन्न, धन, विज्ञान आदि और (ऊर्जम्) बल, प्राण, रस आदि (नः) हमारे लिए (आ भर) लाओ। (यत्) क्योंकि, हे (इन्द्र) दयानिधि परमात्मन् ! आप (नः) हमें (मृडयासि) सदा सुखी ही करते हो ॥९॥
भावार्थःमनुष्यों को भद्र-भद्र ही धन आदि का उपार्जन करके अपनी और दूसरों की उन्नति करनी चाहिए ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣢स्ति꣣ सो꣡मो꣢ अ꣣य꣢ꣳ सु꣣तः꣡ पि꣢꣯बन्त्यस्य म꣣रु꣡तः꣢ । उ꣣त꣢ स्व꣣रा꣡जो꣢ अ꣣श्वि꣡ना꣢ ॥१७४॥
पदार्थःहे मेरे आत्मारूप इन्द्र ! (अयम्) यह (सोमः) भक्तिरस, ज्ञानरस, कर्मरस वीरतारस या सेवा आदि का रस (सुतः) अभिषुत (अस्ति) है। (मरुतः) शरीर में प्राण तथा राष्ट्र में वीर क्षत्रिय जन (उत) और (स्वराजः) शरीर में अपने तेज से शोभायमान मन, बुद्धि, चित और अहंकार तथा राष्ट्र में अपने ब्रह्मवर्चस से देदीप्यमान ब्राह्मणजन और (अश्विना) शरीर में अपने-अपने विषय में व्याप्त होनेवाले ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय तथा राष्ट्र में कृषि-व्यापार एवं शिल्प में व्याप्त होनेवाले वैश्य और शिल्पकार लोग (अस्य) इस पूर्वोक्त सोम रस का (पिबन्ति) यथायोग्य पान करते हैं ॥१०॥ इस मन्त्र मेंश्लेष अलङ्कार है॥१०॥
भावार्थःशरीर में मन, बुद्धि, आत्मा, प्राण एवं इन्द्रिय रूप देव तथा राष्ट्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शिल्पी रूप देव यथायोग्य भक्ति, ज्ञान, कर्म, वीरता, सेवा आदि के सोमरसों का पान करके ही जीवन-संग्राम में सफल होते हैं ॥१०॥ इस दशति में इन्द्रनामक परमेश्वर के प्रति सोम अभिषुत करने का, परमेश्वर की महिमा का और उससे समृद्धि, मेधा आदि की याचना का वर्णन होने से और परमेश्वर की अर्चना के लिए प्रेरणा होने से तथा उसके अधीन रहनेवाले अन्य शारीरिक एवं राष्ट्रिय देवों के सोमपान का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय—प्रपाठक में द्वितीय—अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ द्वितीय—अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ई꣣ङ्ख꣡य꣢न्तीरप꣣स्यु꣢व꣣ इ꣡न्द्रं꣢ जा꣣त꣡मुपा꣢꣯सते । व꣣न्वाना꣡सः꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥१७५॥
पदार्थः(ईङ्खयन्तीः) हर्ष से उछलती हुई, (अपस्युवः) कर्म करने की अभिलाषावाली प्रजाएँ (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीर्य से युक्त ऐश्वर्य की (वन्वानासः) चाहना या याचना करती हुईं (जातम् इन्द्रम्) हृदय में प्रादुर्भूत परमेश्वर की (उपासते) उपासना करती हैं, अथवा (जातम् इन्द्रम्) निर्वाचित तथा अभिषिक्त राजा का (उपासते) अभिनन्दन व सेवन करती हैं ॥१॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःराष्ट्र की प्रजाएँ ऐश्वर्य-प्राप्ति के लिए जैसे राजा का सेवन करती हैं, वैसे ही उन्हें भौतिक तथा आध्यात्मिक सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
न꣡कि꣢ देवा इनीमसि꣣ न꣡ क्या यो꣢꣯पयामसि । म꣣न्त्र꣡श्रु꣢त्यं चरामसि ॥१७६॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन् अथवा हे इन्द्र राजन् ! (देवाः) हे दिव्य ज्ञान और दिव्य आचरणवाले विद्वज्जनो ! हम (नकि) न तो (इनीमसि) हिंसा करते हैं (नकि) और न ही (आ योपयामसि) छल-छ्द्म करते हैं, अपितु (मन्त्रश्रुत्यम्) वेदमन्त्रों में निर्दिष्ट कर्त्तव्य का ही (चरामसि) पालन करते हैं और करते रहेंगे ॥२॥ इस मन्त्र में तीनों क्रियापदों का एक कारक से सम्बन्ध होने के कारण दीपकालङ्कार है। ‘मसि’ की तीन बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥२॥
भावार्थःसब मनुष्यों को हिंसा, उपद्रव, चोरी आदि और छल-कपट-ठगी आदि छोड़कर वेदों के अनुसार पवित्र जीवन बिताना चाहिए ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
दो꣣षो꣡ आगा꣢꣯द्बृ꣣ह꣡द्गा꣢य꣣ द्यु꣡म꣢द्गामन्नाथर्वण । स्तु꣣हि꣢ दे꣣व꣡ꣳ स꣢वि꣣ता꣡र꣢म् ॥१७७॥
पदार्थःहे (द्युमद्गामन्) विद्यादिसद्गुणों से प्रकाशित आचरणवाले (आथर्वण) अचंचल वृत्तिवाले अतिशय स्थितप्रज्ञ विद्वन् ! देख, (दोषा उ) अज्ञान, मोह, दुर्व्यसन, दुराचार आदि की अँधियारी रात (अगात्) आ गयी है, इसलिए तू (बृहत्) बहुत अधिक (गाय) गान कर अर्थात् सदुपदेश, शुभ शिक्षा आदि के द्वारा धर्मवाणी को फैला, (देवम्) प्रकाशमय और प्रकाशक (सवितारम्) सद्विद्या आदि के प्रेरक इन्द्र प्रभु की (अर्च) अर्चना कर, अथवा (सवितारम्) सद्विद्या आदि के प्रेरक इन्द्र राजा को (अर्च) उद्बोधन दे । इस ऋचा का देवता इन्द्र होने से ‘सविता’ यहाँ इन्द्र का ही विशेषण जानना चाहिए ॥३॥
भावार्थःजैसे गगन में उदित हुआ सूर्य अपनी किरणों से घनघोर अन्धकारवाली रात्रि को हटाकर सर्वत्र प्रकाश फैला देता है, वैसे ही मनुष्यों के हृदयों में प्रकट हुआ परमात्मा और राष्ट्र में राजा के पद पर अभिषिक्त हुआ वीर मनुष्य सर्वत्र व्याप्त अधर्म, अज्ञान, दुश्चरित्रता, दुराचार आदि की काली रात को विदीर्ण कर धर्म, विद्या, सच्चरित्रता आदि के उज्ज्वल प्रकाश को चारों ओर फैला देता है। अतः विद्वानों को चाहिए कि वे उस परमात्मा और राजा की उनके गुणों के वर्णन द्वारा पुनः पुनः स्तुति करें ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ए꣣षो꣢ उ꣣षा꣡ अपू꣢꣯र्व्या꣣꣬ व्यु꣢꣯च्छति प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣡ वा꣢मश्विना बृ꣣ह꣢त् ॥१७८॥
पदार्थः(एषा उ) यह (अपूर्व्या) अपूर्व, (प्रिया) प्रिय (उषाः) उषा के समान प्रकाशमयी धर्म, विद्या आदि की ज्योति (दिवः) द्युतिमान् (इन्द्र) अर्थात् परमेश्वर, आचार्य या राजा के पास से उत्पन्न होकर (व्युच्छति) अधर्म, अज्ञान आदि रूप अन्धकार को विदीर्ण कर छिटक रही है। (अश्विना) हे प्राकृतिक उषा से प्रकाशित द्यावापृथिवी के समान धर्म, ज्ञान आदि से प्रकाशित स्त्री-पुरुषो ! मैं (वाम्) तुम्हारी (बृहत्) बहुत अधिक (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥४॥
भावार्थःपहले मन्त्र में रात्रि को दूर करने की प्रार्थना की गयी थी। सौभाग्य से उस हृदय-व्यापिनी राष्ट्रव्यापिनी और विश्वव्यापिनी अधर्मरूपिणी या अविद्यारूपिणी रात्रि को हटाकर दिव्य प्रकाशमयी धर्मरूपिणी या विद्यारूपिणी उषा प्रकट हो गयी है। जैसे प्राकृतिक उषा के प्रादुर्भाव से द्यावापृथिवी प्रकाश से भर जाते हैं, वैसे ही इस, विद्या, सच्चरित्रता, आध्यात्मिकता आदि की ज्योति से परिपूर्ण दिव्य उषा के प्रकाश से स्त्री-पुरुष-रूप द्यावापृथिवी दिव्य दीप्ति से देदीप्यमान हो उठे हैं ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रो꣢ दधी꣣चो꣢ अ꣣स्थ꣡भि꣢र्वृ꣣त्रा꣡ण्यप्र꣢꣯तिष्कुतः । ज꣣घा꣡न꣢ नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥१७९॥
पदार्थः(अप्रतिष्कुतः) आन्तरिक देवासुर-संग्राम में असुरों से प्रतिकार न किया गया अथवा असुरों के मुकाबले में पराजित न होता हुआ (इन्द्रः) बलवान् जीवात्मा व परमात्मा (दधीचः) ध्यान में संलग्न मन को (अस्थभिः) अस्थि-तुल्य सुदृढ़ सात्त्विक वृत्तियों से (नवतीः नव) निन्यानवे (वृत्राणि) घेरनेवाले निशाचरों को (जघान) नष्ट कर देता है। निन्यानवे निशाचर हैं—दस इन्द्रियाँ, दस प्राण, आठ चक्र, अन्तःकरणचतुष्टय और शरीर—इन तैंतीस साधनों से भूतकाल में किये गये, वर्तमान में किये जा रहे तथा भविष्य में किये जानेवाले पाप। उन सबको जीवात्मा और परमात्मा सावधान मन की सात्त्विक वृत्तियों से नष्ट कर देते हैं ॥५॥
भावार्थःपूर्व के दो मन्त्रों में रात्रि का और उसके निवारणार्थ उषा के प्रादुर्भाव का क्रमशः वर्णन किया गया था। इस मन्त्र में रात्रियों में उत्पन्न होनेवाले निशाचरों के विनाश का वर्णन है कि इन्द्र दध्यङ् की हड्डियों से उन्हें मार देता है। यह इन्द्र मनुष्य के शरीर में विद्यमान जीवात्मा और हृदय में स्थित परमात्मा है। दध्यङ् मन है। उस मन की सात्त्विक वृत्ति रूप हड्डियों से उन निशाचरों का वध हो जाता है ॥५॥ इस मन्त्र की व्याख्या में विवरणकार माधव ने इस प्रकार इतिहास प्रदर्शित किया है—“कालकंज नामक असुर थे। उन असुरों से सताये जाते हुए देव ब्रह्मा के समीप पहुँचकर बोले—भगवन्, कालकंज असुर हमें सता रहे हैं, उनके मारने का उपाय कीजिए। यह सुनकर उसने देवों को कहा—दधीचि नाम का ऋषि है, उसके पास जाकर उसे कहो, वह मारने का उपाय कर देगा। यह सुनकर वे वैसा ही करना स्वीकार करके उस दधीचि के समीप पहुँचकर बोले—भगवन्, हमारे अस्त्रों को असुरों का पुरोहित शुक्र चुरा लेता है, उससे उनकी रक्षा कीजिए। उस ऋषि ने उनसे कहा कि इन अस्त्रों को मेरे मुख में डाल दो। तब मरुद्गणों सहित इन्द्र आदि देवों ने अस्त्र उसके मुख में डाल दिये। फिर समय आने पर जब देवासुरसंग्राम उपस्थित हुआ तब ऋषि के पास पहुँच देव बोले—भगवन्, अब वे अस्त्र हमें दे दीजिए। तब ऋषि ने कहा—वे तो पच गये। अब वे पुनः नहीं मिल सकते। तब प्रजापति आदि देव बोले—भगवन्, प्राणत्याग कर दीजिए। यह सुनकर उसने प्राणत्याग कर दिया। तब दधीचि की अस्थियों से इन्द्र ने वृत्रों का वध किया ।” सायण ने शाट्यायनियों का उल्लेख करते हुए उनके नाम से यह इतिहास लिखा है—अथर्वा के पुत्र दधीचि जब जीवित थे तब उनके देखने से ही असुर पराजित हो जाते थे। फिर जब वे स्वर्गवासी हो गये तब भूमि असुरों से भर गयी। तब इन्द्र ने उन असुरों से युद्ध करने में स्वयं को असमर्थ पाकर जब उस ऋषि की खोज की तब उसने सुना कि वे तो स्वर्ग चले गये। तब वहाँ के लोगों से पूछा कि क्या उन ऋषि का कोई अङ्ग बचा हुआ है? उन लोगों ने उसे बतलाया कि उसका घोड़ेवाला सिर अवशिष्ट है, जिस सिर से उसने अश्वि देवों को मधुविद्या का प्रवचन किया था, पर हम यह नहीं जानते कि वह कहाँ है। तब इन्द्र ने उसने कहा कि उसे खोजो। उन्होंने उसे खोजा और शर्यणावत् सरोवर में, जो कुरुक्षेत्र के जघनार्ध में प्रवाहित होता है, उसे पाकर ले आये। उसके सिर की अस्थियों से इन्द्र ने असुरों का वध किया। कुछ नवीन पात्रों को कल्पित कर पुराण, महाभारत आदियों में भी कुछ-कुछ भेद से इस प्रकार की कथाएँ वर्णित हैं। ये सब कथाएँ इसी मन्त्र को आधार बनाकर रची गयी हैं। वे वास्तविक नहीं, अपितु आलङ्कारिक ही जाननी चाहिएँ। आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक क्षेत्रों में सर्वत्र ही देवासुरसंग्राम चल रहा है। मनुष्य के मन में दिव्य प्रवृत्तियों और आसुरी प्रवृत्तियों का संग्राम आध्यात्मिक क्षेत्र का संग्राम है, जैसा हमारे द्वारा कृत इस मन्त्र की व्याख्या में स्पष्ट है। इन्द्र परमेश्वर दध्यङ् सूर्य की अस्थियों से अर्थात् अस्थिसदृश किरणों से मेघों का और रोग आदियों का वध करता है, यह अधिदैवत व्याख्या है। इन्द्र राजा दध्यङ् सेनापति की अस्थियों अर्थात् अस्थियों के समान सुदृढ़ शस्त्रास्त्रों से शत्रुओं का संहार करता है, यह अधिभूत व्याख्या है। वेदों में दध्यङ् नाम के किसी ऐतिहासिक मुनिविशेष की गाथा का होना तो संभव ही नहीं है, क्योंकि वेद सभी ऐतिहासिक मुनियों से पूर्व ही विद्यमान थे और पूर्ववर्ती वेद में परवर्तियों का इतिहास कैसे हो सकता है? ऋषि दयानन्द ने ऋग्भाष्य (ऋ० १।८४।१३) में इस मन्त्र की व्याख्या में सूर्य के दृष्टान्त से सेनापति का कृत्य वर्णित किया है। वहाँ उन द्वारा प्रदर्शित भावार्थ यह है—“यहाँ वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। मनुष्यों को उसे ही सेनापति बनाना चाहिए जो सूर्य के समान दुष्ट शत्रुओं का हन्ता और अपनी सेना का रक्षक हो ॥”
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢꣯न्द्रेहि꣣ म꣡त्स्यन्ध꣢꣯सो꣡ वि꣡श्वे꣢भिः सोम꣣प꣡र्व꣢भिः । म꣣हा꣡ꣳ अ꣢भि꣣ष्टि꣡रोज꣢꣯सा ॥१८०॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) दुर्गुणों को विदीर्ण तथा सद्गुणों को प्रदान करनेवाले परमेश्वर ! आप (आ इहि) हमारे जीवन-यज्ञ में आइए, (अन्धसः) हमारे पुरुषार्थरूप अन्न से तथा (विश्वेभिः) सब (सोमपर्वभिः) भक्ति-समारोहों से (मत्सि) प्रसन्न होइए। आप (महान्) महान् और (ओजसा) बल से (अभिष्टिः) हमारे कामादि रिपुओं के प्रति आक्रमण करनेवाले हो ॥ द्वितीय—विद्वान् के पक्ष में। हे (इन्द्र) विद्यारूप ऐश्वर्य से युक्त विद्वन् ! आप (आ इहि) आइए, (अन्धसः) सात्त्विक अन्न से, तथा (विश्वेभिः) सब (सोमपर्वभिः) बल बढ़ानेवाली सोम आदि ओषधियों के खण्डों से (मत्सि) तृप्त होइए। आप (महान्) गुणों में महान्, तथा (ओजसा) विद्याबल से (अभिष्टिः) अभीष्ट प्राप्त करानेवाले और समाज के अविद्या, दुराचार आदि दुर्गुणों पर आक्रमण करनेवाले, बनिए ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजैसे पुरुषार्थ और भक्ति से प्रसन्न किया गया परमेश्वर मनुष्यों के काम, कोध्र, हिंसा, उपद्रव आदि सब शत्रुओं को क्षण भर में ही विनष्ट कर देता है, वैसे ही विद्वान् मनुष्य को चाहिए कि वह सात्त्विक एवं पुष्टिप्रद अन्न, ओषधि आदि से परिपुष्ट होकर राष्ट्र से अविद्या आदि दुर्गुणों का शीघ्र ही विनाश करे ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ तू꣢꣯ न इन्द्र वृत्रहन्न꣣स्मा꣢क꣣म꣢र्ध꣣मा꣡ ग꣢हि । म꣣हा꣢न्म꣣ही꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ ॥१८१॥
पदार्थःहे (वृत्रहन्) अविद्या, विघ्न, दुःख, पाप आदिकों के विनाशक (इन्द्र) परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! आप (तु) शीघ्र ही (नः) हमारे समीप (आ) आइए। आप (अस्माकम्) हम स्तोताओं व शिष्यों के (अर्धम्) अपूर्ण जीवन में (आ गहि) आइए। आप (महीभिः) अपनी महान् रक्षाओं से (महान्) महान् हैं ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘महा, मही’ में छेकानुप्रास है ॥७॥
भावार्थःअपूर्ण, बहुत से दोषों से युक्त, विविध विघ्नों से प्रताड़ित मनुष्य अपने जीवन में परमात्मा, राजा और गुरु की सहायता से ही उन्नति कर सकता है ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ओ꣢ज꣣स्त꣡द꣢स्य तित्विष उ꣣भे꣢꣫ यत्स꣣म꣡व꣢र्तयत् । इ꣢न्द्र꣣श्च꣡र्मे꣢व꣣ रो꣡द꣣सी ॥१८२॥
पदार्थः(तत्) वह (अस्य) इस इन्द्र परमेश्वर का (ओजः) ओज अर्थात् महान् बल और तेज (तित्विषे) प्रकाशित हो रहा है, (यत्) जो कि (इन्द्रः) वह शक्तिशाली परमेश्वर (उभे) दोनों (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (चर्म इव) मृगछाला के आसन के समान (समवर्तयत्) सृष्टिकाल में फैलाता है और प्रलयकाल में समेट लेता है ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजैसे कोई योगी सन्ध्योपासना के लिए मृगछाला के आसन को बिछाता है और सन्ध्योपासना समाप्त करके उसे समेट लेता है, वैसे ही परमात्मा अपने ओज से सृष्ट्युत्पत्ति के समय सब जगत् को फैलाता है और प्रलय के समय समेट लेता है ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣य꣡मु꣢ ते꣣ स꣡म꣢तसि क꣣पो꣡त꣢ इव गर्भ꣣धि꣢म् । व꣢च꣣स्त꣡च्चि꣢न्न ओहसे ॥१८३॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन् ! (अयम्) यह उपासक (उ) सचमुच (तव) तेरा ही है, जिसके पास तू (समतसि) पहुँचता है, (कपोतः) कबूतर (इव) जैसे (गर्भधिम्) अण्डों से नये निकले हुए बच्चों के आवास-स्थान घोंसले में पहुँचता है। (तत् चित्) इसी कारण, (नः) हमारे (वचः) स्नेहमय स्तुति-वचन को, तू (ओहसे) स्वीकार करता है ॥९॥ यास्काचार्य ने इस मन्त्र के प्रथम पाद को ‘उ’ के पदपूरक होने के उदाहरणस्वरूप उद्धृत किया है। निरु० १।१०। इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःजैसे कबूतर घोंसले में स्थित शिशुओं के पालन के लिए घोंसले में जाता है, वैसे ही परमेश्वर अपने शिशु उपासकों के पालन के लिए उनके पास जाता है। और, जैसे कबूतर अपने शिशुओं के शब्द को उत्कण्ठापूर्वक सुनता है, वैसे ही परमेश्वर स्तोताओं के स्तुतिवचन को प्रेमपूर्वक सुनता है ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
वा꣢त꣣ आ꣡ वा꣢तु भेष꣣ज꣢ꣳ श꣣म्भु꣡ म꣢यो꣣भु꣡ नो꣢ हृ꣣दे꣢ । प्र꣢ न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि तारिषत् ॥१८४॥
पदार्थः(वातः) वायु को चलानेवाला, इन्द्र परमेश्वर, अथवा परमेश्वर द्वारा रचित वायु और प्राण (भेषजम्) औषध को (आ वातु) प्राप्त कराये, (यत्) जो (नः) हमारे (हृदे) हृदय के लिए (शम्भु) रोगों का शमन करनेवाला, और (मयोभु) सुखदायक हो। वह परमेश्वर, वायु और प्राण (नः) हमारे (आयूंषि) आयु के वर्षों को (प्रतारिषत्) बढ़ाये ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘वात, वातु’ में छेकानुप्रास है ॥१०॥
भावार्थःईश्वरप्रणिधानपूर्वक प्राणायाम करने से चित की शुद्धि, हृदय का बल, शरीर का आरोग्य और दीर्घायुष्य प्राप्त होते हैं। इस दशति में इन्द्र परमेश्वर की सहायता से अविद्या, अधर्म के अन्धकार से पूर्ण रात्रि के निवारण का, दिव्य उषा के प्रादुर्भाव का, इन्द्र द्वारा वृत्र के संहार का, परमात्मा, वायु और प्राण से औषध-प्राप्ति का और यथायोग्य राजा एवं आचार्य के भी योगदान का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ द्वितीय प्रपाठक में द्वितीय—अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡ꣳ रक्ष꣢꣯न्ति꣣ प्र꣡चे꣢तसो꣣ व꣡रु꣢णो मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣢ । न꣢ किः꣣ स꣡ द꣢भ्यते꣣ ज꣡नः꣢ ॥१८५॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्मपक्ष में। ऋचा का देवता इन्द्र होने से इन्द्र को सम्बोधन अपेक्षित है। हे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! (यम्) जिस मनुष्य की (प्रचेतसः) हृदय में सदा जागनेवाले (वरुणः) पाप-निवारण का गुण, (मित्रः) मित्रता का गुण और (अर्यमा) न्यायकारिता का गुण (रक्षन्ति) विपत्तियों से बचाते तथा पालते हैं, (सः) वह (जनः) मनुष्य (नकिः) कभी नहीं (दभ्यते) हिंसित होता है ॥ द्वितीय—राष्ट्रपक्ष में। (यम्) जिस राजा की (प्रचेतसः) प्रकृष्ट चित्तवाले, प्रकृष्ट विज्ञानवाले, सदा जागरूक (वरुणः) पाशधारी, शस्त्रास्त्रों से युक्त, शत्रुनिवारक, सेनापति के पद पर चुना गया सेनाध्यक्ष, (मित्रः) देश-विदेश में मित्रता के संदेश को फैलानेवाला मैत्रीसचिव, और (अर्यमा) न्यायाधीश वा न्यायमन्त्री (रक्षन्ति) रक्षा करते हैं, (सः) वह (जनः) राजा (नकिः) कभी भी किसी से नहीं (दभ्यते) पराजित या हिंसित होता है ॥१॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि पाप-निवारण, मैत्री तथा न्याय के गुणों को अपने हृदय में धारण करें, और राजा को चाहिए कि वह अपने राष्ट्र में सेनाध्यक्ष, मैत्रीसचिव, न्यायाधीश आदि के विविध पदों पर सुयोग्य जनों को ही नियुक्त करे, जिससे शत्रुओं का उच्छेद और प्रजा का उत्कर्ष निरन्तर सिद्ध होते रहें ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ग꣣व्यो꣢꣫ षु णो꣣ य꣡था꣢ पु꣣रा꣢श्व꣣यो꣡त र꣢꣯थ꣣या꣢ । व꣣रिवस्या꣢ म꣣हो꣡ना꣢म् ॥१८६॥
पदार्थःहे इन्द्र ! परमैश्वर्यशाली परब्रह्म परमात्मन् और राजन् ! आप (गव्या) गायों, भूमियों, वाक्शक्तियों, विद्युद्विद्याओं और अध्यात्मप्रकाश की किरणों को प्रदान करने की इच्छा से (उ सु) और (अश्वया) घोड़ों, प्राण-बलों, अग्नि तथा सूर्य की विद्याओं को प्रदान करने की इच्छा से, (उत) और (रथया) भूमि, जल व अन्तरिक्ष में चलनेवाले यानों एवं मानव-देह-रूप रथों को प्रदान करने की इच्छा से, तथा (महोनाम्) हम महानों को (वरिवस्या) धन प्रदान करने की इच्छा से (यथा पुरा) पहले के समान अब भी (नः) हमारे पास आइये ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से, राजा की सुव्यवस्था से और अपने पुरुषार्थ से मनुष्यों को दुधारू गौएँ, बलवान् घोड़े, तेल-गैस-बिजली-सूर्यताप आदि से चलाये जानेवाले भूमि, जल और अन्तरिक्ष में चलनेवाले यान, वाणी का बल, प्राण-बल, अग्नि-वायु-बिजली एवं सूर्य की विद्याएँ, अध्यात्म-प्रकाश और चक्रवर्ती राज्य प्राप्त करने चाहिएँ ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣मा꣡स्त꣢ इन्द्र꣣ पृ꣡श्न꣢यो घृ꣣तं꣡ दु꣢हत आ꣣शि꣡र꣢म् । ए꣣ना꣢मृ꣣त꣡स्य पि꣣प्यु꣡षीः꣢ ॥१८७॥
पदार्थःप्रथम—यज्ञ के पक्ष में। हे (इन्द्र) गोपालक यजमान ! (ऋतस्य) यज्ञ की (पिप्युषीः) बढ़ानेवाली (इमाः) ये (ते) तेरी (पृश्नयः) यज्ञ के उपयोग में आनेवाली अनेक रंगोंवाली गायें (घृतम्) घी और (एनाम् आशिरम्) इस दूध को (दुहते) प्रदान करती हैं ॥ द्वितीय—अध्यात्म-पक्ष में। हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (ऋतस्य) सत्य का (पिप्युषीः) पान करानेवाली (इमाः) ये (पृश्नयः) वेद-माताएँ (ते) तेरे लिए (घृतम्) तेज-रूप घी को अर्थात् ब्रह्मवर्चस को और (एनाम् आशिरम्) इस परिपक्व आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, विद्या आदि के दूध को (दुहते) प्रदान करती हैं ॥ तृतीय—वर्षा के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमात्मन् ! (इमाः) ये (ते) आपकी रची हुई (पृश्नयः) रंग-बिरंगी मेघमालाएँ (आशिरम्) सूर्य के ताप से भाप बने हुए (घृतम्) जल को (दुहते) बरसाती हैं और (एनाम्) इस भूमि को (ऋतस्य) वृष्टिजल का (पिप्युषीः) पान करानेवाली होती हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे यजमान की गायें यज्ञार्थ घी और दूध देती हैं, मेघमालाएँ खेती आदि के लिए वर्षाजल-रूप दूध बरसाती हैं, वैसे ही वेद-माताएँ जीव के लिए ब्रह्मवर्चस-रूप घी और आयु-प्राण आदि रूप दूध देती हैं ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣या꣢ धि꣣या꣡ च꣢ गव्य꣣या꣡ पु꣢꣯रुणामन्पुरुष्टुत । य꣡त्सोमे꣢꣯सोम꣣ आ꣡भु꣢वः ॥१८८॥
पदार्थःहे (पुरुणामन्) सर्वान्तर्यामिन् एवं वेदों में शक्र, वृत्रहा, मघवान्, शचीपति आदि अनेक नामों से वर्णित, (पुरुष्टुत) बहुस्तुत इन्द्र परमात्मन् ! (अया) इस (गव्यया) आत्मा-रूप सूर्य की किरणों को पाने की कामनावाली (धिया) बुद्धि तथा ध्यान-शृङ्खला से (च) ही, यह संभव है (यत्) कि, आप (सोमेसोमे) हमारे प्राण-प्राण में, प्रत्येक श्वास में (आभुवः) व्याप्त हो जाओ ॥४॥
भावार्थःयदि हम तमोगुण से ढकी हुई आत्मसूर्य की किरणों को निश्चयात्मक बुद्धि और ध्यान से पुनः पाने का यत्न करें, तभी यह संभव है कि परमेश्वर हमारे प्राण-प्राण में, श्वास-श्वास में और रोम-रोम में व्याप्त हो जाए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
पा꣣वका꣢ नः꣣ स꣡र꣢स्वती꣣ वा꣡जे꣢भिर्वा꣣जि꣡नी꣢वती । य꣣ज्ञं꣡ व꣢ष्टु धि꣣या꣡व꣢सुः ॥१८९॥
पदार्थःप्रथम—वेदवाणी के पक्ष में। ऋचा का देवता इन्द्र होने से इन्द्र को सम्बोधन किया जाना चाहिए। हे इन्द्र परमेश्वर ! आपकी (वाजिनीवती) क्रियामयी अथवा कर्म का उपदेश देनेवाली (सरस्वती) ज्ञानमयी वेदवाणी (वाजेभिः) विज्ञान-रूप बलों से (नः) हमें (पावका) पवित्र करनेवाली हो। (धियावसुः) ज्ञान और कर्म के उपदेश से बसानेवाली वह (यज्ञम्) हमारे जीवन-यज्ञ को (वष्टु) भली-भाँति चलाये, संस्कृत करे ॥ द्वितीय—गुरुओं की वाणी के पक्ष में। गुरुजन कामना कर रहे हैं। हे इन्द्र परमात्मन् ! आपकी कृपा से (नः) हमारी (वाजिनीवती) विद्या से पूर्ण (सरस्वती) वाणी (वाजेभिः) सदाचार-रूप धनों से (पावका) शिष्यों को पवित्र करनेवाली हो। (धियावसुः) बुद्धिपूर्वक शिष्यों में ज्ञान को बसानेवाली वह (यज्ञम्) शिक्षा-रूप यज्ञ का (वष्टु) भलीभाँति वहन करे ॥ तृतीय—विदुषी के पक्ष में। हे (इन्द्र) ! हे विद्वान् गृहपति ! (वाजिनीवती) क्रियाशील (सरस्वती) विदुषी माता (वाजेभिः) सात्त्विक, स्वास्थ्यकर अन्न आदि भोज्य पदार्थों, बल-प्रदानों और सदाचार की शिक्षाओं से (नः) हम सन्तानों के (पावका) शरीर और मन को पवित्र करनेवाली हो। (धियावसुः) बोध-प्रदान के द्वारा बसानेवाली वह (यज्ञम्) गृहस्थ-यज्ञ को (वष्टु) वहन करने की कामना रखे ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर की वेदवाणी श्रोताओं का हित-साधन करती है, और जैसे गुरुओं की वाणी शिष्यों का हित-साधन करती है, वैसे ही विदुषी माताएँ सन्तानों का हित सिद्ध करें ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क꣢ इ꣣मं꣡ नाहु꣢꣯षी꣣ष्वा꣢꣫ इन्द्र꣣ꣳ सो꣡म꣢स्य तर्पयात् । स꣢ नो꣣ व꣢सू꣣न्या꣡ भ꣢रात् ॥१९०
पदार्थः(नाहुषीषु) मानवीय प्रजाओं में (कः) कौन धन्य मनुष्य (इमम्) इस, गुणों के आधार (इन्द्रम्) परमात्मा, राजा, आचार्य एवं अतिथि आदि को (सोमस्य) सोम से अर्थात् श्रद्धा-रस, ज्ञान-रस, उपासना-रस, कर्म-रस, ब्रह्म-रस, क्षत्र-रस, ब्रह्मचर्य-रस, धर्म-रस, कीर्त-रस आदि से (आ तर्पयात्) चारों ओर से तृप्त करेगा, जिससे (सः) तृप्त किया हुआ वह (नः) हमारे लिए (वसूनि) सब प्रकार के ऐश्वर्यों को (आ भरात्) लाये ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना, श्रद्धा, ज्ञान-संग्रह, कर्म, ब्रह्मचर्य, तपस्या, श्रम, धर्म, वैराग्य, व्रत-पालन आदि श्रेष्ठ आचारों से ही परमात्मा, राजा, आचार्य आदि प्रसन्न होते हैं और प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करते हैं ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ या꣢हि सुषु꣣मा꣢꣫ हि त꣣ इ꣢न्द्र꣣ सो꣢मं꣣ पि꣡बा꣢ इ꣣म꣢म् । ए꣢꣫दं ब꣣र्हिः꣡ स꣢दो꣣ म꣡म꣢ ॥१९१॥
पदार्थः(आयाहि) आइए, (ते) आपके लिए, हमने (सुषुम हि) सोमरस को अभिषुत किया है, अर्थात् श्रद्धा, ज्ञान, कर्म, उपासना आदि के रस को निष्पादित किया है। हे (इन्द्र) परमात्मन्, राजन्, आचार्य, अतिथिप्रवर ! (इमम्) इस हमारे द्वारा समर्पित किए जाते हुए (सोमम्) श्रद्धा, ज्ञान, कर्म, उपासना, राजदेय कर, सोम ओषधि आदि के रस को (पिब) पीजिए। (इदम्) इस (मम) मेरे (बर्हिः) हृदयासन, राज्यासन अथवा कुशा के आसन पर (आ सदः) बैठिए ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि वे हृदय में परमात्मा को प्रकाशित कर उसकी पूजा करें और राजा, आचार्य, उपदेशक, संन्यासी आदि को बुलाकर यथायोग्य उनका सत्कार करें ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
म꣡हि꣢ त्री꣣णा꣡मव꣢꣯रस्तु द्यु꣣क्षं꣢ मि꣣त्र꣡स्या꣢र्य꣣म्णः꣢ । दु꣣राध꣢र्षं꣣ व꣡रु꣢णस्य ॥१९२॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म और अधिदैवत पक्ष में। ऋचा का देवता इन्द्र होने से इन्द्र को सम्बोधन अपेक्षित है। हे इन्द्र परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर ! आपकी कृपा से (मित्रस्य) अकाल-मृत्यु से रक्षा करनेवाले वायु और जीवात्मा का, (अर्यम्णः) अपने आकर्षण से पृथिवी आदि लोकों का नियन्त्रण करनेवाले सूर्यलोक का तथा इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखनेवाले मन का, और (वरुणस्य) आच्छादक मेघ का तथा प्राण का, (त्रीणाम्) इन तीनों का (महत्) महान्, (द्युक्षम्) तेज को निवास करानेवाला और (दुराधर्षम्) दुष्पराजेय, दृढ़ (अवः) रक्षण (अस्तु) हमें प्राप्त हो ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (इन्द्र) प्रजा के कष्टों को दूर करने तथा सुख प्रदान करनेवाले राजन् ! आपकी व्यवस्था से (मित्रस्य) सबके मित्र शिक्षाध्यक्ष का, (अर्यम्णः) श्रेष्ठों और दुष्टों के साथ यथायोग्य व्यवहार करनेवाले न्यायाध्यक्ष का, और (वरुणस्य) पाशधारी, शस्त्रास्त्रयुक्त, धनुर्वेद में कुशल सेनाध्यक्ष का, (त्रीणाम्) इन तीनों का (महि) महान्, (द्युक्षम्) राजनीति के प्रकाश से पूर्ण, (दुराधर्षम्) दुष्पराजेय (अवः) रक्षण (अस्तु) हम प्रजाजनों को प्राप्त हो ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःपरमात्मा के अनुशासन में शरीरस्थ आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदि और बाह्य सूर्य, पवन, बादल आदि तथा राजा के अनुशासन में सब राजमन्त्री एवं अन्य राज्याधिकारी अपना-अपना रक्षण आदि हमें प्रदान करें, जिससे हम उत्कर्ष के लिए प्रयत्न करते हुए समस्त प्रेय और श्रेय को प्राप्त कर सकें ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्वा꣡व꣢तः पुरूवसो व꣣य꣡मि꣢न्द्र प्रणेतः । स्म꣡सि꣢ स्थातर्हरीणाम् ॥१९३॥
पदार्थःहे (पुरूवसो) बहुत धनी, (प्रणेतः) उत्कृष्ट नेता, (हरीणाम्) आकर्षणगुणयुक्त पृथिवी-सूर्य आदि लोकों के, अथवा विषयों की ओर ले जानेवाली इन्द्रियों के, अथवा सवारी देनेवाले विमान आदि यानों के (स्थातः) अधिष्ठाता (इन्द्र) परमात्मन्, जीवात्मन् व विद्वन् ! (वयम्) हम मनुष्य (त्वावतः) तुझ जैसे किसी अन्य के न होने के कारण जो तू तुझ जैसा ही है, ऐसे तुझ अद्वितीय के (स्मसि) हो गये हैं ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेष है। ‘त्वावतः’ में ‘कमल कमल के समान है’ इत्यादि के सदृश अनन्वय अलङ्कार है ॥९॥
भावार्थःसंसार में बिखरे हुए सब धनों का स्वामी, सबका नेता, सूर्य-आदि लोकों का अधिष्ठाता, अनुपम परमेश्वर जैसे सबका वन्दनीय है, वैसे ही बहुत से ज्ञान, कर्म आदि धनों का स्वामी, मार्गप्रदर्शक, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय एवं प्राण, मन, बुद्धि आदि का अधिष्ठाता जीवात्मा भी सबसे सेवनीय है। उसी प्रकार वेग से यात्रा करानेवाले विमान आदियों के निर्माण और चलाने में कुशल, विविध विद्याओं में पारङ्गत, शिल्पशास्त्र के वेत्ता विद्वान् भी मनुष्यों द्वारा सेवनीय है ॥९॥ इस दशति में इन्द्र से सम्बद्ध वरुण, मित्र और अर्यमा के रक्षण की प्रार्थना होने से, इन्द्र की गौओं की प्रशंसा होने से, इन्द्र से गाय, अश्व आदि की याचना होने से, इन्द्र की सरस्वती का आह्वान होने से, इन्द्र का स्तुतिगान होने से तथा इन्द्र नाम से राजा, विद्वान्, आचार्य आदि का भी विषय वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की पाँचवी दशति समाप्त ॥ यह द्वितीय प्रपाठक सम्पूर्ण हुआ ॥ द्वितीय अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣡त्त्वा꣢ मन्दन्तु꣣ सो꣡माः꣢ कृणु꣣ष्व꣡ राधो꣢꣯ अद्रिवः । अ꣡व꣢ ब्रह्म꣣द्वि꣡षो꣢ जहि ॥१९४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे इन्द्र परमात्मन् ! (सोमाः) हमारे द्वारा अभिषुत श्रद्धारस, ज्ञानरस और कर्मरस (त्वा) तुझे (उत् मन्दन्तु) अत्यधिक आनन्दित करें। हे (अद्रिवः) मेघों के स्वामिन् ! वर्षा करनेवाले ! तू हमारे लिए (राधः) अहिंसा, सत्य, अस्तेय, धारणा, ध्यान, समाधि, योगसिद्धि आदि आध्यात्मिक ऐश्वर्य (कृणुष्व) प्रदान कर। (ब्रह्मद्विषः) ब्रह्मविरोधी काम, क्रोध, नास्तिकता आदि मानसिक शत्रुओं को (अवजहि) मार गिरा ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे इन्द्र राजन् ! (सोमाः) वीर-रस (त्वा) तुझे (उत् मन्दन्तु) उत्साहित करें। हे (अद्रिवः) वज्रधारी, विविध शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित, धनुर्वेद में पारङ्गत राजन् ! तू प्रजाओं के लिए (राधः) सब प्रकार के धनधान्यादि (कृणुष्व) उत्पन्न कर, प्रदान कर। (ब्रह्मद्विषः) ईश्वरविरोधी, विद्या-विरोधी, सत्यविरोधी, धर्मविरोधी, न्यायविरोधी एवं प्रजाविरोधी डाकू, चोर आदियों को (अवजहि) विनष्ट कर ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःउपासना किया हुआ परमेश्वर और वीर-रसों से उत्साहित राजा प्रजाओं के ऊपर भौतिक व आध्यात्मिक सम्पत्तियों की वर्षा करते हैं और ब्रह्मद्वेषी शत्रुओं को विनष्ट करते हैं। इसलिए सबको परमेश्वर की उपासना करना और राजा का सत्कार करना तथा उसे प्रोत्साहित करना उचित है ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
गि꣡र्व꣢णः पा꣣हि꣡ नः꣢ सु꣣तं꣢꣫ मधो꣣र्धा꣡रा꣢भिरज्यसे । इ꣢न्द्र꣣ त्वा꣡दा꣢त꣣मि꣡द्यशः꣢꣯ ॥१९५॥
पदार्थःहे (गिर्वणः) स्तुतिवाणियों व आदरवचनों से सेवनीय वा याचनीय परमात्मन् अथवा आचार्यप्रवर ! आप (नः) हमारे (सुतम्) अर्जित ज्ञानरस की अर्थात् विविध विद्याओं के विज्ञान की (पाहि) रक्षा कीजिए। आप (मधोः) मधुर ज्ञानराशि की (धाराभिः) धाराओं से (अज्यसे) सिक्त है। (इन्द्र) हे ज्ञानैश्वर्य से सम्पन्न परमात्मन् वा आचार्यप्रवर ! (त्वादातम्) आपके द्वारा शोधित, शोधन द्वारा धवलीकृत (इत्) ही (यशः) विविध विद्याओं एवं सदाचार से समुत्पन्न कीर्ति, हमें प्राप्त हो। अथवा, हे परमात्मन् अथवा आचार्यप्रवर ! (यशः) तप, ब्रह्मचर्य, विद्वत्ता, व्रतपालन आदि से उत्पन्न होनेवाली कीर्ति (त्वादातम् इत्) आपके द्वारा ही हमें दातव्य है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःगुरुकुल में अध्ययन कर रहे शिष्य आचार्य से प्रार्थना करते हैं कि हे आचार्यप्रवर ! आप अगाध पाण्डित्य के खजाने और शिक्षणकला में परम प्रवीण हैं। आप भ्रान्ति, अपूर्णता आदि दोषों से रहित स्वच्छ ज्ञान हमारे अन्दर प्रवाहित कीजिए और उसे स्थिर कर दीजिए। तभी हमारा उज्ज्वल यश सर्वत्र फैलेगा। सम्पूर्ण विद्याओं से भासित, स्वच्छ ज्ञान की निधि परमात्मा से भी वैसी ही प्रार्थना की गयी है। वही यश वस्तुतः यश है, जो परमात्मा के आशीर्वाद से धवल हुआ हो ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स꣡दा꣢ व꣣ इ꣢न्द्र꣣श्च꣡र्कृ꣢ष꣣दा꣢꣫ उपो꣣ नु꣡ स स꣢꣯प꣣र्य꣢न् । न꣢ दे꣣वो꣢ वृ꣣तः꣢꣫ शूर꣣ इ꣡न्द्रः꣢ ॥१९६
पदार्थःहे मनुष्यो ! (सदा) हमेशा (वः) तुम्हें, जो (इन्द्रः) परमेश्वर वा सुयोग्य जन (आ चर्कृषत्) अतिशय बार-बार कर्मों में प्रेरित करे, और (उप उ) समीप आकर (नु) शीघ्र ही (सः) वह (सपर्यन्) तुम्हारा सत्कार करे, प्रेम से तुम्हें शुभ कर्मों के लिए साधुवाद और प्रोत्साहन प्रदान करे, वैसा (देवः) दिव्य गुण-कर्म-स्वभाववाला (शूरः) वीर (इन्द्रः) परमेश्वर वा सुयोग्य मनुष्य (वृतः न) तुमने अभी तक नेता रूप में या राजा रूप में वरा नहीं है? बिना वरे पूर्वोक्त लाभ कैसे मिल सकते हैं? अतः अवश्य ही उसका वरण करो ॥३॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे वरण किया हुआ परमेश्वर मनुष्यों को पुरुषार्थ में प्रवृत्त करता है और शुभ कर्म करनेवालों को साधुवाद देकर उत्साहित करता है, वैसे ही प्रजाओं द्वारा चुना गया राजा प्रजाओं के लिए करे ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ त्वा꣢ विश꣣न्त्वि꣡न्द꣢वः समु꣣द्र꣡मि꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः । न꣢꣫ त्वामि꣣न्द्रा꣡ति꣢ रिच्यते ॥१९७॥
पदार्थः(इन्दवः) चन्द्र-किरणों के सदृश आह्लादक मेरे स्तुतिरूप सोम (त्वा) तुझ परमेश्वर को (आ विशन्तु) प्राप्त करें, (सिन्धवः) नदियाँ (समुद्रम् इव) जैसे समुद्र को प्राप्त करती हैं। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशालिन् दुःखविदारक, सुखदाता परमात्मन् ! (त्वाम्) तुझसे, कोई भी (न अतिरिच्यते) महिमा में अधिक नहीं है ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजैसे नदियाँ रत्नाकर समुद्र को प्राप्त करके रत्नों से मण्डित हो जाती हैं, वैसे ही सब प्रजाएँ स्तुति द्वारा गुण-रूप रत्नों के खजाने परमेश्वर को प्राप्त करके गुणों की निधि हो जाएँ ॥४॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्र꣣मि꣢द्गा꣣थि꣡नो꣢ बृ꣣ह꣡दिन्द्र꣢꣯म꣣र्के꣡भि꣢र꣣र्कि꣡णः꣢ । इ꣢न्द्रं꣣ वा꣡णी꣢रनूषत ॥१९८॥
पदार्थः(इन्द्रम्) महान् परमेश्वर की (इत्) ही (गाथिनः) सामगान करनेवाले उद्गाता लोग, (इन्द्रम्) उसी महान् परमेश्वर की (अर्केभिः) वेदमन्त्रों द्वारा (अर्किणः) मन्त्रपाठी होता लोग स्तुति करते हैं। और (वाणीः) अन्य जनों की वाणियाँ भी (इन्द्रम्) उसी महान् परमेश्वर की (बृहत्) बहुत अधिक (अनूषत) स्तुति करती हैं ॥५॥
भावार्थःपरमैश्वर्यवान्, दुःख-दरिद्रता का मिटानेवाला, सुख-सम्पत्ति का प्रदाता, धर्मात्माओं का प्रशंसक, कुकर्मियों का विध्वंसक, समस्त गुण-गणों का खजाना, सद्गुणों का आधान करनेवाला परमात्मा ही सब मनुष्यों से वन्दना किये जाने योग्य है। उसी की सामगान से और वेद-मन्त्रों के पाठ आदि से स्तुति करनी चाहिए ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्र꣢ इ꣣षे꣡ द꣢दातु न ऋभु꣣क्ष꣡ण꣢मृ꣣भु꣢ꣳ र꣣यि꣢म् । वा꣣जी꣡ द꣢दातु वा꣣जि꣡न꣢म् ॥१९९॥
पदार्थः(इन्द्रः) सब ऐश्वर्यों का खजाना और सब ऐश्वर्य प्रदान करने में समर्थ परमेश्वर (इषे) राष्ट्र की प्रगति, अभ्युदय, अभीष्टसिद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए (नः) हमें (ऋभुम्) अति तेजस्वी, सत्य से भासमान, सत्यनिष्ठ, मेधावी, विद्वान् ब्राह्मण और (ऋभुक्षणम्) मेधावियों का निवासक, महान् (रयिम्) धन (ददातु) प्रदान करे। (वाजी) बलवान् वह (वाजिनम्) बली, राष्ट्ररक्षाकुशल क्षत्रिय (ददातु) प्रदान करे ॥६॥ इस मन्त्र में ‘ददातु’ और ‘ऋभु’ शब्दों की पुनरुक्ति में लाटानुप्रास अलङ्कार है। ‘वाजी, वाजि’ में छेकानुप्रास है ॥६॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से हमारे राष्ट्र में सत्यशील, उपदेशकुशल, मेधावी, विज्ञानवान्, ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण, बली, धनुर्विद्या में पारङ्गत, रोगों से आक्रान्त न होनेवाले, महारथी, राष्ट्ररक्षा में समर्थ, विजयशील शूरवीर क्षत्रिय और कृषि एवं व्यापार में प्रवीण, धनवान्, दानशील वैश्य उत्पन्न हों। सब राष्ट्रवासी धनपति होकर प्रगति और अभ्युदय को प्राप्त करते हुए आनन्द के साथ धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए मोक्ष के लिए प्रयत्न करते रहें ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ म꣣ह꣢द्भ꣣य꣢म꣣भी꣡ षदप꣢꣯ चुच्यवत् । स꣢꣫ हि स्थि꣣रो꣡ विच꣢꣯र्षणिः ॥२००॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (अङ्ग) हे भाई, (इन्द्रः) विघ्नविदारक, सिद्धिप्रदाता परमेश्वर (अभि सत्) अभिभूत करनेवाले (महत्) बड़े भारी (भयम्) विपत्तियों से उत्पन्न, काम-क्रोध आदि शत्रुओं के उत्पीड़न से उत्पन्न अथवा जन्म-मरण से उत्पन्न भय को (अप चुच्यवत्) पूर्णतः दूर कर दे, (हि) क्योंकि (सः) वह परमेश्वर (स्थिरः) भयों से उद्विग्न न होनेवाला, स्थिरमति, और (विचर्षणिः) भय-निवारण के उपायों का द्रष्टा और दर्शानेवाला है ॥ द्वितीय—सूर्य के पक्ष में। (अङ्ग) हे भाई, (इन्द्रः) अन्धकार का विदारक, प्रकाशप्रदाता सूर्य (अभि सत्) अभिभूत या उद्विग्न करनेवाले (महत्) बड़े (भयम्) रोगों से उत्पन्न, बाघ आदि हिंसक जन्तुओं से उत्पन्न, पृथिवी आदि ग्रह-उपग्रहों की टक्कर की आशंका से उत्पन्न इत्यादि प्रकार के भयों को (अपचुच्यवत्) दूर करता है, (हि) क्योंकि (सः) वह सूर्य (स्थिरः) आकर्षणशक्ति के द्वारा आकाश में स्थिर अर्थात् केवल अपनी धुरी पर ही घूमने के कारण स्थानान्तर गति से रहित, और (विचर्षणिः) प्रकाश के दान द्वारा सबको पदार्थों का दर्शन करानेवाला है ॥ तृतीय—राष्ट्र के पक्ष में। (अङ्ग) हे भाई, (इन्द्रः) परम धनी, शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाला, प्रजाओं को सुख-सम्पदा देनेवाला राजा अथवा सेनापति (अभि सत्) राष्ट्र में व्याप्त होनेवाले (महत्) बड़े (भयम्) राष्ट्र के अन्दर के तथा बाहरी शत्रुओं से उत्पन्न किए गये भय को (अपचुच्यवत्) दूर कर दे, (हि) क्योंकि (सः) वह (स्थिरः) अपने पद पर अडिग, और (विचर्षणिः) गुप्तचर रूपी आँखों से अपने राष्ट्र में होनेवाले तथा शत्रु-राष्ट्र में होनेवाले सब घटनाचक्र का विशेष रूप से द्रष्टा है ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःकभी काम, क्रोध आदि रिपुओं से उत्पन्न होनेवाला भय, कभी दुर्भिक्ष, नदियों की बाढ़, संक्रामक रोग आदि का भय, कभी मानवीय विपत्तियों का भय, कभी बाघ आदि हिंसक जन्तुओं का भय, कभी पड़ोसी शत्रु राष्ट्रों का भय, कभी चोरों, लुटेरों, ठगों, हत्यारों आदि का भय, कभी जन्म-मृत्यु के चक्र का भय मनुष्यों को व्याकुल किए रखता है। स्थिर सर्वद्रष्टा परमात्मा, स्थिर प्रकाशक सूर्य और स्थिर गुप्तचर-रूप आँखोंवाला राजा उस सब प्रकार के भय से मुक्त कर दे, जिससे सब लोग सब ओर से निर्भय होते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस को प्राप्त कर सकें ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा सु꣣ते꣡सु꣢ते꣣ न꣡क्ष꣢न्ते गिर्वणो꣣ गि꣡रः꣢ । गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥२०१॥
पदार्थःहे (गिर्वणः) स्तुतिवाणियों से सेवनीय वा याचनीय परमैश्वर्यवन् इन्द्र परमात्मन् ! (इमाः उ) ये हमसे उच्चारण की जाती हुई (गिरः) वेदवाणियाँ अथवा स्तुतिवाणियाँ (सुतेसुते) प्रत्येक ज्ञान, कर्म और उपासना के व्यवहार में (त्वा) आपको (नक्षन्ते) प्राप्त होती हैं, (धेनवः) अपना दूध पिलानेवाली या अपने दूध से तृप्त करनेवाली (गावः) गौएँ (वत्सं न) जैसे बछड़े को प्राप्त होती हैं ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजैसे पौसे हुए पयोधरोंवाली नवप्रसूत गौएँ अपना दूध पिलाने के लिए शीघ्रता से बछड़े के पास जाती हैं, वैसे ही हमारी रस बहानेवाली, अर्थपूर्ण स्तुतिवाणियाँ प्रत्येक ज्ञानयज्ञ में, प्रत्येक कर्मयज्ञ में और प्रत्येक उपासनायज्ञ में परमात्मा के समीप पहुँचें ॥८॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्रा꣣ नु꣢ पू꣣ष꣡णा꣢ व꣣य꣢ꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ स्व꣣स्त꣡ये꣢ । हु꣣वे꣢म꣣ वा꣡ज꣢सातये ॥२०२॥
पदार्थः(वयम्) हम प्रजाजन (इन्द्रा-पूषणा) परमात्मा-जीवात्मा, प्राण-अपान, राजा-सेनापति, क्षत्रिय-वैश्य और विद्युत्-वायु को (नु) शीघ्र ही (सख्याय) मित्रता के लिए (स्वस्तये) अविनाश, उत्तम अस्तित्व एवं कल्याण के लिए, और (वाजसातये) अन्न, धन, बल, वेग, विज्ञान, प्राणशक्ति को प्राप्त करानेवाले आन्तरिक और बाह्य संग्राम में सफलता के लिए (हुवेम) पुकारें ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःमनुष्य के जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में मनोभूमि में और बाहर की भूमि पर संग्राम होते हैं। उनमें परमात्मा-जीवात्मा, प्राण-अपान, राजा-सेनापति, क्षत्रिय-वैश्य और विद्युत्-वायु की मित्रता का जो वरण करते हैं, वे विजयी होते हैं ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
न꣡ कि꣢ इन्द्र꣣ त्व꣡दुत्त꣢꣯रं꣣ न꣡ ज्यायो꣢꣯ अस्ति वृत्रहन् । न꣢ क्ये꣣वं꣢꣫ यथा꣣ त्व꣢म् ॥२०३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमात्मन् ! (त्वत्) तुझसे (उत्तरः) गुणों में अधिक प्रशस्त (न कि) कोई नहीं है। हे (वृत्रहन्) विघ्नों के विनाशक ! (न) न ही कोई (ज्यायः) तुझसे आयु में अधिक बड़ा (अस्ति) है। (न कि) न ही (एवम्) ऐसा है, (यथा) जैसा (त्वम्) तू है ॥१०॥
भावार्थःअति विशाल भी इस ब्रह्माण्ड में जिससे अधिक गुणवान् और जिससे अधिक वृद्ध दूसरा कोई नहीं है, उस जगदीश्वर की सबको श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र परमात्मा के प्रति ज्ञान, कर्म, उपासनारूप सोम अर्पण करने, उसका स्तुति-गान करने, उससे धन की याचना करने, उसका महत्त्व वर्णन करने और इन्द्र नाम से आचार्य, राजा तथा सूर्य का भी वर्णन करने के कारण इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है ॥ तृतीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय में नवम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त꣣र꣡णिं꣢ वो꣣ ज꣡ना꣢नां त्र꣣दं꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢तः । स꣣मान꣢मु꣣ प्र꣡ श꣢ꣳ सिषम् ॥२०४॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (जनानां वः) आप जन्मधारियों का (तरणिम्) नौकारूप अर्थात् नाव के समान तारक, विपत्तिरूप नदियों से पार करनेवाले, (गोमतः) प्रशस्त गौओं से युक्त, प्रशस्त भूमियों से युक्त, प्रशस्त वाणियों से युक्त, प्रशस्त इन्द्रियों से युक्त, प्रशस्त किरणों से युक्त और प्रशस्त अन्तःप्रकाश से युक्त (वाजस्य) ऐश्वर्य के (त्रदम्) प्राप्त करानेवाले इन्द्र नामक परमात्मा, जीवात्मा, राजा और सूर्य की (समानम् उ) सप्राण होकर, सोत्साह (प्रशंसिषम्) मैं प्रशंसा करता हूँ ॥ पणि लोग इन्द्र की गौओं को चुराकर पर्वत की गुफा में छिपा देते हैं। इन्द्र सरमा को दूती बनाकर अङ्गिरस्, सोम और बृहस्पति की सहायता से गुफा तोड़कर उन्हें छुड़ॎता है, यह वृत्त वेद में बहुत बार वर्णित हुआ है। अध्यात्म-क्षेत्र में गौएँ अन्तःप्रकाश की किरणें या मन की सात्त्विक वृत्तियाँ हैं, इन्द्र परमात्मा अथवा जीवात्मा है, पणि उन गौओं को चुरानेवाली तामसिक मनोवृत्तियाँ हैं। अधिदैवत क्षेत्र में गौएँ किरणें हैं, इन्द्र सूर्य है, पणि मेघ अथवा अन्धकारपूर्ण रात्रियाँ हैं। राष्ट्रिय क्षेत्र में गौएँ गाय पशु या भूमि आदि सम्पत्तियाँ हैं, इन्द्र राष्ट्र का पालक राजा है, और पणि उन सम्पत्तियों का अपहरण करनेवाले लुटेरे शत्रु हैं। इन्द्र नामक परमात्मा, जीवात्मा, सूर्य और राजा उन-उन पणियों को पराजित करके उनकी गुफा को तोड़कर उन गौओं को पुनः प्राप्त करके सत्पात्रों को उनका दान करते हैं। इसी प्रसङ्ग से इस मन्त्र में तृद धातु दानार्थक हो गयी है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। इन्द्र में तरणि (नौका) का आरोप होने से रूपक है ॥१॥
भावार्थःनौका के समान परमात्मा संसार-सागर से जनों का तारक, जीवात्मा कुमार्ग से इन्द्रियों का तारक, सूर्य अन्धकार या रोग से मनुष्यों का तारक, और राजा से विपत्तियों से प्रजाओं का तारक होता है। ये अपने-अपने क्षेत्र में यथायोग्य दिव्य प्रकाशरूप, दिव्य इन्द्रियरूप, किरणरूप, गायरूप, और भूमिरूप गौओं को शत्रु के अधिकार से वापस लौटानेवाले हैं। अतः इनकी प्रशंसा, गुण-वर्णन और सेवन सबको करना चाहिए॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡सृ꣢ग्रमिन्द्र ते꣣ गि꣢रः꣣ प्र꣢ति꣣ त्वा꣡मुद꣢꣯हासत । स꣣जो꣡षा꣢ वृष꣣भं꣡ पति꣢꣯म् ॥२०५॥
पदार्थःहे (इन्द्र) पूजनीय जगदीश्वर ! मैं (ते) आपके लिए, आपकी स्तुति के लिए (गिरः) वेदवाणियों को (असृग्रम्) उच्चारित करता हूँ (सजोषाः) प्रीतिपूर्वक उच्चारण की गई वे वेदवाणियाँ (वृषभम्) सब अभीष्टों की वर्षा करनेवाले (पतिम्) पालनकर्ता (त्वां प्रति) आपको लक्ष्य करके (उद् अहासत) उठ रही हैं, उत्कण्ठा-पूर्वक आपको पाने का यत्न कर रही हैं ॥२॥ यहाँ प्रीतिमयी भार्या जैसे वर्षक पति को पाने के लिए उत्कण्ठापूर्वक जाती है, तो यह उपमा शब्द-शक्ति से ध्वनित हो रही है। उससे उपासक के प्रेम का अतिशय द्योतित होता है ॥२॥
भावार्थःयदि परमात्मा की प्रीतिपूर्वक वेदवाणियों से स्तुति की जाती है, तो वह अवश्य प्रसन्न होता है और स्तोता के लिए यथायोग्य अभीष्ट धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की वर्षा करता है ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
सु꣣नीथो꣢ घा꣣ स꣢꣫ मर्त्यो꣣ यं꣢ म꣣रु꣢तो꣣ य꣡म꣢र्य꣣मा꣢ । मि꣣त्रा꣢꣫स्पान्त्य꣣द्रु꣡हः꣢ ॥२०६॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म पक्ष में।हे इन्द्र परमात्मन् ! (सः) वह (मर्त्यः) मरणधर्मा मनुष्य (घ) निश्चय ही (सुनीथः) शुभ नीति से युक्त अथवा प्रशस्त हो जाता है, (यम्) जिसे (मरुतः) प्राण, (यम्) जिसे (अर्यमा) श्रेष्ठ विचारों का सम्मानकारी आत्मा, और जिसे (अद्रुहः) द्रोह न करनेवाले (मित्राः) मित्रभूत मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, आँख, कान, त्वचा, नासिका और जिह्वा (पान्ति) रक्षित-पालित करते हैं ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे इन्द्र राजन् ! (सः) वह (मर्त्यः) प्रजाजन (घ) निश्चय ही (सुनीथः) सन्मार्ग पर चलनेवाला, सदाचारपरायण हो जाता है (यम्) जिसे (मरुतः) वीर क्षत्रिय, (यम्) जिसे (अर्यमा) धार्मिक न्यायाधीश और (अद्रुहः) राजद्रोह या प्रजाद्रोह न करनेवाले (मित्राः) मित्रभूत अन्य राज्याधिकारी-गण (पान्ति) विपत्तियों से बचाते तथा पालित-पोषित करते हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःइस जगत् या राष्ट्र में बहुत से लोग योग्य मार्गदर्शन को न पाकर सन्मार्ग से च्युत हो जाते हैं। परन्तु जीवात्मा, प्राण आदि अध्यात्म-मार्ग पर चलते हुए जिस मनुष्य पर अनुग्रह करते हैं, तथा राष्ट्र में राज्याधिकारी जिसकी सहायता करते हैं, वह निरन्तर प्रगति के पथ पर दौड़ता हुआ लक्ष्य-सिद्धि को पाने में समर्थ हो जाता है ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣢द्वी꣣डा꣡वि꣢न्द्र꣣ य꣢त्स्थि꣣रे꣡ यत्पर्शा꣢꣯ने꣣ प꣡रा꣢भृतम् । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥२०७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमेश्वर, राजन् और आचार्य ! (यत्) जो दृढ़तारूप धन (वीडौ) दृढ़ लोहे, पत्थर, हीरे आदि में, (यत्) जो स्थिरतारूप धन (स्थिरे) अविचल सूर्य, पर्वत आदि में और (यत्) जो परोपकाररूप धन (पर्शाने) सींचनेवाले बादल में (पराभृतम्) निहित है, (तत्) वह (स्पार्हम्) स्पृहणीय (वसु) धन (आभर) हमें प्राप्त कराइए ॥४॥
भावार्थःदृढ़तारूप गुण से ही लोहा, पत्थर, हीरा आदि पदार्थ कीर्तिशाली हैं। स्थिरतारूप गुण से ही सूर्य, पर्वत आदि गर्व से सिर उठाए खड़े हैं। सींचने-बरसने रूप गुणों से ही बादलों की सब प्रशंसा करते हैं। वह दृढ़ता का, स्थिरता का और सींचने-बरसाने का गुण हमें भी प्राप्त करना चाहिए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
श्रु꣣तं꣡ वो꣢ वृत्र꣣ह꣡न्त꣢मं꣣ प्र꣡ शर्धं꣢꣯ चर्षणी꣣ना꣢म् । आ꣣शि꣢षे꣣ रा꣡ध꣢से म꣣हे꣢ ॥२०८॥
पदार्थःहे मित्रो ! (श्रुतम्) सर्वत्र प्रख्यात, (वः) तुम्हारे (वृत्रहन्तमम्) पाप, विघ्न, अविद्या आदि को अतिशय विनष्ट करनेवाले, (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के (प्र शर्धम्) अतिशय बल एवं उत्साह के प्रदाता परमेश्वर, राजा या आचार्य की (राधसे) ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए व कार्यसिद्धि के लिए, और (महे) महत्ता तथा पूज्यता की प्राप्ति के लिए, मैं (आशिषे) स्तुति करता हूँ ॥५॥
भावार्थःजो मनुष्य जगदीश्वर, राजा व आचार्य को उनके गुण-कर्मों का वर्णन करते हुए स्मरण करते हैं और उनकी सेवा करते हैं, वे अविद्या, पाप, विघ्न, विपत्ति आदि को पार करके सब कल्याणों के भाजन बनते हैं ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡रं꣢ त इन्द्र꣣ श्र꣡व꣢से ग꣣मे꣡म꣢ शूर꣣ त्वा꣡व꣢तः । अ꣡र꣢ꣳ शक्र꣣ प꣡रे꣢मणि ॥२०९
पदार्थःहे (शूर) विक्रमी (इन्द्र) ऐश्वर्यशाली परमात्मन् ! हम (त्वावतः) जिसके तुल्य अन्य कोई न होने से जो तू अपने समान ही है, ऐसे (ते) तेरे (श्रवसे) यश को पाने के लिए अथवा यशोगान के लिए (अरम्) पर्याप्तरूप से, तुझे (गमेम) प्राप्त करें। हे (शक्र) शक्तिशालिन्, सब कार्यों को करने में समर्थ जगदीश्वर ! हम (परेमणि) जिससे तेरा साक्षात्कार होता है, उस परा विद्या में (अरम्) पर्याप्तरूप में (गमेम) पारंगत हों ॥६॥
भावार्थःअनुपम परमेश्वर का कीर्तिगान करने और उसके स्वरूप का हस्तामलकवत् साक्षात्कार करने में सबको प्रवृत्त होना चाहिए। केवल अपरा नामक विद्या की प्राप्ति से ही सन्तोष नहीं कर लेना चाहिए, प्रत्युत परा विद्या भी सीखनी चाहिए ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
धा꣣ना꣡व꣢न्तं कर꣣म्भि꣡ण꣢मपू꣣प꣡व꣢न्तमु꣣क्थि꣡न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢ प्रा꣣त꣡र्जु꣢षस्व नः ॥२१०॥
पदार्थःप्रथम—विद्वान् अतिथि के पक्ष में।हे (इन्द्र) विद्वन् ! आप (प्रातः) इस प्रभातकाल में (नः) हमारे (धानावन्तम्) भुने हुए जवों से युक्त, (करम्भिणम्) घृतमिश्रित सत्तुओं से युक्त, (अपूपवन्तम्) घी मिले जौ या चावल के पूड़ों से युक्त और(उक्थिनम्) वेदमन्त्रों के स्तोत्रों से युक्त यज्ञ में (जुषस्व) प्रीतिपूर्वक आइए ॥ द्वितीय—अध्यात्म-पक्ष में।हे (इन्द्र) परमात्मन् ! आप (प्रातः) प्रभात-वेला में (नः) हमारे (धानावन्तम्) धारणा, ध्यान, समाधियों से युक्त अर्थात् उपासनाकाण्ड से युक्त, (करम्भिणम्) कर्मकाण्ड से युक्त, (अपूपवन्तम्) ज्ञानकाण्ड से युक्त और(उक्थिनम्) सामगान से युक्त उपासना-यज्ञ को (जुषस्व) प्रीतिपूर्वक सेवन कीजिए ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि वे जौ, सत्तू, पूड़े आदि सुगन्धित, मधुर, पुष्टिप्रद तथा आरोग्यदायक द्रव्यों का अग्नि में होम करके वायुमण्डल को स्वच्छ करें। इसी प्रकार ज्ञानकाण्ड, कर्मकाण्ड उपासनाकाण्ड का आश्रय लेकर सामगान करते हुए परमात्मा की पूजा करें। इससे अभ्युदय और मोक्ष को साधें ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣पां꣡ फेने꣢꣯न꣣ न꣡मु꣢चेः꣣ शि꣡र꣢ इ꣣न्द्रो꣡द꣢वर्तयः । वि꣢श्वा꣣ य꣡दज꣢꣯य꣣ स्पृ꣡धः꣢ ॥२११॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म-पक्ष में। हे (इन्द्र) परमात्मन् व जीवात्मन् ! तुम (अपां फेनेन) पानी के झाग के समान स्वच्छ सात्त्विक चित्त की तरङ्ग से (नमुचेः) न छोड़नेवाले, प्रत्युत दृढ़ता से अपना पैर जमा लेनेवाले पाप के(शिरः) सिर को अर्थात् ऊँचे उठे प्रभाव को (उदवर्तयः) पृथक् कर देते हो, (यत्) जब (विश्वाः) सब (स्पृधः) पापरूप नमुचि के सहायक काम-क्रोध आदि शत्रुओं की स्पर्धाशील सेनाओं को (अजयः) जीतते हो ॥ द्वितीय—आयुर्वेद के पक्ष में।हे (इन्द्र) रोगविदारक वैद्य ! आप (अपां फेनेन) समुद्रफेन रूप औषध से (नमुचेः) शरीर को न छोड़नेवाले, दृढ़ता से जमे रोग के (शिरः) हानिकारक प्रभाव को (उदवर्तयः) उच्छिन्न कर देते हो, (यत्) जब (विश्वाः) समस्त (स्पृधः) स्पर्धालु, रोग-सहचर वेदना, वमन, मूर्छा आदि उत्पातों को (अजयः) जीतते हो ॥ तृतीय—राजा के पक्ष में।हे (इन्द्र) वीर राजन् ! आप (अपाम्) राष्ट्र में व्याप्त प्रजाओं के (फेनेन) कर-रूप से प्राप्त तथा चक्रवृद्धि ब्याज आदि से बढ़े हुए धन से (नमुचेः) राष्ट्र को न छोड़नेवाले, प्रत्युत राष्ट्र में व्याप्त होकर स्थित दुःख, दरिद्रता आदि के (शिरः) सिर को, उग्रता को (उदवर्तयः) उच्छिन्न कर देते हो, (यत्) जब (विश्वाः) समस्त (स्पृधः) हिंसा, रक्तपात, लूट-पाट, ठगी, तस्कर-व्यापार आदि स्पर्धालु वैरियों को (अजयः) पराजित कर देते हो ॥ चतुर्थ—सेनापति के पक्ष में। हे (इन्द्र) सूर्यवत् विद्यमान शत्रुविदारक सेनापति ! आप (अपां फेनेन) जलों के झाग के समान उज्ज्वल शस्त्रास्त्र-समूह के द्वारा (नमुचेः) न छोड़नेवाले शत्रु के (शिरः) सिर को (उदवर्तयः) धड़ से अलग कर देते हो, (यत्) जब (विश्वाः) सब (स्पृधः) स्पर्धा करनेवाली शत्रुसेनाओं को (अजयः) जीतते हो ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, उपमानोपमेयभाव ध्वनित हो रहा है ॥८॥
भावार्थःजैसे कोई वैद्यराज समुद्रफेन औषध से रोग को नष्ट करता है, जैसे राजा प्रजा से कर-रूप में प्राप्त हुए धन से प्रजा के दुःखों को दूर करता है और जैसे सेनापति शस्त्रास्त्र-समूह से शत्रु का सिर काटता है, वैसे ही परमेश्वर और जीवात्मा मनुष्य के मन की सात्त्विक वृत्तियों से पाप को उन्मूलित करते हैं ॥८॥ यहाँ सायणाचार्य ने यह इतिहास प्रदर्शित किया है—“पहले कभी इन्द्र असुरों को जीतकर भी नमुचि नामक असुर को पकड़ने में असमर्थ रहा। उल्टे नमुचि ने ही युद्ध करते हुए इन्द्र को पकड़ लिया। पकड़े हुए इन्द्र को नमुचि ने कहा कि तुझे मैं इस शर्त पर छोड़ सकता हूँ कि तू मुझे कभी न दिन में मारे, न रात में, न सूखे हथियार से मारे, न गीले हथियार से। जब इन्द्र ने यह शर्त मान ली तब नमुचि ने उसे छोड़ दिया। उससे छूटे हुए इन्द्र ने दिन-रात की सन्धि में झाग से उसका सिर काटा (क्योंकि दिन-रात की सन्धि न दिन कहलाती है, न रात, और झाग भी न सूखा होता है, न गीला)।’’ यह इतिहास दिखाकर सायण कहते हैं कि यही विषय इस ऋचा में प्रतिपादित है। विवरणकार माधव ने भी ऐसा ही इतिहास वर्णित किया है। असल में तो यह कल्पित कथानक है, सचमुच घटित कोई इतिहास नहीं है ॥८॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣मे꣡ त꣢ इन्द्र꣣ सो꣡माः꣢ सु꣣ता꣢सो꣣ ये꣢ च꣣ सो꣡त्वाः꣢ । ते꣡षां꣢ मत्स्व प्रभूवसो ॥२१२
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमात्मन् ! (ते) आपके लिए (इमे) ये वर्तमान काल में प्रस्तुत (सोमाः) हमारे मैत्रीरस हैं, (ये) जो (सुतासः) भूतकाल में भी निष्पादित हो चुके हैं, (सोत्वाः च) और भविष्य में भी निष्पादित होते रहेंगे। हे (प्रभूवसो) प्रचुर रूप से हमारे अन्दर सद्गुणों के बसानेवाले परमात्मन् ! आप (तेषाम्) उनसे (मत्स्व) प्रमुदित हों ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (ते) तेरे लिए (इमे) ये वर्तमान काल में प्रस्तुत (सोमाः) ज्ञानरस, कर्मरस और श्रद्धारस हैं, (ये) जो (सुतासः) पहले भूतकाल में भी निष्पादित हो चुके हैं, (सोत्वाः च) और भविष्य में भी निष्पादित किये जानेवाले हैं। हे (प्रभूवसो) मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदि को बहुत अधिक बसानेवाले जीवात्मन् ! (तेषाम्) उन रसों से (मत्स्व) तृप्ति प्राप्त कर, अर्थात् ज्ञानवान्, कर्मण्य और श्रद्धावान् बन ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःसबको चाहिए कि उपासकों के मन में सद्गुणों को बसानेवाले, दिव्य धन के स्वामी परमेश्वर को सब कालों में मैत्री-रस से सिक्त करें और अपने आत्मा को ज्ञानरसों, कर्मरसों और श्रद्धारसों से तृप्त करें ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
तु꣡भ्य꣢ꣳ सु꣣ता꣢सः꣣ सो꣡माः꣢ स्ती꣣र्णं꣢ ब꣣र्हि꣡र्वि꣢भावसो । स्तो꣣तृ꣡भ्य꣢ इन्द्र मृडय ॥२१३॥
पदार्थःहे (विभावसो) तेज रूप धनवाले परमेश्वर ! (तुभ्यम्) आपके लिए (सोमाः) हमारे प्रीतिरस (सुतासः) निष्पादित किये गये हैं, और (बर्हिः) हृदयरूप आसन (स्तीर्णम्) बिछाया गया है। हृदयासन पर बैठकर, हमारे प्रीतिरूप सोमरसों का पान करके, हे (इन्द्र) परमेश्वर्यशाली परब्रह्म ! आप (स्तोतृभ्यः) हम स्तोताओं के लिए (मृडय) आनन्द प्रदान कीजिए ॥१०॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से और उसके प्रति अपना प्रेमभाव समर्पण करने से उपासकों को ही सुख मिलता है॥१०॥ इस दशति में इन्द्र का तरणि आदि रूप में वर्णन होने से, इन्द्र के सहचारी मित्र, मरुत् और अर्यमा की प्रशंसा होने से, इन्द्र द्वारा जल-फेन आदि साधन से नमुचि का सिर काटने आदि का वर्णन होने से और इन्द्र नाम से विद्वान्, वैद्य, राजा और सेनापति आदि के अर्थों का भी प्रकाश होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है ॥ तृतीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय में दशम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣢ व꣣ इ꣢न्द्रं꣣ कृ꣢विं꣣ य꣡था꣢ वाज꣣य꣡न्तः꣢ श꣣त꣡क्र꣢तुम् । म꣡ꣳहि꣢ष्ठꣳ सिञ्च꣣ इ꣡न्दु꣢भिः ॥२१४॥
पदार्थःहे साथियो ! (वाजयन्तः) बल, विज्ञान या ऐश्वर्य की इच्छा करते हुए (वः) तुम लोग (शतक्रतुम्) बहुत ज्ञानी और बहुत से कर्मों को करनेवाले, (इन्द्रम्) परमात्मा को (इन्दुभिः) भक्तिरसों से (आ) आसिञ्चित करो। जैसे (वाजयन्तः) अन्नों की उत्पत्ति चाहनेवाले किसान लोग (कृविम्) कृत्रिम कुएँ को खेतों में सिंचाई करने के लिए (इन्दुभिः) जलों से भरते हैं, उसी प्रकार मैं भी (मंहिष्ठम्) अतिशय दानी, सबसे महान् और पूज्यतम उस परमात्मा को (इन्दुभिः) भक्तिरसों से (सिञ्चे) सींचता हूँ ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःजो परमात्मा के साथ मित्रता करते हैं, वे सदा आनन्दित होते हैं ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡त꣢श्चिदिन्द्र न꣣ उ꣡पा या꣢꣯हि श꣣त꣡वा꣢जया । इ꣣षा꣢ स꣣ह꣡स्र꣢वाजया ॥२१५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (अतः चित्) इसीलिए, अर्थात् क्योंकि हम पूर्वमन्त्रोक्त रीति से बलादि की कामना करते हुए आपको अपने मैत्रीरसों से सींचते हैं, इस कारण हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् जगदीश्वर ! आप (शतवाजया) सैंकड़ों बलों से युक्त और (सहस्रवाजया) सहस्रों विज्ञानों से युक्त (इषा) अभीष्ट आनन्दरस की धारा के साथ (नः) हमें (उप आयाहि) प्राप्त हों ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) शत्रुविदारक धनपति राजन् ! आप (अतः चित्) इस अपनी राजधानी से (शतवाजया) बहुत बल और वेगवाली तथा (सहस्रवाजया) सहस्र संग्राम करने में समर्थ (इषा) सेना के साथ (नः) शत्रुओं से पीड़ित हम प्रजाजनों को (उप आयाहि) प्राप्त हों ॥ तृतीय—आचार्य के पक्ष में। हे (इन्द्र) अविद्या के विदारक और ज्ञान-धन से सम्पन्न आचार्यप्रवर ! (त्वम्) आप (अतः चित्) इस अपनी कुटी से (शतवाजया) प्रचुर बल से युक्त, (सहस्रवाजया) बहुत ज्ञान से युक्त (इषा) ब्रह्मचर्यादि व्रतपालन की प्रेरणा के साथ (नः) हम शिष्यों को (उप आयाहि) प्राप्त हों ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, और उपमानोपमेयभाव ध्वनित हो रहा है। ‘वाजया’ इस भिन्नार्थक शब्द की एक बार आवृत्ति होने से यमक अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे राजा बलवती, संग्रामकुशल सेना के साथ प्रजाजनों को और आचार्य बलविद्यायुक्त सदाचार-प्रेरणा के साथ शिष्यों को प्राप्त होता है, वैसे ही परमात्मा बलविज्ञानयुक्त आनन्दरस की धारा के साथ हमें प्राप्त हो ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣢ बु꣣न्दं꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ द꣢दे जा꣣तः꣡ पृ꣢च्छा꣣द्वि꣢ मा꣣त꣡र꣢म् । क꣢ उ꣣ग्राः꣡ के ह꣢꣯ शृण्विरे ॥२१६॥
पदार्थःप्रथम—जीव के पक्ष में। (जातः) मानवदेह में जन्मा, (वृत्रहा) दुष्टों के संहार करने में समर्थ जीवात्मा, (बुन्दम्) बाण को शस्त्रास्त्रसमूह को (आददे) ग्रहण करे, और (मातरम्) अपनी माता से (वि पृच्छात्) पूछे कि हे माँ ! (के) कौन लोग (उग्राः) दुष्ट हैं, (के ह) और कौन (शृण्विरे) सद्गुणों और सत्कर्मों से प्रख्यात कीर्तिवाले हैं, यह तुम बताओ, जिससे मैं दुष्टों को दण्डित करूँ और सज्जनों का सम्मान करूँ ॥ द्वितीय—मन के पक्ष में। (जातः) वेग आदि सामर्थ्य में प्रसिद्ध, (वृत्रहा) पापरूप वृत्र का संहार करनेवाला इन्द्र अर्थात् सद्विचाररूप परमैश्वर्यवाला मन (बुन्दम्) शिवसंकल्परूप बाण को (आददे) ग्रहण करे, और(मातरम्) सत्-असत् के विवेक की निर्मात्री बुद्धि से (वि पृच्छात्) पूछे कि (के) कौन से विचार (उग्राः) उत्कट पापवाले हैं (के ह) और कौन से विचार (शृण्विरे) पुण्य से प्रख्यात हैं यह बताओ, जिससे मैं पापात्मक विचारों का खण्डन और पुण्यात्मक विचारों का मण्डन करूँ ॥ तृतीय—राजा के पक्ष में। (जातः) प्रजाओं द्वारा राजा के पद पर अभिषिक्त, (वृत्रहा) राष्ट्र के आन्तरिक और बाह्य शत्रुरूप वृत्रों के संहार में समर्थ राजा (बुन्दम्) बाण को अर्थात् शासनदण्ड को अथवा शस्त्रास्त्रसमूह को (आददे) ग्रहण करे, और (मातरम्) राजा की निर्मात्री जनता से (वि पृच्छात्) विशेषरूप से पूछे कि (के) कौन लोग (उग्राः) प्रचण्ड कोपवाले शत्रु हैं, जो तुम्हें परेशान करते हैं, (के ह) और कौन (शृण्विरे) सद्गुण, सत्कर्म आदि के कारण विश्रुत हैं, प्रख्यात हैं, जो तुम्हारे साथ मित्र के समान आचरण करते हैं। बताओ, जिससे मैं शत्रुओं को दण्डित और मित्रों को सत्कृत करूँ ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजिन्होंने मानव-शरीर धारण किया है, उन वीरों का और राजा का यह कर्तव्य है कि वे दुष्टों को दण्ड देकर पुण्यात्माओं का सत्कार करें। साथ ही सबको चाहिए कि वे मन और बुद्धि की सहायता से पापों को दूर कर पुण्यों का प्रसार करें ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
बृ꣣ब꣡दु꣢क्थꣳ हवामहे सृ꣣प्र꣡क꣢रस्नमू꣣त꣡ये꣢ । सा꣡धः꣢ कृ꣣ण्व꣢न्त꣣म꣡व꣢से ॥२१७॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हम (बृबदुक्थम्) प्रशंसनीय कीर्तिवाले, (सृप्रकरस्नम्) व्यापक कर्मों में निष्णात, और (अवसे) प्रगति के लिए (साधः) सूर्य, वायु, अग्नि, चाँदी, सोना आदि साधन-समूह को (कृण्वन्तम्) उत्पन्न करनेवाले इन्द्र नामक परमात्मा को (ऊतये) रक्षा के लिए (हवामहे) पुकारते हैं ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हम प्रजाजन (बृबदुक्थम्) प्रशंसनीय कीर्तिवाले, (सृप्रकरस्नम्) घुटनों तक लम्बी बाहुओंवाले अथवा शत्रुनिग्रह, प्रजापालन आदि शुभ कर्मों में व्याप्त भुजाओंवाले और (अवसे) प्रजाओं की प्रगति के लिए (साधः) शस्त्रास्त्र-ज्ञानविज्ञान-चिकित्सा आदि की सिद्धि को (कृण्वन्तम्) करनेवाले इन्द्र राजा को (ऊतये) सुरक्षा के लिए (हवामहे) पुकारते हैं ॥४॥
भावार्थःपुरुषार्थी जन सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की और सुयोग्य राजा की सहायता से ही अपनी और समाज की प्रगति कर सकते हैं, इसलिए सबको उनकी सहायता माँगनी चाहिए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ऋ꣣जुनीती꣢ नो꣣ व꣡रु꣢णो मि꣣त्रो꣡ न꣢यति वि꣣द्वा꣢न् । अ꣣र्यमा꣢ दे꣣वैः꣢ स꣣जो꣡षाः꣢ ॥२१८॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म के पक्ष में। हे इन्द्र परमात्मन् ! आपकी सहायता से (देवैः) चक्षु आदि इन्द्रियों के साथ (सजोषाः) प्रीतिवाला, (विद्वान्) ज्ञानी (वरुणः) पापों से निवारण करनेवाला जीवात्मा, (मित्रः) प्राण, और (अर्यमा) मन (नः) हमें (ऋजुनीती) सरल धर्ममार्ग से (नयति) ले चलें ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे इन्द्र राजन् ! (देवैः) अपने-अपने अधिकार में व्यवहार करनेवाले राजपुरुषों के साथ (सजोषाः) प्रीतिवाला अर्थात् अनुकूलता रखनेवाला (विद्वान्) विद्वान् विद्यासभाध्यक्ष, (वरुणः) शत्रुनिवारक, शस्त्रास्त्रधारी सेनाध्यक्ष, (मित्रः) कुत्सित आचरणरूप मृत्यु से त्राण करनेवाला धर्म-सभा का अध्यक्ष और (अर्यमा) न्यायसभा का अध्यक्ष (नः) हम प्रजाजनों को (ऋजुनीती) सरल धर्ममार्ग से (नयति) ले चलें ॥ तृतीय—विद्वान् के पक्ष में। (देवैः) विद्या और व्रत-शिक्षा का दान करनेवाले सब अध्यापकों से (सजोषाः) सामञ्जस्य रखता हुआ (वरुणः) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाववाला, छात्रों द्वारा आचार्यरूप में वरण किया गया व छात्रों को शिष्यरूप से वरनेवाला, (मित्रः) पापरूप मरण से त्राण करानेवाला, (अर्यमा) न्यायकारी (विद्वान्) विद्वान् आचार्य (नः) हम शिष्यों को (ऋजुनीती) सरल विद्या-दान और व्रत-पालन करने की नीति से (नयति) आगे ले चले, अर्थात् हमें सुयोग्य विद्या-व्रत-स्नातक बनाये ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःशरीर में विद्यमान जीवात्मा, प्राण, मन आदि देव परमात्मा के पास से बल प्राप्त कर मनुष्यों को धर्म-मार्ग से ले जाते हैं। उसी प्रकार राष्ट्र में विद्यासभा, धर्मसभा और न्यायसभा के अध्यक्ष तथा सेना का अध्यक्षप्रजाजनों को धर्ममार्ग में ले चलें । गुरुकुलवासी सुयोग्य अध्यापकों से युक्त, श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाववाला आचार्य भी शिष्यों को धर्म तथा विद्या के मार्ग में ले चले ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अश्विनौ, मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
दू꣣रा꣢दि꣣हे꣢व꣣ य꣢त्स꣣तो꣢ऽरु꣣ण꣢प्सु꣣र꣡शि꣢श्वितत् । वि꣢ भा꣣नुं꣢ वि꣣श्व꣡था꣢तनत् ॥२१९॥
पदार्थःप्रथम—खगोल पक्ष में। (अरुणप्सुः) चमकीले रूपवाला सूर्यरूपी इन्द्र (यत्) जब (दूरात्) खगोल में स्थित दूरवर्ती प्रदेश से, मङ्गल-बुध-चन्द्रमा आदि ग्रहोपग्रहों को (इह इव सतः) मानो यहीं समीप में ही स्थित करता हुआ (अशिश्वितत्) चमकाता है, तब (भानुम्) अपने प्रकाश को (विश्वथा) बहुत प्रकार से (वि अतनत्) विस्तीर्ण करता है ॥ द्वितीय—अध्यात्म के पक्ष में। (अरुणप्सुः) तेजस्वी रूपवाला इन्द्र परमेश्वर (यत्) जब, (दूरात्) दूर से अर्थात् व्यवधानयुक्त अथवा दूरस्थ प्रदेश से, पदार्थों को (इह इव सतः) यहाँ समीपस्थ के समान करता हुआ (अशिश्वितत्) योगी के मानस को प्रकाशित करता है, तब (भानुम्) भासमान जीवात्मा को (विश्वथा) सर्व प्रकार से (वि अतनत्) योगैश्वर्य प्राप्त कराकर विस्तीर्ण अर्थात् व्यापक ज्ञानवाला कर देता है ॥६॥ योगाभ्यासी मनुष्य को परमात्मा द्वारा प्रदत्त दिव्य आलोक से सूक्ष्म, ओट में स्थित और दूरस्थ पदार्थों का दूरस्थित ताराव्यूहों का और ध्रुव आदि नक्षत्रों का समीपस्थ वस्तु के समान हस्तामलकवत् साक्षात्कार हो सकता है, यह योगदर्शन में विभूतिपाद में महर्षि पतञ्जलि ने कहा है। योगसिद्धियों के सम्बन्ध में स्वामी दयानन्द के विचार इसी मन्त्र की संस्कृत टिप्पणी में देखें ॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘दूरस्थित को भी मानो समीप-स्थित करता हुआ’ इसमे उत्प्रेक्षालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःचमकीला सूर्य जब अपने प्रकाश को मङ्गल, बुध, बृहस्पति, चन्द्र आदि ग्रहोपग्रहों पर फेंकता है, तब उसके प्रकाश से वे प्रकाशित हो जाते हैं और वह प्रकाश हमारी आँखों पर प्रतिफलित होकर उन दूरस्थित पदार्थों कोभी समीप में स्थित के समान दिखाता है। उसी प्रकार योगाभ्यास से योगियों के मनों में परमात्मा का दिव्य आलोक प्रतिबिम्बित होकर उनके अन्दर वह शक्ति उत्पन्न कर देता है, जिससे वे सूक्ष्म, ओट में स्थित तथा दूरस्थित पदार्थों को भी साक्षात् समीपस्थ के समान देखने लगते हैं ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ नो꣢ मित्रावरुणा घृ꣣तै꣡र्गव्यू꣢꣯तिमुक्षतम् । म꣢ध्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि सुक्रतू ॥२२०॥
पदार्थःइन्द्र परमात्मा और इन्द्र राजा के अधिष्ठातृत्व में चलनेवाले हे (मित्रावरुणौ) ब्राह्मण और क्षत्रियो ! तुम दोनों (नः) हमारी (गव्यूतिम्) राष्ट्रभूमि को (घृतैः) घृत आदि पदार्थों से (आ उक्षतम्) सींचो अर्थात् समृद्ध करो। हे (सुक्रतू) उत्तम ज्ञान और कर्म वालो ! तुम दोनों (मध्वा) विद्यामधु के साथ (रजांसि) क्षात्रतेजों को उत्पन्न करो ॥७॥
भावार्थःपरमात्मा से प्रेरणा और राजा से सहायता पाकर ब्राह्मण और क्षत्रिय राष्ट्र की प्रजाओं में समृद्धि, विद्या, वीरता और क्षात्रतेज को यदि उत्पन्न करते हैं, तो राष्ट्र परम उत्कर्ष को पा सकता है ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मरुतः| स्वर - षड्जः
उ꣢दु꣣ त्ये꣢ सू꣣न꣢वो꣣ गि꣢रः꣣ का꣡ष्ठा꣢ य꣣ज्ञे꣡ष्व꣢त्नत । वा꣣श्रा꣡ अ꣢भि꣣ज्ञु꣡ यात꣢꣯वे ॥२२१॥
पदार्थःप्रथम—वायुओं के पक्ष में। (सूनवः) परमेश्वररूप अथवा सूर्यरूप इन्द्र के पुत्र (त्ये) वे मरुद्-गण अर्थात् पवन (यज्ञेषु) वृष्टि-यज्ञों में, जब (गिरः) विद्युद्गर्जनाओं को तथा (काष्ठाः) मेघजलों को (उद् अत्नत) विस्तीर्ण करते हैं, अर्थात् बिजली को गर्जाते हैं तथा बादलों के जलों पर आघात करते हैं, तब (वाश्राः) रिमझिम करते हुए वर्षाजल (अभिज्ञु) पृथिवी की ओर (यातवे) जाना आरम्भ कर देते हैं, अर्थात् वर्षा होने लगती है ॥ द्वितीय—सैनिकों के पक्ष में। (सूनवः) सेनापतिरूप इन्द्र के पुत्रों के समान विद्यमान (त्ये) वे सैनिकरूप मरुद्गण (यज्ञेषु) जिनमें मुठभेड़ होती है ऐसे संग्रामयज्ञों में (गिरः) जयघोषों को (उद् अत्नत) आकाश में विस्तीर्ण करते हैं, तथा (काष्ठाः) दिशाओं को (उद् अत्नत) लाँघ जाते हैं। (अभिज्ञु) घुटने झुका-झुकाकर (यातवे) चलने पर, उनके लिए (वाश्राः) उत्साहवर्धक उच्चारण किये जाते हैं ॥ हे मरुतो ! शत्रु को परे भगाने के लिए तुम्हारे हथियार चिरस्थायी हों और शत्रुओं का प्रतिरोध करने के लिए सुदृढ़ हों (ऋ० १।३९।२) इत्यादि वैदिक वर्णन मरुतों का सैनिक होना सूचित करते हैं ॥ तृतीय—अध्यात्म पक्ष में। जीवात्मारूप इन्द्र से सम्बद्ध (त्ये) वे (गिरः) शब्दोच्चारण के साधनभूत (सूनवः) प्रेरक प्राण (यज्ञेषु) योगाभ्यास-रूप यज्ञों में, जब (काष्ठाः) चित्त की दिशाओं को (उद् अत्नत उ) ऊर्ध्व-गामिनी कर देते हैं, तब (अभिज्ञु) घुटने मोड़कर पद्मासन बाँधकर (यातवे) मोक्ष की ओर जाने के लिए, उनके चित्त में (वाश्राः) धर्ममेघ समाधिजन्य वर्षाएँ होती हैं ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःपवन जैसे आकाश में बिजली की गर्जना करते हैं, वैसे ही सेनापति के अधीन रहनेवाले योद्धा लोग संग्रामरूप यज्ञ में जयघोषों से सब दिशाओं को भरपूर कर दें। जैसे पवन बादलों में स्थित जलों को भूमि पर बरसाते हैं, वैसे ही प्राण योगी की चित्तभूमि में धर्ममेघ समाधि को बरसावें ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -विष्णुः| स्वर - षड्जः
इ꣣दं꣢꣫ विष्णु꣣र्वि꣡ च꣢क्रमे त्रे꣣धा꣡ नि द꣢꣯धे प꣣द꣢म् । स꣡मू꣢ढमस्य पाꣳसु꣣ले꣡ ॥२२२॥
पदार्थःयहाँ मन्त्र का देवता इन्द्र है, अतः विष्णु इन्द्र का विशेषण समझना चाहिए। प्रथम—परमात्मा पक्ष में। (विष्णुः) चराचर जगत् में व्याप्त होनेवाला परमेश्वर (इदम्) इस सब जगत् में (वि चक्रमे) व्यापक है। (त्रेधा) तीन प्रकार से—अर्थात् उत्पादक, धारक और विनाशक इन तीन रूपों में उस जगत् में वह (पदम्) अपने पैर को अर्थात् अपनी सत्ता को (निधदे) रखे हुए है। किन्तु (अस्य) इस परमेश्वर का, वह पैर अर्थात् अस्तित्व (पांसुले) पाञ्चभौतिक इस जगत् में (समूढम्) छिपा हुआ है, चर्म-चक्षुओं से अगोचर है। जैसे धूलिवाले प्रदेश में (समूढम्) छिपा हुआ (पदम्) किसी का पैर दिखाई नहीं देता है, यह यहाँ ध्वनि निकल रही है ॥ द्वितीय—सूर्य के पक्ष में। (विष्णुः) अपने प्रकाश से सबको व्याप्त करनेवाला सूर्य (इदम्) इस सब ग्रहोपग्रह-चक्र में (विचक्रमे) अपने किरणरूप चरणों को रखे हुए है। (त्रेधा) भूगर्भ, भूतल और आकाश इन तीनों स्थानों पर, उसने (पदम्) अपने किरणसमूह-रूप पैर को (निधदे) रखा हुआ है। किन्तु (पांसुले) धूलिमय भूगर्भ में (अस्य) इस सूर्य का किरणरूप पैर (समूढम्) तर्कणा-गम्य ही है, प्रत्यक्ष नहीं है ॥९॥ यहाँ श्लेषालङ्कार और उपमाध्वनि है ॥९॥
भावार्थःविष्णु सूर्य अपनी किरणों से व्याप्त होकर सब ग्रहोपग्रहों को प्रकाशित करता है। सूर्य के ही ताप से ओषधि, वनस्पति आदि पकती हैं। सूर्य यद्यपि तीनों स्थानों पर अपने किरण-रूप पैर रखे हुए है, तो भी उसकी किरणें पृथ्वीतल पर और आकाश में ही प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती हैं, भूगर्भ में भी पहुँचकर कैसे वे मिट्टी के कणों को लोहे, ताँबे, सोने आदि के रूप में परिणत कर देती हैं, यह सबकी आँखें नहीं देख सकतीं, अपितु भूगर्भवेत्ता वैज्ञानिक लोग ही इस रहस्य को जानते हैं। वैसे ही विष्णु परमेश्वर ने अपनी सत्ता से ब्रह्माण्ड को व्याप्त किया हुआ है। वह सब पदार्थों को सृष्टि के आरम्भ में पैदा करता है, पैदा करके धारण करता है और प्रलयकाल में उनका संहार कर देता है। यह तीन रूपोंवाला उसका कार्य तीन प्रकार से पैर रखने के रूप में वर्णन किया गया है। यद्यपि वह सभी जगह अपना पैर रखे हुए है, तो भी जैसे किसी का धूल में छिपा हुआ पैर नहीं दीखता है, वैसे ही उसका सर्वत्र विद्यमान स्वरूप भी दृष्टिगोचर नहीं होता है ॥९॥ इस दशति में इन्द्र के गुणवर्णनपूर्वक उसका आह्वान करने के कारण, उसके सहायक मित्र, वरुण और अर्यमा के नेतृत्व की याचना के कारण और मित्रावरुण, मरुत् तथा विष्णु के गुणकर्मों का कीर्तन करने के कारण इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ सङ्गति है ॥ तृतीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय में ग्यारहवाँ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡ती꣢हि मन्युषा꣣वि꣡ण꣢ꣳ सुषु꣣वा꣢ꣳस꣣मु꣡पे꣢꣯रय । अ꣣स्य꣢ रा꣣तौ꣢ सु꣣तं꣡ पि꣢ब ॥२२३॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म-पक्ष में। हे इन्द्र परमात्मन् ! आप (मन्युषाविणम्) जो उदासीन भाव से अर्थात् हृदय में प्रीति रखे बिना उपासना करता है, उसे (अति इहि) लाँघ जाइये। (सुषुवांसम्) हार्दिक प्रीति से उपासनारस अभिषुत करनेवाले को (उप-आ-ईरय) अपने समीप ले आइये। (अस्य) इस यजमान के (रातौ) आत्म-समर्पण-प्रवृत्त होने पर (सुतम्) अभिषुत श्रद्धा रस का (पिब) पान कीजिए ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे इन्द्र राजन् ! आप (मन्युषाविणम्) क्रोध उगलनेवाले दुष्ट शत्रु को (अति-इहि)पराजित कीजिए। (सुषुवांसम्) कर-प्रदानरूप सोमयाग करनेवाले प्रजाजन को (उप-आ-ईरय) प्राप्त होकर शुभ कर्मों में प्रेरित कीजिए। (अस्य) इस प्रजाजन के (रातौ) कर-प्रदान के प्रवृत्त होने पर (सुतम्) दिये हुए कर को (पिब) स्वीकार कीजिए। और स्वीकार करके उसे सहस्रगुणित रूप में प्रजा-कल्याण के कार्य में ही व्यय कर दीजिए, जैसे सूर्य भूमिष्ठ रसों को सहस्रगुणित रूप में बरसा देने के लिए ही ग्रहण करता है ॥ तृतीय—अध्ययनाध्यापन के पक्ष में। हे इन्द्र ! विद्युत् के समान तीव्र बुद्धिवाले विद्यार्थी ! तू (मन्युषाविणम्) क्रोध, द्वेष आदि से विद्यादान करनेवाले गुरु को (अति-इहि) त्याग दे, उसके पास विद्या पढ़ने के लिए मत जा। (सुषुवांसम्) प्रेम से विद्यादान करनेवाले के पास ही (उप-आ-ईरय) पहुँचकर विद्या पढ़ने के लिए प्रार्थना कर। (अस्य) उस गुरु के (रातौ) विद्यादान के प्रवृत्त होने पर (सुतम्) ज्ञानरस को (पिब) पी । इससे यह अभिप्राय सूचित होता है कि अध्यापक को छात्रों के प्रति दिव्य मन रखते हुए रमण-पद्धति से पढ़ाना चाहिए। अथर्ववेद में छात्रों की ओर से आचार्य को कहा गया है कि हे वाणी के अधिपति तथा विद्याधन के स्वामी आचार्यप्रवर ! आप दिव्य मन के साथ हमारे बीच में पुनः-पुनः आइये और ऐसी रमण-पद्धति से हमें विद्यादान दीजिए कि सुना हुआ शास्त्र कभी भूलें नहीं (अथ० १।१।२) ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर उसके श्रद्धारस को स्वीकार नहीं करता, जो उदासीन मन से देता है। राजा भी शत्रु को नहीं, अपितु कर (टैक्स) देनेवाले प्रजाजन को ही बढ़ाता है। गुरुओं को भी सरल पद्धति से और प्रेमपूर्वक ही छात्रों को पढ़ाना चाहिए, जटिल पद्धति से तथा क्रोध-विद्वेष आदि के वशीभूत होकर नहीं ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क꣢दु꣣ प्र꣡चे꣢तसे म꣣हे꣡ वचो꣢꣯ दे꣣वा꣡य꣢ शस्यते । त꣡दिध्य꣢꣯स्य꣣ व꣡र्ध꣢नम् ॥२२४
पदार्थः(कत् उ) किसलिए (प्रचेतसे) प्रकृष्ट ज्ञान वा प्रकृष्ट चित्तवाले, (महे) महान् (देवाय) दिव्य गुण-कर्म-स्वभाववाले इन्द्र परमेश्वर के लिए (वचः) स्तुति-वचन (शस्यते) उच्चारण किया जाता है? यह प्रश्न है। इस प्रश्न का उत्तर है—(हि) क्योंकि (तत्) वह स्तुति-वचन (अस्य) इस स्तुतिकर्ता यजमान का (वर्धनम्) बढ़ानेवाला होता है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर के लिए जो स्तुति-वचन कहे जाते हैं, उनसे स्तोता की ही वृद्धि और उन्नति होती है, यह जानना चाहिए ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣣क्थं꣢ च꣣ न꣢ श꣣स्य꣡मा꣢नं꣣ ना꣡गो꣢ र꣣यि꣡रा चि꣢꣯केत । न꣡ गा꣢य꣣त्रं꣢ गी꣣य꣡मा꣢नम् ॥२२५॥
पदार्थः(अगोः) अश्रद्धालु जन का (न) न तो (शस्यमानम्) उच्चारण किया जाता हुआ (उक्थम् च) स्तोत्र ही, (न) न ही (रयिः) दान किया जाता हुआ धन, (न) न ही (गीयमानम्) गान किया जाता हुआ (गायत्रम्) सामगान (आ चिकेत) कभी किसी से जाना गया है। अतः श्रद्धापूर्वक ही परमेश्वर-विषयक-स्तुति आदि कर्म करना चाहिए ॥३॥ इस मन्त्र में स्तोत्रोच्चारण, गायत्रगान आदि के कारण के होने पर भी उनके ज्ञान-रूप कार्य की अनुत्पत्ति वर्णित होने से विशेषोक्ति अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःश्रद्धा-रहित मनुष्य का उच्चारण किया गया भी स्तोत्र अनुच्चारित के समान होता है, दिया हुआ भी दान न दिये हुए के समान होता है और गाया हुआ भी सामगान न गाये हुए के समान होता है। इसलिए श्रद्धा के साथ ही सब शुभ कर्म सम्पादित करने चाहिएँ ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्र꣢ उ꣣क्थे꣢भि꣣र्म꣡न्दि꣢ष्ठो꣡ वा꣡जा꣢नां च꣣ वा꣡ज꣢पतिः । ह꣡रि꣢वान्त्सु꣣ता꣢ना꣣ꣳ स꣡खा꣢ ॥२२६
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान्, विघ्नों को विदीर्ण करनेवाला, सुख आदि का प्रदाता परमेश्वर (उक्थेभिः) वेदमन्त्रों से (मन्दिष्ठः) अतिशय आनन्दित करनेवाला, (वाजानां च) तथा सब बलों का (वाजपतिः) बलपति, (हरिवान्) प्रशस्त प्राणवाला, और (सुतानाम्) सब पुत्र-पुत्रियों का (सखा) मित्र है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (इन्द्रः) राजा (उक्थेभिः) कीर्तियों से (मन्दिष्ठः) सबको अत्यन्त आनन्द देनेवाला, (वाजानां च) सब प्रकार के अन्नों, धनों, बलों और विज्ञानों का (वाजपतिः) स्वामी, (हरिवान्) जितेन्द्रिय अथवा राज्य में विद्युत् आदि से चलनेवाले तीव्रगामी भूमियान, जलयान और विमानों का प्रबन्ध करनेवाला और (सुतानाम्) पुत्रतुल्य प्रजाजनों का (सखा) मित्र हो ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ‘वाजा, वाज’ में छेकानुप्रास है ॥४॥
भावार्थःजैसे विश्व का सम्राट् परमेश्वर अनेक प्रकार के गुण-समूहों का अग्रणी है, वैसे ही प्रजाओं के बीच जो मनुष्य यशस्वी, यश देनेवाला, धनपति, बलवान्, विज्ञानी, जितेन्द्रिय, सुप्रबन्धक और सबके साथ सौहार्द से बरतनेवाला हो, उसी को राजा के पद पर अभिषिक्त करना चाहिए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣢ या꣣ह्यु꣡प꣢ नः सु꣣तं꣡ वाजे꣢꣯भि꣣र्मा꣡ हृ꣢णीयथाः । म꣣हा꣡ꣳ इ꣣व꣢ यु꣡व꣢जानिः ॥२२७॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मान् ! महान् आप (वाजेभिः) आध्यात्मिकबलरूप तथा योगेश्वर्यरूप उपहारों के साथ (नः) हमारे (सुतम्) प्रारम्भ किये हुए उपासना-यज्ञ में (आ याहि) आइये, (मा हृणीयथाः) रोष वा संकोच मत कीजिए, (इव) जैसे (युवजानिः) युवति पत्नीवाला (महान्) गुणों से महान् कोई पुरुष, बहुमूल्य उपहारों के साथ पत्नी-सहित दूसरों के यज्ञ में जाता है ॥५॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे रूपवती भार्यावाला कोई महान् पुरुष सामान्यजनों के भी निमन्त्रण को स्वीकार कर, उपहार लेकर भार्या के साथ उनके यज्ञ में जाता है, वैसे ही महान् परमात्मा भी हम तुच्छों से भी आयोजित उपासना-यज्ञ में आध्यात्मिक ऐश्वर्य का उपहार लेकर आये ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क꣣दा꣡ व꣢सो स्तो꣣त्रं꣡ हर्य꣢꣯त आ꣡ अव꣢꣯ श्म꣣शा꣡ रु꣢ध꣣द्वाः꣢ । दी꣣र्घ꣢ꣳ सु꣣तं꣢ वा꣣ता꣡प्या꣢य ॥२२८॥
पदार्थःप्रथम—भौतिक वर्षा के पक्ष में। बहुत समय तक वर्षा न होने पर जल के अभाव से पीड़ित मनुष्य कहता है—हे (वसो) निवासप्रद इन्द्र जगदीश्वर ! वर्षा के लिए (स्तोत्रम्) स्तोत्र को (हर्यते) आपके प्रति पहुँचाते हुए मेरे लिए (कदा) कब (श्मशा) वर्षाजल से परिपूर्ण नदी या नहर (वाः) जल को (आ अवरुधत्) लाकर खेत, जलाशय आदि में रोकेगी? मैनें (वाताप्याय) वर्षा-जल के लिए (दीर्घम्) लम्बे समय तक (सुतम्) वृष्टियज्ञ किया है ॥ द्वितीय—अध्यात्म-वर्षा के पक्ष में। दिव्य आनन्दरस से परिपूर्ण परमेश्वर के पास से आनन्दरस की वर्षा की कामना करता हुआ साधक कह रहा है—हे (वसो) मुझ निर्धन के धन, निवासदाता जगदीश्वर ! आनन्दरस की वर्षा के लिए (स्तोत्रम्) स्तुति को (हर्यते) आपके प्रति पहुँचाते हुए मेरे लिए (कदा) कब (श्मशा) आपके पास से बहती हुई आनन्दरस की धारा (वाः) आनन्दरस को (आ अवरुधत्) लाकर मेरे हृदयरूप क्षेत्र या जलाशय में रोकेगी? हे रसागार ! चिरकालीन दुःख के दावानल से दग्ध मैंने (वाताप्याय) दिव्य आनन्द-जल की वर्षा के लिए (दीर्घम्) लम्बे समय तक (सुतम्) श्रद्धारस प्रस्रुत करते हुए अध्यात्म-यज्ञ निष्पन्न किया है। तो भी आनन्द-रस की वर्षा मुझे क्यों नहीं प्राप्त हो रही है? ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजैसे अनावृष्टि होनेपर वर्षा के लिए लम्बा वृष्टि-यज्ञ किया जाता है, वैसे ही आनन्द-रस का प्यासा मैं आनन्द-रस की वर्षा को पाने के लिए दीर्घ ध्यान-यज्ञ चिरकाल से कर रहा हूँ। तो भी हे प्रभो, क्यों आप आनन्द-वारि नहीं बरसा रहे हैं? बरसाओ, बरसाओ, हे देव, दिव्य आनन्द को बरसाओ। नहीं तो अनेक प्रकार से सांसारिक संतापों से संतप्त हुआ मैं जीवन धारण भी नहीं कर सकूँगा ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ब्रा꣡ह्म꣢णादिन्द्र꣣ रा꣡ध꣢सः꣣ पि꣢बा꣣ सो꣡म꣢मृ꣣तू꣡ꣳरनु꣢꣯ । त꣢वे꣣द꣢ꣳ स꣣ख्य꣡मस्तृ꣢꣯तम् ॥२२९॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! आप (राधसः) ध्यान-यज्ञ के साधक (ब्राह्मणात्) वेद तथा ईश्वर के ज्ञाता मुझसे (ऋतून् अनु) ऋतुओं के अनुरूप, समयानुसार (सोमम्) मेरे मैत्री-रस का (पिब) पान कीजिए। मेरे साथ (तव) आपकी (इदम्) यह (सख्यम्) मित्रता (अस्तृतम्) अविनष्ट अर्थात् चिरस्थायी रहे ॥ द्वितीय—गुरुशिष्य के पक्ष में। हे (इन्द्र) विद्युत् के समान तीव्र बुद्धिवाले विद्यार्थी ! तू (राधसः) अध्ययन-अध्यापन यज्ञ के साधक (ब्राह्मणात्) ब्रह्मवेत्ता, वेदवेत्ता और ब्राह्मण स्वभाववाले आचार्य से (ऋतून् अनु) प्रत्येक ऋतु में (सोमम्) मेरे ज्ञान-रस को (पिब) पी। (तव) तेरी (इदम्) यह गुरुशिष्य-सम्बन्ध-रूप (सख्यम्) मित्रता (अस्तृतम्) अविनष्ट रहे ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजो परमात्मा और गुरु की मैत्री को प्राप्त करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
व꣣यं꣡ घा꣢ ते꣣ अ꣡पि꣢ स्मसि स्तो꣣ता꣡र꣢ इन्द्र गिर्वणः । त्वं꣡ नो꣢ जिन्व सोमपाः ॥२३०॥
पदार्थःहे (गिर्वणः) वेदवाणियों से भजनीय ! (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (वयम्) हम (स्तोतारः) स्तोता लोग (घ) निश्चय ही (ते अपि) तेरे ही (स्मसि) हैं। हे (सोमपाः) हमारे मैत्री-रस का पान करनेवाले ! (त्वम्) तू (नः) हमें (जिन्व) तृप्त कर ॥८॥
भावार्थःजो लोग परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़ते हैं, परमात्मा भी उन्हें सदा सुखी करता है ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ए꣡न्द्र꣢ पृ꣣क्षु꣡ कासु꣢꣯ चिन्नृ꣣म्णं꣢ त꣣नू꣡षु꣢ धेहि नः । स꣡त्रा꣢जिदुग्र꣣ पौ꣡ꣳस्य꣢म् ॥२३१
पदार्थःहे (इन्द्र) शत्रुविदारक तथा दुःखच्छेदक परमात्मन् और राजन् ! आप (कासुचित् पृक्षु) जिन किन्हीं भी देवासुर-संग्रामों में (नः) हमारे (तनूषु) शरीरों में (नृम्णम्) बल (आधेहि) स्थापित कीजिए। हे (सत्राजित्) सत्यजयी अथवा सदाजयी, (उग्र) तीव्र तेजवाले परमात्मन् व राजन् ! आप हममें (पौंस्यम्) धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप पुरुषार्थ को स्थापित कीजिए ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःजैसे परमात्मा सभी आन्तरिक और बाह्य संग्रामों में, शत्रुओं को जीतने और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है, वैसे ही राजा भी करे ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ए꣣वा꣡ ह्यसि꣢꣯ वीर꣣यु꣢रे꣣वा꣡ शूर꣢꣯ उ꣣त꣢ स्थि꣣रः꣢ । ए꣣वा꣢ ते꣣ रा꣢ध्यं꣣ म꣡नः꣢ ॥२३२॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन् अथवा राजन् ! (एव हि) सचमुच, आप (वीरयुः) वीरों को चाहनेवाले (असि) हैं। (एव) सचमुच, आप (शूरः) शूरवीर (उत) और (स्थिरः) अविचल हैं। (एव) सचमुच ही (ते) आपका (मनः) मन (राध्यम्) सत्कर्मों आदि द्वारा अनुकूल किये जा सकने योग्य है ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर स्वयं वीर, सुस्थिर और किसी से जीता न जा सकनेवाला होकर संसार में वीरों की ही कामना करता है, ड़रपोकों की नहीं, वैसा ही राजा भी हो ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र को सोमपान के लिए निमन्त्रित करने, उसके सखित्व का महत्त्व वर्णन करने, उससे बल की याचना करने, शूर आदि के रूप में उसकी स्तुति करने तथा इन्द्र शब्द से आचार्य, राजा आदि के भी चरित्र का वर्णन करने के कारण इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ तृतीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय में बारहवाँ खण्ड समाप्त ॥ यह द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ शूर नोनु꣣मो꣡ऽदु꣢ग्धा इव धे꣣न꣡वः꣢ । ई꣡शा꣢नम꣣स्य꣡ जग꣢꣯तः स्व꣣र्दृ꣢श꣣मी꣡शा꣢नमिन्द्र त꣣स्थु꣡षः꣢ ॥२३३॥
पदार्थःहे (शूर) विक्रमशाली (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर ! (अस्य) इस सामने दिखाई देनेवाले (जगतः) जंगम के (ईशानम्) अधीश्वर और (तस्थुषः) स्थावर के (ईशानम्) अधीश्वर, (स्वर्दृशम्) मोक्ष-सुख का दर्शन करानेवाले (त्वा अभि) आपको लक्ष्य करके, हम प्रजाजन (अदुग्धाः धेनवः इव) न दोही गयीं गायों के समान, अर्थात् न दोही गयीं गायें जैसे अपने बछड़े को देखकर उसे दूध पिलाने के लिए रँभाती हैं, वैसे (नोनुमः) अतिशय बारम्बार आपकी स्तुति कर रहे हैं। आप हमारे लिए वैसे ही प्रिय हैं, जैसे गाय को बछड़ा प्यारा होता है, यह यहाँ ध्वनित हो रहा है ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे गौएँ बछड़े को अपना दूध पिलाकर बदले में सुख प्राप्त करती हैं, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि परमेश्वर से प्रीति जोड़कर सब प्रकार के अभ्युदय एवं निःश्रेयस का सुख प्राप्त करें ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्वा꣡मिद्धि हवा꣢꣯महे सा꣣तौ꣡ वाज꣢꣯स्य का꣣र꣡वः꣢ । त्वां꣢ वृ꣣त्रे꣡ष्वि꣢न्द्र꣣ स꣡त्प꣢तिं꣣ न꣢र꣣स्त्वां꣢꣫ काष्ठा꣣स्व꣡र्व꣢तः ॥२३४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विपत्ति के विदारक और सब सम्पत्तियों के दाता परमेश्वर व राजन् ! (कारवः) स्तुतिकर्ता, कर्मयोगी हम लोग (वाजस्य) बल की (सातौ) प्राप्ति के निमित्त (त्वाम् इत् हि) तुझे ही (हवामहे) पुकारते हैं। (नरः) पौरुष से युक्त हम (वृत्रेषु) पापों एवं शत्रुओं का आक्रमण होने पर (सत्पतिम्) सज्जनों के रक्षक (त्वाम्) तुझे पुकारते हैं। (अर्वतः) घोड़े आदि सेनांगों के अथवा आग्नेयास्त्रों और वैद्युतास्त्रों के (काष्ठासु) संग्रामों में भी त्वाम् (तुझे) पुकारते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर और राजा आदि का आह्वान मनुष्यों को स्वयं कर्मण्य होकर ही करना चाहिए। जब पापरूप या पापीरूप वृत्र आक्रमण करते हैं, अथवा जब दैत्यों के साथ देवपुरुषों का हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, योद्धा इन सेनांगों के द्वारा और आग्नेयास्त्रों या बिजली के अस्त्रों द्वारा घोर भयंकर युद्ध प्रवृत्त होता है, तब परमेश्वर और राजा से सहयोग, प्रेरणा, बल और साहस प्राप्त करके शत्रु को धूल में मिला देना चाहिए ॥२॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣भि꣡ प्र वः꣢꣯ सु꣣रा꣡ध꣢स꣣मि꣡न्द्र꣢मर्च꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ । यो꣡ ज꣢रि꣣तृ꣡भ्यो꣢ म꣣घ꣡वा꣢ पुरू꣣व꣡सुः꣢ स꣣ह꣡स्रे꣢णेव꣣ शि꣡क्ष꣢ति ॥२३५॥
पदार्थःहे साथियो ! (वः) तुम (सुराधसम्) प्रशस्त धनोंवाले और शुभ सफलता को देनेवाले (इन्द्रम्) परमेश्वर को (अभि) लक्ष्य करके (प्र अर्च) भली-भाँति ऐसी अर्चना करो (यथा) जिससे कि वह अर्चना (विदे) जान ली जाए, (यः) जो प्रसिद्ध (मघवा) ऐश्वर्यवान् (पुरूवसुः) बहुत अधिक बसानेवाला अथवा बहुतों को बसानेवाला परमेश्वर (जरितृभ्यः) स्तोताओं के लिए (सहस्रेण इव) मानो हजार हाथों से (शिक्षति) भौतिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति प्रदान करता है ॥३॥ इस मन्त्र में ‘सहस्रेणेव शिक्षति’ में उत्प्रेक्षालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि बहुत सम्पत्ति के स्वामी, पुरुषार्थीयों को सफलता देनेवाले, निवासक, भूरि-भूरि सुख-सम्पदा को बरसानेवाले परमेश्वर की श्रद्धा के साथ पूजा करें ॥१॥
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तं꣡ वो꣢ द꣣स्म꣡मृ꣢꣫ती꣣ष꣢हं꣣ व꣡सो꣢र्मन्दा꣣न꣡मन्ध꣢꣯सः । अ꣣भि꣢ व꣣त्सं꣡ न स्वस꣢꣯रेषु धे꣣न꣢व꣣ इ꣡न्द्रं꣢ गी꣣र्भि꣡र्न꣢वामहे ॥२३६॥
पदार्थःहे साथियो ! (वः) तुम्हारे और हमारे (दस्मम्) दर्शनीय अथवा दुःखों का क्षय करनेवाले, (ऋतीषहम्) आक्रान्ता काम-क्रोधादि शत्रुओं को पराजित करनेवाले, (वसोः) धनभूत (अन्धसः) भक्तिरूप सोमरस से (मन्दानम्) आनन्दित होनेवाले (तम्) उस प्रसिद्ध (इन्द्रम्) परमेश्वर को (अभि) लक्ष्य करके (स्वसरेषु) दिनों के आविर्भाव-काल में अथवा घरों में (गीर्भिः) वाणियों से, हम (नवामहे) स्तुति करते हैं, (न) जैसे (धेनवः) दूध देनेवाली गौएँ (वत्सम् अभि) बछड़े के प्रति (स्वसरेषु) प्रातः दोहन-वेला में अथवा गोशालाओं में रँभाती है ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजैसे दिन निकलने पर गोशालाओं में स्थित गौएँ बछड़े को देखकर दूध पिलाने के लिए प्रेम से रँभाने लगती हैं, वैसे ही परमात्मा के प्रति हम प्रजाओं को प्रेम में भरकर स्तुतिगीत गाने चाहिएँ ॥४॥
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त꣡रो꣣भिर्वो वि꣣द꣡द्व꣢सु꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣बा꣡ध꣢ ऊ꣣त꣡ये꣢ । बृ꣣ह꣡द्गाय꣢꣯न्तः सु꣣त꣡सो꣢मे अध्व꣣रे꣢ हु꣣वे꣢꣫ भरं꣣ न꣢ का꣣रि꣡ण꣢म् ॥२३७॥
पदार्थःहे साथियो ! (वः) तुम लोग (सबाधः) जब बाधाओं से आक्रान्त होओ तब (ऊतये) रक्षा के लिए (सुतसोमे) जिसमें श्रद्धा और कर्मरूप सोम का निष्पादन किया गया है, ऐसे (अध्वरे) हिंसारहित जीवन-यज्ञ में (तरोभिः) वेगों और बलों के साथ (विदद्वसुम्) ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले (इन्द्रम्) परमेश्वर के (बृहत्) बहुत अधिक (गायन्तः) गीत गाओ। मैं भी (भरम् न) कुटुम्ब का भरण-पोषण करनेवाले गृहपति के समान (कारिणम्) कर्मशील उस परमेश्वर का (हुवे) आह्वान करता हूँ ॥५॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजब-जब मनुष्य अपने जीवन में विघ्न-बाधाओं से पीड़ित होते हैं, तब-तब उन्हें परमेश्वर का स्मरण करना चाहिए। स्मरण करने पर वह उन्हें पुरुषार्थ में और कर्मयोग में प्रवृत्त करता है। जैसे कोई गृहपति कर्मपरायण होकर ही कुटुम्ब के भरण-पोषण में समर्थ होता है, वैसे ही परमेश्वर भी कर्मपरायण होकर ही विश्व को धारण करता है और सब उपासकों को भी कर्मयोग में प्रेरित करता है ॥५॥
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त꣣र꣢णि꣣रि꣡त्सि꣢षासति꣣ वा꣢जं꣣ पु꣡र꣢न्ध्या यु꣣जा꣢ । आ꣢ व꣣ इ꣡न्द्रं꣢ पुरुहू꣣तं꣡ न꣢मे गि꣣रा꣢ ने꣣मिं꣡ तष्टे꣢꣯व सु꣣द्रु꣡व꣢म् ॥२३८॥
पदार्थः(तरणिः) दुःखों से तरानेवाला इन्द्र परमेश्वर अथवा इन्द्र राजा (इत्) अवश्य (युजा) सदा साथ रहनेवाली (पुरन्ध्या) अपनी बुद्धि और क्रिया से (वाजम्) बल, धन और विज्ञान (सिषासति) बाँटता या देता है। इसलिए मैं (पुरुहूतम्) बहुतों द्वारा स्तुत (इन्द्रम्) उस परमेश्वर वा राजा को (गिरा) वाणी के द्वारा (वः) आप लोगों के लिए (आनमे) कार्य में प्रवृत्त करता हूँ, (तष्टा इव) जैसे शिल्पी (नेमिम्) रथ-चक्र की परिधि को (सुद्रुवम्) सुप्रवृत्त करता है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेष तथा उपमालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःउत्तम प्रज्ञावाला तथा उत्तम कर्मोंवाला परमेश्वर और राजा यथायोग्य मनुष्यों को सुख, धन विद्यादि प्रदान करता है, अतः प्रार्थना-वचनों से सबको उन्हें अपनी ओर प्रवृत्त करना चाहिए। जैसे रथ-चक्र के प्रवृत्त होने से ही रथ में बैठे लोग गन्तव्य स्थान को पहुँच सकते हैं, वैसे ही परमेश्वर और राजा की प्रजा की ओर प्रवृत्ति होने से ही लोगों का अभ्युदय हो सकता है ॥६॥
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पि꣡बा꣢ सु꣣त꣡स्य꣢ र꣣सि꣢नो꣣ म꣡त्स्वा꣢ न इन्द्र꣣ गो꣡म꣢तः । आ꣣पि꣡र्नो꣢ बोधि सध꣣मा꣡द्ये꣢ वृ꣣धे꣢३ऽस्मा꣡ꣳ अ꣢वन्तु ते꣣ धि꣡यः꣢ ॥२३९॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमेश्वर ! आप (रसिनः) रसीले (सुतस्य) निष्पादित भक्तिभावरूप सोमरस का (पिब) पान कीजिए। (गोमतः) प्रशस्त इन्द्रियों और प्रशस्त वेदवाणियों का पाठ करनेवाले (नः) हमें (मत्स्व) आनन्दित कीजिए। (सधमाद्ये) जिसमें सब राष्ट्रों के लोग परस्पर मिलकर आनन्दलाभ करते हैं, ऐसे विश्वयज्ञ में (वृधे) वृद्धि के लिए (आपिः) बन्धु बनकर (नः) हमें (बोधि) बोध प्रदान कीजिए। (ते) आपकी (धियः) बुद्धियाँ और कर्म (अस्मान्) हमें (अवन्तु) रक्षित करें ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) ऐश्वर्यशाली राजन् ! आप (रसिनः) रसीले (सुतस्य) निचोड़कर तैयार किये हुए सोमादि ओषधियों के रस का (पिब) पान कीजिए। उससे शक्तिशाली होकर आप (गोमतः) प्रशस्त भूमियों के स्वामी (नः) हम लोगों को (मत्स्व) आनन्दित कीजिए। (सधमाद्ये) जिसमें सब प्रजाजन मिलकर सुखी होते हैं, ऐसे राष्ट्रयज्ञ में (वृधे) वृद्धि के लिए (आपिः) बन्धु बनकर (नः) हम प्रजाजनों को (बोधि) जागरूक कीजिए। (ते) आपकी (धियः) राजनीति में चतुर बुद्धियाँ और राष्ट्रोत्थान के कर्म (अस्मान्) हमें (अवन्तु) रक्षित करें ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा और राजाओं के पुरुषार्थ से ही राष्ट्र की उन्नति, प्रजाओं का आनन्द और विश्वशान्ति हो सकती है ॥७॥
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त्व꣢꣫ꣳ ह्येहि꣣ चे꣡र꣢वे वि꣣दा꣢꣫ भगं꣣ व꣡सु꣢त्तये । उ꣡द्वा꣢वृषस्व मघव꣣न्ग꣡वि꣢ष्टय꣣ उ꣢दि꣣न्द्रा꣡श्व꣢मिष्टये ॥२४०॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमेश्वर वा राजन् ! (त्वं हि) आप (चेरवे) मुझ पुरुषार्थी के हित के लिए (आ इहि) आइए। (वसुत्तये) मुझ धन के दानी के लिए (भगम्) धन (विदाः) प्राप्त कराइए। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् ! आप(गविष्टये) मुझ प्रशस्त इन्द्रिय, पृथिवीराज्य, विद्याप्रकाश आदि के अभिलाषी के लिए (उद्वावृषस्व) धन, विद्या आदि की अतिशय पुनःपुनः वर्षा कीजिए। आप (अश्वमिष्टये) घोड़े, बल, वेग, प्राण आदि के इच्छुक मेरे लिए (उद्वावृषस्व) अतिशयरूप सेपुनःपुनः इन वस्तुओं को बरसाइए ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। 'आ, जान, बरसा' इन सब क्रियाओं का एक कर्ताकारक से सम्बन्ध होने के कारण दीपक अलङ्कार भी है। ‘ष्टय, ष्टये' में छेकानुप्रास और द्वितीय तथा चतुर्थ पाद के अन्त में 'अये' होने से अन्त्यानुप्रास भी है ॥८॥
भावार्थःपरमेश्वर और राजा आदि राज्याधिकारीगण उसी की सहायता करते हैं, जो ‘चरैवेति चरैवेति’ ‘पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।‘ (ए० ब्रा० ७।३।३) के उपदेश को अपने जीवन में चरितार्थ करता है और पुरुषार्थ से धन कमाकर सत्पात्रों में उसका दान भी करता है ॥८॥
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न꣡ हि व꣢꣯श्चर꣣मं꣢ च꣣ न꣡ वसि꣢꣯ष्ठः प꣣रिम꣡ꣳस꣢ते । अ꣣स्मा꣡क꣢म꣣द्य꣢ म꣣रु꣡तः꣢ सु꣣ते꣢꣫ सचा꣣ वि꣡श्वे꣢ पिबन्तु का꣣मि꣡नः꣢ ॥२४१॥
पदार्थःप्रथम—अध्ययनाध्यापन के पक्ष में। हे विद्यार्थीरूप मरुतो ! (वः) तुममें से (चरमं च न) हीनकोटिवाले भी विद्यार्थी को (वसिष्ठः) विद्या से बसानेवाला आचार्य (नहि) नहीं (परिमंसते) छोड़ता है, अर्थात् विद्या से वंचित नहीं करता है। (अद्य) आज (सुते) विद्यायज्ञ के प्रवृत्त हो जाने पर (अस्माकम्) हमारे (विश्वे) सब (कामिनः) विद्या-ग्रहण के इच्छुक (मरुतः) विद्यार्थी (सचा) साथ मिलकर (पिबन्तु) विद्या-रस का पान करें ॥ ‘मरुतः’ का यौगिक अर्थ है मरनेवाले। मृत्यु-रूप आचार्य के गर्भ में स्थित होकर पूर्व संस्कारों को छोड़कर (अर्थात् मरकर) विद्या से पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं, इस कारण विद्यार्थी ‘मरुत्’ कहलाते हैं। अथर्ववेद में स्पष्ट ही आचार्य को मृत्यु कहा है (अथर्व० ११।५।१४), यह भी कहा है कि ‘‘आचार्य उपनयन संस्कार करके ब्रह्मचारी को गर्भ में धारण करता है, तीन रात्रि तक उसे अपने उदर में रखता है, फिर जब ब्रह्मचारी द्वितीय जन्म लेता है, अर्थात् विद्या पढ़कर स्नातक बनता है, तब उसे देखने के लिए अनेक विद्वान् जन आते हैं।’’ (अथर्व० ११।५।३) ॥ द्वितीय—कर्मफल-भोग के पक्ष में। हे मरणधर्मा मनुष्यो ! (वः) तुम्हारे बीच में (चरमं चन) एक को भी (वसिष्ठः) अतिशय बसानेवाला सर्वव्यापक परमेश्वर (नहि परिमंसते) कर्मफल दिये बिना नहीं छोड़ता है, अर्थात् प्रथम से लेकर अन्तिम तक सभी को कर्मफल प्रदान करता है। (अद्य) आज, बर्तमान काल में (सुते) उत्पन्न जगत् में (अस्माकम्) हमारे बीच में (विश्वे) सभी (कामिनः) अभ्युदय के इच्छुक (मरुतः) मरणधर्मा मनुष्य (सचा) साथ मिलकर (पिबन्तु) कर्मफलों का भोग करें ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःजैसे वसिष्ठ परमेश्वर निरपवाद रूप में सभी जीवात्माओं को कर्मानुसार फल देता है, वैसे ही वसिष्ठ आचार्य ऐसी सरल शैली से शिष्यों को पढ़ाये, जिससे बिना अपवाद के सभी शिष्य विद्या के ग्रहण में समर्थ हों ॥९॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
मा꣡ चि꣢द꣣न्य꣡द्वि श꣢꣯ꣳसत꣣ स꣡खा꣢यो꣣ मा꣡ रि꣢षण्यत । इ꣢न्द्र꣣मि꣡त्स्तो꣢ता꣣ वृ꣡ष꣢ण꣣ꣳ स꣡चा꣢ सु꣣ते꣡ मुहु꣢꣯रु꣣क्था꣡ च꣢ शꣳसत ॥२४२॥
पदार्थःहे (सखायः) मित्रो ! तुम (अन्यत्) दूसरी किसी वस्तु, पत्थर की मूर्ति, नदी, पर्वत आदि की (मा चित्) कभी मत (वि शंसत) उपास्य रूप में पूजा करो, (मा रिषण्यत) जो उपासनीय नहीं हैं, उनकी उपासना करके हानि प्राप्त मत करो। (सुते) ज्ञान, कर्म और भक्ति का रस निष्पादित होनेपर (सचा) साथ मिलकर (वृषणम्) सुखवर्षक (इन्द्रम् इत्) परमेश्वर की ही (स्तोत) स्तुति-उपासना करो और उसके प्रति (मुहुः) पुनः-पुनः (उक्था च) स्तोत्रों का भी (शंसत) गान करो ॥१०॥
भावार्थःपरिवार, समाज, राष्ट्र और जगत् में जो सम्मान के योग्य हैं, उनका सम्मान तो करना ही चाहिए, किन्तु उनमें से किसी की भी परमेश्वर के रूप में पूजा नहीं करनी चाहिए, न ही नदी, वृक्ष, पर्वत आदि जड़ पदार्थों की पूजा करनी चाहिए। इन्द्र आदि नामों से वेदों में प्रसिद्ध सुखवर्षी एक जगदीश्वर ही पुनः-पुनः स्तुति, प्रार्थना, अर्चना और उपासना करने योग्य है ॥१०॥ इस दशति में मनुष्यों को इन्द्र की स्तुति, अर्चना आदि के लिए प्रेरणा करने, उससे ऐश्वर्य आदि की प्रार्थना करने और इन्द्र के सहचर मरुतों का आह्वान करने के कारण इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति जाननी चाहिए ॥ तृतीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध की पञ्चम दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
न꣢ कि꣣ष्टं꣡ कर्म꣢꣯णा नश꣣द्य꣢श्च꣣का꣡र꣢ स꣣दा꣡वृ꣢धम् । इ꣢न्द्रं꣣ न꣢ य꣣ज्ञै꣢र्वि꣣श्व꣡गू꣢र्त꣣मृ꣡भ्व꣢स꣣म꣡धृ꣢ष्टं धृ꣣ष्णु꣡मोज꣢꣯सा ॥२४३॥
पदार्थः(यः) जो मनुष्य (चकार) महत्त्वपूर्ण कर्मों को करता है, वह भी (तम्) उस प्रसिद्ध (सदावृधम्) सदा बढ़ानेवाले, (विश्वगूर्तम्) सबसे स्तुति किये जानेवाले, (ऋभ्वसम्) बहुत विशाल अर्थात् सर्वव्यापक, सूर्य-किरणों को चन्द्रादिलोकों में भेजनेवाले, (अधृष्टम्) किसी से पराजित न होनेवाले, और (ओजसा) अपने बल से (धृष्णुम्) कामादि शत्रुओं को परास्त करनेवाले, (इन्द्रम्) परमेश्वर की (नकिः) न तो (कर्मणा) वीरतापूर्ण कर्म में, (न) न ही (यज्ञैः) परोपकार आदि यज्ञों में (नशत्) बराबरी कर सकता है ॥१॥
भावार्थःसंसार में परमेश्वर के जो वीरतापूर्ण कार्य और परोपकार के कार्य हैं, उनमें उसकी बराबरी का या उससे अधिक न कोई उत्पन्न हुआ है, न भविष्य में उत्पन्न होगा ॥१॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣢ ऋ꣣ते꣡ चि꣢द꣣भिश्रि꣡षः꣢ पु꣣रा꣢ ज꣣त्रु꣡भ्य꣢ आ꣣तृ꣡दः꣢ । स꣡न्धा꣢ता स꣣न्धिं꣢ म꣣घ꣡वा꣢ पुरू꣣व꣢सु꣣र्नि꣡ष्क꣢र्ता꣣ वि꣡ह्रु꣢तं꣣ पु꣡नः꣢ ॥२४४॥
पदार्थः(यः) जो (अभिश्रिषः) जोड़नेवाले पदार्थ गोंद, सरेस, प्लास्टर आदि के (ऋते चित्) बिना ही (जत्रुभ्यः) गर्दन की हड्डियों पर से (आतृदः) गले के कटने से (पुरा) पहले ही (सन्धिम्) जोड़ने योग्य अवयव को (सन्धाता) जोड़ देता है, अर्थात् शस्त्र आदि से गले के एक भाग के कट जाने पर भी कटे हुए भाग को प्राकृतिक रूप से भरकर पुनः स्वस्थ कर देता है, जिससे सिर कटकर गिरता नहीं, वह (पुरूवसुः) बहुत से शरीरावयवों को यथास्थान बसानेवाला (मघवा) चिकित्सा-विज्ञानरूप धन का धनी परमेश्वर, जीवात्मा, प्राण वा शल्य-चिकित्सक (विह्रुतम्) टेढ़े हुए भी अङ्ग को (पुनः) फिर से (निष्कर्ता) ठीक कर देता है ॥२॥ इस मन्त्र में जोड़नेवाले द्रव्य रूप कारण के बिना ही जोड़ने रूप कार्य की उत्पत्ति का वर्णन होने से विभावना अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःअहो, परमेश्वर की कैसी शरीर-रचना की चतुरता है ! यदि वह जोड़नेवाले द्रव्य गोंद आदि के बिना ही बीच में जोड़ लगाकर सिर को धड़ के साथ दृढ़तापूर्वक जोड़ न देता तो कभी भी कहीं भी सिर धड़ से अलग होकर गिर जाता। यह भी परमेश्वर का ही कर्तृत्व है कि शरीर का कोई भी अङ्ग यदि घायल या टेढ़ा हो जाता है तो जीवात्मा और प्राण की सहायता से तथा शरीर की स्वाभाविक क्रिया से फिर घाव भर जाता है और टेढ़ा अङ्ग सीधा हो जाता है। कुशल शल्य-चिकित्सक भी इस कर्म में परमेश्वर का अनुकरण करता है। युद्ध में यदि शत्रु के शस्त्र-प्रहार से किसी योद्धा का गले का एक भाग कट जाता है तो वह कटेभाग को सुई से सीकर और ओषधि का लेप करके पुनः स्वस्थ कर देता है। दुर्घटना आदि से यदि किसी का अङ्ग विकृत या टेढ़ा हो जाता है तो उसे भी वह उचित उपायों से ठीक कर देता है ॥२॥
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आ꣡ त्वा꣢ स꣣ह꣢स्र꣣मा꣢ श꣣तं꣢ यु꣣क्ता꣡ रथे꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्म꣢युजो꣣ ह꣡र꣢य इन्द्र के꣣शि꣢नो꣣ व꣡ह꣢न्तु꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥२४५॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म पक्ष में। हे (इन्द्र) परमात्मन् ! (हिरण्यये) सुवर्ण के समान ज्योतिर्मय (रथे) शरीररूप रथ में (युक्ताः) नियुक्त, (ब्रह्मयुजः) ब्रह्म के साथ योग करानेवाले अर्थात् ब्रह्म-साक्षात्कार के साधन-भूत, (केशिनः) प्रकाशमय तथा प्रकाशक (सहस्रम्) सहस्र संख्यावाले (हरयः) आहरणशील सात्त्विक-चित्तवृत्ति-रूप अश्व अथवा प्राणरूप अश्व (सोमपीतये) श्रद्धारूप सोमरस का जिसमें पान किया जाता है, ऐसे उपासना-यज्ञ के लिए (त्वा) तुझे (आवहन्तु) हृदय में लायें, प्रकट करें, (शतम्) सौ संख्यावाले सात्त्विक चित्तवृत्तिरूप अश्व (आ) हृदय में लायें, प्रकट करें ॥ पहले हजार कहकर फिर सौ कहना इस बात का ज्ञापक है कि ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए शनैःशनै सात्त्विक चित्तवृत्तियों का भी निरोध करना होता है। इसीप्रकार प्राणायाम में पहले श्वासोच्छ्वासों की संख्या अधिक होती है, क्रमशः अभ्यास करते-करते उनकी संख्या न्यून हो जाती है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (इन्द्र) वीर मनुष्य ! (हिरण्यये) ज्योतिर्मय (रथे) राष्ट्ररूप रथ में (युक्ताः) नियुक्त, (ब्रह्मयुजः) वेदज्ञ चुनाव-अधिकारियों से प्रेरित, (केशिनः) ज्ञान-प्रकाश से युक्त (सहस्रम्) सहस्र (हरयः) मतदान के अधिकारी मनुष्य (सोमपीतये) सुखशान्ति की रक्षा जिसमें होती है, ऐसे राष्ट्र-यज्ञ के सञ्चालनार्थ (त्वा) तुझे (आ वहन्तु) चुनकर राजा के पद पर लायें, (शतम्) सौ चुननेवाले विधायक लोग तुझे चुनकर (आ) राजा के पद पर प्रतिष्ठित करें ॥ पहले हजार या अधिक प्रजाजन मतदान करके कुछ विधायकों को चुनते हैं, फिर वे विधायक जो संख्या में कम होते हैं, राजा को चुनते हैं। यह बात क्रमशः सहस्र और शत शब्दों से सूचित होती है ॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे योगीजन प्रकाशपूर्ण सात्त्विक चित्त की भावनाओं से परमात्मा को प्राप्त करते हैं, वैसे ही विवेकशील प्रजाजनों को चाहिए कि वे मतदान द्वारा सुयोग्य राजा को प्राप्त करें ॥३॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
आ꣢ म꣣न्द्रै꣡रि꣢न्द्र꣣ ह꣡रि꣢भिर्या꣣हि꣢ म꣣यू꣡र꣢रोमभिः । मा꣢ त्वा꣣ के꣢ चि꣣न्नि꣡ ये꣢मु꣣रि꣢꣫न्न पा꣣शि꣢꣫नोऽति꣣ ध꣡न्वे꣢व꣣ ता꣡ꣳ इ꣢हि ॥२४६॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! आप (मन्द्रैः) आनन्ददायक (मयूररोमभिः) मोरपंखों के समान मृदु (हरिभिः) प्राणों के द्वारा (आयाहि) आइये, अर्थात् हमारे हृदय में प्रकट होइये। (त्वा) प्रकट होते हुए आपको (केचित्) कोई भी योगमार्ग में बाधक व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व रूप विघ्न (मा नियेमुः) न रोक सकें, (न) जैसे (पाशिनः) जाल हाथ में लिये व्याध (इत्) गतिमान् अर्थात् भूमि पर चलते हुए अथवा आकाश में उड़ते हुए पशु-पक्षी आदि को जाल द्वारा रोक लेते हैं। (तान्) उन प्रतिबन्धकों को (धन्व इव) अन्तरिक्ष के समान (अति इहि) पार करके प्रकट हो जाइए, अर्थात् जैसे विमानों से अन्तरिक्ष को पार करके कोई आता है, वैसे ही उन बाधकों को पार करके आप हमारे हृदय में प्रकट होइए। अथवा (धन्व इव) धनुष धारी के समान आप उन बाधक शत्रुओं को पराजित करके प्रकट हो जाइए ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) शत्रुविदारक वीर राजन् ! आप (मन्द्रैः) स्तुतियोग्य अथवा गम्भीर स्वरवाले, (मयूररोमभिः) मोरों के रोमों के समान मृदु केसरोंवाले (हरिभिः) रथ में जोते हुए उत्कृष्ट जाति के घोड़ों द्वारा (आयाहि) संकट-काल में प्रजा की रक्षा के लिए आइए ! (न) जैसे (इत्) भूमि पर चलते या आकाश में उड़ते हुए पशु-पक्षी आदि को (पाशिनः) पाशधारी व्याध बाँध लेते हैं, वैसे (त्वा) आपको (केचित्) कोई भी शत्रुजन (मा नियेमुः) बाँध न सकें, (धन्व इव) धनुष के समान आप (तान्) उन शत्रुओं को (अति इहि) अतिक्रान्त अर्थात् पराजित कर दीजिए ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषा तथा उपमालङ्कार है। रेफ, मकार और नकार की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है। 'न्द्रै, न्द्र' 'न्नि, न्न' में छेकानुप्रास है ॥४॥
भावार्थःप्राणों का स्वरूप मोर के रोमों के समान मृदु होता है, इसीलिए प्राणविद्या मधुविद्या के नाम से प्रसिद्ध है। प्राणायाम द्वारा हम परमात्मा को अपने हृदय के अन्दर प्रकट कर सकते हैं। प्रकट किया गया वह हमारी योगसाधना में आनेवाले विघ्नों को दूर कर देता है। इसीप्रकार प्रजाजनों से पुकार गया राजा सब शत्रुओं को पराजित करके राष्ट को उन्नत करता है ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्व꣢म꣣ङ्ग꣡ प्र श꣢꣯ꣳसिषो दे꣣वः꣡ श꣢विष्ठ꣣ म꣡र्त्य꣢म् । न꣢꣫ त्वद꣣न्यो꣡ म꣢घवन्नस्ति मर्डि꣣ते꣢न्द्र꣣ ब्र꣡वी꣢मि ते꣣ व꣡चः꣢ ॥२४७॥
पदार्थः(अङ्ग) हे (शविष्ठ) सबसे अधिक बली परमात्मन् वा राजन् ! (देवः) दिव्यगुणयुक्त (त्वम्) आप (मर्त्यम्) मनुष्य को (प्रशंसिषः) प्रशंसा का पात्र कीजिए। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् ! (त्वत् अन्यः) आपसे भिन्न अन्य कोई भी (मर्डिता) सुखदाता (न अस्ति) नहीं है। हे (इन्द्र) विघ्नविदारक सिद्धिदायक परमेश्वर वा राजन् ! मैं (ते) आपके लिए (वचः) स्तुति-वचन (ब्रवीमि) बोल रहा हूँ ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःहे बलियों में बलिष्ठ, समस्त दिव्य गुणों के पारावार, सकलसम्पत्तिशाली, न्याय-विद्या-विवेक-दया आदि ऐश्वर्यों के निधि परमात्मन् वा राजन् ! कभी अधर्माचरण में संलग्न होकर हम जगत् में निन्दा के पात्र हो जाते हैं। आप कृपा करके हमें धर्म में नियुक्त करके और शुभ कर्मों में समुत्साहित करके प्रशंसा का पात्र बना दीजिए ॥५॥
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त्व꣡मि꣢न्द्र य꣣शा꣡ अ꣢स्यृजी꣣षी꣡ शव꣢꣯स꣣स्प꣡तिः꣢ । त्वं꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ हꣳस्यप्र꣣ती꣢꣫न्येक꣣ इ꣢त्पु꣣र्व꣡नु꣢त्तश्चर्षणी꣣धृ꣡तिः꣢ ॥२४८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमेश्वर अथवा राजन् ! (त्वम्) आप (यशाः) यशस्वी असि हो, (ऋजीषी) सरल धर्ममार्ग पर चलने के इच्छुक अथवा सरल गुण-कर्म-स्वभाववाले और (शवसः पतिः) बल के स्वामी हो। (त्वम्) आप (एकः इत्) अकेले ही (पुरु) बहुत से (अप्रतीनि) अप्रतिद्वन्द्वी (वृत्राणि) आन्तरिक व बाह्य पापी शत्रुओं को (हंसि) दण्डित या विनष्ट करते हो। (त्वम्) आप (अनुत्तः) किसी से बलात् प्रेरित किये बिना ही (चर्षणीधृतिः) मनुष्यों को धारण करनेवाले हो ॥६॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर यशस्वी, ऋजुमार्गगामी, बलवान्, पाप आदिकों का विनाशक, स्वयं शुभ कार्यों में प्रवृत्त होनेवाला तथा मनुष्यों का धारणकर्त्ता है, वैसे ही राजा और प्रजाजनों को होना चाहिए ॥६॥
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इ꣢न्द्र꣣मि꣢द्दे꣣व꣡ता꣢तय꣣ इ꣡न्द्रं꣢ प्रय꣣꣬त्य꣢꣯ध्व꣣रे꣢ । इ꣡न्द्र꣢ꣳ समी꣣के꣢ व꣣नि꣡नो꣢ हवामह꣣ इ꣢न्द्रं꣣ ध꣡न꣢स्य सा꣣त꣡ये꣢ ॥२४९॥
पदार्थः(इन्द्रम् इत्) इन्द्र नामक जगदीश्वर और सभापति राजा को (देवतातये) विद्वानों के कल्याण के लिए अथवा विद्वानों से फैलाये जानेवाले यज्ञ की पूर्ति के लिए (हवामहे) हम पुकारते हैं। (इन्द्रम्) जगदीश्वर औरराजा को (प्रयति) प्रवृत्त होते हुए (अध्वरे) हिंसादि दोषों से रहित यज्ञ में (हवामहे) हम पुकारते हैं। (इन्द्रम्) जगदीश्वर और राजा को (समीके) देवासुर-संग्राम में (वनिनः) स्तुति, प्रार्थना एवं ज्ञानप्रकाश से युक्त हम लोग (हवामहे) पुकारते हैं। (इन्द्रम्) जगदीश्वर औरराजा को (धनस्य) आध्यात्मिक एवं भौतिक ऐश्वर्य की (सातये) प्राप्ति के लिए (हवामहे) हम पुकारते हैं ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। इन्द्र शब्द की अनेक बार आवृत्ति में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजगत् में अथवा राष्ट्र में विविध सत्कार्यों की सफलता के लिए और विविध ऐश्वर्यों की प्राप्ति के लिए परमात्मा तथा सभापति राजा का पुनःपुनः श्रद्धापूर्वक सेवन करना चाहिए ॥७॥
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इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा पुरूवसो꣣ गि꣡रो꣢ वर्धन्तु꣣ या꣡ मम꣢꣯ । पा꣣वक꣡व꣢र्णाः꣣ शु꣡च꣢यो विप꣣श्चि꣢तो꣣ऽभि꣡ स्तोमै꣢꣯रनूषत ॥२५०॥
पदार्थःहे (पुरूवसो) बहुत धनवाले अथवा बहुत बसानेवाले इन्द्र परमात्मन् (इमाः उ) ये (याः) जो (मम) मेरी (गिरः) वाणियाँ हैं वे (त्वा) आपको अर्थात् आपकी महिमा को (वर्धन्तु) बढ़ायें। (पावकवर्णाः) अग्नि के समान वर्णवाले अर्थात् तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी, (शुचयः) शुद्ध अन्तःकरणवाले (विपश्चितः) विद्वान् लोग (स्तोमैः) स्तोत्रों से (अभि अनूषत) आपकी स्तुति करते ही हैं, जैसे वे आपकी स्तुति करते हैं, वैसे ही मैं भी करूँ ॥८॥
भावार्थःहमें चाहिए कि हम परमात्मा की स्तुति-प्रार्थना-उपासना में और भाषण-उपदेश-गुणवर्णन आदि में अपनीवाणियों का उपयोग करके संसार में परमात्मा के अस्तित्व का प्रचार करें, जिससे सब लोग आस्तिक होकर सदाचारी बनें ॥८॥
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उ꣢दु꣣ त्ये꣡ मधु꣢꣯मत्तमा꣣ गि꣢र꣣ स्तो꣢मा꣣स ईरते । स꣣त्राजि꣡तो꣢ धन꣣सा꣡ अक्षि꣢꣯तोतयो वाज꣣य꣢न्तो꣣ र꣡था꣢ इव ॥२५१॥
पदार्थः(त्ये) वे (मधुमत्तमाः) अत्यन्त मधुर, (सत्राजितः) सत्यजयी, (धनसाः) स्तोता को सद्गुणरूप धन प्रदान करनेवाले, (अक्षितोतयः) अक्षय रक्षावाले, (वाजयन्तः) स्तोता को आत्मबल प्रदान करनेवाले, (गिरः) परमेश्वर की अर्चना में साधनभूत (स्तोमासः) मेरे स्तोत्र (रथाः इव) अन्तरिक्ष में चलनेवाले विमान-रूप रथों के समान (उद्-ईरते उ) उठ रहे हैं। जो विमान-रूप रथ भी (सत्राजितः) समवेत शत्रुओं को जीतने में साधनभूत, (धनसाः) स्थानान्तर से धन को लाने में साधनभूत, (अक्षितोतयः) अक्षय रक्षा के साधनभूत, (वाजयन्तः) अन्न आदि को देशान्तर में पहुंचानेवाले तथा (मधुमत्तमाः) अतिशय मधुर गतिवाले होते हैं ॥९॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःजगदीश्वर की महिमा गाने के लिए मेरी जिह्वा मधुर-मधुर स्तोत्रों को उठा रही है, जैसे विमान-चालक मधुर गतिवाले विमान यानों को ऊपर उठाता है ॥९॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡था꣢ गौ꣣रो꣢ अ꣣पा꣢ कृ꣣तं꣢꣫ तृष्य꣣न्ने꣡त्यवे꣢रिणम् । आ꣣पित्वे꣡ नः꣢ प्रपि꣣त्वे꣢꣫ तूय꣣मा꣡ ग꣢हि꣣ क꣡ण्वे꣢षु꣣ सु꣢꣫ सचा꣣ पि꣡ब꣢ ॥२५२॥
पदार्थः(यथा) जिस प्रकार (गौरः) गौरमृग (तृष्यन्) प्यासा होकर (इरिणम्) मरुस्थल को (अव) छोड़ कर (अपा) जल से (कृतम्) पूर्ण किये हुए जलाशय अथवा जलप्रचुर देश को (एति) चला जाता है, वैसे ही (आपित्वे) बन्धुभाव के अर्थात् प्रीतिरस के (प्रपित्वे) प्राप्त हो जाने पर, अर्थात् प्रीतिरूप जल से हमारे हृदय के पूर्ण हो जाने पर, आप (तूयम्) शीघ्र ही (नः) हमारे पास (आगहि) आइए, और (कण्वेषु) हम मेधावियों के पास आकर (सचा) एक साथ (सु पिब) भली-भाँति हमारे प्रीतिरस-रूप सोम का पान कीजिए ॥१०॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘पित्वे, पित्वे’ में यमक है ॥१०॥
भावार्थःप्यासा गौर मृग जैसे जल-रहित मरुस्थल को छोड़कर जलप्रचुर प्रदेश में चला जाता है, वैसे ही प्रीतिरस का प्यासा परमात्मा भी प्रीतिरहित हृदयों को छोड़कर प्रीतिरस से जिनके हृदय परिपूर्ण हैं, ऐसे मेधावी जनों के पास चला जाता है। परमात्मा के सर्वव्यापक होने से उसमें जाने-आने की क्रियाएँ क्योंकि सम्भव नहीं हैं, इसलिए वेदों में अनेक स्थानों पर वर्णित परमात्मा के गमन-आगमन की प्रार्थना आलङ्कारिक जाननी चाहिए। गमन से उसे भूल जाना तथा आगमन से उसका स्मरण या आविर्भाव लक्षित होता है ॥१०॥ इस दशति में अङ्गों को शरीर में यथास्थान जोड़ने आदि इन्द्र के कौशल का वर्णन होने से, उसके गुण-कर्मों का वर्णन होने से और इन्द्र नाम से जीवात्मा, प्राण, शल्यचिकित्सक, राजा आदि के भी चरित्र का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति जाननी चाहिए ॥ तृतीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
श꣣ग्ध्यू꣢३षु꣡ श꣢चीपत꣣ इ꣢न्द्र꣣ वि꣡श्वा꣢भिरू꣣ति꣡भिः꣢ । भ꣢गं꣣ न꣡ हि त्वा꣢꣯ य꣣श꣡सं꣢ वसु꣣वि꣢द꣣म꣡नु꣢ शूर꣣ च꣡रा꣢मसि ॥२५३॥
पदार्थःहे (शचीपते इन्द्र) प्रज्ञा, वाणी एवं कर्म के स्वामी परमात्मन् व राजन् ! आप (विश्वाभिः) सब (ऊतिभिः) रक्षाओं से (उ) निश्चय ही (सु) भली-भाँति (शग्धि) हमें शक्तिशाली कीजिए। (भगं न हि) सूर्य के समान (यशसम्) यशस्वी, (वसुविदम्) ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले (त्वा अनु) आपकी आज्ञाओं के अनुकूल (शूर) हे दानशूर, धर्मशूर, विद्याशूर, वीरताशूर, परमात्मन् व राजन् ! हम लोग (चरामसि) आचरण करते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के समान राजा को भी वाग्मी, कर्मण्य, ज्ञानी, प्रजा की रक्षा करने में समर्थ, सूर्य के समान कीर्तिमान्, प्रजा को ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाला, दानवीर, धर्मवीर, विद्यावीर और युद्धवीर होना चाहिए। साथ ही प्रजाओं को परमात्मा तथा धर्मात्मा राजा की आज्ञाओं के अनुकूल चलना चाहिए ॥१॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
या꣡ इ꣢न्द्र꣣ भु꣢ज꣣ आ꣡भ꣢रः꣣꣬ स्व꣢꣯र्वा꣣ꣳ अ꣡सु꣢रेभ्यः । स्तो꣣ता꣢र꣣मि꣡न्म꣢घवन्नस्य वर्धय꣣ ये꣢ च꣣ त्वे꣢ वृ꣢क्त꣡ब꣢र्हिषः ॥२५४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमेश्वर ! (स्वर्वान्) धनवान्, प्रकाशवान् और आनन्दवान् आप (अ-सुरेभ्यः) जो सुरापान करके उन्मत्त नहीं हुए हैं, किन्तु जागरूक हैं, उनके लिए (याः भुजः) जिन अन्तप्रकाशरूप वा आनन्दरूप भोगों को (आ अभरः) लाते हो, उनसे, हे (मघवन्) दिव्य सम्पत्ति के स्वामी ! (अस्य) इस अध्यात्म-यज्ञ के (स्तोतारम्) स्तोता यजमान को (इत्) अवश्य ही (वर्धय) बढ़ाओ, (ये च) और जो (त्वयि) आपकी प्राप्ति करानेवाले अध्यात्मयज्ञ में (वृक्तबर्हिषः) मार्गदर्शक ऋत्विज् लोग हैं, उन्हें भी बढ़ाओ ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) शुत्रविदारक सम्पत्तिप्रदायक राजन् ! (स्वर्वान्) राजनीति विद्या के प्रकाश से युक्त आपने (असुरेभ्यः) अदानी, अपने कोठों में ही राष्ट्र की सम्पत्ति को भरनेवाले कृपणों के पास से (याः भुजः) जिन भोग्य-सम्पदाओं को (आ अभरः) अपहृत किया है, छीना है, उनसे, हे (मघवन्) धनी राजन् ! (अस्य) इस राष्ट्रयज्ञ के (स्तोतारम्) स्तोता को, राष्ट्रगीत के गायक को, न कि राष्ट्र द्रोही को (इत्) ही (वर्धय) समृद्ध कीजिए, (ये च) और जो (त्वे) आपके लिए, आपकी सहायता के लिए (वृक्तबर्हिषः) राष्ट्रयज्ञ का विस्तार करनेवाले राजपुरुष हैं, उन्हें भी समृद्ध कीजिए ॥ राजा को उचित है कि अपने राज्य के कृपण धनपतियों को प्रेरणा करे कि वे निर्धनों को अपने धन का दान करें। फिर भी जो दान न करें, उनके धन को बलात् उनसे छीन ले, यह वैदिक मर्यादा अनेक वेदवाक्यों से प्रमाणित होती है, यथा ‘हे तेजस्वी पोषक राजन्, जो अपनी सम्पत्ति का दान नहीं करना चाहता, उसे आप दान के लिए प्रेरित कीजिए। ऋ० ६।५३।३’, हे राष्ट्र के स्वामी राजन् ! दान न करनेवालों के धन को आप छीन लीजिए—ऋ० १।८१।९। यही बात प्रस्तुत मन्त्र में भी कही गयी है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर धार्मिक उपासकों को ज्ञान-प्रकाश से और दिव्य आनन्द से समृद्ध करता है, वैसे ही राजा भी राष्ट्र-भक्तों को समृद्ध करे और राष्ट्रद्रोहियों को दण्डित करे ॥२॥
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छन्द -बृहती| देवता -मित्रावरुणादित्याः| स्वर - मध्यमः
प्र꣢ मि꣣त्रा꣢य꣣ प्रा꣢र्य꣣म्णे꣡ स꣢च꣣꣬थ्य꣢꣯मृतावसो । व꣣रूथ्ये꣢३ व꣡रु꣢णे꣣ छ꣢न्द्यं꣣ व꣡चः꣢ स्तो꣣त्र꣡ꣳ राज꣢꣯सु गायत ॥२५५॥
पदार्थःप्रथम—वायु आदि के पक्ष में। हे (ऋतावसो) सत्यरूप धनवाले मानव ! तू (मित्राय) वायु के लिए, (अर्यम्णे) आदित्य के लिए और (वरुथ्ये) शरीर रूप गृह के लिए हितकर (वरुणे) अग्नि के लिए (सचथ्यम्) सेवनीय, (छन्द्यम्) छन्दोबद्ध (वचः) स्तुति-वचन को (प्र प्र) भली-भाँति गान कर, गान कर। हे भाइयो ! तुम भी (राजसु) उक्त शोभायमान वायु, आदित्य और अग्नि के सम्बन्ध में (स्तोत्रम्) स्तोत्र का (गायत) गान करो ॥ द्वितीय—प्राणों के पक्ष में। हे (ऋतावसो) प्राणायाम रूप यज्ञ को धन माननेवाले प्राणसाधक ! तू (मित्राय) पूरक प्राण के लिए, (अर्यम्णे) कुम्भक प्राण के लिए और (वरूथ्ये) शरीररूप गृह के हितकारी (वरुणाय) रेचक प्राण के सम्बन्ध में (सचथ्यम्) एक साथ मिलकर पढ़ने योग्य, (छन्द्यम्) छन्दोबद्ध (वचः) प्राण महिमापरक वचन का (प्र प्र) भली-भाँति उच्चारण कर। हे दूसरे प्राणसाधको ! तुम भी (राजसु) प्रदीप्त हुए पूर्वोक्त पूरक, कुम्भक एवं रेचक प्राणों के विषय में (स्तोत्रम्) प्राण का महत्त्व प्रतिपादित करनेवाले स्तोत्र का (गायत) गान करो ॥ प्राण का महत्त्व प्रतिपादन करनेवाले छन्दोबद्ध वेदमन्त्र अथर्व ११।४ में देखने चाहिए। जैसे “अन्दर आनेवाले पूरक प्राण को हम अनुकूल करें, बाहर जानेवाले रेचक प्राण को अनुकूल करें” आदि अथर्व० ११।४।८ ॥ तृतीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (ऋतावसो) राष्ट्रयज्ञ को धन माननेवाले राष्ट्रभक्त ! तू राजा रूप इन्द्र के साथ-साथ (मित्राय) देश-विदेश में मैत्री के सन्देश का प्रसार करनेवाले राज्याधिकारी के लिए, (अर्यम्णे) न्यायाध्यक्ष के लिए और (वरूथ्ये) सेना के लिए हितकारी (वरुणे) शत्रुनिवारक सेनाध्यक्ष के लिए (सचथ्यम्) सहगान के योग्य, (छन्द्यम्) छन्दोबद्ध गीत को (प्र प्र) भली-भाँति गा। हे दूसरे राष्ट्रभक्तो ! तुम भी (राजसु) पूर्वोक्त राज्याधिकारियों के विषय में (स्तोत्रम्) उन-उनके गुण वर्णन करनेवाले स्तोत्र को (गायत) गाओ ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की सृष्टि में जो वायु-सूर्य और अग्नि आदि, मनुष्य के शरीर में जो प्राण आदि और राष्ट्र में जो विभिन्न राज्याधिकारी हैं, उनके गुण-कर्मों का वर्णन करते हुए उनसे यथायोग्य लाभ सबको प्राप्त करने चाहिएँ ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ पू꣣र्व꣡पी꣢तय꣣ इ꣢न्द्र꣣ स्तो꣡मे꣢भिरा꣣य꣡वः꣢ । स꣣मीचीना꣡स꣢ ऋ꣣भ꣢वः꣣ स꣡म꣢स्वरन्रु꣣द्रा꣡ गृ꣢णन्त पू꣣र्व्य꣢म् ॥२५६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमात्मन् ! (पूर्वपीतये) जिसका श्रेष्ठ रसास्वादन होता है, उस आनन्द के लिए (आयवः) मनुष्य (स्तोमेभिः) स्तोत्रों से (त्वा) आपकी (अभि) चारों ओर स्तुति करते हैं। (समीचीनासः) सम्यक् शुभकर्मों में संलग्न अथवा परस्पर संगत हुए (ऋभवः) मेधावी लोग (समस्वरन्) आपकी स्तुति करते हैं, (रुद्राः) सदुपदेशक, प्राणसाधक स्तोता लोग (पूर्व्यम्) पूर्वकाल में भी विद्यमान अर्थात् सनातन आपकी (गृणन्त) अर्चना करते हैं ॥४॥
भावार्थःआयुष्मान्, सामान्यजन, कर्मयोगी मेधावीजन, सदुपदेशक स्तोताजन सभी जिस परमात्मा की आराधना करते हैं, उसकी आराधना हम भी क्यों न करें ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य बृह꣣ते꣡ मरु꣢꣯तो꣣ ब्र꣡ह्मा꣢र्चत । वृ꣣त्र꣡ꣳ ह꣢नति वृत्र꣣हा꣢ श꣣त꣡क्र꣢तु꣣र्वज्रेण श꣣त꣡प꣢र्वणा ॥२५७॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (मरुतः) मेरे प्राणो ! (वः) तुम (बृहते) महान् (इन्द्राय) परमेश्वर के लिए (ब्रह्म) साम-स्तोत्र को (प्र अर्चत) प्रेरित करो। वह (वृत्रहा) पापहन्ता (शतक्रतुः) अनन्त प्रज्ञावाला तथा अनन्त कर्मोंवाला परमेश्वर, अपने (शतपर्वणा) बहुमुखी (वज्रेण) वीर्य से (वृत्रम्) पाप को (हनति) नष्ट करे ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (मरुतः) राष्ट्रवासी प्रजाजनो ! (वः) तुम लोग (बृहते) महान् (इन्द्राय) वीर सेनाध्यक्ष के लिए (ब्रह्म) स्तोत्र अर्थात् प्रार्थनावचन (अर्चत) प्रेरित करो। वह (वृत्रहा) अत्याचारियों का संहारक (शतक्रतुः) अनेक शत्रु-विध्वंसक कार्यों का कर्ता सेनाध्यक्ष (शतपर्वणा वज्रेण) सौ कीलों से युक्त गदादि वज्र से अथवा सौ गोलों या गोलियों के आधारभूत तोप, बन्दूक आदि शस्त्र से (वृत्रम्) राष्ट्र की उन्नति में प्रतिबन्धक मायावी शत्रु को (हनति) मारे ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, ‘वृत्रं, वृत्र’ में छेकानुप्रास और ‘शत, शत’ में लाटानुप्रास है ॥५॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर उपासक के काम-क्रोध आदि तथा पाप आदि रिपुओं का संहार करता है, वैसे ही सेनाध्यक्ष को चाहिए कि राष्ट्र के सब शत्रुओं का समूल उन्मूलन करे ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
बृ꣣ह꣡दिन्द्रा꣢꣯य गायत꣣ म꣡रु꣢तो वृत्र꣣ह꣡न्त꣢मम् । ये꣢न꣣ ज्यो꣢ति꣣र꣡ज꣢नयन्नृता꣣वृ꣡धो꣢ दे꣣वं꣢ दे꣣वा꣢य꣣ जा꣡गृ꣢वि ॥२५८॥
पदार्थःहे (मरुतः) मनुष्यो ! तुम (इन्द्राय) परमैश्वर्यवान् परमात्मा के लिए (वृत्रहन्तमम्) विघ्नों व पापों के अतिशय विनाशक (बृहत्) “त्वामिद्धि हवामहे” साम २३४, ८०९ ऋचा पर गाये जानेवाले बृहत् नामक सामगान को (गायत) गाओ, (येन) जिस गान से (ऋतावृधः) सत्य को बढ़ानेवाले सिद्ध योगी लोग (देवाय) योगाङ्गों में कीड़ा करनेवाले साधक के लिए (देवम्) प्रकाशमान, (जागृवि) जागरणशील (ज्योतिः) अन्तःज्योति को (अजनयन्) उत्पन्न कर देते हैं ॥६॥
भावार्थःजिस सामगान से सिद्ध योगी लोग योगाभ्यासी शिष्य को योगविद्या में निष्णात कर देते हैं, वह सामगान हमें भी गाना चाहिए ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
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इ꣢न्द्र꣣ क्र꣡तुं꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र पि꣣ता꣢ पु꣣त्रे꣢भ्यो꣣ य꣡था꣢ । शि꣡क्षा꣢ णो अ꣣स्मि꣡न्पु꣢रुहूत꣣ या꣡म꣢नि जी꣣वा꣡ ज्योति꣢꣯रशीमहि ॥२५९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परम ऐश्वर्य को देनेवाले जगदीश्वर, आचार्य वा राजन् ! आप (नः) हमें (क्रतुम्) विज्ञान और कर्म (आभर) प्रदान करो, (यथा) जिस प्रकार (पिता) पिता (पुत्रेभ्यः) अपने पुत्रों और पुत्रियों के लिए विज्ञान और कर्म प्रदान करता है। हे (पुरुहूत) बहुस्तुत जगदीश्वर, आचार्य वा राजन् ! आप (अस्मिन्) इस सामने विद्यमान (यामनि) जीवनमार्ग, जीवनयज्ञ अथवा योगमार्ग में (नः) हमें (शिक्ष) सभी सामर्थ्य प्रदान करो अथवा शिक्षा दो कि (जीवाः) जीवित और जागरूक रहते हुए हम (ज्योतिः) आशारूप ज्योति को, कर्तव्याकर्तव्यदर्शनरूप ज्योति को, आत्मज्योति को, अथवा परब्रह्म की दिव्य ज्योति को (अशीमहि) प्राप्त कर लेवें ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमा अलङ्कार हैं ॥७॥
भावार्थःजैसे पिता अपनी सन्तानों को ज्ञान देता है, कर्म करना सिखाता है, मार्ग में चलना और दौड़ना सिखाता है, जिससे आत्मनिर्भर होकर वे जीवन में सफल होते हैं, वैसे ही परमात्मा, आचार्य और राजा हमें प्रचुर ज्ञान, महान् कर्मयोग, अतुल सामर्थ्य और श्रेष्ठ शिक्षा प्रदान करें, जिससे हम जीवन से निराशा के अन्धकार को दूर कर जीवित-जागृत रहते हुए, उत्तरोतर ज्योति का दर्शन करते हुए सर्वोत्कृष्ट ईश्वरीय दिव्य ज्योति को पा सकें ॥७॥
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मा꣡ न꣢ इन्द्र꣣ प꣡रा꣢ वृण꣣ग्भ꣡वा꣢ नः सध꣣मा꣡द्ये꣢ । त्वं꣡ न꣢ ऊ꣣ती꣢꣫ त्वमिन्न꣣ आ꣢प्यं꣣ मा꣡ न꣢ इन्द्र꣣ प꣡रा꣢ वृणक् ॥२६०॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् परमेश्वर, आचार्य व राजन् ! आप (नः) हमें (मा परावृणक्) मत छोड़ो। (सधमाद्ये) जहाँ साथ-साथ आनन्द से रहते हैं उस घर, यज्ञ, गुरुकुल, सभास्थल, राष्ट्र आदि में, आप (नः) हमारे (भव) सहायक होवो। (त्वम्) आप (नः) हमारी (ऊती) रक्षा के लिए होवो। (त्वम् इत्) आप ही (नः) हमारे (आप्यम्) बन्धु बनो। हे (इन्द्र) परमेश्वर आचार्य व राजन् ! (नः मा परावृणक्) आप हमें असहाय मत छोड़ो ॥ यहाँ पुनरुक्ति से उत्कट इच्छा सूचित होती है। निरुक्तकार ने भी कहा है कि पुनरुक्ति में बहुत बड़ा अर्थ छिपा होता है, जैसे किसी अद्भुत वस्तु को देखकर द्रष्टा कहता है—“अहो दर्शनीय है, अहो दर्शनीय है।” (निरु० १०।४०) ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःपरमात्मा, गुरुजन और राजा का यथायोग्य पूजन व सत्कार करके उनसे बहुमूल्य लाभ प्राप्त करने चाहिएँ ॥८॥
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व꣣यं꣡ घ꣢ त्वा सु꣣ता꣡व꣢न्त꣣ आ꣢पो꣣ न꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषः । प꣣वि꣡त्र꣢स्य प्र꣣स्र꣡व꣢णेषु वृत्रह꣣न्प꣡रि꣢ स्तो꣣ता꣡र꣢ आसते ॥२६१॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन् ! (वृक्तबर्हिषः) जिन्होंने अन्तरिक्ष को छोड़ दिया है, ऐसे (आपः न) मेघ जलों के समान (वृक्तबर्हिषः) सांसारिक एषणाओं को छोड़े हुए (सुतावन्तः) उपासना-रसों को अभिषुत किये हुए (वयं घ) हम (त्वा) आपकी स्तुति करते हैं, क्योंकि, हे (वृत्रहन्) पापविनाशक परमेश्वर ! (स्तोतारः) आपके स्तोता लोग (पवित्रस्य) शुद्ध सात्त्विक आनन्द के (प्रस्रवणेषु) प्रवाहों में (परि आसते) तैरा करते हैं, जैसे अन्तरिक्ष को छोड़े हुए उपर्युक्त मेघ-जल (प्रस्रवणेषु) नदियों, झरनों आदियों में (परि आसते) बहते हैं ॥९॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। साथ ही कारणरूप उत्तरार्द्धवाक्य कार्यरूप पूर्वार्द्धवाक्य का समर्थन कर रहा है अतः कारण से कार्यसमर्थनरूप अर्थान्तरन्यास अलङ्कार भी है ॥९॥
भावार्थःजैसे मेघों के जल आकाश को छोड़कर भूमि पर आकर धान्य, वनस्पति आदि को उत्पन्न करते हैं, वैसे ही हम पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा आदि का परित्याग करके परमात्मा को प्राप्त कर आनन्द-रस को उत्पन्न करें ॥९॥
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य꣡दि꣢न्द्र꣣ ना꣡हु꣢षी꣣ष्वा꣡ ओजो꣢꣯ नृ꣣म्णं꣡ च꣢ कृ꣣ष्टि꣡षु꣢ । य꣢द्वा꣣ प꣡ञ्च꣢ क्षिती꣣नां꣢ द्यु꣣म्न꣡मा भ꣢꣯र स꣣त्रा꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ पौ꣡ꣳस्या꣢ ॥२६२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) दान के महारथी परमेश्वर ! (यत्) जो (नाहुषीषु) संघरूप में परस्पर बँधी हुई मानव-प्रजाओं में (ओजः) संघ का बल, और (कृष्टिषु) कृषि आदि धन कमाने के कामों में लगी हुई प्रजाओं में (नृम्णम्) धन का बल (आ) आता है, (यद् वा) और जो (पञ्चक्षितीनाम्) निवास में कारणभूत पाँच ज्ञानेन्द्रियों का अथवा प्राण, मन, बुद्धि चित्त, अहङ्कार इन पाँचों का (द्युम्नम्) यश है, वह (आभर) हमें प्रदान कीजिए। (सत्रा) साथ ही (विश्वानि) सब (पौंस्या) धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप पुरुषार्थों को भी (आभर) प्रदान कीजिए ॥१०॥
भावार्थःसंघ का बल, ऐश्वर्य का बल, इन्द्रियों का बल, प्राणसहित अन्तःकरणचतुष्टय का बल, और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का बल परमेश्वर की कृपा से हमें प्राप्त हो, जिससे हमारा मनुष्य-जीवन सफल हो ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र तथा उससे सम्बद्ध मित्र, वरुण, अर्यमा के महत्त्ववर्णनपूर्वक उसकी स्तुति के लिए प्रेरणा होने से, इन्द्र से ओज, क्रतु, नृम्ण, द्युम्न आदि की याचना होने से और इन्द्र नाम से आचार्य, राजा, सेनाध्यक्ष आदि के भी गुण-कर्मों का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ तृतीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
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स꣣त्य꣢मि꣣त्था꣡ वृषे꣢꣯दसि꣣ वृ꣡ष꣢जूतिर्नोऽवि꣣ता꣢ । वृ꣢षा꣣꣬ ह्यु꣢꣯ग्र शृण्वि꣣षे꣡ प꣢रा꣣व꣢ति꣣ वृ꣡षो꣢ अर्वा꣣व꣡ति꣢ श्रु꣣तः꣢ ॥२६३॥
पदार्थःहे इन्द्र परमेश्वर ! (सत्यम् इत्था) सचमुच-सचमुच आप (वृषा इत्) ऐश्वर्यवर्षी होने से वर्षा करनेवाले बादल ही (असि) हो, और (वृषजूतिः) विद्युत् आदि पदार्थों को मन के वेग के समान वेग प्रदान करनेवाले (नः) हमारे (अविता रक्षक हो। हे (उग्र प्रबल ऐश्वर्यवाले ! आप (परावति) उत्कृष्ट मोक्ष-लोक में (वृषा हि) निश्चय ही मोक्ष के आनन्दों की वर्षा करनेवाले (शृण्विषे) सुने जाते हो, और (अर्वावति) इस लोक में भी (वृषः) धर्म-अर्थ-काम-आनन्दों के वर्षक (श्रुतः) सुने गये हो ॥१॥ इस मन्त्र में ‘वृषे, वृष वृषा, वृषो’ में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है। ‘वृषेदसि’—‘आप बादल ही हो’ यहाँ परमेश्वर में बादल का आरोप होने से रूपक है। ‘वति, वति’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःसमस्तगुणगुणों में अग्रणी, इहलोक तथा परलोक में विविध आनन्दों की वृष्टि करनेवाले, परोपकारी परमेश्वर की हम वन्दना क्यों न करें ॥१॥
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य꣢च्छ꣣क्रा꣡सि꣢ परा꣣व꣢ति꣣ य꣡द꣢र्वा꣣व꣡ति꣢ वृत्रहन् । अ꣡त꣢स्त्वा गी꣣र्भि꣢र्द्यु꣣ग꣡दि꣢न्द्र के꣣शि꣡भिः꣢ सु꣣ता꣢वा꣣ꣳ आ꣡ वि꣢वासति ॥२६४॥
पदार्थःहे (शक्र) शक्तिशाली परमेश्वर ! (यत्) क्योंकि, तुम (परावति) सुदूरस्थ सूर्य, नक्षत्र, चन्द्र-मण्डल आदियों में अथवा पराविद्या से प्राप्तव्य मोक्षलोक में (असि) विद्यमान हो, और हे (वृत्रहन्) अविद्या आदि दोषों के विनाशक ! (यत्) क्योंकि, तुम (अर्वावति) समीप स्थित पर्वत, नदी, सागर आदि में अथवा अपरा विद्या से प्राप्तव्य इहलोक के ऐश्वर्य में (असि) विद्यमान हो, (अतः) इसलिए, हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर ! (सुतावान्) उपासना-रस को अभिषुत किये हुए यजमान (त्वा) तुम्हारी (द्युगत्) शीघ्र ही अथवा जिससे मोक्ष प्राप्त हो सके, इस प्रकार (केशिभिः) ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशमान (गीर्भिः) वेदवाणियों से (आ विवासति) पूजा कर रहा है ॥२॥ इस मन्त्र में शक्र, वृत्रहन्, इन्द्र इन सबके इन्द्रवाचक प्रसिद्ध होने से पुनरुक्ति प्रतीत होती है, किन्तु योगार्थ ग्रहण करने से पुनरुक्ति का परिहार हो जाता है, अतः पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार है। ‘वति, वति’ तथा ‘सुता, सति’ में छेकानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःसब कर्म करने में समर्थ, दूर से दूर और समीप से समीप विद्यमान, अविद्या-पाप आदि के विनाशक, सब ऐश्वर्यों के स्वामी परमात्मा की ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश से भरपूर साममन्त्रों के गान से सबको भक्तिपरायण होकर शीघ्र ही उपासना करनी चाहिए और उसकी उपासना से ऐहिक तथा पारलौकिक आनन्द प्राप्त करना चाहिए ॥२॥
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अ꣣भि꣡ वो꣢ वी꣣र꣡मन्ध꣢꣯सो꣣ म꣡दे꣢षु गाय गि꣣रा꣢ म꣣हा꣡ विचे꣢꣯तसम् । इ꣢न्द्रं꣣ ना꣢म꣣ श्रु꣡त्य꣢ꣳ शा꣣कि꣢नं꣣ व꣢चो꣣ य꣡था꣢ ॥२६५॥
पदार्थःहे उद्गाताओ ! (वः) तुम (अन्धसः) श्रद्धारस की (मदेषु) तृप्तियों में (महा) महती (गिरा) वेदवाणी से (वीरम्) विक्रमशाली अथवा शत्रुओं को प्रकम्पित करनेवाले, (विचेतसम्) विशिष्ट ज्ञान से पूर्ण, (श्रुत्यम्) श्रुतियों में प्रसिद्ध, (शाकिनम्) शक्तिमान् (इन्द्रं नाम) इन्द्र नामक परमेश्वर को (अभि) अभिलक्ष्य करके (वचः यथा) जैसा विधिवचन हो, उसके अनुसार (गाय) गाओ, सामगान करो ॥३॥
भावार्थःकाम, क्रोध आदि आन्तरिक शत्रुओं को तथा मानव-समाज में भ्रष्टाचारियों को अपनी वीरता से पराजित करनेवाले, सर्वज्ञ, वेदों में प्रसिद्ध, सब कार्य करने में समर्थ परमेश्वर की सबको सामगानपूर्वक अर्चना करनी चाहिए ॥३॥
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इ꣡न्द्र꣢ त्रि꣣धा꣡तु꣢ शर꣣णं꣢ त्रि꣣व꣡रू꣢थꣳ स्व꣣स्त꣡ये꣢ । छ꣣र्दि꣡र्य꣢च्छ म꣣घ꣡व꣢द्भ्यश्च꣣ म꣡ह्यं꣢ च या꣣व꣡या꣢ दि꣣द्यु꣡मे꣢भ्यः ॥२६६॥
पदार्थःप्रथम—राष्ट्र के पक्ष में। हे (इन्द्र) दुःख-विदारक, सुखप्रदाता, परमैश्वर्य के स्वामी राजन् ! आप (मघवद्भ्यः च) धनिकों के लिए (मह्यं च) और मुझ सामान्य प्रजाजन के लिए (स्वस्तये) सुख, उत्तम अस्तित्व व अविनाश के निमित्त (त्रिधातु) तीन मंजिलोंवाला अथवा कम से कम तीन कोठोंवाला (शरणम्) आश्रय-योग्य, (त्रिवरुथम्) सर्दी, गर्मी और वर्षा तीनों को रोकनेवाला (छर्दिः) घर (यच्छ) प्रदान कीजिए। और (एभ्यः) इन जनों के लिए उक्त घर में (दिद्युम्) बिजुली के प्रकाश को भी (यावय) संयुक्त कीजिए, अथवा (एभ्यः) इन घरों से (दिद्युम्) आकाशीय बिजुली को (यावय) दूर कर दीजिए अर्थात्, घरों में विद्युद्-वाहक ताँबे का तार लगवाकर ऐसा प्रबन्ध करवा दीजिए कि आकाश से गिरी हुई बिजली भी घर को क्षति न पहुँचा सके ॥ द्वितीय—मानव-शरीर के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमेश्वर ! आप इस राष्ट्र के (मघवद्भ्यः) विद्या, स्वास्थ्य आदि धनों से सम्पन्न लोगों के लिए (मह्यं च) और मुझ उपासक के लिए (स्वस्तये) कल्याणार्थ, पुनर्जन्म में (त्रिधातु) सत्त्व-रजस्-तमस् रूप, वात-पित्त-कफरूप, प्राण-मन-बुद्धिरूप, बाल्यावस्था-यौवन-वार्धक्यरूप वा अस्थि-मज्जा-वीर्यरूप तीन धातुओं से युक्त, (शरणम्) आत्मा का आधारभूत, (त्रिवरुथम्) ज्ञान-कर्म-उपासनारूप तीन वरणीय व्रतों से युक्त (छर्दिः) मानव-शरीररूप घर (यच्छ) प्रदान कीजिए और (एभ्यः) इन शरीर-गृहों से (दिद्युम्) संतापक रोग आदि तथा दुष्कर्म आदि को (यावय) दूर करते रहिए ॥ तृतीय—अध्यात्म-परक। हे (इन्द्र) दुःखविदारक, सुखप्रदाता, परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! आप (मघवद्भ्यः) योगसिद्धिरूप धन के धनिक सिद्ध योगी जनों के लिए (मह्यं च) और मुझ योग-साधक के लिए (स्वस्तये) मोक्षरूप उतम अस्तित्व के प्राप्त्यर्थ (त्रिधातु) सत्त्व, चित्त्व और आनन्दरूप तीन धातुओंवाली, (त्रिवरुथम्) आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक रूप तीनों दुःखों को दूर करनेवाली, (छर्दिः) पापों का वमन करानेवाली (शरणम्) अपनी शरण (यच्छ) प्रदान कीजिए। (एभ्यः) इन योग में संलग्न लोगों के हितार्थ (दिद्युम्) उत्तेजक काम, क्रोध आदि को (यावय) दूर कर दीजिए ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। पूर्वार्ध में तकार का अनुप्रास और उत्तरार्ध में यकार का अनुप्रास भी है ॥४॥
भावार्थःराजकीय सहायता से राष्ट्रवासियों के रहने के घर यथायोग्य तिमंजिले, कम से कम तीन कोठोंवाले, सर्दी-गर्मी-वर्षा से त्राण करनेवाले, सब ऋतुओं में सुखकर, बिजली के प्रकाश से युक्त और आकाश की बिजली गिरने पर क्षतिग्रस्त न होनेवाले हों। परमात्मा की छत्रछाया रूप घर भी हमें सुलभ हो। साथ ही हम सदा ऐसे कर्म करें, जिनसे हमें पुनः-पुनः मानव-शरीर-रूप घर ही मिले, कभी ऐसे कर्मों में लिप्त न हों, जिनसे हमें शेर, बाघ, कीड़ें-पतंगों की योनियों अथवा स्थावरयोनियों में जन्म लेना पड़े ॥४॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
श्रा꣡य꣢न्त इव꣣ सू꣢र्यं꣣ वि꣡श्वेदिन्द्र꣢꣯स्य भक्षत । व꣡सू꣢नि जा꣣तो꣡ जनि꣢꣯मा꣣न्यो꣡ज꣢सा꣣ प्र꣡ति꣢ भा꣣गं꣡ न दी꣢꣯धिमः ॥२६७॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (श्रायन्तः) फल पकानेवाले वृक्ष आदि अथवा पकानेवाले अग्नि आदि (सूर्यम् इव) जैसे सूर्य का सेवन करते हैं, वैसे (श्रायन्तः) अपने आत्मा को परिपक्व करते हुए तुम लोग (इन्द्रस्य) जगत् के सम्राट् परमेश्वर के (विश्वा इत्) सभी परोपकार, दयालुता, न्यायकारिता आदि स्वरूपों का (भक्षत) सेवन करो। (जातः) प्रसिद्ध वह परमेश्वर (ओजसा) अपने बल से (वसूनि) समस्त धनों को, और (जनिमानि) विविध जन्मों को देता है। हम (भागं न) जैसे पुत्र दायभाग को ग्रहण कर अपने पास रख लेता है, वैसे ही उस इन्द्र परमेश्वर को (प्रतिदीधिमः) अपने हृदय में धारण करते हैं ॥५॥ इस मन्त्र में दो उपमालङ्कारों की संसृष्टि है ॥५॥
भावार्थःजैसे सूर्य के बिना फल आदि नहीं पकते हैं, ऐसे ही परमेश्वर के बिना जीवात्माओं का परिपाक नहीं होता है। जैसे पुत्र अपने दायभाग को अपने पास रख लेते हैं, ऐसे ही सबको चाहिए कि परमात्मा को अपने अन्दर धारण करें ॥५॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
न꣢ सी꣣म꣡दे꣢व आप꣣ त꣡दिषं꣢꣯ दीर्घायो꣣ म꣡र्त्यः꣢ । ए꣡त꣢ग्वा꣣ चि꣣द्य꣡ एत꣢꣯शो यु꣣यो꣡ज꣢त꣣ इ꣢न्द्रो꣣ ह꣡री꣢ यु꣣यो꣡ज꣢ते ॥२६८॥
पदार्थःहे (दीर्घायो) दीर्घायु यजमान ! (अदेवः) जो देव अर्थात् तेजस्वी और महत्त्वाकांक्षी नहीं है, वह (मर्त्यः) मनुष्य (तत्) उस प्रसिद्ध (इषम्) अभीप्सित विजय, साम्राज्य, मोक्ष आदि को (न सीम् आप) नहीं प्राप्त कर पाता। (यः) जो यजमान (एतशः) गतिशील एवं कर्मण्य होकर (एतग्वा) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-रूप अथवा मन-प्राण-रूप अश्वों को (चित्) निश्चय ही (युयोजते) कार्यों में नियुक्त करता है, उसके प्रति (इन्द्रः) परमेश्वर भी (हरी) अपने ज्ञान-कर्म-रूप अश्वों को (युयोजते) नियुक्त करता है, अर्थात् ज्ञान और कर्म से उसकी सहायता करता है ॥६॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि विद्याविस्तार, शत्रुविजय, चक्रवर्ती साम्राज्य, मोक्ष आदि को लक्ष्य बनाकर मन, बुद्धि, प्राण, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय आदि साधनों का उपयोग कर, कर्मण्यता को स्वीकार कर पुरुषार्थ करें, क्योंकि आलसी लोगों का परमेश्वर भी सहायक नहीं होता है ॥६॥
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आ꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢सु꣣ ह꣢व्य꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣म꣡त्सु꣢ भूषत । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि꣣ स꣡व꣢नानि वृत्रहन्परम꣣ज्या꣡ ऋ꣢चीषम ॥२६९॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (विश्वासु समत्सु) सब देवासुर-संग्रामों में (नः) हमारे और तुम्हारे, सबके (हव्यम्) पुकारने योग्य (इन्द्रम्) शत्रुविदारक परमात्मा को (आभूषत) नेता के पद पर अलंकृत करो। हे (वृत्रहन्) पाप आदि असुरों के विनाशक, हे (ऋचीषम) वेदज्ञों का सत्कार करनेवाले, स्तोताओं को मान देनेवाले, स्तुति के अनुरूप परमात्मन् ! (परमज्याः) प्रबल कामक्रोधादि रिपुओं के विध्वंसक, आप (ब्रह्माणि) हमारे स्तोत्रों को और (सवनानि) जीवनरूप यज्ञ के बचपन-यौवन-बुढ़ापा रूप प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन तथा सायंसवनों को (उप) प्राप्त होवो ॥७॥
भावार्थःमनुष्य के जीवन में जो बाह्य और आन्तरिक देवासुर-संग्राम उपस्थित होते हैं, उनमें यदि वह परमेश्वर को स्मरण कर उससे बल प्राप्त करे तो सभी प्रतिद्वन्द्विओं को पराजित कर सकता है ॥७॥
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त꣡वेदि꣢꣯न्द्राव꣣मं꣢꣫ वसु꣣ त्वं꣡ पु꣢ष्यसि मध्य꣣म꣢म् । स꣣त्रा꣢ विश्व꣢꣯स्य पर꣣म꣡स्य꣢ राजसि꣣ न꣡ कि꣢ष्ट्वा꣣ गो꣡षु꣢ वृण्वते ॥२७०॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर ! (अवमम्) निचला अर्थात् पृथिवी अथवा शरीर में स्थित (वसु) धन (तव इत्) तेरा ही है। (त्वम्) तू ही (मध्यमम्) मध्यलोक अन्तरिक्ष में अथवा मनरूपी लोक में विद्यमान धन को (पुष्यसि) परिपुष्ट करता है। (सत्रा) सचमुच ही तू (विश्वस्य) सब (परमस्य) उच्च द्यौलोक में अथवा आत्मलोक में विद्यमान धन का भी (राजसि) राजा है। (त्वा) तुझे (गोषु) पृथिवी आदि लोकों में अथवा गाय आदि धनों के दानों में (न किः) कोई भी नहीं (वृण्वते) रोक सकते हैं ॥८॥
भावार्थःनिचले भूलोक में जो चाँदी, सोना, मणि, मोती, हीरे, कन्द, फल, रस, गाय, घोड़े, सन्तान, आदि ऐश्वर्य है, बीच के अन्तरिक्षलोक में जो बिजली, बादल, ग्रह, चन्द्रमा आदि ऐश्वर्य है, और उच्च द्युलोक में जो सूर्यकिरण, तारामण्डल आदि धन है, उस सबका परमेश्वर ही राजा है। उसी प्रकार हमारे अध्यात्म-जगत् में स्थूल शरीर का त्वचा, हड्डी, मज्जा, वीर्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय आदि जो धन है, बीच के मनोलोक का जो मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार रूप धन है, और परम लोक आत्मा का जो ज्ञान आदि ऐश्वर्य है, उसका भी परमेश्वर ही शासक और पोषक है। उस परमेश्वर की पृथिवी आदि लोकों में कहीं भी गति रोकी नहीं जा सकती। वह अपने ऐश्वर्य में से जो कुछ भी गाय आदि धन जिस किसी को भी देना चाहता है, उसके उस दान में भी कोई विघ्न नहीं डाल सकता है ॥८॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
क्वे꣢꣯यथ꣣ क्वे꣡द꣢सि पुरु꣣त्रा꣢ चि꣣द्धि꣢ ते꣣ म꣡नः꣢ । अ꣡ल꣢र्षि युध्म खजकृत्पुरन्दर꣣ प्र꣡ गा꣢य꣣त्रा꣡ अ꣢गासिषुः ॥२७१॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर अथवा राजन् ! तू (क्व) कहाँ (इयथ) चला गया है? (क्व इत्) कहाँ (असि) है? (पुरुत्रा चित्) बहुतों में अर्थात् बहुतों के उद्धार में (ते) तेरा (मनः) मन लगा हुआ है। हे (युध्म) युद्ध-कुशल ! हे (खजकृत्) शत्रुओं का मन्थन करनेवाले ! हे (पुरन्दर) शत्रु की नगरियों को विदीर्ण करनेवाले ! तू (अलर्षि) गतिमय अर्थात् कर्मण्य है। (गायत्राः) प्रभुस्तुति के अथवा राष्ट्रगान के गायक जन (अगासिषुः) तेरा यशोगान कर रहे हैं ॥ वास्तव में परमात्मा हमें छोड़कर कहीं नहीं चला जाता, हम ही उसे छोड़ते हैं। यह भाषा की शैली है कि स्वयं को उपालम्भ देने के स्थान पर परमात्मा को उपालम्भ दिया जा रहा है। कहीं-कहीं परमात्मा के अनुग्रह-रहित होने पर स्वयं को ही उपालम्भ दिया गया है। जैसे “हे वरुण परमात्मन् ! मुझसे क्या अपराध हो गया है कि आप मुझ अपने सबसे बड़े स्तोता का वध करना चाह रहे हैं? मेरा अपराध मेरे ध्यान में ला दीजिए, जिससे मैं उस अपराध को छोड़कर नमस्कारपूर्वक आपकी शरण में आ सकूँ।” ऋ० ७।८६।४। एवं दोनों प्रकार की शैली वेदों में प्रयुक्त हुई है। राजा-परक अर्थ में शत्रु से पीड़ित प्रजाजन राजा को पुकार रहे हैं और उसे उद्बोधन दे रहे हैं, यह समझना चाहिए ॥९॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है। ‘क्वे क्वे’ में छेकानुप्रास और ‘युध्म, खजकृत्, पुरन्दर’ में पुनरुक्तवदाभास है ॥९॥
भावार्थःजैसे काम, क्रोध आदि शत्रुओं से पीड़ित जन सहायता के लिए परमात्मा को पुकारते हैं, वैसे ही मानव-शत्रुओं से और दैवी विपत्तियों से व्याकुल किये गये आर्त प्रजाजन राजा को बुलाते हैं ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
व꣣य꣡मे꣢नमि꣣दा꣡ ह्योपी꣢꣯पेमे꣣ह꣢ व꣣ज्रि꣡ण꣢म् । त꣡स्मा꣢ उ अ꣣द्य꣡ सव꣢꣯ने सु꣣तं꣡ भ꣣रा꣢ नू꣣नं꣡ भू꣢षत श्रु꣣ते꣢ ॥२७२॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म पक्ष में। (वयम्) हम उपासक लोग (वज्रिणम्) दुर्जनों वा दुर्गुणों के प्रति वज्रधारी अर्थात् उनके विनाशक, (एनम्) प्रसिद्ध गुणोंवाले इस इन्द्र परमेश्वर को (इदा) इस समय और (ह्यः) कल (इह) इस उपासना-यज्ञ में (अपीपेम) स्तुतिगान से रिझा चुके हैं। हे भाई ! तू भी (तस्मै उ) उस इन्द्र परमेश्वर के लिए (अद्य) आज (सवने) अपने जीवन-यज्ञ में (सुतम्) श्रद्धारूप सोमरस को (भर) हृदय में धारण कर अथवा अर्पित कर। हे साथियो ! तुम सब भी (नूनम्) निश्चय ही (श्रुते) वेदादि द्वारा उसकी महिमा सुनी जाने पर, उसे (आभूषत) स्तोत्ररूप उपहारों से अलंकृत करो ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। (वयम्) हम लोगों ने (वज्रिणम्) दुष्ट शत्रुओं तथा चोर, ठग, लुटेरों आदियों के प्रति दण्डधारी (एनम्) इस अपने सम्राट् को (इदा) वर्तमान काल में, और (ह्यः) भूतकाल में (इह) इस राष्ट्र-यज्ञ में (अपीपेम) कर-प्रदान द्वारा बढ़ाया है। हे भाई ! तू भी (तस्मै उ) उस सम्राट् के लिए (अद्य) आज (सवने) राष्ट्ररूप यज्ञ में (सुतम्) अपनी आमदनी की राशि में से पृथक् किये हुए राजदेय कर को (भर) प्रदान कर। हे दूसरे प्रजाजनों ! तुम भी (नूनम्) निश्चयपूर्वक (श्रुते) राजाज्ञा के सुनने पर, राजा को (आभूषत) अपना-अपना देय अंश देकर अलङ्कृत करो ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि दुर्जनों और दुर्गुणों के विनाशक तथा सज्जनों और सद्गुणों के पोषक परमेश्वर की उपासना करें। उसी प्रकार दुष्ट शत्रुओं, चोर, लम्पट, ठग, लुटेरे आदियों तथा अशान्ति फैलानेवालों को दण्ड देनेवाले और सज्जनों तथा शान्ति के प्रेमियों को बसानेवाले सम्राट् का भी कर (टैक्स) देकर सम्मान करना चाहिए ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र के गुणों का वर्णन करके उसकी महिमा गाने की प्रेरणा होने से, उससे गृह आदि की याचना होने से, उसका आह्वान होने से और इन्द्र नाम से राजा आदि का भी वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ तृतीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
यो꣡ राजा꣢꣯ चर्षणी꣣नां꣢꣫ याता꣣ र꣡थे꣢भि꣣र꣡ध्रि꣢गुः । वि꣡श्वा꣢सां तरु꣣ता꣡ पृत꣢꣯नानां꣣ ज्ये꣢ष्ठं꣣ यो꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣢ गृ꣣णे꣢ ॥२७३॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (यः) जो इन्द्र परमेश्वर (चर्षणीनाम्) मनुष्यों का (राजा) सम्राट् (रथेभिः याता) मानो रथों से यात्रा करनेवाला अर्थात् रथयात्री के समान शीघ्रव्यापी, (अध्रिगुः) बेरोक गतिवाला तथा (विश्वासाम्) सब (पृतनानाम्) शत्रु-सेनाओं का, अर्थात् शत्रुभूत कामज-क्रोधज आदि गणों का (तरुता) पराजित करनेवाला है, (यः) और जो (वृत्रहा) पापों का संहारक है, उस (ज्येष्ठम्) गुणों में सबसे श्रेष्ठ तथा अनादि होने से आयु में भी सबसे वृद्ध परमेश्वर की, मैं (गृणे) स्तुति और अर्चना करता हूँ ॥ कामज और क्रोधज गणों का उल्लेख मनु ने इस प्रकार किया है—शिकार करना, जुआ खेलना, दिन में सोना, दूसरों की निन्दा करना, दूसरों की स्त्रियों का सेवन करना, नशा करना, अनुचित रूप से बाजे बजाने में लगे रहना, व्यर्थ इधर-उधर घूमना—ये दस काम के गण हैं। चुगली, दुस्साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया, अर्थशुचि न होना, वाणी और दण्ड की कठोरता होना—ये आठ क्रोध के गण हैं। (मनु. ७।४७, ४८)। साधक की उपासना में विघ्न डालनेवाले इन शत्रुगणों को परमेश्वर पराजित कर देता है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (यः) जो (चर्षणीनाम्) मानुषी प्रजाओं का (राजा) राजा, (रथेभिः) जल, स्थल और अन्तरिक्ष में चलनेवाले यानों से (याता) आवागमन करनेवाला, (अध्रिगुः) न रोकी जा सकने योग्य गतिवाला और (विश्वासाम्) सब (पृतनानाम्) रिपुसेनाओं का (तरुता) पराजेता है, (यः) और जो (वृत्रहा) विघ्नकारी शत्रुओं का संहारक है, उस (ज्येष्ठम्) वीरता आदि गुणों में श्रेष्ठ राजा को, मैं (गृणे) पुकारता हूँ, उसकी स्तुति करता हूँ, उसे प्रोत्साहित करता हूँ, उसका सत्कार करता हूँ ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है। परमेश्वर-पक्ष में 'याता रथेभिः में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥१॥
भावार्थःजैसे ब्रह्माण्ड का राजराजेश्वर, संकटों से बचानेवाला, किसी से प्रतिहत न होनेवाला, विजयार्थ प्रयत्नशील दिव्य गुणों की सेनाओं को विजय दिलानेवाला, काम-क्रोध आदि की सेनाओं का ध्वंस करनेवाला, ज्येष्ठ और श्रेष्ठ परमात्मा सबके द्वारा उपासना करने योग्य है, वैसे ही बिजली आदि से चलाये जानेवाले विमान आदि यानों से जाने-आनेवाला, समस्त शत्रुओं को जीतनेवाला वीर राष्ट्रनायक भी संकटकाल में प्रजाजनों द्वारा पुकारने योग्य, प्रोत्साहन देने योग्य तथा गुण-कर्मों की प्रशंसा करके कीर्ति गाने योग्य है ॥१॥
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य꣡त꣢ इन्द्र꣣ भ꣡या꣢महे꣣ त꣡तो꣢ नो꣣ अ꣡भ꣢यं कृधि । म꣡घ꣢वञ्छ꣣ग्धि꣢꣫ तव꣣ त꣡न्न꣢ ऊ꣣त꣢ये꣣ वि꣢꣫ द्विषो꣣ वि꣡ मृधो꣢꣯ जहि ॥२७४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) शत्रुविदारक परमात्मन् अथवा राजन् ! हम लोग (यतः) जिससे (भयामहे) भय खाते हैं, (ततः) उससे (नः) हमारी (अभयम्) निर्भयता (कृधि) कर दो। हे (मघवन्) निर्भयतारूप धन के धनी ! आप (शग्धि) हमें शक्तिशाली बनाओ, (तव) आपका (तत्) वह अभय-प्रदान (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिए होवे, आप (द्विषः) द्वेष-वृत्तियों को अथवा द्वेष करनेवालों को (विजहि) विनष्ट कर दो, (मृधः) हिंसावृत्तियों को अथवा आपस के युद्धों को (विजहि) समाप्त कर दो ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘भया, भयं’ में छेकानुप्रास है। तकार की आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥२॥
भावार्थःमहाबली परमात्मा को हृदय में धारण करके और महापराक्रमी पुरुष को राजा के पद पर अभिषिक्त करके, उनसे अभय पाकर, महत्त्वाकांक्षा जगाकर, महान् कार्यों को करके संसार से द्वेषवृत्तियाँ, हिंसावृत्तियाँ और युद्ध समाप्त करने चाहिएँ और राष्ट्रों में शान्ति एवं सद्भावना स्थापित करनी चाहिए ॥२॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
वा꣡स्तो꣢ष्पते ध्रु꣣वा꣡ स्थूणाꣳ स꣢꣯त्रꣳ सो꣣म्या꣡ना꣢म् । द्र꣣प्सः꣢ पु꣣रां꣢ भे꣢त्ता꣡ शश्व꣢꣯तीना꣣मि꣢न्द्रो꣣ मु꣡नी꣢ना꣣ꣳ स꣡खा꣢ ॥२७५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (वास्तोः पते) ब्रह्माण्डरूप घर के स्वामी इन्द्र परमात्मन् ! आप (सोम्यानाम्) शान्तिमय, दूसरों को शान्ति देनेवाले अथवा ब्रह्मानन्दरूप सोमरस को प्रवाहित करने योग्य स्तोता जनों के (ध्रुवा स्थूणा) स्थिर आधारस्तम्भ अर्थात् आधारस्तम्भ के समान आश्रयभूत हैं, एवं (अंसत्रम्) धनुष् तथा कवच हैं अर्थात् धनुष् के समान विघ्नकर्ताओं पर बाण-प्रहार करनेवाले और कवच के समान रक्षक हैं। (द्रप्सः) रसमय अथवा सूर्य के समान ज्योतिष्मान् तथा (शश्वतीनाम्) चिरकाल से चली आ रही (पुराम्) काम-क्रोधादि शत्रुओं की किलेबन्दियों के (भेत्ता) तोड़नेवाले (इन्द्रः) इन्द्र नामक आप (मुनीनाम्) मुनियों के (सखा) मित्र हैं ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (वास्तोः पते) राष्ट्ररूप गृह के अधिपति इन्द्र राजन् ! आप राष्ट्रयज्ञ रूप सोमयाग करनेवाले प्रजाजनों के (ध्रुवा स्थूणा) स्थिर आधार-स्तम्भ और (अंसत्रम्) धनुष् तथा कवच बनें अर्थात् आप आधारस्तम्भ बनकर प्रजाजनों को सहारा दें और धनुष् बनकर शत्रुओं पर आक्रमण करें एवं कवच बनकर प्रजा का शत्रुजन्य आघातों से त्राण करें। साथ ही (द्रप्सः) प्रेमरस के अगार और सूर्य के समान तेजस्वी तथा (शश्वतीनाम्) चिरकाल से सुदृढ़ रूप में बनायी हुई (पुराम्) शत्रु-नगरियों को (भेत्ता) विदीर्ण करनेवाले (इन्द्रः) सम्राट् आप (मुनीनाम्) मुनिवृत्ति से वनों में बसनेवाले वानप्रस्थों के (सखा) मित्र के समान हितचिन्तक हों ॥ तृतीय—वास्तुकला-विशेषज्ञ शिल्पी के पक्ष में। हे (वास्तोः पते) वास्तुकला-विशेषज्ञ, गृहनिर्माण-कुशल शिल्पी ! ध्यान रख कि (सोम्यानाम्) यज्ञ अथवा ऐश्वर्य के अधिकारी गृहस्थ जनों की (स्थूणा) मकानों के आधारभूत खम्भे व दीवारें (ध्रुवा) सुदृढ़ हों, और (अंसत्रम्) मकानों के कंधों के तुल्य खम्भों, दीवारों आदि की रक्षक छतें भी सुदृढ़ हों, क्योंकि कभी-कभी (द्रप्सः) वर्षा-जल (शश्वतीनाम्) चिरकाल से भी स्थित (पुराम्) नगरियों का, उनमें बने हुए मकानों का (भेत्ता) तोड़कर गिरा देनेवाला हो जाता है। यदि कहो कि मुनियों के घरों के विषय में निवेदन क्यों नहीं करते हो, तो उसका उत्तर है कि—(मुनीनाम्) वानप्रस्थ वृत्ति से वन में निवास करनेवाले मुनियों का तो (इन्द्रः) परमेश्वर (सखा) मित्र होता है, अर्थात् वे तो एक परमेश्वर की ही शरण में स्थित रहते हुए, बाह्य सुख की अपेक्षा न करते हुए वन के वृक्षों के नीचे कुटियों में रहते हुए भी स्वयं को सुखी मानते हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। प्रथम दो व्याख्याओं में इन्द्र में अंसत्र और स्थूणा का आरोप होने से रूपक अलङ्कार भी है ॥३॥
भावार्थःवही राजा श्रेष्ठ है, जो परमेश्वर के गुणों का अनुसरण करता हुआ प्रजा का आधारस्तम्भ, शत्रुओं का संहारक, स्वजनों का रक्षक, प्रेमरस का अगार, सूर्य के समान तेजस्वी और ऋषि-मुनियों का मित्र-सदृश हितकर्ता हो। और वास्तुकला के विशेषज्ञ इंजीनियरों का कर्त्तव्य है कि वे राष्ट्र में ऐसे सुदृढ़ मकान कुशल शिल्पियों द्वारा बनवाये कि वे मूसलाधार वर्षा, आँधी आदि से भी कुछ भी क्षतिग्रस्त न हों ॥३॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
ब꣢ण्म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि सू꣣र्य ब꣡डा꣢दित्य म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि । म꣣ह꣡स्ते꣢ स꣣तो꣡ म꣢हि꣣मा꣡ प꣢निष्टम म꣣ह्ना꣡ दे꣢व म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि ॥२७६॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (बट्) सचमुच हे (सूर्य) सर्वव्यापक, सर्वजगत् को उत्पन्न करनेवाले, दुष्टों को प्रकंपित करनेवाले, सूर्यसदृश प्रकाशमान एवं सर्वप्रकाशक जगदीश्वर ! आप (महान्) अतिशय महान् (असि) हो। (बट्) सचमुच, हे (आदित्य) अविनाशी-स्वरूप परमात्मन् ! आप (महान्) परम महिमावाले (असि) हो। हे (पनिष्टम) अतिशय स्तुति के पात्र परब्रह्म परमेश्वर ! (महः) महान् (सतः) होते हुए (ते) आपकी (महिमा) महिमा (महान्) अपार है। (मह्ना) महिमा से, आप (महान्) सबसे बड़े (असि) हो ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (बट्) सचमुच, हे (सूर्य) अपने राष्ट्र में सूर्य के समान विद्या का प्रकाश फैलानेवाले राजन् ! आप (महान्) बड़े दिग्विजेता (असि) हो। (बट्) सचमुच, हे (आदित्य) राष्ट्रभूमि के पुत्र अर्थात् राष्ट्रवासियों द्वारा मत देकर राज्य के अन्दर से ही चुने हुए राजन् ! आप (महान्) प्रजापालनरूप महान् कर्मवाले (असि) हो। हे (पनिष्टम) व्यवहार के श्रेष्ठ ज्ञाता ! (महः सतः) प्रजा के पूज्य होते हुए (ते) आपकी (महिमा) गरिमा (महान्) बहुत बड़ी है, क्योंकि आपमें मनुस्मृति (७।४) के अनुसार इन्द्र, वायु, यम, सूर्य आदि सब देवों के गुण विद्यमान हैं। हे (देव) प्रजाओं को सुख देनेवाले राजन् ! आप (मह्ना) गुणों के गौरव के कारण (महान्) बड़े कीर्तिशाली (असि) हो ॥ तृतीय—आचार्य के पक्ष में। (बट्) सचमुच, हे (सूर्य) प्रकाशमय सूर्य के समान विद्या के प्रकाश से परिपूर्ण आचार्यवर ! आप (महान्) महान् पाण्डित्य से युक्त (असि) हो। (बट्) सचमुच, हे (आदित्य) आदित्य ब्रह्मचारी ! आप (महान्) महान् व्रतों का अनुष्ठान करनेवाले (असि) हो। हे (पनिष्टम) अत्यधिक विद्याव्यवहार के ज्ञाता ! (महः सतः) शिष्यों के पूज्य (ते) आपकी (महिमा) महिमा (महान्) अपार है। हे (देव) दिव्यगुणोंवाले आचार्यप्रवर ! आप (मह्ना) विद्या, शिक्षणकला आदि की महिमा से (महान्) गौरवशाली (असि) हो ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःब्रह्माण्ड में परमेश्वर, राष्ट्र में राजा और गुरुकुल में तीनों ही महान्, परोपकारी और कीर्तिमान् हैं। उनसे यथायोग्य उपकार सबको ग्रहण करना चाहिए ॥४॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣श्वी꣢ र꣣थी꣡ सु꣢रू꣣प꣢꣫ इद्गोमा꣣ꣳ य꣡दि꣢न्द्र ते꣣ स꣡खा꣢ । श्वा꣣त्रभा꣢जा꣣ व꣡य꣢सा सचते꣣ स꣡दा꣢ च꣣न्द्रै꣡र्या꣣ति स꣣भा꣡मु꣢꣯प ॥२७७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) दुःखविदारक, सुखदाता परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर राजन् वा आचार्य ! (यत्) जब कोई (ते) आपका (सखा) मित्र हो जाता है, तब वह (अश्वी) प्रशस्त घोड़ों का स्वामी और प्रशस्त मन, प्राण एवं इन्द्रियों का स्वामी, (रथी) प्रशस्त स्थलयानों, जलयानों एवं विमानों का स्वामी और प्रशस्त मानव-देह रूप रथ का स्वामी, (सुरूपः) प्रशस्त रूप एवं प्रशस्त गुणों का स्वामी, और (गोमान्) प्रशस्त गौओं, भूमियों तथा वाणियों आदि का स्वामी (इत्) अवश्य हो जाता है। (सः) वह (सदा) हमेशा (श्वात्रभाजा) धनवाली, विज्ञानवाली और शीघ्र किये जानेवाले कर्मोंवाली (वयसा) आयु से (सचते) संयुक्त होता है, और (चन्द्रैः) चन्द्रमा के समान आह्लादक गुणों से युक्त होकर (सभाम्) प्रजा की सभा, विद्वानों की सभा और राजसभा में (उपयाति) जाता है ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजो मनुष्य परमात्मा, राजा एवं आचार्य से मैत्री जोड़ लेता है वह पुरुषार्थी, बलवान्, वाग्मी, जितेन्द्रिय, मेधावी, रथवान्, अश्ववान्, गोमान्, प्राणवान्, धनवान्, विज्ञानवान्, कर्मवान्, गुणवान्, आयुष्मान् होकर जनता का नेतृत्व करता हुआ जनसभाओं, विद्वत्सभाओं और राजसभाओं में प्रतिष्ठा पाता है ॥५॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡द्द्याव꣢꣯ इन्द्र ते श꣣त꣢ꣳ श꣣तं꣡ भूमी꣢꣯रु꣣त꣢ स्युः । न꣡ त्वा꣢ वज्रिन्त्स꣣ह꣢स्र꣣ꣳ सू꣢र्या꣣ अ꣢नु꣣ न꣢ जा꣣त꣡म꣢ष्ट꣣ रो꣡द꣢सी ॥२७८॥
पदार्थःहे (वज्रिन्) वज्रधारी के समान सब सूर्य, चन्द्र, मेघ आदि को नियम में चलानेवाले (इन्द्र) महामहिम परमेश्वर ! (यत्) यदि (ते) आपके रचे हुए (द्यावः) द्यौ लोक (शतम्) सौ, (उत) और (भूमीः) भूमियाँ भी (शतम्) सौ (स्युः) हो जाएँ और (सूर्याः) सूर्य (सहस्रम्) हजार हो जाएँ, तो भी वे (त्वा) तेरी (न) नहीं (अनु) बराबरी कर सकते। (न) न ही (रोदसी) आकाश-भूमि के मध्य में (जातम्) उत्पन्न वायु, बादल, पहाड़, झरने, नदी, सागर आदि जो कुछ हैं, वे सब भी (अष्ट) तेरी महिमा का पार पा सकते हैं। अर्थात् तेरी महिमा अपरम्पार है ॥६॥ इस मन्त्र में द्यौ, भूमि और सूर्य से शत तथा सहस्र संख्याओं का सम्बन्ध न होने पर भी उनके साथ सम्बन्ध वर्णित होने से असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है। साथ ही उपमानों से उपमेय का आधिक्य वर्णित होने से व्यतिरेक अलङ्कार भी है। ‘शतं, शतं’ में लाटानुप्रास है ॥६॥
भावार्थःउषा, सूर्य, चाँद, तारे, भूमि, नदियाँ, पहाड़, समुद्र, वृक्ष, वनस्पतियाँ, दिन-रात, ऋतुएँ, वर्ष ये सब सौ हजार या लाख भी क्यों न हो जाएँ, परमेश्वर की महिमा को प्राप्त नहीं कर सकते ॥६॥
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य꣡दि꣢न्द्र꣣ प्रा꣢꣫गपा꣣गु꣢द꣣꣬ग्न्य꣢꣯ग्वा हू꣣य꣢से꣣ नृ꣡भिः꣢ । सि꣡मा꣢ पु꣣रू꣡ नृषू꣢꣯तो अ꣣स्या꣢न꣣वे꣢ऽसि꣢ प्रशर्ध तु꣣र्व꣡शे꣢ ॥२७९॥
पदार्थः(यत्) क्योंकि, (इन्द्र) हे जगदीश्वर ! तू (प्राक्) पूर्व दिशा में, (अपाक्) पश्चिम दिशा में, (उदक्) उत्तर दिशा में (न्यक् वा) और दक्षिण दिशा में (नृभिः) स्तोता जनों के द्वारा (हूयसे) पुकारा जाता तथा महिमा गान किया जाता है, इस कारण (नृषूतः) उन स्तोता जनों के द्वारा प्रेरित-प्रचारित होकर तू (पुरु) बहुत रूपों में (सिमा) सर्वत्र (आनवे) मानव-जाति में (असि) विदित हो जाता है। (प्रशर्ध) हे प्रकृष्ट रूप से शत्रुओं को परास्त करनेवाले ! तू (तुर्वशे) मार्ग में आनेवाली विघ्नबाधाओं के विनाशक पुरुषार्थी मनुष्य में, उसकी सहायता के लिए (असि) विद्यमान रहता है ॥७॥
भावार्थःदिशा-दिशा में परमात्मा का प्रचार हमें करना चाहिए, तभी मानव जाति का कल्याण हो सकता है ॥७॥ इस मन्त्र पर सायण ने यह लिखा है कि अनु नाम का एक राजा था, उसका राजर्षि पुत्र ‘आनव’ है, और ‘तुर्वश’ भी एक राजा का नाम है। उसका यह व्याख्यान असंगत है, क्योंकि सृष्टि के आदिकाल में प्रादुर्भूत वेदों में परवर्ती मानव-इतिहास का वर्णन असंभव है। निघण्टु में अनु और तुर्वश मनुष्यवाची नामों में पठित होने से ऐतिहासिक नाम नहीं हैं ॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
क꣡स्तमि꣢꣯न्द्र त्वा वस꣣वा꣡ मर्त्यो꣢꣯ दधर्षति । श्र꣣द्धा꣡ हि ते꣢꣯ मघव꣣न्पा꣡र्ये꣢ दि꣣वि꣡ वा꣣जी꣡ वाज꣢꣯ꣳ सिषासति ॥२८०॥
पदार्थःहे (त्वावसो) कोई दूसरा निवासक न होने से जो स्वयं ही अपना निवासक है, ऐसे आत्मनिर्भर (इन्द्र) परमात्मन् ! (कः मर्त्यः) भला कौन मनुष्य (तम् आदधर्षति) उसका बाल भी बाँका कर सकता है, जो (मघवन्) हे ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (पार्ये दिवि) पार करने योग्य सम्पूर्ण दिन में (ते) तेरे प्रति (श्रद्धा) श्रद्धा से (हि) निश्चय ही (वाजी) अन्न, धन, विद्या, आत्मबल आदि से युक्त होकर (वाजम्) अन्न, धन, विद्या आत्मबल आदि को (सिषासति) दूसरों के लिए देना चाहता है ॥८॥
भावार्थःजो दिन-रात परमेश्वर में श्रद्धा रखकर उसकी कृपा से अन्न, धन, विद्या, बल, वेग आदि प्राप्त करके सत्पात्रों को उसका दान करता है, उस परोपकारी का सब आदर करते हैं ॥८॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी अ꣣पा꣢दि꣣यं꣡ पूर्वागा꣢꣯त्प꣣द्व꣡ती꣢भ्यः । हि꣢त्वा꣡ शिरो꣢꣯ जि꣣ह्व꣢या꣣ रा꣡र꣢प꣣च्च꣡र꣢त्त्रि꣣ꣳश꣢त्प꣣दा꣡ न्य꣢क्रमीत् ॥२८१॥
पदार्थःप्रथम—श्रद्धा के पक्ष में। हे (इन्द्राग्नी) परमात्मन् और जीवात्मन् ! तुम्हारे सान्निध्य से (अपात्) पैरों से रहित भी (इयम्) यह पूर्व मन्त्र में वर्णित श्रद्धा (पद्वतीभ्यः) पैरोंवाली प्रजाओं से (पूर्वा) पूर्व-गामिनी होती हुई (आ अगात्) आ गयी है। (शिरः) सिर को (हित्वा) छोड़कर भी, अर्थात् बिना सिरवाली होती हुई भी यह (जिह्वया) जिह्वा से (रारपत्) पुनः-पुनः बोलती हुई सी, अर्थात् अपना सन्देश सुनाती हुई सी (चरत्) विचर रही है और यह (त्रिंशत् पदानि) शरीरस्थ दस इन्द्रियों, दस प्राणों, पाँच कोशों और आत्मासहित अहङ्कारचतुष्टय इन तीसों स्थानों को (अक्रमीत्) व्याप्त कर रही है ॥ द्वितीय—उषा के पक्ष में। हे (इन्द्राग्नी) ब्राह्मणो और क्षत्रियो ! (अपात्) पैरों से रहित भी (इयम्) यह उषा (पद्वतीभ्यः) सोयी हुई पैरोंवाली प्रजाओं से (पूर्वा) पहले जागकर (आ अगात्) आ गयी है। यह उषा (शिरः) सिर को (हित्वा) छोड़कर भी अर्थात् बिना सिर के भी (जिह्वया) जिह्वा-सदृश अपनी प्रभा से (रारपत्) जागरण का सन्देश पुनः पुनः बोलती हुई सी (चरत्) विचर रही है। (त्रिंशत् पदानि) अहोरात्र के तीसों मूहूर्तों को (अक्रमीत्) पार करके आ गयी है, क्योंकि एक पूरे अहोरात्र के पश्चात् उषा का पुनः प्रादुर्भाव होता है ॥ तृतीय—विद्युत् के पक्ष में। हे (इन्द्राग्नी) राजप्रजाजनो ! देखो, (अपात्) पैरों से रहित भी (इयम्) यह विद्युत् (पद्वतीभ्यः) पैरोंवाली मनुष्य, पशु आदि प्रजाओं से (पूर्वा) तीव्रगामिनी होती हुई (आ अगात्) हमारे उपयोग के लिए हमें प्राप्त हुई है। यह विद्युत् (शिरः हित्वा) सिर के बिना भी (जिह्वया) सन्देशवाहक विद्युत्-तारयन्त्र द्वारा (रारपत्) पुनः-पुनः सन्देश-प्रेषक के सन्देश को बोलती हुई (चरत्) तार में चलती है। यह (त्रिंशत् पदानि) महीने के तीसों दिनों को व्याप्त करके (अक्रमीत्) प्रकाश-प्रदान, सन्देशवहन, यन्त्रचालन आदि कार्यों में पग रखती है अर्थात् इन कार्यों को करती है ॥९॥ इस मन्त्र में ‘पैर-रहित होती हुई भी पैरोंवालियों से पहले पहुँच जाती है’, ‘सिर-रहित होती हुई भी जिह्वा से बोलती है’, यहाँ बिना कारण के कार्योत्पत्ति का वर्णन होने से विभावना अलङ्कार है। श्रद्धा, उषा, विद्युत् आदि किसी का नाम लिये बिना संकेतों से सूचना देने के कारण प्रहेलिकालङ्कार भी है ॥९॥
भावार्थःश्रद्धा के धारण से धर्म में प्रवृत्ति और वैयक्तिक तथा सामाजिक उन्नति होती है। उषा जागरण का सन्देश देती है। विद्युत् के प्रयोग से रात में भी दिन के समान प्रकाश प्राप्त होता है और दूरभाषयन्त्र, आकाशवाणीयन्त्र, ऐक्सरेयन्त्र, भार ऊपर उठाने, अस्त्र छोड़ने आदि के विविध यन्त्र और स्थलयान, जलयान एवं विमान चलाये जाते हैं। इस प्रकार श्रद्धा, उषा और विद्युत् सब जनों के लिए अतिलाभकारी हैं, अतः उनका यथोचित उपयोग सबको करना चाहिए ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣢न्द्र꣣ ने꣡दी꣢य꣣ ए꣡दि꣢हि मि꣣त꣡मे꣢धाभिरू꣣ति꣡भिः꣢ । आ꣡ शं꣢तम꣣ शं꣡त꣢माभिर꣣भि꣡ष्टि꣢भि꣣रा꣡ स्वा꣢꣯पे꣢꣯ स्वा꣣पि꣡भिः꣢ ॥२८२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमेश्वर, राजन् वा विद्वन् ! आप (मितमेधाभिः) मेधापूर्ण (ऊतिभिः) रक्षाओं के साथ (नेदीयः इत्) हमारे अधिक समीप (आ इहि) आइए। हे (शन्तम) अतिशय कल्याण करनेवाले ! आप (शन्तमाभिः) अतिशय कल्याण करनेवाली (अभिष्टिभिः) अभीष्ट प्राप्तियों के साथ (आ) आइए। हे (स्वापे) सुबन्धु ! आप (स्वापिभिः) उत्कृष्ट बन्धुभावों के साथ (आ) आइए ॥१०॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है। दकार, तकार, मकार की आवृत्ति में, ‘भि’ की आवृत्ति में और ‘रभि’, ‘भिरा’ में वृत्त्यनुप्रास है। ‘शन्तम, शन्तमा’ और ‘स्वापे, स्वापि’ में छेकानुप्रास है ॥१०॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर की रक्षाएँ बुद्धिपूर्ण, दान कल्याणकारी और बन्धुभाव शुभ होते हैं, वैसे ही राष्ट्र में राजा और विद्वान् अध्यापक के भी हों ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र नाम से परमेश्वर, राजा, आचार्य आदि के गुण-कर्म-स्वभावों का वर्णन करके उनसे अभय आदि की याचना होने से, सूर्य नाम से भी इनकी स्तुति होने से और श्रद्धा आदि का भी महत्त्व वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ तृतीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣣त꣢ ऊ꣣ती꣡ वो꣢ अ꣣ज꣡रं꣢ प्रहे꣣ता꣢र꣣म꣡प्र꣢हितम् । आ꣣शुं꣡ जेता꣢꣯र꣣ꣳ हे꣡ता꣢रꣳ र꣣थी꣡त꣢म꣣म꣡तू꣢र्तं तुग्रिया꣣वृ꣡ध꣢म् ॥२८३॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (वः) तुम लोग (ऊती) रक्षा के लिए (अजरम्) बुढ़ापे अथवा जीर्णता से रहित, (प्रहेतारम्) शुभ कर्मों में प्रेरणा करनेवाले, (अ-प्रहितम्) स्वयं किसी अन्य से प्रेरित न होनेवाले, (आशुम्) शीघ्रकारी, न कि व्यर्थ ही कार्यों को लटकानेवाले, (जेतारम्) विजयी, (हेतारम्) वृद्धि करनेवाले, (रथीतमम्) गतिशील, सूर्यचन्द्रादिरूप रथों के तथा ब्रह्माण्डरूप रथ के श्रेष्ठ रथी, अथवा श्रेष्ठ रथारोही, (अतूर्तम्) किसी से हिंसित न होनेवाले, (तुग्रियावृधम्) अन्न में रहनेवाले अन्नरस, आकाश में रहनेवाले मेघजल या वायु, यज्ञ में रहनेवाले फलसाधनत्व तथा वरिष्ठ जनों में रहनेवाले धर्माचार के वर्धक इन्द्र परमेश्वर को अथवा प्रजाओं की वृद्धि करनेवाले इन्द्र राजा को (इतः) इधर अपने अभिमुख करो ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। तकार और रेफ की अनेक बार आवृत्ति में, ‘तार’ की तीन बार आवृत्ति में और ‘तम, मतू’ में वृत्त्यनुप्रास है। ‘प्रहेता, प्रहित’ में छेकानुप्रास, और ‘हेतारं’ की आवृत्ति में यमक है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि सांसारिक विषय-विलासों में अति प्रवृत्ति को छोड़कर विविध गुणोंवाले परमेश्वर की उपासना करके और राजा को प्रजाओं के अनुकूल करके अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि करें ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
मो꣡ षु त्वा꣢꣯ वा꣣घ꣡त꣢श्च꣣ ना꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्नि री꣢꣯रमन् । आ꣣रा꣡त्ता꣣द्वा सध꣣मा꣡दं꣢ न꣣ आ꣡ ग꣢ही꣣ह꣢ वा꣣ स꣡न्नुप꣢꣯ श्रुधि ॥२८४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे इन्द्र परमात्मन् ! (वाघतः) हमारे शरीर-यज्ञ के ऋत्विज् इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि (च न) निश्चय ही (त्वा) तुझे (अस्मत्) हमसे (आरे) दूर (मा उ सु) मत (निरीरमन्) रमायें अर्थात् इन्द्रिय आदियों से विषयों में आकृष्ट हुआ मैं तुझे अपने पास से दूर न रखूँ। तू (आरात्ताद् वा) दूर से भी (नः) हमारे (सधमादम्) जीवन-यज्ञ या उपासना-यज्ञ में (आ गहि) आ, (इह वा सन्) और यहीं हृदय में रहता हुआ (उपश्रुधि) हमारी स्तुति और प्रार्थना को सुन ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे इन्द्र राजन् ! (वाघतः) बुद्धिमान् राजमन्त्री, नगराधीश आदि राज्याधिकारी (च न) निश्चय ही (त्वा) तुझे (अस्मत्) हमसे (आरे) दूर (मा उ सु) मत (निरीरमन्) रोकें, अर्थात् तुझ राजा को हमारे लिए सुलभ करायें। हे राजन् ! (आरात्ताद् वा) सुदूरस्थ भी अपनी राजधानी से, तू (नः) हमारे (सधमादम्) यज्ञ-समारोह में (आ गहि) आ, (इह वा सन्) और यहीं हमारे मध्य में विराजमान होता हुआ तू (उपश्रुधि) हमारे सुखदुःखादि के निवेदन को सुन ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। रेफ की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥२॥
भावार्थःराजराजेश्वर परमात्मा और मानव राजा हम प्रजाजनों को सदा सुलभ रहता हुआ हमारे सुख-दुःख को जाने ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
सु꣣नो꣡त꣢ सोम꣣पा꣢व्ने꣣ सो꣢म꣣मि꣡न्द्रा꣢य व꣣ज्रि꣡णे꣢ । प꣡च꣢ता प꣣क्ती꣡रव꣢꣯से कृणु꣣ध्व꣢꣯मित्पृ꣣ण꣢न्नित्पृ꣢꣯ण꣣ते꣡ मयः꣢꣯ ॥२८५॥
पदार्थःहे मरणधर्मा मनुष्यो ! तुम (सोमपाव्ने) उपासकों के श्रद्धारस का पान करनेवाले, (वज्रिणे) पापाचारियों के प्रति दण्डधारी (इन्द्राय) जगदीश्वर के लिए (सोमम्) श्रद्धारस को (सुनोत) अभिषुत करो, (पक्तीः) ज्ञान, कर्म आदि के परिपाकों को (पचत) पकाकर तैयार करो और (अवसे) जगदीश्वर की प्रीति के लिए (कृणुध्वम् इत्) उन श्रद्धारसों और ज्ञान, कर्म आदि के परिपाकों को उसे समर्पित करो। (पृणते) समर्पण करनेवाले मनुष्य के लिए वह जगदीश्वर (मयः) सुख को (पृणन् इत्) अवश्य प्रदान करता है ॥३॥ इस मन्त्र में ‘समर्पण करनेवाले को सुख मिलता है’ इससे सोमसवन एवं पाकों के परिपाक के समर्पण रूप कार्य का समर्थन होता है, अतः अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। ‘सोम-सोम’ में लाटानुप्रास तथा ‘पृण-पृण’ में छेकानुप्रास है ॥३॥
भावार्थःसुखार्थी जनों को चाहिए कि परमेश्वर में श्रद्धा और अपनी अन्तरात्मा में ज्ञान, कर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि का परिपाक अवश्य करें ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
यः꣡ स꣢त्रा꣣हा꣡ विच꣢꣯र्षणि꣣रि꣢न्द्रं꣣ त꣡ꣳ हूम꣢हे व꣣य꣢म् । स꣡ह꣢स्रमन्यो तुविनृम्ण सत्पते꣣ भ꣡वा꣢ स꣣म꣡त्सु꣢ नो वृ꣣धे꣢ ॥२८६॥
पदार्थः(यः) जो परमात्मा वा राजा (सत्राहा) सत्य से असत्य का हनन करनेवाला अथवा सत्य व्यवहार करनेवाला और (विचर्षणिः) विशेष रूप से द्रष्टा है, (तम्) उस (इन्द्रम्) दुःख, विघ्न आदि के विदारक तथा सुख एवं ऐश्वर्य के प्रदाता परमात्मा और राजा को (वयम्) हम प्रजाजन (हूमहे) पुकारते हैं। हे (सहस्रमन्यो) पापों और पापियों के विनाशार्थ अनन्त उत्साह को धारण करनेवाले, (तुविनृम्ण) बहुत बली तथा बहुत धनी, (सत्पते) सज्जनों के पालक ! तू (समत्सु) जीवन के संघषों में एवं देवासुरसंग्रामों में (नः) हमारी (वृधे) वृद्धि के लिए (भव) हो ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजैसे ब्रह्माण्ड में परमेश्वर सत्य का हन्ता, सर्वद्रष्टा, पापों को सहन न करनेवाला, बहुत बलवान्, बहुत धनवान् और देवासुरसंग्रामों में देवपुरुषों को विजय दिलानेवाला तथा बढ़ानेवाला है, वैसे ही राष्ट्र में राजा हो ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
श꣡ची꣢भिर्नः शचीवसू꣣ दि꣢वा꣣ न꣡क्तं꣢ दिशस्यतम् । मा꣡ वा꣢ꣳ रा꣣ति꣡रुप꣢꣯ दसत्क꣣दा꣢च꣣ना꣢꣫स्मद्रा꣣तिः꣢ क꣣दा꣢च꣣न꣢ ॥२८७॥
पदार्थःहे (शचीवसू) कर्म-रूप धनवाले परमात्मा-जीवात्मा, गुरु शिष्य, अध्यापक-उपदेशक, वैद्य-शल्यचिकित्सक, राजा-राजमन्त्री, सभापति-सेनापति आदि अश्वीदेवो ! तुम (शचीभिः) अपने-अपने कर्मों से (नः) हमें (दिवा नक्तम्) दिन-रात (दिशस्यतम्) अपनी-अपनी देनें प्रदान करो। (वाम्) तुम्हारा (रातिः) दान (कदा च न) कभी (मा उपदसत्) समाप्त न हो, वैसे ही (अस्मत्) हमारे अन्दर से (रातिः) दान का गुण (कदा च न) कभी (मा उपदसत्) समाप्त न हो, अर्थात् हम भी निरन्तर दान में संलग्न रहें ॥५॥ इस मन्त्र में ‘शची, शची’, ‘राति, रातिः’, तथा ‘कदा च न, कदा च न’ में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःउक्त अश्वी-युगल जैसे अपनी-अपनी आध्यात्मिक, वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रिय, शिल्पात्मक, चिकित्सात्मक आदि देनों से हमारा उपकार करते रहें, उसी प्रकार हम भी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार दूसरों का उपकार करें ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣣दा꣢ क꣣दा꣡ च꣢ मी꣣ढु꣡षे꣢ स्तो꣣ता꣡ ज꣢रेत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । आ꣡दिद्व꣢꣯न्देत꣣ व꣡रु꣢णं वि꣣पा꣢ गि꣣रा꣢ ध꣣र्त्ता꣢रं꣣ वि꣡व्र꣢तानाम् ॥२८८
पदार्थः(यदा कदा च) जब कभी (स्तोता) स्तोता (मर्त्यः) मनुष्य (मीढुषे) बादल के समान ऐश्वर्यवर्षक परमैश्वर्यशाली इन्द्र परमात्मा को अनुकूल करने के लिए (जरेत) उसकी अर्चना करे, (आत् इत्) उसके अनन्तर ही वह (विव्रतानाम्) व्रत-रहितों को (धर्तारम्) कर्म-पाशों से जकड़नेवाले, (वरुणम्) कर्मानुसार फल देकर पापों से निवारण करनेवाले वरुण परमात्मा की भी (विपा) मेधायुक्त (गिरा) वाणी से (वन्देत) वन्दना कर लिया करे ॥६॥
भावार्थःइन्द्र और वरुण दोनों ही परमेश्वर के नाम हैं। इन्द्र नाम से उसकी परमैश्वर्यवत्ता तथा ऐश्वर्यवर्षकता सूचित होती है और वरुण नाम से उसका पाशधारी होना तथा कर्म-पाशों से बाँधकर और दण्ड देकर पापनिवारक होना सूचित होता है। परमेश्वर के इन दोनों ही स्वरूपों के चिन्तन करने, स्मरण करने तथा सदा अपने सामने धारण रखने से मनुष्य अपने जीवन में सन्मार्गगामी होकर सफलता प्राप्त कर सकता है। ऐश्वर्य पाकर मनुष्य कुमार्ग में प्रवृत्त न हो जाए, इसके लिए परमेश्वर के वरुण स्वरूप को भी ध्यान में रखना आवश्यक है ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
पा꣣हि꣡ गा अन्ध꣢꣯सो꣣ म꣢द꣣ इ꣡न्द्रा꣢य मेध्यातिथे । यः꣡ सम्मि꣢꣯श्लो ह꣢र्यो꣣र्यो꣡ हि꣢र꣣ण्य꣢य꣣ इ꣡न्द्रो꣢ व꣣ज्री꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥२८९॥
पदार्थःहे (मेध्यातिथे) पवित्र इन्द्र रूप अतिथिवाले स्तोता ! तू (अन्धसः) भक्तिरस के (मदे) आनन्द में विह्वल होकर (इन्द्राय) इन्द्र परमेश्वर के लिए, अर्थात् उसके आतिथ्य के लिए (गाः) स्तुतिवाणियों को (पाहि) पाल-पोसकर प्रवृत्त कर, (यः) जो इन्द्र परमेश्वर (हर्योः) मन-प्राणरूप घोड़ों को (संमिश्लः) शरीर में नियुक्त करनेवाला है, और (यः) जो (हिरण्ययः) ज्योतिर्मय तथा यशोमय है, और जो (इन्द्रः) परमेश्वर (वज्री) वज्र के समान विद्यमान आक्रामक तथा रक्षक बल से युक्त होकर दुर्जनों को दण्डित एवं सज्जनों को रक्षित करनेवाला और (हिरण्ययः) सत्यरूप स्वर्णालङ्कार से अलङ्कृत है ॥७॥ इस मन्त्र में 'इन्द्राय गाः पाहि’ इससे यह उपमालङ्कार ध्वनित होता है कि जैसे कोई गृहस्थ विद्वान् अतिथियों के सत्कार के लिए गाय पालता है। ‘इन्द्रा, इन्द्रे’ में छेकानुप्रास, ‘हर्यो र्योहि’ में वृत्त्यनुप्रास, तथा ‘हिरण्यय, हिरण्ययः’ में यमक अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःअतिथि-सत्कार मनुष्य का परम धर्म है। इन्द्र परमेश्वर भी मनुष्य के हृदय-गृह का अतिथि है। उसके आतिथ्य के लिए उसे श्रद्धारस में विभोर होकर स्तुतिवाणीरूप अर्घ्य प्रदान करना चाहिए। इन्द्र परमेश्वर एक विलक्षण अतिथि है, जो अपना आतिथ्य करनेवाले को ज्योति, यश एवं सत्यादिरूप सुवर्ण प्रदान करता है, अपने बल से उसकी रक्षा करता है, उसके शरीर में मन और प्राण को नियुक्त करके उसे लम्बी आयु और सामर्थ्य देता है ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
उ꣣भ꣡य꣢ꣳ शृ꣣ण꣡व꣢च्च न꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣र्वा꣢गि꣣दं꣡ वचः꣢꣯ । स꣣त्रा꣡च्या꣢ म꣣घ꣢वा꣣न्त्सो꣡म꣢पीतये धि꣣या꣡ शवि꣢꣯ष्ठ꣣ आ꣡ ग꣢मत् ॥२९०॥
पदार्थः(इन्द्रः) सुखप्रदाता, दुःखहर्ता जगदीश्वर एवं राजा (अर्वाक्) हमारे अभिमुख हो, (च) और (नः) हमारे (इदम्) इस (उभयम्) मानसिक तथा वाचिक अथवा लिखित एवं मौखिक दोनों प्रकार के (वचः) निवेदन को (शृणवत्) सुने। साथ ही (मघवान्) सकल ऐश्वर्य का स्वामी, (शविष्ठः) सबसे अधिक बली वह जगदीश्वर एवं राजा (सोमपीतये) मानस तथा बाह्य शान्ति की रक्षा के लिए (सत्राच्या) सत्य का अनुसरण करनेवाली (धिया) विचारशृङ्खला के साथ (आ गमत्) हमारे पास आये ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥
भावार्थःजैसे परमात्मा मनुष्यों के अन्तःकरण में भ्रातृभाव और शान्ति के विचारों को प्रेरित करता है, वैसे ही राजा लोग राष्ट्रों में और संसार में पारस्परिक विद्वेष को समाप्त करके शान्ति का विस्तार करें ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
म꣣हे꣢ च꣣ न꣢ त्वा꣢द्रिवः꣣ प꣡रा꣢ शु꣣ल्का꣡य꣢ दीयसे । न꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢य꣣ ना꣡युता꣢꣯य वज्रिवो꣣ न꣢ श꣣ता꣡य꣢ शतामघ ॥२९१॥
पदार्थःहे (अद्रिवः) आनन्दरूप मेघों के स्वामी, आनन्दरस-वर्षक इन्द्र परमात्मन् ! (त्वा) तुम (महे च) किसी बड़ी भी (शुल्काय) कीमत पर, हमसे (न) नहीं (परादीयसे) छोड़े जा सकते हो। हे (वज्रिवः) प्रशस्त विज्ञानमय नीति के अनुसार चलनेवाले ! (न) न (सहस्राय) हजार मुद्रा आदि का मूल्य लेकर, और (न) न ही (अयुताय) दस हजार मुद्रा आदि का मूल्य लेकर, छोड़े जा सकते हो। हे (शतामघ) अनन्त सम्पदावाले ! (न) न ही (शताय) दस हजार से भी सौ गुणा अधिक अर्थात् दस लाख मुद्रा आदि का मूल्य लेकर छोड़े जा सकते हो ॥९॥ इस मन्त्र में ‘अद्रिवः, वज्रिवः और शतामघ’ विशेषण साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार है। जो मेघ के समान सुखवर्षक, प्रशस्त नीति से चलनेवाला और अनन्त धनवान् है, वह भला किसी मूल्य पर कैसे छोड़ा जा सकता है ॥९॥
भावार्थःहे राजराजेश्वर परमात्मन् ! तुम्हें हमने अपने प्रेम से वश में कर लिया है। अब तुम्हें सौ, हजार, दस हजार, लाख, दस लाख, करोड़, दस करोड़ मूल्य के बदले भी हम छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं ॥९॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
व꣡स्या꣢ꣳ इन्द्रासि मे पि꣣तु꣢रु꣣त꣢꣫ भ्रातु꣣र꣡भु꣢ञ्जतः । मा꣣ता꣡ च꣢ मे छदयथः स꣣मा꣡ व꣢सो वसुत्व꣣ना꣢य꣣ रा꣡ध꣢से ॥२९२
पदार्थःहे (इन्द्र) परमेश्वर ! आप (अभुञ्जतः) पालन न करनेवाले (मे) मेरे (पितुः) पिता से (उत) और (भ्रातुः) सगे भाई से (वस्यान्) अधिक निवासप्रद (असि) हो। हे (वसो) निवासक जगदीश्वर ! आप, (मे माता च) और मेरी माता (समा) दोनों समान हो, क्योंकि तुम दोनों ही (वसुत्वनाय) धन के लिए और (राधसे) सफलता के लिए (छदयथः) हमें अपनी शरण से सत्कृत करते हो ॥१०॥ इस मन्त्र में ‘अभुञ्जतः’ पद का अर्थ पिता और भ्राता की अपेक्षा इन्द्र के अधिक निवासक होने में तथा ‘वसुत्वनाय राधसे छदयथः’ इस वाक्य का अर्थ इन्द्र और माता के समान होने में हेतु होने से काव्यलिङ्ग अलङ्कार है। ‘तुरु, तुर,’ ‘वसो, वसु’ में छेकानुप्रास है ॥१०॥
भावार्थःजगदीश्वर सभी सांसारिक बन्धुबान्धवों की अपेक्षा सर्वाधिक प्रिय और श्रेष्ठ है। केवल माता से उसकी कुछ तुलना हो सकती है, क्योंकि माता भूमि से भी अधिक गौरवमयी है, ऐसा शास्त्रकार कहते हैं ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र के गुणों का वर्णन तथा आह्वान होने से, उससे वृद्धि आदि की प्रार्थना होने से, उससे सम्बद्ध अश्विनों से दान की याचना होने से तथा इन्द्र नाम से राजा आदि का भी चरित्र वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ तृतीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की पाँचवी दशति समाप्त ॥ यह तृतीय प्रपाठक समाप्त हुआ ॥ तृतीय अध्याय में छठा खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣣म꣡ इन्द्रा꣢꣯य सुन्विरे꣣ सो꣡मा꣢सो꣣ द꣡ध्या꣢शिरः । ता꣡ꣳ आ मदा꣢य वज्रहस्त पी꣣त꣢ये꣣ ह꣡रि꣢भ्यां या꣣ह्यो꣢क꣣ आ꣢ ॥२९३॥
पदार्थःप्रथम—अतिथि के पक्ष में। (इमे) ये (दध्याशिरः) दही के साथ मिलाये हुए (सोमासः) सोमादि ओषधियों के रस (इन्द्राय) तुझ विद्वान् अतिथि के लिए (सुन्विरे) तैयार रखे हैं। हे (वज्रहस्त) हमारे दोषों को नष्ट करने के लिए उपदेशवाणीरूप वज्र को धारण करनेवाले विद्वन् ! (तान्) उन दधिमिश्रित सोमरसों को (मदाय) तृप्त्यर्थ (पीतये) पीने के लिए (हरिभ्याम्) ऋक् और साम के ज्ञान के साथ अथवा दो घोड़ों से चलनेवाले रथ पर बैठकर, मुझ गृहस्थ के (ओकः) घर पर (आयाहि) आइए ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (इमे) ये (दध्याशिरः) कर्मरूप दही के साथ मिलाये या पकाये हुए (सोमासः) हमारे श्रद्धा-रस (इन्द्राय) तुझ जगदीश्वर के लिए (सुन्विरे) तैयार किये हुए हैं। हे (वज्रहस्त) वज्र-धारी के समान दोषों को नष्ट करनेवाले परमेश्वर ! (तान्) उन कर्ममिश्रित श्रद्धारसों को (मदाय) तृप्त्यर्थ (पीतये) पान करने के लिए (हरिभ्याम्) जैसे कोई रथ में घोड़ों को नियुक्त करके वेगपूर्वक आता है, वैसे (ओकः) हमारे हृदय-सदन में (आयाहि) आइए ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, परमात्मपक्ष में लुप्तोपमा भी है ॥१॥
भावार्थःजैसे दही में मिलाकर सोमादि ओषधियों का रस अतिथियों को समर्पित किया जाता है, वैसे ही श्रद्धारस को कर्म के साथ मिलाकर ही परमेश्वर को अर्पित करना चाहिए, क्योंकि कर्महीन भक्ति कुछ भी लाभ नहीं पहुँचाती है ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣣म꣡ इ꣡न्द्र꣣ म꣡दा꣢य ते꣣ सो꣡मा꣢श्चिकित्र उ꣣क्थि꣢नः꣣ । म꣡धोः꣢ पपा꣣न꣡ उप꣢꣯ नो꣣ गि꣡रः꣢ शृणु꣣ रा꣡स्व꣢ स्तो꣣त्रा꣡य꣢ गिर्वणः ॥२९४
पदार्थः(इमे) ये (उक्थिनः) स्तोत्रयुक्त (सोमाः) हमारे श्रद्धारस, हे (इन्द्र) परमेश्वर ! (ते) आपकी (मदाय) तृप्ति के लिए (चिकित्रे) जाने गये हैं, सर्वविदित हैं। हमारे (मधोः) मधुर श्रद्धारस का (पपानः) पान करते हुए (नः) हमारी (गिरः) प्रार्थना-वाणियों को (उप शृणु) समीपता से सुनिए। हे (गिर्वणः) वाणियों द्वारा सेवन करने अथवा याचना करने योग्य परमात्मन् ! आप (स्तोत्राय) मुझ स्तुतिकर्ता को (रास्व) अभीष्ट फल प्रदान कीजिए ॥ अतिथि के पक्ष में भी अर्थयोजना कर लेनी चाहिए। उस पक्ष में ‘उक्थिनः सोमाः’ से प्रशंसित सोमादि ओषधियों के रस अभिप्रेत हैं। उनसे सत्कृत होकर वह गृहस्थों की प्रार्थना को सुनकर उन्हें अभीष्ट उपदेश आदि प्रदान करे ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर और अतिथि हमारी प्रार्थना को सुनकर अभीष्ट फल हमें प्रदान करें ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
आ꣡ त्वा꣢३꣱द्य꣡ स꣢ब꣣र्दु꣡घा꣢ꣳ हु꣣वे꣡ गा꣢य꣣त्र꣡वे꣢पसम् । इ꣡न्द्रं꣢ धे꣣नु꣢ꣳ सु꣣दु꣢घा꣣म꣢न्या꣣मि꣡ष꣢मु꣣रु꣡धा꣢रामर꣣ङ्कृ꣡त꣢म् ॥२९५॥
पदार्थः(अद्य) आज (तु) शीघ्र ही (सबर्दुघाम्) ज्ञानरूप दूध को देनेवाली, (गायत्र-वेपसम्) जिसके कर्मों का सर्वत्र गान हो रहा है ऐसी, (सुदुघाम्) भली-भाँति कामनाओं को पूर्ण करनेवाली, (अन्याम्) विलक्षण, (इषम्) चाहने योग्य, (उरुधाराम्) बड़ी-बड़ी धारोंवाली, (अरंकृतम्) अलङ्कृत करनेवाली (इन्द्रं धेनुम्) परमेश्वररूप गाय को (आहुवे) पुकारता हूँ ॥३॥ इस मन्त्र में परमेश्वर में गाय का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे गाय दूध देती है, वैसे परमेश्वर ज्ञान-रस देता है। गाय और परमेश्वर दोनों के यज्ञ-साधकत्व रूप कर्म का गान किया जाता है। दोनों ही मनोरथों को पूर्ण करनेवाले हैं। गाय अन्य पशुओं से विलक्षण है, परमेश्वर अन्य चेतन-अचेतनों से विलक्षण है। गाय दूध की बड़ी-बड़ी धारों को देती है, परमेश्वर आनन्द की धारें बरसाता है। गाय पुष्टि और आरोग्य देकर मनुष्यों को शोभित करती है, परमेश्वर अध्यात्मबल से शोभित करता है। इस प्रकार दोनों की समता होने से परमेश्वर की गाय के समान सेवा और पूजा करनी योग्य है ॥३॥
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न꣡ त्वा꣢ बृ꣣ह꣢न्तो꣣ अ꣡द्र꣢यो꣣ व꣡र꣢न्त इन्द्र वी꣣ड꣡वः꣢ । य꣡च्छिक्ष꣢꣯सि स्तुव꣣ते꣡ माव꣢꣯ते꣣ व꣢सु꣣ न꣢ कि꣣ष्ट꣡दा मि꣢꣯नाति ते ॥२९६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमेश्वर ! (बृहन्तः) विशाल (वीडवः) दृढ (अद्रयः) पर्वत भी (त्वा) तुझे (न) नहीं (वरन्त) रोक सकते हैं, (यत्) जब कि तू (मावते) मुझ जैसे (स्तुवते) स्तोता जन के लिए (वसु) आध्यात्मिक और भौतिक धन (शिक्षसि) देता है। (तत्) उस तेरे दानरूप कर्म को (न किः) कोई भी नहीं (आ मिनाति) नष्ट कर सकता है ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर का जो गुण-कर्म-स्वभाव है, उसके फलीभूत होने में संसार की कोई भी बाधा रुकावट नहीं डाल सकती ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
क꣡ ईं꣢ वेद सु꣣ते꣢꣫ सचा꣣ पि꣡ब꣢न्तं꣣ क꣡द्वयो꣢꣯ दधे । अ꣣यं꣡ यः पुरो꣢꣯ विभि꣣न꣡त्त्योज꣢꣯सा मन्दा꣣नः꣢ शि꣣प्र्य꣡न्ध꣢सः ॥२९७॥
पदार्थः(सुते) उपासना-यज्ञ में (सचा) एक-साथ (पिबन्तम्) यजमान के श्रद्धारस का पान करते हुए (ईम्) इस इन्द्र परमेश्वर को (कः वेद) कौन जानता है? (कत्) कब वह (वयः) उपासक के जीवन को (दधे) सहारा दे देता है, इसे भी कौन जानता है? अर्थात् यदि कोई जानता है तो उपासक ही जानता या अनुभव करता है। कैसे परमेश्वर को? इसका उत्तर देते हैं—(अयम्) यह (यः) जो (शिप्री) प्रशस्त स्वरूपवाला परमेश्वर (अन्धसः) यजमान के श्रद्धारस से (मन्दानः) प्रसन्न होता हुआ (ओजसा) बलपूर्वक (पुरः) उसकी मनोभूमि में दृढ़ता के साथ जमी हुई काम-क्रोधादि असुरों की नगरियों को (विभिनत्ति) तोड़-फोड़ देता है ॥५॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना का यही लाभ है कि वह उपासक के मन में सब शत्रुओं को पराजित कर सकनेवाले पुरुषार्थ को उत्पन्न करके उसे समरभूमि में विजयी बना देता है ॥५॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡दि꣢न्द्र꣣ शा꣡सो꣢ अव्र꣣तं꣢ च्या꣣व꣢या꣣ स꣡द꣢स꣣स्प꣡रि꣢ । अ꣣स्मा꣡क꣢म꣣ꣳशुं꣡ म꣢घवन्पुरु꣣स्पृ꣡हं꣢ व꣣स꣢व्ये꣣ अ꣡धि꣢ बर्हय ॥२९८
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (यत्) क्योंकि, हे (इन्द्र) दुर्गुणनिवारक जगदीश्वर ! आप (शासः) शासक और नियामक हैं, इस कारण (अव्रतम्) व्रतहीन और कर्महीन मनुष्य को (सदसः परि) सज्जनों के समाज से (च्यावय) निकाल दीजिए। हे (मघवन्) सद्गुणरूप धनों के धनी ! (अस्माकम्) हमारे (पुरुस्पृहम्) बहुत अधिक प्रिय (अंशुम्) मन को (वसव्ये अधि) आध्यात्मिक एवं आधिभौतिक दोनों प्रकार के धन-समूह की प्राप्ति के निमित्त से (बर्हय) श्रेष्ठ बना दीजिए ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (यत्) क्योंकि, हे (इन्द्र) पाप और पापियों के विनाशक राजन् ! आप (शासः) शासक हैं, इस कारण (अव्रतम्) वर्णाश्रम की मर्यादा का पालन न करनेवाले मनुष्य को (सदसः परि) राष्ट्ररूप यज्ञगृह से (च्यावय) निष्कासित कर दो। अथवा (अव्रतम्) राष्ट्रसेवा के व्रत से रहित मनुष्य को (सदसः परि) संसत् की सदस्यता से (च्यावय) च्युत कर दो। हे (मघवन्) धनों के स्वामिन् ! (अस्माकम्) हमारे (पुरुस्पृहम्) अतिशय प्रिय (अंशुम्) प्रदत्त कर-रूप अंशदान को (वसव्ये अधि) राष्ट्रहित के कार्यों में (बर्हय) व्यय करो ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःवे ही राष्ट्रपरिषद् के सदस्य होने योग्य हैं, जो राष्ट्रसेवा के व्रत में दीक्षित हों। प्रजाजनों को भी वर्णाश्रम की मर्यादा का पालन करनेवाला और कर्मपरायण होना चाहिए। प्रजाओं को चाहिए कि स्वेच्छा से राजा को कर प्रदान करें और राजा को चाहिए कि कर द्वारा प्राप्त धन को राष्ट्रहित के कार्यों में व्यय करे ॥६॥
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छन्द -बृहती| देवता -त्वष्टा, पर्जन्यः, ब्रह्मणस्पतिः, अदितिः| स्वर - मध्यमः
त्व꣡ष्टा꣢ नो꣣ दै꣢व्यं꣣ व꣡चः꣢ प꣣र्ज꣢न्यो꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣡तिः꣢ । पु꣢त्रै꣡र्भ्रातृ꣢꣯भि꣣र꣡दि꣢ति꣣र्नु꣡ पा꣢तु नो दु꣣ष्ट꣢रं꣣ त्रा꣡म꣢णं꣣ व꣡चः꣢ ॥२९९॥
पदार्थः(त्वष्टा) दोषनिवारक, तेजस्वी, दुःखच्छेदक विद्वान् मनुष्य, (पर्जन्यः) बादल के समान उपदेश की वर्षा करनेवाला संन्यासी, और (ब्रह्मणः पतिः) ज्ञान का अधिपति आचार्य (नः) हमारे लिए (दैव्यं वचः) ईश्वरीय वेदवचन का उपदेश करें। (पुत्रैः) पुत्रों सहित, और (भ्रातृभिः) भाई-बन्धुओं सहित (नः) हमें (अदितिः) जगन्माता (नु) शीघ्र ही (पातु) रक्षा प्रदान करती रहे। हमारा (वचः) वचन (दुष्टरम्) दुस्तर, अकाट्य तथा (त्रामणम्) दूसरों की रक्षा करनेवाला होवे ॥७॥
भावार्थःविद्वानों के उपदेश से पुत्र, पौत्र, बन्धु, बान्धव आदि सहित सब लोग वेद के ज्ञाता, सत्कर्मों में संलग्न और परमेश्वर-प्रेमी होते हुए व्यवहार में सत्य, मधुर, प्रभावजनक तथा कुतर्कों से अकाट्य वचन बोला करें ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
क꣣दा꣢ च꣣न꣢ स्त꣣री꣡र꣢सि꣣ ने꣡न्द्र꣢ सश्चसि दा꣣शु꣡षे꣢ । उ꣢पो꣣पे꣡न्नु म꣢꣯घ꣣वन्भू꣢य꣣ इ꣢꣯न्नु ते꣣ दा꣡नं꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ पृच्यते ॥३००॥
पदार्थःहे (इन्द्र) सुखप्रदाता परमेश्वर ! आप (कदाचन) कभी (स्तरीः) वन्ध्या गौ के समान निष्फल (न असि) नहीं होते, प्रत्युत (दाशुषे) आत्मदान करनेवाले उपासनायज्ञ के यजमान को फल देने के लिए (सश्चसि) प्राप्त होते हो। हे (मघवन्) धनों के स्वामी ! (देवस्य ते) तुझ दानादिगुणयुक्त का (दानम्) दान (इत् नु) निश्चय ही (भूयः इत्) पुनः-पुनः (उप-उप पृच्यते) यजमान को प्राप्त होता है, अवश्य प्राप्त होता है ॥८॥
भावार्थःजो स्वयं को परमेश्वर के लिए समर्पित कर देता है, उसे वह दुधारू गाय के समान सदा फल प्रदान करता रहता है ॥८॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि वृ꣢꣯त्रहन्तम꣣ ह꣡री꣢ इन्द्र परा꣣व꣡तः꣢ । अ꣣र्वाचीनो꣡ म꣢घव꣣न्त्सो꣡म꣢पीतय उ꣣ग्र꣢ ऋ꣣ष्वे꣢भि꣣रा꣡ ग꣢हि ॥३०१॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (वृत्रहन्तम) पापरूप वृत्रासुरों का अतिशय वध करनेवाले (इन्द्र) परमात्मन् ! (परावतः) अपने परम स्वरूप में स्थित होकर आप (हरी) हमारे ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रियरूप घोड़ों को (युङ्क्ष्व हि) कार्य में प्रवृत्त कीजिए, अर्थात् हमें ज्ञानवान् और कर्मवान् बनाइए। (उग्रः) तीक्ष्ण बलवाले आप (अर्वाचीनः) हमारे अभिमुख होते हुए (सोमपीतये) हमारे आत्मा के रक्षणार्थ (ऋष्वेभिः) महान्, वीरता, दया, उदारता आदि गुणों के साथ अर्थात् हमारे लिए उनका उपहार लेकर (आगहि) आइए ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। राष्ट्र में शत्रु का संकट आ जाने पर प्रजा द्वारा सेनाध्यक्ष को सैनिकों के साथ बुलाया जा रहा है। हे (वृत्रहन्तम) शत्रुओं का अत्यधिक संहार करनेवाले (इन्द्र) सेनाध्यक्ष ! आप (परावतः) अपने उत्कृष्ट सैन्यावास से (हरी) संकटों को हरनेवाले अपने आक्रामक और रक्षक दोनों सेना-दलों को (युङ्क्ष्व हि) शत्रुओं के उच्छेद और राष्ट्र के रक्षण के लिए नियुक्त कीजिए। हे (मघवन्) वीरतारूप धन के धनी ! (उग्रः) प्रचण्ड आप (सोमपीतये) शान्ति के रक्षणार्थ (ऋष्वेभिः) अपने महाबली सैनिकों के साथ (अर्वाचीनः) रणभूमि की ओर (आगहि) आइए ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःदेहधारी जीवात्मा के ज्ञान एवं पौरुष से रहित तथा पापग्रस्त हो जाने पर जैसे परमेश्वर का आह्वान श्रेयस्कर होता है, वैसे ही राष्ट्र जब शत्रुओं से आक्रान्त हो जाता है तब सेनाध्यक्ष का आह्वान श्रेयस्कर होता है ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्वा꣢मि꣣दा꣡ ह्यो नरोऽपी꣢꣯प्यन्वज्रि꣣न्भू꣡र्ण꣢यः । स꣡ इ꣢न्द्र꣣ स्तो꣡म꣢वाहस इ꣣ह꣡ श्रु꣣ध्यु꣢प꣣ स्व꣡स꣢र꣣मा꣡ ग꣢हि ॥३०२॥
पदार्थःहे (वज्रिन्) वज्रधारी अर्थात् दुर्जनों के दलन और सज्जनों के रक्षण की शक्ति से युक्त परमात्मन् वा राजन् ! (त्वाम्) आपको (भूर्णयः) लोगों का भरण-पोषण करनेवाले (नरः) नेताजन (इदा) इस समय, तथा (ह्यः) भूतकाल में (अपीप्यन्) बढ़ाते हैं और बढ़ाते रहे हैं, अर्थात् सदा आपका प्रचार करते हैं। (सः) वह आप (इन्द्र) हे दुर्मति के विदारक और सुमति के दाता परमात्मन् वा राजन् ! (स्तोमवाहसः) स्तुति करनेवाले हम लोगों को अर्थात् हमारे निवेदनों को (इह) यहाँ (श्रुधि) सुनिए और (स्वसरम्) हमारे हृदयसदन में अथवा प्रजा के सभागृह में (उप आ गहि) आइए ॥१०॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःसमाज में जो नेताजन होते हैं, उन्हें चाहिए कि सर्वत्र परमात्मा वा प्रजारञ्जक राजा का प्रचार करें, जिससे राष्ट्र के सब लोग आस्तिक तथा राजभक्त हों ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र के प्रति सोमरस अर्पित होने, गाय के रूप में इन्द्र का स्मरण करके उसका आह्वान होने, इन्द्र से सम्बन्ध रखनेवाले त्वष्टा, पर्जन्य, बृहस्पति एवं अदिति का आह्वान होने और इन्द्र नाम से राजा, सेनापति आदि का भी वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -उषाः| स्वर - मध्यमः
प्र꣡त्यु꣢ अदर्श्याय꣣त्यू꣢३꣱च्छ꣡न्ती꣢ दुहि꣣ता꣢ दि꣣वः꣢ । अ꣡पो꣢ म꣣ही꣡ वृ꣢णुते꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ त꣢मो꣣ ज्यो꣡ति꣢ष्कृणोति सू꣣न꣡री꣢ ॥३०३॥
पदार्थः(आयती) आती हुई, (उच्छन्ती) उदित होती हुई (दिवः दुहिता) द्यौ-लोक की पुत्री उषा (प्रति अदर्शि उ) दिखाई दी है। (मही) महती यह उषा (चक्षुषा) दर्शनप्रदान से (तमः) अन्धकार को (अप उ वृणुते) दूर कर रही है। (सूनरी) सुनेत्री यह उषा (ज्योतिः) ज्योति को (कृणोति) उत्पन्न कर रही है ॥१॥ इस मन्त्र में स्वभावोक्ति अलङ्कार है और प्राकृतिक उषा के वर्णन से आध्यात्मिक उषा का वर्णन ध्वनित हो रहा है ॥१॥
भावार्थःजैसे सूर्योदय से पूर्व व्याप्त घने रात्रि के अन्धकार को विच्छिन्न करता हुआ प्राकृतिक उषा का प्रकाश सर्वत्र फैल जाता है, वैसे ही परमात्मारूप सूर्य के उदय से पूर्व मनोभूमि में व्याप्त तामसिक वृत्तियों के जाल को विच्छिन्न कर आध्यात्मिक उषा का प्रकाश आत्मा में फैलता है। यह उषा योगमार्ग में ऋतम्भरा प्रज्ञा के नाम से प्रसिद्ध है ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -अश्विनौ| स्वर - मध्यमः
इ꣣मा꣡ उ꣢ वां꣣ दि꣡वि꣢ष्टय उ꣣स्रा꣡ ह꣢वन्ते अश्विना । अ꣣यं꣡ वा꣢म꣣ह्वे꣡ऽव꣢से शचीवसू꣣ वि꣡शं꣢ विश꣣ꣳ हि꣡ गच्छ꣢꣯थः ॥३०४
पदार्थःहे (अश्विनौ) परमात्मा और जीवात्मा अथवा अध्यापक-उपदेशको ! (उस्रा वाम्) आप निवासकों को (इमाः उ) ये (दिविष्टयः) ज्ञान-प्रकाश को चाहनेवाली प्रजाएँ (हवन्ते) पुकार रही हैं। हे (शचीवसू) कर्मरूप और प्रज्ञारूप धनवालो ! (अयम्) यह मैं भी (अवसे) रक्षा के लिए (वाम्) तुम्हें (अह्वे) पुकार रहा हूँ, (हि) क्योंकि, तुम (विशं विशम्) प्रत्येक प्रजा के पास (गच्छथः) जाते हो ॥२॥
भावार्थःजैसे परमात्मा और जीवात्मा मनुष्यों का मार्गदर्शन करते हैं, वैसे ही अध्यापक और उपदेशक भी शिक्षा और उपदेश के द्वारा सदाचार का मार्ग दर्शाते हैं। अतः उनकी संगति सबको करनी चाहिए ॥२॥
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छन्द -बृहती| देवता -अश्विनौ| स्वर - मध्यमः
कु꣢ष्ठः꣣ को꣡ वा꣢मश्विना तपा꣣नो꣡ दे꣢वा꣣ म꣡र्त्यः꣢ । घ्न꣣ता꣡ वा꣢मश्न꣣या꣡ क्षप꣢꣯माणो꣣ꣳशु꣢ने꣣त्थ꣢मु꣣ आ꣢द्व꣣न्य꣡था꣢ ॥३०५
पदार्थःहे (देवा) दानादि गुणों से युक्त, तेज से प्रकाशमान (अश्विना) परमात्मा-जीवात्मा और अध्यापक-उपदेशको ! (युवाम्) तुम (कु) कहाँ (स्थः) हो? (कः मर्त्यः) कौन मनुष्य (वाम्) तुम्हें (तपानः) संतप्त करनेवाला है? तुम कहाँ हो? प्रेरणा, शिक्षण या उपदेश क्यों नहीं करते हो? क्या रुष्ट हो? तुम्हारे रोष का क्या कारण है? आगे स्वयं ही उत्तर देता है—प्रथम—परमात्मा-जीवात्मा के पक्ष में—(अश्नया) मन में व्याप्त, (वाम् घ्नता) तुम्हारे पास पहुँचनेवाले (अंशुना) ज्ञान-कर्म-श्रद्धारूप सोमरस से (क्षपमाणः) तुम्हें वंचित करनेवाला ही तुम्हारा संतापक है । द्वितीय—अध्यापक-उपदेशक के पक्ष में। (अश्नया) भूख से (घ्नता) पीड़ित (वाम्) तुम्हें (अंशुना) भोजन, वस्त्र, वेतन आदि देयांश से (क्षपमाणः) वंचित करनेवाला ही तुम्हारा संतापक है। आगे अभयपक्ष में—(इत्थम् उ) ऐसा ही है न? (आत् उ) अथवा (अन्यथा) इससे भिन्न अन्य ही कोई तुम्हारे संताप और रोष का कारण है? अभिप्राय यह है कि अन्य कोई कारण नहीं हो सकता ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा और जीवात्मा रूप अश्वी सदा मनुष्यों के हृदय में बैठे हुए हैं। जो ज्ञान, कर्म, श्रद्धा, भक्ति आदि का सोमरस यथायोग्य उन्हें अर्पित करता है, उसे वे सदा सत्प्रेरणा देते रहते हैं। पर जो उनकी उपेक्षा करता है उससे वे रुष्ट के समान हो जाते हैं। उसी प्रकार जो शिक्षण और उपदेशों से उपकार करनेवाले अध्यापक और उपदेशक को दक्षिणारूप में भोजन-वस्त्र आदि अथवा निश्चित वेतन नहीं देता, वह उनके प्रति अपराध करता है ॥३॥
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छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣यं꣢ वां꣣ म꣡धु꣢मत्तमः सु꣣तः꣢꣫ सोमो꣣ दि꣡वि꣢ष्टिषु । त꣡म꣢श्विना पिबतं ति꣣रो꣡अ꣢ह्न्यं ध꣣त्त꣡ꣳ रत्ना꣢꣯नि दा꣣शु꣡षे꣢ ॥३०६॥
पदार्थःहे (अश्विना) आत्मा और मन रूप अथवा अध्यापक और उपदेशक रूप अश्वी देवो ! (दिविष्टिषु) अध्यात्म-दीप्ति के यज्ञों में अथवा व्यवहार-यज्ञों में (अयम्) यह (मधुमत्तमः) अत्यन्त मधुर (सोमः) ज्ञान, कर्म, श्रद्धा, शान्ति आदि का रस अथवा सोमादि ओषधियों का रस (वाम्) तुम्हारे लिए (सुतः) मैंने तैयार किया है। (तिरोअह्न्यम्) पवित्रता में दिन को भी तिरस्कृत करनेवाले अर्थात् उज्ज्वल दिन से भी अधिक पवित्र (तम्) उस रस को, तुम (पिबतम्) पान करो, और (दाशुषे) देनेवाले मुझ यजमान के लिए (रत्नानि) उत्कृष्ट प्रेरणा, उत्कृष्ट संकल्प, उत्कृष्ट शिक्षा, उत्कृष्ट उपदेश आदि बहुमूल्य रमणीय धन (धत्तम्) प्रदान करो ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःमन के शिवसंकल्पपूर्वक जीवात्मा जिस ज्ञान, कर्म, श्रद्धा, भक्ति आदि को परमात्मा के प्रति अर्पण की बुद्धि से करता है, वह बहुत फलदायक होता है। उसी प्रकार राष्ट्र में अध्यापक और उपदेशक के यथायोग्य सत्कार से उनके पास से बहुत अधिक ज्ञान, विज्ञान आदि प्राप्त किया जा सकता है ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
आ꣢ त्वा꣣ सो꣡म꣢स्य꣣ ग꣡ल्द꣢या꣣ स꣢दा꣣ या꣡च꣢न्न꣣हं꣡ ज्या꣢ । भू꣡र्णिं꣢ मृ꣣गं꣡ न सव꣢꣯नेषु चुक्रुधं꣣ क꣡ ईशा꣢꣯नं꣣ न या꣢चिषत् ॥३०७॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन् ! (सोमस्य) शान्तरस के (गल्दया) प्रवाह के साथ (ज्या) जिह्वा द्वारा (त्वा) तुझसे (सदा) हमेशा (याचन्) याचना करता हुआ (अहम्) मैं (सवनेषु) बहुत से घृत द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञों में (भूर्णिम्) अपने दूध-घी से भरण-पोषण करनेवाले (मृगम् न) गाय पशु के समान (सवनेषु) जीवन-यज्ञों में (भूर्णिम्) भरण-पोषण-कर्ता तथा (मृगम्) मन को शुद्ध करनेवाले तुझे मैं (न आचुक्रुधम्) क्रुद्ध न करूँ। सदा याचना से दाता क्रुद्ध क्यों न हो जाएगा, इसका उत्तर देते हैं— (ईशानम्) स्वामी से (कः) कौन (न याचिषत्) याचना नहीं करता ॥५॥ इस मन्त्र में ‘भूर्णिं मृगं न सवनेषु’ में श्लिष्टोपमालङ्कार है। ‘न’ उपमार्थक तथा निषेधार्थक दोनों है। जब ‘मृगं’ से सम्बद्ध होता है तब बाद में प्रयुक्त होने के कारण उपमार्थक है, और जब ‘सवनेषु’ से सम्बद्ध होता है तब पहले प्रयुक्त होने के कारण निषेधार्थक है। अभिप्राय यह है कि जैसे यज्ञ में बार-बार दूध-घी माँगने पर भी गाय क्रुद्ध नहीं होती, ऐसे ही मेरे बार-बार माँगने से आप क्रुद्ध न हों। ‘कः ईशानम् न याचिषत्-स्वामी से कौन नहीं माँगता’ इस सामान्य से अपने माँगने रूप विशेष का समर्थन होने से यहाँ अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःबार-बार भी याचना करके जगदीश्वर से सद्गुण, सदाचार आदि सबको प्राप्त करने चाहिएँ ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣡ध्व꣢र्यो द्रा꣣व꣢या꣣ त्व꣢꣫ꣳ सोम꣣मि꣡न्द्रः꣢ पिपासति । उ꣡पो꣢ नू꣣नं꣡ यु꣢युजे꣣ वृ꣡ष꣢णा꣣ ह꣢री꣣ आ꣡ च꣢ जगाम वृत्र꣣हा꣢ ॥३०८॥
पदार्थःहे (अध्वर्यो) अध्यात्म-यज्ञ के अध्वर्यु मेरे मन ! (त्वम्) तू (सोमम्) शान्तरस को (आ द्रावय) चारों ओर से प्रवाहित कर, (इन्द्रः) आत्मा (पिपासति) उसका प्यासा है। (नूनम्) मानो, (वृत्रहा) शान्ति के बाधक अशान्त विचारों के हन्ता परमात्मा ने भी, तेरे अध्यात्म-यज्ञ में आने के लिए (वृषणा) बलवान् (हरी) वेग से ले जानेवाले घोड़ों को (उपो युयुजे) रथ में नियुक्त कर लिया है, और साथ ही साथ (आजगाम च) वह आ भी गया है ॥६॥ इस मन्त्र में उत्प्रेक्षालङ्कार है। ‘नूनम्’ शब्द उत्प्रेक्षावाचक है। कहा भी है—‘मन्ये, शङ्के, ध्रुवम्, प्रायः, नूनम्, इव आदि शब्द उत्प्रेक्षावाचक होते हैं।’ शरीररहित परमात्मा का रथ में घोड़ों को नियुक्त करना असंभव होने से ‘मानो घोड़ों को नियुक्त किया है’ इस रूप में उत्प्रेक्षा की गयी है। साथ ही ‘आत्मा शान्तिरस का प्यासा है’ इस कारण द्वारा शान्तरस-प्रवाह करने रूप कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास अलङ्कार भी है। इसके अतिरिक्त ‘घोड़ों को नियुक्त करते ही आ पहुँचा है’ इस प्रकार कारण-कार्य की एक-साथ प्रतीति होने से अतिशयोक्ति अलङ्कार भी है ॥६॥
भावार्थःजीवात्मा को शान्तरस से तृप्त करने के लिए अपने मन को अध्वर्यु बनाकर सबको आन्तरिक शान्तियज्ञ का विस्तार करना चाहिए, क्योंकि शान्त आत्मा में ही परमात्मा का निवास होता है ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣भी꣢ष꣣त꣢꣫स्तदा भ꣣रे꣢न्द्र꣣ ज्या꣢यः꣣ क꣡नी꣢यसः । पु꣣रूव꣢सु꣣र्हि꣡ म꣢घवन्ब꣣भू꣡वि꣢थ꣣ भ꣡रे꣢भरे च꣣ ह꣡व्यः꣢ ॥३०९॥
पदार्थःप्रथम—उपास्य-उपासक के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमेश्वर ! (कनीयसः सतः) आपकी अपेक्षा अल्प शक्ति और अल्प धन आदिवाले मुझे (तत्) वह आपके पास विद्यमान (ज्यायः) अत्यधिक प्रशस्त तथा अधिक महान् आध्यात्मिक एवं भौतिक धन और बल (अभि आ भर) प्राप्त कराओ। हे (मघवन्) प्रशस्त ऐश्वर्यवाले परमात्मन् ! आप (पुरूवसुः) बहुत धनी (बभूविथ) हो, (भरे-भरे च) और प्रत्येक अन्तर्द्वन्द्व में, प्रत्येक देवासुर-संग्राम में, प्रत्येक संकट में विजयप्रदानार्थ (हव्यः) पुकारे जाने योग्य हो ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य के पक्ष में। हे (इन्द्र) दोषविदारक तथा उपदेशप्रदायक आचार्यवर ! (कनीयसः सतः) आयु और विद्या में आपसे अत्यल्प मुझ अपने शिष्य को आप (तत्) उस अपने पास विद्यमान (ज्यायः) प्रशंसनीय तथा विशाल विद्या और व्रतपालन के भण्डार को (अभि आ भर) प्रदान करो, (हि) क्योंकि (मघवन्) हे ज्ञान-धन के धनी ! आप (पुरूवसुः) अनेक विद्याओं में विशारद (बभूविथ) हो, (भरे-भरे च) और शिष्यों का प्रत्येक भार उठाने के निमित्त (हव्यः) ग्रहण करने योग्य हो ॥ तृतीय—राजा-प्रजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) शत्रुविदारक सुखादिप्रदायक राजन् ! (कनीयसः सतः) धन, शूरवीरता आदि में आपकी अपेक्षा बहुत कम मुझ प्रजाजन को (तत्) वह स्पृहणीय, प्रसिद्ध (ज्यायः) प्रशस्यतर तथा विशालतर, धन-धान्य, शस्त्रास्त्र, कला-कौशल, सुराज्य आदि ऐश्वर्य (अभि आ भर) प्रदान कीजिए। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् ! आप (पुरूवसुः) बहुत-सी प्रजाओं को बसानेवाले (बभूविथ) हो, (भरे-भरे च) और राष्ट्र के अन्दर तथा बाहर जो शत्रु हैं, उनके साथ होनेवाले प्रत्येक संग्राम में (हव्यः) पुकारे जाने योग्य हो ॥७॥ नन्हे पात्र में बड़ी वस्तु नहीं समा सकती, अतः ‘ज्यायः कनीयसः’ में वैषम्य प्रतीत होने के कारण विषमालङ्कार व्यङ्ग्य है ॥७॥
भावार्थःपरमात्मा के पास अत्यन्त प्रशस्त और अत्यन्त विशाल भौतिक तथा आध्यात्मिक धन, गुरु के पास प्रचुर विद्याधन तथा सच्चारित्र्य का धन और राजा के पास प्रभूत, चाँदी, सोने, धान्य, शस्त्रास्त्र, कलाकौशल, चिकित्सा-साधन आदि का धन है। वे अपने-अपने धन से हमें धनी करें ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡दि꣢न्द्र꣣ या꣡व꣢त꣣स्त्व꣢मे꣣ता꣡व꣢द꣣ह꣡मीशी꣢꣯य । स्तो꣣ता꣢र꣣मि꣡द्द꣢धिषे रदावसो꣣ न꣡ पा꣢प꣣त्वा꣡य꣢ रꣳसिषम् ॥३१०॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमात्मन् ! (यत्) यदि (यावतः) जितने धन के (त्वम्) आप स्वामी हैं, (एतावत्) उतने धन का (अहम्) मैं (ईशीय) स्वामी हो जाऊँ, तो हे (रदावसो) पवित्रताकारक धनवाले, अथवा दानियों को वसानेवालेपरमात्मन् ! मैं (स्तोतारम्) आपके स्तोता, पुण्यकर्ता मनुष्य को (इत्) ही (दधिषे) धन-दान से धारण करूँ, (पापत्वाय) पाप के लिए कभी (न) नहीं (रंसिषम्) दान करूँ ॥८॥
भावार्थःधन पाकर किसी को कंजूस नहीं होना चाहिए, किन्तु उस धन का यथायोग्य सत्पात्रों में दान करना चाहिए। पर पाप-कार्य के लिए कभी धन-दान नहीं करना चाहिए ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ प्र꣡तू꣢र्तिष्व꣣भि꣡ विश्वा꣢꣯ असि꣣ स्पृ꣡धः꣢ । अ꣣शस्तिहा꣡ ज꣢नि꣣ता꣡ वृ꣢त्र꣣तू꣡र꣢सि꣣ त्वं꣡ तू꣢र्य तरुष्य꣣तः꣢ ॥३११॥
पदार्थःहे (इन्द्र) शूरवीर परमात्मन् वा राजन् ! (त्वम्) आप (प्रतूर्तिषु) झटापटीवाले देवासुरसंग्रामों में (विश्वाः) सब (स्पृधः) स्पर्धालु शत्रु-सेनाओं को (अभि-असि) परास्त करते हो। आप (अशस्तिहा) अप्रशस्ति को दूर करनेवाले, (जनिता) प्रशस्तिप्रद सद्गुणों और सच्चारित्र्यों को हृदय में वा राष्ट्र में उत्पन्न करनेवाले, (वृत्रतूः) पाप वा पापियों की हिंसा करनेवाले (असि) हो। (त्वम्) आप (तरुष्यतः) हिंसकों की (तूर्य) हिंसा करो ॥९॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष और कारण से कार्य का समर्थनरूप अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। ‘तूर्’ की तीन बार आवृत्ति तथा तकार की ग्यारह बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है। परमात्मा और राजा का उपमानोपमेयभाव व्यङ्ग्य है ॥९॥
भावार्थःजैसे परमात्मा मानस देवासुर-संग्रामों में काम, क्रोध आदि असुरों को परास्त कर, अप्रशस्ति को दूर कर, प्रशस्ति दिलानेवाले श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभावों को उत्पन्न कर, पापों का निर्मूलन कर स्तोता की कीर्ति का विस्तार करता है, वैसे ही राजा को भी राष्ट्र के अन्दर तथा बाहर के शत्रुओं का उन्मूलन करके, राष्ट्र की अप्रशस्ति का निवारण करके, प्रजाओं में सद्गुणों और सदाचार का प्रचार करके सुप्रबन्ध द्वारा कीर्ति उत्पन्न करनी चाहिए ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
प्र꣡ यो रि꣢꣯रि꣣क्ष꣡ ओज꣢꣯सा दि꣣वः꣡ सदो꣢꣯भ्य꣣स्प꣡रि꣢ । न꣡ त्वा꣢ विव्याच꣣ र꣡ज꣢ इन्द्र꣣ पा꣡र्थि꣢व꣣म꣢ति꣣ वि꣡श्वं꣢ ववक्षिथ ॥३१२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (यः) जो आप (ओजसा) बल और प्रताप से (दिवः) द्यौ लोक के (सदोभ्यः) सदनों—सूर्य-तारामण्डल आदियों से (परि) ऊपर होकर (प्र रिरिक्षे) महिमा में उनसे बढ़े हुए हो, (त्वा) ऐसे आपको (पार्थिवं रजः) पार्थिव लोक भी (न विव्याच) नहीं छल सकता है, अर्थात् महिमा में पराजित नहीं कर सकता है। सचमुच आप (विश्वम् अति) सारे विश्व को अतिक्रमण करके (ववक्षिथ) महान् हो ॥१०॥
भावार्थःपरमात्मा का बल, महत्त्व, प्रताप और प्रभाव द्यावापृथिवी आदि सारे ब्रह्माण्ड से अधिक है ॥१०॥ इस दशति में प्राकृतिक उषा के वर्णन द्वारा आध्यात्मिक उषा के आविर्भाव को सूचित कर, अश्विनौ के नाम से परमात्मा-जीवात्मा, आत्मा-मन और अध्यापक-उपदेशक का स्तवन कर, इन्द्र नाम से जगदीश्वर की स्तुति करके उससे धन, शत्रुविनाश आदि की प्रार्थना कर उसकी महिमा का वर्णन होने से और इन्द्र नाम से राजा, सेनापति आदि के भी कर्तव्यों का बोध कराने से इस दशति के विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति जाननी चाहिए ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
अ꣡सा꣢वि दे꣣वं꣡ गोऋ꣢꣯जीक꣣म꣢न्धो꣣꣬ न्य꣢꣯स्मि꣢न्नि꣡न्द्रो꣢ ज꣣नु꣡षे꣢मुवोच । बो꣡धा꣢मसि त्वा हर्यश्व यज्ञै꣣र्बो꣡धा꣢꣯ न꣣ स्तो꣢म꣣म꣡न्ध꣢सो꣣ म꣡दे꣢षु ॥३१३॥
पदार्थःहमारे द्वारा (देवम्) दीप्तियुक्त, तेजस्वी, (गोऋजीकम्) इन्द्रियरूप गौओं की सरलगामिता में हेतुभूत (अन्धः) श्रद्धारस (असावि) अभिषुत कर लिया गया है। (अस्मिन्) इसमें (इन्द्रः) परमेश्वर (जनुषा ईम्) स्वभावतः ही (नि उवोच) अतिशय संबद्ध हो गया है। हे (हर्यश्व) वेगवान् भूमि, चन्द्र, विद्युत् आदि व्याप्त पदार्थों के स्वामी परमात्मन् ! हम (यज्ञैः) योगाभ्यासरूप यज्ञों से (त्वा) आपको (बोधामसि) जानते हैं, आप (अन्धसः) आनन्द रस की (मदेषु) तृप्तियों में (नः) हमें बोध जानिये ॥१॥ इस मन्त्र में इन्द्र तथा उसके स्तोताओं द्वारा परस्पर एक बोधनरूप क्रिया किये जाने का वर्णन होने से अन्योन्य अलङ्कार है। ‘बोधा’ की एक बार आवृत्ति में यमक तथा ‘मन्धो, मन्ध’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से योगाभ्यासी मनुष्य की इन्द्रियाँ सरल मार्ग पर चलनेवाली हो जाती हैं। इसलिए सबको श्रद्धापूर्वक परमेश्वर की अर्चना करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
यो꣡नि꣢ष्ट इन्द्र꣣ स꣡द꣢ने अकारि꣣ त꣡मा नृभिः꣢꣯ पुरूहूत꣣ प्र꣡ या꣢हि । अ꣢सो꣣ य꣡था꣢ नोऽवि꣣ता꣢ वृ꣣ध꣢श्चि꣣द्द꣢दो꣣ व꣡सू꣢नि म꣣म꣡द꣢श्च꣣ सो꣡मैः꣢ ॥३१४॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। हे (इन्द्र) दुःखविदारक सुखप्रद परमेश्वर ! (ते) आपके (सदने) बैठने के निमित्त (योनिः) हृदय-गृह (अकारि) हमने संस्कृत कर लिया है। हे (पुरुहूत) बहुस्तुत ! (तम्) उस हृदय-गृह में (नृभिः) उन्नति करानेवाले सत्य, अहिंसा, दान, उदारता आदि गुणों के साथ (आ प्र याहि) आप आइए, (यथा) जिससे, आप (नः) हमारे (अविता) रक्षक और (वृधः चित्) वृद्धिकर्ता भी (असः) होवें, (वसूनि) आध्यात्मिक एवं भौतिक धनों को (ददः) देवें, (च) और (सोमैः) शान्तियों से (ममदः) हमें आनन्दित करें ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) शत्रुविदारक शान्तिप्रदाता राजन् ! (ते) आपके (सदने) बैठने के निमित्त (योनिः) सिंहासन (अकारि) बनाया गया है। हे (पुरुहूत) बहुत-से प्रजाजनों द्वारा निर्वाचित राजन् ! आप (नृभिः) नेता राज्याधिकारियों के साथ (आ) आकर (प्रयाहि) विराजिए, (यथा) जिससे, आप (नः) हम प्रजाओं के (अविता) रक्षक और (वृधः चित्) उन्नतिकर्ता भी (असः) होवें, (वसूनि) धनों को (ददः) देवें, (च) और (सोमैः) शान्तियों से (ममदः) हम प्रजाजनों को आनन्दित करें ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर हृदयासन पर और राजा सिंहासन पर बैठकर सबको आध्यात्मिक तथा भौतिक रक्षा, वृद्धि, सम्पदा और शान्ति प्रदान कर सकते हैं ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
अ꣡द꣢र्द꣣रु꣢त्स꣣म꣡सृ꣢जो꣣ वि꣢꣫ खानि꣣ त्व꣡म꣢र्ण꣣वा꣡न्ब꣢द्बधा꣣ना꣡ꣳ अ꣢रम्णाः । म꣣हा꣡न्त꣢मिन्द्र꣣ प꣡र्व꣢तं꣣ वि꣢꣫ यद्वः सृ꣣ज꣢꣫द्धा꣣रा अ꣢व꣣ य꣡द्दा꣢न꣣वा꣢न्हन् ॥३१५॥
पदार्थःप्रथम—हे (इन्द्र) परमेश्वर ! (त्वम्) सकलसृष्टि के व्यवस्थापक आप, अपने द्वारा रचित सूर्य को साधन बनाकर (उत्सम्) जल के आधार बादल का (अदर्दः) विदारण करते हो, (खानि) उसके बन्द छिद्रों को (वि असृजः) खोल देते हो। (बद्बधानान्) न बरसनेवाले बादल में दृढ़ता से बँधे हुए (अर्णवान्) जल के पारावारों को (अरम्णाः) छोड़ देते हो। इस प्रकार वृष्टिकर्म के वर्णन के बाद पहाड़ों से जलधाराओं के प्रवाह का वर्णन है। (यत्) जब (महान्तम्) विशाल (पर्वतम्) बर्फ के पर्वत को (विवः) पिघला देते हो और (यत्) जब (दानवान्) जल-प्रवाह में बाधक शिलाखण्ड आदियों को (हन्) दूर करते हो, तब (धाराः) नदियों की धाराओं को (अव सृजत्) बहाते हो ॥ इससे राजा का विषय भी सूचित होता है। जैसे परमेश्वर वा सूर्य वृष्टि-प्रतिबन्धक मेघ को विदीर्ण कर उसमें रुकी हुई जलधाराओं को प्रवाहित करते हैं, वैसे ही राजा भी राष्ट्र की उन्नति में प्रतिबन्धक शत्रुओं को विदीर्ण कर उनसे अवरुद्ध ऐश्वर्य की धाराओं को प्रवाहित करे ॥ द्वितीय—हे (इन्द्र) परमेश्वर ! (त्वम्) आप (उत्सम्) ज्ञान से रुके हुए स्रोत को (अदर्दः) खोल देते हो, (खानि) अन्तरात्मा से पराङ्मुख हुई बहिर्मुख इन्द्रियों को (वि-असृजः) बाह्य विषयों से पृथक् कर देते हो, (बद्बधानान्) आनन्दमय कोशों में रुके हुए (अर्णवान्) आनन्द के पारावारों को (अरम्णाः) मनोमय आदि कोशों में फव्वारे की तरह छोड़ देते हो। (यत्) जब, आप (महान्तम्) विशाल (पर्वतम्) योगमार्ग में विघ्नभूत व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदियों के पहाड़ को (विवः) विदीर्ण कर देते हो, और (यत्) जब (दानवान्) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश रूप दानवों को (हन्) विनष्ट कर देते हो, तब (धाराः) कैवल्य प्राप्त करानेवाली धर्ममेघ समाधि की धाराओं को (अव सृजत्) प्रवाहित करते हो ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर जैसे वर्षा करना, नदियों को बहाना आदि प्राकृतिक कार्य सम्पन्न करता है, वैसे ही योगाभ्यासी मुमुक्षु मनुष्य के योगमार्ग में आये हुए विघ्नों का निवारण कर उसकी आत्मा में आनन्द की वृष्टि करके उसे मोक्ष भी प्रदान करता है ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
सु꣣ष्वाणा꣡स꣢ इन्द्र स्तु꣣म꣡सि꣢ त्वा सनि꣣ष्य꣡न्त꣢श्चित्तुविनृम्ण꣣ वा꣡ज꣢म् । आ꣡ नो꣢ भर सुवि꣣तं꣡ यस्य꣢꣯ को꣣ना꣢꣫ तना꣣ त्म꣡ना꣢ सह्यामा꣣त्वो꣡ताः꣢ ॥३१६॥
पदार्थःहे (तुविनृम्ण) बहुत बली और बहुत धनी (इन्द्र) परमात्मन् ! (सुष्वाणासः) श्रद्धारस को अभिषुत किये हुए हम (वाजम्) आत्मबल और अध्यात्मधन को (सनिष्यन्तः) पाना चाहते हुए (त्वा) तेरी (स्तुमसि) स्तुति करते हैं। तू (नः) हमें (सुवितम्) सद्गति और उत्कृष्ट प्रजा (आ भर) प्रदान कर, (यस्य) जिसकी (नः) हमें (कोना) कामना है। (त्वोताः) तुझसे रक्षित हम (त्मना) आत्म-बल द्वारा (तना) इधर-उधर फैले शत्रुओं को (सह्याम) परास्त कर दें ॥४॥
भावार्थःआत्मा, मन, प्राण, शरीर आदि का बल और आत्मिक एवं सांसारिक धन पाने के लिए अनन्त बल और अपार धनवाले परमेश्वर से ही हमें याचना करनी चाहिए। उसी की कृपा से हम उत्तम गति और उत्तम प्रजा को पाने तथा शत्रु का पराजय करने में समर्थ होते हैं ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
ज꣣गृह्मा꣢ ते꣣ द꣡क्षि꣢णमिन्द्र꣣ ह꣡स्तं꣢ वसू꣣य꣡वो꣢ वसुपते꣣ व꣡सू꣢नाम् । वि꣣द्मा꣢꣫ हि त्वा꣣ गो꣡प꣢तिꣳ शूर꣣ गो꣡ना꣢म꣣स्म꣡भ्यं꣢ चि꣣त्रं꣡ वृष꣢꣯णꣳ र꣣यिं꣡ दाः꣢ ॥३१७॥
पदार्थःहे (वसूनां वसुपते) समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक ऐश्वर्यों के अधिपति (इन्द्र) परमात्मन्, राजन् और आचार्य ! (वसूयवः) धन, धान्य, राज्य, विद्या, शम, दम, वैराग्य आदि ऐश्वर्यों की कामनावाले हम (ते) आपके (दक्षिणं हस्तम्) दाहिने हाथ को अर्थात् आपकी शरण को (जगृह्म) पकड़ रहे हैं। हे (शूर) दानवीर परमात्मन् राजन् और आचार्य ! हम (त्वा) आपको (गोनां गोपतिम्) समस्त वाणी, इन्द्रिय, गाय, भूमि आदियों का स्वामी (विद्म) जानते हैं। आप (अस्मभ्यम्) हमें (चित्रम्) गुण आदि में अद्भुत (वृषणम्) व्यक्ति, समाज, राष्ट्र वा जगत् में सुख की वर्षा करनेवाला (रयिम्) ऐश्वर्य (दाः) प्रदान कीजिए ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःपरमात्मा, राजा और आचार्य यथायोग्य अनेक प्रकार के धन, धान्य, विद्या, आरोग्य, सत्य, अहिंसा, शम, दम, योगसिद्धि, चक्रवर्ती राज्य, मोक्ष आदि ऐश्वर्यों के स्वामी हैं। उनकी शरण में जाकर हम भी इन ऐश्वर्यों को प्राप्त करें ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
इ꣢न्द्रं꣣ न꣡रो꣢ ने꣣म꣡धि꣢ता हवन्ते꣣ य꣡त्पार्या꣢꣯ यु꣣न꣡ज꣢ते꣣ धि꣢य꣣स्ताः꣢ । शू꣢रो꣣ नृ꣡षा꣢ता꣣ श्र꣡व꣢सश्च꣣ का꣢म꣣ आ꣡ गोम꣢꣯ति व्र꣣जे꣡ भ꣢जा꣣ त्वं꣡ नः꣢ ॥३१८॥
पदार्थः(इन्द्रम्) वीर परमात्मा वा राजा को (नरः) प्रजाजन (नेमधिता) आन्तरिक वा बाह्य संग्राम में और यज्ञ में (हवन्ते) सहायतार्थ पुकारते हैं। (पार्याः) पार होने योग्य वे, आन्तरिक और बाह्य विघ्नों को पार करने के लिए (यत्) जिस साधन का (युनजते) उपयोग करते हैं (ताः) वे (धियः) बुद्धियाँ और कर्म हैं, अर्थात् बुद्धि और कर्म का अवलम्बन करके वे सब शत्रुओं और विघ्नों को पार करते हैं। हे परमात्मन् वा राजन् ! (शूरः) शूरवीर (त्वम्) आप (नृषाता) संग्राम में (यशसः च) और यश की (कामे) अभिलाषा-पूर्ति में, और (गोमति व्रजे) प्रशस्त भूमि, वाणी, इन्द्रिय, दुधार गायों आदि के समूह में (नः) हमें (आ भज) भागी बनाइए, अर्थात् आप हमारी यशस्वी होने की कामना को पूर्ण कीजिए तथा हमें पृथिवी का राज्य, वाणी का बल, इन्द्रियों का बल और उत्तम जाति की गायें आदि प्राप्त कराइए ॥६॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥६॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा, राजा की सहायता एवं अपने बुद्धिकौशल तथा पुरुषार्थ से शत्रु-विजय, परम कीर्ति, भूमण्डल का साम्राज्य आदि सब अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
व꣡यः꣢ सुप꣣र्णा꣡ उ꣢꣯प सेदु꣣रि꣡न्द्रं꣢ प्रि꣣य꣡मे꣢धा꣣ ऋ꣡ष꣢यो꣣ ना꣡ध꣢मानाः । अ꣡प꣢ ध्वा꣣न्त꣡मू꣢र्णु꣣हि꣢ पू꣣र्धि꣡ चक्षु꣢꣯र्मुमु꣣ग्ध्या꣢३꣱स्मा꣢न्नि꣣ध꣡ये꣢व ब꣣द्धा꣢न् ॥३१९॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य और सूर्य-किरणों के पक्ष में। (सुपर्णाः वयः) सुन्दर पंखोंवाले पक्षियों के समान सुन्दर उड़ान लेनेवाली सूर्य-किरणें, मानो (इन्द्रम्) सूर्य के (उपसेदुः) समीप पहुँचती हैं। (प्रियमेधाः) बुद्धि बढ़ाना अथवा प्रकाशप्रदानरूप यज्ञ करना जिन्हें प्रिय है, ऐसी (ऋषयः) दर्शन में सहायक वे (नाधमानाः) मानो याचना करती हैं कि हे सूर्य (निधया इव) मानो जाल से (बद्धान्) बँधी हुई (अस्मान्) हमें आप मुमुग्धि छोड़ दो, हमारे द्वारा (ध्वान्तम्) अन्धकार के आवरण को (अप-ऊर्णुहि) परे हटा दो, और (चक्षुः) प्राणियों की आँख को (पूर्धि) प्रकाश से पूर्ण कर दो ॥ द्वितीय—आचार्य और शिष्यों के पक्ष में। (सुपर्णाः) ज्ञान, कर्म, उपासना रूप सुन्दर पंखोंवाले, (वयः) उड़ने में समर्थ पक्षियों के समान पढ़ी हुई विद्या के प्रचार में समर्थ शिष्यगण (इन्द्रम्) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य के (उपसेदुः) समीप पहुँचते हैं। (प्रियमेधाः) मेधा और यज्ञ से प्रीति रखनेवाले, (ऋषयः) वेदादि शास्त्रों के द्रष्टा होते हुए वे (नाधमानाः) आचार्य से याचना करते हैं कि (निधया इव बद्धान्) मानो जाल से बाँधकर इस गुरुकुल में रखे हुए (अस्मान्) हमें, आप (मुमुग्धि) बाहर जाने के लिए छोड़ दीजिए, (ध्वान्तम्) संसार में फैले हुए अविद्या के अन्धकार को, (अप-ऊर्णुहि) हमारे द्वारा हटा दीजिए, और लोगों में (चक्षुः) ज्ञान के प्रकाश को (पूर्धि) भर दीजिए ॥ तृतीय—परमात्मा और जीवात्मा के पक्ष में। (सुपर्णाः) ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि रूप सुन्दर पंखोंवाले (वयः) पक्षियों के तुल्य जीवात्मा (इन्द्रम्) परमेश्वर के (उपसेदुः) पास पहुँचते हैं। (प्रियमेधाः) बुद्धि अथवा यज्ञ के प्रेमी, (ऋषयः) पदार्थों का दर्शन करनेवाले वे (नाधमानाः) परमात्मा से याचना करते हैं कि हमारे (ध्वान्तम्) तमोगुण के आवरण को (अप-ऊर्णुहि) हटा दो, और हमारे अन्दर (चक्षुः) ज्ञानप्रकाश को (पूर्धि) भर दो। (निधया इव) जाल के तुल्य जन्म, जरा, मरण आदि से (बद्धान्) शरीर या संसार में बंधे हुए (अस्मान्) हमें (मुमुग्धि) मुक्त कर दो, मोक्ष प्रदान कर दो ॥ चतुर्थ—राजा और प्रजा के पक्ष में। (सुपर्णाः) विविध साधनरूप शुभ पंखोंवाले (वयः) कर्मण्य प्रजाजन (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् वीर राजा के (उपसेदुः) समीप पहुँचते हैं। (प्रियमेधाः) मेधाप्रिय एवं यज्ञप्रिय, (ऋषयः) दृष्टिसम्पन्न, प्रबुद्ध वे (नाधमानाः) राजा से याचना करते हैं कि (ध्वान्तम्) राष्ट्र में व्याप्त अविद्या, भ्रष्टाचार आदि के अन्धकार को (अप-ऊर्णुहि) हटा दीजिए, हमारे अन्दर (चक्षुः) सद्विज्ञान, सद्विचार, सदाचार आदि का प्रकाश (पूर्धि) भर दीजिए। (निधया इव) मानो पापों और दुर्व्यसनों के जाल से (बद्धान्) बँधे हुए (अस्मान्) हम प्रजाजनों को (मुमुग्धि) श्रेष्ठ शिक्षा, दण्ड आदि उपायों द्वारा पापों और दुर्व्यसनों से छुड़ा दीजिए ॥७॥ इस मन्त्र में अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है। अप्रस्तुत सूर्य तथा रश्मियों के वृत्तान्त से प्रस्तुत गुरु-शिष्य, परमात्मा-जीवात्मा और राजा-प्रजा का वृत्तान्त सूचित हो रहा है। ‘निधयेव बद्धान्—मानो जाल में बँधे हुए’ में उत्प्रेक्षा है ॥७॥
भावार्थःकवि उत्प्रेक्षा कर रहा है कि रात्रि में सूर्य-किरणें जाल में बँधे पक्षियों के समान मानो सूर्यमण्डल के अन्दर बद्ध हो जाती हैं, तब वे मानो सूर्य से याचना करती हैं कि हमें छोड़ दो, जिससे हम भूतल पर जाकर अँधेरा मिटाकर सर्वत्र प्रकाश फैला दें। इसी प्रकार विद्याध्ययन किये हुए शिष्य आचार्य से याचना करते हैं कि आप हमें गुरुकुल से मुक्त कर दीजिए, जिससे बाहर जाकर हम संसार में फैले हुए अविद्या के अँधेरे को मिटाएँ। जीवात्मा-गण परमात्मा से याचना करते हैं कि ज्ञान की सलाई से हमारी चक्षु को दोषमुक्त करके जन्म, जरा, मरण आदि से बँधे हुए हमें मोक्ष का अधिकारी बना दीजिए। प्रजाजन राजा से याचना करते हैं कि राष्ट्र में व्याप्त अज्ञान, दुराचार आदि के अन्धकार को विछिन्न कर राष्ट्र को पतन की ओर ले जानेवाले सब दुर्व्यसनों से हमें छुड़ा दीजिए ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -वेनः| स्वर - धैवतः
ना꣡के꣢ सुप꣣र्ण꣢꣯मुप꣣ य꣡त्पत꣢꣯न्तꣳ हृ꣣दा꣡ वेन꣢꣯न्तो अ꣣भ्य꣡च꣢क्षत त्वा । हि꣡र꣢ण्यपक्षं꣣ व꣡रु꣢णस्य दू꣣तं꣢ य꣣म꣢स्य꣣ यो꣡नौ꣢ शकु꣣नं꣡ भु꣢र꣣ण्यु꣢म् ॥३२०॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन् ! (नाके) आत्मलोक में (उपपतन्तम्) पहुँचते हुए, (हिरण्यपक्षम्) ज्योतिरूप पंखोंवाले, (वरुणस्य दूतम्) पापनिवारक मन के प्रेरक, (यमस्य) शरीरस्थ इन्द्रियों के नियामक जीवात्मा के (योनौ) हृदयरूप गृह में उदित, (शकुनम्) शक्तिशाली, (भुरण्युम्) धारक और पोषक, (सुपर्णम्) शुभ पालन-गुणों से युक्त (त्वा) आपकी (यत्) जब, स्तोता जन (वेनन्तः) सच्ची कामना करते हैं, तब वे (हृदा) मन से (अभ्य- चक्षत) आपका साक्षात्कार कर लेते हैं, जैसे (नाके) मध्याह्नाकाश में (उपपतन्तम्) जाते हुए (हिरण्यपक्षम्) किरणरूप सुनहरे पंखोंवाले, (वरुणस्य दूतम्) रोगनिवारक अन्तरिक्षस्थानीय वायु के (दूतम्) दूत के समान उपकारक (यमस्य) रथ, यन्त्र आदियों को नियन्त्रित करनेवाले वैद्युत अग्नि के (योनौ) गृहरूप अन्तरिक्ष में (शकुनम्) पक्षी के समान विद्यमान (भुरण्युम्) भ्रमणशील (सुपर्णम्) सूर्य को, लोग (अभ्यचक्षत) आँख से देखते हैं ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार और उपमाध्वनि है ॥८॥
भावार्थःजो मनुष्य उत्कण्ठापूर्वक परमेश्वर की कामना करते हैं, वे मन द्वारा उसका वैसे ही साक्षात्कार कर लेते हैं, जैसे आँख से सूर्य को देखते हैं ॥८॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
ब्र꣡ह्म꣢ जज्ञा꣣नं꣡ प्र꣢थ꣣मं꣢ पु꣣र꣢स्ता꣣द्वि꣡ सी꣢म꣣तः꣢ सु꣣रु꣡चो꣢ वे꣣न꣡ आ꣢वः । स꣢ बु꣣꣬ध्न्या꣢꣯ उप꣣मा꣡ अ꣢स्य वि꣣ष्ठाः꣢ स꣣त꣢श्च꣣ यो꣢नि꣣म꣡स꣢तश्च꣣ वि꣡वः꣢ ॥३२१॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य के पक्ष में। (प्रथमम्) श्रेष्ठ (ब्रह्म) महान् आदित्यरूप ज्योति (पुरस्तात्) पूर्व दिशा में (जज्ञानम्) प्रकट हो रही है। (वेनः) कान्तिमान् सूर्य ने (सीमतः) चारों ओर अथवा मर्यादापूर्वक (सुरुचः) सम्यक् रोचमान किरणों को (वि आवः) रात्रि के अन्धकार के अन्दर से आविर्भूत कर दिया है। (सः) वह सूर्य (उपमाः) सबके समीप स्थित (अस्य) इस जगत् की (विष्ठाः) विशेष रूप से स्थितिसाधक (बुध्न्याः) अन्तरिक्षवर्ती दिशाओं को (विवः) अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है, और (सतः च) व्यक्त अर्थात् कार्यरूप में परिणत, (असतः च) और कारण के अन्दर अव्यक्तरुप से विद्यमान पदार्थ-समूह के (योनिम्) गृहरूप भूमण्डल को (विवः) प्रकाशित करता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (प्रथमम्) श्रेष्ठ (ब्रह्म) जगत् का आदिकारण ब्रह्म (पुरस्तात्) पहले, सृष्टि के आदि में (जज्ञानम्) प्रकृति के गर्भ से महत् आदि जगत्प्रपञ्च का जनक हुआ। (वेनः) मेधावी उस परब्रह्म ने (सीमतः) मर्यादा से अर्थात् महदादि क्रम से व्यवस्थापूर्वक (सुरुचः) सुरोचमान पदार्थों को (वि आवः) उत्पन्न किया। (सः) उसी परब्रह्म ने (उपमाः) समीपता से धारण तथा आकर्षण की शक्तियों द्वारा एक-दूसरे को स्थिर रखनेवाले, और (अस्य) इस जगत् के (विष्ठाः) विशेष रूप से स्थिति के निमित्त (बुध्न्याः) आकाशस्थ सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, तारे आदि लोकों को (विवः) प्रकाशित किया। उसी ने (सतः च) व्यक्त भूमि, जल, अग्नि, पवन आदि (असतः च) और अव्यक्त महत्, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा आदि की (योनिम्) कारणभूत प्रकृति को (विवः) कार्य पदार्थों के रूप में प्रकट किया ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘सतश्च-सतश्च’ की एक बार आवृत्ति में यमक है ॥९॥
भावार्थःकान्तिमान् सूर्य पूर्व दिशा में प्रकट होता हुआ अपनी सुप्रदीप्त किरणों को आकाश और भूमि पर प्रसारित करता हुआ सब दिशाओं को तथा सौर जगत् को प्रकाशित करता है। कान्तिमान् मेधावी परमेश्वर प्रकृति के मध्य से सुरोचमान पदार्थों को और सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, तारे आदि लोकों को प्रकट करता है। उस सूर्य का भली-भाँति उपयोग और उस परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना सबको करनी चाहिए ॥९॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
अ꣡पू꣢र्व्या पुरु꣣त꣡मा꣢न्यस्मै म꣣हे꣢ वी꣣रा꣡य꣢ त꣣व꣡से꣢ तु꣣रा꣡य꣢ । वि꣣रप्शि꣡ने꣢ व꣣ज्रि꣢णे꣣ श꣡न्त꣢मानि꣣ व꣡चा꣢ꣳस्यस्मै꣣ स्थ꣡वि꣢राय तक्षुः ॥३२२॥
पदार्थः(अस्मै) इस (महे) महान् (वीराय) वीर अथवा कामादि शत्रुओं के प्रकम्पक, (तवसे) बलवान् (तुराय) शीघ्र कार्यों को करनेवाले इन्द्र परमेश्वर के लिए और (अस्मै) इस (विरप्शिने) विशेष रूप से वेदों के प्रवक्ता तथा विशेषरूप से स्तुतियोग्य, (वज्रिणे) वज्रधारी के समान दुष्टों को दण्ड देनेवाले, (स्थविराय) प्रवृद्धतम चिरन्तन पुराण पुरुष इन्द्र परमेश्वर के लिए, स्तोता जन (अपूर्व्या) अपूर्व (पुरुतमानि) बहुत सारे (शन्तमानि) अतिशय शान्तिदायक (वचांसि) स्तोत्रों को (तक्षुः) रचते या प्रयुक्त करते हैं ॥१०॥ इस मन्त्र में विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार है। ‘तमान्-तमानि’, ‘वीराय-विराय’ आदि में छेकानुप्रास और ‘राय’ की तीन बार आवृत्ति में तथा ‘वीर-विर-विरा’ में वृत्त्यनुप्रास है ॥१०॥
भावार्थःपुराण पुरुष परमेश्वर सबसे अधिक महान् सबसे अधिक वीर, सबसे अधिक बली, सबसे अधिक शीघ्रकारी, सबसे अधिक स्तुतियोग्य, सबसे अधिक दुर्जनों का दण्डयिता, सबसे अधिक वयोवृद्ध, सबसे अधिक ज्ञानवृद्ध और सबसे अधिक प्राचीन है। वैदिक, स्वरचित और अन्य महाकवियों द्वारा रचित स्तोत्रों से उसकी पूजा सबको करनी चाहिए ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र को प्रबोधन देने, उसके गुण वर्णन करने, उसके द्वारा सृष्ट्युत्पत्ति आदि वर्णित करने, उसकी स्तुति करने तथा इन्द्र नाम से सूर्य, राजा, आचार्य आदि के कर्मों का वर्णन करने के कारण इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में नवम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
अ꣡व꣢ द्र꣣प्सो꣡ अ꣢ꣳशु꣣म꣡ती꣢मतिष्ठदीया꣣नः꣢ कृ꣣ष्णो꣢ द꣣श꣡भिः꣢ स꣣ह꣡स्रैः꣢ । आ꣢व꣣त्त꣢꣫मिन्द्रः꣣ श꣢च्या꣣ ध꣡म꣢न्त꣣म꣢प꣣ स्नी꣡हि꣢तिं नृ꣣म꣡णा꣢ अध꣣द्राः꣢ ॥३२३॥
पदार्थः(द्रप्सः) जल की बूँद के समान अणुरूप जीवात्मा (अंशुमतीम्) चक्षु आदि इन्द्रिय, प्राण और मन से युक्त देहपुरी में (अव-अतिष्ठत्) स्थित होता है, अर्थात् संचित कर्मों के फल भोगने के लिए और नवीन कर्म करने के लिए परमात्मा से प्रेरित होकर देहपुरी में आता है। (कृष्णः) काला तमोगुण (दशभिः सहस्रैः) दस हजार योद्धाओं के साथ अर्थात् अपने-अपने गणों सहित अनेकों काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि रिपुओं के साथ (इयानः) उस आत्मा पर आक्रमण कर देता है। तब (धमन्तम्) तरह-तरह की पैंतरे-बाजी करते हुए अथवा साँस फेंकते हुए (तम्) सैन्यसहित उस काले तमोगुण पर (इन्द्रः) जीवात्मा का सहायक परमैश्वर्यवान् परमात्मा (शच्या) उत्कृष्ट ज्ञान वा कर्म के साथ (आवत्) झपटता है। तदनन्तर (नृमणाः) सज्जनों पर ध्यान व प्रेम रखनेवाला वह परमात्मा (स्नीहितिम्) तमोगुण की उस हिंसक सेना को (अप) भगाकर, आत्मा में (राः) सद्गुणरूप सम्पत्तियों को (अधत्) आधान कर देता है। अभिप्राय यह है कि जब-जब देहधारी जीवात्मा पर तमोगुणरूप कृष्णासुर आक्रमण करता है, तब-तब इन्द्र परमात्मा उसका उससे उद्धार कर देता है ॥१॥
भावार्थःदेह में स्थित जीवात्मा को काम, क्रोध आदि अनेक दानव पीड़ित करना चाहते हैं, जिनका पराजय उसे अपने पुरुषार्थ द्वारा और परमात्मा की सहायता से करना चाहिए। तभी वह आध्यात्मिक और भौतिक ऐश्वर्यों को प्राप्त कर सकता है॥१॥ इस मन्त्र पर सायण इस प्रकार ऐतिहासिक अर्थ लिखते हैं—‘‘पहले कभी कृष्ण नामक असुर दस हजार असुरों के साथ अंशुमती नाम की नदी के किनारे ठहरा हुआ था। वहाँ जंगल के मध्य में स्थित उस कृष्णासुर के पास इन्द्र बृहस्पति के साथ पहुँचा। आकर उसने उस कृष्णासुर को और उसके अनुचरों को बृहस्पति की सहायता से मार ड़ाला था।’’ यह सब वृतान्त अप्रामाणिक ही है, क्योंकि वेदों में लौकिक इतिहास नहीं है। इस इतिहास की यदि आध्यात्मिक, आधिदैविक, अधियज्ञ या अधिभूत व्याख्या की जाए तो संगति लग सकती है, जैसे हमने अपनी व्याख्या में आध्यात्मिक अर्थ की दिशा प्रपंचित की है ॥ अपनी मति से चारों वेदों का अंग्रेजी भाषा में टिप्पणीसहित अनुवाद करनेवाले ग्रिफिथ महोदय ने इस मन्त्र पर टिप्पणी में लिखा है कि यहाँ ‘कृष्ण द्रप्स’ अन्धकारावृत चन्द्रमा है, और अंशुमती अन्तरिक्ष की कोई रहस्यमय नदी है, दस हजार असुर अन्धकार-रूप दानव हैं, जिनके वध के पश्चात् चन्द्रमा अन्धकार से मुक्त हो जाता है। ग्रिफिथ का यह लेख आधिदैविक व्याख्या की ओर एक संकेत है ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
वृ꣣त्र꣡स्य꣢ त्वा श्व꣣स꣢था꣣दी꣡ष꣢माणा꣣ वि꣡श्वे꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢जहु꣣र्ये꣡ सखा꣢꣯यः । म꣣रु꣡द्भि꣢रिन्द्र स꣣ख्यं꣡ ते꣢ अ꣣स्त्व꣢थे꣣मा꣢꣫ विश्वा꣣: पृ꣡त꣢ना जयासि ॥३२४॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। आन्तरिक देवासुरसंग्राम में अपने आत्मा को, जिसका साथ सबने छोड़ दिया है, अकेला देखकर कोई कह रहा है—(वृत्रस्य) तमोगुण के प्रधान हो जाने से उत्पन्न कामक्रोधादिरूप वृत्रासु्र की (श्वसथात्) फुंकार से (ईषमाणाः) भयभीत हो पलायन करती हुई (विश्वे देवाः) सब चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रियों ने (त्वा) तुझ आत्मा को (अजहुः) अकेला छोड़ दिया है, (ये) जो इन्द्रियाँ (सखायः) पहले तेरी मित्र बनी हुई थीं। हे (इन्द्र) जीवात्मन् (मरुद्भिः) प्राणों के साथ (ते) तेरी (सख्यम्) मित्रता (अस्तु) हो, (अथ) उसके अनन्तर, तू (इमाः) इन (विश्वाः) सब (पृतनाः) काम-क्रोध आदि शत्रुओं की सेनाओं को (जयासि) जीत ले ॥ इस प्रसंग में वृत्रवध के आख्यान में ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है कि—इन्द्र और उसके साथी वृत्र को मारने की इच्छा से दौड़े। उसने जान लिया कि ये मुझे मारने के लिए दौड़ रहे हैं। उसने सोचा इन्हें डरा दूँ । यह सोचकर उसने उनकी ओर साँस छोड़ी, फुंकार मारी। उसकी साँस या फुंकार से भयभीत हो सब देव भाग खड़े हुए। केवल मरुतों ने इन्द्र को नहीं छोड़ा। ‘भगवन् प्रहार करो, मारो, वीरता दिखाओ’—इस प्रकार वाणी बोलते हुए वे उसके साथ उपस्थित रहे। ॠषि इसी अर्थ का दर्शन करता हुआ कह रहा है—“वृत्रस्य त्वा श्वसथादीषमाणाः” आदि। ऐ० ब्रा० ३।२०। यह आख्यान उक्त अर्थ को ही स्पष्ट करने के लिए है ॥ छान्दोग्य उपनिषद् की एक कथा भी इस मन्त्र के भाव को स्पष्ट करती है। वहाँ लिखा है-“देव और असुरों में लड़ाई ठन गयी, दोनों प्रजापति के पुत्र थे। देव उद्गीथ को ले आये कि इससे इन्हें परास्त कर देंगे। उन्होंने नासिक्य (नासिका से आने-जानेवाले) प्राण को उद्गीथरूप में उपासा। असुरों ने उसे पाप से बींध दिया। इसी कारण नासिक्य प्राण से सुगन्धित और दुर्गन्धित दोनों प्रकार के पदार्थ सूँघता है, यतः यह पाप से बिंध चुका है। इसके बाद उन्होंने वाणी को उद्गीथरूप में उपासा। उसे भी असुरों ने पाप से बींध दिया। इसी कारण वाणी से सत्य और असत्य दोनों बोलता है, यतः यह पाप से बिंध चुकी है। इसके बाद उन्होंने आँख को उद्गीथरूप में उपासा। उसे भी असुरों ने पाप से बींध दिया। इसी कारण आँख से दर्शनीय और अदर्शनीय दोनों को देखता है। यतः यह पाप से बिंध चुकी है। फिर उन्होंने श्रोत्र को उद्गीथरूप में उपासा। उसे भी असुरों ने पाप से बींध दिया। इसी कारण श्रोत्र से श्रवणीय और अश्रवणीय दोनों सुनता है, यतः यह पाप से बिंध चुका है। तत्पश्चात् उन्होंने मन को उद्गीथरूप में उपासा। उसे भी असुरों ने पाप से बींध दिया। इसी कारण मन से उचित और अनुचित दोनों प्रकार के संकल्प करता है, यतः यह पाप से बिंध चुका है। तदनन्तर उन्होंने मुख्य प्राण को उद्गीथरूप में उपासा। असुर जब उसे भी बींधने के लिए झपटे तो वे उससे टकराकर ऐसे विध्वस्त हो गये, जैसे मिट्टी का ढेला पत्थर से टकराकर चूर-चूर हो जाता है। इस प्रकार जो मुख्य प्राण से साहचर्य कर लेता है उसके सब शत्रु ऐसे ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे मिट्टी का ढेला पत्थर से टकराकर चूर हो जाता है। इस कथा से स्पष्ट है कि चक्षु-श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ आत्मा की सच्ची सहायक नहीं हैं, मुख्य प्राण की ही सहायता से वह काम, क्रोधादि असुरों को परास्त करने में सफल हो सकता है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। सग्रामों में जिसका प्रजाजनों ने साथ छोड़ दिया है, ऐसे अकेले पड़े हुए राजा को राजमन्त्री कह रहा है—(वृत्रस्य) अत्याचारी शत्रु के (श्वसथात्) विनाशक शस्त्रास्त्र-समूह से (ईषमाणाः) भयभीत हो भागते हुए (विश्वे देवाः) सब प्रजाजनों ने (त्वा) आपको (अजहुः) छोड़ दिया है, (ये) जो प्रजाजन, पहले जब युद्ध उपस्थित नहीं हुआ था तब (सखायः) आपके मित्र बने हुए थे। हे (इन्द्र) राजन् ! (मरुद्भिः) वीर क्षत्रिय योद्धाओं के साथ (ते) आपकी (सख्यम्) मित्रता (अस्तु) हो, (अथ) उसके पश्चात्, आप (इमाः) इन (विश्वाः) सब (पृतनाः) युद्ध करनेवाली शत्रु-सेनाओं को (जयासि) जीत लो ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःयुद्ध का समय उपस्थित होने पर युद्ध में निपुण शूरवीर क्षत्रिय योद्धा ही रिपुदल से मुठभेड़ कर सकते हैं। इसी प्रकार आन्तरिक देवासुर-संग्राम में प्राण आत्मा के सहायक बनते हैं ॥२॥
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वि꣣धुं꣡ द꣢द्रा꣣ण꣡ꣳ सम꣢꣯ने बहू꣣ना꣡ꣳ युवा꣢꣯न꣣ꣳ स꣡न्तं꣢ पलि꣣तो꣡ ज꣢गार । दे꣣व꣡स्य꣢ पश्य꣣ का꣡व्यं꣢ महि꣣त्वा꣢꣫द्या म꣣मा꣢र꣣ स꣡ ह्यः समा꣢꣯न ॥३२५॥
पदार्थःप्रथम—चन्द्र-सूर्य के पक्ष में। (समने) अन्धकार के साथ युद्ध में (बहूनाम्) बहुत से अन्धकार-रूप शत्रुओं के (दद्राणम्) विदारणकर्त्ता (विधुम्) चन्द्रमा को (युवानं सन्तम्) युवक होते हुए अर्थात् पूर्णिमा में पूर्ण प्रकाशमान होते हुए को भी (पलितः) बूढ़े, पके हुए किरणरूप केशोंवाले सूर्य ने (जगार) निगल लिया है, अर्थात् पूर्णिमा के बीत जाने पर प्रतिपदा तिथि से आरम्भ करके धीरे-धीरे एक-एक कला को निगलते-निगलते अमावस्या को पूर्ण रूप से निगल लिया है। (देवस्य) क्रीडा करनेवाले परमेश्वर के (महित्वा) महान् (काव्यम्) जगत्-रूप दृश्य काव्य को (पश्य) देखो। इसमें जो (ह्यः) कल (समान) धारण किए हुए था, जीवित था, (सः) वह (अद्य) आज (ममार) मर जाता है ॥ चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। पृथिवी के चारों ओर चन्द्रमा के परिभ्रमण करने के कारण उसका जितना भाग पृथिवी की ओट में आ जाता है, उतने पर सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता, अतः वह अप्रकाशित ही रहता है। अमावस्या को चन्द्रमा और सूर्य के बीच में पृथिवी के आ जाने से सूर्य की किरणें चन्द्रमा पर बिल्कुल नहीं पड़ती हैं, इस कारण उस रात चन्द्रमा बिल्कुल दिखाई नहीं देता। उसी को यहाँ वेदकाव्य के कवि ने इस रूप में वर्णित किया है कि सूर्य चन्द्रमा को निगल लेता है ॥ द्वितीय—अध्यात्म-पक्ष में। (समने) प्राणवान् शरीर में (बहूनाम्) अनेक ज्ञानेन्द्रियों को (दद्राणम्) अपने-अपने विषयों में प्रेरित करनेवाले (विधुम्) ज्ञान-साधन मन को (युवानं सन्तम्) जाग्रदवस्था में युवा के समान पूर्णशक्तिमान् होते हुए को भी (पलितः) अनादि होने से बूढ़ा आत्मा (जगार) सुषुप्ति अवस्था में निगल लेता है, क्योंकि सुषुप्ति में मन के सब व्यापार शान्त हो जाते हैं। (देवस्य) प्रकाशक आत्मा के (महित्वा) महान् (काव्यम्) जनन, जीवन, मरण आदि-रूप काव्य को (पश्य) देखो। जो (अद्य) आज (ममार) मरा पड़ा है, (सः) वह (ह्यः) कल (समान) प्राण धारण कर रहा था। यह सब आत्मा के ही आवागमन का खेल है। इसी प्रकार आगे भी आत्मा पुनर्जन्म प्राप्त करके देहधारी होकर देह की दृष्टि से जीवित भी होगा, मरेगा भी ॥३॥ इस मन्त्र में ‘अद्य ममार स ह्यः समान’ इस सामान्य का विधु-निगरणरूप विशेष अर्थ द्वारा समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। ‘युवक को बूढ़े ने निगल लिया’ इसमें विरूपसंघटनारूप विषमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःइस संसार में शक्तिशालियों की भी मृत्यु निश्चित है, यह मानकर सबको धर्म-कर्मों में मन लगाना चाहिए ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
त्व꣢ꣳ ह꣣ त्य꣢त्स꣣प्त꣢भ्यो꣣ जा꣡य꣢मानोऽश꣣त्रु꣡भ्यो꣢ अभवः꣣ श꣡त्रु꣢रिन्द्र । गू꣣ढे꣡ द्यावा꣢꣯पृथि꣣वी꣡ अन्व꣢꣯विन्दो विभु꣣म꣢द्भ्यो꣣ भु꣡व꣢नेभ्यो꣣ र꣡णं꣢ धाः ॥३२६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) शूरवीर परमात्मन् ! (त्वं ह) आप ही (त्यत्) उस, आगे कहे जानेवाले महान् कर्म को करते हो। किस कर्म को, यह बताते हैं। (जायमानः) उपासक के हृदय में प्रकट होते हुए आप (अशत्रुभ्यः) जिनका आपके अतिरिक्त अन्य कोई विनाशक नहीं है, ऐसे (सप्तभ्यः) काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर तथा दुर्भाषण इन सात राक्षसों को मारने के लिए, उनके (शत्रुः) शत्रु (अभवः) होते हो। आप ही (गूढे) कारण-भूत पञ्चभूतों के अन्दर छिपे हुए (द्यावापृथिवी) द्युलोक और पृथिवीलोक को (अन्वविन्दः) कार्यावस्था में लाते हो। इस प्रकार (विभुमद्भ्यः भुवनेभ्यः) वैभवयुक्त लोक-लोकान्तरों को पैदा करने के लिए, आप (रणम्) संग्राम (धाः) करते हो । अभिप्राय यह है कि जैसे संग्रामों में शूरता का प्रयोग किया जाता है, वैसे ही शूरता का प्रयोग करके आपने प्रकृति से महत् तत्त्व, महत् से अहंकार, अहंकार से पञ्चतन्मात्रा तथा मन सहित दस इन्द्रियों, पञ्चतन्मात्राओं से पञ्चभूत और पञ्चभूतों से द्यावापृथिवी आदि लोकलोकान्तरों को और प्रजाओं को उत्पन्न किया। उत्तरोत्तर सृष्टि के लिए प्रकृति आदि में जो विक्षोभ उत्पन्न किया जाता है, उसी को यहाँ रण की संज्ञा दी है ॥४॥
भावार्थःपरमात्मा ही काम, क्रोध आदि अन्तः शत्रुओं को नष्ट करता है। उसी ने प्रकृति के गर्भ से महत् आदि के क्रम से तरह-तरह की विचित्रताओं से युक्त सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह आदि लोक-लोकान्तरों में विभक्त, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज और जरायुज जीव-जन्तु, वृक्ष-वनस्पति आदि से समृद्ध और पहाड़, झरने, नदी, तालाब, सागर आदि से अलङ्कृत सृष्टि उत्पन्न की है। इस कारण उसका गौरव-गान हमें मुक्त कण्ठ से करना चाहिए ॥४॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
मे꣣डिं꣡ न त्वा꣢꣯ व꣣ज्रि꣡णं꣢ भृष्टि꣣म꣡न्तं꣢ पुरुध꣣स्मा꣡नं꣢ वृष꣣भ꣢ꣳ स्थि꣣र꣡प्स्नु꣢म् । क꣣रो꣢꣯ष्यर्य꣣स्त꣡रु꣢षीर्दुव꣣स्यु꣡रिन्द्र꣢꣯ द्यु꣣क्षं꣡ वृ꣢त्र꣣ह꣡णं꣢ गृणीषे ॥३२७
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! (दुवस्युः) आपकी पूजा की चाहवाला मैं (वज्रिणम्) दुष्टों को दण्डित करनेवाले, (भृष्टिमन्तम्) दीप्तिमान्, शत्रु को भून डालनेवाले तेज से युक्त, (पुरुधस्मानम्) बहुतों के धारणकर्ता, (वृषभम्) सुख आदि की वर्षा करनेवाले, (स्थिरप्स्नुम्) स्थिर रूपवाले अर्थात् स्थिर गुण, कर्म, स्वभाव से युक्त, (द्युक्षम्) कर्तव्याकर्तव्य का प्रकाश देनेवाले, (वृत्रहणम्) पापों के विनाशक (त्वा) आपकी (मेडिं न) भूमि को वर्षा से सींचनेवाले अथवा विद्युद्गर्जना के आश्रयभूत बादल के समान अर्थात् जैसे वर्षा का इच्छक कोई मनुष्य बादल की बार-बार प्रशंसा करता है, वैसे (गृणीषे) स्तुति करता हूँ। हे परमात्मन् ! आप (अरीः) प्रजाओं को (तरुषीः) आपत्तियों को पार करने में अथवा शत्रु-विनाश में समर्थ (करोषि) कर देते हो ॥५॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘करोष्यर्यस्तरुषीः’ इस कारणात्मक वाक्य से स्तुतिरूप कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास भी है ॥५॥
भावार्थःजैसे वर्षा चाहनेवाले किसान लोग वर्षक मेघ की पुनः पुनः प्रशंसा करते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाववाले, सुख-समृद्धि की वर्षा करनेवाले परमेश्वर की सबको प्रशंसा और उपासना करनी चाहिए ॥५॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ वो꣢ म꣣हे꣡ म꣢हे꣣वृ꣡धे꣢ भरध्वं꣣ प्र꣡चे꣢तसे꣣ प्र꣡ सु꣢म꣣तिं꣡ कृ꣢णुध्वम् । वि꣡शः꣢ पू꣣र्वीः꣡ प्र च꣢꣯र चर्षणि꣣प्राः꣢ ॥३२८॥
पदार्थःसाथियों ! (वः) तुम (महेवृधे) जो तेज के लिए मनुष्यों को बढ़ाता है ऐसे, (महे) पूजनीय इन्द्र जगदीश्वर के लिए (प्र भरध्वम्) पूजा का उपहार हेलाओ। (प्रचेतसे) श्रेष्ठ ज्ञानवाले उसके लिए (सुमतिम्) श्रेष्ठ स्तुति को (प्रकृणुध्वम्) श्रेष्ठ रूप से करो। हे इन्द्र परमात्मन् ! (चर्षणिप्राः) मनुष्यों को पूर्ण करनेवाले आप (पूर्वीः) श्रेष्ठ (विशः) प्रजाओं को (प्र चर) धन, धान्य, गुणों आदि से पूर्ण करने के लिए प्राप्त होवो ॥६॥ इस मन्त्र में ‘महे, महे’ में यमक अलङ्कार है। ‘प्र’ की पाँच बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास और ‘ध्वम्, ध्वम्’ तथा ‘चर, चर्’ में छेकानुप्रास है ॥६॥
भावार्थःपूजा के बहुमूल्य उपहार से सत्कृत किया गया महामहिमाशाली जगदीश्वर स्तोताओं को विविध आध्यात्मिक और भौतिक ऐश्वर्यों से भरपूर कर देता है ॥६॥
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शु꣣न꣡ꣳ हु꣢वेम म꣣घ꣡वा꣢न꣣मि꣡न्द्र꣢मस्मि꣢꣫न्भरे꣣ नृ꣡त꣢मं꣣ वा꣡ज꣢सातौ । शृ꣣ण्व꣡न्त꣢मु꣣ग्र꣢मू꣣त꣡ये꣢ स꣣म꣢त्सु꣣ घ्न꣡न्तं꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ स꣣ञ्जि꣢तं꣣ ध꣡ना꣢नि ॥३२९॥
पदार्थः(अस्मिन्) इस (वाजसातौ) अन्न, धन, बल, विज्ञान आदि की प्राप्ति करानेवाले (भरे) संसार-समर, जीवन-संग्राम अथवा शत्रुओं के साथ युद्ध में हम (शुनम्) सदा-सुखी, सुख देनेवाले और बढ़ानेवाले, (मघवानम्) प्रशस्त ऐश्वर्यों के स्वामी, (नृतमम्) सबसे बड़े नायक, (शृण्वन्तम्) दीनों की प्रार्थना को सुननेवाले, (उग्रम्) ओजस्वी, (ऊतये) सज्जनों की रक्षार्थ (समत्सु) आन्तरिक एवं बाह्य देवासुर-संग्रामों में (वृत्राणि) काम, क्रोध आदि षड् रिपुओं को अथवा मानव-शत्रुओं को (घ्नन्तम्) विनष्ट करनेवाले, (धनानि) अध्यात्मिक और भौतिक ऐश्वर्यों को (सञ्जितम्) जीतने और जितानेवाले (इन्द्रम्) विश्व के सम्राट् परमेश्वर को अथवा राष्ट्रनायक राजा को (हुवेम) पुकारें ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेष और परिकर अलङ्कार हैं ॥७॥
भावार्थःजीवन-संग्रामों में मनुष्यों से सहायता के लिए पुकारा हुआ ब्रह्माण्ड का सम्राट् परमेश्वर उन्हें पुरुषार्थी बनाकर उनका नेतृत्व करता हुआ उन्हें सब संकटों से पार ले जाकर सुखी करता है। इसी प्रकार राष्ट्र का स्वामी राजा शत्रुओं द्वारा राष्ट्र के आक्रान्त हो जाने पर प्रजाओं का आह्वान सुनकर दुर्दान्त शत्रुओं को जीतकर, उनके धनों को छीनकर प्रजाओं की रक्षा करे ॥७॥
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उ꣢दु꣣ ब्र꣡ह्मा꣢ण्यैरत श्रव꣣स्ये꣡न्द्र꣢ꣳ सम꣣र्ये꣡ म꣢हया वसिष्ठ । आ꣡ यो विश्वा꣢꣯नि꣣ श्र꣡व꣢सा त꣣ता꣡नो꣢पश्रो꣣ता꣢ म꣣ ई꣡व꣢तो꣣ व꣡चा꣢ꣳसि ॥३३०॥
पदार्थःउपासक जन (श्रवस्या) यश-प्राप्ति की इच्छा से इन्द्र परमेश्वर के प्रति (ब्रह्माणि) स्तोत्रों को (उद् ऐरत उ) उच्चारण करते हैं। हे (वसिष्ठ) सद्गुणकर्मों में और विद्या में अतिशय निवास किए हुए विद्वन् ! तू भी (समर्ये) जीवन-संग्राम में वा यज्ञ में (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् परमात्मा की (महय) पूजा कर। (यः) जिस परमात्मा ने (विश्वानि) सब भुवनों को (श्रवसा) यश से (आ ततान) विस्तीर्ण किया है, वह (ईवतः मम) मुझ पुरुषार्थी के (वचांसि) प्रार्थना-वचनों को (उपश्रोता) सुननेवाला हो ॥८॥
भावार्थःपरमेश्वर पुरुषार्थी के ही वचनों को सुनता है, पौरुषरहित होकर केवल स्तुति करते रहनेवाले के नहीं। जिसने सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि सब भुवनों को यश से प्रसिद्ध किया है, वह मुझे भी यशस्वी बनाये, यह आकांक्षा सबको करनी चाहिए और उसके लिए प्रयत्न भी करना चाहिए ॥८॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
च꣣क्रं꣡ यद꣢꣯स्या꣣प्स्वा꣡ निष꣢꣯त्तमु꣣तो꣡ तद꣢꣯स्मै꣣ म꣡ध्विच्च꣢꣯च्छद्यात् । पृ꣣थिव्या꣡मति꣢꣯षितं꣣ य꣢꣫दूधः꣣ प꣢यो꣣ गो꣡ष्वद꣢꣯धा꣣ ओ꣡ष꣢धीषु ॥३३१॥
पदार्थः(अप्सु) जलों में (अस्य) इस इन्द्र परमात्मा का अर्थात् उससे रचित (यत्) जो (चक्रम्) ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना रूपी चक्र (आ निषत्तम्) स्थित है, (उत उ तत्) वह (अस्मै) इस संसार के लिए (मधु इत्) मधु को ही (चच्छद्यात्) प्रदान करता है। (यत्) जो (ऊधः) अन्तरिक्षरूपी गाय के ऊधस् के समान विद्यमान बादल (पृथिव्याम्) भूमि पर (अतिषितम्) वर्षा की धारों के रूप में छूटता है, उससे हे इन्द्र परमात्मन् ! आप (गोषु) गायों में, और (ओषधीषु) ओषधियों में (पयः) क्रम से दूध और रस को (अदधाः) निहित करते हो ॥ इस जल के चक्र को अन्यत्र वेद में इस रूप में वर्णित किया गया है—“यह जल समानरूप से दिनों में कभी ऊपर जाता है और कभी नीचे आता है। बादल बरसकर भूमि को तृप्त करते हैं, और अग्नियाँ जल को भाप बनाकर आकाश को तृप्त करती हैं’’ ऋ० १।१६४।५१ ॥९॥
भावार्थःपृथिवी के नदी, नद, समुद्र आदियों से पानी भाप बनकर आकाश में जाता है, वहाँ बादल के आकार में परिणत होकर वर्षा द्वारा फिर भूमण्डल पर आ जाता है। वही निर्मल जल गायों में दूध रूप में और वनस्पतियों में रस-रूप में बदल जाता है। परमेश्वर जलों में इस चक्र को पैदा कर सर्वत्र मधु बरसाता है, इसके लिए उसे सबको धन्यवाद देना चाहिए ॥९॥ इस दशति में इन्द्र द्वारा कृष्ण और वृत्र के वध तथा द्यावापृथिवी आदि के जन्म का वर्णन होने से, इन्द्र का आह्वान होने से, और उसके द्वारा जलों में निहित चक्र का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में दशम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
त्य꣢मू꣣ षु꣢ वा꣣जि꣡नं꣢ दे꣣व꣡जू꣢तꣳ सहो꣣वा꣡नं꣢ तरु꣢ता꣢रं꣣ र꣡था꣢नाम् । अ꣡रि꣢ष्टनेमिं पृत꣣ना꣡ज꣢मा꣢शु꣣ꣳ स्व꣣स्त꣢ये꣣ ता꣡र्क्ष्य꣢मि꣣हा꣡ हु꣢वेम ॥३३२॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हम (त्यम् उ) उस (वाजिनम्) सब अन्नों वा धनों के स्वामी, (देवजूतम्) विद्वान् योगीजनों को प्राप्त अथवा प्रकाशक सूर्य, चाँद आदि तथा मन, चक्षु, श्रोत्र आदि में व्याप्त, (सहोवानम्) साहसी, बलवान् (रथानाम्) शरीररूप रथों के अथवा गतिशील पृथिवी, सूर्य, चन्द्र आदि लोकों के (तरुतारम्) चलानेवाले, (अरिष्टनेमिम्) अप्रतिहत दण्डशक्तिवाले, (पृतनाजम्) काम, क्रोध आदि की सेनाओं को परे फेंकने वा जीतनेवाले और सत्य, दया, उदारता आदि सद्गुणों की सेनाओं को प्राप्त करानेवाले, (आशुम्) शीघ्रकारी (तार्क्ष्यम्) विस्तीर्ण जगत् में निवास करनेवाले, सकलभुवनव्यापी, प्राप्तव्य परमात्मा को (इह) अपने इस जीवन में (स्वस्तये) कल्याण के लिए (सु हुवेम) भली-भाँति पुकारें ॥ द्वितीय—सेनापति के पक्ष में। हम (त्यम् उ) उस (वाजिनम्) अन्न आदि सात्त्विक आहार करनेवाले, बलवान्, संग्रामकारी, (देवजूतम्) राजा द्वारा युद्धार्थ प्रेरित, (सहोवानम्) क्षात्र-तेज से युक्त, (रथानाम्) युद्ध के विमानों को (तरुतारम्) उड़ानेवाले, (अरिष्टनेमिम्) अक्षत रथचक्रवाले, (पृतनाजम्) संग्राम में अपनी सेनाओं को भेजनेवाले, तथा शत्रु-सेनाओं को उखाड़ फेंकनेवाले, (आशुम्) शीघ्रकारी, आलस्यरहित (तार्क्ष्यम्) गरुड़ के समान आक्रमण करनेवाले अथवा वायु के समान स्वपक्ष को जीवन देनेवाले तथा परपक्ष का भञ्जन करनेवाले सेनापति को (इह) इस संग्रामकाल में (स्वस्तये) राष्ट्र के उत्तम अस्तित्व के लिए (सु हुवेम) भली-भाँति पुकारें अथवा उत्साहित करें ॥ तृतीय—वायु और विद्युत् के पक्ष में। हम (त्यम् उ) उस (वाजिनम्) अतिशय वेगवान्, (देवजूतम्) शिल्पविद्या के वेत्ता कुशल शिल्पियों द्वारा यान आदियों में प्रेरित, (सहोवानम्) अतिशय बलयुक्त, (रथानाम्) समुद्र, पृथिवी और अन्तरिक्ष में चलनेवाले वायु-यानों वा विद्युद्-यानों के (तरुतारम्) तराने या उड़ाने में साधनभूत, (पृतनाजम्) सांग्रामिक सेनाओं को देशान्तर में पहुँचाने में निमित्तभूत अथवा संग्राम को जीतने में साधनभूत, (आशुम्) यानों की तेज गति में निमित्तभूत, (तार्क्ष्यम्) अन्तरिक्षशायी वायु वा विद्युत् रूप अग्नि को (इह) इस शिल्पयज्ञ में (स्वस्तये) सुख के लिए (हुवेम) यान आदियों में प्रयुक्त करें ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘तरु, तारं’ में छेकानुप्रास और वकार, रेफ आदि की आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥१॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि उपासना-यज्ञ में सकलजगद्व्यापी परमेश्वर का, राष्ट्रयज्ञ में गरुड़ के समान परपक्षाक्रान्ता सेनापति का और शिल्पयज्ञ में कलाकौशल के साधक वायु वा विद्युत् का ग्रहण और उपयोग करें ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
त्रा꣣ता꣢र꣣मि꣡न्द्र꣢मवि꣣ता꣢र꣣मि꣢न्द्र꣣ꣳ ह꣡वे꣢हवे सु꣣ह꣢व꣣ꣳ शू꣢र꣣मि꣡न्द्र꣢म् । हु꣣वे꣢꣫ नु श꣣क्रं꣡ पु꣢रुहू꣣त꣡मिन्द्र꣢꣯मि꣣द꣢ꣳ ह꣣वि꣢र्म꣣घ꣡वा꣢ वे꣣त्वि꣡न्द्रः꣢ ॥३३३॥
पदार्थःमैं (त्रातारम्) आपत्तियों से त्राण करनेवाले (इन्द्रम्) शत्रुविदारक जगदीश्वर वा राजा को (अवितारम्) सुखादि के प्रदान द्वारा पालना करनेवाले (इन्द्रम्) ऐश्वर्यशाली जगदीश्वर वा राजा को, (हवे हवे) प्रत्येक संग्राम में, प्रत्येक संकट में (सुहवम्) सरलता से पुकारने योग्य (शक्रम्) शक्तिशाली, (पुरुहूतम्) बहुत स्तुति किये गये अथवा बहुतों से बुलाये गये (इन्द्रम्) अविद्या, दुःख आदि के भञ्जक जगदीश्वर वा राजा को (नु) शीघ्र ही (हुवे) पुकारता हूँ। (सः) वह (मघवा) प्रशस्त धनवाला (इन्द्रः) जगदीश्वर वा राजा (इदम्) इस मेरे द्वारा दी जाती हुई (हविः) आत्मसमर्पण रूप अथवा राजकर रूप हवि को (वेतु) स्वीकार करे ॥२॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है, विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकरालङ्कार भी है। इन्द्र शब्द की चार बार पुनरुक्ति उसकी बहुक्षमता को तथा अन्यों से विलक्षण आह्वानयोग्यता को द्योतित करती है। निरर्थक ‘तारमिन्द्रं’ की दो बार, ‘रमिन्द्रं’ की तीन बार, ‘मिन्द्र’ की चार बार आवृत्ति होने से यमक अलङ्कार है। इसी प्रकार ‘हवे, हवे, हवं, हवं हुवे, हवि’ में वृत्त्यनुप्रास है। ‘त्रातारम्, अवितारम्,’ में और ‘इन्द्रम्, शक्रम्, पुरुहूतम्’ में पुनरुक्तवदाभास है ॥२॥
भावार्थःसबको चाहिए कि विपत्त्राता, शुभ पालनकर्त्ता, सुख से आह्वान किये जाने योग्य, अनेक जनों से वन्दित, शूर परमेश्वर तथा राजा का आत्मकल्याण और जनकल्याण के लिए वरण करें। साथ ही परमेश्वर को आत्म-समर्पण और राजा को कर-प्रदान भी नियम से करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
य꣡जा꣢मह꣣ इ꣢न्द्रं꣣ व꣡ज्र꣢दक्षिण꣣ꣳ ह꣡री꣢णाꣳ र꣣थ्यां꣢३꣱वि꣡व्र꣢तानाम् । प्र꣡ श्मश्रु꣢꣯भि꣣र्दो꣡धु꣢वदू꣣र्ध्व꣡धा꣢ भुव꣣द्वि꣡ सेना꣢꣯भि꣣र्भ꣡य꣢मानो꣣ वि꣡ राध꣢꣯सा ॥३३४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हम (वज्रदक्षिणम्) जिसका न्यायरूप दण्ड सदा जागरूक है ऐसे, (विव्रतानाम्) विविध कर्मों से युक्त (हरीणाम्) आकर्षणशक्तिवाले, गतिमय सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पृथिवी आदि लोकों के (रथ्यम्) रथी (इन्द्रम्) सर्वद्रष्टा परमात्मा की (यजामहे) पूजा करते हैं। वह (श्मश्रुभिः) सूर्य-किरणों द्वारा (प्र दोधुवत्) रोग आदियों को अतिशय पुनः पुनः प्रकंपित कर देता है, (ऊर्ध्वधा) सर्वोन्नत वह (सेनाभिः) सेनाओं के समान विद्यमान अपनी शक्तियों से (भयमानः) दुर्जनों को भयभीत करता हुआ (वि भुवत्) वैभवशाली बना हुआ है, और (राधसा) ऐश्वर्य से (वि) वैभवशाली बना हुआ है ॥ द्वितीय—राजा-प्रजा के पक्ष में। हम राष्ट्रवासी प्रजाजन (वज्रदक्षिणम्) दाहिने हाथ में वज्रतुल्य दृढ शस्त्रास्त्रों को धारण करनेवाले (विव्रतानाम्) विविध कर्मोंवाले (हरीणाम्) अग्नि, वायु, विद्युत् और सूर्यकिरणों को (रथ्यम्) अग्नियानों, वायुयानों, विद्युद्यानों और सूर्यताप से चलनेवाले यानों में प्रयुक्त करनेवाले (इन्द्रम्) शूरवीर राजा वा सेनाध्यक्ष को (यजामहे) सत्कृत करते हैं। वह शत्रुओं की (श्मश्रुभिः दोधुवत्) मूछें नीची करता हुआ अर्थात् उनका गर्व चूर करता हुआ (ऊर्ध्वधा) उन्नत (भुवत्) होता है, तथा (सेनाभिः) अपनी दुर्दान्त सेनाओं से (भयमानः) शत्रुओं को भयभीत करता हुआ (वि भुवत्) विजयी होता है, और (राधसा) ऐश्वर्य से (वि) वैभवशाली होता है ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःदुष्टों और पापों के प्रति दण्डधारी, न्यायकारी, सब लोकों को नियम से अपनी-अपनी परिधि पर और सूर्य के चारों ओर घुमानेवाला, शौर्य आदि गुणों में सबसे बढ़ा हुआ परमेश्वर जैसे सब जनों से पूजनीय है, वैसे ही अनेक शस्त्रास्त्रों से युक्त, राष्ट्र में विमानादि यानों का प्रबन्धकर्ता, सेनाओं द्वारा शत्रुओं को पराजित करनेवाला सेनाध्यक्ष अथवा राजा भी सब प्रजाओं द्वारा सम्माननीय है ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
स꣣त्राह꣢णं꣣ दा꣡धृ꣢षिं꣣ तु꣢म्र꣣मि꣡न्द्रं꣢ म꣣हा꣡म꣢पा꣣रं꣡ वृ꣢ष꣣भ꣢ꣳ सु꣣व꣡ज्र꣢म् । ह꣢न्ता꣣ यो꣢ वृ꣣त्र꣡ꣳ सनि꣢꣯तो꣣त꣢꣫ वाजं꣣ दा꣢ता꣢ म꣣घा꣡नि꣢ म꣣घ꣡वा꣢ सु꣣रा꣡धाः꣢ ॥३३५॥
पदार्थःहम (सत्राहणम्) सत्य से असत्य का खण्डन करनेवाले, (दाधृषिम्) पापों व पापियों का अतिशय धर्षण करनेवाले अथवा अत्यन्त प्रगल्भ, (तुम्रम्) शुभ कर्मों में प्रेरित करनेवाले, (महाम्) महान्, (अपारम्) अपार अर्थात् अनन्त विद्या वा पराक्रमवाले, (वृषम्) सुखों की वर्षा करनेवाले, (सुवज्रम्) उत्कृष्ट दण्डशक्तिवाले (इन्द्रम्) अधर्म, अविद्या आदि के विदारक परमात्मा वा राजा का (यजामहे) पूजन वा सत्कार करते हैं, (मघवा) ऐश्वर्यवान् (सुराधाः) उत्कृष्ट न्याय व धर्म रूप धनवाला (यः) जो परमात्मा वा राजा (वृत्रम्) विघ्नभूत शत्रु को (हन्ता) मारता है, (उत) और (वाजम्) अन्न, बल, विज्ञान आदि को (सनिता) बाँटता है तथा (मघानि) धनों को (दाता) देता है ॥४॥ इस मन्त्र में ‘यजामहे’ क्रियापद पूर्व मन्त्र से आया है। अर्थश्लेष और परिकर अलङ्कार है। ‘न्ता, निता’ और ‘मघा, मघ’ में छेकानुप्रास, तथा मकार, तकार की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥४॥
भावार्थःसब राष्ट्रवासी प्रजाजनों को चाहिए कि मन्त्रोक्त गुणों से विभूषित परमात्मा की पूजा और राजा का सत्कार करें ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
यो꣡ नो꣢ वनु꣣ष्य꣡न्न꣢भिदा꣢ति꣣ म꣢र्त꣣ उ꣡ग꣢णा वा꣣ म꣡न्य꣢मानस्तु꣣रो꣡ वा꣢ । क्षि꣣धी꣢ यु꣣धा꣡ शव꣢꣯सा वा꣣ त꣡मि꣢न्द्रा꣣भी꣡ ष्या꣢म वृषमण꣣स्त्वो꣡ताः꣢ ॥३३६
पदार्थः(यः मर्तः) जो मनुष्य (वनुष्यन्) क्रोध करता हुआ (उगणा वा) और सैन्यगणों अथवा आयुध गणों को तैयार किये हुए (मन्यमानः) अभिमान करता हुआ, अथवा (उगणा) अपनी शस्त्रास्त्रों से सज्जित सेनाओं को (मन्यमानः) बहुत मानता हुआ (तुरः) शीघ्रकारी यमराज भी होकर (नः) हमारी (अभिदाति) हिंसा पर उतारू होता है, हे (इन्द्र) शत्रुविदारक परमात्मन् वा राजन् ! (तम्) उस मनुष्य को (त्वम्) आप (युधा) युद्ध से (शवसा वा) और बल से (क्षिधि) विनष्ट कर दो। हे (वृषमणः) बलवान् मनवाले परमात्मन् वा राजन् ! (त्वोताः) आप से रक्षित हम, उसे (अभिस्याम) परास्त कर दें ॥५॥
भावार्थःजो वैरी शत्रु विशाल सेना लेकर अपने बल का अभिमान करता हुआ सज्जनों को उद्विग्न करे, उसे वे परमात्मा से पुरुषार्थ की प्रेरणा लेकर और राजा की सहायता से युद्ध में पराजित कर दें ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
यं꣢ वृ꣣त्रे꣡षु꣢ क्षि꣣त꣢य꣣ स्प꣡र्ध꣢माना꣣ यं꣢ यु꣣क्ते꣡षु꣢ तु꣣र꣡य꣢न्तो ह꣡व꣢न्ते । य꣡ꣳ शूर꣢꣯सातौ꣣ य꣢म꣣पा꣡मुप꣢꣯ज्म꣣न्यं꣡ विप्रा꣢꣯सो वा꣣ज꣡य꣢न्ते꣣ स꣡ इन्द्रः꣢꣯ ॥३३७
पदार्थःप्रथम—राजा के पक्ष में। (वृत्रेषु) अविद्या, भ्रष्टाचार आदियों के व्याप्त हो जाने पर (स्पर्धमानाः) उन पर विजय पाना चाहते हुए (क्षितयः) प्रजाजन (यं हवन्ते) जिस जननायक को पुकारते हैं, (युक्तेषु) किन्हीं महान् कर्मों के प्रारम्भ करने पर (तुरयन्तः) कार्यसिद्धि के लिए शीघ्रता करते हुए प्रजाजन (यं हवन्ते) जिस कार्यसाधक को पुकारते हैं, (शूरसातौ) शूरों को विजयोपलब्धि करानेवाले संग्राम में (यं हवन्ते) जिस वीर को पुकारते हैं, (अपाम्) सरोवर, नहर आदियों के (उपज्मन्) निर्माण के लिए (यं हवन्ते) जिस राष्ट्रनिर्माता को पुकारते हैं, (विप्रासः) ज्ञानी ब्राह्मण लोग (यं वाजयन्ते) जिसे अपना परामर्श देकर बलवान् करते हैं, (सः) वह दुःखविदारक, सुखप्रदाता राजा (इन्द्रः) इन्द्र कहाता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (वृत्रेषु) योगमार्ग में व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि विघ्नों के उपस्थित होने पर (स्पर्धमानाः) उन्हें जीतने की इच्छावाले योगीजन (यं हवन्ते) जिस सहायक को पुकारते हैं, (युक्तेषु) इन्द्रिय, मन, प्राण आदियों के योग में लग जाने पर (तुरयन्तः) योगसिद्धि पाने के लिए शीघ्रता करते हुए योगीजन (यं हवन्ते) जिस सिद्धिप्रदाता को पुकारते हैं, (शूरसातौ) आन्तरिक देवासुर-संग्राम के उपस्थित होने पर (यं हवन्ते) जिस विजयप्रदाता को पुकारते हैं, (अपाम्) प्राणों के (उपज्मन्) उपरले-उपरले चक्र में चंक्रमण करने के निमित्त (यं हवन्ते) जिस योगक्रियाओं में सहायक को पुकारते हैं, (यम्) और जिसकी (विप्रासः) ज्ञानी योगीजन (वाजयन्ते) अर्चना करते हैं, (सः) वह धारणा-ध्यान-समाधि से प्राप्तव्य परमेश्वर (इन्द्रः) इन्द्र कहलाता है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःवेदों में इन्द्र नाम से जिसका बहुत स्थानों पर वर्णन है, वह विघ्नविदारक, आरम्भ किये कार्यों में सिद्धिप्रदायक, देवासुरसंग्रामों में विजयप्रदाता, जलधाराओं को प्रवाहित करानेवाला, ज्ञानीजनों की स्तुति का पात्र ब्रह्माण्ड में परमेश्वर तथा राष्ट्र में राजा है। उनकी यथायोग्य उपासना प्रार्थना और सत्कार से अभीष्ट लाभ सबको उनसे प्राप्त करने चाहिएँ ॥६॥ इस मन्त्र पर विवरणकार ने यह अपनी कल्पना से ही घड़ा हुआ इतिहास लिखा है कि इन्द्र के अत्यन्त भक्त होने के कारण इन्द्र का रूप धारण किये हुए वामदेव ऋषि को जब असुर पकड़कर मारने लगे तब वह इस मन्त्र को कह रहा है कि इन्द्र मैं नहीं हूँ, इन्द्र तो ऐसा-ऐसा है। इसी प्रकार का इतिहास ‘स जनास इन्द्रः’ इस प्रकार इन्द्र का परिचय देनेवाले, गृत्समद ऋषि से दृष्ट ऋग्वेदीय द्वितीय मण्डल के १२वें सूक्त पर गृत्समद के नाम से किन्हीं लोगों ने कल्पित कर लिया था, जो सायण के ऋग्वेदभाष्य में उद्धृत है। यह सब प्रामाणिक नहीं है, किन्तु कथाकारों का लीलाविलास है ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
इ꣡न्द्रा꣢पर्वता बृह꣣ता꣡ रथे꣢꣯न वा꣣मी꣢꣫रिष꣣ आ꣡ व꣢हतꣳ सु꣣वी꣡राः꣢ । वी꣣त꣢ꣳ ह꣣व्या꣡न्य꣢ध्व꣣रे꣡षु꣢ देवा꣣ व꣡र्धे꣢थां गी꣣र्भी꣡रिड꣢꣯या꣣ म꣡द꣢न्ता ॥३३८॥
पदार्थःहे (इन्द्रापर्वता) जीवात्मा और प्राण ! तुम दोनों (बृहता) महान् (रथेन) शरीर-रूप रथ द्वारा (सुवीराः) उत्तम वीर सन्तानों से अथवा वीर भावों से युक्त (वामीः) प्रशस्त वा संभजनीय (इषः) अभीष्ट आध्यात्मिक और भौतिक सम्पदाएँ (आ वहतम्) प्राप्त कराओ। हे (देवा) दिव्य गुण-कर्मोंवाले जीवात्मा और प्राण ! तुम दोनों (अध्वरेषु) शरीरधारणरूप यज्ञों में (हव्यानि) भोज्य, पेय आदि हवियों का (वीतम्) आस्वादन करो। (गीर्भिः) वाणियों से, और (इडया) अन्न तथा गोदुग्ध आदि से (मदन्ता) तृप्त होते हुए (वर्द्धेथाम्) वृद्धि को प्राप्त करो ॥७॥
भावार्थःजीवात्मा संचित कर्मों के फलभोग के लिए तथा नवीन कर्म करने के लिए मन, इन्द्रिय आदियों से युक्त प्राण के साथ सर्वश्रेष्ठ शरीर-रूप रथ में बैठता है। वे दोनों जीवात्मा और प्राण शरीर के माध्यम से उत्कृष्ट सन्तान और विविध दिव्य तथा भौतिक सम्पदा को प्राप्त कराने की योग्यता रखते हैं। यथायोग्य खाद्य, पेय, ज्ञान, कर्म, प्राणायाम आदि की हवि देकर उनकी शक्ति सबको बढ़ानी चाहिए ॥७॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ गि꣢रो꣣ अ꣡नि꣢शितसर्गा अ꣣पः꣡ प्रै꣢꣯रय꣣त्स꣡ग꣢रस्य꣣ बु꣡ध्ना꣢त् । यो꣡ अक्षे꣢꣯णेव च꣣क्रि꣢यौ꣣ श꣡ची꣢भि꣣र्वि꣡ष्व꣢क्त꣣स्त꣡म्भ꣢ पृथि꣣वी꣢मु꣣त꣢ द्याम् ॥३३९॥
पदार्थः(इन्द्राय) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर के लिए अर्थात् उसकी महिमा का गान करने के लिए (अनिशितसर्गाः) अतीक्ष्ण प्रयोगवाली अर्थात् मधुर (गिरः) मेरी स्तुतिवाणियाँ प्रवृत्त हों। जो जगदीश्वर (सगरस्य) अन्तरिक्ष के (बुध्नात्) शीर्षस्थान से (अपः) मेघ-जलों को (प्रैरयत्) भूमि की ओर प्रेरित करता अर्थात् भूमि पर बरसाता है। (यः) जो (विष्वक्) विविध कर्मों में संलग्न होता हुआ अथवा विशेषरूप से सर्वान्तर्यामी होता हुआ (शचीभिः) अपने बुद्धिकौशल से व जगद्धारण की क्रियाओं से (पृथिवीम्) भूमि को (उत) और (द्याम्) द्यौ लोक को (तस्तम्भ) थामे हुए है, परस्पर सन्तुलित कर रहा है, (इव) जैसे (अक्षेण) रथ के बीच में पड़ी हुई कीली के द्वारा (चक्रियौ) दोनों रथचक्रों को रथचालक थामे रखता है ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःपरमात्मा की ही यह विलक्षण महिमा है कि वह अन्तरिक्ष से वर्षा करता है और द्यावापृथिवी में परस्पर सामञ्जस्य स्थापित करता है ॥८॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
आ꣢ त्वा꣣ स꣡खा꣢यः स꣣ख्या꣡ व꣢वृत्युस्ति꣣रः꣢ पु꣣रू꣡ चि꣢दर्ण꣣वां꣡ ज꣢गम्याः । पि꣣तु꣡र्नपा꣢꣯त꣣मा꣡ द꣢धीत वे꣣धा꣡ अ꣣स्मि꣡न्क्षये꣢꣯ प्रत꣣रां꣡ दीद्या꣢꣯नः ॥३४०॥
पदार्थःहे इन्द्र परमेश्वर ! (सखायः) आपके सखा स्तोता लोग सदा ही (त्वा) आपको (सख्या) सखिभाव से (आ ववृत्युः) स्वीकार करें। (तिरः) उनको प्राप्त होकर आप (पुरु चित्) बहुत अधिक (अर्णवान्) आनन्द के सागरों को (जगम्याः) प्राप्त कराओ। (वेधाः) स्तुति और पुरुषार्थ का कर्ता वह आपका सखा (अस्मिन् क्षये) इस घर में, गृहस्थाश्रम में (प्रतराम्) अत्यधिक (दीद्यानः) तेज और यश से प्रदीप्त होता हुआ (पितुः) अपने पिता के, वैसे ही तेजस्वी और यशस्वी (नपातम्) पौत्र को अर्थात् अपने पुत्र को (आदधीत) उत्पन्न करे ॥९॥
भावार्थःजो जगदीश्वर से मित्रता जोड़ता है, उसे वह आनन्द-सागर में निमग्न कर देता है। जगदीश्वर का वह सखा शास्त्रोक्त विधि से गृहस्थाश्रम का पालन करता हुआ अपने अनुरूप तेजस्वी और यशस्वी पुत्र का पिता बनता है ॥९॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
को꣢ अ꣣द्य꣡ यु꣢ङ्क्ते धु꣣रि꣢꣫ गा ऋ꣣त꣢स्य꣣ शि꣡मी꣢वतो भा꣣मि꣡नो꣢ दुर्हृणा꣣यू꣢न् । आ꣣स꣡न्ने꣢षामप्सु꣣वा꣡हो꣢ मयो꣣भू꣡न्य ए꣢꣯षां भृ꣣त्या꣢मृ꣣ण꣢ध꣣त्स꣡ जी꣢वात् ॥३४१॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म पक्ष में। (कः) कौन मनुष्य (अद्य) आज (शिमीवतः) कर्मवान्, आलस्यरहित, (भामिनः) तेजस्वी, (दुर्हृणायून्) दुष्पराजेय, (अप्सुवाहः) नदी की धाराओं के सदृश बाधाओं के बीच से भी वहन कर ले जानेवाले, (मयोभून्) सुखप्रापक (गाः) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-प्राण-मन-बुद्धि रूप बैलों को (ऋतस्य) सत्यरूप रथ के (धुरि) धुरे में (युङ्क्ते) जोड़ेगा। (एषाम्) गतिशील (एषाम्) इन पूर्वोक्त इन्द्रियादिरूप बैलों के (आसन्) मुख में (यः) जो मनुष्य (भृत्याम्) उन-उनके उत्कृष्ट ग्राह्यविषयरूप जीविकाद्रव्य को (ऋणधत्) वृद्धि के साथ प्रदान करेगा, (सः) वह (जीवात्) प्रशस्त जीवन से युक्त होगा ॥ यहाँ ‘सत्य के धुरे में’ इस कथन से सत्य में रथ का आरोप ध्वनित होता है। सत्य के धुरे में सामान्य बैल क्योंकि नहीं जोड़े जा सकते, अतः आरोप के विषय बैलों में आरोप्यमाण इन्द्रियादि गृहीत होते हैं। इन्द्रियादि में बैलों का आरोप होने से ही उनके मुख की भी कल्पना कर ली गयी है। अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। (कः) कौन मनुष्य (अद्य) आज, संकट के समय (शिमीवतः) कर्मशूर, (भामिनः) क्षात्र तेज से युक्त, (दुर्हृणायून्) दुष्पराजेय, (अप्सुवाहः) युद्धयात्रा में नदी, समुद्र आदि के जलों में युद्धपोत को खेकर ले जानेवाले, (मयोभून्) शत्रुओं को जीतकर राष्ट्रवासियों को सुख देनेवाले (गाः) गतिशील सैनिकों को (ऋतस्य) राष्ट्ररूप यज्ञ के (धुरि) रक्षा के धुरे में (युङ्क्ते) नियुक्त करेगा? राजा ही नियुक्त करेगा, यह अभिप्राय है। (आसन्नेषाम्) जिनके तरकस में बाण हैं अर्थात् जिन्होंने प्रचुर शस्त्रास्त्रों का संचय किया हुआ है, ऐसे (एषाम्) इन सैनिकों के (यः) जो राजा (भृत्याम्) वेतन को (ऋणधत्) समय-समय पर बढ़ायेगा (सः) वह राजा (जीवात्) शत्रु-विजय करके प्रजाओं के साथ चिरकाल तक जीवित रहेगा ॥१०॥ इस मन्त्र में अध्यात्म और अधिराष्ट्र उभयविध अर्थ वाच्य होने से श्लेषालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःसत्य के ज्ञानार्थ तथा प्रचारार्थ आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों का यथोचित उपयोग मनुष्यों को करना चाहिए, और राष्ट्र के शासक राजा को चाहिए कि राष्ट्र के रक्षक सैनिकों का भरपूर वेतन-प्रदान आदि से सत्कार करे ॥१०॥ इस दशति में तार्क्ष्य नाम से परमेश्वर का स्मरण करने, इन्द्र-पर्वत के युगल की स्तुतिपूर्वक इन्द्र का स्तवन करने, उसके सख्य की याचना करने, इन्द्रिय-रूप गौओं का महत्त्व वर्णन करने तथा राजा, सैनिक आदि अर्थों के भी सूचित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त ॥ चतुर्थ प्रपाठक का प्रथम अर्ध समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में ग्यारहवाँ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
गा꣡य꣢न्ति त्वा गाय꣣त्रि꣡णोऽर्च꣢꣯न्त्य꣣र्क꣢म꣣र्कि꣡णः꣢ । ब्र꣣ह्मा꣡ण꣢स्त्वा शतक्रत꣣ उ꣢द्व꣣ꣳश꣡मि꣢व येमिरे ॥३४२॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) बहुत बुद्धिमान् तथा बहुत कर्मों को करनेवाले परमैश्वर्यवान् परमात्मन् ! (गायत्रिणः) सामगान करनेवाले गायक जन अथवा यज्ञ के उद्गाता नामक ऋत्विज् (त्वा) तेरा (गायन्ति) गान करते हैं। (अर्किणः) वेदमन्त्रार्थों का अध्ययन करनेवाले जन अथवा पूजक होता और अध्वर्यु नामक ऋत्विज् (त्वा) तेरी (अर्चन्ति) स्तुति करते हैं। (ब्राह्मणाः) ब्रह्मोपासक ब्राह्मण अथवा यज्ञ के ब्रह्मा नामक ऋत्विज् (त्वा) तुझे (वंशम् इव) ध्वजदण्ड के समान (उद्येमिरे) ऊपर उठाते हैं, अर्थात् जैसे पताकाधारी लोग पताका के डण्डे को ऊँचा उठाकर आकाश में पताका को फहराते हैं, वैसे ही ब्राह्मण जन और यज्ञ के ब्रह्मा लोग तेरी कीर्ति को सर्वत्र फहराते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘गाय, गाय’ में यमक है। द्वितीय पाद में अनुप्रास है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि साङ्गोपाङ्ग वेदों को पढ़कर, यज्ञ आदि में मन्त्रोच्चारणपूर्वक और सामगानसहित परमेश्वर की अर्चना करते हुए उसकी महिमा को गगन में ऊँची उठायी हुई, हवा से लहराती हुई ध्वजा के समान सर्वत्र प्रसारित करें ॥१॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣢न्द्रं꣣ वि꣡श्वा꣢ अवीवृधन्त्समु꣣द्र꣡व्य꣢चसं꣣ गि꣡रः꣢ । र꣣थी꣡त꣢मꣳ र꣣थी꣢नां꣣ वा꣡जा꣢ना꣣ꣳ स꣡त्प꣢तिं꣣ प꣡ति꣢म् ॥३४३॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (विश्वाः) सब (गिरः) स्तुति-वाणियाँ वा वेद-वाणियाँ (समुद्र-व्यचसम्) सागर और अन्तरिक्ष के समान व्याप्तिवाले, (रथीनाम्) रथवालों में (रथीतमम्) सबसे बढ़कर रथवाले अर्थात् पृथिवी, सूर्य, चन्द्र आदि अनेक रथसदृश गतिशील लोकों के सर्वोच्च स्वामी, (वाजानाम्) सब बलों के (पतिम्) अधीश्वर, (सत्पतिम्) सज्जनों, सद्गुणों व सदाचारों के रक्षक (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् परमात्मा का (अवीवृधन्) वर्धन अर्थात् महिमागान द्वारा प्रचार-प्रसार करती हैं ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (विश्वाः) सब (गिरः) राष्ट्रवासी प्रजाजनों की वाणियाँ (समुद्रव्यचसम्) जलपोतों से सागर में और विमानों से अन्तरिक्ष में व्याप्त, (रथीनाम्) यान-स्वामियों में (रथीतमम्) भूयान, जलयान और विमानों के सबसे बड़े स्वामी, (वाजानाम्) दैहिक, मानसिक और आत्मिक बलों, अन्नों वा युद्धों के (पतिम्) अधीश्वर, (सत्पतिम्) सज्जनों वा सत्कर्मों के रक्षक (इन्द्रम्) शत्रुविदारक तथा सुखप्रद राजा को (अवीवृधन्) बढ़ायें, उत्साहित करें ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘रथी, रथी’ में लाटानुप्रास और ‘पतिम् पतिम्’ में यमक है ॥२॥
भावार्थःसब वेदवाणियाँ और स्तोताओं की वाणियाँ परमेश्वर की ही महिमा का गान करती हैं। वैसे ही राष्ट्र में प्रजाओं की वाणियाँ प्रजावत्सल राजा की महिमा का गान करें ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣣म꣡मि꣢न्द्र सु꣣तं꣡ पि꣢ब꣣ ज्ये꣢ष्ठ꣣म꣡म꣢र्त्यं꣣ म꣡द꣢म् । शु꣣क्र꣡स्य꣢ त्वा꣣꣬भ्य꣢꣯क्षर꣣न्धा꣡रा꣢ ऋ꣣त꣢स्य꣣ सा꣡द꣢ने ॥३४४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) अध्यात्मसम्पत्ति के प्रदाता परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! तुम (इमम्) इस (ज्येष्ठम्) अतिशय प्रशंसनीय, (अमर्त्यम्) दिव्य, (मदम्) स्तोता को आनन्द देनेवाले (सुतम्) तैयार किये हुए हमारे श्रद्धारसरूप सोम का (पिब) पान करो। (ऋतस्य) ध्यान-यज्ञ के (सादने) सदनभूत हृदय में (शुक्रस्य) दीप्त, पवित्र श्रद्धारस की (धाराः) धाराएँ (त्वा अभि) तुम्हारे प्रति (अक्षरन्) बह रही हैं ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य पक्ष में। शिष्य के प्रति यह आचार्य की उक्ति है। हे (इन्द्र) जिज्ञासु एवं विद्युत् के समान तीव्रबुद्धिवाले मेरे शिष्य ! तू (इमम्) मेरे द्वारा दिये जाते हुए इस (ज्येष्ठम्) श्रेष्ठ (अमर्त्यम्) चिर-स्थायी, (मदम्) तृप्तिप्रद, (सुतम्) अध्ययन-अध्यापन-विधि से निष्पादित ज्ञानरस को (पिब) पान कर, जिस ज्ञानरस को (शुक्रस्य) पवित्र (ऋतस्य) अध्ययन-अध्यापन-रूप यज्ञ के (सादने) सदन में, अर्थात् गुरूकुल में (धाराः) मेरी वाणियाँ (त्वा अभि) तेरे प्रति (अक्षरन्) सींच रही हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःसब लोग दुःखविदारक, आनन्द के सिन्धु परमेश्वर के प्रति श्रद्धा को हृदय में धारण कर उसकी उपासना करें और गुरुजन शिष्यों के प्रति प्रेम से प्रभावी शिक्षा-पद्धति द्वारा विद्या प्रदान करें ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣡दि꣢न्द्र चित्र म इ꣣ह꣢꣫ नास्ति꣣ त्वा꣡दा꣢तमद्रिवः । रा꣡ध꣣स्त꣡न्नो꣢ विदद्वस उभयाह꣣स्त्या꣡ भ꣢र ॥३४५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (चित्र) अद्भुतगुणकर्मस्वभाववाले, (अद्रिवः) वज्रधारी के समान दुष्कर्मों का दण्ड देनेवाले (इन्द्र) जगदीश्वर ! (यत्) जो आध्यात्मिक और भौतिक धन, हमारे कर्मों के परिपाक के कारण अथवा हमारी पौरुषहीनता के कारण (त्वादातम्) तेरे द्वारा काटा या रोका हुआ (मे) मुझे (इह) यहाँ (नास्ति) नहीं मिल रहा है। (तत् राधः) वह धन, हे (विदद्वसो) ज्ञात अथवा प्राप्त धनवाले परमेश्वर ! तू (उभयाहस्ति) दोनों हाथों को प्रवृत्त करके (आ भर) मुझे प्रदान कर ॥ यहाँ निराकार भी परमेश्वर के विषय में दोनों हाथों से दान का वर्णन दान की प्रचुरता को द्योतित करने के लिए आलङ्कारिक जानना चाहिए ॥ द्वितीय—राजा-प्रजा के पक्ष में। दुर्भिक्ष, महामारी, नदियों में बाढ़ आदि विपत्तियों से पीड़ित प्रजा राजा से याचना कर रही है। हे (चित्र) अद्भुत दानी, (अद्रिवः) मेघोंवाले सूर्य के समान राष्ट्र में धन आदि की वृष्टि करनेवाले (इन्द्र) विपत्तियों के विदारक राजन् ! (त्वादातम्) आपके द्वारा देय (यत्) जो धन (मे) मुझे (इह) इस संकटकाल में, अब तक (नास्ति) नहीं मिला है, (तत् राधः) वह धन, हे (विदद्वसो) धन का संचय किये हुए राजन् ! आप (उभयाहस्ति) दोनों हाथों से भर-भर कर (आभर) मुझे दीजिए, देकर मुझ विपत्तिग्रस्त की सहायता कीजिए ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःआध्यात्मिक और भौतिक धन से रहित लोग पुरुषार्थ करते हुए यदि परमेश्वर से धन माँगते हैं, तो उसकी कृपा से उनके ऊपर धन की वर्षा अवश्य होती है। इसी प्रकार राजा को भी संकटग्रस्त प्रजाओं की रक्षा के लिए पुष्कल धन देकर उनकी सहायता अवश्य करनी चाहिए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
श्रु꣣धी꣡ हवं꣢꣯ तिर꣣श्च्या꣢꣫ इन्द्र꣣ य꣡स्त्वा꣢ सप꣣र्य꣡ति꣢ । सु꣣वी꣡र्य꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तो रा꣣य꣡स्पू꣡र्धि म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि ॥३४६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) भक्तवत्सल परमात्मन् ! (यः) जो मनुष्य (त्वा) आपकी (सपर्यति) आराधना करता है, उस (तिरश्च्याः) आपको प्राप्त होकर पुरुषार्थ करनेवाले अथवा लम्बे जटिल मार्ग को छोड़कर बाण के समान चीरते हुए आगे बढ़ते चले जानेवाले मनुष्य के (हवम्) आह्वान को, आप (श्रुधि) सुनिए अर्थात् पूर्ण कीजिए। साथ ही उसके लिए (गोमतः) प्रशस्त गाय, पृथिवी, वाणी आदि से युक्त (रायः) विद्या, आरोग्य, चक्रवर्ती राज्य आदि ऐश्वर्य की (पूर्धि) पूर्ति कीजिए। आप (महान्) महान्, उदार हृदयवाले (असि) हैं ॥५॥
भावार्थःजो श्रद्धावनत होकर परमेश्वर की पूजा करता है, उससे प्रेरणा लेकर पुरुषार्थ करता है और लम्बे मार्ग पर जाने से शक्ति तथा समय का व्यय न करके लक्ष्य के प्रति बाण के समान सीधा चलता चला जाता है, उसे सब सम्पत्तियाँ शीघ्र ही हस्तगत हो जाती हैं ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
अ꣡सा꣢वि꣣ सो꣡म꣢ इन्द्र ते꣣ श꣡वि꣢ष्ठ धृष्ण꣣वा꣡ ग꣢हि । आ꣡ त्वा꣢ पृणक्त्विन्द्रि꣣य꣢꣫ꣳ रजः꣣ सू꣢र्यो꣣ न꣢ र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥३४७॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! (ते) तेरे लिए (सोमः) ज्ञान, उत्साह आदि का रस (असावि) मेरे द्वारा अभिषुत किया गया है। हे (शविष्ठ) बलिष्ठ, (धृष्णो) कामादि शत्रुओं को परास्त करनेवाले ! (आ गहि) तू रसपान के लिए आ, अर्थात् अभिमुख हो। (इन्द्रियम्) ज्ञान की साधन-भूत मेरी मन, चक्षु आदि इन्द्रिय (रश्मिभिः) ज्ञान-प्रकाशों से (त्वा) तुझे (आ पृणक्तु) भरपूर करें, (सूर्यः) सूर्य (न) जैसे (रश्मिभिः) अपनी किरणों से (रजः) पृथिवी, अन्तरिक्ष आदि लोक को भरपूर करता है ॥ अथवा, सोम से योगदर्शन १।४७ में प्रोक्त अध्यात्मप्रसाद अभिप्रेत है। इन्द्रिय से अभीष्ट है अध्यात्मप्रसाद में उत्पन्न, योग० १।४८ में प्रोक्त ऋतम्भरा प्रज्ञा। वह प्रज्ञा तुझ आत्मा को रश्मियों अर्थात् निर्बीजसमाधि के प्रकाशों से पूर्ण करे, यह आशय ग्रहण करना चाहिए ॥ द्वितीय—सेनाध्यक्ष आदि वीर मनुष्य के पक्ष में। हे (इन्द्र) वीर नरपुंगव सेनाध्यक्ष ! (ते) तेरे लिए अर्थात् तेरे पीने के लिए, हम प्रजाजनों ने (सोमः) सोम आदि ओषधियों का रस (असावि) निचोड़ा है। उसके पानार्थ, हे (शविष्ठ) बलिष्ठ, (धृष्णो) शत्रुधर्षक वीर ! तू (आ गहि) आ। (इन्द्रियम्) मनरूप आन्तरिक इन्द्रिय (त्वा) तुझे (रश्मिभिः) उत्साह की किरणों से (पृणक्तु) भर देवे, जैसे सूर्य अपनी किरणों से भूमण्डल आदि को भर देता है, इत्यादि शेष पूर्ववत् अर्थ जानना चाहिए ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमा अलङ्कार हैं ॥६॥
भावार्थःसबको चाहिए कि अपने आत्मा को उद्बोधन देकर ज्ञान, कर्म, योगसिद्धि आदि का संचय करें। इसी प्रकार राष्ट्र के कर्णधार सेनापति आदि वीरता का संचय करके राष्ट्र की रक्षा करें ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ए꣡न्द्र꣢ याहि꣣ ह꣡रि꣢भि꣣रु꣢प꣣ क꣡ण्व꣢स्य सुष्टु꣣ति꣢म् । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥३४८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! आप (हरिभिः) अपनी अध्यात्म-प्रकाश की किरणों के साथ (कण्वस्य) मुझ मेधावी की (सुस्तुतिम्) शुभ स्तुति को (उप आयाहि) समीपता से प्राप्त कीजिए। आगे स्तोता अपने आत्मा को कहता है—हे (दिवावसो) दीप्तिधन के इच्छुक मेरे अन्तरात्मन् ! तू (शासतः) शासक, (अमुष्य) चर्म-चक्षुओं से न दीखनेवाले उस (दिवः) दीप्तिमान् परमात्मा के (दिवम्) प्रकाशक तेज को (यय) प्राप्त कर ॥७॥ इस मन्त्र में ‘दिवो, दिवं, दिवा’ में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःयदि हमारी स्तुति हृदय से निकली है, तो परमेश्वर उसे सुनता ही है। हमें भी उसका सान्निध्य प्राप्त कर उसके तेज से तेजस्वी बनना चाहिए ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣢ त्वा꣣ गि꣡रो꣢ र꣣थी꣢रि꣣वा꣡स्थुः꣢ सु꣣ते꣡षु꣢ गिर्वणः । अ꣣भि꣢ त्वा꣣ स꣡म꣢नूषत꣣ गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ ॥३४९॥
पदार्थःहे (गिर्वणः) वाणियों से सेवनीय इन्द्र परमात्मन् ! (सुतेषु) ज्ञान-कर्म-श्रद्धा रूप सोमरसों के अभिषुत हो जाने पर (गिरः) मेरी वाणियाँ (त्वा) तेरे पास (आ अस्थुः) आकर स्थित हो गयी हैं, रथीः (इव) जैसे रथ-स्वामी रथ पर स्थित होता है। वे मेरी वाणियाँ (त्वा अभि) तेरे अभिमुख होकर (समनूषत) भली-भाँति स्तुति कर रही हैं, (धेनवः गावः) दूध पिलानेवाली प्रीतियुक्त गौएँ (वत्सं न) जैसे बछड़े के अभिमुख होकर रंभाती हैं ॥८॥ इस मन्त्र में दो उपमालङ्कारों की संसृष्टि और अनुप्रास अलङ्कार है ॥८॥
भावार्थःरथी जन जैसे रथ का आश्रय लेते हैं, वैसे स्तोताओं की वाणियाँ परमात्मा का आश्रय लें, और उसके सम्मुख हो ऐसे प्रेम से उसकी स्तुति करें जैसे गौएँ बछड़े को सम्मुख पाकर रंभाती हैं ॥८॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ए꣢तो꣣ न्वि꣢न्द्र꣣ꣳ स्त꣡वा꣢म शु꣣द्ध꣢ꣳ शु꣣द्धे꣢न꣣ सा꣡म्ना꣢ । शु꣣द्धै꣢रु꣣क्थै꣡र्वा꣢वृ꣣ध्वा꣡ꣳस꣢ꣳ शु꣣द्धै꣢रा꣣शी꣡र्वा꣢न्ममत्तु ॥३५०॥
पदार्थःहे साथियो ! (एत उ) आओ, (नु) शीघ्र ही, तुम और हम मिलकर (शुद्धम् इन्द्रम्) पवित्र जगदीश्वर की (शुद्धेन साम्ना) पवित्र सामगान से (स्तवाम) स्तुति करें। (शुद्धैः) पवित्र (उक्थैः) स्तोत्रों से (वावृध्वांसम्) वृद्धि को प्राप्त हममें से प्रत्येक जन को (आशीर्वान्) आशीषों का अधिपति जगदीश्वर (शुद्धैः) पवित्र आशीर्वादों से (ममत्तु) आनन्दित करे ॥९॥ इस मन्त्र में पूर्वार्ध में ‘शुद्धं, शुद्धे, ‘शुद्धैरु, शुद्धैरा’ में छेकानुप्रास, और उत्तरार्ध में ‘शुद्धै, शुद्धै’ इन निरर्थकों की आवृत्ति में यमक अलङ्कार है। सम्पूर्ण मन्त्र में संयुक्ताक्षरों का वैशिष्ट्य है ॥९॥
भावार्थःस्तोताओं के द्वारा शुद्ध सामगानों द्वारा प्रेम से स्तुति किया हुआ जगदीश्वर शुद्ध आशीर्वादों से उन्हें बढ़ाता और आनन्दित करता है ॥९॥ इस मन्त्र पर सायणाचार्य ने यह इतिहास प्रदर्शित किया है—“पहले कभी इन्द्र वृत्र आदि असुरों का वध करके ब्रह्महत्या आदि के दोष से स्वयं को अशुद्ध मानने लगा। उस दोष के परिहार के लिए इन्द्र ने ऋषियों से कहा कि तुम मुझ अपवित्र को अपने साम से शुद्ध कर दो। तब उन्होंने शोधक साम से और शस्त्रों से उसे परिशुद्ध किया। बाद में शुद्ध हुए उस इन्द्र के लिए याग आदि कर्म में सोम आदि हवियाँ भी दीं।’’ पर इस इतिहास में देवता भी, वध्य को भी मार कर, पाप से लिप्त होते हैं, यह कल्पना की गयी है, जो बड़ी असंगत है ॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
यो꣢ र꣣यिं꣡ वो꣢ र꣣यि꣡न्त꣢मो꣣ यो꣢ द्यु꣣म्नै꣢र्द्यु꣣म्न꣡व꣢त्तमः । सो꣡मः꣢ सु꣣तः꣡ स इ꣢꣯न्द्र꣣ ते꣡ऽस्ति꣢ स्वधापते꣣ म꣡दः꣢ ॥३५१॥
पदार्थः(रयिन्तमः) अतिशय ऐश्वर्ययुक्त (यः) जो (वः) तुम्हारे लिए (रयिम्) ऐश्वर्य को देता है, और (द्युम्नवत्तमः) अतिशय तेजस्वी (यः) जो (द्युम्नैः) तेजों से, तुम्हें अलङ्कृत करता है, (सः) वह (सुतः) हृदय में प्रकट हुआ (सोमः) चन्द्रमा के समान आह्लादक और सोम ओषधि के समान रसागार परमेश्वर, हे (स्वधापते) अन्नों के स्वामी अर्थात् अन्नादि सांसारिक पदार्थों के भोक्ता (इन्द्र) विद्वन् ! (ते) तुम्हारे लिए (मदः) आनन्ददायक (अस्ति) है ॥१०॥ इस मन्त्र में ‘रयिं, रयिं’ में लाटानुप्रास अलङ्कार है। ‘तमो, तमः’ ‘द्युम्नै, द्युम्न’ में छेकानुप्रास है। य्, स्, त् और म् की पृथक्-पृथक् अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥१०॥
भावार्थःहृदय में प्रत्यक्ष किया गया परमेश्वर योगी को समस्त आध्यात्मिक ऐश्वर्य, ब्रह्मवर्चस और आनन्द प्रदान करता है, अतः सबको यत्नपूर्वक उसका साक्षात्कार करना चाहिए ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र के महिमागान का वर्णन होने, उसके प्रति श्रद्धारस आदि का अर्पण करने, उससे ऐश्वर्य माँगने, उसका आह्वान होने तथा उसकी स्तुति के लिए प्रेरणा होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में बारहवाँ खण्ड समाप्त ॥ यह तृतीय अध्याय समाप्त हुआ ॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡त्य꣢स्मै꣣ पि꣡पी꣢षते꣣ वि꣡श्वा꣢नि वि꣣दु꣡षे꣢ भर । अ꣣रङ्गमा꣢य꣣ ज꣢ग्म꣣ये꣡ऽप꣢श्चादध्व꣣ने꣡ न꣢रः ॥३५२॥
पदार्थःप्रथम—जगदीश्वर के पक्ष में। हे नर ! तू (पिपीषते) तेरी मित्रता के प्यासे, (विदुषे) सर्वज्ञ (अरङ्गमाय) पर्याप्तरूप में धनादि प्राप्त करानेवाले, (जग्मये) सहायता के लिए सदा आगे बढ़नेवाले, और (नरः) मनुष्यों को (अ-पश्चा-दध्वने) पीछे न धकेलनेवाले, प्रत्युत सदा विजयार्थ आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करनेवाले इन्द्र जगदीश्वर के लिए (विश्वानि) अपनी सब मित्रताओं को (प्रति भर) भेंट कर ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। हे राजन् वा प्रजाजन ! तुम (पिपीषते) गुरुकुल चलाने के लिए धनादि पदार्थों के प्यासे, (अरङ्गमाय) विद्या आदि में पारंगत, (जग्मये) क्रियाशील (अ-पश्चा-दध्वने) कभी पग न हटानेवाले, किन्तु सदा आगे बढ़नेवाले (विदुषे) विद्वान् आचार्य के लिए (विश्वानि) सब उत्तम धन आदियों को, और विद्याप्रदान तथा आचार-निर्माण के लिए (नरः) प्रतिभाशाली बालकों को (प्रतिभर) सौंपो ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःसब राजा-प्रजा आदि को चाहिए कि वे जगदीश्वर के साथ मित्रता करें और विद्वानों को धन, धान्य आदि से सत्कृत करके उन्हें विद्या तथा उपदेश देने के लिए निश्चित कर दें ॥१॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣡ नो꣢ वयोवयःश꣣यं꣢ म꣣हा꣡न्तं꣢ गह्वरे꣣ष्ठां꣢ म꣣हा꣡न्तं꣢ पूर्वि꣣ने꣢ष्ठाम् । उ꣣ग्रं꣢꣫ वचो꣣ अ꣡पा꣢वधीः ॥३५३
पदार्थःहे मानव ! तू (नः) हम सबके (वयोवयःशयम्) अन्न-अन्न, आयु-आयु, प्राण-प्राण में विद्यमान, (महान्तम्) सर्वव्यापक होने से परिमाण में महान्, (गह्वरेष्ठाम्) हृदय-गुहा में प्रच्छन्न रूप से स्थित, (महान्तम्) गुणों में महान्, (पूर्विणेष्ठाम्) पूर्वजों से रचित भक्तिस्तोत्र, भक्तिकाव्य आदियों में वर्णित इन्द्र परमेश्वर को (आ) अध्यात्मयोग से प्राप्त कर, और (उग्रं वचः) ‘मारो-काटो-छेदो-भेदो’ इत्यादि हिंसा-उपद्रव से उत्पन्न होनेवाले ‘हाय, बड़ा कष्ट है, बड़ी सिर में पीड़ा है, कैसे जीवन धारण करें’ आदि रोग के प्रकोप से उत्पन्न होनेवाले, और ‘हाय भूखे हैं, प्यासे हैं, कोई भी हमें नहीं पूछता, अन्न का एक दाना मुख में डाल दो, पानी की एक बूँद से जीभ गीली कर दो’ इत्यादि भूख-प्यास से उत्पन्न होनेवाले उग्र वचनों को (अपावधीः) दूर कर ॥२॥ इस मन्त्र में ‘वयो-वयः’ में छेकानुप्रास तथा ‘महान्तं’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि महामहिमाशाली जगदीश्वर की उपासना कर, उसका सर्वत्र प्रचार कर, जनजीवन से सब प्रकार के हाहाकार को समाप्त करके समाज, राष्ट्र और जगत् में शान्ति लायें ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣢ त्वा꣣ र꣢थं꣣ य꣢थो꣣त꣡ये꣢ सु꣣म्ना꣡य꣢ वर्तयामसि । तु꣣विकूर्मि꣡मृ꣢ती꣣ष꣢ह꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ शविष्ठ꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥३५४॥
पदार्थःहे (शविष्ठ) बलिष्ठ ! (ऊतये) सांसारिक दुःख, विघ्न आदियों से रक्षा के लिए, और (सुम्नाय) ऐहिक एवं पारलौकिक सुख के लिए, हम (तुविकूर्मिम्) बहुत-से कर्मों के कर्ता, (ऋतीषहम्) शत्रु-सेनाओं के पराजयकर्ता, (सत्पतिम्) सदाचारियों के पालनकर्ता (त्वा) तुझ (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् परमात्मा वा राजा को (आवर्तयामसि) अपनी ओर प्रवृत्त करते हैं, (यथा) जैसे (ऊतये) शत्रुओं से रक्षा के लिए और (सुम्नाय) यात्रा-सुख के लिए (तूविकूर्मिम्) व्यापार आदि द्वारा बहुत-से धनों को उत्पन्न करने में साधनभूत, (ऋतीषहम्) वायु, वर्षा आदि के आघात को सहनेवाले, (सत्पतिम्) बैठे हुए श्रेष्ठ यात्रियों के पालन के साधनभूत (रथम्) भूयान, जलयान, विमान आदि को लोग प्रवृत्त करते हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे हवा, धूप, वर्षा आदि से बचाव के लिए और यात्रासुख के लिए रथ प्राप्तव्य होता है, वैसे ही रोग आदि से होनेवाले दुःखों से त्राणार्थ और शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, वर्णाश्रमधर्म की प्रतिष्ठा, शान्तिस्थापना आदि द्वारा योगक्षेम के सुखप्रदानार्थ राजा को तथा त्रिविध तापों से त्राणार्थ और मोक्ष-सुख आदि के प्रदानार्थ परमात्मा को प्राप्त करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
स꣢ पू꣣र्व्यो꣢ म꣣हो꣡नां꣢ वे꣣नः꣡ क्रतु꣢꣯भिरानजे । य꣢स्य꣣ द्वा꣢रा꣣ म꣡नुः꣢ पि꣣ता꣢ दे꣣वे꣢षु꣣ धि꣡य꣢ आन꣣जे꣢ ॥३५५॥
पदार्थः(महोनाम्) पूजनीयों में भी (पूर्व्यः) पूज्यता में श्रेष्ठ, (वेनः) मेधावी और कमनीय (सः) वह परमैश्वर्यवान् इन्द्र जगदीश्वर (क्रतुभिः) सृष्टिसञ्चालन आदि कर्मों से (आनजे) व्यक्त होता है, अनुमान किया जाता है, (यस्य द्वारा) जिस जगदीश्वर के द्वारा (मनुः) मननशील (पिता) शरीर का पालक जीवात्मा (देवेषु) शरीरवर्ती मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि में (धियः) उन-उनकी क्रियाओं को (आनजे) प्राप्त कराता है ॥४॥ इस मन्त्र में नकार का अनुप्रास है, ‘नजे’ की आवृत्ति में यमक है ॥४॥
भावार्थःसंसार में दिखायी देनेवाली सूर्यचन्द्रोदय, ऋतुचक्रप्रवर्तन आदि क्रियाएँ किसी कर्ता के बिना नहीं हो सकतीं, अतः परमात्मा का अनुमान कराती हैं। देह का स्वामी जीवात्मा भी परमात्मा की ही सहायता से देह में स्थित मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि में संकल्प, निश्चय, प्राणन, दर्शन, स्पर्शन आदि क्रियाओं को प्रवृत्त करता है ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -मरुतः| स्वर - गान्धारः
य꣢दी꣣ व꣡ह꣢न्त्या꣣श꣢वो꣣ भ्रा꣡ज꣢माना꣣ र꣢थे꣣ष्वा꣢ । पि꣡ब꣢न्तो मदि꣣रं꣢꣫ मधु꣣ त꣢त्र꣣ श्र꣡वा꣢ꣳसि कृण्वते ॥३५६
पदार्थः(यदि) जिस समय (रथेषु) देहरूप रथों में (भ्राजमानाः) तेज से दीप्यमान (आशवः) शीघ्रगामी मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय रूप शीर्षण्य प्राण (मदिरम्) आनन्दजनक (मधु) अपने-अपने विषयों संकल्प, अध्यवसाय, रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श के मधुर रस को (पिबन्तः) पान करते हुए (आ वहन्ति) रथी जीवात्मा को जीवन-यात्रा कराते हैं, (तत्र) उस समय (श्रवांसि) यशों को (कृण्वते) उत्पन्न करते हैं ॥५॥
भावार्थःदेहरथ में नियुक्त मन, बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियों का ही यह कार्य है कि वे जीवात्मा के ज्ञान में साधन बनकर उसे यशस्वी बनाते हैं ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
त्य꣡मु꣢ वो꣣ अ꣡प्र꣢हणं गृणी꣣षे꣡ शव꣢꣯स꣣स्प꣡ति꣢म् । इ꣡न्द्रं꣢ विश्वा꣣सा꣢हं꣣ न꣢र꣣ꣳ श꣡चि꣢ष्ठं वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् ॥३५७॥
पदार्थःहे प्रजाजनो ! मैं (वः) तुम्हारे व अपने हितार्थ (त्यम् उ) उस, (अप्रहणम्) किसी से न मारे जा सकने योग्य अथवा अन्याय से किसी को न मारनेवाले, (शवसः पतिम्) बल और सेना के अधिपति, (विश्वासाहम्) सब शत्रुओं वा विघ्नों को परास्त करनेवाले, (नरम्) नेता, (शचिष्ठम्) अतिशय कर्मनिष्ठ, (विश्ववेदसम्) ब्रह्माण्ड वा राष्ट्र के सब घटनाचक्र को जाननेवाले (इन्द्रम्) शूरवीर परमात्मा वा राजा की (गृणीषे) गुण-कर्मों के वर्णन द्वारा स्तुति करता हूँ ॥६॥
भावार्थःजो प्रजाओं का हित चाहते हैं उन मन्त्री, पुरोहित आदियों को चाहिए कि मन्त्रोक्त गुणों से अलङ्कृत जगदीश्वर का गुण-कर्मों के कीर्तन द्वारा और उसकी गरिमा के गान द्वारा सर्वत्र प्रचार करें और वैसे ही गुणी राजा को उसके गुणों के वर्णन द्वारा कर्तव्य के प्रति प्रोत्साहित करें ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -दधिक्रा| स्वर - गान्धारः
द꣣धिक्रा꣡व्णो꣢ अकारिषं जि꣣ष्णो꣡रश्व꣢꣯स्य वा꣣जि꣡नः꣢ । सु꣣रभि꣢ नो꣣ मु꣡खा꣢ कर꣣त्प्र꣢ न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि तारिषत् ॥३५८॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। मैं (जिष्णोः) विजयशील तथा विजय प्रदान करनेवाले, (अश्वस्य) सब शुभ गुणों में व्याप्त, (वाजिनः) बल और विज्ञान से युक्त (दधिक्राव्णः) धारक पृथिवी, चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र आदि लोकों को अपनी-अपनी धुरी पर अथवा किसी पिण्ड के चारों ओर घुमानेवाले, अथवा स्तोत्र-धारकों, धर्म-धारकों वा सद्गुण-धारकों को कर्मयोगी बनानेवाले जगदीश्वर का (अकारिषम्) स्वागत करता हूँ। स्वागतवचन द्वारा सत्कृत वह जगदीश्वर (नः) हमारे (मुखा) मुखों को (सुरभि) सुगन्धित अर्थात् कटु-वचन, पर-निन्दा आदि से रहित मधुर सत्य-भाषण के सौरभ से सम्पन्न (करत्) करे, और (नः) हमारी (आयूंषि) आयुओं को (प्र तारिषत्) बढ़ाये ॥ द्वितीय—यज्ञाग्नि के पक्ष में। मैं (जिष्णोः) रोग आदि पर विजय पानेवाले, (अश्वस्य) फैलने के स्वभाववाले, (वाजिनः) हव्यान्नों से युक्त (दधिक्राव्णः) हवियों को धारण कर रूपान्तरित करके देशान्तर में पहुँचा देनेवाले आहवनीय अग्नि का (अकारिषम्) यज्ञ में उपयोग करता हूँ, अर्थात् उसमें हवियों का होम करता हूँ। आहुति दिया हुआ वह यज्ञाग्नि (नः) हमारे (मुखा) मुख को, अर्थात् मुखवर्ती नासिका-प्रदेश को (सुरभि) सुगन्धित (करत्) कर दे, और (नः आयूंषि प्रतारिषत्) हम अग्निहोत्रियों के आयु के वर्षों को बढ़ाये। अभिप्राय यह है कि नियम से अग्निहोत्र करते हुए हम चिरञ्जीवी हों ॥ अग्नि में होमे हुए सुगन्धित हव्य से सुगन्धित हुआ वायु जब श्वास-प्रश्वास-क्रिया द्वारा फेफड़ों के अन्दर जाता है, तब रक्त को शुद्ध कर, उसमें जीवनदायक तत्त्व समाविष्ट करके, उसकी मलिनता को हरकर बाहर निकाल देता है। वेद में कहा भी है—‘हे वायु, तू अपने साथ औषध अन्दर ला, जो मल है उसे बाहर निकाल। तू सब रोगों की दवा है, तू विद्वान् वैद्यों का दूत होकर विचरता है (ऋ० १०।१३७|३)’। एक अन्य मन्त्र में वैद्य कह रहा है—‘हे रोगी ! मैं हवि के द्वारा तुझे जीवन देने के लिए अज्ञात रोग से और राजयक्ष्मा से छुडा दूँगा। यदि तुझे गठिया रोग ने जकड़ लिया है, तो उससे भी वायु और अग्नि तुझे छुड़ा देंगे (ऋ० १०।१६१।१)’ ॥ तृतीय—राजा के पक्ष में। मैं (जिष्णोः) विजयशील (अश्वस्य) अश्व के समान राष्ट्र-रूप रथ को वहन करनेवाले, (वाजिनः) अन्नादि ऐश्वर्यों से युक्त, बलवान् और युद्ध करने में समर्थ, (दधिक्राव्णः) बहुत से लोगों तथा पदार्थों के धारक विमानादि यानों को चलवानेवाले राजा के (अकारिषम्) राजनियमों का पालन करता हूँ। (सः) वह राजा, सदाचारमार्ग में प्रवृत्त करके (नः) हम प्रजाजनों के (मुखा) मुखों को (सुरभि) यश के सौरभ से युक्त (करत्) करे, और (नः) हम प्रजाजनों की (आयूंषि) आयु के वर्षों को (प्रतारिषत्) बढ़ाये। भाव यह है कि आयुर्वेद के शिक्षण, चिकित्सा के सुप्रबन्ध, कृषि-व्यापार-पशुपालन के उत्कर्ष, हिंसा-उपद्रव आदि के निवारण, शत्रुओं के उच्छेद, इस प्रकार के सब उपायों द्वारा राष्ट्रवासियों को अकाल मृत्यु का ग्रास बनने से बचाये ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, तृतीय-चतुर्थ पादों में अन्त्यानुप्रास भी है। दधिक्रावा, अश्व और वाजी इन सबके अश्ववाचक होने से पुनरुक्ति प्रतीत होती है, किन्तु यौगिक अर्थ करने से पुनरुक्ति का परिहार हो जाता है, अतः पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःपरमात्मा की स्तुति, अग्निहोत्र और राजनियमों के पालन द्वारा हमें यशःसौरभ और दीर्घायुष्य प्राप्त करना चाहिए ॥७॥ महीधर ने इस मन्त्र पर यजुर्वेदभाष्य में कात्यायन श्रौतसूत्र की अश्वमेधविधि का अनुसरण करते हुए यह लिखा है कि घोड़े के पास सोयी हुई यजमान की प्रथम परिणीत पत्नी महिषी को वहाँ से उठाकर अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, होता और क्षत्ता नामक ऋत्विज् इस मन्त्र को पढ़ें। साथ ही ‘सुरभि नो मुखा करत्’ की व्याख्या में लिखा है कि अश्लील भाषण से दुर्गन्ध को प्राप्त हुए मुखों को यज्ञ सुगन्धित कर दे। यह सब प्रलापमात्र है। कौन बुद्धिमान् ऐसा होगा जो पहले तो अश्लील भाषण करके मुखों को दुर्गन्धयुक्त करे और फिर उसकी शुद्धि का उपाय खोजे? ‘कीचड़ लगाकर फिर उसे धोने की अपेक्षा कीचड़ को हाथ न लगाना ही अधिक अच्छा है’ इस नीति का अनुसरण क्यों न किया जाये?
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
पु꣣रां꣢ भि꣣न्दु꣡र्युवा꣢꣯ क꣣वि꣡रमि꣢꣯तौजा अजायत । इ꣢न्द्रो꣣ वि꣡श्व꣢स्य꣣ क꣡र्म꣢णो ध꣣र्त्ता꣢ व꣣ज्री꣡ पु꣢रुष्टु꣣तः꣡ ॥३५९॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (पुराम्) मन में दृढ़ हुई तमोगुण की नगरियों का (भिन्दुः) विदारक, (युवा) नित्य युवा रहनेवाला अर्थात् अजर-अमर, (कविः) वेदकाव्य का कवि, अथवा क्रान्तदर्शी, (अमितौजाः) अपरिमित तेजवाला, (वज्री) न्याय-दण्ड को धारण करनेवाला, (पुरुष्टुतः) बहुस्तुत (इन्द्रः) ब्रह्माण्ड का सम्राट् परमात्मा (विश्वस्य कर्मणः) सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि के भ्रमण, ऋतु-निर्माण, नदी-प्रवाह, वर्षा, पाप-पुण्य का फल प्रदान आदि सब कर्मों का (धर्ता) नियामक (अजायत) बना हुआ है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। (पुराम्) शत्रु की नगरियों या किलेबन्दियों का (भिन्दुः) तोड़नेवाला, (युवा) तरुण, (कविः) राजनीतिशास्त्र का पण्डित व दूरदर्शी, (अमितौजाः) अपरिमित पराक्रमवाला, (वज्री) विविध शस्त्रास्त्रों का संग्रहकर्ता और उनके प्रयोग में कुशल, (पुरुष्टुतः) अनेकों प्रजाजनों से प्रशंसित (इन्द्रः) शूरवीर राजा वा सेनापति (विश्वस्य कर्मणः) सब राजकाज वा सेनासंगठन-कार्य का (धर्ता) भार उठानेवाला (अजायत) होता है ॥ तृतीय—सूर्य के पक्ष में। (पुराम्) अन्धकार, बादल, बर्फ आदि नगरियों का (भिन्दुः) विदारणकर्ता, (युवा) पदार्थों को मिलाने और अलग करनेवाला, (कविः) अपनी धुरी पर घूमनेवाला, अथवा पृथिवी, मङ्गल, बुध, चन्द्रमा आदि ग्रहोपग्रहों को अपने चारों ओर घुमानेवाला, (अमितौजाः) अपरिमित बल और प्रकाश वाला, (वज्री) किरणरूप वज्रवाला, (पुरुष्टुतः) बहुत-से खगोलज्योतिष को जाननेवाले विद्वान् वैज्ञानिकों द्वारा वर्णन किया गया (इन्द्रः) सूर्य (विश्वस्य कर्मणः) सौरमण्डल में दिखायी देनेवाले सब प्राकृतिक कर्मों का (धर्ता) धारक (अजायत) बना हुआ है ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजैसे राष्ट्र का राजा सब राज्यकार्य का और सेनापति सेना के संगठनकार्य का नेता होता है, अथवा जैसे सूर्य सौरमण्डल का धारणकर्ता है, वैसे ही विविध लोक-लोकान्तरों के समष्टिरूप इस महान् ब्रह्माण्ड में विद्यमान सम्पूर्ण व्यवस्था का करनेवाला राजाधिराज परमेश्वर है, यह सबको जानना चाहिए ॥८॥ इस दशति में इन्द्र की महिमा का वर्णन होने, उसके प्रति आत्मसमर्पण आदि की प्रेरणा होने तथा इन्द्र नाम से राजा, सेनापति, आचार्य आदि का भी वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡प्र꣢ वस्त्रि꣣ष्टु꣢भ꣣मि꣡षं꣢ व꣣न्द꣡द्वी꣢रा꣣ये꣡न्द꣢वे । धि꣣या꣡ वो꣢ मे꣣ध꣡सा꣢तये꣣ पु꣢र꣣न्ध्या꣡ वि꣢वासति ॥३६०॥
पदार्थःहे साथियो ! (वः) तुम लोग (वन्दद्वीराय) वीरजनों से वन्दित (इन्दवे) तेजस्वी, स्नेह की वर्षा करनेवाले और चन्द्रमा के समान आह्लादकारी इन्द्र परमात्मा के लिए (त्रिष्टुभम्) आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीनों सुखों को स्थिर करानेवाली अथवा ज्ञान, कर्म और उपासना इन तीन से स्थिर होनेवाली (इषम्) प्रीति और श्रद्धा को (प्र प्र) प्रकृष्टरूप से समर्पित करो, समर्पित करो। प्रीति और श्रद्धा से पूजित वह (मेधसातये) योगयज्ञ की पूर्णता के लिए (पुरन्ध्या) पूर्णता प्रदान करनेवाली (धिया) ऋतम्भरा प्रज्ञा से (आ विवासति) सत्कृत अर्थात् संयुक्त करता है ॥१॥
भावार्थःवीरजन भी अपनी विजय का कारण परमात्मा को ही मानते हुए जिस परमात्मा की बार-बार वन्दना करते हैं, उसकी सभी लोग प्रीति और श्रद्धा के साथ वन्दना क्यों न करें ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
क꣣श्यप꣡स्य꣢ स्व꣣र्वि꣢दो꣣ या꣢वा꣣हुः꣢ स꣣यु꣢जा꣣वि꣡ति꣢ । य꣢यो꣣र्वि꣢श्व꣣म꣡पि꣢ व्र꣣तं꣢ य꣣ज्ञं꣡ धी꣢꣯रा नि꣣चा꣡य्य꣢ ॥३६१
पदार्थःप्रथम—ब्रह्माण्ड के पक्ष में। विद्वान् लोग (यौ) जिन अग्नितत्त्व और सोमतत्त्व को (स्वर्विदः) प्रकाश वा आनन्द को प्राप्त करानेवाले (कश्यपस्य) सर्वद्रष्टा इन्द्र जगदीश्वर के (सयुजौ इति) सहयोगी (आहुः) कहते हैं, और (ययोः) जिनके (विश्वम् अपि) सारे ही (व्रतम्) कर्म को (यज्ञम् आहुः) यज्ञरूप कहते हैं (तौ) उन अग्नितत्त्व और सोमतत्त्व को (निचाय्य) जानकर, हे मनुष्यो ! तुम (धीराः) पण्डित बनो ॥ इस मन्त्र का देवता इन्द्र होने से ‘कश्यप’ यहाँ इन्द्र का नाम है। वेद में उस इन्द्र के प्रधान सहचारी अग्नि और सोम हैं, क्योंकि अग्नि और सोम के साथ बहुत-से स्थलों में उसका वर्णन मिलता है ॥ जैसे ‘इन्द्रा॑ग्नी॒ शर्म॑ यच्छतम्। ऋ० १।२१।६’, ‘इन्द्रा॑ग्नी वृत्रहणा जु॒षेथा॑म् ऋ० ७।९३।१’ में अग्नि इन्द्र का सहचारी है और ‘इन्द्रा॑सोमा यु॒वम॒स्माँ अ॑विष्टम् ऋ० २।३०।६’, ‘इन्द्रा॑सोमा॒ तप॑तं॒ रक्ष॑ उ॒ब्जत॒म् अथ० ८।४।१’ में सोम इन्द्र कासहचारी है। एक मन्त्र में इन्द्र, अग्नि और सोम तीनों एक साथ मिलते हैं—‘ य॒शा इन्द्रो य॒शा अ॒ग्निर्य॒शाः सोमो॑ अजायत अथ० ६।५८।३। निरुक्त में भी इन्द्र के सहचारी देवों में सर्वप्रथम अग्नि और सोम ही परिगणित हैं (निरु० ७।१०)। यह जगत् अग्नि और सोम से (आग्नेय तत्त्व और सौम्य तत्त्व) से ही बना है। वे ही प्रश्नोपनिषद् में रयि और प्राण नाम से वर्णित किये गये हैं। वहाँ कहा गया है कि कबन्धी कात्यायन ने भगवान् पिप्पलाद के पास जाकर प्रश्न किया कि भगवन्, ये प्रजाएँ कहाँ से उत्पन्न हो गई हैं? उसे उन्होंने उत्तर दिया कि प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न करने की कामना से तप किया और तप करके रयि और प्राण के जोड़े को पैदा किया, इस विचार से कि ये दोनों मिलकर बहुत-सी प्रजाओं को उत्पन्न कर देंगे। वहीं पर प्राण और रयि को सूर्य-चन्द्र, उत्तरायण-दक्षिणायन, शुक्ल-कृष्ण पक्ष तथा अहोरात्र के रूप में वर्णित किया है। शतपथब्राह्मण में भी कहा है कि सूर्य आग्नेय है, चन्द्रमा सौम्य है, दिन आग्नेय है, रात्रि सौम्य है; शुक्लपक्ष आग्नेय है, कृष्णपक्ष सौम्य है (श० १।६।३।२४)। ये ही अग्नि-सोम इन्द्र के सहचररूप में प्रस्तुत मन्त्र में अभिप्रेत हैं, ऐसा समझना चाहिए। इन्द्र परमेश्वर इन्हीं के माध्यम से जगत् को उत्पन्न करता है और उसका सञ्चालन करता है। इनका सब कर्म यज्ञरूप है, यह भी मन्त्र में कहा गया है। अन्यत्र भी वेद अग्नि और सोम की महिमा वर्णित करते हुए कहता है—हे शुभकर्मोंवाले अग्नि और सोम, तुम दोनों ने आकाश में चमकीले पिण्डों को धारण किया है, तुम ही पर्वतों पर बर्फ जम जाने से रुकी हुई नदियों को बहाते हो। हे अग्नि और सोम, तुम दोनों ब्रह्म से वृद्धि पाकर यज्ञ के लिए विशाल लोक को उत्पन्न करते हो। (ऋ० १।९३।५,६)। जो लोग इन्द्र के सहचारी इन अग्नि और सोम का यह वेदप्रतिपादित महत्त्व जान लेते हैं, वे ही पण्डित हैं ॥ द्वितीय—शरीर के पक्ष में। विद्वान् लोग (यौ) जिन बुद्धि-मन अथवा प्राण-अपानरूप अग्नि-सोम को (स्वर्विदः) विवेक-प्रकाश तथा आनन्द प्राप्त करनेवाले (कश्यपस्य) ज्ञान के द्रष्टा जीवात्मारूप इन्द्र के (सयुजौ) सहयोगी (आहुः) कहते हैं, और (ययोः) जिन बुद्धि-मन अथवा प्राण-अपान के (विश्वम् अपि) सारे ही (व्रतम्) कर्म को (यज्ञम्) ज्ञान-यज्ञ अथवा शरीरसञ्चालन-यज्ञ कहते हैं, [तौ] उन बुद्धि-मन अथवा प्राण-अपान को (निचाय्य) भली-भाँति जानकर, प्रयुक्त करके और सबल बनाकर, हे मनुष्यो, तुम (धीराः) ज्ञानबोध से युक्त अथवा शरीर-धारण में समर्थ होवो। अभिप्राय यह है कि बुद्धि और मन का सम्यक् उपयोग करके ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से ज्ञान एकत्र करने में समर्थ होवो और प्राणायाम से प्राणापानों को वश करके शरीर-धारण में समर्थ होवो ॥ तृतीय—राष्ट्र के पक्ष में। राजनीतिज्ञ लोग (यौ) जिन सेनाध्यक्ष और राज्यमन्त्री रूप अग्नि और सोम को (स्वर्विदः) प्रजाओं को सुख पहुँचानेवाले, (कश्यपस्य) राजपुरुषों के कार्य और प्रजा के सुख-दुःख के द्रष्टा राजा के (सयुजौ) सहायक (आहुः) कहते हैं, और (ययोः) जिन सेनाध्यक्ष तथा राजमन्त्री के (विश्वम् अपि) सारे ही (व्रतम्) राज्यसञ्चालनरूप तथा शत्रुनिवारणरूप कर्म को (यज्ञम्) राष्ट्रयज्ञ का पूर्तिरूप (आहुः) कहते हैं, उनका (निचाय्य) सत्कार करके, हे प्रजाजनो, तुम (धीराः) धृत राष्ट्रवाले होवो ॥ चतुर्थ—आदित्य और अहोरात्र के पक्ष में।विद्वान् लोग (यौ) जिन दिन-रात्रिरूप अग्नि और सोम को (स्वर्विदः) प्रकाश प्राप्त करानेवाले (कश्यपस्य) पदार्थों का दर्शन करानेवाले अथवा गतिमय पृथिव्यादि लोकों के रक्षक आदित्य के (सयुजौ) सहयोगी (आहुः) कहते हैं, और (ययोः) जिन दिन-रात्रि के (विश्वम् अपि) सारे ही (व्रतम्) कर्म को (यज्ञम्) यज्ञात्मक अर्थात् परोपकारात्मक (आहुः) बताते हैं [तौ] उन दिन-रात्रि को (निचाय्य) जानकर, हे मनुष्यो ! तुम भी (धीराः) परोपकार-बुद्धि से युक्त होवो ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर के सहचर अग्नितत्त्व और सोमतत्त्व को, जीवात्मा के सहचर मन और बुद्धि अथवा प्राण और अपान को, राजा के सहचर सेनाधीश और अमात्य को तथा सूर्य के सहचर दिन और रात्रि को भली-भाँति जानकर उनसे यथोचित लाभ सबको प्राप्त करने चाहिएँ ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
अ꣡र्च꣢त꣣ प्रा꣡र्च꣢ता नरः꣣ प्रि꣡य꣢मेधासो꣣ अ꣡र्च꣢त । अ꣡र्च꣢न्तु पुत्र꣣का꣢ उ꣣त꣢꣫ पुर꣣मि꣢द्धृ꣣꣬ष्ण्व꣢꣯र्चत ॥३६२॥
पदार्थःहे (नरः) नेतृत्वशक्ति से युक्त स्त्री-पुरुषो ! तुम (अर्चत) पूजा करो। हे (प्रियमेधासः) बुद्धिप्रेमी जनो ! (अर्चत) पूजा करो। (पुत्रकाः उत) तुम्हारे पुत्र-पुत्री भी (अर्चन्तु) पूजा करें। (पुरम् इत्) पूर्ति ही करनेवाले, (धृष्णु) अन्तःशत्रुओं तथा विघ्नों के धर्षणकर्ता इन्द्र जगदीश्वर की (अर्चत) पूजा करो ॥३॥ इस मन्त्र में ‘अर्चत’ की पुनरुक्ति अधिकता, निरन्तरता तथा अवश्यकर्तव्यता को द्योतित करने के लिए है ॥३॥
भावार्थःसब स्त्रीपुरुषों को चाहिए कि अपने पुत्र-पुत्री आदि परिवार सहित प्रातः-सायं नियम से परमेश्वर की पूजा किया करें। पूजा किया हुआ परमेश्वर पूजकों के मार्ग में आये शत्रुओं तथा विघ्नों को हटाकर उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से भरपूर करता है ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
उ꣣क्थ꣡मिन्द्रा꣢꣯य꣣ श꣢ꣳस्यं꣣ व꣡र्ध꣢नं पुरुनि꣣ष्षि꣡धे꣢ । श꣣क्रो꣡ यथा꣢꣯ सु꣣ते꣡षु꣢ नो रा꣣र꣡ण꣢त्स꣣ख्ये꣡षु꣢ च ॥३६३॥
पदार्थःहमें पुत्र, स्त्री, मित्र आदियों सहित (पुरुनिष्षिधे) बहुतों को पाप-पंक से अथवा संकट से उबारनेवाले (इन्द्राय) परम उपदेशक परमात्मा के लिए, ऐसा (उक्थम्) स्तोत्र (शंस्यम्) गान करना चाहिए, जो (वर्धनम्) हम स्तोताओं को बढ़ानेवाला हो, (यथा) जिससे (शक्रः) वह सर्वशक्तिमान् परमात्मा (नः) हम स्तोताओं के (सुतेषु) पुत्रों को (सख्येषु च) और सखाओं को (रारणत्) अतिशय पुनः-पुनः प्रेरणात्मक उपदेश देता रहे ॥४॥
भावार्थःस्तुति किया हुआ परमेश्वर स्तोताजनों को और उनके स्तोता पुत्र, मित्र आदि को पुरुषार्थ आदि की शुभ प्रेरणा और सदुपदेश देकर उनकी उन्नति करता है ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
वि꣣श्वा꣡न꣢रस्य व꣣स्प꣢ति꣣म꣡ना꣢नतस्य꣣ श꣡व꣢सः । ए꣡वै꣢श्च चर्षणी꣣ना꣢मू꣣ती꣡ हु꣢वे꣣ र꣡था꣢नाम् ॥३६४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे इन्द्र जगदीश्वर ! (विश्वानरस्य) सब जगत् के सञ्चालक (अनानतस्य) कहीं भी न झुकनेवाले अर्थात् पराजित न होनेवाले (शवसः) बल के (पतिम्) अधीश्वर (वः) आपको (चर्षणीनाम्) मनुष्यों की (एवैः) सत्कामनाओं की पूर्तियों के लिए, और (रथानाम्) उनके शरीररूप रथों को (ऊती) लक्ष्य के प्रति प्रेरित करने तथा रक्षित करने के लिए, मैं (हुवे) पुकारता हूँ ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे राजन् ! (विश्वानरस्य) सबसे आगे जानेवाली, (अनानतस्य) शत्रुओं के आगे न झुकनेवाली अर्थात् उनसे पराजित न होनेवाली (शवसः) सेना के (पतिम्) स्वामी (वः) आपको (चर्षणीनाम्) प्रजाजनों की (एवैः) महत्त्वाकांक्षाओं तथा प्रारब्ध कार्यों की पूर्ति के लिए, और (रथानाम्) विमानादि यानों को (ऊती) चलाने के लिए (हुवे) पुकारता हूँ ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजगदीश्वर ही जीवात्माओं को उनकी जीवनयात्रा के लिए कर्मानुसार उत्कृष्ट मानव शरीररूप रथ प्रदान करता है। वैसे ही राजा राष्ट्र में प्रजाजनों की शीघ्र यात्रा के लिए विमानादि रथों का निर्माण कराये ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
स꣢ घा꣣ य꣡स्ते꣢ दि꣣वो꣡ नरो꣢꣯ धि꣣या꣡ मर्त꣢꣯स्य꣣ श꣡म꣢तः । ऊ꣣ती꣡ स बृ꣢꣯ह꣣तो꣢ दि꣣वो꣢ द्वि꣣षो꣢꣫ अꣳहो꣣ न꣡ त꣢रति ॥३६५॥
पदार्थःहे परम धीमान् इन्द्र परमेश्वर ! (यः नरः) जो मनुष्य (मर्तस्य) मारनेवाले, (शमतः) लौकिक शान्ति को तथा मोक्षरूप परमशान्ति को देनेवाले, (दिवः) कमनीय (ते) आपके (धिया) ध्यान में मग्न होता है, (सः) वह, (सः घ) निश्चय से वही, (बृहतः) महान्, (दिवः) ज्योतिर्मय आपकी (ऊती) रक्षा से (अंहः न) पाप के समान (द्विषः) द्वेषवृत्तियों को भी (तरति) पार कर लेता है ॥६॥
भावार्थःजैसे मनुष्य मरणधर्मा होने से ‘मर्त्त’ कहलाता है, वैसे ही जगदीश्वर मारनेवाला होने से ‘मर्त्त’ है। वेद में कहा भी है—‘जो मारता है, जो जिलाता है (अथ० १३।३।३)’। मारनेवाला होने से उसके नाम मर्त्त, मृत्यु, शर्व और यम हैं, जन्म देने और प्राण प्रदान करने के कारण वह भव, जनिता, प्राण आदि कहाता है। उसके ध्यान से बल पाकर मनुष्य सब विघ्नों और समस्त शत्रुओं को पार कर सकता है ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
वि꣣भो꣡ष्ट꣢ इन्द्र꣣ रा꣡ध꣢सो वि꣣भ्वी꣢ रा꣣तिः꣡ श꣢तक्रतो । अ꣡था꣢ नो विश्वचर्षणे द्यु꣣म्न꣡ꣳ सु꣢दत्र मꣳहय ॥३६६॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) बहुत ज्ञानी तथा बहुत-से कर्मों को करनेवाले (इन्द्र) विश्वम्भर परमात्मन् ! (विभोः ते) व्यापक आपके (राधसः) शम, दम, न्याय, सत्य, अहिंसा आदि आध्यात्मिक और चाँदी, सोना, हीरा, मोती, मणि, माणिक्य, विद्या, आरोग्य, यश, चक्रवर्ती राज्य आदि भौतिक धन की (रातिः) देन (विभ्वी) बड़ी व्यापक है। (अथ) इस कारण, हे (विश्वचर्षणे) विश्वद्रष्टा ! हे (सुदत्र) शुभ दानी जगदीश्वर ! आप (नः) हमारे लिए (द्युम्नम्) आत्मिक तेज, भौतिक धन और उससे उत्पन्न होनेवाले यश को (मंहय) प्रदान कीजिए ॥ इस मन्त्र की राजा तथा आचार्य के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए। व्यापक धनवाले राजा का धनदान व्यापक होता है, और व्यापक विद्यावाले आचार्य का विद्यादान व्यापक होता है। राजा गुप्तचर रूपी आँखों से सकलद्रष्टा होता है, और आचार्य अपने ज्ञान के बल से सकलद्रष्टा होता है ॥७॥ इस मन्त्र में ‘विभु परमात्मा की देन भी विभु है’ इसमें समालङ्कार व्यङ्ग्य है, क्योंकि समालङ्कार वहाँ होता है, जहाँ अनुरूप वस्तुओं के मिलन की प्रशंसा होती है ॥७॥
भावार्थःजो जगदीश्वर, राजा और आचार्य धन, विद्या, तेज, यश आदि की प्रचुर वर्षा करते हैं, वे हमारे लिए भी इनकी धारा को प्रवाहित करें ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -उषाः| स्वर - गान्धारः
व꣡य꣢श्चित्ते प꣣तत्रि꣡णो꣢ द्वि꣣पा꣡च्चतु꣢꣯ष्पादर्जुनि । उ꣢षः꣣ प्रा꣡र꣢न्नृ꣣तू꣡ꣳरनु꣢꣯ दि꣣वो꣡ अन्ते꣢꣯भ्य꣣स्प꣡रि꣢ ॥३६७॥
पदार्थःजैसे प्रभात में सूर्योदय से पूर्व प्राची दिशा के आकाश में उषा प्रकाशित होती है, वैसे ही अध्यात्म-साधना में तत्पर योगियों के हृदयाकाश में परमात्मारूप सूर्य के उदय से पूर्व उसके आविर्भाव की द्योतक आत्मप्रभारूप उषा खिलती है। उसी को यहाँ उषा नाम से कहा गया है ॥ हे (अर्जुनि) जनमानस में प्रकट होती हुई शुभ्र, सत्त्वगुणप्रधान अध्यात्म-प्रभा ! (दिवः) आत्मलोक के (अन्तेभ्यः परि) प्रान्तों से (ते) तेरे (ऋतून् अनु) आगमनों पर (पतत्रिणः वयः चित्) पंखोंवाले पक्षियों के समान (पतत्रिणः) उत्क्रमणशील, अर्थात् मूलाधार आदि निचले-निचले चक्रों से ऊपर-ऊपर के चक्रों में प्राण के उत्क्रमण के लिए प्रयत्न करनेवाले योगीजन, और (द्विपात्) अपरा और परा विद्या रूप दो प्राप्तव्य पदार्थोंवाले, अथवा, ज्ञान और कर्म रूप दो गन्तव्य मार्गोंवाले, अथवा अभ्युदय और निःश्रेयस रूप दो गन्तव्य मार्गोंवाले, और (चतुष्पात्) मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार इन अन्तः करणचतुष्टयरूप साधनोंवाले, अथवा क्रमशः सुख-दुःख-पुण्य-अपुण्य विषयोंवाली मैत्री-करुणा-मुदिता-उपेक्षा ये चार वृत्तियाँ जिनके चित्तप्रसादन के उपाय हैं वे, अथवा बाह्य-आभ्यन्तर-स्तम्भवृत्ति-बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी ये चार प्राणायाम जिनके प्रकाशावरणक्षय के उपाय हैं वे, अथवा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इन चार पुरुषार्थोंवाले मनुष्य (प्रारन्) प्रगति में तत्पर हो जाते हैं ॥८॥ इस मन्त्र में ‘वयः चित् पतत्रिणः’ में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजैसे प्रभातकालीन प्राकृतिक उषा के खिलने पर पंखयुक्त पक्षी, दोपाये मनुष्य और चौपाये पशु नींद छोड़कर सचेष्ट और प्रयत्नशील होते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक उषा के प्रकट होने पर योगमार्ग में प्रवृत्त, आगे-आगे उत्क्रान्ति करनेवाले, दो साधनों या चार साधनोंवाले योगीजन अपने हृदय में और जन-मानस में अध्यात्म-सूर्य के उदय के लिए सचेष्ट हो जाते हैं ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - गान्धारः
अ꣣मी꣡ ये दे꣢꣯वा꣣ स्थ꣢न꣣ म꣢ध्य꣣ आ꣡ रो꣢च꣣ने꣢ दि꣣वः꣢ । क꣡द्ध꣢ ऋ꣣तं꣢꣫ कद꣣मृ꣢तं꣣ का꣢ प्र꣣त्ना꣢ व꣣ आ꣡हु꣢तिः ॥३६८॥
पदार्थःहे (देवाः) अपने-अपने विषय के प्रकाशक ज्ञानेन्द्रियरूप देवो ! (अमी ये) ये जो तुम (दिवः) उर्ध्वस्थान सिर के (मध्ये) अन्दर (रोचने) रोचमान अपने-अपने गोलक में (आ स्थन) आकर स्थित हुए हो, अथवा, हे (देवाः) प्रकाशक सूर्यकिरणों ! (अमी ये) ये जो तुम (दिवः) द्युलोक के (मध्ये) बीच (रोचने) दीप्तिमान् सूर्य में (आ स्थन) आकर स्थित हो, अथवा, हे (देवाः) ज्ञान के प्रकाश से युक्त तथा ज्ञान के प्रकाशक विद्वानो ! (अमी ये) ये जो तुम (दिवः) कीर्ति से प्रकाशित राष्ट्र के (मध्ये) अन्दर (रोचने) यशस्वी पद पर (आ स्थन) नियुक्त हुए हो, उन तुमसे पूछता हूँ कि (कत्) क्या (वः) तुम्हारा (ऋतम्) सत्य है, (कत्) क्या (अमृतम्) अमरतत्त्व है, (का) और क्या (वः) तुम्हारी (प्रत्ना) पुरातन (आहुतिः) होम क्रिया है? ॥९॥
भावार्थःयहाँ उत्तर दिये बिना ही केवल प्रश्न करके जिज्ञासा उत्पन्न की गयी है कि इन प्रश्नों के उत्तर अपनी प्रतिभा से स्वयं दो। इन प्रश्नों के उत्तर ये हो सकते हैं। सिर में जो ज्ञानेन्द्रियरूप देव स्थित हैं, उनका ऋत है जीवात्मा में सत्यज्ञान को पहुँचाना, उनका अमृत है वास्तविक इन्द्रियतत्त्व, जो देह के साथ इन्द्रिय-गोलकों के विनष्ट हो जाने पर भी मरता नहीं, प्रत्युत सूक्ष्म शरीर में विद्यमान रहता है, उनकी सनातन आहुति है शरीररक्षारूप यज्ञ में तथा ज्ञानप्रदानरूप यज्ञ में अपना होम करना। इसी प्रकार द्युलोकस्थ सूर्य में जो किरण-रूप देव स्थित हैं, उनका ऋत है वह सत्यनियम, जिसके अनुसार प्रतिदिन सूर्योदय के साथ वे आकाश और भूमण्डल में व्याप्त होते हैं, उनका अमृत है शुद्ध मेघ-जल, जिसे वे समुद्र आदि से भाप बनाकर ऊपर ले जाते हैं, उनकी सनातन आहुति है मेघजल का पार्थिव अग्नि में होम करना, जिससे पृथिवी पर ओषधि, वनस्पति आदि उगती हैं और प्राणी जीवन धारण करते हैं, अथवा सब ग्रहोपग्रहों में अपना होम करना, जिससे पृथिवी, मङ्गल, बुध, चन्द्रमा आदि प्रकाशित होते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र में जो विद्या दान करनेवाले विद्वान लोग हैं, उनका ऋत है वह सत्यनिष्ठा जिसका अनुसरण कर वे विद्यादान में दत्तचित्त होते हैं; उनका अमृत है वह ज्ञान जिसे वे सत्पात्रों को देते हैं, उनकी सनातन आहुति है अध्ययन-अध्यापन रूप यज्ञ में अपना होम करना, इत्यादि सुधी जनों को स्वयं ऊहा कर लेनी चाहिए ॥९॥ विवरणकार माधव ने यह देखकर कि इस ऋचा का ऋषि आप्त का पुत्र त्रित है और देवता ‘विश्वेदेवाः’ है, इस पर निम्नलिखित इतिहास लिखा है-“आप्त ऋषि के तीन पुत्र थे, एकत, द्वित और त्रित। उन्होंने यज्ञ करने की इच्छा से यजमानों से गौएँ माँगी और पा लीं। उन्हें लेकर वे घर चल पड़े। जब वे सरस्वती नदी के किनारे-किनारे जा रहे थे तब परले पार बैठे गवादक ने उन्हें देख लिया। वह उठा और सरस्वती के जलों को पार करके रात में उसने उनको डराया। जब वे डरकर भागे तब उनमें से त्रित घास-फूस और लताओं से ढके हुए एक निर्जल कुएँ में गिर पड़ा। कुएँ में गिरने का कारण अन्य कुछ लोग यह बताते हैं कि एकत और द्वित को कम गौएँ मिली थीं, त्रित को बहुत सारी मिल गयी थीं, इसलिए जान-बूझकर उन्होंने त्रित को कुएँ में धकेल दिया था। वहीं उसके मन में आया कि मैंने यज्ञ का संकल्प किया था, अब यदि बिना यज्ञ किये ही मर जाता हूँ तो मेरा कल्याण नहीं होगा, इसलिए कोई ऐसा उपाय करना चाहिए कि यहाँ कुएँ में पड़ा-पड़ा ही मैं सोम-पान कर लूँ। वह यह विचार कर ही रहा था कि अकस्मात् ही उसने उसी कुएँ में एक लता उतरी हुई देखी। उसने उसे लेकर और यह सोम ही है, ऐसा मन में निश्चय करके अन्य भी यज्ञ-साधनों का मन में संकल्प करके बजरी को सोम कूटने के सिल-बट्टे बनाकर उस लता को अभिषुत किया और अभिषुत करके देवों को पुकारा। पुकारे गये देवों को पुकारे जाने का कारण समझ में न आया, अतः वे आविग्न हो उठे। बृहस्पति ने भी पुकार को सुना और सुनकर वह देवों से बोला कि त्रित का यज्ञ है, वहाँ चलते हैं। तब वे सब देव वहाँ आये। उन्हें आया देखकर कुएँ से उद्धार की इच्छावाले त्रित ने उनकी स्तुति की और उन्हें उपालम्भ दिया कि तुम्हारा सत्यासत्य का विवेक नष्ट हो गया है, तुम बड़े अकृतज्ञ हो कि मुझे इस कुएँ से बाहर नहीं निकालते हो। त्रित का उपालम्भ ही प्रस्तुत ऋचा में प्रकट किया गया है, इत्यादि।” यह सब कल्पना-कला का विलास है, वास्तविकता इसमें कुछ भी नहीं है, यह सुधी जन स्वयं ही समझ लें ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ऋ꣢च꣣ꣳ सा꣡म꣢ यजामहे꣣ या꣢भ्यां꣣ क꣡र्मा꣢णि कृ꣣ण्व꣡ते꣢ । वि꣡ ते सद꣢꣯सि राजतो य꣣ज्ञं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ वक्षतः ॥३६९॥
पदार्थःहम (ऋचम्) ऋग्वेद का, और (साम) सामवेद का (यजामहे) अर्थज्ञानपूर्वक तथा गीतिज्ञानपूर्वक अध्ययन करते हैं, और अध्यापन कराते हैं (याभ्याम्) जिनसे अर्थात् जिनका अध्ययन-अध्यापन करके (कर्माणि) तदुक्त कर्मों को वेदपाठी लोग (कृण्वते) करते हैं। (ते) वे ऋग्वेद और सामवेद (सदसि) निवासगृह तथा सभागृह में (राजतः) शोभा पाते हैं, क्योंकि वहाँ उनका पाठ और गान किया जाता है। और वे (देवेषु) विद्वानों में (यज्ञम्) यज्ञ-भावना को (वक्षतः) प्राप्त कराते हैं ॥१०॥
भावार्थःहमें चाहिए कि ऋग्वेद, सामवेद, सामयोनि ऋचा, ऋचा पर किया जानेवाला सामगान, यह सब योग्य गुरुओं से अर्थज्ञानपूर्वक पढ़कर घर में, सभा में और विभिन्न समारोहों के अवसरों पर सस्वर वेदपाठ और सामगान किया करें ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र नाम से और कश्यप नाम से इन्द्र का स्मरण करने से, उसकी अर्चनार्थ प्रेरणा होने से, उसके ध्यान का फल प्रतिपादित होने से, उसके दान की याचना होने से, दिव्य उषा का प्रभाव वर्णित होने से और ऋक् तथा साम के अध्ययन का संकल्प वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -अति जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
वि꣢श्वाः꣣ पृ꣡त꣢ना अभि꣣भू꣡त꣢रं꣣ न꣡रः꣢ स꣣जू꣡स्त꣢तक्षु꣣रि꣡न्द्रं꣢ जज꣣नु꣡श्च꣢ रा꣣ज꣡से꣢ । क्र꣢त्वे꣣ व꣡रे꣢ स्थे꣢म꣢न्या꣣मु꣡री꣢मु꣣तो꣡ग्रमोजि꣢꣯ष्ठं त꣣र꣡सं꣢ तर꣣स्वि꣡न꣢म् ॥३७०॥
पदार्थः(विश्वाः) सब (पृतनाः) शत्रुसेनाओं को (अभिभूतरम्) अतिशय पराजित करने वाले, (वरे) उत्कृष्ट (स्थेमनि) स्थिरता में विद्यमान, (आ मुरीम्) चारों ओर प्रलयकर्ता अथवा विपदाओं के संहारक (उत) और (उग्रम्) प्रचण्ड, (ओजिष्ठम्) सबसे बढ़कर ओजस्वी, (तरसम्) तरने और तराने में समर्थ, (तरस्विनम्) अति बलवान् (इन्द्रम्) परमेश्वर वा वीरपुरुष को (नरः) प्रभुभक्त व राजभक्त लोग (सजूः) इकट्ठे मिलकर (ततक्षुः) स्तुतियों व उत्साह-वचनों से तीक्ष्ण करते हैं (च) और (राजसे) हृदय-साम्राज्य में वा राष्ट्र में राज्य करने के लिए और (क्रत्वे) कर्मयोग की प्रेरणा देने के लिए अथवा कर्म करने के लिए (जजनुः) सम्राट् के पद पर अभिषिक्त करते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘तरसं, तरस्विनम्’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःजैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, दुःख, दौर्मनस्य आदि की सेनाओं के पराजेता, अविचल, प्रलयकर्ता, अति ओजस्वी, तारक, बलिष्ठ परमात्मा को उपासकजन अपना हृदय-सम्राट् बनाते हैं, वैसे ही प्रजाजन शत्रुविजयी, दृढ़संकल्पवान् विपत्तिविदारक, संकटों से तरने-तराने में समर्थ शूरवीर मनुष्य को उत्साहित करके राजा के पद पर अभिषिक्त करें ॥१॥
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छन्द -जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
श्र꣡त्ते꣢ दधामि प्रथ꣣मा꣡य꣢ म꣣न्य꣢꣫वेऽह꣣न्य꣢꣯द्दस्युं꣣ न꣡र्यं꣢ वि꣣वे꣢र꣣पः꣢ । उ꣣भे꣢꣫ यत्वा꣣ रो꣡द꣢सी꣣ धा꣡व꣢ता꣣म꣢नु꣣ भ्य꣡सा꣢ते꣣ शु꣣ष्मा꣢त्पृथि꣣वी꣡ चि꣢दद्रिवः ॥३७१॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! मैं (ते) तेरे (प्रथमाय) सर्वोत्कृष्ट (मन्यवे) तेज के प्रति (श्रत् दधामि) श्रद्धा करता हूँ, (यत्) क्योंकि, तू (दस्युम्) यज्ञादि कर्मों के विध्वंसक दुर्भिक्ष को अथवा रात्रि के अन्धकार को (अहन्) नष्ट करता है, (नर्यम्) मनुष्यों के हितकर रूप में (अपः) मेघ-जलों को (विवेः) भूमि पर बरसाता है, और (यत्) क्योंकि (उभे रोदसी) द्युलोक और पृथिवी-लोक दोनों (त्वा) तेरे (अनु धावताम्) पीछे-पीछे दौड़ते हैं। हे (अद्रिवः) प्रतापरूपवज्रवाले ! तेरे (शुष्मात्) बल से (पृथिवी चित्) अन्तरिक्ष भी (भ्यसाते) भय से काँपता है ॥२॥
भावार्थःसूर्य के प्रकाश से रात्रि के अन्धकार का निवारण होना, बादल से वर्षा होना, द्यावापृथिवी के मध्य में विद्यमान लोक-लोकान्तरों का नियन्त्रण होना, सूर्य और भूमि का परस्पर सामञ्जस्य होना इत्यादि जो कुछ भी व्यवस्था जगत् में दिखायी देती है, उसका करनेवाला जगदीश्वर ही है। इस लिए हमें उसके प्रताप पर श्रद्धा करनी चाहिए ॥२॥
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छन्द -जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
स꣣मे꣢त꣣ वि꣢श्वा꣣ ओ꣡ज꣢सा꣣ प꣡तिं꣢ दि꣣वो꣢꣯ य एक꣣ इ꣡द्भूरति꣢꣯थि꣣र्ज꣡ना꣢नाम् । स꣢ पू꣣र्व्यो꣡ नू꣢꣯तनमा꣣जि꣡गी꣢ष꣣न् तं꣡ व꣢र्त्त꣣नी꣡रनु꣢꣯ वावृत꣣ ए꣢क꣣ इ꣢त् ॥३७२॥
पदार्थःहे प्रजाओ ! (विश्वाः) तुम सब (ओजसा) तेज और बल से (दिवः) सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, नीहारिका आदि सहित समस्त खगोल के (पतिम्) स्वामी इन्द्र जगदीश्वर को (समेत) प्राप्त करो, (यः) जो (एकः इत्) एक ही है, और (जनानाम्) सब स्त्री-पुरुषों का (अतिथिः) अतिथि के समान पूज्य (भूः) है। (पूर्व्यः) पुरातन भी (सः) वह (नूतनम्) नवीन उत्पन्न जड़-चेतन जगत् को (आ जिगीषन्) जीत लेता है, क्योंकि वह पुराणपुरुष सर्वाधिक महिमावाला है। (तम्) उस जगदीश्वर की ओर (एकः इत्) एक ही (वर्तनीः) मार्ग अर्थात् अध्यात्ममार्ग, न कि भोगमार्ग (अनु वावृते) जाता है। उसी मार्ग पर चलकर उसे पाया जा सकता है ॥३॥
भावार्थःअकेला भी परमेश्वर सब लोकों का अधिपति, सबसे अधिक पूज्य और महिमा में सबसे बड़ा है। उसे पाने के लिए एक धर्ममार्ग का ही आश्रय लेना चाहिए ॥३॥
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छन्द -जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
इ꣣मे꣡ त꣢ इन्द्र꣣ ते꣢ व꣣यं꣡ पु꣢रुष्टुत꣣ ये꣢ त्वा꣣र꣢भ्य꣣ च꣡रा꣢मसि प्रभूवसो । न꣢꣫ हि त्वद꣣न्यो꣡ गि꣢र्वणो꣣ गि꣢रः꣣ स꣡घ꣢त्क्षो꣣णी꣡रि꣢व꣣ प्र꣢ति꣣ त꣡द्ध꣢र्य नो꣣ व꣡चः꣢ ॥३७३॥
पदार्थःहे (पुरुष्टुत) बहुत यशोगान किये गये अथवा बहुतों से यशोगान किये गये, (प्रभूवसो) समर्थ और निवासक (इन्द्र) जगदीश्वर ! (इमे) ये (ते) वे लब्धप्रतिष्ठ (वयम्) हम उपासक (ते) तुम्हारे हो गये हैं, (ये) जो (त्वा आरभ्य) तुम्हारा आश्रय लेकर (चरामसि) विचर रहे हैं। हे (गिर्वणः) स्तुतिवाणियों से संभजनीय भगवन् ! (त्वत् अन्यः) तुमसे भिन्न कोई भी (गिरः) हमारी स्तुतिवाणियों का (न हि) नहीं (सघत्) पात्र हो सकता है (तत्) इस कारण तुम (नः वचः) हमारे स्तुतिवचन की (प्रति हर्य) कामना करो, (क्षोणीः इव) जैसे कोई राजा भूमियों की कामना करता है ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘गिर्, गिरः’ में छेकानुप्रास है ॥४॥
भावार्थःजो परमात्मा के साथ हार्दिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं, उन्हीं की स्तुतियों को वह सुनता है ॥४॥
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छन्द -जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
च꣣र्षणीधृ꣡तं꣢ म꣣घ꣡वा꣢नमु꣣क्थ्या꣢३꣱मि꣢न्द्रं꣣ गि꣡रो꣢ बृह꣣ती꣢र꣣꣬भ्यनू꣢꣯षत । वा꣣वृधानं꣡ पु꣢रुहू꣣त꣡ꣳ सु꣢वृ꣣क्ति꣢भि꣣र꣡म꣢र्त्यं꣣ ज꣡र꣢माणं दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥३७४॥
पदार्थः(चर्षणीधृतम्) मनुष्यों के धारणकर्ता, (मघवानम्) प्रशस्त ऐश्वर्यों के स्वामी, (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय, (सुवृक्तिभिः) शुभ क्रियाओं से (वावृधानम्) वृद्ध, (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे गये, (अमर्त्यम्) अमर कीर्तिवाले, (दिवेदिवे) प्रतिदिन (जरमाणम्) सत्कर्मकर्ताओं की प्रंशसा करनेवाले अथवा सत्कर्मों का उपदेश करनेवाले (इन्द्रम्) परमेश्वर वा राजा को (बृहतीः) महान् (गिरः) वेदवाणियाँ अथवा मेरी अपनी वाणियाँ (अभ्यनूषत) स्तुति अथवा प्रशंसा का विषय बनाती हैं ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है, विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर भी है ॥५॥
भावार्थःजैसे सब मनुष्यों का धारणकर्ता, शुभकर्मा, अमरकीर्ति, सत्कर्मों का उपदेष्टा परमेश्वर सबसे स्तुति किया जाता है, वैसे ही उन गुणों से युक्त राजा भी प्रजाओं की प्रशंसा का पात्र बनता है ॥५॥
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छन्द -जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
अ꣡च्छा꣢ व꣣ इ꣡न्द्रं꣢ म꣣त꣡यः꣢ स्व꣣र्यु꣡वः꣢ स꣣ध्री꣢ची꣣र्वि꣡श्वा꣢ उश꣣ती꣡र꣢नूषत । प꣡रि꣢ ष्वजन्त꣣ ज꣡न꣢यो꣣ य꣢था꣣ प꣢तिं꣣ म꣢र्यं꣣ न꣢ शु꣣न्ध्युं꣢ म꣣घ꣡वा꣢नमू꣣त꣡ये꣢ ॥३७५॥
पदार्थः(स्वर्युवः) विवेक-प्रकाश की कामनावाली, (सध्रीचीः) मिलकर उद्यम करनेवाली, (उशतीः) प्रीतियुक्त (विश्वाः) सब (मतयः) मेरी बुद्धियाँ (इन्द्रं वः) हृदयसम्राट् आप जगदीश्वर के (अच्छ) अभिमुख होकर (अनूषत) स्तुति कर रही हैं, और वे (ऊतये) रक्षा के लिए (मर्यं न शुन्ध्युम्) अग्नि के समान शोधक, (मघवानम्) ऐश्वर्यवान्, ऐश्वर्यप्रदाता आपका (परिष्वजन्त) आलिङ्गन कर रही हैं, (जनयः) स्त्रियाँ (यथा पतिम्) जैसे पति का आलिङ्गन करती हैं ॥६॥ इस मन्त्र में दो उपमालङ्कारों की संसृष्टि है ॥६॥
भावार्थःजो परमेश्वर अग्नि के सदृश हमारे हृदयों का शोधक और सद्विचाररूप ऐश्वर्यों का प्रदाता है, उसके प्रति सबको अपनी मतियाँ सदा प्रवृत्त करनी चाहिएँ ॥६॥
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छन्द -जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
अ꣣भि꣢꣫ त्यं मे꣣षं꣡ पु꣢रुहू꣣त꣢मृ꣣ग्मि꣢य꣣मि꣡न्द्रं꣢ गी꣣र्भि꣡र्म꣢दता꣣ व꣡स्वो꣢ अर्ण꣣व꣢म् । य꣢स्य꣣ द्या꣢वो꣣ न꣢ वि꣣च꣡र꣢न्ति꣣ मा꣡नु꣢षं भु꣣जे꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठम꣣भि꣡ विप्र꣢꣯मर्चत ॥३७६॥
पदार्थः(त्यम्) उस प्रसिद्ध, (मेषम्) सुखों से सींचनेवाले, (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे गये, (ऋग्मियम्) अर्चना के योग्य, (वस्वः अर्णवम्) धन के समुद्र (इन्द्रम्) परमेश्वर वा राजा को (गीर्भिः) वाणियों से (मदत) हर्षयुक्त करो। (यस्य) जिस परमेश्वर वा राजा की (द्यावः) दीप्तियाँ, तेजस्विताएँ (मानुषम्) मनुष्य का (न विचरन्ति) अपकार नहीं करतीं, उस (मंहिष्ठम्) अतिशय महान् व दाता (विप्रम्) मेधावी विद्वान् परमेश्वर व राजा को (भुजे) अपने पालन के लिए (अर्चत) पूजित वा सत्कृत करो ॥७॥ ‘वस्वः अर्णवम्’ में समुद्रवाची अर्णव पद का लक्षणावृत्ति से निधि लक्ष्यार्थ होता है, निधि न कह-कर अर्णव कहने में अतिशय धनवत्त्व व्यङ्ग्य है। इन्द्र में अर्णव का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजैसे सुखवर्षक, ऐश्वर्य का पारावार, सबसे अधिक महान्, सबसे बड़ा दानी, मेधावी परमेश्वर सबसे पूजा करने योग्य है, वैसे ही इन गुणों से युक्त राजा प्रजाजनों से सत्कृत और प्रोत्साहित किये जाने योग्य है ॥७॥ विवरणकार माधव ने इस मन्त्र पर यह इतिहास लिखा है—“अङ्गिरा नामक ऋषि था। उसने इन्द्र को पुत्र रूप में पाने की याचना करते हुए आत्म-ध्यान किया। उसके योगैश्वर्य के बल से उसी ध्यान के फलस्वरूप उसे सव्य नाम से इन्द्र पुत्र रूप में प्राप्त हुआ। उसे इन्द्र मेष का रूप धारण करके हर ले गया। यह कथा देकर वे कहते हैं कि इसी इतिहास को बतानेवाली प्रस्तुत ऋचा है, जिसमें मेषरूपधारी इन्द्र की स्तुति की गयी है।” किन्तु यह घटना वास्तविक नहीं है। मन्त्र का ऋषि आङ्गिरस सव्य है, और मन्त्र में इन्द्र को मेष कहा गया है, यही देखकर उक्त कथा रच ली गयी है ॥ सायण ने पहले मेष शब्द को तुदादिगण की स्पर्धार्थक मिष धातु से निष्पन्न मानकर ‘मेष’ का यौगिक अर्थ ‘शत्रुओं से स्पर्धा करनेवाला’ करके भी फिर वैकल्पिक रूप से यह इतिहास भी दे दिया है कि—कण्व का पुत्र मेधातिथि यज्ञ कर रहा था, तब इन्द्र मेष का रूप धरकर आया और उसने उसका सोमरस पी लिया। तब ऋषि ने उसे मेष कहा था, इसलिए अब भी इन्द्र को मेष कहते हैं। यह कथा भी काल्पनिक है, वास्तव में घटित किसी इतिहास का वर्णन इस मन्त्र में नहीं है, यह सुधीजन समझ लें ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
त्य꣢꣫ꣳसु मे꣣षं꣡ म꣢हया स्व꣣र्वि꣡द꣢ꣳ श꣣तं꣡ यस्य꣢꣯ सु꣣भु꣡वः꣢ सा꣣क꣡मी꣢꣯रते । अ꣢त्यं꣣ न꣡ वाज꣢꣯ꣳ हवन꣣स्य꣢द꣣ꣳ र꣢थ꣣मि꣡न्द्रं꣢ ववृत्या꣣म꣡व꣢से सुवृ꣣क्ति꣡भिः꣢ ॥३७७॥
पदार्थःहे सखे ! तू (त्यम्) उस प्रसिद्ध, (मेषम्) सुखों से सींचनेवाले, (स्वर्विदम्) भूमि पर सूर्य के प्रकाश को अथवा राष्ट्र में बिजली के प्रकाश को प्राप्त करानेवाले जगदीश्वर वा राजा की (सु महय) भली-भाँति पूजा वा सत्कार कर, (यस्य) जिस जगदीश्वर वा राजा की (शतम्) सैंकड़ों जन (साकम्) साथ मिलकर (सुभुवः) उत्तम स्तुतियों को (ईरते) उच्चारण करते हैं। मैं भी (वाजम्) बलवान् (हवनस्यदम्) आह्वान के प्रति तुरन्त पहुँचनेवाले, (अत्यम्) निरन्तर कर्मशील (इन्द्रम्) जगदीश्वर वा राजा को (अवसे) रक्षा के लिए (सुवृक्तिभिः) शुभ स्तुतियों से (ववृत्याम्) अपनी ओर प्रवृत्त करूँ, (न) जैसे (वाजम्) वेगवान् (हवनस्यदम्) विजयस्पर्धा में ले जाये जानेवाले (अत्यम्) निरन्तर चलनेवाले (रथम्) विमानादि यान को (अवसे) देशान्तर में ले जाने के लिए (सृवृक्तिभिः) शोभन क्रियाओं अथवा यन्त्र-कलाओं से, चलने के लिए प्रवृत्त करते हैं ॥८॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजैसे देशान्तर में जाने के लिए निरन्तर चल सकनेवाले रथ को प्रवृत्त करते हैं, वैसे ही रक्षा प्राप्त करने के लिए निरन्तर कर्मशील परमेश्वर वा राजा को अपनी ओर प्रवृत्त करना चाहिए ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -जगती| देवता -द्यावापृथिवी| स्वर - निषादः
घृ꣣त꣡व꣢ती꣣ भु꣡व꣢नानामभि꣣श्रि꣢यो꣣र्वी꣢ पृ꣣थ्वी꣡ म꣢धु꣣दु꣡घे꣢ सु꣣पे꣡श꣢सा । द्या꣡वा꣢पृथि꣣वी꣡ वरु꣢꣯णस्य꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ वि꣡ष्क꣢भिते अ꣣ज꣢रे꣣ भू꣡रि꣢रेतसा ॥३७८॥
पदार्थः(घृतवती) दीप्तिवाले और जलवाले, (भुवनानाम्) सब लोकों के (अभिश्रिया) शोभा-जनक (उर्वी) बहुत-से पदार्थों से युक्त, (पृथ्वी) विस्तीर्ण, (मधुदुघे) मधुर आदि रसों से भरनेवाले, (सुपेशसा) उत्कृष्ट सुवर्ण वा उत्कृष्ट रूप-रंग से युक्त, (अजरे) अजीर्ण, अच्छिन्न (भूरिरेतसा) बहुत वीर्य व जल को उत्पन्न करनेवाले (द्यावापृथिवी) द्युलोक और भूमिलोक (वरुणस्य) श्रेष्ठ जगदीश्वर, सूर्य वा वायु के (धर्मणा) आकर्षण, धारण आदि गुण से (विष्कभिते) विशेष रूप से धृत हैं ॥९॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि भूलोकविद्या और खगोलविद्या को भली-भाँति जानकर सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदियों से तथा पृथिवी से यथायोग्य लाभ प्राप्त करें। वरुण परमेश्वर ही सूर्य, वायु आदि के द्वारा सब लोकों को आकर्षण, धारण आदि से स्थिर किये हुए है, इसलिए उसे भी कभी नहीं भूलना चाहिए ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -महापङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
उ꣣भे꣡ यदि꣢꣯न्द्र रो꣡द꣢सी आप꣣प्रा꣢थो꣣षा꣡ इ꣢व । म꣣हा꣡न्तं꣢ त्वा म꣣ही꣡ना꣢ꣳ स꣣म्रा꣡जं꣢ चर्षणी꣣ना꣢म् । दे꣣वी꣡ जनि꣢꣯त्र्यजीजनद्भ꣣द्रा꣡ जनि꣢꣯त्र्यजीजनत् ॥३७९॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) जगत्पति परमात्मन् ! (यत्) जो आप (उषाः इव) प्रभात में खिलनेवाली उषा के समान (उभे रोदसी) द्युलोक-भूलोक दोनों को अथवा आत्मा और शरीर दोनों को (आपप्राथ) प्रकाश से पूर्ण कर रहे हो अथवा यश से प्रसिद्ध कर रहे हो, उन (महीनां महान्तम्) महत्त्वशालियों में भी महत्त्वशाली, (चर्षणीनां सम्राजम्) मनुष्यों के सम्राट् (त्वा) आपको (देवी जनित्री) प्रकाशक दिव्य ऋतम्भरा प्रज्ञा (अजीजनत्)योगी के हृदय में प्रकाशित करती है, (भद्रा जनित्री) आविर्भाव करनेवाली श्रेष्ठ विवेकख्याति (अजीजनत्) योगसाधक के हृदय में आविर्भूत करती है ॥ जनन से यहाँ प्रकाशन और आविर्भाव अभिप्रेत हैं, उत्पत्ति नहीं, क्योंकि परमेश्वर अनादि है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (इन्द्र) राजन् ! (यत्) जो आप (उषाः इव) उषा के समान (उभे रोदसी आपप्राथ) भूमि-आकाश दोनों को अपने यश से पूर्ण किये हुए हो, अथवा राष्ट्रवासी स्त्रियों-पुरुषों दोनों को विद्या के प्रकाश से पूर्ण कर रहे हो, उन (महीनां महान्तम्) महत्त्वशालियों में भी महत्त्वशाली, और (चर्षणीनाम् सम्राजम्) प्रजाओं के सम्राट् (त्वा) आपको (देवी जनित्री) दिव्य गुणोंवाली माता ने (अजीजनत्) पैदा किया है, (भद्रा जनित्री) श्रेष्ठ माता ने (अजीजनत्) पैदा किया है, इसी कारण आप इतने गुणी और भद्र हो ॥१०॥ इस मन्त्र में उपमा और श्लेष अलङ्कार हैं। पुनरुक्ति जननी और जन्य के गौरवाधिक्य को सूचित कर रही है। ‘महा, मही’ में छेकानुप्रास और ‘जनित्र्यजीजनत्’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास है ॥१०॥
भावार्थःउषा जैसे भूमि-आकाश को प्रकाश से परिपूर्ण करती है, वैसे जगदीश्वर उन्हें स्वरचित अग्नि, सूर्य, विद्युत्, चन्द्र, नक्षत्र आदियों के प्रकाश से और राजा प्रजारञ्जन से पैदा की हुई अपनी धवल कीर्ति से परिपूर्ण करता है ॥१०॥
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छन्द -जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
प्र꣢ म꣣न्दि꣡ने꣢ पितु꣣म꣡द꣢र्च꣣ता व꣢चो꣣ यः꣢ कृ꣣ष्ण꣡ग꣢र्भा नि꣣र꣡ह꣢न्नृ꣣जि꣡श्व꣢ना । अ꣣वस्य꣢वो꣣ वृ꣡ष꣢णं꣣ व꣡ज्र꣢दक्षिणं म꣣रु꣡त्व꣢न्तꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ हुवेमहि ॥३८०॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे मनुष्यो ! तुम (मन्दिने) आनन्दयुक्त तथा आनन्दप्रदाता इन्द्र जगदीश्वर के लिए (पितुमत्) श्रद्धारूप रस से युक्त (वचः) स्तुतिवचन को (प्र अर्चत) प्रेरित करो, (यः) जो जगदीश्वर (ऋजिश्वना) सीधी जानेवाली किरणों से युक्त सूर्य के द्वारा (कृष्णगर्भाः) अन्धकारपूर्ण रात्रियों को (निरहन्) नष्ट करता है। आओ, (अवस्यवः) रक्षा की कामनावाले हम-तुम (वृषणम्) बादल से वर्षा करनेवाले अथवा सुखों के वर्षक, (वज्रदक्षिणम्) न्यायदण्ड जिसके प्रताप को बढ़ानेवाला है ऐसे, (मरुत्वन्तम्) प्रशस्त प्राणोंवाले इन्द्र जगदीश्वर को (सख्याय) मित्रता के लिए (हुवेमहि) पुकारें ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य के पक्ष में। हे सहपाठियो ! तुम (मन्दिने) आनन्ददाता तथा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य के लिए (पितुमत्) उत्कृष्ट अन्न सहित (वचः) आदरपूर्ण प्रियवचन (प्र अर्चत) उच्चारण करो, (यः) जो आचार्य (ऋजिश्वना) सरल शिक्षापद्धति से (कृष्णगर्भाः) काला अज्ञान जिनके गर्भ में है, ऐसी अविद्या-रात्रियों को (निरहन्) नष्ट करता है। (अवस्यवः)विद्या की तृप्ति को चाहनेवाले हम-तुम (वृषणम्) सद्गुणों की वर्षा करनेवाले, (वज्रदक्षिणम्) कुपथ से हटानेवाला है विद्यादान जिसका ऐसे, और (मरुत्वन्तम्) विद्यायज्ञ के ऋत्विज् प्रशस्त विद्वान् अध्यापक जिसके पास हैं, ऐसे आचार्य को (सख्याय) मैत्री के लिए (हुवेमहि) स्वीकार करें ॥११॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है ॥११॥
भावार्थःअहो, परमेश्वर हमारे प्रति कैसी मित्रता का निर्वाह करता है ! सर्वत्र व्याप्त हुई रात्रि के अन्धकार को निवारण करने और वर्षा करने में क्या हम जैसों का सामर्थ्य हो सकता है? वही हमारे उपकार के लिए इस प्रकार के विविध कर्मों को विना हमसे कोई शुल्क लिये कर रहा है। गुरु का भी हमारे प्रति कैसा महान् उपकार है, जो समस्त अविद्या-रात्रि को हटाकर ज्ञान की वर्षा से हमारी अन्तःकरण की भूमि को सरस करता है। इसलिए परमेश्वर और गुरु का हमें सर्वात्मना पूजन और सत्कार करना चाहिए ॥११॥ इस मन्त्र पर भरतस्वामी ने यह इतिहास लिखा है कि यह गर्भस्राविणी उपनिषद् है। कृष्ण नाम का एक असुर था, उस कृष्ण से गर्भवती हुई उसकी भार्याओं को इन्द्र ने गर्भ नष्ट करने के लिए मार डाला था। ऋजिश्वा नामक राजर्षि कृष्णासुर का शत्रु था, उसके हितार्थ ही इन्द्र ने कृष्णासुर का भी वध कर दिया और उसके पुत्र भी उत्पन्न न हों, इस हेतु से उसकी गर्भवती भार्याओं का भी वध कर दिया। सायण ने भी अपने भाष्य में ऐसा ही इतिहास लिखा है। किन्तु यह कल्पना का विलासमात्र है, इसमें वास्तविकता कुछ नहीं है। सत्यव्रत सामश्रमी ने सायण की व्याख्या को अरुचिकर मानते हुए टिप्पणी दी है कि—“यहाँ विवरणकार का व्याख्यान अधिक उत्कृष्ट है, जिसने आधिदैविक अर्थ करते हुए लिखा है कि ‘कृष्णगर्भाः’ का तात्पर्य है काले मेघ में गर्भरूप से रहनेवाले जल, जिन्हें इन्द्र उनमें से निकालकर बरसा देता है। ‘निरहन्’ में हन् धातु अन्तर्णीतण्यर्थ है, जिसका अर्थ निकालना या नीचे गिरा देना है’’ ॥ इस दशति में इन्द्र की महिमा वर्णित होने, उसके स्तोत्र गाने के लिए प्रेरणा होने, द्यावापृथिवी के भी उसी के धर्म से धृत होने तथा इन्द्र नाम से राजा के भी कर्तव्य का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
इ꣡न्द्र꣢ सु꣣ते꣢षु꣣ सो꣡मे꣢षु꣣ क्र꣡तुं꣢ पुनीष उ꣣꣬क्थ्य꣢꣯म् । वि꣣दे꣢ वृ꣣ध꣢स्य꣣ द꣡क्ष꣢स्य म꣣हा꣢ꣳ हि षः ॥३८१॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली दुःखविदारक जगदीश्वर ! (सोमेषु) हमारे ज्ञानरस, कर्मरस और श्रद्धारस के (सुतेषु) अभिषुत होने पर, आप (उक्थ्यम्) प्रशंसायोग्य (क्रतुम्) हमारे जीवनयज्ञ को (पुनीषे) पवित्र करते हो। (सः) वह आप (वृधस्य) समृद्ध (दक्षस्य) बल के (विदे) प्राप्त कराने के लिए (महान् हि) निश्चय ही महान् हो ॥१॥
भावार्थःजो ज्ञानी और कर्मण्य होता हुआ परमेश्वर की उपासना करता है, उसके जीवन को वह कल्मषरहित करके उसे आत्मबल प्रदान करता है ॥१॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त꣡मु꣢ अ꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत पुरुहू꣣तं꣡ पु꣢रुष्टु꣣त꣢म् । इ꣡न्द्रं꣢ गी꣣र्भि꣡स्त꣢वि꣣ष꣡मा वि꣢꣯वासत ॥३८२॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (तम् उ) उसी (पुरुस्तुतम्) बहुत अधिक कीर्तिगान किये गये, (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे गये जगदीश्वर को (अभि) लक्ष्य करके (प्र गायत) भली-भाँति स्तुतिगीत गाओ। (तविषम्) महान् (इन्द्रम्) उस परमैश्वर्यशाली जगत्पति की (गीर्भिः) वेदवाणियों से (आ विवासत) आराधना करो ॥२॥
भावार्थःअनेकों ऋषि, महर्षि, राजा आदियों से स्तुति और पूजा किये गये महान् विश्वम्भर की हमें भी क्यों नहीं स्तुति और पूजा करनी चाहिए? ॥२॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
तं꣢ ते꣣ म꣡दं꣢ गृणीमसि꣣ वृ꣡ष꣢णं पृ꣣क्षु꣡ सा꣢स꣣हि꣢म् । उ꣣ लोककृत्नु꣡म꣢द्रिवो हरि꣣श्रि꣡य꣢म् ॥३८३॥
पदार्थःहे (अद्रिवः) अविनश्वर आत्मा से अनुप्राणित मानव ! (ते) तेरे लिए (तम्) उस प्रसिद्ध, (मदम्) आनन्ददाता, (वृषणम्) अन्न, धन, जल, बल, प्रकाश, विद्या आदि की वर्षा करनेवाले, (पृक्षु) आन्तरिक और बाह्य देवासुर-संग्रामों में (सासहिम्) अतिशय रूप से शत्रुओं को परास्त करनेवाले, (उ) और (लोककृत्नुम्) पृथिवी, सूर्य, चन्द्र आदि लोकों के रचयिता अथवा विवेक का आलोक प्रदान करनेवाले, (हरिश्रियम्) हरणशील अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र, प्राण, विद्युत् आदियों में शोभा तथा क्रियाशक्ति को उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर का, हम (गृणीमसि) उपदेश करते हैं ॥३॥
भावार्थःविद्वानों को चाहिए कि वे विविध पदार्थों और सद्गुणों के वर्षक, सुखदाता, संग्रामों में विजय दिलानेवाले, लोकलोकान्तरों के रचयिता, विवेकप्रदाता, सब पदार्थों में सौन्दर्य एवं शोभा के आधानकर्ता परमेश्वर का प्रजाजनों के कल्याणार्थ उपदेश किया करें, जिससे वे उसकी महिमा को जानकर, उसकी पूजा कर, उससे प्रेरणा लेकर पुरुषार्थी बनें ॥३॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
य꣡त्सोम꣢꣯मिन्द्र꣣ वि꣡ष्ण꣢वि꣣ य꣡द्वा꣢ घ त्रि꣣त꣢ आ꣣प्त्ये꣢ । य꣡द्वा꣢ म꣣रु꣢त्सु꣣ म꣡न्द꣢से꣣ स꣡मिन्दु꣢꣯भिः ॥३८४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगत् के धारणकर्ता परमात्मन् ! (यत्) क्योंकि, आपने (विष्णवि) सूर्य में अथवा आत्मा में (सोमम्) तेजरूप अथवा ज्ञानरूप सोम को निहित किया है, (यत् वा) और क्योंकि, आपने (घ) निश्चय ही (आप्त्ये) प्राप्तव्य (त्रिते) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक तीनों स्थानों में व्याप्त होनेवाले अग्नि में अथवा मन में (सोमम्) दाहकगुणरूप अथवा संकल्परूप सोम को निहित किया है, (यद् वा) और क्योंकि (मरुत्सु) पवनों में अथवा प्राणों में (सोमम्) जीवनप्रदानरूप सोम को निहित किया है, इसलिए आप (मन्दसे) यशस्वी हैं। आप हमें भी (इन्दुभिः) पूर्वोक्त तेज, ज्ञान, दोषदाहकत्व, संकल्प एवं जीवनप्रदान रूप सोमों से (सम्) संयुक्त कीजिए ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर ने सूर्य, अग्नि, वायु आदियों में और जीवात्मा, मन, प्राण आदियों में जो-जो उन-उनके विशिष्ट गुण निहित किये हैं, वे ही उनके सोमरस कहाते हैं। उन गुणों से हम भी संयुक्त हों ॥४॥ इस मन्त्र की व्याख्या में विवरणकार माधव ने त्रित और आप्त्य ये पृथक्-पृथक् दो ऐतिहासिक ऋषियों के नाम माने हैं। भरतस्वामी के मत में आप्त का पुत्र कोई त्रित है। सायण के अनुसार आपः का पुत्र त्रित नाम का राजर्षि है। इनका पारस्परिक विरोध ही ऐतिहासिक पक्ष के अप्रामाण्य को प्रमाणित कर रहा है ॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
ए꣢दु꣣ म꣡धो꣢र्म꣣दि꣡न्त꣢रꣳ सि꣣ञ्चा꣡ध्व꣣र्यो꣣ अ꣡न्ध꣢सः । ए꣣वा꣢꣫ हि वी꣣र꣡स्तव꣢꣯ते स꣣दा꣡वृ꣢धः ॥३८५॥
पदार्थःहे (अध्वर्यो) यज्ञ-निष्पादन के इच्छुक मानव ! तू समाज, राष्ट्र और जगत् में (मधोः अन्धसः) मधुर ज्ञान-कर्म-उपासनारूप सोम के (मदिन्तरम्) अतिशय तृप्तिकारक रस को (इत्) निश्चय ही (आसिञ्च उ) सींच। (एव हि) इसी प्रकार (वीरः) वीर, (सदावृधः) सदा समृद्ध वह इन्द्र परमेश्वर (स्तवते) स्तुति किया जाता है ॥५॥
भावार्थःपरमेश्वर की स्तुति का यही मार्ग है कि स्तोता मधुरातिमधुर ज्ञान, कर्म, उपासना के रस को जगत् में प्रवाहित करे। सदा समृद्ध, पूर्णकाम परमेश्वर पत्र, पुष्प, फल आदि का उपहार नहीं चाहता ॥५॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
ए꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य सिञ्चत꣣ पि꣡बा꣢ति सो꣣म्यं꣡ मधु꣢꣯ । प्र꣡ राधा꣢꣯ꣳसि चोदयते महित्व꣣ना꣢ ॥३८६॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (इन्द्राय) परमैश्वर्ययुक्त जगत्पति परमात्मा के लिए (इन्दुम्) ज्ञान-कर्म-रूप सोमरस को (आ सिञ्चत) सींचो, समर्पित करो। वह (सोम्यम्) ज्ञान-कर्म-रूप सोम से युक्त (मधु) उपासनारूप मधु को (पिबाति) पीता है। इस प्रकार पूजा किया हुआ वह, पूजक को (महित्वना) अपनी महिमा से (राधांसि) सफलताएँ (चोदयते) प्रदान करता है ॥६॥
भावार्थःजैसे यज्ञ में सोमरस को मधु में मिलाकर होम करते हैं, वैसे ही हमें अपने ज्ञान-कर्मरूप सोमरस को उपासनारूप मधु में मिलाकर परमेश्वर के प्रति उसका होम करना चाहिए। उससे वह अपने उपासक को बल प्रदान करके उसे सफलता की सीढ़ी पर चढ़ा देता है ॥६॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
ए꣢तो꣣ न्वि꣢न्द्र꣣ꣳ स्त꣡वा꣢म꣣ स꣡खा꣢यः꣣ स्तो꣢म्यं꣣ न꣡र꣢म् । कृ꣣ष्टी꣡र्यो विश्वा꣢꣯ अ꣣भ्य꣢꣫स्त्येक꣣ इ꣢त् ॥३८७॥
पदार्थःहे (सखायः) मित्रो ! तुम (नु) शीघ्र ही (एत उ) आओ। हम-तुम मिलकर (स्तोम्यम्) स्तुति के योग्य, (नरम्) नेता, (इन्द्रम्) राजाधिराज परमेश्वर की (स्तवाम) उपासना करें, (यः) जो (एकः-इत्) अकेला ही (विश्वाः कृष्टीः) सब मानवी प्रजाओं से (अध्यस्ति) महिमा में अधिक है ॥७॥
भावार्थःजो अकेला होता हुआ भी करोड़ों-करोड़ों की संख्याओं में विद्यमान मनुष्यों से महिमा में अधिक है, उसी सकल ब्रह्माण्ड के अधीश्वर की सबको स्तुति और आराधना करनी चाहिए ॥७॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ सा꣡म꣢ गायत꣣ वि꣡प्रा꣢य बृह꣣ते꣢ बृ꣣ह꣢त् । ब्र꣣ह्मकृ꣡ते꣢ विप꣣श्चि꣡ते꣢ पन꣣स्य꣡वे꣢ ॥३८८॥
पदार्थःहे मित्रो ! तुम (विप्राय) विशेषरूप से क्षतिपूर्ति करनेवाले अथवा ब्राह्मण के समान श्रेष्ठ ज्ञान का उपदेश करनेवाले, (बृहते) महान् (ब्रह्मकृते) वेदकाव्य के रचयिता, (विपश्चिते) सकल विद्याओं में पारंगत, (पनस्यवे) दूसरों की प्रशंसा और कीर्ति चाहनेवाले (इन्द्राय) राजराजेश्वर परब्रह्म परमेश्वर के लिए (बृहत्) बहुत अधिक (साम गायत) सामगान करो ॥८॥
भावार्थःमन्त्रोक्त गुण-कर्म-स्वभाववाले, महामहिमाशाली, विराड् ब्रह्माण्ड के अधिपति परमेश्वर की सस्वर सामगान की विधि से सबको उपासना करनी चाहिए ॥८॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
य꣢꣫ एक꣣ इ꣢द्वि꣣द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ म꣡र्ता꣢य दा꣣शु꣡षे꣢ । ई꣡शा꣢नो꣣ अ꣡प्र꣢तिष्कुत꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ ॥३८९॥
पदार्थः(यः) जो (एकः इत्) एक ही है, और जो (दाशुषे मर्त्याय) अपना धन दूसरों के हित के लिए जिसने दान कर दिया है, ऐसे मनुष्य को (वसु) धन (विदयते) विशेष रूप से प्रदान करता है, (अङ्ग) हे भाई ! वह (ईशानः) सकल ब्रह्माण्ड का अधीश्वर (अप्रतिष्कुतः) किसी से प्रतिकार न किया जा सकनेवाला अथवा कभी न लड़खड़ानेवाला (इन्द्रः) इन्द्र नामक परमेश्वर है ॥९॥
भावार्थःपरमेश्वर एक ही है, उसके बराबर या उससे अधिक अन्य कोई नहीं है। धनदाता वह परोपकारार्थ धन का दान करनेवाले को अधिकाधिक धन प्रदान करता है ॥९॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
स꣡खा꣢य꣣ आ꣡ शि꣢षामहे꣣ ब्र꣡ह्मेन्द्रा꣢꣯य व꣣ज्रि꣡णे꣢ । स्तु꣣ष꣢ ऊ꣣ षु꣢ वो꣣ नृ꣡त꣢माय धृ꣣ष्ण꣡वे꣢ ॥३९०॥
पदार्थःहे (सखायः) मित्रो ! आओ, हम-तुम मिलकर (वज्रिणे) दुष्टों वा दुष्टवृत्तियों के प्रति दण्डधारी (इन्द्राय) जगत् के शासक परमात्मा के लिए (ब्रह्म) स्तोत्र को (आ शिषामहे) इच्छापूर्वक समर्पित करें। आगे प्रत्यक्ष स्तुति है—हे परमात्मन् ! (नृतमाय) वरिष्ठ नेता, (धृष्णवे) पापों को धर्षण करनेवाले, (वः) आपके लिए (सु स्तुषे उ) मैं भली-भाँति स्तुति करता हूँ ॥१०॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि परस्पर मिलकर सार्वजनिक रूप से राजराजेश्वर परमात्मा के लिए उसके महिमागानसम्बन्धी स्तुतिगीत गायें ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र जगदीश्वर के महिमागानपूर्वक उसके प्रति स्तोत्र अर्पित करने की प्रेरणा होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त ॥ यह चतुर्थ प्रपाठक समाप्त हुआ ॥ चतुर्थ अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
गृ꣣णे꣡ तदि꣢꣯न्द्र ते꣣ श꣡व꣢ उप꣣मां꣢ दे꣣व꣡ता꣢तये । य꣡द्धꣳसि꣢꣯ वृ꣣त्र꣡मोज꣢꣯सा शचीपते ॥३९१॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्नों के विदारणकर्ता परमात्मन् ! मैं (देवतातये) उपासना-यज्ञ की पूर्ति के लिए, (ते) आपके (उपमाम्) सबके उपमानभूत, (तत्) उस सर्वविदित (शवः) बल की (गृणे) प्रशंसा करता हूँ, (यत्) क्योंकि, हे (शचीपते) अतिशय कर्मशूर परमेश ! आप (ओजसा) अपने तेजोयुक्त बल से (वृत्रम्) पाप के अन्धकार को अथवा योगसाधना के बीच में आये व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन आदि विघ्नसमूह को (हंसि) विनष्ट कर देते हो ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के बल की प्रशंसा से स्वयं भी बलवान् होकर जीवनमार्ग में अथवा योगमार्ग में आये हुए सब विघ्नों और शत्रुओं को विनष्ट कर हम परमसिद्धि को प्राप्त करें ॥१॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
य꣢स्य꣣ त्य꣡च्छम्ब꣢꣯रं꣣ म꣢दे꣣ दि꣡वो꣢दासाय र꣣न्ध꣡य꣢न् । अ꣣य꣡ꣳ स सोम꣢꣯ इन्द्र ते सु꣣तः꣡ पिब꣢꣯ ॥३९२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्नविदारक परमात्मन् ! (यस्य) जिस पुरुषार्थमिश्रित भक्तिरूप सोमरस के (मदे) हर्ष में (दिवोदासाय) मन आदि को प्रकाश देनेवाले जीवात्मा की सहायता के लिए, आप (शम्बरम्) योगमार्ग में आये आनन्द और शान्ति के आच्छादक विघ्नसमूह को (रन्धयन्) विनष्ट करते हुए (त्यत्) प्रसिद्ध वीर कर्म को करते हो, (अयं सः) यह वह (सोमः) पुरुषार्थमिश्रित भक्तिरस (ते) आपके लिए (सुतः) अभिषुत है, उसका (पिब) पान करो ॥२॥
भावार्थःपुरुषार्थपूर्ण भक्ति से आराधना किया गया परमेश्वर योगसाधक के मार्ग में आये हुए सब विघ्नों का निराकरण करके योगसिद्धि प्रदान करता है ॥२॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
ए꣡न्द्र꣢ नो गधि प्रिय꣣ स꣡त्रा꣢जिदगोह्य । गि꣣रि꣢꣫र्न वि꣣श्व꣡तः꣢ पृ꣣थुः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥३९३॥
पदार्थःहे (प्रिय) प्रिय, (सत्राजित्) सत्य से असत्य पर विजय पानेवाले, (अगोह्य) छिपाये न जा सकनेवाले, किन्तु प्रकट हो जानेवाले (इन्द्र) परमात्मन् ! आप (नः) हमारे समीप (आ गधि) आओ। आप (गिरिः न) पर्वत के सदृश (विश्वतः पृथुः) सबसे विशाल और (दिवः पतिः) सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, विद्युत् आदि से जगमगाते हुए जगत् के अधिपति हो ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःचर्म-चक्षुओं से अदृश्य भी परमेश्वर संसार में दिखायी देनेवाले अपने सत्य नियमों से और योगाभ्यासों से सबके सम्मुख प्रकट हो जाता है। आकाश को चूमनेवाले विस्तीर्ण पहाड़ के समान विशाल, सर्वव्यापक, सब ज्योतिष्मान् पदार्थों को ज्योति देनेवाला वह सब जनों से उपासना करने योग्य है ॥३॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
य꣡ इ꣢न्द्र सोम꣣पा꣡त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ शविष्ठ꣣ चे꣡त꣢ति । ये꣢ना꣣ ह꣢ꣳसि न्या꣢꣯३꣱त्रिणं त꣡मी꣢महे ॥३९४॥
पदार्थःहे (शविष्ठ) बलिष्ठ (इन्द्र) शत्रुविदारक परमात्मन्, जीवात्मन् वा सेनाध्यक्ष ! (यः) जो आप (सोमपातमः) अतिशय वीररस का पान करनेवाले हो, उन आपका (मदः) वीरताजनित हर्ष (चेतति) सदा जागता रहता है। आप (येन) अपने जिस पराक्रम से (अत्रिणम्) भक्षक शत्रु को (निहंसि) निःशेष रूप से विनष्ट कर देते हो (तम्) उस पराक्रम की, हम भी आपसे (ईमहे) याचना करते हैं ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजैसे वीर परमात्मा और जीवात्मा वीररस से उत्साहित होकर सब कामक्रोधादिरूप, विघ्नरूप और पापरूप भक्षक राक्षसों को विनष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार राष्ट्र में वीर सेनापति सब आक्रान्ता रिपुओं को अपने पराक्रम से दण्डित करे। वैसा वीररस और पराक्रम सब प्रजाजनों को भी प्राप्त करना चाहिए ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -आदित्याः| स्वर - ऋषभः
तु꣣चे꣡ तुना꣢꣯य꣣ त꣢꣫त्सु नो꣣ द्रा꣡घी꣢य꣣ आ꣡यु꣢र्जी꣣व꣡से꣢ । आ꣡दि꣢त्यासः समहसः कृ꣣णो꣡त꣢न ॥३९५॥
पदार्थःहे (समहसः) तेजस्वी (आदित्यासः) आदित्य के समान ज्ञानप्रकाश से भासमान ब्रह्मवित् ब्राह्मणो ! अथवा हे मेरे प्राणो ! तुम (तुचे) सन्तान के लिए, (तुनाय) धन के लिए और (जीवसे) उत्कृष्ट जीवन के लिए (तत्) उस, अन्य प्राणियों से विलक्षण (नः आयुः) हमारी आयु को (द्राघीयः) अधिक लम्बी (सु कृणोतन) सुचारू रूप से कर दो ॥ सन्तान दो प्रकार की होती है, भौतिक और मानस। पुत्र, पुत्री आदि भौतिक तथा नवीन ज्ञान-विज्ञानादि मानस सन्तान कहलाती है। धन भी द्विविध होता है, भौतिक और आध्यात्मिक। चाँदी, सोना, कपड़ा, धान्य, मुद्रा आदि भौतिक धन तथा अहिंसा, सत्य, न्याय, योगसिद्धि आदि आध्यात्मिक धन कहाता है। उत्कृष्ट जीवन भी दो प्रकार का होता है, बाह्य और आध्यात्मिक। भौतिक सुख-सम्पदा आदि से पूर्ण जीवन बाह्य और अध्यात्म-पथ का पथिक जीवन आध्यात्मिक कहाता है। यह सब हमारे लिए सुलभ हो, एतदर्थ लम्बी आयु की प्रार्थना की गयी है ॥५॥ इस मन्त्र में ‘तुना, तन’ में छेकानुप्रास अलङ्कार है। त्, स् और न् की पृथक्-पृथक् अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥५॥
भावार्थःप्राणायाम से और विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा उपदेश किये गये मार्ग का अनुसरण करने से हमारी आयु अधिक लम्बी हो सकती है। अधिक लम्बी आयु प्राप्त कर अपनी रुचि के अनुसार प्रेय-मार्ग या श्रेय-मार्ग में हमें पग रखना चाहिए ॥५॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
वे꣢त्था꣣ हि꣡ निरृ꣢꣯तीनां꣣ व꣡ज्र꣢हस्त परि꣣वृ꣡ज꣢म् । अ꣡ह꣢रहः शु꣣न्ध्युः꣡ प꣢रि꣣प꣡दा꣢मिव ॥३९६॥
पदार्थःहे (वज्रहस्त) शस्त्रास्त्रपाणि वीर राजन् या सेनापति, अथवा शस्त्रास्त्रधारी वीरपुरुष के समान पाप आदि विघ्नों का दलन करने में समर्थ पराक्रमशाली परमात्मन् ! (शुन्ध्युः) राष्ट्र के अथवा मन के शोधक आप (निर्ऋतीनाम्) पापों, कुनीतियों, कष्टों, अकालमृत्युओं अथवा शत्रुसेनाओं के (अहरहः) प्रतिदिन (परिवृजम्) परिहार को (वेत्थ हि) निश्चय ही जानते हो, (शुन्ध्युः) शोधक सूर्य (अहरहः) प्रतिदिन (परिपदाम् इव) जैसे चारों ओर व्याप्त अन्धकारों या रोगों का परिहार करना जानता है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजैसे शोधक सूर्य तमोजाल, रोग, मालिन्य आदियों को दूर करता है, वैसे ही परमेश्वर संसार के पाप, कुनीति, कष्ट आदि का विनाश करता है। उसी प्रकार राजा और सेनापति को भी चाहिए कि राष्ट्र से पाप, दुराचार, अकालमृत्यु, शत्रुसेना आदियों का प्रयत्न से निवारण करे ॥६॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -आदित्याः| स्वर - ऋषभः
अ꣡पामी꣢꣯वा꣣म꣢प꣣ स्रि꣢ध꣣म꣡प꣢ सेधत दुर्म꣣ति꣢म् । आ꣡दि꣢त्यासो यु꣣यो꣡त꣢ना नो꣣ अ꣡ꣳह꣢सः ॥३९७॥
पदार्थःहे (आदित्यासः) शरीरस्थ प्राणो, राष्ट्रस्थ क्षत्रिय राजपुरुषो अथवा आदित्य ब्रह्मचारियो ! तुम शरीर, समाज और राष्ट्र से (अमीवाम्) रोग को (अप) दूर करो, (स्रिधम्) हिंसावृत्ति, शत्रुकृत हिंसा और हिंसक को (अप) दूर करो, तथा (दुर्मतिम्) कुमति को (अप सेधत) दूर करो। साथ ही (नः) हमें (अंहसः) पाप से (युयोतन) पृथक् करो ॥७॥
भावार्थःप्राणायाम से, क्षत्रिय राजपुरुषों के कर्तव्यपालन से और आदित्य ब्रह्मचारियों के प्रयत्न से राष्ट्र से यथायोग्य रोग, हिंसावृत्तियाँ, शत्रुकृत हिंसा-उपद्रव आदि तथा पाप दूर किये जा सकते हैं ॥७॥
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छन्द -त्रिपदा विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
पि꣢बा꣣ सो꣡म꣢मिन्द्र꣣ म꣡न्द꣢तु त्वा꣣ यं꣡ ते꣢ सु꣣षा꣡व꣢ हर्य꣣श्वा꣡द्रिः꣢ । सो꣣तु꣢र्बा꣣हु꣢भ्या꣣ꣳ सु꣡य꣢तो꣣ ना꣡र्वा꣢ ॥३९८॥
पदार्थःप्रथम—राष्ट्र के पक्ष में। हे (हर्यश्व) वेगवान् घोड़ों के स्वामी (इन्द्र) शत्रुविदारक सेनापति वा राजन् ! तुम (सोमम्) सोमादि ओषधियों के वीरताप्रदायक रस को (पिब) पान करो, वह रस (त्वा) तुम्हें (मन्दतु) उत्साहित करे। (यम्) जिस रस को, (सोतुः) रथचालक की (बाहुभ्याम्) बाहुओं से (सुयतः) सुनियन्त्रित (अर्वा न) घोड़े के समान, (सोतुः) रस निकालनेवाले के (बाहुभ्याम्) हाथों से (सुयतः) सुनियन्त्रित (अद्रिः) सिलबट्टे रूप साधन ने (ते) तुम्हारे लिए (सुषाव) कूट-पीस कर अभिषुत किया है ॥ द्वितीय—अध्यात्म पक्ष में। हे (हर्यश्व) ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय रूप अश्वों के स्वामी (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! तू (सोमम्) ज्ञानरस और कर्मरस को (पिब) पान कर, वह ज्ञान और कर्म का रस (त्वा) तुझे (मन्दतु) आनन्दित करे, (यम्) जिस ज्ञान और कर्म के रस को (सोतुः) रथ-प्रेरक सारथि की (बाहुभ्याम्) बाहुओं से (सुयतः) सुनियन्त्रित (अर्वा न) घोड़े की तरह (सुयतः) सुनियन्त्रित (अद्रिः) विदीर्ण न होनेवाले तेरे मन ने (ते) तेरे लिए (सुषाव) उत्पन्न किया है ॥८॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमा और श्लेष अलङ्कार है ॥८॥
भावार्थःपुष्टिप्रद सोमादि ओषधियों का रस पीकर राष्ट्र के सैनिक, सेनापति और राजा सुवीर होकर शत्रुओं को पराजित करें। इसी प्रकार राष्ट्र के सब स्त्री-पुरुष मन के माध्यम से ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अर्जित ज्ञान-रस का तथा कर्मेन्द्रियों द्वारा अर्जित कर्म-रस का पान कर परम ज्ञानी और परम पुरुषार्थी होते हुए ऐहिक तथा पारलौकिक उत्कर्ष को सिद्ध करें ॥८॥ इस दशति में इन्द्र के बल-पराक्रम का वर्णन होने से, इन्द्र से सम्बद्ध आदित्यों से दीर्घायु-प्राप्ति तथा रोग, दुर्मति आदि के दूरीकरण की याचना होने से और सोमपानार्थ इन्द्र का आह्वान होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में प्रथम अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
अ꣣भ्रातृव्यो꣢ अ꣣ना꣡ त्वमना꣢꣯पिरिन्द्र ज꣣नु꣡षा꣢ स꣣ना꣡द꣢सि । यु꣣धे꣡दा꣢पि꣣त्व꣡मि꣢च्छसे ॥३९९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगत् के उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कर्ता परमात्मन् ! तुम (सनात्) सनातन काल से (जनुषा) स्वभावतः (अभ्रातृव्यः) शत्रु-रहित, (अना) नेता-रहित और (अनापिः) अबन्धु (असि) हो। (युधा इत्) युद्ध से ही (आपित्वम्)बन्धुत्व को (इच्छसे) चाहते हो, अर्थात् जो आन्तरिक तथा बाह्य देवासुरसंग्रामों में विजयी होता है, उसी के तुम बन्धु होते हो ॥१॥ इस मन्त्र में अना, मना, सना में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है। ‘त्वम, त्वमि’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःजिससे शत्रुता ठानने का कोई साहस नहीं करता और जिसका नेतृत्व करनेवाला कोई नहीं है, वह महान् जगदीश्वर पुरुषार्थियों का ही बन्धु बनता है, अकर्मण्यों का नहीं ॥१॥
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छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
यो꣡ न꣢ इ꣣द꣡मि꣢दं पु꣣रा꣡ प्र वस्य꣢꣯ आनि꣣ना꣢य त꣡मु꣢ व स्तुषे । स꣡खा꣢य꣣ इ꣡न्द्र꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥४००॥
पदार्थः(यः) जो इन्द्र जगदीश्वर (पुरा) पहले, सृष्टि के आदि में (इदम्-इदम्) इस सब अग्नि, सूर्य, वायु, विद्युत्, बादल, नदी, सागर, चाँदी, सोना आदि (वस्यः) अतिशय निवासक पदार्थ-समूह को (नः) हमारे-तुम्हारे लिए (आ निनाय) लाया था, (तम् उ) उसी (इन्द्रम्) जगदीश्वर की, हे (सखायः) मित्रो ! मैं (वः) तुम्हारी और अपनी (ऊतये) रक्षा के लिए (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥२॥
भावार्थःअनेक बहुमूल्य पदार्थ निःशुल्क ही सबको देनेवाले ब्रह्माण्ड के अधिपति परमेश्वर की सबको कृतज्ञतापूर्वक आराधना करनी चाहिए ॥२॥
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छन्द -ककुप्| देवता -मरुतः| स्वर - ऋषभः
आ꣡ ग꣢न्ता꣣ मा꣡ रि꣢षण्यत꣣ प्र꣡स्था꣢वानो꣣ मा꣡प꣢ स्थात समन्यवः । दृ꣣ढा꣡ चि꣢द्यमयिष्णवः ॥४०१॥
पदार्थःप्रथम—सैनिकों के पक्ष में। युद्ध उपस्थित होने पर राष्ट्र के सैनिकों को पुकारा जा रहा है। हे (प्रस्थावानः) रण-प्रस्थान करनेवाले वीर सैनिको ! तुम शत्रुओं से युद्ध करने के लिए (आ गन्त) आओ, न आकर (मा रिषण्यत) राष्ट्र की क्षति मत करो। हे (समन्यवः) मन्युवालो ! हे (दृढा चित्) दृढ रिपुदलों को भी (यमयिष्णवः) रोकने में समर्थ वीरो ! तुम (मा अपस्थात) युद्ध से अलग मत रहो ॥ द्वितीय—प्राणों के पक्ष में। पूरक-कुम्भक-रेचक आदि की विधि से प्राणायाम का अभ्यास करता हुआ योगसाधक प्राणों को सम्बोधित कर रहा है। हे (प्रस्थावानः) प्राणायाम के लिए प्रस्थित मेरे प्राणो ! तुम (आ गन्त) रेचक प्राणायाम से बाहर जाकर पूरक प्राणायाम के द्वारा पुनः अन्दर आओ, (मा रिषण्यत) हमारे स्वास्थ्य की हानि मत करो। हे (समन्यवः) तेजस्वी प्राणो !(दृढा चित्) दृढ़ता से शरीर में बद्ध भी रोग, मलिनता आदियों को (यमयिष्णवः) दूर करने में समर्थ प्राणो ! तुम (मा अपस्थात) शरीर से बाहर ही स्थित मत हो जाओ, किन्तु पूरक, कुम्भक, रेचक और स्तम्भवृत्ति के व्यापारों द्वारा मेरी प्राणसिद्धि कराओ। भाव यह है कि हम प्राणायाम से विरत न होकर नियम से उसके अभ्यास द्वारा प्रकाश के आवरण का क्षय करके धारणाओं में मन की योग्यता सम्पादित करें ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःशत्रुओं से राष्ट्र के आक्रान्त हो जाने पर वीर योद्धाओं को चाहिए कि शत्रुओं को दिशाओं में इधर-उधर भगाकर या धराशायी करके राष्ट्र की कीर्ति को दिग्दिगन्त में फैलायें। इसी प्रकार रोग, मलिनता आदि से शरीर के आक्रान्त होने पर प्राण पूरक, कुम्भक आदि के क्रम से शरीर के स्वास्थ्य का विस्तार कर आयु को लम्बा करें ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
आ꣡ या꣢ह्य꣣य꣢꣫मिन्द꣣वे꣡ऽश्व꣢पते꣣ गो꣡प꣢त꣣ उ꣡र्व꣢रापते । सो꣡म꣢ꣳ सोमपते पिब ॥४०२॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (अश्वपते) घोड़ों के अथवा अश्व नाम से प्रसिद्ध अग्नि, बादल आदि के अधीश्वर, (गोपते) गाय पशुओं के अथवा सूर्यकिरणों के अधीश्वर, (उर्वरापते) उपजाऊ भूमियों के अधीश्वर इन्द्र परमात्मन् ! (अयम्) यह आप (इन्दवे) आनन्दरस के प्रवाह के लिए (आ याहि) आओ, मेरे हृदय में प्रकट होवो। हे (सोमपते) मेरे मनरूप चन्द्रमा के अधीश्वर ! आप (सोमम्) मेरे श्रद्धारस का (पिब) पान करो ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। हे (अश्वपते) इन्द्रिय रूप घोड़ों के स्वामी, (गोपते) वाणियों और प्राणों के स्वामी, (उर्वरापते) ऋद्धि-सिद्धि की उपजाऊ बुद्धि के स्वामी मेरे अन्तरात्मन् ! (अयम्) यह तू (इन्दवे) परमेश्वरोपासना का आनन्द पाने के लिए (आ याहि) तैयार हो। हे (सोमपते) मन के स्वामी ! तू (सोमम्) ब्रह्मानन्द-रस का (पिब) पान कर ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, ‘पते’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास और ‘सोम’ की आवृत्ति में यमक है ॥४॥
भावार्थःजो जीवात्मा शरीरस्थ मन, बुद्धि, प्राण, चक्षु, श्रोत्र आदि का तथा ज्ञान, कर्म आदि का अधिष्ठाता है, उसे चाहिए कि नित्य जगदीश्वर की उपासना से ब्रह्मानन्द-रस को प्राप्त करे ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त्व꣡या꣢ ह स्विद्यु꣣जा꣢ व꣣यं꣡ प्रति꣢꣯ श्व꣣स꣡न्तं꣢ वृषभ ब्रुवीमहि । स꣣ꣳस्थे꣡ जन꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢तः ॥४०३॥
पदार्थःहे (वृषभ) मनोरथों को पूर्ण करनेवाले परमात्मन् ! (गोमतः जनस्य) ज्ञान-किरणों अथवा अध्यात्म-किरणों से युक्त आत्मा के (संस्थे) उपासना-यज्ञ में अथवा देवासुरसंग्राम में (श्वसन्तम्) हमारी हिंसा करने के लिए तैयार व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि तथा दुःख, दौर्मनस्य आदि विघ्न-समूह का (त्वया ह स्वित्) तुझ ही (युजा) सहायक के द्वारा, हम (प्रति ब्रुवीमहि) प्रतिकार करें ॥ राज-प्रजा पक्ष में भी योजना करनी चाहिए। गोपालक प्रजाजनों की गौओं को चुराने का यदि कोई प्रयत्न करे, तो राजकीय सहायता से युद्ध में उसका प्रतिकार करना उचित है ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःअध्यात्म-प्रकाश से युक्त आत्मा को जो पुनः मोहान्धकार में डालना चाहते हैं, उनका परमेश्वर की सहायता से बलपूर्वक प्रतिरोध करना चाहिए। इसी प्रकार गो-सेवकों की गायों का वध करने की जो चेष्टा करते हैं, उन पर राजदण्ड और प्रजादण्ड गिराना चाहिए ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -मरुतः| स्वर - ऋषभः
गा꣡व꣢श्चिद्घा समन्यवः सजा꣣꣬त्ये꣢꣯न म꣣रु꣢तः꣣ स꣡ब꣢न्धवः । रि꣣ह꣡ते꣢ क꣣कु꣡भो꣢ मि꣣थः꣢ ॥४०४॥
पदार्थःहे (समन्यवः) तेजस्वी (गावः) स्तोता ब्राह्मणो ! (सजात्येन) समान जातिवाला होने से (मरुतः) क्षत्रिय योद्धाजन (चिद् घ) निश्चय ही (सबन्धवः) तुम्हारे सबन्धु हैं, जो (मिथः) परस्पर मिलकर, युद्ध में (ककुभः) दिशाओं को (रिहते) व्याप्त करते हैं, अर्थात् सब दिशाओं में फैलकर शत्रु के साथ लड़कर राष्ट्र की रक्षा करते हैं। अथवा जो क्षत्रिय (मिथः) तुम ब्राह्मणों के साथ मिलकर (ककुभः) ककुप् छन्दोंवाली प्रस्तुत दशति की ऋचाओं का (रिहते) पाठ तथा अर्थज्ञानपूर्वक आस्वादन करते हैं ॥५ प्रस्तुत दशति में ककुब् उष्णिक् छन्द है, जिसमें प्रथम और तृतीय पाद आठ-आठ अक्षर के तथा मध्य का द्वितीय पाद बारह अक्षर का होता है ॥६॥
भावार्थःस्तोता ब्राह्मण और रक्षक क्षत्रिय दोनों ही राष्ट्र के अनिवार्य अङ्ग हैं। जैसे ब्राह्मण विद्यादान से क्षत्रियों का उपकार करते हैं, वैसे ही युद्ध उपस्थित होने पर क्षत्रिय लोग दिशाओं को व्याप्त कर, शत्रुओं को पराजित कर ब्राह्मणों का उपकार करते हैं। इसलिए ब्राह्मणों और क्षत्रियों को राष्ट्र में भ्रातृभाव से रहना चाहिए ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त्वं꣡ न꣢ इ꣣न्द्रा꣡ भ꣢र꣣ ओ꣡जो꣢ नृ꣣म्ण꣡ꣳ श꣢तक्रतो विचर्षणे । आ꣢ वी꣣रं꣡ पृ꣢तना꣣स꣡ह꣢म् ॥४०५॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) बहुत ज्ञानी, बहुत कर्मों को करनेवाले, (विचर्षणे) विशेष द्रष्टा (इन्द्र) वीर, परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर वा राजन् ! (त्वम्) आप (नः) हमें (ओजः) ब्रह्मवर्चस, और (नृम्णम्) धन (आभर) प्रदान कीजिए। साथ ही (पृतनासहम्) शत्रुसेनाओं को पराजित करनेवाला (वीरम्) वीर योद्धा (आभर) प्रदान कीजिए ॥७॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से और राजा के प्रयत्न से हमारे राष्ट्र में ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण, शूरवीर क्षत्रिय और धनी वैश्य उत्पन्न हों और सब प्रजाजन भी बलवान्, धनवान् तथा वीर पुत्रोंवाले हों ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
अ꣢धा꣣꣬ ही꣢꣯न्द्र गिर्वण꣣ उ꣡प꣢ त्वा꣣ का꣡म꣢ ई꣣म꣡हे꣢ ससृ꣣ग्म꣡हे꣢ । उ꣣दे꣢व꣣ ग्म꣡न्त꣢ उ꣣द꣡भिः꣢ ॥४०६॥
पदार्थःहे (गिर्वणः) स्तुतिवाणियों से संसेवनीय (इन्द्र) परमधनी परमेश्वर ! (अध हि) इस समय, हम (कामे) मनोरथों की पूर्ति हेतु (त्वा) आपको (उप ईमहे) समीपता से प्राप्त करते हैं, तथा (ससृग्महे) आपसे संसर्ग करते हैं (उदा इव) जैसे जलमार्ग से (ग्मन्तः) जाते हुए लोग (उदभिः) जलों से संसर्ग को प्राप्त करते हैं ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘महे’ की आवृत्ति में यमक और ‘उदे, उद’ में छेकानुप्रास है ॥८॥
भावार्थःजैसे नदी के कम गहराईवाले जल को पैरों से चलकर और गहरे जल को तैरकर पार करते हुए लोग जल के संसर्ग को प्राप्त होते हैं और गीले हो जाते हैं, वैसे ही परमेश्वर के समीप पहुँच हम उससे संसृष्ट होकर उसके संसर्ग द्वारा प्राप्त आनन्दरस से सराबोर हो जाएँ ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
सी꣡द꣢न्तस्ते꣣ व꣢यो꣣ य꣢था꣣ गो꣡श्री꣢ते꣣ म꣡धौ꣢ मदि꣣रे꣢ वि꣣व꣡क्ष꣢णे । अ꣣भि꣡ त्वामि꣢꣯न्द्र नोनुमः ॥४०७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) मधुवर्षक परमेश्वर ! (वयः यथा) पक्षियों के समान अर्थात् जैसे जलचर पक्षी जलाशय में एकत्र होते हैं वैसे, हम (ते) आपके (गोश्रीते) गोदुग्ध के समान पवित्र अन्तःप्रकाश से मिश्रित, (मदिरे) हर्षजनक, (विवक्षणे) मुक्ति प्राप्त करानेवाले (मधौ) आनन्दरूप सोमरस में (सीदन्तः) समवेत होकर बैठते हुए (त्वाम् अभि) आपको लक्ष्य करके (नोनुमः) अतिशय पुनः-पुनः स्तुति करते हैं ॥९॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःजल-पक्षी जैसे जल के ऊपर मिलकर बैठते हैं और क्रें क्रें करते हैं, वैसे ही प्रेमरसघन परमात्मा के आनन्दरस में समवेत होकर उसके उपासक लोग उसे लक्ष्य कर पुनः- पुनः स्तुतिगीत गाते हैं। जैसे सोमरस में गाय का दूध मिलाया जाता है, वैसे ही परमात्मा के आनन्दरस में दिव्यप्रकाश का संमिश्रण है, यह जानना चाहिए ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
व꣣य꣢मु꣣ त्वा꣡म꣢पूर्व्य स्थू꣣रं꣢꣫ न कच्चि꣣द्भ꣡र꣢न्तोऽव꣣स्य꣡वः꣢ । व꣡ज्रि꣢ञ्चि꣣त्र꣡ꣳ ह꣢वामहे ॥४०८॥
पदार्थःहे (अपूर्व्य) अपूर्व गुण-कर्म-स्वभाववाले, (वज्रिन्) शस्त्रधारी के समान दोषनाशक परमेश्वर आचार्य वा वैद्यराज ! (कच्चित्) किसी (स्थूरं न) स्थूल गढ़े आदि के समान (स्थूरम्) मन, चक्षु आदि के स्थूल छिद्र को (भरन्तः) भरना चाहते हुए (अवस्यवः) रक्षा के इच्छुक (वयम्) हम (चित्रम्) पूज्य (त्वाम्) आपको (हवामहे) पुकारते हैं ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःजैसे विशाल निर्जल अन्धे कुएँ आदि को भरना चाहते हुए लोग सहायक मित्रों को बुलाते हैं, वैसे ही मन, चक्षु आदियों के रोगरूप या अशक्तिरूप छिद्र को भरने के लिए परमेश्वर, आचार्य वा वैद्य की सहायता पानी चाहिए ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र का महत्त्व वर्णित होने से, उसकी स्तुति होने से, उसका आह्वान होने से और उससे बल-धन आदि की याचना होने से तथा इन्द्र नाम से राजा, आचार्य, वैद्य आदि के भी कर्तव्य का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में प्रथम अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में छठा खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
स्वा꣣दो꣢रि꣣त्था꣡ वि꣢षू꣣व꣢तो꣣ म꣡धोः꣢ पिबन्ति गौ꣣꣬र्यः꣢꣯ । या꣡ इन्द्रे꣢꣯ण स꣣या꣡व꣢री꣣र्वृ꣢ष्णा꣣ म꣡द꣢न्ति शो꣣भ꣢था꣣ व꣢स्वी꣣र꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥४०९॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्मपक्ष में। (गौर्यः) सात्त्विक चित्तवृत्तियाँ (इत्था) सचमुच (वि-सुवतः) ब्रह्मानन्द को विशेषरूप से अभिषुत करनेवाले जीवात्मा से (स्वादोः) स्वादु (मधोः) मधुर ब्रह्मानन्द-रस का (पिबन्ति) पान करती हैं, (वृष्णा) आनन्दवर्षक (इन्द्रेण) जीवात्मा के (सयावरीः) साथ गति करनेवाली (वस्वीः) सद्गुणों की निवासक (याः) जो चित्तवृत्तियाँ (स्वराज्यम् अनु) आत्मिक स्वराज्य के अनुकूल होकर (शोभथा) शुभ प्रकार से (मदन्ति) हृष्ट होती हैं ॥ द्वितीय—राष्ट्रपक्ष में। (गौर्यः) उद्यमवाली सेनाएँ (इत्था) सत्य ही (वि-सुवतः) विशेषरूप से वीरता की प्रेरणा देनेवाले सेनापति से (स्वादोः) स्वादु (मधोः) मधुर वीररस का (पिबन्ति) पान करती हैं, (वृष्णा) शस्त्रास्त्रवर्षक (इन्द्रेण) शत्रुविदारक सेनापति के (सयावरीः) साथ युद्ध में प्रयाण करनेवाली (वस्वीः) अपनी शूरता से राष्ट्र की निवासक (याः) जो सेनाएँ (स्वराज्यम् अनु) स्वराज्य स्थापित करके (शोभथा) शोभा के साथ (मदन्ति) विजयोल्लास मनाती हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे जीवात्माओं को परमात्मा के साथ मेल करके ब्रह्मानन्द को अभिषुत कर, मन, प्राण, इन्द्रिय आदियों के साथ स्वराज्य की अर्चना करनी चाहिए, वैसे ही सेनाओं को शूरता प्राप्त कर सेनापति के साथ सहयोग करके विजय प्राप्त कर स्वराज्य को बढ़ाना चाहिए ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
इ꣣त्था꣢꣫ हि सोम꣣ इ꣢꣫न्मदो꣣ ब्र꣡ह्म꣢ च꣣का꣢र꣣ व꣡र्ध꣢नम् । श꣡वि꣢ष्ठ वज्रि꣣न्नो꣡ज꣢सा पृथि꣣व्या꣡ निः श꣢꣯शा꣣ अ꣢हि꣣म꣢र्च꣣न्न꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥४१०॥
पदार्थः(इत्था हि) सचमुच (सोमः) ब्रह्मानन्दरस अथवा वीररस (इत्) निश्चय ही (मदः) हर्षकारी होता है, उससे (ब्रह्म) जीवात्मा वा राजा (वर्धनम्) उन्नति (चकार) करता है। उससे अनुप्राणित होकर हे (शविष्ठ) बलिष्ठ, (वज्रिन्) दुष्टताओं वा दुष्टों पर वज्र-प्रहार करनेवाले जीवात्मन् वा राजन् ! तू (स्वराज्यम्) स्वराज्य की (अनु अर्चन्) अनुकूल अर्चना करता हुआ (ओजसा) अपने बल द्वारा (पृथिव्याः) शरीर से अर्थात् शरीरवर्ती मन, बुद्धि, प्राण व इन्द्रियों से तथा राष्ट्रभूमि से (अहिम्) दुःसंकल्पादिरूप, पापरूप, रोगादिरूप, लुटेरे-चोर-ठग आदि रूप और शत्रुरूप असुर को (निःशशाः) बाहर निकाल दे ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःशरीर में आत्मा और राष्ट्र में राजा ब्रह्मानन्द-रस और वीर-रस का पान कर शरीर और राष्ट्र के शत्रुओं को निःशेष करके वाणी के निर्घोष तथा दुन्दुभिघोष के साथ स्वराज्य की अर्चना करें ॥२॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
इ꣢न्द्रो꣣ म꣡दा꣢य वावृधे꣣ श꣡व꣢से वृत्र꣣हा꣡ नृभिः꣢꣯ । त꣢꣯मिन्म꣣ह꣢त्स्वा꣣जि꣢षू꣣ति꣡मर्भे꣢꣯ हवामहे꣣ स꣡ वाजे꣢꣯षु꣣ प्र꣡ नो꣢ऽविषत् ॥४११॥
पदार्थः(वृत्रहा) शत्रुहन्ता (इन्द्रः) वीर परमात्मा, जीवात्मा, राजा वा सेनापति (मदाय) हर्ष प्रदान के लिए, और (शवसे) बल के कर्म करने के लिए (नृभिः) मनुष्यों द्वारा (वावृधे) बढ़ाया या प्रोत्साहित किया जाता है। (तम् इत्) उसी (ऊतिम्) रक्षक को (महत्सु आजिषु) बड़े युद्धों में, और (अर्भे) छोटे युद्ध में, हम (हवामहे) पुकारते हैं। (सः) वह (वाजेषु) युद्धों में (नः) हमारी (प्र अविषत्) उत्तमता से रक्षा करे ॥३॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःआनन्द, आत्मबल और शारीरिक बल को पाने के लिए परमात्मा को स्तुति से, जीवात्मा को उत्कृष्ट उद्बोधन से तथा राजा और सेनापति को जयकार से हर्षित करना चाहिए। साधारण या विकट आन्तरिक और बाह्य देवासुरसंग्राम में वे ही हमारे सहायक होते हैं ॥३॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
इ꣢न्द्र꣣ तु꣢भ्य꣣मि꣡दद्रि꣣वो꣡ऽनु꣢त्तं वज्रिन्वी꣣꣬र्य꣢꣯म् । य꣢꣯द्ध꣣ त्यं꣢ मा꣣यि꣡नं꣢ मृ꣣गं꣢꣫ तव꣣ त्य꣢न्मा꣣य꣡याव꣢꣯धी꣣र꣢र्च꣣न्न꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥४१२॥
पदार्थःहे (अद्रिवः) मेघयुक्त अन्तरिक्ष के तुल्य विद्यमान अर्थात् मेघयुक्त अन्तरिक्ष जैसे जल बरसाता है, वैसे सुख बरसानेवाले, (वज्रिन्) शत्रुओं को दण्ड देनेवाले (इन्द्र) परमात्मन्, जीवात्मन्, राजन् और सेनापते ! (तुभ्यम् इत्) तेरा ही (अ-नुत्तम्) शत्रुओं से अप्रतिहत (वीर्यम्) शौर्य है। (यत्) जो, तू (स्वराज्यम् अनु) स्वराज्य के अनुकूल (अर्चन्) कर्म करता हुआ (त्यम्) उस कुख्यात (मायिनम्) छलादिदोषयुक्त, (मृगम्) पशुतुल्य शत्रु को (मायया) कौशल से (अवधीः) मार गिराता है, (त्यत्) वह कर्म (तव) तेरा ही है, अन्य कोई उस कर्म को नहीं कर सकता ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥४॥
भावार्थःपरमात्मा को स्मरण कर और जीवात्मा, राजा तथा सेनापति को उद्बोधन देकर, उनके द्वारा समस्त आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं का उन्मूलन करके सबको आत्मा और राष्ट्र के स्वराज्य का उपभोग करना चाहिए ॥४॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
प्रे꣢ह्य꣣भी꣡हि꣢ धृष्णु꣣हि꣢꣫ न ते꣣ व꣢ज्रो꣣ नि꣡ य꣢ꣳसते । इ꣡न्द्र꣢ नृ꣣म्ण꣢꣫ꣳहि ते꣣ श꣢वो꣣ ह꣡नो꣢ वृ꣣त्रं꣡ जया꣢꣯ अ꣣पो꣢ऽर्च꣣न्न꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥४१३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन्, राजन् वा सेनापते ! तू (प्रेहि) आगे बढ़ (अभीहि) आक्रमण कर, (धृष्णुहि) शत्रुओं का पराभव कर। (ते) तेरे (वज्रः) वज्रतुल्य शत्रुविनाश-सामर्थ्य का अथवा शस्त्रास्त्र-समूह का (न नियंसते) अवरोध या प्रतिकार नहीं किया जा सकता। (ते) तेरा (शवः) बल (नृम्णं हि) तेरे लिए धनरूप है। तू (स्वराज्यम् अनु) स्वराज्य के अनुकूल (अर्चन्) कर्म करता हुआ, (वृत्रम्) पाप एवं शत्रु को (हनः) विनष्ट कर दे, (अपः) शत्रु से प्रतिरुद्ध सत्कर्मसमूह को (जयाः) जीत ले ॥५॥ इस मन्त्र में वीर रस है, श्लेषालङ्कार है, अनेक क्रियाओं के साथ एक कारक का योग होने से दीपक भी है ॥५॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा, राजा और सेनाध्यक्ष जब अपनी शत्रुओं से दुर्दमनीय महान् शक्ति को पहचान लेते हैं, तब सब आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को धूल में मिलाकर निश्चय ही विजयी होते हैं ॥५॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
य꣢दु꣣दी꣡र꣢त आ꣣ज꣡यो꣢ धृ꣣ष्ण꣡वे꣢ धीयते꣣ ध꣡न꣢म् । यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ म꣢द꣣च्यु꣢ता꣣ ह꣢री꣣ क꣢꣫ꣳ हनः꣣ कं꣡ वसौ꣢꣯ दधो꣣ऽस्मा꣡ꣳ इ꣢न्द्र꣣ व꣡सौ꣢ दधः ॥४१४॥
पदार्थः(यत्) जब (आजयः) देवासुरसंग्राम (उदीरते) उपस्थित होते हैं, तब (धृष्णवे) जो शत्रु का पराजय कर सकता है, उसे ही (धनम्) ऐश्वर्य (धीयते) मिलता है। इसलिए हे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन्, सेनापति अथवा राजन् ! तुम (मदच्युता) शत्रुओं के मद को चूर करनेवाले (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़ों को अथवा युद्धरथ को चलाने के साधनभूत जल-अग्नि रूप या वायु-विद्युत् रूप घोड़ों को (युङ्क्ष्व) कार्य में नियुक्त करो। (कम्) किसी को अर्थात् शत्रुजन को (हनः) विनष्ट करो, (कम्) किसी को अर्थात् मित्रजन को (वसौ) ऐश्वर्य में (दधः) स्थापित करो। (अस्मान्) दिव्य कर्मों में संग्लन हम धार्मिक लोगों को (वसौ) ऐश्वर्य में (दधः) स्थापित करो ॥६॥
भावार्थःआन्तरिक अथवा बाह्य देवासुरसंग्रामों के उपस्थित होने पर सबको चाहिए कि असुरों को पराजित कर, देवों को उत्साहित कर विजयश्री और दिव्य तथा भौतिक सम्पदा प्राप्त करें ॥६॥ इस मन्त्र की व्याख्या में सायणाचार्य ने इस प्रकार इतिहास दर्शाया है—“रहूगण का पुत्र गोतम कुरु-सृञ्जय राजाओं का पुरोहित था। उन राजाओं का शत्रुओं के साथ युद्ध होने पर उस ऋषि ने इस मन्त्र से इन्द्र की स्तुति करके स्वपक्षवालों के विजय की प्रार्थना की थी।” रहूगण का पुत्र गोतम इस मन्त्र का द्रष्टा ऋषि है। उसके विषय का ही यह इतिहास जानना चाहिए ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢क्ष꣣न्न꣡मी꣢मदन्त꣣ ह्य꣡व꣢ प्रि꣣या꣡ अ꣢धूषत । अ꣡स्तो꣢षत꣣ स्व꣡भा꣢नवो꣣ वि꣢प्रा꣣ न꣡वि꣢ष्ठया म꣣ती꣢꣫ योजा꣣꣬ न्वि꣢꣯न्द्र ते꣣ ह꣡री꣢ ॥४१५॥
पदार्थः(विप्राः) इन विद्वान अतिथियों ने (अक्षन्) भोजन कर लिया है, (अमीमदन्त हि) निश्चय ही ये तृप्त हो गये हैं। (प्रियाः) इन प्रिय अतिथियों ने (अव अधूषत) मुझ आतिथ्यकर्ता के दोषों को प्रकम्पित कर दिया है। (स्वभानवः) स्वकीय तेज से युक्त इन्होंने (नविष्ठया मती) नवीनतम मति के द्वारा (अस्तोषत) स्वस्ति का आशीर्वाद दिया है। अब, (इन्द्र) हे मेरे आत्मन्, तू (नु) शीघ्र ही (ते हरी) अपने ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़ों को (युङ्क्ष्व) नियुक्त कर अर्थात् विद्वान् अतिथियों के उपदेश पर मनन, चिन्तन और आचरण करने का प्रयत्न कर ॥७॥ इस मन्त्र में अक्षन्, अमीमदन्त, अधूषत, अस्तोषत इन अनेक क्रियाओं में एक कर्तृकारक के योग के कारण दीपक अलङ्कार है। ‘षत’ की एक बार आवृत्ति में छेकानुप्रास है ॥७॥
भावार्थःगृहस्थों से सत्कार पाये हुए अतिथि जन अपने बहुमूल्य उपदेश से उन्हें कृतार्थ करें, और गृहस्थ जन प्रयत्नपूर्वक उसके अनुकूल आचरण करें ॥७॥ इस मन्त्र में यजुर्वेदभाष्य में उवट और महीधर ने कात्यायनश्रौतसूत्र का अनुसरण करते हुए यह व्याख्या की है कि पितृयज्ञ कर्म में जो पितर आये हैं, उन्होंने हमारे दिये हुए हविरूप अन्न को खा लिया है और वे तृप्त हो गये हैं आदि। इस विषय में यह जान लेना चाहिए कि मृत पितरों को भोजन देना आदि वेदसम्मत नहीं है ॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
उ꣢पो꣣ षु꣡ शृ꣢णु꣣ही꣢꣫ गिरो꣣ म꣡घ꣢व꣣न्मा꣡त꣢था इव । क꣣दा꣡ नः꣢ सू꣣नृ꣡ता꣢वतः꣣ क꣢र꣣ इ꣢द꣣र्थ꣡या꣢स꣣ इद्यो꣢꣫जा꣣꣬ न्वि꣢꣯न्द्र ते꣣ ह꣡री꣢ ॥४१६॥
पदार्थःहे (मघवन्) ऐश्वर्यशाली, दानशील परमेश्वर, मेरे अन्तरात्मा अथवा राजन् ! तुम (गिरः) मेरी वाणियों को (सु उप-उ शृणुहि) भली-भाँति समीपता के साथ सुनो। (अतथाः इव) जैसे पहले मेरे अनुकूल थे उसके विपरीत (मा) मत होवो। तुम (कदा) कब (नः) हमें (सूनृतावतः) प्रिय-सत्य वाणियों से युक्त, वेदवाणियों से युक्त, आध्यात्मिक उषा से युक्त तथा आवश्यक भोज्य पदार्थों से युक्त (इत्) निश्चय ही (करः) करोगे? क्यों तुम (अर्थयासे इत्) माँगते ही जा रहे हो, देते नहीं? हे (इन्द्र) शक्तिशाली मेरे अन्तरात्मा ! तुम (नु) शीघ्र ही (ते) अपने (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप अश्वों को (योज) सक्रिय करो तथा श्रेष्ठ ज्ञान और श्रेष्ठ कर्म के उपार्जन द्वारा समृद्ध होवो। और, हे (इन्द्र) परमात्मन् ! तुम (ते) अपने (हरी) ऋक्-सामों को (नु) शीघ्र ही (योज) हमारे आत्मा में प्रेरित करो, जिससे सर्वविध ज्ञान और साम-संगीत से सम्पन्न होकर हम उत्कर्ष प्राप्त करें। और, हे (इन्द्र) राजन् ! तुम, हमारे समीप आने के लिए (ते) अपने (हरी) जल-अग्नि, वायु-विद्युत् आदि को (योज) विमान आदि रथों में नियुक्त करो और हमारे समीप आकर हमें अपनी सहायता का भागी करो ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःसर्वैश्वर्यवान्, सफलताप्रदायक परमेश्वर का आह्वान करके तथा अपने अन्तरात्मा और राष्ट्र के राजा को उद्बोधन देकर हम समस्त अभीष्टों को प्राप्त कर सकते हैं ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - पञ्चमः
च꣣न्द्र꣡मा꣢ अ꣣प्स्वा꣢३꣱न्त꣡रा सु꣢꣯प꣣र्णो꣡ धा꣢वते दि꣣वि꣢ । न꣡ वो꣢ हिरण्यनेमयः प꣣दं꣡ वि꣢न्दन्ति विद्युतो वि꣣त्तं꣡ मे꣢ अ꣣स्य꣡ रो꣢दसी ॥४१७॥
पदार्थः(चन्द्रमाः) चन्द्रमा (अप्सु अन्तः) अन्तरिक्ष के मध्य में, और (सुपर्णः) किरणरूप सुन्दर पंखोंवाला सूर्य (दिवि) द्युलोक में (आ धावते) चारों ओर दौड़ रहा है, अर्थात् चन्द्रमा अपनी धुरी पर घूमने के साथ-साथ पृथिवी और सूर्य के चारों ओर भी घूम रहा है, तथा सूर्य केवल अपनी धुरी पर घूम रहा है, इस बात को सब जानते हैं, किन्तु हे (हिरण्यनेमयः) स्वर्णिम् चक्रोंवाले (विद्युतः) विद्योतमान चन्द्र, सूर्य, विद्युत् आदियो ! (वः) तुम्हारे (पदम्) गतिप्रदाता को, कोई भी (न विन्दन्ति) नहीं जानते हैं। हे (रोदसी) स्त्रीपुरुषो अथवा राजा-प्रजाओ ! तुम (मे) मेरी (अस्य) इस बात को (वित्तम्) समझो। अभिप्राय यह है कि उस इन्द्र परमात्मा को साक्षात्कार करने का तुम प्रयत्न करो, जिसकी गति से यह सब-कुछ गतिमान् बना है ॥९॥
भावार्थःमनुष्यों को प्राकृतिक पदार्थों के गति, प्रकाश आदि विषयक ज्ञान से ही सन्तोष नहीं करना चाहिए, किन्तु उसे भी जानना चाहिए जो इन पदार्थों को पैदा करनेवाला, इन्हें गति, प्रकाश आदि प्रदान करनेवाला और इनकी व्यवस्था करनेवाला है ॥९॥ इस ऋचा की व्याख्या में विवरणकार माधव ने त्रित- विषयक वही इतिहास लिखा है, जो पूर्व संख्या ३६८ के मन्त्र पर प्रदर्शित किया जा चुका है। भरत स्वामी ने भिन्न इतिहास दिखाया है—“एकत, द्वित और त्रित ये तीनों आप्त के पुत्र थे। वे जब यज्ञ कराकर, गौएँ लेकर लौट रहे थे, तब मरुस्थल में प्यास से व्याकुल होकर, वहाँ एक कुएँ को देखकर वहीं रुक गये और कुएँ में उतरने का विचार करने लगे। पहले त्रित कुएँ में उतर गया। शेष दोनों को बाहर ही पानी मिल गया और वे पानी पीकर तृप्त हो गये तथा कुएँ को एक चक्र से बन्द करके गौएँ लेकर चलते बने। इधर कुएँ में बन्द पड़ा हुआ त्रित देवों की स्तुति करने लगा। वह कुआँ निर्जल था, जिसमें त्रित प्यास से व्याकुल होकर उतरा था। वहीं पड़ा-पड़ा वह रात्रि में चन्द्रमा को देखकर विलाप करने लगा कि चन्द्रमा पानी में स्थित हुआ अन्तरिक्ष में दौड़ रहा है आदि। किसी तरह मेरी प्यास बुझ जाए, इसलिए उसका विलाप है। वह कहता है कि हे आकाश और भूमि, तुम मेरे इस संकट को जानो ॥’’ यहाँ माधव और भरत स्वामी के इतिहासों में अन्तर ही उनके कल्पनाप्रसूत होने में प्रमाण है ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -आश्विनौ| स्वर - पञ्चमः
प्र꣡ति꣢ प्रि꣣य꣡त꣢म꣣ꣳ र꣢थं꣣ वृ꣡ष꣢णं वसु꣣वा꣡ह꣢नम् । स्तो꣣ता꣡ वा꣢मश्विना꣣वृ꣢षि꣣ स्तो꣡मे꣢भिर्भूषति꣣ प्र꣢ति꣣ मा꣢ध्वी꣣ म꣡म꣢ श्रुत꣣ꣳ ह꣡व꣢म् ॥४१८॥
पदार्थःप्रथम—शरीर-रथ के पक्ष में। हे (अश्विनौ) परमात्मन् और जीवात्मन् ! (प्रियतमम्) सर्वाधिक प्रिय, (वृषणम्) बलवान्, (वसुवाहनम्) वासक इन्द्रियों द्वारा वहन किये जानेवाले (रथम्) शरीररूप रथ को (प्रति) लक्ष्य करके (स्तोता) स्तुतिकर्ता (ऋषिः) तत्त्वार्थद्रष्टा विद्वान् (स्तोमेभिः) तुम्हारे स्तोत्रगानों के साथ (वाम्) तुमसे (प्रतिभूषति) याचना कर रहा है, अर्थात् मैं याचना कर रहा हूँ। हे (माध्वी) मधुर परमात्मन् और जीवात्मन् ! तुम (मम) मेरे (हवम्) आह्वान को (प्रतिश्रुतम्) सुनो। भाव यह है कि मैं आगामी जन्म में मानवशरीर ही प्राप्त करूँ, पशु, पक्षी, सरकनेवाले जन्तु, स्थावर आदि का शरीर नहीं ॥ द्वितीय—शिल्प-रथ के पक्ष में। हे (अश्विनौ) रथों के निर्माता और चालक शिल्पिजनो ! (प्रियतमम्) अतिशय प्रिय, (वृषणम्) शत्रुसेना के ऊपर शस्त्रास्त्रों की वर्षा के साधनभूत, (वसुवाहनम्) धन-धान्य आदि को देशान्तर में पहुँचानेवाले (रथम्) विमानादि यान को (वाम्) तुम्हारा (स्तोता) प्रशंसक (ऋषिः) विद्वान् मनुष्य (स्तोमेभिः) देशान्तर में ले जाये जानेवाले पदार्थ-समूहों से (प्रतिभूषति) अलङ्कृत करता है। हे (माध्वी) मधुर गति की विद्या को जाननेवाले शिल्पी जनो ! तुम (मम) मेरी (हवम्) विमानादि यानों के निर्माण करने तथा उन्हें चलाने विषयक पुकार को (प्रति श्रुतम्) पूर्ण करो ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःसब मनुष्यों को ऐसे कर्म करने चाहिएँ, जिससे पुनर्जन्म में मानवशरीर ही प्राप्त हो। इसी प्रकार राष्ट्र में शिल्पविद्या की उन्नति से वेगवान् भूयान, जलयान और अन्तरिक्षयान बनवाने चाहिएँ और देशान्तरगमन, व्यापार, युद्ध आदि में उनका प्रयोग करना चाहिए ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र की सहयोगिनी गौरियों का, इन्द्र के स्वराज्य का, उसके आह्वान, उद्बोधन और स्तवन का, चन्द्र-सूर्य आदि की गतियों के तत्कर्तृक होने का और उसके द्वारा दातव्य रथ का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में प्रथम अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ ते꣢ अग्न इधीमहि द्यु꣣म꣡न्तं꣢ देवा꣣ज꣡र꣢म् । यु꣢द्ध꣣ स्या꣢ ते꣣ प꣡नी꣢यसी स꣣मि꣢द्दी꣣द꣡य꣢ति꣣ द्य꣡वी꣢꣯षꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥४१९॥
पदार्थःहे (देव) सर्वप्रकाशक (अग्ने) अन्तर्यामी जगदीश्वर ! हम (ते) तेरे (द्युमन्तम्) दीप्तिमान्, (अजरम्) कभी जीर्ण न होनेवाले प्रकाश को (आ इधीमहि) हृदय में प्रदीप्त करें। (यत्) जो (ते) तेरी (स्या) वह प्रसिद्ध (पनीयसी) अतिशय स्तुतियोग्य (समित्) दीप्ति (द्यवि) सूर्य में (दीदयति) प्रकाशित है, उस (इषम्) व्याप्त दीप्ति को (स्तोतृभ्यः) हम स्तोताओं को भी (आ भर) प्रदान कर ॥१॥
भावार्थःजो कुछ भी प्रकाशमान अग्नि, विद्युत्, चन्द्र, सूर्य, तारे आदि भूमि पर और आकाश में विद्यमान हैं, वे सब परमात्मा के ही प्रकाश से प्रकाशित हैं। उस प्रकाश से सब मनुष्यों को अपना आत्मा भी प्रकाशित करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ग्निं न स्ववृ꣢꣯क्तिभि꣣र्हो꣡ता꣢रं त्वा वृणीमहे । शी꣣रं꣡ पा꣢व꣣क꣡शो꣢चिषं꣣ वि꣢ वो꣣ म꣡दे꣢ य꣣ज्ञे꣡षु꣢ स्ती꣣र्ण꣡ब꣢र्हिषं꣣ वि꣡व꣢क्षसे ॥४२०॥
पदार्थःहम लोग (न) इस समय (होतारम्) सुख आदि के दाता, (शीरम्) सर्वत्र शयन करनेवाले, सर्वव्यापक (पावकशोचिषम्) पवित्रताकारक दीप्तिवाले (त्वा अग्निम्) आप अग्रनायक परमेश्वर को (स्व-वृक्तिभिः) अपनी सूक्तियों अथवा क्रियाओं से (आ वृणीमहे) वरते हैं। हम (वः मदे) आपके प्राप्त कराये हुए आनन्द में (वि) उत्कर्ष को प्राप्त करें। आप (यज्ञेषु) ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ आदि पञ्च यज्ञों में तथा अन्य विविध परोपकार-रूप यज्ञों में (स्तीर्णबर्हिषम्) जिसने आसन बिछाया है अर्थात् उन यज्ञों को करने में जो प्रवृत्त हुआ है, उसे (विवक्षसे) विशेष रूप से उन्नत कर देते हो ॥२॥
भावार्थःपरम आनन्द के प्रदाता, सर्वत्र व्यापक, अपने तेज से मनों को पवित्र करनेवाले, महान् परमेश्वर का सब यज्ञकर्ताओं को भौतिक अग्नि के समान वरण करना चाहिए ॥२॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -उषाः| स्वर - पञ्चमः
म꣣हे꣡ नो꣢ अ꣣द्य꣡ बो꣢ध꣣यो꣡षो꣢ रा꣣ये꣢ दि꣣वि꣡त्म꣢ती । य꣡था꣢ चिन्नो꣣ अ꣡बो꣢धयः स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥४२१॥
पदार्थःहे (उषः) प्राकृतिक उषा के समान मेरे आत्मलोक में उदित होती हुई अध्यात्मप्रभा ! (दिवित्मती) विवेकख्याति को प्रदीप्त करनेवाले गुणों से युक्त तू (नः) हमें (अद्य) आज (महे राये) योगसिद्धिरूप महान् ऐश्वर्य के लिए (बोधय) बोध प्रदान कर, (यथा) जैसे हे (सुजाते) शुभ जन्मवाली, (अश्वसूनृते) व्यापक प्रिय दिव्य वाणीवाली उषा ! तू (सत्यश्रवसि) सत्य यशवाले (वाय्ये) विस्तार योग्य जीवन में, हमें (अबोधयः) बोध प्रदान करती रही है ॥३॥
भावार्थःजैसे प्रभातदीप्ति रूप उषा सबको निद्रा से जगाती है, वैसे ही आध्यात्मिक उषा हमें जागृति और प्रबोध प्रदान करे ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -सोमः| स्वर - पञ्चमः
भ꣣द्रं꣢ नो꣣ अ꣡पि꣢ वातय꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣡ क्रतु꣢꣯म् । अ꣡था꣢ ते स꣣ख्ये꣡ अन्ध꣢꣯सो꣣ वि꣢ वो꣣ म꣢दे꣣ र꣢णा꣣ गा꣢वो꣣ न꣡ यव꣢꣯से꣣ वि꣡व꣢क्षसे ॥४२२॥
पदार्थःहे सोम ! हे रसागार परमात्मन् ! आप (नः) हमारे लिए (भद्रम्) श्रेष्ठ (मनः) मनोबल, (दक्षम्) शारीरिक बल, (उत) और (क्रतुम्) प्रज्ञान तथा कर्म (अपि वातय) प्राप्त कराओ। (अथ) और (ते) आपके अपने (अन्धसः) शान्तिरस के (सख्ये) सखित्व में, तथा (वः) आपके अपने (मदे) आनन्द में, हमें (वि रण) विशेष रूप से रमाओ, (गावः न) जैसे गौएँ (यवसे) घास में रमती हैं। हे सोम परमात्मन् ! आप (विवक्षसे) महान् हो ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से मनुष्य आत्मा, मन, बुद्धि आदि के बल को और आनन्द को प्राप्त कर सकते हैं ॥४॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
क्र꣡त्वा꣢ म꣣हा꣡ꣳ अ꣢नुष्व꣣धं꣢ भी꣣म꣡ आ वा꣢꣯वृते꣣ श꣡वः꣢ । श्रि꣣य꣢ ऋ꣣ष्व꣡ उ꣢पा꣣क꣢यो꣣र्नि꣢ शि꣣प्री꣡ हरि꣢꣯वान् दधे꣣ ह꣡स्त꣢यो꣣र्व꣡ज्र꣢माय꣣स꣢म् ॥४२३॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (क्रत्वा) दिव्य प्रज्ञा और जगत् के धारण आदि कर्म से (महान्) महान्, (भीमः) नियम तोड़नेवालों के लिए भयंकर वह इन्द्र परमेश्वर (अनु स्वधम्) अपनी धारणशक्ति के अनुरूप (शवः) बलवान् सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि को (आ वावृते) घुमा रहा है। (ऋष्वः) लोकलोकान्तरों को अपनी-अपनी कक्षाओं में गति करानेवाला, (शिप्री) जगत् का विस्तारक, (हरिवान्) अकर्मण्यता आदि दोषों को हरने के सामर्थ्यवाला वह (श्रिये) ऐश्वर्यप्रदानार्थ (उपाकयोः) परस्पर सम्बद्ध (हस्तयोः) मनुष्य के हाथों में (आयसम्) दृढ (वज्रम्) शस्त्रास्त्रसमूह को (आ दधे) थमाता है ॥ द्वितीय—सेनापति के पक्ष में। (क्रत्वा) शत्रुवध आदि कर्म से (महान्) महान्, (भीमः) दुष्टों के लिए भयंकर इन्द्र अर्थात् वीर सेनापति (अनुस्वधम्) पौष्टिक अन्न के भक्षण के अनुरूप, अपने शरीर में (शवः) बल (आ वावृते) उत्पन्न करता है। (ऋष्वः) गतिमान्, कर्मण्य, (शिप्री) शत्रुओं में आक्रोश या हाहाकार पैदा करनेवाला, (हरिवान्) प्रशस्त घोड़ों अथवा हरणसाधन विमानादि यानोंवाला वह (श्रिये) विजयश्री प्राप्त करने के लिए (उपाकयोः) निकट पहुँचे शत्रुदलों के ऊपर प्रहारार्थ (हस्तयोः) हाथों में (आयसम्) लोहे के बने, अथवा लोहे जैसे दृढ (वज्रम्) शस्त्रास्त्रसमूह को (नि दधे) धारण करता है ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर अकर्मण्य लोगों के भी हृदय में वीरता का सञ्चार करके उनके हाथों में शस्त्रास्त्र ग्रहण करा देता है, वैसे ही सेनापति अपने हाथों में शत्रु का वध करने में समर्थ दृढ़ शस्त्रास्त्रों को धारण कर, शत्रुओं पर प्रहार करके उन्हें पराजित करे ॥५॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
स꣢ घा꣣ तं꣡ वृष꣢꣯ण꣣ꣳ र꣢थ꣣म꣡धि꣢ तिष्ठाति गो꣣वि꣡द꣢म् । यः꣡ पात्र꣢꣯ꣳ हारियोज꣣नं꣢ पू꣣र्ण꣡मि꣢न्द्र꣣ चि꣡के꣢तति꣣ यो꣢जा꣣꣬ न्वि꣢꣯न्द्र ते꣣ ह꣡री꣢ ॥४२४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! (स घ) वही मनुष्य (तम्) उस श्रेष्ठ, (वृषणम्) बलवान् (गोविदम्) इन्द्रियरूप बैलों से युक्त (रथम्) मानव-शरीर-रूप रथ का (अधितिष्ठाति) अधिष्ठाता बनता है, (यः) जो (हारियोजनम्) प्राणयुक्त मानव-शरीर को प्रदान करने में समर्थ (पात्रम्) सत्कर्मों के कोष को (पूर्णम्) भरा हुआ (चिकेतति) जान लेता है। इसलिए, हे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! तू (ते हरी) अपने ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय रूप घोड़ों को (नु) शीघ्र ही (योज) नियुक्त कर, अर्थात् पुनर्जन्म में मनुष्य-शरीर प्राप्त करने के लिए ज्ञानेन्द्रियों से सत्य ज्ञान प्राप्त कर और कर्मेन्द्रियों से उत्कृष्ट कर्म कर ॥६॥
भावार्थःजो मनुष्य इस जन्म में मानवदेह प्राप्त कराने योग्य सत्कर्मों को करता है, वही अगले जन्म में मानवदेह प्राप्त करता है, यह जानकर सब मनुष्यों को श्रेष्ठ ही कर्म करने चाहिएँ ॥६॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣣ग्निं꣡ तं म꣢꣯न्ये꣣ यो꣢꣫ वसु꣣र꣢स्तं꣣ यं꣡ यन्ति꣢꣯ धे꣣न꣡वः꣢ । अ꣢स्त꣣म꣡र्व꣢न्त आ꣣श꣢꣫वोऽस्तं꣣ नि꣡त्या꣣सो वा꣣जि꣢न꣣ इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥४२५॥
पदार्थःमैं (तम् अग्निम्) उस अग्रनायक एवं अग्नि के समान प्रकाशमान और प्रकाशक परमेश्वर की (मन्ये) अर्चना करता हूँ, (यः) जो (वसुः) सबका निवास-प्रदाता है, (अस्तम्) गृहरूप (यम्) जिसके पास (धेनवः) वाणियाँ (यन्ति) शक्ति पाने के लिए जाती हैं, (अस्तम्) गृहरूप (यम्) जिसके पास (आशवः) शीघ्रगामी (अर्वन्तः) प्राण (यन्ति) शक्ति पाने के लिए जाते हैं, (अस्तम्) गृहरूप (यम्) जिसके पास (नित्यासः) अनादि और अनन्त (वाजिनः) बलवान् आत्माएँ (यन्ति) शक्ति पाने के लिए जाती हैं। हे परमात्मन् ! तू (स्तोतृभ्यः) तेरे गुण-कर्म-स्वभाव का वर्णन करनेवालों के लिए (इषम्) अभीष्ट पदार्थों व अभीष्ट गुणों के समूह को (आ भर) प्रदान कर ॥७॥ इस मन्त्र में अग्नि परमेश्वर में ‘अस्त’ (गृह) का आरोप होने से रूपकालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःपरमात्मा के पास से ही सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि और आत्मा, मन, चक्षु, श्रोत्र, प्राण आदि अपनी-अपनी क्रियाशक्ति पाते हैं। वही स्तोताओं के मनोरथों को पूर्ण करता है ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - मध्यमः
न꣢꣫ तमꣳहो꣣ न꣡ दु꣢रि꣣तं꣡ देवा꣢꣯सो अष्ट꣣ म꣡र्त्य꣢म् । स꣣जो꣡ष꣢सो꣣ य꣡म꣢र्य꣣मा꣢ मि꣣त्रो꣡ नय꣢꣯ति꣣ व꣡रु꣢णो꣣ अ꣢ति꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥४२६॥
पदार्थःहे (देवासः) विद्वानो ! (तं मर्त्यम्) उस मनुष्य को (न अंहः) न अपराध, (न दुरितम्) न पाप (अष्ट) प्राप्त होता है, (यम्) जिसे (सजोषसः) समान प्रीतिवाले, परस्पर सामञ्जस्य रखनेवाले, (अर्यमा) मन, सूर्य वा न्यायाधीश, (मित्रः) प्राण, वायु वा मित्र और (वरुणः) आत्मा, चन्द्रमा वा राजा (द्विषः) विपत्ति, विघ्नसमूह वा शत्रुसंघ से (अति नयति) पार कर देते हैं ॥८॥
भावार्थःशरीर में, जड़ जगत् में, समाज में और राष्ट्र में क्रमशः जो मन, प्राण आदि, जो सूर्य आदि, जो श्रेष्ठ मित्र आदि और जो राजा आदि मुख्य हैं, उनकी रक्षा प्राप्त करके मनुष्य पापों और शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं ॥८॥ इस दशति में इन्द्र के तथा इन्द्र से सम्बद्ध अग्नि, उषा, सोम, मित्र, वरुण और अर्यमा के गुण-कर्म वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में प्रथम अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प꣢रि꣣ प्र꣢ ध꣣न्वे꣡न्द्रा꣢य सोम स्वा꣣दु꣢र्मि꣣त्रा꣡य꣢ पू꣣ष्णे꣡ भगा꣢꣯य ॥४२७॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार एवं शान्तिमय जगदीश्वर ! (स्वादुः) मधुर आप, मेरे (इन्द्राय) आत्मा के लिए, (मित्राय) मित्रभूत मन के लिए, (पूष्णे) पोषक प्राण के लिए और (भगाय) सेवनीय बुद्धितत्त्व के लिए (परि प्र धन्व) सब ओर से माधुर्य और शान्ति को क्षरित करो ॥१॥
भावार्थःरसागार और शान्त परमेश्वर ही हमें रसमय और शान्तिप्रिय कर सकता है ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामध्या| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प꣢र्यू꣣ षु꣡ प्र ध꣢꣯न्व꣣ वा꣡ज꣢सातये꣣ प꣡रि꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ स꣣क्ष꣡णिः꣢ । द्वि꣣ष꣢स्त꣣र꣡ध्या꣢ ऋण꣣या꣡ न꣢ ईरसे ॥४२८॥
पदार्थःहे वीररसमय मेरे अन्तरात्मन् अथवा वीर पुरुष ! तू (वाजसातये) संग्राम के लिए अर्थात् शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिए (उ सु) भली-भाँति (परि प्र धन्व) चारों ओर प्रयाण कर, (सक्षणिः) हिंसक होकर तू (वृत्राणि) आच्छादक पापों पर (परि) चारों ओर से आक्रमण कर। (ऋणयाः) ऋणों को चुकानेवाला होकर तू (द्विषः) लोभ आदि द्वेषियों को (तरध्यै) पार करने के लिए (नः) हमें (ईरसे) प्रेरित कर ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि लोभवृत्तियों को छोड़कर ऋण समय पर चुकायें और वीरता-पूर्वक शत्रुओं को पराजित करें ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हा꣡न्त्स꣢मु꣣द्रः꣢ पि꣣ता꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ वि꣢श्वा꣣भि꣡ धाम꣢꣯ ॥४२९॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (सोम) सब जगत् के उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर ! आप (महान्) महान् हो, (समुद्रः) रस के पारावार हो, (देवानाम्) प्रकाशक विद्वानों के, सूर्य-चन्द्र-विद्युत्-अग्नि आदियों के और ज्ञानेन्द्रिय-मन-बुद्धि आदियों के (पिता) पालनकर्ता हो। आप (विश्वा धाम) सब स्थानों को वा हृदय धामों को (अभि पवस्व) व्याप्त करके पवित्र करो ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (सोम) चन्द्रमा के समान आह्लादक प्रजारञ्जक राजन् ! आप (महान्) गुणों और कर्मों में महान् हो, (समुद्रः) प्रेमरस, शौर्य और सम्पदाओं के सागर हो, (देवानाम्) दानादि गुणों से युक्त प्रजाजनों के (पिता) पालक हो। आप (विश्वा धाम) राष्ट्र के शिक्षा, न्याय, कृषि, व्यापार, उद्योग, सेना आदि सब विभागों में (अभि) पहुँचकर (पवस्व) उन्हें निर्दोष और पवित्र करो ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है और सोमपदवाच्य परमात्मा और राजा में समुद्र का आरोप होने से रूपकालङ्कार भी है ॥३॥
भावार्थःजैसे परमात्मा सबके हृदयों को पवित्र करता है, वैसे ही राजा राष्ट्र के सब विभागों को भ्रष्टाचार से रहित तथा पवित्र करे ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हे꣢꣫ दक्षा꣣या꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ वा꣣जी꣡ धना꣢य ॥४३०॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमेश्वर और राजन् ! (अश्वः न) अग्नि, बादल वा सूर्य के समान (निक्तः) शुद्ध, शुद्ध गुण-कर्म-स्वभाववाले और (वाजी) बलवान् आप (महे) महान् (दक्षाय) बल के लिए तथा (धनाय) धन के लिए (पवस्व) हमें पवित्र कीजिए ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार तथा अर्थश्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर के समान राजा भी स्वयं शुद्ध आचरणवाला होकर सबके आचरण को पवित्र करे। वही बल और धन सबका उपकारक होता है, जो पवित्रता के साथ तथा पवित्र साधनों से कमाया जाता है ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
इ꣡न्दुः꣢ पविष्ट꣣ चा꣢रु꣣र्म꣡दा꣢या꣣पा꣢मु꣣प꣡स्थे꣢ क꣣वि꣡र्भ꣢꣯गाय ॥४३१॥
पदार्थः(चारुः) रमणीय, (कविः) दूरदर्शी, मेधावी, (इन्दुः) चन्द्रमा के समान आह्लादक और सोम ओषधि के समान रसागार, शान्ति के सौम्य प्रकाश से प्रदीप्त करनेवाला परमेश्वर और राजा (मदाय) आनन्द उत्पन्न करने के लिए, और (भगाय) ऐश्वर्य उत्पन्न करने के लिए (अपाम्) प्राणों के (वा) जल के समान शान्त प्रजाओं के (उपस्थे) मध्य में स्थित होकर (पविष्ट) पवित्रता देवे ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःपरमेश्वर के समान राजा भी चारुदर्शन, विवेकी, क्रान्तदर्शी, चन्द्रमा के समान मधुर, प्रेमरस तथा वीररस से परिप्लुत, परमानन्द और धन का दाता, पवित्र एवं पवित्रतादायक होवे ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -त्रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामध्या| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣢नु꣣ हि꣡ त्वा꣢ सु꣣त꣡ꣳ सो꣢म꣣ म꣡दा꣢मसि म꣣हे꣡ स꣢मर्य꣣रा꣡ज्ये꣢ । वा꣡जा꣢ꣳ अ꣣भि꣡ प꣢वमान꣣ प्र꣡ गा꣢हसे ॥४३२॥
पदार्थःहे (सोम) परमात्मन्, जीवात्मन् वा राजन् ! (सुतम्) अभिषिक्त किये हुए (त्वा) तुम्हारा (अनु) अनुगमन करके, हम (महे) महान् (समर्यराज्ये) देवासुरसंग्राम में कुशल दिव्य भावों व वीर क्षत्रियों के राज्य में (मदामसि हि) निश्चय ही आनन्द लाभ करते हैं। हे (पवमान) पवित्रकर्ता देव ! तुम (वाजान् अभि) हमें बल, विज्ञान वा ऐश्वर्य प्राप्त कराने के लिए (प्र गाहसे) प्रकृष्ट रूप से आलोडित करते हो अर्थात् आलोडित करके क्रियाशील बना देते हो ॥६॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥६॥
भावार्थःपरमात्मा, जीवात्मा और वीर मनुष्य को राजा के पद पर अभिषिक्त करके संग्राम-कुशल वीरभावों व वीरजनों के राज्य में निवास करते हुए हम देवासुरसंग्राम में विजय और उत्कर्ष पायें ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -मरुतः| स्वर - पञ्चमः
क꣢ ईं꣣꣬ व्य꣢꣯क्ता꣣ न꣢रः꣣ स꣡नी꣢डा रु꣣द्र꣢स्य꣣ म꣢र्या꣣ अ꣢था꣣ स्व꣡श्वाः꣢ ॥४३३॥
पदार्थः(के ईम्) कौन ये (व्यक्ताः) प्रकाशमान, (नरः) नेता, (सनीडाः) समान आश्रयवाले, (रुद्रस्य मर्याः) रूद्र के पुत्र कहे जानेवाले, (अथ) और (स्वश्वाः) उत्तम घोड़ोंवाले हैं? यह प्रश्न है। इसका उत्तर इस प्रकार है— प्रथम—प्राणों के पक्ष में। ये (व्यक्ताः) विशेष गतिवाले, (नरः) शरीर के नेता, (सनीडाः) शरीर-रूप समान गृह में निवास करनेवाले, (रुद्रस्य मर्याः) रूद्र नामक मुख्य प्राण के सहचर, (स्वश्वाः) इन्द्रियरूप उत्तम घोड़ोंवाले, (मरुतः) प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान हैं ॥ द्वितीय—सैनिकों के पक्ष में। ये (व्यक्ताः) कन्धों पर बन्दूकें, पैरों में पादत्राण, छातियों पर सोने के तमगे, भुजाओं में विद्युत्-यन्त्र, शिरों पर शिरस्त्राण इन परिचायक चिह्नों से व्यक्त होते हुए, (सनीडाः) समान राष्ट्ररूप गृह में निवास करनेवाले, (रुद्रस्य मर्याः) शत्रुओं को रुलानेवाले सेनापति के मनुष्य (स्वश्वाः) उत्तम घोड़ों पर सवार अथवा उत्तम अग्नि, विद्युत् आदि को युद्ध-रथ में प्रयुक्त करनेवाले (मरुतः) राष्ट्र के वीर सैनिक हैं ॥७॥ इस मन्त्र में प्रश्न में ही उत्तर समाविष्ट होने से गूढोत्तर नामक प्रहेलिकालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजैसे शरीर-रूप गृह में व्यवस्थापूर्वक अपना-अपना स्थान बाँटकर विभिन्न अङ्गों में आश्रय लेनेवाले प्राण शरीर की रक्षा करते हैं, वैसे ही राष्ट्र में निवास करनेवाले वीर सैनिक राष्ट्र की रक्षा करते हैं, इस कारण शरीर में प्राणों का और राष्ट्र में सैनिकों का उत्तम खाद्य, पेय आदि से सत्कार करना चाहिए ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पदपङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢ग्ने꣣ त꣢म꣣द्या꣢श्वं꣣ न꣢꣫ स्तोमैः꣣ क्र꣢तुं꣣ न꣢ भ꣣द्र꣡ꣳ हृ꣢दि꣣स्पृ꣡श꣢म् । ऋ꣣ध्या꣡मा꣢ त꣣ ओ꣡हैः꣣ ॥४३४॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनेता प्रकाशक परमेश्वर ! (अश्वं न) घोड़े के समान, और (क्रतुं न) रचयिता शिल्पी के समान (भद्रम्) कल्याणकर्ता, (हृदिस्पृशम्) हृदय को स्पर्श करनेवाले (तम्) उस जगत्प्रसिद्ध तुझको (अद्य) आज (ते ओहैः) तुझे हमारी ओर लानेवाले (स्तोमैः) स्तोत्रों से (ऋध्याम) पूजित करें ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजैसे घोड़ा देशान्तर को जाने में साधन बनकर और शिल्पी विविध यन्त्रकला आदि का निर्माण करके हमारा हित करता है, वैसे ही परमेश्वर हमें उन्नति की ओर ले जाकर और हमारे लिए सूर्य, चन्द्र, वायु, फल, मूल आदि विविध वस्तुओं का निर्माण कर हमारा हितकर्ता होता है ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -पुरउष्णिक्| देवता -वाजिनः| स्वर - ऋषभः
आ꣣वि꣡र्म꣢र्या꣣ आ꣡ वाजं꣢꣯ वा꣣जि꣡नो꣢ अग्मन् दे꣣व꣡स्य꣢ सवि꣣तुः꣢ स꣣व꣢म् । स्व꣣र्गा꣡ꣳ अ꣢र्वन्तो जयत ॥४३५
पदार्थः(वाजिनः) ज्ञानवान् लोग (वाजम्) बल को, और (देवस्य) प्रकाशक (सवितुः) प्रेरक परमात्मा की (सवम्) प्रेरणा को (आ अग्मन्) प्राप्त करते हैं। हे (मर्याः) मनुष्यो ! तुम भी (आविः) अपने आत्मा में बल और परमात्मा की प्रेरणा को प्रकट करो। हे (अर्वन्तः) उद्योगी मनुष्यो ! तुम (स्वर्गान्) सुखमय ब्रहमचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास लोकों को तथा मुक्तिलोकों को (जयत) जीत लो ॥९॥ इस मन्त्र में ‘अर्वन्तः’ शब्द के प्रयोग से ‘जैसे घोड़े संग्राम को जीत लेते हैं,’ यह उपमालङ्कार ध्वनित होता है। ‘वाजं, वाजि’ तथा ‘सवि, सव’ में छेकानुप्रास और वकार की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥९॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि आत्मबल का संचय करके और परमात्मा से सत्प्रेरणा लेकर, शुभ कर्म करके लौकिक तथा पारलौकिक सुख को प्राप्त करें ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प꣡व꣢स्व सोम द्यु꣣म्नी꣡ सु꣢धा꣣रो꣢ म꣣हा꣡ꣳ अवी꣢꣯ना꣣म꣡नु꣢पू꣣र्व्यः꣢ ॥४३६॥
पदार्थःहे (सोम) आनन्दरसागार परमात्मन् ! (द्युम्नी) यशस्वी, (अवीनां महान्) बहुत-सी भूमियों से भी अधिक महान्, (पूर्व्यः) सनातन, (सुधारः) आनन्दरस की उत्तम धारों सहित आप (पवस्व) मेरे हृदय में परिस्रुत हों ॥१०॥
भावार्थःसमाहित मन से निरन्तर उपासना किया गया रसनिधि परमेश्वर आनन्द की बौछारों के साथ हृदय में बरसता है ॥१०॥ इस दशति में सोम नाम से परमात्मा की रसमयता का वर्णन करके उससे आनन्दरस और पवित्रता की याचना होने से, अग्नि नाम से उसके तेजोमय रूप का वर्णन होने से, और मरुतों के नाम से प्राणादि का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में प्रथम अर्ध की पञ्चमी दशति समाप्त ॥ प्रथम अर्ध समाप्त हुआ ॥ चतुर्थ अध्याय में नवम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
वि꣡श्व꣢तोदावन्वि꣣श्व꣡तो꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र꣣ यं꣢ त्वा꣣ श꣡वि꣢ष्ठ꣣मी꣡म꣢हे ॥४३७
पदार्थःहे (विश्वतोदावन्) सब ओर दान करनेवाले परमात्मन् वा राजन् ! आप (विश्वतः) सब ओर से (नः) हमारे लिए (आ भर) विद्या, धन, बल आदि लाइए, (यम्) जिन (शविष्ठम्) बलिष्ठ (त्वा) आपसे, हम (ईमहे) याचना कर रहे हैं ॥१॥ इस मन्त्र में अर्थ-श्लेष अलङ्कार, तथा ‘विश्वतो’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर हमारे लिए वेदज्ञान, आत्मबल, देहबल तथा सूर्य, वायु, पृथिवी, सुवर्ण आदि धन देता है, वैसे ही राजा भी राष्ट्र में निरक्षरों को विद्या, निर्बलों को बल और निर्धनों को धन प्रदान करे ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
ए꣣ष꣢ ब्र꣣ह्मा꣢꣫ य ऋ꣣त्वि꣢य꣣ इ꣢न्द्रो꣣ ना꣡म꣢ श्रु꣣तो꣢ गृ꣣णे꣢ ॥४३८॥
पदार्थः(एषः) यह मेरे द्वारा अनुभव किया जाता हुआ परमेश्वर (ब्रह्मा) ज्ञान, गुण, कर्म आदि से सर्वतोवृद्ध होने के कारण ब्रह्मा कहलाता है, (यः ऋत्वियः) जिसकी पूजा की ऋतु सदा ही रहती है, और जो (इन्द्रो नाम श्रुतः) इन्द्र नाम से प्रसिद्ध है, उसकी मैं (गृणे) स्तुति करता हूँ ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर सब दृष्टियों से वृद्ध, सब दृष्टियों से भद्र और सब ऋतुओं में उपासनीय है ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
ब्र꣣ह्मा꣢ण꣣ इ꣡न्द्रं꣢ म꣣ह꣡य꣢न्तो अ꣣र्कै꣡र꣢꣯वर्धय꣣न्न꣡ह꣢ये꣣ ह꣢न्त꣣वा꣡ उ꣢ ॥४३९॥
पदार्थः(ब्रह्माणः) आस्तिक तथा देशभक्त लोग (अर्कैः) वेदमन्त्रों से (इन्द्रम्) विघ्नविदारक परमेश्वर वा राजा को (महयन्तः) पूजित वा सत्कृत करते हुए (अहये हन्तवै) सर्प के समान कुटिल गतिवाले विघ्न-समूह, पाप वा शत्रु को नष्ट करने के लिए (उ) निश्चय ही (अवर्द्धयन्) अपने हृदय में वा राष्ट्र में बढ़ाते हैं ॥३॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर योगमार्ग में आये विघ्नों का, अन्तःकरण और समाज में प्रसार पाये पापरूप शत्रुओं का तथा दुष्टों का संहार करता है, वैसे ही राजा को चाहिए कि राष्ट्र की उन्नति के लिए शत्रुओं का विनाश करे ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣡न꣢वस्ते꣣ र꣢थ꣣म꣡श्वा꣢य तक्षु꣣स्त्व꣢ष्टा꣣ व꣡ज्रं꣢ पुरुहूत द्यु꣣म꣡न्त꣢म् ॥४४०॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। हे (पुरुहूत) बहुतों से गुणकीर्तन किये गये जीवात्मन् ! (ते) तेरे लिए (अनवः) प्राण (अश्वाय) शीघ्रगमनार्थ (रथम्) शरीररूप रथ को (तक्षुः) रचते हैं, (त्वष्टा) जगत् का शिल्पी परमेश्वर (द्युमन्तम्) तेजोमय (वज्रम्) वाणी रूप वज्र को रचता है। उस यशोमय शरीर-रथ से जीवनयात्रा करता हुआ तू वाणीरूप वज्र से पाखण्डियों का खण्डन कर ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (पुरुहूत) बहुत-से प्रजाजनों द्वारा सत्कृत अखण्ड ऐश्वर्यवाले राजन् ! (ते) आपके लिए (अनवः) शिल्पी मनुष्य (अश्वाय) शीघ्रगमनार्थ (रथम्) यात्रा के तथा युद्ध के साधनभूत भूमि, जल और अन्तरिक्ष में चलनेवाले यान-समूह को (तक्षुः) रचें, (त्वष्टा) शस्त्रास्त्रों का निर्माता शिल्पी (द्युमन्तम्) चमचमाते हुए (वज्रम्) शस्त्रास्त्र-समूह को रचे। इसप्रकार रथ, शस्त्रास्त्र आदि युद्धसाधनों से युक्त होकर आप शत्रुओं को पराजित कर प्रजा को सुखी करें ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजैसे जीवात्मा शरीर-रथ पर स्थित होकर वाणीरूप वज्र से कुतर्कों को खण्डित करता हुआ सत्यपक्ष की रक्षा करता है, वैसे ही राजा भूयान, जलयान और अन्तरिक्षयान में बैठकर वज्र से शत्रुओं का उच्छेद कर राष्ट्र की रक्षा करे ॥४॥
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छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
शं꣢ प꣣दं꣢ म꣣घ꣡ꣳ र꣢यी꣣षि꣢णे꣣ न꣡ काम꣢꣯मव्र꣢तो꣡ हि꣢नोति꣣ न꣡ स्पृ꣢शद्र꣣यि꣢म् ॥४४१
पदार्थःहे मेरे अन्तरात्मा रूपी इन्द्र ! (शम्) सुख, शान्ति, (पदम्) उच्च पद, (मघम्) आध्यात्मिक और भौतिक धन (रयीषिणे) ऐश्वर्यप्राप्ति की महत्त्वाकांक्षावाले को ही मिलता है। (अव्रतः) व्रतरहित और अकर्मण्य मनुष्य (कामम्) किसी उच्च आकांक्षा को (न हिनोति) नहीं प्राप्त होता, और (न) न ही (रयिम्) ऐश्वर्य को (स्पृशत्) स्पर्श कर पाता है ॥५॥
भावार्थःधन, सुख, शान्ति और राजा, मन्त्री, न्यायाधीश आदि के उच्च पद एवं मोक्षपद को जो पाना चाहते हैं, उन्हें उसके लिए तीव्र महत्त्वाकांक्षा मन में धारण करके उसकी प्राप्ति के लिए महान् प्रयत्न करना चाहिए ॥५॥
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छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - पञ्चमः
स꣢दा꣣ गा꣢वः꣣ शु꣡च꣢यो वि꣣श्व꣡धा꣢यसः꣣ स꣡दा꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢रे꣣प꣡सः꣢ ॥४४२
पदार्थः(सदा) हमेशा (विश्वधायसः) सबको अपना रस पिलानेवाली (गावः) धेनुएँ, सूर्यकिरणें और वेदवाणियाँ (शुचयः) पवित्र और पवित्रताकारक होती हैं। (सदा) हमेशा (देवाः) दान करने, प्रकाशित होने, प्रकाशित करने आदि गुणवाले सदाचारी विद्वान् लोग (अरेपसः) निर्दोष एवं पवित्र होते हैं ॥६॥
भावार्थःसब स्त्री-पुरुषों को गौओं, सूर्यकिरणों, वेदवाणियों और विद्वानों के समान सदा निर्दोष और पवित्र रहना चाहिए ॥६॥
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छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -उषाः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ या꣢हि꣣ व꣡न꣢सा स꣣ह꣡ गाव꣢꣯ सचन्त वर्त꣣निं꣡ यदूध꣢꣯भिः ॥४४३॥
पदार्थःहे उषा के समान तेजोमयी जगन्माता ! तू (वनसा सह) अपने संभजनीय तेज के साथ (आ याहि) आ, मेरे हृदय में प्रादुर्भूत हो, (यत्) जब (गावः) वेदरूपिणी गौएँ (ऊधभिः) ज्ञानरस से भरे मन्त्ररूप ऊधसों के साथ (वर्तनिम्) मेरे आत्मारूप दोहनगृह में (सचन्त) पहुँचें ॥७॥ इस मन्त्र में उपमानों द्वारा उपमेयों के निगरण होने से अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःउषा का प्रादुर्भाव होने पर जैसे घड़े के समान विशाल ऊधसवाली गौएँ दूध देने के लिए दोहनगृह को प्राप्त होती हैं, वैसे ही जगन्माता के प्रादुर्भूत होने पर ज्ञानरस से पूर्ण वेदरूपिणी गौएँ अपना ज्ञानरूप दूध देने के लिए स्तोता के आत्मा में पहुँचती हैं ॥७॥
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छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
उ꣡प꣢ प्र꣣क्षे꣡ मधु꣢꣯मति क्षि꣣य꣢न्तः꣣ पु꣡ष्ये꣢म र꣣यिं꣢ धी꣣म꣡हे꣢ त इन्द्र ॥४४४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) मधु बरसानेवाले जगदीश्वर ! हम (ते) तुझे (धीमहे) अपने अन्तःकरण में धारण करते हैं। तेरे (मधुमति) मधुर (प्रक्षे) आनन्द के झरने में (क्षियन्तः) निवास करते हुए, हम (रयिम्) आनन्दरूप धन को (पुष्येम) परिपुष्ट करें ॥८॥
भावार्थःजगदीश्वर की उपासना से उसके आनन्द के झरने में अपने-आप को नहलाते हुए हम धन्य हों ॥८॥
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छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣡र्च꣢न्त्य꣣र्कं꣢ म꣣रु꣡तः꣢ स्व꣣र्का꣡ आ स्तो꣢꣯भति श्रु꣣तो꣢꣫ युवा꣣ स꣡ इन्द्रः꣢꣯ ॥४४५॥
पदार्थः(स्वर्काः) उत्तम स्तुति करनेवाले, अथवा उत्तम विधि से वेदमन्त्रों का उच्चारण करनेवाले (मरुतः) ऋत्विज् लोग (अर्कम्) अर्चनीय परमेश्वर की (अर्चन्ति) पूजा करते हैं। (श्रुतः) वेदों में प्रसिद्ध अथवा सुना गया, (युवा) सदा युवा, युवा के समान असीम बलवाला (सः) वह (इन्द्रः) परमेश्वर, उन्हें (आ स्तोभति) सहारा देता है ॥९॥ इस मन्त्र में अनुप्रास अलङ्कार है, साथ ही परस्पर उपकार करने रूप वस्तु से परिवृत्ति अलङ्कार व्यङ्ग्यहै ॥९॥
भावार्थःजो मनुष्य वेदमन्त्रों के गानपूर्वक परमात्मा की आराधना करते हैं, उन्हें वह अक्षय अवलम्ब देकर अनुगृहीत करता है ॥९॥
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छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य वृत्र꣣ह꣡न्त꣢माय꣣ वि꣡प्रा꣢य गा꣣थं꣡ गा꣢यत꣣ यं꣢ जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥४४६॥
पदार्थःहे मित्रो ! (वः) तुम (वृत्रहन्तमाय) सबसे बढ़कर पाप, अज्ञान आदि के विनाशक, (विप्राय) विद्वान्, मेधावी (इन्द्राय) वीर परमेश्वर के लिए (गाथम्) स्तोत्र को (गायत) गाओ, (यम्) जिस स्तोत्र को, वह (जुजोषते) प्रीतिपूर्वक सेवन करता है ॥१०॥
भावार्थःसामस्तोत्रों से परमेश्वर की आराधना करके उससे पुरुषार्थ, पापविनाश और धारणावती बुद्धि की प्रेरणा सबको लेनी चाहिए ॥१०॥ इस दशति में इन्द्र के गुणवर्णनपूर्वक उसकी स्तुति की प्रेरणा होने से, उसके रथ और वज्र का वर्णन होने से, उससे सम्बद्ध वाणियों, गायों, किरणों और विद्वानों की पवित्रता का वर्णन होने से, उससे सम्बद्ध उषा का आह्वान होने से और उसकी अर्चना का फल वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में दशम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡चे꣢त्य꣣ग्नि꣡श्चिकि꣢꣯तिर्हव्य꣣वाड्न꣢꣫ सु꣣म꣡द्र꣢थः ॥४४७॥
पदार्थः(अग्निः) अग्रनेता परमेश्वर (अचेति) हमसे जान लिया या अनुभव कर लिया गया है, जो (चिकितिः) सर्वज्ञ, तथा (सुमद्रथः) श्रेष्ठ विमानादि रथों में प्रयुक्त किये जानेवाले (हव्यवाड् न) विद्युत् रूप अग्नि के समान (सुमद्रथः) श्रेष्ठ शरीर-रथों को या वेगवान् सूर्य, चन्द्र, भूगोल आदियों को रचनेवाला है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे परमात्मा का सबको साक्षात्कार करना चाहिए, वैसे ही विद्युत् रूप अग्नि को भी जानना चाहिए और उसे जानकर समाचार भेजने, विमानादि यानों को चलाने आदि के कार्य सिद्ध करने चाहिएँ ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢ग्ने꣣ त्वं꣢ नो꣣ अ꣡न्त꣢म उ꣣त꣢ त्रा꣣ता꣢ शि꣣वो꣡ भु꣢वो वरू꣣꣬थ्यः꣢꣯ ॥४४८॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन् वा राजन् ! (त्वम्) आप (नः) हमारे (अन्तमः) समीपतम (उत) और (त्राता) विपत्तियों से त्राणकर्ता, (शिवः) कल्याणकारी तथा (वरूथ्यः) वरणीय एवं घरों के लिए हितकर (भुवः) होवो ॥२॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर हमारे निकटतम, विघ्न-विद्वेष-पाप आदि से त्राण करनेवाला, मङ्गलकारी और शरीररूप गृहों का हितकर्ता होता है, वैसे ही निर्वाचन-पद्धति से चुना हुआ राजा प्रजाओं के समीपतम होकर विपत्तियों से बचानेवाला, सुखशान्ति देनेवाला और आवासगृहों के निर्माणार्थ धनादि देनेवाला हो ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
भ꣢गो꣣ न꣢ चि꣣त्रो꣢ अ꣣ग्नि꣢र्म꣣हो꣢नां꣣ द꣡धा꣢ति꣣ र꣡त्न꣢म् ॥४४९
पदार्थः(भगः न) सेवनीय सूर्य के समान (चित्रः) अद्भुत गुण, कर्म, स्वभाववाला (अग्निः) अग्रनेता परमेश्वर वा राजा (महोनाम्) तेजस्वी वा महत्वाकांक्षी जनों के (रत्नम्) रमणीय ऐश्वर्य को (दधाति) परिपुष्ट करता है ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजो स्वयं महत्वाकांक्षी वा तेजस्वी नहीं हैं, उनकी परमात्मा वा राजा भी भला क्या सहायता करेंगे ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
वि꣡श्व꣢स्य꣣ प्र꣡ स्तो꣢भ पु꣣रो꣢ वा꣣ स꣡न्यदि꣢꣯ वे꣣ह꣢ नू꣣न꣢म् ॥४५०
पदार्थःहे (इन्द्र) सबको सहायता प्रदान करनेवाले जगदीश्वर ! आप (विश्वस्य) सबको (प्र स्तोभ) भली-भाँति अवलम्ब दो, (पुरो वा सन्) चाहे आप प्रत्यक्ष सामने विद्यमान होवो, (यदि वा) अथवा चाहे (नूनम्) परोक्ष विद्यमान होवो ॥४॥
भावार्थःप्रत्यक्ष हो चाहे परोक्ष, सदा ही परमेश्वर हमें अवलम्ब देता है। यद्यपि वह सदा सबके समक्ष ही है, तो भी जैसे दिनौंधी रोग से ग्रस्त लोग सांसारिक पदार्थों को नहीं देख पाते हैं, वैसे ही अज्ञान से ग्रस्त हम जब उसे नहीं देख पाते, तब वह परोक्ष कहलाता है ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -उषाः| स्वर - पञ्चमः
उ꣣षा꣢꣫ अप꣣ स्व꣢सु꣣ष्ट꣢मः꣣ सं꣡ व꣢र्त्तयति वर्त꣣नि꣡ꣳ सु꣢जा꣣त꣡ता꣢ ॥४५१
पदार्थःजैसे (उषाः) प्रभातकालीन प्राकृतिक उषा (स्वसुः) अपनी बहिन रात्रि के (तमः) अन्धकार को (अप) हटा देती है, और (सुजातता) अपने श्रेष्ठ जन्म से (वर्तनिम्) मार्ग को (सं वर्तयति) प्रकाशित कर देती है, वैसे ही (उषाः) योगशास्त्र में प्रसिद्ध आत्मख्याति (स्वसुः) आत्मा में राग, द्वेष आदि को प्रक्षिप्त करनेवाली अविद्या के (तमः) तामसिक प्रभाव को (अप) दूर कर देती है और (सुजातता) अपने शुभ जन्म से (वर्तनिम्) साधक के योगमार्ग को (सं वर्तयति) अध्यात्मप्रकाश से प्रकाशित कर देती है ॥५॥
भावार्थःजो मनुष्य अविद्यारूप रात्रि को दूर करके विवेकख्यातिरूप उषा के प्रकाश को प्राप्त करते हैं, वे मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा पङ्क्तिः| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - पञ्चमः
इ꣣मा꣢꣫ नु कं꣣ भु꣡व꣢ना सीषधे꣣मे꣡न्द्र꣢श्च꣣ वि꣡श्वे꣢ च दे꣣वाः꣢ ॥४५२॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्मपक्ष में। हम, (इन्द्रः च) तथा द्रष्टा हमारा जीवात्मा, (विश्वेदेवाः च) और ज्ञान के साधन सब मन, बुद्धि तथा ज्ञानेन्द्रियाँ (इमा भुवना) इन अन्नमय, प्राणमय आदि कोश रूप सब भुवनों को (कम्) सुखपूर्वक (सीषधेम) प्रसाधित करें ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हम प्रजाजन, (इन्द्रः च) और वीर राजनीतिज्ञ राजा, (विश्वेदेवाः च) और सब विद्वान् राजसभासद्, मिलकर (इमा भुवना) राष्ट्र के इन सब नगरों को (कम्) सुखपूर्वक (सीषधेम) अलङ्कृत और समृद्ध करें ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजीवात्मा, मन, बुद्धि आदि की सहायता से शरीर के और राजा, मन्त्री, सभासदों आदि की सहायता से राष्ट्र के उत्कर्ष को भली-भाँति सिद्ध कर सब लोग सफल जन्मवाले हों ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - षड्जः
वि꣢ स्रु꣣त꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थ꣢꣫ इन्द्र꣣ त्व꣡द्य꣢न्तु रा꣣त꣡यः꣢ ॥४५३॥
पदार्थःहे सब विद्वानो तथा हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर, जीवात्मन् वा राजन् ! (त्वत्) तेरे पास से (रातयः) दान (वि यन्तु) विविध दिशाओं में जाएँ, (यथा) जैसे (पथः) राजमार्ग से (स्रुतयः) छोटे-छोटे मार्ग विविध दिशाओं में जाते हैं ॥७॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःपरमेश्वर, जीवात्मा और राजा से धन, धर्म, सत्य, अहिंसा, न्याय, विद्या, दया, उदारता, स्वास्थ्य, दीर्घायुष्य आदि दानों को प्राप्त करके हम श्रेष्ठ नागरिक बनें ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
अ꣣या꣡ वाजं꣢꣯ दे꣣व꣡हि꣢तꣳ सनेम꣣ म꣡दे꣢म श꣣त꣡हि꣢माः सु꣣वी꣡राः꣢ ॥४५४॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन्, जीवात्मन् अथवा राजन् ! हम (अया) इस देह से अथवा इस बुद्धि से (देवहितम्) विद्वानों वा इन्द्रियों के लिए हितकर (वाजम्) धन, बल और विज्ञान को (सनेम) प्राप्त करें, और (सुवीराः) उत्तम वीर पुत्रों सहित, हम (शतहिमाः) सौ वर्ष (मदेम) आनन्द लाभ करते रहें ॥८॥
भावार्थःवही धन, बल और विज्ञान श्रेष्ठ होता है, जो परोपकार में प्रयुक्त हो। उसे पाकर कम से कम सौ वर्ष जीनेवाले सब स्त्री-पुरुष होवें ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -द्विपदा त्रिष्टुप्| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - धैवतः
ऊ꣣र्जा꣢ मि꣣त्रो꣡ वरु꣢꣯णः पिन्व꣣ते꣢डाः꣣ पी꣡व꣢री꣣मि꣡षं꣢ कृणु꣣ही꣡ न꣢ इन्द्र ॥४५५
पदार्थःप्रथम—परमात्मा आदि के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! आप, (मित्रः) सूर्य और (वरुणः) वायु, मिलकर (ऊर्जा) रस से (इडाः) भूमियों को (पिन्वत) सींचो। हे इन्द्र परमात्मन् ! आप (नः) हमारे लिए (पीवरीम्) प्रचुर (इषम्) धान्य-सम्पत्ति को (कृणुहि) उत्पन्न करो, जिससे हम दुर्भिक्ष आदि से पीड़ित न हों ॥ द्वितीय—शरीर के पक्ष में। हे (इन्द्र) मेरे जीवात्मन् ! तू, (मित्रः) प्राण और (वरुणः) अपान मिलकर (ऊर्जा) बल के साथ (इडाः) मधुर वाणियों को (पिन्वत) प्रेरित करो। हे इन्द्र जीवात्मन् ! तू (नः) हमारे लिए (पीवरीम्) प्रचुर (इषम्) ज्ञान-सम्पदा को (कृणुहि) उत्पन्न कर ॥ तृतीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् राजन् ! आप (मित्रः) राजमन्त्री और (वरुणः) सेनापति, मिलकर (ऊर्जा) अन्न के साथ (इडाः) भूमियों और गौओं को (पिन्वत) बहुतायत से प्रदान करो। हे इन्द्र राजन् ! आप (इषम्) प्रजा को (पीवरीम्) समृद्ध (कृणुहि) करो ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःपरमात्मा, जीवात्मा और राजा मन, बुद्धि, प्राण, अपान, सूर्य, वायु, सचिव, सेनापति आदियों के साथ मिलकर भोज्य, पेय, बल, वाणी, भूमि, गाय आदि सम्पदाओं से हमें समृद्ध करें ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -एकपदा गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्रो꣣ वि꣡श्व꣢स्य राजति ॥४५६॥
पदार्थः(इन्द्रः) परब्रह्म परमेश्वर (विश्वस्य) सकल ब्रह्माण्ड का, (इन्द्रः) अखण्ड जीवात्मा (विश्वस्य) सकल शरीर का, और (इन्द्रः) प्रजाओं से निर्वाचित राजा (विश्वस्य) सकल राष्ट्र का (राजति) सम्राट् है ॥१०॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःपरमात्मा, जीवात्मा और राजा को अपने-अपने क्षेत्र का सम्राट् मानकर उनसे यथायोग्य लाभ प्राप्त करने चाहिएँ ॥१०॥ इस दशति में अग्नि और इन्द्र नामों से परमात्मा, राजा आदि के गुण-कर्मों का वर्णन होने से, उषा नाम से प्राकृतिक और आध्यात्मिक उषा का वर्णन होने से, और ब्रह्माण्ड, शरीर तथा राष्ट्र में सब देवों के कर्तृत्व आदि का निरूपण होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में ग्यारहवाँ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अष्टिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्रि꣡क꣢द्रुकेषु महि꣣षो꣡ यवा꣢꣯शिरं तुविशु꣣ष्म꣢स्तृ꣣म्प꣡त्सोम꣢꣯मपिब꣣द्वि꣡ष्णु꣢ना सु꣣तं꣡ य꣢थाव꣣श꣢म् । स꣡ ईं꣢ ममाद꣣ म꣢हि꣣ क꣢र्म꣣ क꣡र्त्त꣢वे म꣣हा꣢मु꣣रु꣡ꣳ सैन꣢꣯ꣳ सश्चद्दे꣣वो꣢ दे꣣व꣢ꣳ स꣣त्य꣡ इन्दुः꣢꣯ स꣣त्य꣡मिन्द्र꣢꣯म् ॥४५७॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य-चन्द्र के पक्ष में। (त्रिकद्रुकेषु) वायु, बिजली और बादल रूप तीन पदार्थों से युक्त अन्तरिक्षभागों में (महिषः) महान् (तुविशुष्मः) बहुत बलवान् सूर्यरूप इन्द्र (यवाशिरम्) संयुक्त-वियुक्त होनेवाली सूर्यकिरणों से पूर्णता को प्राप्त होनेवाले (सोमम्) चन्द्रमा को (तृम्पत्) तृप्ति प्रदान करता है, और चन्द्रमा (विष्णुना) उस व्याप्तिमान् सूर्य से (सुतम्) उत्पन्न किये किरणसमूह को (यथावशम्) यथेच्छ (अपिबत्) पान करता है। (सः) वह चन्द्रमा में प्रविष्ट सूर्यकिरणसमूह (ईम्) इस चन्द्रमा को (महि) महान् (कर्म) प्राण-प्रदान, चान्द्र मासों के निर्माण आदि कार्य (कर्तवे) करने के लिए (ममाद) हर्षित करता है। (सः) वह (देवः) प्रकाशमान (सत्यः) सत्य नियमवाला (इन्दुः) चन्द्रमा (एनम्) इस (देवम्) प्रकाशक (सत्यम्) सत्य नियमोंवाले (इन्द्रम्) सूर्य का (सश्चत्) सेवन करता रहता है ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य के पक्ष में। (त्रिकद्रुकेषु) ज्ञानकाण्ड, कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड रूप तीन सवनोंवाले शिक्षायज्ञों में (महिषः) महान् (तुविशुष्मः) विद्यार्थी का अतिशय प्रतिभा-बल से युक्त आत्मा (तृम्पत्) तृप्ति लाभ करता हुआ (विष्णुना) व्याप्त विद्यावाले आचार्य से (सुतम्) अभिषुत, (यवाशिरम्) व्रतपालनरूप कर्मों से परिपक्व (सोमम्) ज्ञानरस को (यथावशम्) यथेच्छ (अपिबत्) पान करता है। (सः) पान किया हुआ वह ज्ञान-रस (महाम्) विद्या में महान् (उरुम्) विशाल हृष्टपुष्ट शरीरवाले (ईम्) विद्यार्थी के इस आत्मा को (महि) महान् (कर्म) समाजसुधार आदि कर्म (कर्तवे) करने के लिए (ममाद) हर्षित करता है। (देवः) दिव्यगुणयुक्त (सत्यः) सत्य (सः) वह (इन्दुः) विद्यारस (देवम्) दिव्य गुणवाले (सत्यम्) सत्यप्रिय (इन्द्रम्) आत्मा को (सश्चत्) निरन्तर प्राप्त होता रहता है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘देवो, देवं’ में छेकानुप्रास और ‘सत्य, सत्य’ में यमक है ॥१॥
भावार्थःविद्यार्थी का आत्मा गुरु के पास से ज्ञानरस का पान करके वैसे ही महान् कर्म करने योग्य हो जाता है, जैसे चन्द्रमा सूर्य के पास से प्रकाश का पान कर प्राणप्रदान आदि महान् कर्मों को करता है ॥१॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अतिजगती| देवता -सूर्यः| स्वर - निषादः
अ꣣य꣢ꣳ स꣣ह꣢स्र꣣मा꣡न꣢वो दृ꣣शः꣡ क꣢वी꣣नां꣢ म꣣ति꣢꣫र्ज्योति꣣र्वि꣡ध꣢र्म । ब्र꣣ध्नः꣢ स꣣मी꣡ची꣢रु꣣ष꣢सः꣣ स꣡मै꣢रयदरे꣣प꣢सः꣣ स꣡चे꣢त꣣सः स्व꣡स꣢रे मन्यु꣣म꣡न्त꣢श्चि꣣ता꣢ गोः ॥४५८॥
पदार्थः(अयम्) यह सूर्य, परमेश्वर वा आचार्य (सहस्रम्) अकेला भी सहस्र के तुल्य, (आनवः) मनुष्यों के लिए हितकर, (दृशः) द्रष्टा अथवा दर्शन करानेवाला, (कवीनाम्) मेधावी विद्वानों का (मतिः) मतिप्रदाता, और (विधर्म ज्योतिः) विशेष धारक प्रकाश से युक्त है। (ब्रध्नः) महान् यह सूर्य, परमेश्वर वा आचार्य (समीचीः) सम्यक् गतिवाली, (अरेपसः) निर्मल (उषसः) उषाओं को अथवा ज्ञानदीप्तियों को (समैरयत्) भली-भाँति प्रेरित करता है, जिससे (स्वसरे) उज्ज्वल दिन अथवा दिन के समान उज्ज्वल विवेक के प्रकट हो जाने पर (सचेतसः) सहृदय जन (मन्युमन्तः) तेजयुक्त अथवा ब्रह्मवर्चस्वी होकर (गोः) किरणसमूह के अथवा वेदवाणी के (चिताः) ज्ञाता हो जाते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मतिः और ज्योतिः के अर्थ लक्षणा द्वारा क्रमशः मतिप्रदाता और ज्योतिष्मान् होते हैं। ‘तिर्, तिर्’, ‘समी, समै’ और ‘चेत, चिता’ में छेकानुप्रास तथा सकार, रेफ व तकार की पृथक्-पृथक् अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे सूर्य प्रकाशवती उषाओं को प्रेरित करता है, वैसे ही परमात्मा और आचार्य मनुष्यों में विद्या एवं विवेक की कान्तियों को उत्पन्न करते हैं ॥२॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ए꣡न्द्र꣢ या꣣ह्यु꣡प꣢ नः परा꣣व꣢तो꣣ ना꣡यमच्छा꣢꣯ वि꣣द꣡था꣢नीव꣣ स꣡त्प꣢ति꣣र꣢स्ता꣣ रा꣡जे꣢व꣣ स꣡त्प꣢तिः । ह꣡वा꣢महे त्वा꣣ प्र꣡य꣢स्वन्तः सु꣣ते꣢꣫ष्वा पु꣣त्रा꣢सो꣣ न꣢ पि꣣त꣢रं꣣ वा꣡ज꣢सातये꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठं꣣ वा꣡ज꣢सातये ॥४५९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् एवं विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य ! (अयम्) यह आप (नः अच्छ) हमारे प्रति (उप आ याहि) आइये, (परावतः न) जैसे कोई दूरदेश से आता है, और (सत्पतिः) श्रेष्ठ गृहपति (विदथान् इव) जैसे यज्ञों में आता है, और (सत्पतिः) सज्जनों का पालक (राजा) राजा (अस्ता इव) जैसे राजदरबार में आता है। (प्रयस्वन्तः) प्रयत्नवान् हम (त्वा) आपको (सुतेषु) आनन्द-रसों, वीर-रसों और विद्या-रसों के निमित्त से (आ हवामहे) बुलाते हैं। (पुत्रासः न) जैसे पुत्र (पितरम्) पिता को (वाजसातये) अन्नादि की प्राप्ति के लिए बुलाते हैं, वैसे ही (मंहिष्ठम्) धन, बल, विद्या आदि के अतिशय दानी आपको, हम (वाजसातये) धन, बल, विद्या आदि की प्राप्ति के लिए बुलाते हैं ॥३॥ इस मन्त्र में चार उपमाएँ हैं। ‘सत्पति’ और ‘वाजसातये’ की एक-एक बार आवृत्ति में यमक अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर और गुरुजन जिसके अनुकूल होते हैं, वह सब विपत्तियों को पार करके उत्कृष्ट ऐश्वर्यों को प्राप्त कर लेता है ॥३॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अतिजगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
त꣡मिन्द्रं꣢꣯ जोहवीमि म꣣घ꣡वा꣢नमु꣣ग्र꣢ꣳ स꣣त्रा꣡ दधा꣢꣯न꣣म꣡प्र꣢तिष्कुत꣣ꣳ श्र꣡वा꣢ꣳसि꣣ भू꣡रि꣢ । म꣡ꣳहि꣢ष्ठो गी꣣र्भि꣡रा च꣢꣯ य꣣ज्ञि꣡यो꣢ ववर्त्त रा꣣ये꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢ सु꣣प꣡था꣢ कृणोतु व꣣ज्री꣢ ॥४६०॥
पदार्थःमैं (तम्) उस प्रसिद्ध (मघवानम्) ऐश्वर्यवान् (उग्रम्) अन्यायों और अन्यायियों के प्रति उग्र, (सत्रा दधानम्) सत्य को धारण करनेवाले, (अप्रतिष्कुतम्) शत्रुओं से प्रतिरुद्ध न होनेवाले (इन्द्रम्) परमात्मा, राजा वा आचार्य से (भूरि) अनेकानेक (श्रवांसि) यशों की (जोहवीमि) बार-बार याचना करता हूँ। (मंहिष्ठः) अतिशय दानी, (यज्ञियः) पूजा वा सत्कार के योग्य वह (गीर्भिः) उपदेशवाणियों के साथ (आ ववर्त) हमारे अभिमुख होवे। (वज्री) अविद्या-अन्याय आदि पर, हिंसा-असत्य-तस्करी आदि पर और हिंसकों पर वज्र उठानेवाला वह (राये) ऐश्वर्य के लिए (विश्वा नः) हम सबको (सुपथा) सुपथ से (कृणोतु) ले चले ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर, राजा और आचार्य जिन पर अनुग्रह करते हैं, वे सन्मार्ग पर चलनेवाले और यशस्वी होते हैं ॥४॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -विश्वेदेवाः| स्वर - गान्धारः
अ꣢स्तु꣣ श्रौ꣡ष꣢ट्पु꣣रो꣢ अ꣣ग्निं꣢ धि꣣या꣡ द꣢ध꣣ आ꣡ नु त्यच्छर्धो꣢꣯ दि꣣व्यं꣡ वृ꣢णीमह इन्द्रवा꣣यू꣡ वृ꣢णीमहे । य꣡द्ध꣢ क्रा꣣णा꣢ वि꣣व꣢स्व꣢ते꣣ ना꣡भा꣢ स꣣न्दा꣢य꣣ न꣡व्य꣢से । अ꣢ध꣣ प्र꣢ नू꣣न꣡मुप꣢꣯ यन्ति धी꣣त꣡यो꣢ दे꣣वा꣢꣫ꣳअच्छा꣣ न꣢ धी꣣त꣡यः꣢ ॥४६१॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म पक्ष में। (अस्तु श्रौषट्) हमारी प्रार्थना सुनी जाए, अर्थात् हमारी कामनाएँ पूर्ण हों। मैं (अग्निम्) अग्रनायक परमात्मा को (पुरः दधे) सम्मुख स्थापित करता हूँ। हम सब (त्यत्) उस अति उपयोगी (दिव्यं शर्धः) प्रकाशपूर्ण आत्म-बल का (नु) शीघ्र ही (आ वृणीमहे) उपयोग करते हैं। (इन्द्रवायू) मन और प्राण का (वृणीमहे) उपयोग करते हैं। (यत् ह) जब वे मन और प्राण (नाभा) केन्द्रभूत हृदय-प्रदेश में (सन्दाय) स्वयं को बाँधकर (नव्यसे) अतिशय प्रशंसनीय (विवस्वते) अज्ञानान्धकार के निवारक आत्मा के लिए (क्राणा) उच्च संकल्प, प्राणवशीकरण आदि कर्म को करनेवाले होते हैं, (अध) तब (नूनम्) अवश्य ही (धीतयः) धारणा, ध्यान, समाधियाँ (उप प्रयन्ति) योगी के समीप आ जाती हैं, सिद्ध हो जाती हैं, (न) जिस प्रकार (धीतयः) अङ्गुलियाँ (देवान् अच्छ) माता, पिता, अतिथि आदि विद्वानों को ‘नमस्ते’ करने के लिए (उप प्रयन्ति) तत्पर होती हैं ॥ द्वितीय—अधिदैवत पक्ष में। (अस्तु श्रौषट्) मेरा वचन सुना जाए। मैं (अग्निम्) भौतिक आग का (धिया) बुद्धि या कर्मकौशल से (पुरः दधे) शिल्पादि कर्मों में उपयोग लेता हूँ। हम सभी (त्यत्) उस (दिव्यम्) द्युलोक में विद्यमान (शर्धः) बलवान् सूर्य का (नु) शीघ्र ही (आ वृणीमहे) शिल्पकर्म में उपयोग करते हैं। (इन्द्र-वायू) विद्युत् और वायु का (वृणीमहे) उपयोग करते हैं। (यद् ह) जब वे विद्युत् और वायु (नाभा) केन्द्रभूत अन्तरिक्ष में (सन्दाय) पृथिवी आदि लोकों को आकर्षण-गुण से बाँधकर (नव्यसे) हर ऋतु में नवीन रूप में प्रकट होनेवाले (विवस्वते) अन्धकार-निवारक सूर्य के चारों ओर (क्राणा) परिक्रमा कराते हैं, (अध) तब (नूनम्) निश्चय ही (धीतयः) सूर्य-किरणें (उप प्रयन्ति) उन पृथिवी आदि लोकों को प्राप्त होती हैं। शेष पूर्ववत् ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। ‘वृणीमह, वृणीमहे’ में लाटानुप्रास और ‘धीतयो, धीतयः’ में यमक है ॥५॥
भावार्थःजैसे शिल्पविद्या की उन्नति से अग्नि, सूर्य, बिजली और वायु को यन्त्र, यान आदियों में भली-भाँति प्रयुक्त करके मनुष्य महान् सुख प्राप्त कर सकते हैं, वैसे ही योगविद्या की उन्नति से जीवात्मा, मन, प्राण एवं इन्द्रियों के सामञ्जस्य द्वारा योगसमाधि और मोक्ष प्राप्त किये जा सकते हैं ॥५॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अतिजगती| देवता -मरुतः| स्वर - निषादः
प्र꣡ वो꣢ म꣣हे꣢ म꣣त꣡यो꣢ यन्तु꣣ वि꣡ष्ण꣢वे म꣣रु꣡त्व꣢ते गिरि꣣जा꣡ ए꣢व꣣या꣡म꣢रुत् । प्र꣡ शर्धा꣢꣯य꣣ प्र꣡ यज्य꣢꣯वे सुखा꣣द꣡ये꣢ त꣣व꣡से भ꣣न्द꣡दि꣢ष्टये꣣ धु꣡नि꣢व्रताय꣣ श꣡व꣢से ॥४६२॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म-पक्ष में। हे साथियों ! (महे) महान्, (मरुत्वते) प्राणयुक्त (विष्णवे) सारे शरीर में व्याप्त क्रियावाले अपने जीवात्मा के प्रोत्साहनार्थ (वः) तुम्हारी (मतयः) बुद्धियाँ वा वाणियाँ (प्र यन्तु) प्रवृत्त हों, जो जीवात्मा (गिरिजाः) पर्वत-सदृश शरीर में जन्मा हुआ और (यवयामरुत्) वेगवान् प्राणवाला है। (यज्यवे) शरीर-सञ्चालन रूप यज्ञ के कर्ता, (सुखादये) रोग आदियों को पूर्णतः खा जानेवाले (तवसे) शरीर से वृद्धिशील, (भन्ददिष्टये) सुखजनक शतायुष्य रूप इष्टि को करनेवाले, (धुनिव्रताय) शारीरिक और मानसिक दोषों को कंपित करनेवाले कर्म से युक्त (शवसे) बलवान् (शर्धाय) प्राणबल को पाने के लिए भी, तुम्हारी बुद्धियाँ वा वाणियाँ (प्र प्र यन्तु) प्रकृष्ट रूप से प्रवृत्त हों ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे राष्ट्रवासियो ! (महे) महान् (मरुत्वते) प्रशस्त योद्धा सैनिकों से युक्त (विष्णवे) यानों द्वारा जल, स्थल, अन्तरिक्ष तीनों स्थानों में व्याप्त होनेवाले राजा के लिए (वः) तुम्हारी (मतयः) वाणियाँ (प्र यन्तु) प्रवृत्त हों, जो राजा (गिरिजाः) पर्वततुल्य सर्वोच्च पद पर अभिषिक्त और (एवया-मरुत्) वेगवान् सैनिकोंवाला है। और (यज्यवे) राष्ट्ररक्षा-रूप यज्ञ के अनुष्ठाता, (सुखादये) उत्कृष्ट पादत्राणों और हस्तत्राणों से युक्त, (तवसे) गतिमान्, कर्मण्य, (भन्ददिष्टये) संग्रामरूप यज्ञ से सुख पानेवाले, (धुनिव्रताय) शत्रुप्रकम्पक कर्मोंवाले, (शवसे) बलवान् (शर्धाय) वीर योद्धाओं के सैन्य के लिए भी, तुम्हारी वाणियाँ (प्र प्र यन्तु) अतिशय प्रवृत्त हों, अर्थात् तुम राजा की तथा उसके सैन्यगण की प्रशंसा करो और उन्हें उत्तम उद्बोधन दो ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःमनुष्य जब प्राणायाम से शारीरिक और मानसिक दोषों को जलाकर आत्मिक बल बढ़ाते हैं, तब सब सिद्धियाँ उन्हें हस्तगत हो जाती हैं। वैसे ही राष्ट्र के वीर सैनिक सब शत्रुओं को कँपा कर जब राजा के बल को बढ़ाते हैं, तब राष्ट्र में सब उन्नतियाँ भासित होने लगती हैं ॥६॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣣या꣢ रु꣣चा꣡ हरि꣢꣯ण्या पुना꣣नो꣢꣫ विश्वा꣣ द्वे꣡षा꣢ꣳसि तरति स꣣यु꣡ग्व꣢भिः꣣ सू꣢रो꣣ न꣢ स꣣यु꣡ग्व꣢भिः । धा꣡रा꣢ पृ꣣ष्ठ꣡स्य꣢ रोचते पुना꣣नो꣡ अ꣢रु꣣षो꣡ हरिः꣢꣯ । वि꣢श्वा꣣ य꣢द्रू꣣पा꣡ प꣢रि꣣या꣡स्यृक्व꣢꣯भिः स꣣प्ता꣡स्ये꣢भि꣣रृ꣡क्व꣢भिः ॥४६३॥
पदार्थःयह सोम अर्थात् इन्द्रियों को कर्मों में प्रेरित करनेवाला आत्मा (अया) इस (हरिण्या) हृदयहारिणी (रुचा) तेजस्विता से (पुनानः) पवित्रता देता हुआ (सयुग्वभिः) साथ नियुक्त होनेवाले प्राणों के साथ मिलकर (विश्वा द्वेषांसि) सब द्वेषी विघ्नों अथवा काम, क्रोध आदि छहों रिपुओं को (तरति) पार कर लेता है, (सूरः न) जैसे सूर्य(सयुग्वभिः) सहयोगी किरणों से (विश्वा द्वेषांसि) सब शत्रुभूत अन्धकारों को (तरति) पार करता है। (पृष्ठस्य) प्रकाशसेचक आत्मारूप सोम की (धारा) प्रकाश-धारा (रोचते) भासित होती है। (अरुषः) तेज से आरोचमान (हरिः) पापहारी तू आत्मारूप सोम (पुनानः) मन, बुद्धि आदि को पवित्र करता है, (यत्) जबकि तू (ऋक्वभिः) प्रशस्तस्तुतियुक्त कर्मों के साथ, और (ऋक्वभिः) प्रशंसनीय (सप्तास्यैः) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इन सप्तमुख प्राणों के साथ (विश्वा रूपा) सब रूपधारी मनुष्यों को (परियासि) प्राप्त होता है ॥ यहाँ ‘सूरो न सयुग्वभिः’ द्वारा सूर्य को उपमान बनाने से शेष मन्त्र सूर्य के पक्ष में भी घटता है। कैसा सूर्य? जो (अया) इस (हरिण्या) तमोहारिणी (रुचा) दीप्ति से (पुनानः) भूमि को पवित्र करता हुआ (सयुग्वभिः) सहयोगी किरणों से (विश्वा द्वेषांसि) सब द्वेषकारी अन्धकार, रोग आदियों को (तरति) निवारण करता है, (पृष्ठस्य) वृष्टिकर्ता जिस सूर्य की (धारा) प्रकाशधारा या वृष्टिधारा (रोचते) चमकती है, जो (अरुषः) तेजस्वी रूपवाला (हरिः) आकर्षण-बल से पृथिवी आदि लोकों का धारणकर्ता सूर्य (पुनानः) पवित्रता देता है, (यत्) जबकि (सप्तास्येभिः) सात मुखों अर्थात् रंगोंवाली (ऋक्वभिः) प्रशंसनीय किरणों से (विश्वा रूपाणि) सब रूपवान् वस्तुओं को (परियासि) प्राप्त होता है ॥७॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। ‘सयुग्वभिः’ और ‘ऋक्वभिः’ की एक-एक बार आवृत्ति में यमक है ॥७॥
भावार्थःजैसे सूर्य अपनी किरणों से रोग, मलिनता आदि को दूर कर समस्त भूमण्डल को पवित्र करता है, वैसे ही मनुष्यों का आत्मा सब पाप, द्वेष आदि कल्मषों को दूर कर जीवन को पवित्र करे ॥७॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -सविता| स्वर - गान्धारः
अ꣣भि꣢꣫ त्यं दे꣣व꣡ꣳ स꣢वि꣣ता꣡र꣢मो꣣꣬ण्योः꣢꣯ क꣣वि꣡क्र꣢तु꣣मर्चा꣡मि꣢ स꣣त्य꣡स꣢वꣳ रत्न꣣धा꣢म꣣भि꣢ प्रि꣣यं꣢ म꣣ति꣢म् ऊ꣣र्ध्वा꣢꣫ यस्या꣣म꣢ति꣣र्भा꣡ अदि꣢꣯द्युत꣣त्स꣡वी꣢मनि꣣ हि꣡र꣢ण्यपाणिरमिमीत सु꣣क्र꣡तुः꣢ कृ꣣पा꣡ स्वः꣢ ॥४६४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। मैं (त्यम्) उस प्रसिद्ध गुण-कर्म-स्वभाववाले, (ओण्योः) द्यावापृथिवी के अथवा वाणी और मन के (देवम्) प्रकाशक, (कविक्रतुम्) क्रान्तदर्शिनी प्रज्ञावाले अथवा बुद्धिपूर्ण कर्मोंवाले, (सत्यसवम्) सत्य ऐश्वर्यवाले अथवा सत्य प्रेरणावाले, (रत्नधाम्) रमणीय लोकों के धारणकर्ता, (प्रियम्) प्रिय, (मतिम्) ज्ञानी (सवितारम्) जगदुत्पादक परमेश्वर की (अभि अर्चामि) अभिमुख होकर पूजा करता हूँ। (यस्य) जिस परमेश्वर की (ऊर्ध्वा) उत्कृष्ट (अमतिः भाः) आत्मदीप्ति (अदिद्युतत्) उपासकों को आत्मिक प्रकाश देती है, उसके (सवीमनि) अनुशासन में, हम होवें। (हिरण्यपाणिः) ज्योतियों को व्यवहार में लानेवाले, (सुक्रतुः) उत्तम प्रज्ञा व कर्मोंवाले उस परमेश्वर ने (कृपा) अपनी कृपा से (स्वः) ज्योतिष्मान् सूर्य को (अमिमीत) बनाया है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। मैं प्रजाजन (त्यम्) उस विशिष्ट गुण-कर्म-स्वभाववाले, (ओण्योः) स्त्री-पुरुषों को (देवम्) विद्या आदि से प्रकाशित करनेवाले, (कविक्रतुम्) बुद्धिपूर्ण कर्मोंवाले, (सत्यसवम्) सत्य ज्ञानवाले, (रत्नधाम्) रमणीय धनों को प्रदान करनेवाले, (प्रियम्) प्रिय, (मतिम्) विचारशील, (सवितारम्) सदाचार के प्रेरक राजा का (अभि अर्चामि) सत्कार करता हूँ। (यस्य) जिस राजा का (ऊर्ध्वा) उच्च (अमतिः) सर्वाधिक तेजस्वी रूप, और जिसकी (भाः) यश की कान्ति (अदिद्युतत्) अन्यों को भी तेजस्वी और यशस्वी करते हैं, उसके (सवीमनि) अनुशासन में हम रहें। (हिरण्यपाणिः) सुवर्ण आदि धन को दानार्थ हाथ में ग्रहण करनेवाला, (सुक्रतुः) शुभ कर्मोंवाला वह राजा (कृपा) अपने सामर्थ्य से, राष्ट्र में (स्वः) सुख को (अमिमीत) रचता है ॥ तृतीय—सूर्य के पक्ष में। मैं (त्यम्) उस सुदूरस्थ, (ओण्योः) भूमि-आकाश के (देवम्) प्रकाशक, (कविक्रतुम्)मेधावियों के कर्मों के सदृश भूमण्डल-धारण, ऋतुचक्रप्रवर्तन आदि कर्मों को करनेवाले, (सत्यसवम्) जल को ऊपर-नीचे ले जानेवाले, (रत्नधाम्) सोना, चाँदी, हीरे, मोती आदि रत्नों को भूमि में स्थापित करनेवाले, (प्रियम्) तृप्तिप्रदाता, (मतिम्) ज्ञान में साधन बननेवाले (सवितारम्) सूर्य की (अभि अर्चामि) स्तुति करता हूँ, अर्थात् उसके गुण-कर्मों का वर्णन करता हूँ। (यस्य) जिस सूर्य की (अमतिः भाः) रूपवती प्रभा (सवीमनि) उत्पन्न भूमण्डल पर (अदिद्युतत्) सब पदार्थों को प्रकाशित करती है, वह (हिरण्यपाणिः) सुनहरी किरणोंवाला, (सुक्रतुः) उत्तम कर्मोंवाला सूर्य (कृपा) अपने सामर्थ्य से (स्वः) प्रकाश को (अमिमीत) उत्पन्न करता है ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःअनुपम गुण-कर्म-स्वभाववाले परमेश्वर की पूजा करके, राजा का सत्कार करके और सूर्य का उपयोग करके प्रजाएँ सुख प्राप्त करती हैं ॥८॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
अ꣣ग्नि꣡ꣳ होता꣢꣯रं मन्ये꣣ दा꣡स्व꣢न्तं꣣ व꣡सोः꣢ सू꣣नु꣡ꣳ सह꣢꣯सो जा꣣त꣡वे꣢दसं꣣ वि꣢प्रं꣣ न꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसम् । य꣢ ऊ꣣र्ध्व꣡या꣢ स्वध्व꣣रो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣वा꣡च्या꣢ कृ꣣पा꣢ । घृ꣣त꣢स्य꣣ वि꣡भ्रा꣢ष्टि꣣म꣡नु꣢ शु꣣क्र꣡शो꣢चिष आ꣣जु꣡ह्वा꣢नस्य स꣣र्पि꣡षः꣢ ॥४६५॥
पदार्थःमैं (होतारम्) सृष्ट्युत्पत्ति और प्रलय के कर्ता, (वसोः) धन के (दास्वन्तम्) दाता, (सहसः सूनुम्) बल के प्रेरक, (जातवेदसम्) प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान, सर्वान्तर्यामी, (विप्रं न) विद्वान् के समान (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता (अग्निम्) अग्रनेता परमेश्वर की (मन्ये) पूजा करता हूँ। (देवः) स्वयं प्रकाशित तथा अन्यों का प्रकाशक (यः) जो परमेश्वर (ऊर्ध्वया) उन्नत, (देवाच्या) सूर्य, चन्द्र आदि देवों के प्रति गयी हुई (कृपा) अपनी शक्ति से (स्वध्वरः) उत्कृष्ट सृष्टि-यज्ञ को चला रहा है, वही (आजुह्वानस्य) अग्नि में आहुत किये जाते हुए, (शुक्रशोचिषः) उज्ज्वल दीप्तिवाले (घृतस्य) घृत की (विभ्राष्टिम्) प्रदीप्ति में भी (अनु) अनुप्रविष्ट है, अर्थात् अग्नि का प्रदीप्त होना आदि क्रियाएँ भी परमेश्वर के ही सामर्थ्य से हो रही हैं, जैसाकि उपनिषद् में भी कहा है—‘उसी की चमक से यह सब-कुछ चमक रहा है’ (श्वेता० ६।१४) ॥९॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘जातवेदसम्’ की पुनरुक्ति में यमक और ‘देवो, देवा’ में छेकानुप्रास है ॥९॥
भावार्थःअग्नि में घृत की आहुति देने से जो प्रभा होती है, वह धन, बल, ज्ञान आदि के प्रदाता, सृष्टि के व्यवस्थापक जगदीश्वर की ही प्रभा की ओर निर्देश करती है ॥९॥
काण्ड -ऐन्द्रं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -ऐन्द्रं पर्व
छन्द -अष्टिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त꣢व꣣ त्य꣡न्न꣢꣯र्यं नृ꣣तो꣡ऽप꣢ इन्द्र प्रथ꣣मं꣢ पू꣣र्व्यं꣢ दि꣣वि꣢ प्र꣣वा꣡च्यं꣢ कृ꣣त꣢म् । यो꣢ दे꣣व꣢स्य꣣ श꣡व꣢सा꣣ प्रा꣡रि꣢णा꣣ अ꣡सु꣢ रि꣣ण꣢न्न꣣पः꣢ । भु꣢वो꣣ वि꣡श्व꣢म꣣भ्य꣡दे꣢व꣣मो꣡ज꣢सा वि꣣दे꣡दूर्ज꣢꣯ꣳ श꣣त꣡क्र꣢तुर्वि꣣दे꣡दिष꣢꣯म् ॥४६६॥
पदार्थःहे (नृतो) पृथिवी आदि लोकों को नचानेवाले (इन्द्र) जगदीश्वर ! (तव) तुम्हारा (त्यत्) वह प्रसिद्ध, (नर्यम्) नरों का हितकर, (प्रथमम्) श्रेष्ठ, (पूर्व्यम्) पूर्वकाल से चला आ रहा (अपः) कर्म (प्रवाच्यम्) प्रशंसनीय है, (यः) जो तुम (देवस्य) प्रकाशक सूर्य के (शवसा) बल से (असु) प्राण को (रिणन्) प्रेरित करना चाहते हुए, (अपः) अन्तरिक्ष में स्थित जलों को (प्रारिणाः) वर्षा द्वारा नीचे गिराते हो, और (विश्वम्) सब (अदेवम्) अप्रकाश के कारणभूत भौतिक और मानसिक अन्धकार को (ओजसा) बल से (अभिभुवः) परास्त करते हो। आगे परोक्षकृत वर्णन है—(शतक्रतुः) अनन्त प्रज्ञावाला और अनन्त कर्मोंवाला वह जगदीश्वर (ऊर्जम्) बल तथा प्राण को (विदेत्) प्राप्त कराये, (इषम्) इच्छासिद्धि को (विदेत्) प्राप्त कराये ॥१०॥ इस मन्त्र में ‘रिणा, रिण’, ‘देव, देव’, ‘विदेदू, विदेदि’ में छेकानुप्रास अलङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःपरमेश्वर ही सूर्य द्वारा पृथिवी आदि लोकों को नचाता हुआ सूर्य के चारों ओर तथा अपनी धुरी पर घुमाता है। वही जैसे अन्तरिक्ष में रुके हुए जलों को बरसाता है, वैसे ही आत्मलोक में रुकी हुई आनन्द-धाराओं को मनोभूमि पर प्रवाहित करता है। वही जैसे विशाल अन्धकार को विदीर्ण कर भौतिक प्रकाश को उत्पन्न करता है, वैसे ही मन की भूमि पर व्याप्त तमोगुण के जाल को विच्छिन्न करके आत्म-प्रकाश को प्रकट करता है ॥१०॥ इस दशति में सूर्य, पवमान, हरि, सविता, अग्नि, विष्णु नामों से जगदीश्वर आदि के गुण-कर्मों का वर्णन होने से तथा ‘विश्वे देवाः’ और मरुतों का आह्वान होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में द्वादश खण्ड समाप्त ॥ यह चतुर्थ अध्याय समाप्त हुआ ॥
पावमानं काण्डम्
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣣च्चा꣡ ते꣢ जा꣣त꣡मन्ध꣢꣯सो दि꣣वि꣡ सद्भूम्या द꣢꣯दे । उ꣣ग्र꣢꣫ शर्म꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥४६७॥
पदार्थःहे पवमान सोम ! पवित्रकर्ता रसागार परमेश्वर ! (ते) तेरा (अन्धसः) आनन्दरस का (जातम्) समूह (उच्चा) उच्च है, (दिवि सत्) प्रकाशमान आनन्दमय कोश में विद्यमान उसको (भूमि) भूमि अर्थात् भूमि पर स्थित मनुष्य (आददे) ग्रहण करता है। उस आनन्दरस से (उग्रं शर्म) तीव्र कल्याण, और (महि श्रवः) महान् यश, प्राप्त होता है ॥१॥
भावार्थःजैसे ऊपर अन्तरिक्ष में विद्यमान बादल के रस को अथवा चन्द्रमा की चाँदनी के रस को ग्रहण कर भूमि सस्यश्यामला हो जाती है, वैसे ही उच्च आनन्दमयकोश में अभिषुत होते हुए ब्रह्मानन्द-रस का पान कर सामान्य मनुष्य कृतार्थ हो जाता है ॥१॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स्वा꣡दि꣢ष्ठया꣣ म꣡दि꣢ष्ठया꣣ प꣡व꣢स्व सोम꣣ धा꣡र꣢या । इ꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे सु꣣तः꣢ ॥४६८॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमेश्वर ! तुम (स्वादिष्ठया) स्वादिष्ठ, (मदिष्ठया) अतिशय हर्षप्रद (धारया) आनन्दधारा से (पवस्व) हमें पवित्र करो। तुम (इन्द्राय) मेरे आत्मा के (पातवे) पान के लिए (सुतः) अभिषुत हो ॥२॥
भावार्थःअपने अन्तःकरण में बहती हुई पवित्रतासम्पादिनी आनन्द-रस की सरिता को अनुभव करता हुआ उपासक कह रहा है कि परमात्मा-रूप सोम से अभिषुत होता हुआ ब्रह्मानन्द-रस इसी प्रकार मेरे आत्मा के पानार्थ निरन्तर धारा-रूप में प्रवाहित होता रहे ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣡षा꣢ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या म꣣रु꣡त्व꣢ते च मत्स꣣रः꣡ । वि꣢श्वा꣣ द꣡धा꣢न꣣ ओ꣡ज꣢सा ॥४६९॥
पदार्थःहे परमात्म-सोम ! (वृषा) अध्यात्म-संपत्ति की वर्षा करनेवाला तू (धारया) धारा-रूप में (पवस्व) प्रवाहित हो, (मरुत्वते च) और प्राणों के सहचर आत्मा के लिए (मत्सरः) आनन्ददायक हो। (ओजसा) अपने ओज से (विश्वा) सब आत्मा, मन, बुद्धि आदियों को (दधानः) धारण करनेवाला बन ॥३॥
भावार्थःजब प्राणायाम-साधन और ध्यान के द्वारा रसनिधि परमेश्वर से धारारूप में आनन्द-रस का सन्दोह प्रस्रुत होता है, तब शरीर-राज्य के आत्मा, मन, बुद्धि आदि सभी अङ्ग तृप्त हो जाते हैं ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
य꣢स्ते꣣ म꣢दो꣣ व꣡रे꣢ण्य꣣स्ते꣡ना꣢ पव꣣स्वा꣡न्ध꣢सा । दे꣣वावी꣡र꣢घशꣳस꣣हा꣢ ॥४७०॥
पदार्थःहे पवित्रतादायक परमात्म-सोम ! (यः ते) जो तेरा (वरेण्यः) वरणीय (मदः) आनन्द-रस है, (तेन अन्धसा) उस रस के साथ (पवस्व) प्रवाहित हो, और प्रवाहित होकर (देवावीः) सन्मार्ग में प्रवृत्त करने के द्वारा मन, इन्द्रिय आदि देवों का रक्षक तथा (अघशंसहा) पापप्रशंसक भावों का विनाशक बन ॥४॥
भावार्थःरसनिधि परमात्मा की उपासना से जो आनन्दरस प्राप्त होता है, उससे शरीर के सब मन, इन्द्रियाँ आदि कुटिल मार्ग को छोड़कर सरलगामी बन जाते हैं और पापप्रशंसक भाव पराजित हो जाते हैं ॥४॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ति꣣स्रो꣢꣫ वाच꣣ उ꣡दी꣢रते꣣ गा꣡वो꣢ मिमन्ति धे꣣न꣡वः꣢ । ह꣡रि꣢रेति꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥४७१॥
पदार्थः(तिस्रः वाचः) ऋग्, यजुः, साम रूप तीन वाणियाँ (उदीरते) उठ रही हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो (धेनवः) नवप्रसूत दुधारू (गावः) गौएँ (मिमन्ति) बछड़ों के प्रति रंभा रही हों। (हरिः) कल्मषहारी, आनन्दमय सोमरस का झरना (कनिक्रदत्) झर-झर शब्द करता हुआ (एति) उपासकों की मनोभूमि पर झर रहा है ॥५॥ इस मन्त्र में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति और अनुप्रास अलङ्कार हैं ॥५॥
भावार्थःपरमात्मा की आराधना में लीन जन पुनः-पुनः ऋग्, यजुः, साम रूप वाणियों का उच्चारण कर रहे हैं, मानो बछड़ों के प्रति प्रेम में भरी हुई धेनुएँ रंभा रही हों। उपासकों की मनोभूमियाँ रसनिधि परमात्मा के पास से प्रस्नुत आनन्दरस के झरने में नहा रही हैं। अहो, कैसा आनन्दमय वातावरण है ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢येन्दो म꣣रु꣡त्व꣢ते꣣ प꣡व꣢स्व꣣ म꣡धु꣢मत्तमः । अ꣣र्क꣢स्य꣣ यो꣡नि꣢मा꣣स꣡द꣢म् ॥४७२॥
पदार्थःहे (इन्दो) चन्द्रमा के सदृश आह्लादक, रस से आर्द्र करनेवाले रसनिधि परमात्मन् ! (मधुमत्तमः) अतिशय मधुर आप (मरुत्वते इन्द्राय) प्राणयुक्त मेरे आत्मा के लाभार्थ, (अर्कस्य) उपासक उस आत्मा के (योनिम्) निवासगृह हृदय में (पवस्व) प्राप्त हों ॥६॥
भावार्थःसमाधि-दशा में रसागार परमेश्वर से प्रवाहित होता हुआ आनन्द-संदोह हृदय में व्याप्त होकर उपासक जीव का महान् कल्याण करता है ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡सा꣢व्य꣣ꣳशु꣡र्मदा꣢꣯या꣣प्सु꣡ दक्षो꣢꣯ गिरि꣣ष्ठाः꣢ । श्ये꣣नो꣢꣫ न योनि꣣मा꣡स꣢दत् ॥४७३॥
पदार्थः(गिरिष्ठाः) पर्वत पर स्थित, (दक्षः) बलप्रद (अंशुः) सोम ओषधि, जैसे (अप्सु) जलों में (असावि) अभिषुत की जाती है, वैसे ही (गिरिष्ठाः) पर्वत के समान उन्नत परब्रह्म में स्थित, (दक्षः) आत्मबल को बढ़ानेवाला (अंशुः) आनन्द-रस (मदाय) हर्ष के लिए (अप्सु) मेरे प्राणों वा कर्मों में (असावि) मेरे द्वारा अभिषुत किया गया है। (श्येनः न) बाज पक्षी, जैसे (योनिम्) अपने घोंसले को प्राप्त होता है, वैसे ही यह आनन्दरस (योनिम्) मेरे हृदय-गृह में (आ असदत्) आकर स्थित हो गया है ॥७॥ इस मन्त्र में पूर्वार्द्ध में श्लिष्ट व्यङ्ग्योपमा तथा उत्तरार्ध में वाच्योपमा अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजैसे बाज आदि पक्षी सायंकाल अपने आवासभूत वृक्ष पर आ जाते हैं, वैसे ही परब्रह्म के पास से झरता हुआ आनन्द-रस हृदय-प्रदेश में आता है और जैसे सोमलता का सोमरस वसतीवरी नामक पात्र में स्थित जल में अभिषुत किया जाता है, वैसे ही आनन्द-रस स्तोता के प्राणों और कर्मों में अभिषुत होता है ॥७॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व दक्ष꣣सा꣡ध꣢नो दे꣣वे꣡भ्यः꣢ पी꣣त꣡ये꣢ हरे । म꣣रु꣡द्भ्यो꣢ वा꣣य꣢वे꣣ म꣡दः꣢ ॥४७४॥
पदार्थःहे (हरे) उन्नति की ओर ले जानेवाले रसागार परब्रह्म ! (दक्षसाधनः) बल के साधक आप (देवेभ्यः पीतये) विद्वानों द्वारा पान के लिए (पवस्व) आनन्दरस को परिस्रुत करो। उन विद्वानों के (मरुद्भ्यः) प्राणों के लिए तथा (वायवे) गतिशील मन के लिए (मदः) तृप्तिप्रदाता होवो ॥८॥
भावार्थःपरब्रह्म के पास से जो आनन्द-रस झरता है, वह साधक की ऊर्ध्वयात्रा में सहायक होता है, और उस रस से उसका मन, बुद्धि, प्राण आदि सब-कुछ परमतृप्ति को पा लेता है ॥८॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ स्वा꣣नो꣡ गि꣢रि꣣ष्ठाः꣢ प꣣वि꣢त्रे꣣ सो꣡मो꣢ अक्षरत् । म꣡दे꣢षु सर्व꣣धा꣡ अ꣢सि ॥४७५॥
पदार्थः(गिरिष्ठाः) पर्वत पर उत्पन्न (सोमः) सोम ओषधि, जैसे (स्वानः) निचोड़ने पर (पवित्रे) दशा-पवित्र में क्षरित होती है, वैसे ही (गिरिष्ठाः) पर्वत के समान उन्नत परब्रह्म में स्थित और (स्वानः) वहाँ से अभिषुत किया जाता हुआ (सोमः) आनन्दरस (पवित्रे) पवित्र हृदय में (अक्षरत्) क्षरित हो रहा है। हे रसागार परमात्मन् ! तुम (मदेषु) आनन्दरसों के क्षरित होने पर (सर्वधाः) सर्वात्मना धारणकर्ता (असि) होते हो ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषमूलक वाचकलुप्तोपमालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःजब रसनिधि परमात्मा से आनन्दरस हृदय में प्रस्रुत होता है, तब रस से संतृप्त योगी पूर्णतः धृत हो जाता है ॥९॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ क꣣वि꣡र्वया꣢꣯ꣳसि न꣣꣬प्त्यो꣢꣯र्हि꣣तः꣢ । स्वा꣣नै꣡र्या꣢ति क꣣वि꣡क्र꣢तुः ॥४७६॥
पदार्थः(नप्त्योः हितः) द्यावापृथिवी अथवा प्राणापानों का हितकर, (कविः) क्रान्तद्रष्टा, (कविक्रतुः) बुद्धिपूर्ण कर्मोंवाला रसागार सोम परमात्मा (स्वानैः) अभिषुत किये जाते हुए आनन्द-रसों के साथ (दिवः) द्योतमान जीवात्मा के (प्रिया वयांसि) प्रिय मन, बुद्धि आदि लोकों में (परि याति) व्याप्त हो जाता है ॥१०॥
भावार्थःरसनिधि परमात्मा का दिव्य आनन्द जब आत्मा में व्याप्त होता है, तब आत्मा से सम्बद्ध सब मन, बुद्धि आदि मानो हर्ष से नाच उठते हैं ॥१०॥ इस दशति में परमात्मा रूप पवमान सोम का तथा उसके आनन्दरस का वर्णन होने से और पूर्व दशति में भी इन्द्र, सूर्य, अग्नि, पवमान आदि नामों से परमात्मा का ही वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में द्वितीयार्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ सोमा꣢꣯सो मद꣣च्यु꣢तः꣣ श्र꣡व꣢से नो म꣣घो꣡ना꣢म् । सु꣣ता꣢ वि꣣द꣡थे꣢ अक्रमुः ॥४७७॥
पदार्थः(सुताः) रसागार परमात्मा से अभिषुत, (मदच्युतः) उत्साहवर्षी (सोमासः) दिव्य आनन्द-रस (मघोनाम्) हम ऐश्वर्यवानों के (श्रवसे) यश के लिए (विदथे) हमारे जीवन-यज्ञ में (प्र अक्रमुः) व्याप्त हो रहे हैं ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के साथ योग से जो दिव्य आनन्दरस प्राप्त होता है वह मानव के सम्पूर्ण जीवन-यज्ञ में व्याप्त होकर उसे यशस्वी बनाता है ॥१॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ सोमा꣢꣯सो विप꣣श्चि꣢तो꣣ऽपो꣡ न꣢यन्त ऊ꣣र्म꣡यः꣢ । व꣡ना꣢नि महि꣣षा꣡ इ꣢व ॥४७८॥
पदार्थः(ऊर्मयः) तरङ्गरूप, (विपश्चितः) बुद्धिवर्धक, (सोमासः) परमात्मा से प्रस्रुत आनन्दरस (अपः) कर्मों को (प्र नयन्ते) उत्कृष्ट मार्ग में प्रेरित कर देते हैं, (वनानि) अन्तरिक्षस्थ जलों को (महिषाः इव) जैसे माध्यमिक देवगण पवन (प्र नयन्ते) वेग से प्रेरित करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःयोगियों का योग सिद्ध हो जाने पर दिव्य आनन्दरस की तरङ्गों से उनके कर्म भी परम उत्कृष्ट हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्वेन्दो꣣ वृ꣡षा꣢ सु꣣तः꣢ कृ꣣धी꣡ नो꣢ य꣣श꣢सो꣣ ज꣡ने꣢ । वि꣢श्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षो꣢ जहि ॥४७९॥
पदार्थःहे (इन्दो) चन्द्रमा के समान आह्लादक और सोमवल्ली के समान रसागार परमात्मन् ! (वृषा) बादल के समान वर्षा करनेवाले आप (सुतः) हृदय में अभिषुत होकर (पवस्व) हमें पवित्र कीजिए। (जने) जनसमाज में (नः) हमें (यशसः) यशस्वी (कृधि) कीजिए। (विश्वाः) सब (द्विषः) द्वेषवृत्तियों को और काम-क्रोधादि की द्वेषकर्त्री सेनाओं को (अप जहि) विनष्ट कीजिए ॥३॥
भावार्थःपरब्रह्मरूप सोम से प्रवाहित होती हुई दिव्य आनन्द की धाराएँ योगसाधकों को यशस्वी और शत्रुरहित कर देती हैं ॥३॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣢षा꣣ ह्य꣡सि꣢ भा꣣नु꣡ना꣢ द्यु꣣म꣡न्तं꣢ त्वा हवामहे । प꣡व꣢मान स्व꣣र्दृ꣡श꣢म् ॥४८०॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रता देनेवाले रसागार परमात्मन् ! आप (हि) क्योंकि (भानुना) अपने तेज से (वृषा) आनन्द-रस की वृष्टि करनेवाले (असि) हो, इसलिए (द्युमन्तम्) देदीप्यमान, (स्वर्दृशम्) मोक्षसुख को दर्शानेवाले (त्वा) आपको, हम (हवामहे) पुकारते हैं ॥४॥
भावार्थःजैसे सूर्य अपने तेज से जल की वर्षा करता है, वैसे ही परमेश्वर आनन्द-रस का वर्षक होता है। उस रसनिधि, रसवर्षक, तेजस्वी, तेज-वर्द्धक, आनन्दमय, मोक्षानन्द का दर्शन करानेवाले परमेश्वर की सबको उपासना करनी चाहिए ॥४॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्दुः꣢ पविष्ट꣣ चे꣡त꣢नः प्रि꣣यः꣡ क꣢वी꣣नां꣢ म꣣तिः꣢ । सृ꣣ज꣡दश्व꣢꣯ꣳ र꣣थी꣡रि꣢व ॥४८१॥
पदार्थः(चेतनः) चेतना प्रदान करनेवाला, (कवीनां प्रियः) मेधावियों का प्रिय, (मतिः) ज्ञाता, (इन्दुः) चन्द्रमा के समान आह्लादक, सोमलता के समान रसागार परमेश्वर (पविष्ट) अन्तःकरण को पवित्र करता है और (अश्वम्) प्राण को (सृजत्) ऊर्ध्वारोहण के लिए प्रेरित कर देता है, (रथीः इव) जैसे सारथि (अश्वम्) रथ में नियुक्त घोड़े को (सृजत्) चलने के लिए प्रेरित करता है ॥५॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःउपासना किया हुआ परमात्मा-रूप सोम योगी के चित्त को पवित्र करके उसके प्राणों को योगसिद्धियों के प्राप्त्यर्थ ऊर्ध्वारोहण के लिए प्रेरित कर देता है ॥५॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡सृ꣢क्षत꣣ प्र꣢ वा꣣जि꣡नो꣢ ग꣣व्या꣡ सोमा꣢꣯सो अश्व꣣या꣢ । शु꣣क्रा꣡सो꣢ वीर꣣या꣡शवः꣢꣯ ॥४८२॥
पदार्थः(वाजिनः) सबल, (शुक्रासः) पवित्र, (आशवः) वेगवान् (सोमासः) प्रभु-भक्ति के रस (गव्या) अन्तःप्रकाश-प्राप्ति की इच्छा से, (अश्वया) प्राणों की ऊर्ध्वप्रेरणा की इच्छा से, और (वीरया) वीरता-प्राप्ति की इच्छा से (प्र असृक्षत) मेरे द्वारा प्रवाहित किये गये हैं ॥६॥
भावार्थःअन्तःकरण में भगवद्भक्ति के रस को प्रवाहित करने से अन्तः-प्रकाश की स्फूर्ति, प्राणों का ऊर्ध्वारोहण और दिव्यकर्मों में उत्साह पैदा होता है ॥६॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व दे꣣व꣡ आ꣢यु꣣ष꣡गिन्द्रं꣢꣯ गच्छतु ते꣣ म꣡दः꣢ । वा꣣यु꣡मा रो꣢꣯ह꣣ ध꣡र्म꣢णा ॥४८३॥
पदार्थःहे पवमान सोम ! हे पवित्रताकारी रसागार परब्रह्म ! (देवः) दिव्यगुणवाले आप (आयुषक्) उपासक मनुष्यों में समवेत होकर (पवस्व) प्रस्रुत होवो, आनन्द-रस को प्रवाहित करो। (ते मदः) आपका आनन्द-रस (इन्द्रम्) आत्मा को (गच्छतु) प्राप्त हो। आप (धर्मणा) अपने धारक बल से (वायुम्) मेरे प्राण पर (आरोह) आरूढ़ होवो, अर्थात् मेरे प्राण भी आपकी तरङ्ग से तरङ्गित हों ॥७॥
भावार्थःपरमात्मा-रूप सोम से झरा हुआ आनन्द-रस तभी प्रभावकारी होता है, जब वह आत्मा, प्राण आदि में पूर्णतः व्याप जाता है ॥७॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानो अजीजनद्दि꣣व꣢श्चि꣣त्रं꣡ न त꣢꣯न्य꣣तु꣢म् । ज्यो꣡ति꣢र्वैश्वान꣣रं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥४८४॥
पदार्थः(पवमानः) पवित्रतादायक सोम परमेश्वर (दिवः) आकाश की (चित्रम्) चित्र-विचित्र (तन्यतुं न) विद्युत् के समान (बृहत्) विस्तीर्ण (वैश्वानरम्) विश्व का नेतृत्व करनेवाली (ज्योतिः) दिव्य ज्योति को (अजीजनत्) उत्पन्न कर देता है ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःईश्वर की आराधना से हृदय में विद्युत् के समान अद्भुत ज्योति परिस्फुरित हो जाती है, जिससे मनुष्य विवेकख्याति प्राप्त कर लेता है ॥८॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ स्वा꣣ना꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वो꣣ म꣡दा꣢य ब꣣र्ह꣡णा꣢ गि꣣रा꣢ । म꣡धो꣢ अर्षन्ति꣣ धा꣡र꣢या ॥४८५॥
पदार्थःहे (मधो) मधुर आनन्द से भरपूर सोम परमात्मन् ! (बर्हणा) श्रेष्ठ (गिरा) स्तुति वाणी के द्वारा (स्वानासः) आपसे झरते हुए (इन्दवः) आनन्द-रस (मदाय) मेरे उत्साह के लिए (धारया) धारा रूप में (परि अर्षन्ति) मेरे अन्तः करण में प्रवेश कर रहे हैं ॥९॥
भावार्थःभक्ति में लीन मन से स्तोता जन जब परमात्मा की आराधना करते हैं, तब उन्हें परम आनन्द की अनुभूति होती है ॥९॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣢रि꣣ प्रा꣡सि꣢ष्यदत्क꣣विः꣡ सिन्धो꣢꣯रू꣣र्मा꣡वधि꣢꣯ श्रि꣣तः꣢ । का꣣रुं꣡ बिभ्र꣢꣯त्पुरु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥४८६॥
पदार्थः(कविः) वेदकाव्य का कर्ता, काव्यजनित आनन्द से तरङ्गित हृदयवाला सोम परमेश्वर (सिन्धोः) आनन्दसागर की (ऊर्मौ) लहरों पर (अधिश्रितः) स्थित हुआ (पुरुस्पृहम्) अतिप्रिय (कारुम्) स्तुतिकर्ता जीव को (बिभ्रत्) अपने साथ धारण किये हुए (परि प्रासिष्यदत्) आनन्द की लहरों पर झूल रहा है ॥१०॥ वस्तुतः परमात्मा का झूले आदि से सम्बन्ध न होने के कारण यहाँ असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःसच्चिदानन्दस्वरूप रसमय परमेश्वर अपने सहचर मुझ जीवात्मा का मानो हाथ पकड़े हुए आनन्द-सागर की लहरों पर झूल रहा है। अहो, उसके साथ ऐसा पहले कभी अनुभव में न आया हुआ सुख मैं अनुभव कर रहा हूँ। सचमुच, कृतकृत्य हो गया हूँ। मैंने जीवन की सफलता पा ली है ॥१०॥ इस दशति में भी रसागार सोम परमेश्वर का तथा तज्जनित आनन्द का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में द्वितीयार्ध की पाँचवीं दशति समाप्त ॥ यह पञ्चम प्रपाठक समाप्त हुआ ॥ पञ्चम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣢पो꣣ षु꣢ जा꣣त꣢म꣣प्तु꣢रं꣣ गो꣡भि꣢र्भ꣣ङ्गं꣡ परि꣢꣯ष्कृतम् । इ꣡न्दुं꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢यासिषुः ॥४८७॥
पदार्थः(सु जातम्) सुप्रसिद्ध, (अप्तुरम्) कर्म करने में शीघ्रतायुक्त, (भङ्गम्) दुःखों के भञ्जक, (गोभिः परिष्कृतम्) प्रकाश-किरणों से अलङ्कृत अर्थात् तेजस्वी (इन्दुम्) चाँद के समान आह्लादक, रस से आर्द्र करनेवाले तथा सोम ओषधि के समान रसमय परमात्मा को (देवाः) विद्वान् लोग (उप उ अयासिषुः) निकटता से प्राप्त करते हैं ॥१॥
भावार्थःजो परमेश्वर प्रसिद्ध कीर्तिवाला, जगत् की उत्पत्ति, धारण आदि क्रियाओं को करनेवाला, दुःखियों का दुःख दूर करनेवाला, दिव्य तेजों से अलङ्कृत, अपने शान्तिदायक आनन्द-रस में स्नान करानेवाला, चन्द्रमा के समान सुन्दर और सोमलता के समान रस से पूर्ण है, उसकी सबको उपासना करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
पु꣣नानो꣡ अ꣢क्रमीद꣣भि꣢꣫ विश्वा꣣ मृ꣢धो꣣ वि꣡च꣢र्षणिः । शु꣣म्भ꣢न्ति꣣ वि꣡प्रं꣢ धी꣣ति꣡भिः꣢ ॥४८८॥
पदार्थः(पुनानः) मन को पवित्र करता हुआ (विचर्षणिः) सर्वद्रष्टा परमेश्वर (विश्वाः मृधः) काम, क्रोध आदियों की सब संग्रामकारिणी सेनाओं पर अथवा समस्त हिंसावृत्तियों पर (अभि अक्रमीत्) आक्रमण कर देता है। उस (विप्रम्) मेधावी परमेश्वर को, उपासक जन (धीतिभिः) ध्यानों के द्वारा (शुम्भन्ति) अपने हृदय के अन्दर शोभित करते हैं ॥२॥
भावार्थःध्यान किया हुआ परमेश्वर साधक के मार्ग में विघ्नभूत सब आसुरी सेनाओं को पराजित कर चित्त को पवित्र करता है ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣣विश꣢न्क꣣ल꣡श꣢ꣳ सु꣣तो꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣡र्ष꣢न्न꣣भि꣡ श्रियः꣢꣯ । इ꣢न्दु꣣रि꣡न्द्रा꣢य धीयते ॥४८९॥
पदार्थः(सुतः) अभिषुत किया हुआ अर्थात् ध्यान द्वारा प्रकट किया हुआ, (कलशम्) हृदय-रूप द्रोणकलश में (आविशन्) प्रवेश करता हुआ, (विश्वाः) समस्त (श्रियः) शोभाओं को अथवा सद्गुणरूप ऐश्वर्यों को (अर्षन्) प्राप्त कराता हुआ (इन्दुः) चन्द्रमा के समान सौम्य कान्तिवाला और सोम ओषधि के समान रस से परिपूर्ण परमेश्वर (इन्द्राय) जीवात्मा की उन्नति के लिए (धीयते) संमुख स्थापित किया जाता है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा में ध्यान लगाने से जीवात्मा सब प्रकार का उत्कर्ष प्राप्त कर सकता है ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡स꣢र्जि꣣ र꣢थ्यो꣣ य꣡था꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ च꣣꣬म्वोः꣢꣯ सु꣣तः꣢ । का꣡र्ष्म꣢न्वा꣣जी꣡ न्य꣢क्रमीत् ॥४९०॥
पदार्थः(चम्वोः) आत्मा और बुद्धिरूप अधिषवणफलकों में (सुतः) अभिषुत अर्थात् ध्यान द्वारा प्रकटीकृत रसनिधि परमेश्वर (पवित्रे) दशापवित्र के तुल्य पवित्र हृदय में (असर्जि) छोड़ा जाता है, (रथ्यः यथा) जैसे रथ में नियुक्त घोड़ा मार्ग में छोड़ा जाता है। उससे (वाजी) बलवान् हुआ उपासक (कार्ष्मन्) योग-मार्ग में (न्यक्रमीत्) सब विघ्नों को पार कर लेता है, जैसे (वाजी) बलवान् सेनापति (कार्ष्मन्) युद्ध में (न्यक्रमीत्) शत्रु-सेनाओं को परास्त करता है ॥४॥ इस मन्त्र में पूर्वार्द्ध में श्रौति उपमा और उत्तरार्द्ध में श्लेषमूलक लुप्तोपमा है ॥४॥
भावार्थःजब हृदय में सोम परमात्मा अवतीर्ण होता है, तब मनुष्य सभी विघ्न-बाधाओं को क्षण-भर में ही परास्त कर लेता है ॥४॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢꣫ यद्गावो꣣ न꣡ भूर्ण꣢꣯यस्त्वे꣣षा꣢ अ꣣या꣢सो꣣ अ꣡क्र꣢मुः । घ्न꣡न्तः꣢ कृ꣣ष्णा꣢꣫मप꣣ त्व꣡च꣢म् ॥४९१॥
पदार्थः(यत्) जब (गावः न) सूर्य-किरणों के समान (भूर्णयः) धारण-पोषण करनेवाले, (त्वेषाः) दीप्तिमान्, (अयासः) क्रियाशील आनन्द-रस रूपी सोम (प्र अक्रमुः) पराक्रम दिखाते हैं, तब (त्वचम्) आवरण डालनेवाली (कृष्णाम्) तमोगुण की काली रात्रि को (ध्नन्तः) नष्ट कर देते हैं ॥५॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःब्रह्मानन्द-रूप रसों का जब योगी जन पान कर लेते हैं, तब सभी मोह-निशाएँ उनके मार्ग से हट जाती हैं ॥५॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣पघ्न꣡न्प꣢वसे꣣ मृ꣡धः꣢ क्रतु꣣वि꣡त्सो꣢म मत्स꣣रः꣢ । नु꣣द꣡स्वादे꣢꣯वयुं꣣ ज꣡न꣢म् ॥४९२॥
पदार्थःहे (सोम) आनन्दरसागार परमेश्वर ! आप (मृधः) संग्रामकारी काम, क्रोध आदि रिपुओं को (अपघ्नन्) विनष्ट करते हुए (पवसे) हमें पवित्र करते हो। (क्रतुवित्) बुद्धि और कर्म दोनों प्राप्त करानेवाले, (मत्सरः) आनन्द-प्रदाता आप (अदेवयुम्) दिव्य गुणों की कामना न करनेवाले (जनम्) मनुष्य को (नुदस्व) दिव्य गुण प्राप्त करने के लिए प्रेरित करो ॥६॥
भावार्थःआनन्द-रस के खजाने परमेश्वर की सत्प्रेरणा से अपावन भी पावन और अदिव्य भी दिव्यगुणी हो जाते हैं ॥६॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣या꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या꣣ य꣢या꣣ सू꣢र्य꣣म꣡रो꣢चयः । हि꣣न्वानो꣡ मानु꣢꣯षीर꣣पः꣢ ॥४९३॥
पदार्थःहे तेज-रूप रस के भण्डार परमेश्वर ! आप (अया) इस (धारया) तेज की धारा के साथ (पवस्व) हमें प्राप्त हो। (यया) जिस तेज की धारा से, आपने (सूर्यम्) सूर्य को (अरोचयः) चमकाया है। आप (मानुषीः अपः) सब मानव प्रजाओं को (हिन्वानः) तेज से तृप्त करो ॥७॥
भावार्थःजो परमेश्वर तेज से सूर्य, अग्नि, बिजली आदियों को चमकाता है, उसके दिये हुए तेज से सब मनुष्य तेजस्वी होवें ॥७॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ प꣢वस्व꣣ य꣢꣫ आवि꣣थे꣡न्द्रं꣢ वृ꣣त्रा꣢य꣣ ह꣡न्त꣢वे । व꣣व्रिवा꣡ꣳसं꣢ म꣣ही꣢र꣣पः꣢ ॥४९४॥
पदार्थःहे वीर-रस के भण्डार सोम परमेश्वर ! (सः) वह प्रसिद्ध आप, हमारे पास (पवस्व) अपनी रक्षा-शक्ति के साथ आओ, (यः) जो आप (महीः अपः) बड़ी धर्मरूप धाराओं को (वव्रिवांसम्) वरण करनेवाले (इन्द्रम्) जीवात्मा को (वृत्राय हन्तवे) अधर्म, पाप आदि के विनाशार्थ (आविथ) प्राप्त होते हो ॥८॥
भावार्थःदेवासुरसंग्राम में विजय पाने के लिए परमेश्वर से प्रेरणा पाकर पुरुषार्थ करना चाहिए ॥८॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣या꣢ वी꣣ती꣡ परि꣢꣯ स्रव꣣ य꣡स्त꣢ इन्दो꣣ म꣢दे꣣ष्वा꣢ । अ꣣वा꣡ह꣢न्नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥४९५॥
पदार्थःहे (इन्दो) आनन्दरस वा वीररस के भण्डार परमात्मन् ! आप (अया वीती) इस रीति से (परिस्रव) उपासकों के अन्तःकरण में प्रवाहित होवो, कि (यः) जो उपासक (ते मदेषु) आपसे उत्पन्न किये गये हर्षों में (आ) मग्न हो, वह (नव नवतीः) निन्यानवे वृत्रों को (अवाहन्) विनष्ट कर सके ॥ मनुष्य की औसत आयु वेद के अनुसार सौ वर्ष है। उसमें से नौ या दस मास क्योंकि माता के गर्भ में बीत जाते हैं, इसलिए शेष लगभग निन्यानवे वर्ष वह जीता है। उन निन्यानवे वर्षों में आनेवाले विघ्न निन्यानवे वृत्र कहाते हैं। सोमजनित आनन्द एवं वीरत्व से तृप्त होकर मनुष्य उन सब वृत्रों का संहार करने में समर्थ हो, यह भाव है ॥९॥
भावार्थःपरमेश्वर से झरा हुआ आनन्दरस वा वीररस स्तोता को ऐसा आह्लादित कर देता है कि वह जीवन में आनेवाले सभी विघ्नों वा शत्रुओं का संहार कर सकता है ॥९॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ द्यु꣣क्ष꣡ꣳ सन꣢꣯द्र꣣यिं꣢꣫ भर꣣द्वा꣡जं꣢ नो꣣ अ꣡न्ध꣣सा । स्वा꣣नो꣡ अ꣢र्ष प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣢ ॥४९६॥
पदार्थःहे सोम ! हे रसागार परमात्मन् ! (द्युक्षम्) दीप्ति के निवासक (रयिम्) दिव्य ऐश्वर्य को (सनत्) देते हुए, और (अन्धसा) आनन्द-रस के साथ (नः) हमारे लिए (वाजम्) आत्म-बल को (भरत्) लाते हुए, (स्वानः) झरते हुए, आप (पवित्रे) दशापवित्र के तुल्य पवित्र हृदय में (आ अर्ष) आओ ॥१०॥
भावार्थःउपासक के हृदय में परमात्मा से झरा आनन्द-रस अनुपम ऐश्वर्य, ब्रह्मवर्चस और आत्मबल आदि प्रदान करता है ॥१०॥ इस दशति में परमात्मा-रूप सोम और उससे झरे हुए आनन्द, वीरता आदि के रस का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡चि꣢क्रद꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रि꣢र्म꣣हा꣢न्मि꣣त्रो꣡ न द꣢꣯र्श꣣तः꣢ । स꣡ꣳ सूर्ये꣢꣯ण दिद्युते ॥४९७॥
पदार्थः(वृषा) मनोरथों को पूर्ण करनेवाला, (हरिः) पापहारी सोम परमेश्वर, सबके हृदयों में स्थित हुआ (अचिक्रदत्) शब्द कर रहा है अर्थात् उपदेश व सत्प्रेरणा दे रहा है। (महान्) महान् वह (मित्रः न) मित्र के समान (दर्शतः) दर्शनीय है। वही (सूर्येण) सूर्य से (सम्) संगत हुआ (दिद्युते) प्रकाशित हो रहा है। कहा भी है—‘जो वह आदित्य में पुरुष है, वह मैं ही हूँ’, य० ४०।१७ ॥१॥ इस मन्त्र में ‘अचिक्रदत् वृषा’ यहाँ पर शब्दशक्तिमूलक ध्वनि से ‘वर्षा करनेवाला बादल गर्ज रहा है’ यह दूसरा अर्थ भी सूचित होकर बादल और सोम परमात्मा में उपमानोपमेयभाव को ध्वनित कर रहा है, इसलिए उपमाध्वनि है। ‘मित्रो न दर्शतः’ में वाच्या पूर्णोपमा है ॥१॥
भावार्थःजो सूक्ष्मदर्शी लोग हैं, वे सूर्य, पर्जन्य आदि में परमेश्वर के ही दर्शन करते हैं, क्योंकि ताप, प्रकाश, जल बरसाने आदि की सब शक्ति उसी की दी हुई है ॥१॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣢ ते꣣ द꣡क्षं꣢ मयो꣣भु꣢वं꣣ व꣡ह्नि꣢म꣣द्या꣡ वृ꣢णीमहे । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥४९८॥
पदार्थःहे पवमान सोम, हे पवित्रतादायक आनन्दरसमय परमात्मन् ! हम (ते) आपके (मयोभुवम्) सुखदायक, (वह्निम्) लक्ष्य की ओर ले जानेवाले, (पान्तम्) रक्षक, (पुरुस्पृहम्) बहुत चाहने योग्य (दक्षम्) बल को (अद्य) आज (आ वृणीमहे) स्वीकार करते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा से जो बल और शुभकर्मों में उत्साह प्राप्त होता है, उससे सुख, लक्ष्यपूर्ति और रक्षा की वृद्धि होती है ॥२॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡ध्व꣢र्यो꣣ अ꣡द्रि꣢भिः सु꣣त꣡ꣳ सोमं꣢꣯ प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣡ न꣢य । पु꣣नाही꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे ॥४९९॥
पदार्थःहे (अध्वर्यो) यज्ञविधि के निष्पादक अध्वर्यु नामक ऋत्विज् के समान ज्ञानयज्ञ को निष्पन्न करनेवाले मानव ! तू (अद्रिभिः) सिलबट्टों के सदृश ज्ञानेन्द्रियों से (सुतम्) अभिषुत (सोमम्) सोम ओषधि के रस के सदृश ज्ञानरस को (पवित्रे) दशापवित्र के सदृश मन में (आ नय) ला, उस ज्ञान-रूप सोम-रस को (इन्द्राय पातवे) जीवात्मा के पान के लिए (पुनाहि) मनन द्वारा शुद्ध कर ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेष से अभिहित भौतिक सोमपरक द्वितीय अर्थ उपमान-भाव में परिणत हो रहा है ॥३॥
भावार्थःजैसे यज्ञ में पीसने के साधन सिल-बट्टों से अभिषुत सोम दशापवित्र द्वारा छानकर ही पिया और पिलाया जाता है, वैसे ही ज्ञानार्जन की साधनभूत ज्ञानेन्द्रियों से अर्जित ज्ञान को मन से मनन द्वारा शुद्ध करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति꣣ धा꣡रा꣢ सु꣣त꣡स्यान्ध꣢꣯सः । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥५००॥
पदार्थः(सुतस्य) आचार्य के अथवा परमात्मा के पास से अभिषुत (अन्धसः) ज्ञान और कर्म के रस की अथवा आनन्द-रस की (धारा) धारा से (मन्दी) तृप्त हुआ (सः) वह आत्मा (तरत्) दुःख, विघ्न, विपत्ति आदि के सागर को पार कर लेता है, और (धावति) ऐहलौकिक लक्ष्य की ओर वेग से अग्रसर होने लगता है। (मन्दी) ज्ञान और कर्म के रस वा आनन्दरस की धारा से तृप्त हुआ (सः) वह आत्मा (तरत्) दुःखादि के सागर को पार कर लेता है, और (धावति) पारलौकिक लक्ष्य मोक्ष की ओर अग्रसर होने लगता है ॥४॥ इस मन्त्र में ‘तरत् स मन्दी धावति’ की पुनरुक्ति में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥४॥
भावार्थःगुरु के पास से प्राप्त ज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड के रस से तथा परमात्मा के पास से प्राप्त आनन्दरस से तृप्त होकर मनुष्य समस्त ऐहलौकिक एवं पारलौकिक उन्नति करने में समर्थ हो जाता है ॥४॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡ण꣢ꣳ र꣣यि꣡ꣳ सो꣢म सु꣣वी꣡र्य꣢म् । अ꣣स्मे꣡ श्रवा꣢꣯ꣳसि धारय ॥५०१
पदार्थःहे (सोम) सर्वैश्वर्यवान् जगदीश्वर अथवा विद्वन् आचार्य ! आप हमारे लिए (सहस्रिणम्) सहस्रों की संख्यावाले अथवा प्रचुर, (सुवीर्यम्) शुभ बल से युक्त (रयिम्) ऐश्वर्य को अथवा विद्याधन को (आ पवस्व) प्रवाहित कीजिए, और (अस्मे) हममें (श्रवांसि) यशों को (धारय) स्थापित कीजिए ॥५॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से हम धन, धान्य, सुवर्ण आदि और सत्य, न्याय, बल, वीर्य आदि सब प्रकार के अपार ऐश्वर्य को तथा आचार्य की कृपा से अपार सद्विद्या एवं सदाचार के धन को प्राप्त करें, जिससे हमारी अधिकाधिक कीर्ति सर्वत्र फैले ॥५॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡नु꣢ प्र꣣त्ना꣡स꣢ आ꣣य꣡वः꣢ प꣣दं꣡ नवी꣢꣯यो अक्रमुः । रु꣣चे꣡ ज꣢नन्त꣣ सू꣡र्य꣢म् ॥५०२॥
पदार्थःसोम परमात्मा की सहायता से (प्रत्नासः) ज्ञान की दृष्टि से पुरातन अर्थात् ज्ञानवृद्ध मनुष्य (नवीयः) नवीनतर (पदम्) राजमन्त्री, न्यायाधीश आदि के पद को अथवा मोक्षपद को (अनु अक्रमुः) अनुकूलतापूर्वक प्राप्त कर लेते हैं, और (रुचे) प्रकाश के लिए, वे सूर्यम् विद्या के सूर्य को अथवा अध्यात्म के सूर्य को (जनन्त) प्रकट कर देते हैं ॥६॥ इस मन्त्र में ‘बूढ़े जीर्ण लोग नवीन पद को प्राप्त करते हैं’ में नवीन पद की प्राप्ति के हेतु के अभाव में भी उसकी प्राप्ति का वर्णन होने से विभावनालङ्कार ध्वनित हो रहा है। ‘मनुष्य सूर्य को उत्पन्न करते हैं’ में मनुष्यों द्वारा सूर्य का उत्पन्न किया जाना असम्भव होने से सूर्य की विद्या-प्रकाश अथवा अध्यात्म-प्रकाश में लक्षणा है ॥६॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से और अपने पुरुषार्थ से मनुष्य सांसारिक उच्च से उच्च पद को और परम मुक्तिपद को भी प्राप्त करने तथा राष्ट्र और जगत् में ज्ञान-विज्ञान एवं सदाचार के सूर्य को प्रकट करने में समर्थ हो जाते हैं ॥६॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡र्षा꣢ सोम द्यु꣣म꣡त्त꣢मो꣣ऽभि꣡ द्रोणा꣢꣯नि꣣ रो꣡रु꣢वत् । सी꣢द꣣न्यो꣢नौ꣣ व꣢ने꣣ष्वा꣢ ॥५०३॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (सोम) रस के भण्डार परमात्मन् ! (वनेषु) वनों में, वन के लता-कुञ्ज आदियों में, और (योनौ) नगरस्थ घरों में, सर्वत्र (सीदन्) विराजमान होते हुए (द्युमत्तमः) अतिशय तेजस्वी आप (रोरुवत्) उपदेश करते हुए (द्रोणानि अभि) हमारे हृदय-रूप द्रोण-कलशों में (अर्ष) आइए ॥ द्वितीय—वानप्रस्थ के पक्ष में। हे (सोम) विद्वन् वानप्रस्थ ! (वनेषु) वनों में (योनौ) वृक्ष-मूल रूप घर में (आसीदन्) निवास करते हुए, (द्युमत्तमः) अतिशय तेजस्वी आप (रोरुवत्) पुनः-पुनः उपदेश करने की इच्छा रखते हुए (द्रोणानि अभि) गृहस्थों से आयोजित यज्ञों में (अर्ष) आइए ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजैसे वनों में उगनेवाला सोम वहाँ से लाया जाकर दशापवित्र से छाना जाता हुआ शब्द के साथ द्रोण-कलश में आता है और जैसे रसनिधि परमेश्वर उपदेश देता हुआ स्तोताओं के हृदय में प्रकट होता है, वैसे ही वानप्रस्थ मनुष्य नगरवासियों से आयोजित यज्ञों में उपदेशार्थ आये ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣡षा꣢ सोम द्यु꣣मा꣡ꣳ अ꣢सि꣣ वृ꣡षा꣢ देव꣣ वृ꣡ष꣢व्रतः । वृ꣡षा꣣ ध꣡र्मा꣢णि दध्रिषे ॥५०४॥
पदार्थःहे (सोम) रसनिधि जगदीश्वर ! (द्युमान्) तेजस्वी आप (वृषा) तेज के वर्षक सूर्य के समान (असि) हो, हे (देव) दान आदि गुणों से युक्त ! (वृषव्रतः) सद्गुण आदि की वृष्टि करनेवाले आप (वृषा) वर्षा करनेवाले बादल के समान हो। (वृषा) धर्म की वर्षा करनेवाले आप (धर्माणि) धर्म कर्मों को (दध्रिणे) धारण करते हो ॥८॥ इस मन्त्र में ‘वृषा’ की आवृत्ति में यमक अलङ्कार है। ‘वृषा असि’ में लुप्तोपमा है ॥८॥
भावार्थःउपासना किया हुआ परमेश्वर सूर्य और बादल के समान वर्षक होकर धन, धर्म, तेज, शान्ति, सुख आदि की वर्षा से उपासक को कृतार्थ करता है ॥८॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣣षे꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या मृ꣣ज्य꣡मा꣢नो मनी꣣षि꣡भिः꣢ । इ꣡न्दो꣢ रु꣣चा꣡भि गा इ꣢꣯हि ॥५०५॥
पदार्थःहे (इन्दो) रस के भण्डार, चन्द्रमा के समान आह्लाददायक परब्रह्म परमेश्वर ! (मनीषिभिः) चिन्तनशील हम उपासकों द्वारा (मृज्यमानः) स्तुतियों से अलङ्कृत किये जाते हुए आप (इषे) इच्छासिद्धि के लिए (धारया) आनन्द की धारा के साथ (पवस्व) हमारे अन्तः करण में प्रवाहित होवो। आप (रुचा) तेज के साथ (गाः अभि) हम स्तोताओं के प्रति (इहि) आओ ॥९॥
भावार्थःस्तोताओं से उपासना किया गया रसनिधि परमेश्वर आनन्दरस से उन्हें तृप्त करता है ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
म꣣न्द्र꣡या꣢ सोम꣣ धा꣡र꣢या꣣ वृ꣡षा꣢ पवस्व देव꣣युः꣢ । अ꣢व्या꣣ वा꣡रे꣢भिरस्म꣣युः꣢ ॥५०६॥
पदार्थःहे (सोम) सोम ओषधि के समान रसागार परमेश्वर ! (वृषा) आनन्द के वर्षक, (देवयुः) हमें दिव्य गुण प्रदान करने के इच्छुक, (अस्मयुः) हमसे प्रीति करनेवाले आप (अव्याः वारेभिः) भेड़ों के बालों से निर्मित दशापवित्रों के सदृश हमारे मन के सात्त्विक भावों के माध्यम से (मन्द्रया धारया) आनन्दप्रद धारा के साथ (पवस्व) द्रोणकलश के तुल्य हमारे हृदय-कलश में परिस्रुत होवो ॥१०॥
भावार्थःजैसे सोम ओषधि का रस भेड़ के बालों से निर्मित दशापवित्र से छनकर द्रोणपात्र में धारारूप से गिरता है, वैसे ही परमेश्वर मन के सात्त्विक भावों के माध्यम से आनन्द-धारा के साथ स्तोता के हृदय-कलश में प्रकट होता है ॥१०॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣या꣡ सो꣢म सु꣣कृत्य꣡या꣢ म꣣हा꣢꣫न्त्सन्न꣣꣬भ्य꣢꣯वर्धथाः । म꣣न्दान꣡ इद्वृ꣢꣯षायसे ॥५०७॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमेश्वर ! (महान् सन्) महान् होते हुए आप (अया) इस (सुकृत्यया) स्तुति-गान रूप शुभ क्रिया से (अभ्यवर्द्धथाः) हृदय में वृद्धि को प्राप्त हो गये हो। आप (मन्दानः) आनन्द प्रदान करते हुए (इत्) सचमुच (वृषायसे) वृष्टिकर्ता बादल के समान आचरण करते हो, अर्थात् जैसे बादल जल बरसाता हुआ सब प्राणियों को और ओषधि-वनस्पति आदियों को तृप्त करता है, वैसे ही आप आनन्द की वर्षा करके हमें तृप्त करते हो ॥११॥
भावार्थःजैसे-जैसे स्तोता स्तुतिगान से परमेश्वर की आराधना करता है, वैसे-वैसे परमेश्वर आनन्द की वृष्टि से उसे प्रसन्न करता है ॥११॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣यं꣡ विच꣢꣯र्षणिर्हि꣣तः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ स꣡ चे꣢तति । हि꣣न्वान꣡ आप्यं꣢꣯ बृ꣣ह꣢त् ॥५०८॥
पदार्थः(सः) वह पूर्ववर्णित (विचर्षणिः) विशेष द्रष्टा, (हितः) सबका हितकर्ता (अयम्) यह रसनिधि परमेश्वर (पवमानः) अन्तः करण को शुद्ध करता हुआ (बृहत्) महान् (आप्यम्) बन्धुत्व को (हिन्वानः) निर्वाह करता हुआ (चेतति) बोध दे रहा है ॥१२॥
भावार्थःउपासना किया हुआ परमेश्वर अन्तःकरण को शुद्ध करके, जीवों को जागरूक करके बन्धुत्व का निर्वाह करता है ॥१२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ न꣢ इन्दो म꣣हे꣡ तु न꣢꣯ ऊ꣣र्मिं꣡ न बिभ्र꣢꣯दर्षसि । अ꣣भि꣢ दे꣣वा꣢ꣳ अ꣣या꣡स्यः꣢ ॥५०९॥
पदार्थःहे (इन्दो) आनन्द-रस से आर्द्र करनेवाले रस के सागर परमात्मन् ! (अयास्यः) प्राणप्रिय तू (ऊर्मिं न) मानो लहर को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (नः) हमारी (महे) वृद्धि के लिए (तु) शीघ्र ही (देवान् नः अभि) हम विद्वान् उपासकों को लक्ष्य करके (अर्षसि) प्राप्त हो ॥१३॥ इस मन्त्र में ‘ऊर्मिं न बिभ्रत्’ में उत्प्रेक्षालङ्कार है ॥१३॥
भावार्थःउपासना किया गया प्राणप्रिय परमेश्वर अपने प्यारे उपासक को मानो आनन्द की तरङ्गों से आप्लावित कर देता है ॥१३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣पघ्न꣡न्प꣢वते꣣ मृ꣢꣫धोऽप꣣ सो꣢मो꣣ अ꣡रा꣢व्णः । ग꣢च्छ꣣न्नि꣡न्द्र꣢स्य नि꣣ष्कृ꣢तम् ॥५१०॥
पदार्थः(सोमः) पवित्र रस का भण्डार परमेश्वर (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (निष्कृतम्) संस्कृत किये हुए हृदयरूप घर में (गच्छन्) जाता हुआ, (मृधः) संग्रामकर्ता पापरूप शत्रुओं को (अपघ्नन्) विध्वस्त करता हुआ और (अराव्णः)अदानशील स्वार्थभावों को (अप) विनष्ट करता हुआ (पवते) पवित्रता प्रदान करता है ॥१४॥
भावार्थःजब पवित्रतादायक आनन्दरस की धारा को प्रवाहित करता हुआ सोम परमेश्वर साधक के हृदय में प्रकट होता है तब उसका हृदय सब वासनाओं से रहित और स्वार्थवृत्ति से विहीन होकर पवित्र हो जाता है ॥१४॥ इस दशति में सोम परमात्मा तथा उससे उत्पन्न होनेवाली आनन्दरसधारा का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
पु꣣नानः꣡ सो꣢म꣣ धा꣡र꣢या꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो अर्षसि । आ꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ योनि꣢꣯मृ꣣त꣡स्य꣢ सीद꣣स्युत्सो꣢ दे꣣वो꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥५११॥
पदार्थःहे (सोम) पवित्र रस के भण्डार परमात्मन् ! आप (धारया) अपनी आनन्द-धारा से (पुनानः) पवित्रता लाते हुए, (अपः) कर्म को (वसानः) आच्छादित अर्थात् प्रभावित करते हुए (अर्षसि) उपासकों के हृदय में व्याप्त होते हो। (रत्नधाः) रमणीय गुणरूप रत्नों के प्रदाता आप (ऋतस्य) सत्य के (योनिम्) गृहरूप जीवात्मा को (आ सीदसि) प्राप्त होते हो। आप (उत्सः) आनन्द के झरने, (देवः) विद्या, सुख आदि के प्रदाता और (हिरण्ययः) ज्योतिर्मय तथा यशोमय हो ॥१॥
भावार्थःपवित्र परमेश्वर अपने उपासकों के हृदयों और कर्मों को पवित्र करता हुआ, उनके आत्मा में निवास करता हुआ, उन्हें आनन्द के झरने में स्नान कराता हुआ, ज्योति से प्रदीप्त करता हुआ यशस्वी बनाता है ॥१॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
प꣢री꣣तो꣡ षि꣢ञ्चता सु꣣त꣢꣫ꣳ सोमो꣣ य꣡ उ꣢त्त꣣म꣢ꣳ ह꣣विः꣢ । द꣣धन्वा꣡न् यो नर्यो꣢꣯ अ꣣प्स्वा꣢३꣱न्त꣢꣯रा सु꣣षा꣢व꣣ सो꣢म꣣म꣡द्रि꣢भिः ॥५१२॥
पदार्थःप्रथम—सोम ओधधि के रस के पक्ष में। हे मनुष्यो ! (यः सोमः) जो सोमरस (उत्तमम्) उत्तम (हविः) हव्य अथवा भोज्य है, उस (सुतम्) अभिषुत सोमरस को (इतः) इस यज्ञवेदि से अथवा भोजनालय से (परि सिञ्चत) यज्ञाग्नि अथवा जाठराग्नि में चारों ओर सींचो। (नर्यः) मनुष्यों का हितकर्मा (यः) जो सोमरस (दधन्वान्) यजमान को अथवा पीनेवाले को धारण करता है और जिस (सोमम्) सोमरस को अभिषोता (अद्रिभिः) यज्ञिय सिलबट्टों से, तीव्रता कम करने के लिए (अप्सु अन्तः) जलों के अन्दर (आ सुषाव) अभिषुत करता है ॥ द्वितीय—अध्यात्मपक्ष में। हे मनुष्यो ! (यः सोमः) जो भक्तिरस, उपासनायज्ञ में (उत्तमं हविः) उत्कृष्टतम हवि है, उस (सुतम्) अभिषुत भक्तिरस को, तुम (इतः) इस हृदय से (परि सिञ्चत) चारों ओर प्रवाहित करो, (नर्यः) मनुष्यों का हितकर्ता (यः) जो भक्तिरस, (दधन्वान्) उपासक को धारण करता है, और जिस (सोमम्) भक्तिरस को, उपासनायज्ञ का यजमान आत्मा (अद्रिभिः) ध्यानरूप सिलबट्टों से (अप्सुः अन्तः) प्राणों के अन्दर (आ सुषाव) अभिषुत करता है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे बाह्य यज्ञ में अथवा भोजन में सोम ओषधि का रस सिलबट्टों द्वारा अभिषुत करके जलों में मिलाया जाता है, वैसे ही अध्यात्मयज्ञ में भक्तिरस को ध्यानरूप सिलबट्टों से अभिषुत करके अपने जीवन का अङ्ग बनाना चाहिए ॥२॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
आ꣡ सो꣢म स्वा꣣नो꣡ अद्रि꣢꣯भिस्ति꣣रो꣡ वारा꣢꣯ण्य꣣व्य꣡या꣢ । ज꣢नो꣣ न꣢ पु꣣रि꣢ च꣣꣬म्वो꣢꣯र्विश꣣द्ध꣢रिः꣣ स꣢दो꣣ व꣡ने꣢षु दध्रिषे ॥५१३॥
पदार्थःहे (सोम) परमात्मरूप सोम ! (अद्रिभिः) ध्यानरूप यज्ञिय सिलबट्टों से (आ स्वानः) अभिषुत होता हुआ तू (अव्यया वाराणि तिरः) भेड़ों के बालों से निर्मित दशापवित्रों के समान शुद्धचित्तवृत्तियों से छनकर क्षरित होता है। शुद्ध चित्तवृत्तिरूप दशापवित्रों से क्षरित (हरिः) दुःख पाप आदि का हर्ता वह रसागार परमेश्वर (चम्वोः) अधिषवणफलकों के तुल्य बुद्धि और मन में (विशत्) प्रवेश करता है, (जनः न) जैसे मनुष्य (पुरि) नगरी में प्रवेश करता है। तदनन्तर हे परमात्म-सोम ! तू (वनेषु) प्राणों में (सदः) स्थिति को (दध्रिषे) धारण करता है ॥३॥ इस मन्त्र में ‘जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः’ में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे यज्ञिय सिलबट्टों से अभिषुत, भेड़ के बालों से निर्मित दशापवित्रों द्वारा क्षारित सोमलता का रस द्रोणकलशों में प्रविष्ट होकर जल से मिल जाता है, वैसे ही आनन्दरसागार परमेश्वर जब ध्यानों द्वारा अभिषुत, शुद्ध चित्तवृत्तियों से क्षारित और बुद्धि तथा आत्मा में प्रविष्ट होकर प्राणों में अभिव्याप्त हो जाता है, तभी साधक की उपासना सफल होती है ॥३॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
प्र꣡ सो꣢म दे꣣व꣡वी꣢तये꣣ सि꣢न्धु꣣र्न꣡ पि꣢प्ये꣣ अ꣡र्ण꣢सा । अ꣣ꣳशोः꣡ पय꣢꣯सा मदि꣣रो꣡ न जागृ꣢꣯वि꣣र꣢च्छा꣣ को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣡त꣢म् ॥५१४॥
पदार्थःहे (सोम) जीवात्मन् ! (देववीतये) दिव्य जीवन की प्राप्ति के लिए, तू (अर्णसा) जल से (सिन्धुः न) महानदी के समान (अर्णसा) ज्ञानरस से (प्र पिप्ये) वृद्धि को प्राप्त कर। (अंशोः) बादल के (पयसा) जल से (मदिरः न) हर्ष को प्राप्त किसान के समान (जागृविः) जागरूक होकर (मधुश्चुतम्) आनन्द को प्रवाहित करनेवाले (कोशम्) आनन्दरस के खजाने परमात्मा के (अच्छ) अभिमुख हो। जैसे किसान जागरूक होकर धान्यरूप मधु के उत्पादक खेत के अभिमुख होता है, यह अभिप्राय है ॥४॥ इस मन्त्र में ‘सिन्धुर्न’ और ‘मदिरो न’ इस प्रकार दो उपमाओं की संसृष्टि है ॥४॥
भावार्थःजैसे बड़ी नदी वर्षा के जल से बढ़ जाती है, वैसे ही मनुष्य ज्ञानरस से बढ़े। जैसे वर्षा से तृप्त किसान जागरूक रहकर खेत से फसल प्राप्त करने का यत्न करता है, वैसे ही मनुष्य ज्ञानरस से तृप्त होकर निरन्तर जागरूक रहकर भक्ति द्वारा परमात्मा के पास से आनन्दरस पाने का प्रयत्न करे ॥४॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
सो꣡म꣢ उ ष्वा꣣णः꣢ सो꣣तृ꣢भि꣣र꣢धि꣣ ष्णु꣢भि꣣र꣡वी꣢नाम् । अ꣡श्व꣢येव ह꣣रि꣡ता꣢ याति꣣ धा꣡र꣢या म꣣न्द्र꣡या꣢ याति꣣ धा꣡र꣢या ॥५१५॥
पदार्थःप्रथम—सोमरस के पक्ष में। (सोतृभिः) सोम-रस निचोड़नेवाले मनुष्यों से (अवीनां स्नुभिः) भेड़ों के बालों से निर्मित ऊँचे उठाये दशापवित्रों द्वारा (अधिष्वाणः) अभिषुत किया जाता हुआ (सोमः) सोम ओषधि का रस (अश्वया इव) घोड़ी के समान (हरिता) वेगवती (धारया) धारा के साथ (याति) द्रोणकलश में जाता है, (मन्द्रया) हर्षकारिणी (धारया) धारा के साथ (याति) द्रोणकलश में जाता है ॥ द्वितीय—अध्यात्मपक्ष में। (सोतृभिः) परमात्मा के पास से आनन्दरस को अभिषुत करनेवाले उपासकों से (अवीनां स्नुभिः) भेड़ों के बालों से निर्मित ऊपर उठाये दशापवित्रों के तुल्य मन की समुन्नत सात्त्विक वृत्तियों द्वारा (अधिष्वाणः) अभिषुत किया जाता हुआ (सोमः) आनन्दरस (अश्वया इव) घोड़ी के समान (हरिता) वेगवती (धारया) धारा के साथ (याति) आत्मा को प्राप्त होता है, (मन्द्रया) हर्षकारिणी (धारया) धारा के साथ (याति) आत्मा में पहुँचता है ॥५॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। ‘याति धारया’ की पुनरावृत्ति में लाटानुप्रास है ॥५॥
भावार्थःउपासक लोग जब तल्लीन मन से परमात्मा का ध्यान करते हैं, तब अपने आत्मा के अन्दर दिव्य आनन्द के धाराप्रवाह का अनुभव करते हैं ॥५॥
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त꣢वा꣣ह꣡ꣳ सो꣢म रारण स꣣ख्य꣡ इ꣢न्दो दि꣣वे꣡दि꣢वे । पु꣣रू꣡णि꣢ बभ्रो꣣ नि꣡ च꣢रन्ति꣣ मा꣡मव꣢꣯ परि꣣धी꣢꣫ꣳरति꣣ ता꣡ꣳ इ꣢हि ॥५१६॥
पदार्थःहे (सोम) चन्द्रमा के समान आह्लादक तथा सोम ओषधि के समान रसागार (इन्दो) रस से आर्द्र करनेवाले परमात्मन् ! (अहम्) मैं उपासक (तव सख्ये) तेरी मित्रता में (दिवेदिवे) प्रतिदिन (रारण) रमूँ। हे (बभ्रो) भरणपोषणकर्ता परमेश ! (पुरूणि) बहुत-से काम, क्रोध आदि राक्षस (माम्) मुझ तेरे उपासक को (नि अव चरन्ति) उद्विग्न कर रहे हैं, (परिधीन्) घेरनेवाले (तान्) उन राक्षसों को (अति इहि) पराजित कर दो ॥६॥
भावार्थःपरमात्मा की मित्रता से मनुष्य सब काम, क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, असत्य, अन्याय आदि शत्रुओं को पराजित कर उन्नति के मार्ग में प्रवृत्त होता है ॥६॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
मृ꣣ज्य꣡मा꣢नः सुहस्त्या समु꣣द्रे꣡ वाच꣢꣯मिन्वसि । र꣣यिं꣢ पि꣣श꣡ङ्गं꣢ बहु꣣लं꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣢हं꣣ प꣡व꣢माना꣣꣬भ्य꣢꣯र्षसि ॥५१७॥
पदार्थःहे (सुहस्त्य) उत्तम ऐश्वर्योंवाले रसागार सोम परमात्मन् ! (मृज्यमानः) स्तुतियों से अलङ्कृत किये जाते हुए आप (समुद्रे) उपासक के हृदयान्तरिक्ष में (वाचम्) सत्प्रेरणारूप वाणी को (इन्वसि) प्रेरित करते हो। हे (पवमान) पवित्रता देनेवाले जगदीश्वर ! आप (बहुलम्) बहुत सारे (पुरुस्पृहम्) बहुत चाहने योग्य अथवा बहुतों से चाहने योग्य (पिशङ्गं रयिम्) पीले धन सुवर्ण को अथवा तेज से युक्त आध्यात्मिक धन सत्य, अहिंसा आदि को (अभ्यर्षसि) प्रदान करते हो ॥७॥ इस मन्त्र में द्वितीय और चतुर्थ पादों में अन्त्यानुप्रास अलङ्कार है, पवर्ग जिनके बाद आता है, ऐसे अनेक अनुस्वारों के सहप्रयोग में वृत्त्यनुप्रास है ॥७॥
भावार्थःसबके हृदय में स्थित परमेश्वर दिव्य संदेश निरन्तर देता रहता है, वही जीवन को पवित्र करता हुआ तेजोमय आध्यात्मिक और भौतिक धन भी प्रदान करता है ॥७॥
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अ꣣भि꣡ सोमा꣢꣯स आ꣣य꣢वः꣣ प꣡व꣢न्ते꣣ म꣢द्यं꣣ म꣡द꣢म् । स꣣मु꣡द्रस्याधि꣢꣯ वि꣣ष्ट꣡पे꣢ मनी꣣षि꣡णो꣢ मत्स꣣रा꣡सो꣢ मद꣣च्यु꣡तः꣢ ॥५१८॥
पदार्थः(मनीषिणः) मनन करनेवाले, (मत्सरासः) उल्लासयुक्त, (मदच्युतः) आनन्द बहानेवाले (सोमासः) ब्रह्मानन्द रूप सोमरस का पान किये हुए (आयवः) मनुष्य (समुद्रस्य विष्टपे अधि) राष्ट्ररूप अन्तरिक्ष के लोक में अर्थात् राष्ट्रवासी जनों में (मद्यम्) उल्लासजनक (मदम्) ब्रह्मानन्द-रस को (पवन्ते) प्रवाहित करते हैं ॥८॥
भावार्थःस्वयं ब्रह्मानन्द-रस में मग्न योगी जन अन्यों को भी ब्रह्मानन्द-रस में मग्न क्यों न करें? ॥८॥
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पु꣣नानः꣡ सो꣢म꣣ जा꣡गृ꣢वि꣣र꣢व्या꣣ वा꣢रैः꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣यः꣢ । त्वं꣡ विप्रो꣢꣯ अभवोऽङ्गिरस्तम꣣ म꣡ध्वा꣢ य꣣ज्ञं꣡ मि꣢मिक्ष णः ॥५१९॥
पदार्थःहे (अङ्गिरस्तम) अतिशय तेजस्वी (सोम) मेरे अन्तरात्मन् ! (जागृविः) जागरूक, (अव्याः वारैः) भेड़ों के बालों से निर्मित दशापवित्रों के सदृश बुद्धि के तर्कों से (परि पुनानः) असत्य के त्याग तथा सत्य के स्वीकार द्वारा स्वयं को पवित्र करता हुआ (प्रियः) सबका प्रिय (त्वम्) तू (विप्रः) ज्ञानी (अभवः) हो गया है। वह तू (नः) हमारे (यज्ञम्) जीवन-यज्ञ को (मध्वा) माधुर्य से (मिमिक्ष) सींचने का प्रयत्न कर ॥९॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि वे जागरूक, पवित्र, सबके प्रिय, ज्ञानी, तेजस्वी और मधुर व्यवहार करनेवाले होवें ॥९॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
इ꣡न्द्रा꣢य पवते꣣ म꣢दः꣣ सो꣡मो꣢ म꣣रु꣡त्व꣢ते सु꣣तः꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢धारो꣣ अ꣡त्यव्य꣢꣯मर्षति꣣ त꣡मी꣢ मृजन्त्या꣣य꣡वः꣢ ॥५२०॥
पदार्थः(मदः) तृप्ति देनेवाला, (सुतः) ध्यानरूपी सिलबट्टों से अभिषुत (सोमः) रसनिधि परमात्मा (मरुत्वते) प्राण से सहचरित (इन्द्राय) आत्मा के लिए (पवते) झरता है। (सहस्रधारः) अनेकों आनन्दधाराओं से युक्त वह (अव्यम् अति) पार्थिव अन्नमय कोश को पार कर प्राणमय, मनोमय आदि कोशों में (अर्षति) पहुँचता है। (तम् ई) उसे (आयवः) मनुष्य (मृजन्ति) भक्तिपुष्पों से अलङ्कृत करते हैं ॥१०॥
भावार्थःरसागार परमेश्वर ध्यानी, भक्तिपरायण जीवात्मा को आनन्द के झरने में स्नान कराता है ॥१०॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
प꣡व꣢स्व वाज꣣सा꣡त꣢मो꣣ऽभि꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ वा꣡र्या꣢ । त्व꣡ꣳ स꣢मु꣣द्रः꣡ प्र꣢थ꣣मे꣡ विध꣢꣯र्मन् दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सोम मत्स꣣रः꣢ ॥५२१॥
पदार्थःहे (सोम) ऐश्वर्यशाली जगदीश्वर वा राजन् ! (वाजसातमः) ऐश्वर्यों के अतिशय दानी आप (विश्वानि) सब (वार्या) वरणीय ऐश्वर्यों को (अभिपवस्व) प्राप्त कराइये। (त्वम्) आप (समुद्रः) परमेश्वरोचित वा राजोचित बल, वीर्य आदि के समुद्र हो। आप (प्रथमे) श्रेष्ठ (विधर्मन्) विशिष्ट जगद्धारण-यज्ञ में वा प्रजापालन-यज्ञ में (देवेभ्यः) विद्वानों के लिए (मत्सरः) आनन्ददायक होवो ॥११॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर जगत् में सब ऐश्वर्यों को देनेवाला है, वैसे राष्ट्र में राजा प्रजाओं को ऐश्वर्य प्रदान करे ॥११॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
प꣡व꣢माना असृक्षत प꣣वि꣢त्र꣣म꣢ति꣣ धा꣡र꣢या । म꣣रु꣡त्व꣢न्तो मत्स꣣रा꣡ इ꣢न्द्रि꣣या꣡ हया꣢꣯ मे꣣धा꣢म꣣भि꣡ प्रया꣢꣯ꣳसि च ॥५२२॥
पदार्थः(पवमानाः) पवित्रता देते हुए ये ज्ञानरूप सोमरस (धारया) धारा रूप में (पवित्रम् अति) पवित्र हृदयरूप दशापवित्र में से छनकर (असृक्षत) आत्मारूप द्रोणकलश में छोड़े जा रहे हैं। (मरुत्वन्तः) प्राणों से युक्त, (मत्सरासः) तृप्तिप्रदाता, (इन्द्रियाः) आत्मा रूप इन्द्र से सेवित, (हयाः) प्राप्त होनेवाले ये ज्ञानरस (मेधाम्) धारणावती बुद्धि को (प्रयांसि च) और आनन्दरसों को (अभि) बरसाते हैं ॥१२॥
भावार्थःमन और प्राण से पवित्र किये गये ज्ञानरस जब आत्मा को प्राप्त होते हैं, तब मेधा और आनन्द के बरसानेवाले होते हैं ॥१२॥ इस दशति में भी सोम परमात्मा और उससे प्राप्त आनन्दधारा का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ तु द्र꣢꣯व꣣ प꣢रि꣣ को꣢शं꣣ नि꣡ षी꣢द꣣ नृ꣡भिः꣢ पुना꣣नो꣢ अ꣣भि꣡ वाज꣢꣯मर्ष । अ꣢श्वं꣣ न꣡ त्वा꣢ वा꣣जि꣡नं꣢ म꣣र्ज꣢य꣣न्तो꣡ऽच्छा꣣ ब꣣र्ही꣡ र꣢श꣣ना꣡भि꣢र्नयन्ति ॥५२३॥
पदार्थःहे आत्मन् ! तू (तु) शीघ्र ही (प्र द्रव) उत्कृष्ट दिशा में दौड़, कोशम् आनन्दमय कोश में (परि निषीद) व्याप्त होकर स्थित हो, (नृभिः) आगे ले जानेवाले अपने पौरुषों से (पुनानः) मन, बुद्धि आदि को पवित्र करता हुआ (वाजम् अभि) देवासुरसंग्राम में (अर्ष) असुरों के पराजय के लिए जा। (वाजिनम्) ज्ञानवान् (त्वा) तुझे (मर्जयन्तः) सद्गुणों से अलङ्कृत करते हुए (रशनाभिः) यम-नियम की रस्सियों से नियन्त्रित करके, शिक्षक योगी जन (बर्हिः अच्छ) परब्रह्म के प्रति (नयन्ति) प्रेरित कर रहे हैं, (न) जैसे (वाजिनम्) बलवान् (अश्वम्) घोड़े को (मर्जयन्तः) साफ या अलङ्कृत करते हुए योद्धा लोग (रशनाभिः) लगामों से नियन्त्रित करके (बर्हिः अच्छ) संग्राम में (नयन्ति) ले जाते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उत्तरार्ध में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे बलवान् घोड़े को योद्धा लोग लगामों से नियन्त्रित करके युद्ध में ले जाते हैं, वैसे ही योग-प्रशिक्षक लोग मनुष्य के आत्मा को यम, नियम आदि योग-साधनों से नियन्त्रित करके परब्रहम के प्रति ले जाएँ ॥१॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ काव्य꣢꣯मु꣣श꣡ने꣢व ब्रुवा꣣णो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ ज꣡नि꣢मा विवक्ति । म꣡हि꣢व्रतः꣣ शु꣡चि꣢बन्धुः पाव꣣कः꣢ प꣣दा꣡ व꣢रा꣣हो꣢ अ꣣꣬भ्ये꣢꣯ति꣣ रे꣡भ꣢न् ॥५२४॥
पदार्थः(काव्यम्) काव्य का (प्र ब्रुवाणः) प्रवचन करते हुए (उशना इव) धर्मेच्छु विद्वान् के समान (काव्यम्) वेदरूप काव्य का (प्र ब्रुवाणः) उपदेश करता हुआ (देवः) दान आदि गुणों से युक्त सोम परमात्मा (देवानाम्) प्रकाशक अग्नि, सूर्य, विद्युत् आदि पदार्थों के तथा इन्द्रियों के (जनिम) उत्पत्ति-प्रकार को (प्र विवक्ति) वेद द्वारा भली-भाँति बतलाता है। (महिव्रतः) महान् कर्मोंवाला, (शुचिबन्धुः) पवित्रात्मा जनों से बन्धुत्व स्थापित करनेवाला, (पावकः) मनुष्यों को पवित्र करनेवाला वह जगदीश्वर (रेभन्) गर्जते हुए (वराहः) मेघ के समान (रेभन्) उद्बोधन के शब्द बोलता हुआ (पदा) गन्तव्य सत्पात्र जनों के पास (अभ्येति) पहुँचता है ॥२॥ इस मन्त्र में ‘उशनेव’ में वाच्योपमा और ‘वराहः’ में लुप्तोपमा अलङ्कार है। ‘देवो-देवा’ में छेकानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःजैसे सोमरस धारापात शब्द करता हुआ पात्रों में जाता है और जैसे मेघ गर्जना करता हुआ भूमि पर बरसता है, वैसे ही सौम्य परमेश्वर जीभ के बिना भी सत्कर्मों का उपदेश करता हुआ स्तोता जनों के पास पहुँचता है ॥२॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
ति꣣स्रो꣡ वाच꣢꣯ ईरयति꣣ प्र꣡ वह्नि꣢꣯रृ꣣त꣡स्य꣢ धी꣣तिं꣡ ब्रह्म꣢꣯णो मनी꣣षा꣢म् । गा꣡वो꣢ यन्ति꣣ गो꣡प꣢तिं पृ꣣च्छ꣡मा꣢नाः꣣ सो꣡मं꣢ यन्ति म꣣त꣡यो꣢ वावशा꣣नाः꣢ ॥५२५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (वह्निः) जगत् का वहनकर्ता सोम परमेश्वर (तिस्रः वाचः) ऋग्, यजुः, साम रूप तीन वाणियों का (प्र ईरयति) प्रजाओं के कल्याणार्थ उपदेश करता है। वही (ऋतस्य) सत्यमय यज्ञ के (धीतिम्) धारण की और (ब्रह्मणः) ज्ञान के (मनीषाम्) मनन की (प्र ईरयति) प्रेरणा करता है। (गावः) पृथिवी आदि लोक अथवा सूर्यकिरण (गोपतिम्) अपने स्वामी के विषय में (पृच्छमानाः) मानो पूछते हुए (यन्ति) चले जा रहे हैं—अर्थात् मानो यह पूछ रहे हैं कि कौन हमारा स्वामी है, जो हमें सञ्चालित करता है। इसी प्रकार (मतयः) मेरी स्तुतियाँ (वावशानाः) अतिशय पुनः-पुनः चाह रखती हुई (सोमम्) रसागार परमात्मा को (यन्ति) प्राप्त हो रही हैं ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (वह्निः) शरीर का वहनकर्ता जीवात्मा (तिस्रः वाचः) ज्ञानरूप में, विचाररूप में तथा जिह्वा के कण्ठ तालु आदि के संयोग से जन्य शब्दरूप में विद्यमान त्रिविध वाणियों को (प्र ईरयति) प्रकट करता है। वही (ऋतस्य) सत्य के (धीतिम्) धारण को और (ब्रह्मणः)उपार्जित ज्ञान के (मनीषाम्) मनन को करता है। (गावः) मन-सहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (पृच्छमानाः) मानो कर्तव्याकर्तव्य को पूछती हुई (गोपतिम्) इन्द्रियों के स्वामी आत्मा के पास (यन्ति) पहुँचती हैं। (मतयः) मेरी बुद्धियाँ (वावशानाः) निश्चय में साधन बनना चाहती हुई (सोमम्) ज्ञाता आत्मा के पास (यन्ति) पहुँच रही हैं ॥ तृतीय—आचार्य के पक्ष में। (वह्निः) ज्ञान का वाहक आचार्य, शिष्य के लिए (तिस्रः वाचः) त्रिविध ज्ञान-कर्म-उपासना की प्रतिपादक अथवा सत्त्व-रजस्-तमस् की प्रतिपादक, अथवा सृष्टि-स्थिति-प्रलय की प्रतिपादक, अथवा जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति की प्रतिपादक, अथवा धर्म-अर्थ-काम की प्रतिपादक वाणियों का (प्र ईरयति) उच्चारण करता है। वही (ऋतस्य) सत्य के (धीतिम्) धारण को और (ब्रह्मणः) ब्रह्म की अथवा मोक्ष की (मनीषाम्) प्रज्ञा को (प्र ईरयति) देता है। (गावः) मेरी वाणियाँ (पृच्छमानाः) ब्रह्मविद्याविषयक प्रश्न पूछती हुई (गोपतिम्) वाचस्पति आचार्य को (यन्ति) प्राप्त होती हैं। (मतयः) मेरी बुद्धियाँ (वावशानाः) ज्ञानोद्घाटन को चाहती हुई (सोमम्) ज्ञानरस के आगार, सौम्य आचार्य को (यन्ति) प्राप्त होती हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है। प्रथम दो पक्षों में ‘गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥३॥
भावार्थःवाणियों के प्रेरक, सत्य वा यज्ञ को धारण करानेवाले, ज्ञान के प्रदाता और मन-बुद्धि आदियों के संस्कर्ता परमेश्वर, जीवात्मा तथा गुरु का सदा सेवन एवं सत्कार करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣स्य꣢ प्रे꣣षा꣢ हे꣣म꣡ना꣢ पू꣣य꣡मा꣢नो दे꣣वो꣢ दे꣣वे꣢भिः꣣ स꣡म꣢पृक्त꣢ र꣡स꣢म् । सु꣣तः꣢ प꣣वि꣢त्रं꣣ प꣡र्ये꣢ति꣣ रे꣡भ꣢न्मि꣣ते꣢व꣣ स꣡द्म꣢ पशु꣣म꣢न्ति꣣ हो꣡ता꣢ ॥५२६॥
पदार्थः(अस्य) इस सौम्य ज्योतिवाले सोम परमात्मा की (प्रेषा) प्रेरणा से। और (हेमना) ज्योति से (पूयमानः) पवित्र किया जाता हुआ (देवः) द्युतिमान् आत्मा (देवेभिः) मनसहित ज्ञानेन्द्रियों के साथ मिलकर (रसम्) आनन्द को (समपृक्त) अपने अन्दर संपृक्त करता है। (सुतः) ध्यान द्वारा अभिषुत परमात्मारूप सोम (रेभन्) कर्तव्य का उपदेश करता हुआ (पवित्रम्) पवित्र मन में (पर्येति) पहुँचता है, (इव) जैसे (होता) होता नामक ऋत्विज् (पशुमन्ति) पशु-युक्त (मिता) निर्मित (सद्म) गो-सदनों में दूध, घृत आदि लाने के लिए जाता है ॥४॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःउपासकों के अन्तःकरण में प्रकट हुआ परमेश्वर उन्हें पवित्र और तेजस्वी बना देता है ॥४॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
सो꣡मः꣢ पवते जनि꣣ता꣡ म꣢ती꣣नां꣡ ज꣢नि꣣ता꣢ दि꣣वो꣡ ज꣢नि꣣ता꣡ पृ꣢थि꣣व्याः꣢ । ज꣣निता꣡ग्नेर्ज꣢꣯नि꣣ता꣡ सूर्य꣢꣯स्य जनि꣣ते꣡न्द्र꣢स्य जनि꣣तो꣡त विष्णोः꣢꣯ ॥५२७॥
पदार्थः(सोमः) सर्वोत्पादक, रसागार और चन्द्रमा के समान कमनीय परमेश्वर (पवते) हृदयों को पवित्र करता है, जो (मतीनाम्) बुद्धियों का (जनिता) उत्पादक है, (दिवः) द्युलोक का तथा मनोमय कोश का (जनिता) उत्पादक है, (पृथिव्याः) भूलोक का तथा अन्नमय कोश का (जनिता) उत्पादक है, (अग्नेः) आग का तथा वाणी का (जनिता) उत्पादक है, (सूर्यस्य) सूर्य का तथा चक्षु का (जनिता) उत्पादक है, (इन्द्रस्य) वायु का तथा प्राणमयकोश का (जनिता) उत्पादक है, (उत) और (विष्णोः) यज्ञ का (जनिता) उत्पादक है ॥५॥ इस मन्त्र में पुनः-पुनः ‘जनिता’ कहने से यह सूचित होता है कि इसी प्रकार अन्य भी अनेक पदार्थों का जनिता है। लाटानुप्रास अलङ्कार है। कुवलयानन्द का अनुसरण करने पर आवृत्तिदीपक अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःसर्वोत्पादक परमात्मा ने ही ब्रह्माण्ड के सूर्य, चन्द्र, वायु, विद्युत् आदि और शरीर पिण्ड के प्राण, मन, बुद्धि, वाक्, चक्षु, श्रोत्र आदि रचे हैं, क्योंकि उनकी रचना करना किसी मनुष्य के सामर्थ्य में नहीं है ॥५॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣भि꣡ त्रि꣢पृ꣣ष्ठं꣡ वृष꣢꣯णं वयो꣣धा꣡म꣢ङ्गो꣣षि꣡ण꣢मवावशन्त꣣ वा꣡णीः꣢ । व꣢ना꣣ व꣡सा꣢नो꣣ व꣡रु꣢णो꣣ न꣢꣫ सिन्धु꣣र्वि꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ द꣢यते꣣ वा꣡र्या꣢णि ॥५२८॥
पदार्थः(त्रिपृष्ठम्) ऋग्-यजुः-साम रूप, पृथिवी-अन्तरिक्ष-द्यौ रूप, अग्नि-वायु-आदित्य रूप, सत्त्व-रजस्-तमस् रूप और मन-प्राण-आत्मा रूप तीन पृष्ठोंवाले, (वृषणम्) सुख आदि के वर्षक, (वयोधाम्) आयु प्रदान करनेवाले (अङ्गोषिणम्) अङ्ग-अङ्ग में निवास करनेवाले अथवा स्तुति-योग्य परमात्मा का (वाणीः) वेदवाणियाँ (अभि अवावशन्त) गान करती हैं। (वरुणः न) सूर्य के समान (वना) तेज की किरणों को (वसानः) धारण करता हुआ वह परमात्मा (रत्नधाः) रत्नप्रदाता (सिन्धुः) समुद्र के समान (वार्याणि) वरणीय भौतिक एवं आध्यात्मिक रत्नों को (वि दयते) विशेष रूप से प्रदान करता है ॥६॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःसूर्य के समान तेजों का और समुद्र के समान रत्नों का भण्डार परमेश्वर तेजों तथा रत्नों को प्रदान कर सबको समृद्ध करता है ॥६॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣡क्रा꣢न्त्समु꣣द्रः꣡ प्र꣢थ꣣मे꣡ विध꣢꣯र्मन् ज꣣न꣡य꣢न्प्र꣣जा꣡ भुव꣢꣯नस्य गो꣣पाः꣢ । वृ꣡षा꣢ प꣣वि꣢त्रे꣣ अ꣢धि꣣ सा꣢नो꣣ अ꣡व्ये꣢ बृ꣣ह꣡त्सोमो꣢꣯ वावृधे स्वा꣣नो꣡ अद्रिः꣢꣯ ॥५२९॥
पदार्थःप्रथम—मेघ के पक्ष में। (समुद्रः) जलों का पारावार मेघ (प्रथमे) श्रेष्ठ (विधर्मन्) विशेष धारणकर्ता अन्तरिक्ष में (अक्रान्) व्याप्त होता है। (प्रजाः) वृक्ष, वनस्पति आदि रूप प्रजाओं को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ वह (भुवनस्य) भूतल का (गोपाः) रक्षक होता है। (वृषा) वर्षा करनेवाला, (स्वानः) स्नान कराता हुआ (अद्रिः) मेघरूप (सोमः) सोम (पवित्रे) पवित्र (अव्ये) पार्थिव (सानौ अधि) पर्वत-शिखर पर (बृहत्) बहुत (वावृधे) वृद्धि को प्राप्त करता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (समुद्रः) शक्ति का पारावार परमेश्वर (प्रथमे) श्रेष्ठ, (विधर्मन्) विशेष रूप से जड़-चेतन के धारक ब्रह्माण्ड में (अक्रान्) व्याप्त है, (प्रजाः) जड़-चेतन प्रजाओं को (जनयन्) जन्म देता हुआ वह (भुवनस्य) जगत् का (गोपाः) रक्षक है। (वृषा) सद्गुणों की अथवा अन्तरिक्षस्थ जलों की वर्षा करनेवाला, (स्वानः) सत्कर्मों में प्रेरित करता हुआ, (अद्रिः) अविनश्वर (सोमः) वह परमात्मा (पवित्रे) पवित्र (अव्ये) अव्यय अर्थात् अविनाशी (सानौ अधि) उन्नत जीवात्मा में (बृहत्) बहुत (वावृधे) महिमा को प्राप्त है, क्योंकि जीवात्मा द्वारा किये जानेवाले महान् कार्यों में उसी की महिमा दृष्टिगोचर होती है ॥७॥ इस मन्त्र में मेघ और परमेश्वर दो अर्थों का वर्णन होने से श्लेषालङ्कार है। दोनों अर्थों का उपमानोपमेयभाव भी ध्वनित हो रहा है ॥७॥
भावार्थःजैसे अगाध जलराशिवाला मेघ अन्तरिक्ष में व्याप्त होता है, वैसे परमेश्वर सकल ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। जैसे मेघ बरसकर वृक्ष, वनस्पति आदियों को उत्पन्न करता है, वैसे परमेश्वर जड़-चेतन सब पदार्थों को उत्पन्न करता है। जैसे मेघ भूतल का रक्षक है, वैसे परमेश्वर सब भुवनों का रक्षक है। जैसे मेघ पर्वतों के शिखरों पर विस्तार प्राप्त करता है, वैसे परमेश्वर मनुष्यों के आत्माओं में ॥७॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
क꣡नि꣢क्रन्ति꣣ ह꣢रि꣣रा꣢ सृ꣣ज्य꣡मा꣢नः꣣ सी꣢द꣣न्व꣡न꣢स्य ज꣣ठ꣡रे꣢ पुना꣣नः꣢ । नृ꣡भि꣢र्य꣣तः꣡ कृ꣢णुते नि꣣र्णि꣢जं꣣ गा꣡मतो꣢꣯ म꣣तिं꣡ ज꣢नयत स्व꣣धा꣡भिः꣢ ॥५३०॥
पदार्थःप्रथम—सोम ओषधि के पक्ष में। (हरिः) हरे रंग का सोम (आ सृज्यमानः) द्रोणकलश में छोड़ा जाता हुआ (कनिक्रन्ति) शब्द करता है। (वनस्य) जंगल के (जठरे) मध्य में (सीदन्) स्थित वह (पुनानः) वायुमण्डल को पवित्र करता है। (नृभिः) यज्ञ के नेता ऋत्विजों से (यतः) पकड़ा हुआ वह सोम (गाम्) गोदुग्ध को (निर्णिजम्) अपने संयोग से पुष्ट (कृणुते) करता है। (अतः) इस कारण, हे यजमानो ! तुम (स्वधाभिः) हविरूप अन्नों के साथ, सोमयाग के प्रति (मतिम्) बुद्धि (जनयत) उत्पन्न करो, अर्थात् सोमयाग के निष्पादन में रुचि लो ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (हरिः) पापहारी परमेश्वर (आसृज्यमानः) मनुष्य के जीवात्मा के साथ संयुक्त होता हुआ (कनिक्रन्ति) कर्तव्याकर्तव्य का उपदेश करता है। (वनस्य) चाहनेयोग्य अपने मित्र उपासक मनुष्य के (जठरे) हृदय के अन्दर (सीदन्) बैठा हुआ वह (पुनानः) पवित्रता देता रहता है। (नृभिः) उपासक जनों से (यतः) हृदय में नियत किया हुआ वह (गाम्) इन्द्रिय-समूह को (निर्णिजम्) शुद्ध (कृणुते) करता है। (अतः) इस कारण, हे मनुष्यो ! तुम (स्वधाभिः) आत्मसमर्पणों के साथ, उस परमेश्वर के प्रति (मतिम्) स्तुति (जनयत) प्रकट करो ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। उपमानोपमेयभाव गम्य है ॥८॥
भावार्थःजैसे द्रोणकलश में पड़ता हुआ सोम टप-टप शब्द करता है, वैसे ही मनुष्यों के आत्मा में उपस्थित परमेश्वर कर्तव्य का उपदेश करता है। जैसे गोदूध से मिलकर सोम उस दूध को पुष्ट करता है, वैसे हृदय में निगृहीत किया परमेश्वर इन्द्रियों को पुष्ट और निर्मल करता है। अतः परमेश्वर के प्रति सबको स्तुतिगीत गाने चाहिएँ ॥८॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
ए꣣ष꣢꣫ स्य ते꣣ म꣡धु꣢माꣳ इन्द्र꣣ सो꣢मो꣣ वृ꣢षा꣣ वृ꣢ष्णः꣣ प꣡रि꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अक्षाः । स꣣हस्रदाः꣡ श꣢त꣣दा꣡ भू꣢रि꣣दा꣡वा꣢ शश्वत्त꣣मं꣢ ब꣣र्हि꣢꣫रा वा꣣꣬ज्य꣢꣯स्थात् ॥५३१॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् परमात्मन् ! (वृष्णः ते) तुझ वर्षक का (एषः) यह (स्यः) वह प्रसिद्ध, (वृषा) शक्तिवर्षक, (मधुमान्) मधुर (सोमः) आनन्दरस (पवित्रे) मेरे पवित्र हृदयरूप द्रोणकलश में (परि अक्षाः) झर रहा है। (सहस्रदाः) सहस्र गुणों का प्रदाता, (शतदाः) शत बलों का प्रदाता, (भूरिदावा) बहुत से लाभों को देनेवाला, (वाजी) वेगवान् आनन्दरस-रूप सोम (शश्वत्तमम्) सनातन (बर्हिः) आत्मा रूप दर्भपात्र में (आ अस्थात्) आकर स्थित हो गया है ॥९॥ इस मन्त्र में ‘तुझ वृषा का रस भी वृषा है’, इस प्रकार योग्य समागम की सूचना होने से समालङ्कार ध्वनित होता है। ‘वृषा, वृष्’ में छेकानुप्रास है। ‘दा’ की तीन बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥९॥
भावार्थःजैसे मधुर रस से भरा सोम पवित्र द्रोणकलश में क्षरित होता है, वैसे ही परमेश्वर का मधुर आनन्दरस हृदय-रूप द्रोणकलश में झरता है। जैसे सोमरस बहुशक्तिप्रद होता है, वैसे ही आनन्दरस भी ॥९॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प꣡व꣢स्व सोम꣣ म꣡धु꣢माꣳ ऋ꣣ता꣢वा꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो꣣ अ꣢धि꣣ सा꣢नो꣣ अ꣡व्ये꣢ । अ꣢व꣣ द्रो꣡णा꣢नि घृ꣣त꣡व꣢न्ति रोह म꣣दि꣡न्त꣢मो मत्स꣣र꣡ इ꣢न्द्र꣣पा꣡नः꣢ ॥५३२॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमात्मन् ! (मधुमान्) मधुर आनन्द से युक्त, (ऋतावा) सत्यमय आप (पवस्व) हमारे प्रति झरो अथवा हमें पवित्र करो। (अपः) हमारे कर्मों को (वसानः) आच्छादित करते हुए आप (अव्ये) अविनाशी (सानौ) उन्नत आत्मा में (अधि) अधिरोहण करो। (मदिन्तमः) अतिशय आनन्दमय, (मत्सरः) आनन्दप्रद, (इन्द्रपानः) जीवात्मा से पान किये जाने योग्य आप (घृतवन्ति) तेजोमय (द्रोणानि) इन्द्रिय, मन, प्राण रूप द्रोणकलशों में (अवरोह) अवरोहण करो ॥१०॥
भावार्थःयहाँ श्लेष से सोम ओषधि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए। परमात्मा सोम ओषधि के सदृश मधुर रस का भण्डार है। जैसे सोम ओषधि का रस जलों से मिलकर भेड़ के बालों से बने दशापवित्र में परिस्रुत होकर द्रोणकलशों में जाता है, वैसे ही परमात्मा हमारे कर्मों से संसृष्ट होकर आत्मा में परिस्रुत हो इन्द्रिय, मन, प्राण रूप द्रोणकलशों में अवरोहण करता है ॥१०॥ इस दशति में भी सोम परमात्मा तथा उससे अभिषुत आनन्दरस का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक, प्रथम अर्ध में चतुर्थ दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ से꣢ना꣣नीः꣢꣫ शूरो꣣ अ꣢ग्रे꣣ र꣡था꣢नां ग꣣व्य꣡न्ने꣢ति꣣ ह꣡र्ष꣢ते अस्य꣣ से꣡ना꣢ । भ꣣द्रा꣢न्कृ꣣ण्व꣡न्नि꣢न्द्रह꣣वा꣡न्त्सखि꣢꣯भ्य꣣ आ꣢꣯ सोमो꣣ व꣡स्त्रा꣢ रभ꣣सा꣡नि꣢ दत्ते ॥५३३॥
पदार्थः(सेनानीः) देवजनों का सेनापति (शूरः) शूरवीर सोम नामक परमेश्वर (गव्यन्) दिव्य प्रकाश-किरणों को प्राप्त कराना चाहता हुआ (रथानाम्) शरीररथारोही जीवात्मारूप योद्धाओं के (अग्रे) आगे-आगे (प्र एति) चलता है, इस कारण (अस्य) इसकी (सेना) देवसेना (हर्षते) प्रमुदित एवं उत्साहित होती है। (सखिभ्यः) अपने सखा उपासकों के लिए (इन्द्रहवान्) सेनापति के प्रति की गयी पुकारों को (भद्रान्) भद्र (कृण्वन्) करता हुआ, अर्थात् उपासकों की पुकारों को सफल करता हुआ (सोमः) वीररसपूर्ण परमेश्वर (रभसानि) बल, वेग आदियों को (वस्त्रा) वस्त्रों के समान (आदत्ते) ग्रहण करता है, अर्थात् जैसे कोई वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही वीर परमेश्वर अपने सेनापतित्व का निर्वाह करने के लिए बल, वेग आदि को धारण करता है ॥१॥ इस मन्त्र में वीररस है। सोम परमात्मा में सेनानीत्व का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे कोई शूर सेनापति वीरोचित वस्त्रों को धारण कर रथारोही योद्धाओं के आगे-आगे चलता हुआ उन्हें प्रोत्साहित करता है और अपनी सेना को हर्षित करता है, वैसे ही परमेश्वर वीरोचित बल, वेग आदि को धारण करता हुआ मानसिक देवासुरसंग्राम में मानो सेनानी बनकर दुर्विचाररूप शत्रुओं का संहार करने के लिए और दिव्य विचारों को बढ़ाने के लिए देवजनों को समुत्साहित करता है ॥१॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣢ ते꣣ धा꣢रा꣣ म꣡धु꣢मतीरसृग्र꣣न्वा꣢रं꣣ य꣢त्पू꣣तो꣢ अ꣣त्ये꣡ष्यव्य꣢꣯म् । प꣡व꣢मान꣣ प꣡व꣢से꣣ धा꣡म꣢ गो꣡नां꣢ ज꣣न꣢य꣣न्त्सू꣡र्य꣢मपिन्वो अ꣣र्कैः꣢ ॥५३४॥
पदार्थःहे सोम ! हे रसमय परमात्मन् ! (ते) तेरी (मधुमतीः) मधुर (धाराः) धाराएँ (प्र असृग्रन्) प्रवाहित होती हैं, (यत्) जब (पूतः) पवित्र तू (अव्यम्) पार्थिव अर्थात् अन्नमय (वारम्) कोश को (अत्येषि) अतिक्रान्त करता है अर्थात् अन्नमयकोश को पार कर क्रमशः प्राणमय, मनोमय तथा विज्ञानमयकोश को भी पार करता हुआ जब तू आनन्दमयकोश में अधिष्ठित हो जाता है तब तेरी मधुर आनन्दधाराएँ शरीर, प्राण, मन और आत्मा में प्रवाहित होने लगती हैं। हे (पवमान) पवित्रकारी जगदीश्वर ! तू (गोनाम्) पृथिव्यादि लोकों के तुल्य इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, आत्मा के (धाम) धाम को (पवसे) पवित्र करता है और (सूर्यम्) आकाशवर्ती सूर्य के समान अध्यात्मप्रकाश के सूर्य को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ, उसकी (अर्कैः) किरणों से (अपिन्वः) उपासक के आत्मा को सींचता है, अर्थात् उपासक के आत्मा को अध्यात्मसूर्य की किरणों से अतिशय भरकर शान्ति प्रदान करता है ॥२॥
भावार्थःजैसे सोमरस जब भेड़ों के बालों से निर्मित दशापवित्र में से पार होता है तब उसकी मधुर धाराएँ द्रोणकलश की ओर बहती हैं, वैसे ही जब परमेश्वर अन्नमय आदि कोशों को पार कर आनन्दमयकोश में अधिष्ठित हो जाता है, तब उसकी मधुर आनन्दधाराएँ शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा के धामों को आप्लावित कर देती हैं ॥२॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ गा꣢यता꣣꣬भ्य꣢꣯र्चाम दे꣣वा꣡न्त्सोम꣢꣯ꣳ हिनोत मह꣣ते꣡ धना꣢꣯य । स्वा꣣दुः꣡ प꣢वता꣣मति꣣ वा꣢र꣣म꣢व्य꣣मा꣡ सी꣢दतु क꣣ल꣡शं꣢ दे꣣व꣡ इन्दुः꣢꣯ ॥५३५॥
पदार्थःप्रथम—सोम ओषधि के पक्ष में। हे साथियो ! तुम (प्र गायत) वेदमन्त्रों का गान करो। हम (देवान्) यज्ञ में आये हुए विद्वानों को (अभ्यर्चाम) सत्कृत करें। तुम (महते) महान् (धनाय) यज्ञफल-रूप धन के लिए (सोमम्) सोम ओषधि के रस को (हिनोत) प्रेरित करो। (स्वादुः) स्वादु सोमरस (अव्यम्) भेड़ के बालों से बने हुए (वारम्) दशापवित्र में से (अति पवताम्) छनकर पार हो। (देवः) द्युतिमान्, वह (इन्दुः) सोमरस (कलशम्) द्रोणकलश में (आ सीदतु) आकर स्थित हो ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। हे उपासको ! तुम (प्र गायत) रसागार सोम परमात्मा को लक्ष्य करके गीत गाओ। तुम और हम मिलकर हृदय में आये हुए (देवान्) सत्य, अहिंसा आदि दिव्य गुणों को (अभ्यर्चाम) सत्कृत करें। तुम (महते) महान् (धनाय) दिव्य-धन की प्राप्ति के लिए (सोमम्) रसागार परमेश्वर को (हिनोत) अपने अन्तः- करण में प्रेरित करो। (स्वादुः) मधुर रसवाला वह परमेश्वर (अव्यं वारम्) पार्थिव अन्नमय कोश को (अति) पार करके (पवताम्) प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों में प्रवाहित हो। (देवः) दानादिगुणविशिष्ट वह (इन्दुः) रस से आर्द्र करनेवाला परमेश्वर (कलशम्) सोलह कलाओं से युक्त आत्मा को (आ सीदतु) प्राप्त हो ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे यजमान लोग सोमलता को यज्ञिय सिल-बट्टों पर पीसकर, रस को दशापवित्रों से छानकर, मधुर सोमरस को द्रोणकलशों में भरते हैं, उसी प्रकार परमात्मा के आराधक लोग मधुर ब्रह्मानन्द-रस को आत्मा-रूप कलश में प्रविष्ट करायें ॥३॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ हि꣢न्वा꣣नो꣡ ज꣢नि꣣ता꣡ रोद꣢꣯स्यो꣣ र꣢थो꣣ न꣡ वाज꣢꣯ꣳ सनि꣣ष꣡न्न꣢यासीत् । इ꣢न्द्रं꣣ ग꣢च्छ꣣न्ना꣡यु꣢धा स꣣ꣳशि꣡शा꣢नो꣣ वि꣢श्वा꣣ व꣢सु꣣ ह꣡स्त꣢योरा꣣द꣡धा꣢नः ॥५३६॥
पदार्थः(रोदस्योः) द्यावापृथिवी का (जनिता) उत्पादक और (हिन्वानः) द्यावापृथिवी को गति देता हुआ सर्वप्रेरक सोम परमात्मा (वाजम्) आत्मबल को (सनिषन्) देना चाहता हुआ (प्र अयासीत्) प्रवृत्त होता है, (रथः न) जैसे रथ, मानो (वाजम्) अन्न को (सनिषन्) देने के लिए (प्र अयासीत्) चलता है। वह (इन्द्रम्) जीवात्मा के प्रति (गच्छन्) जाता हुआ, उसके (आयुधा) हथियारों को अर्थात् शम, दम आदि शत्रुपराजय के साधनों को (सं शिशानः) भली-भाँति तीक्ष्ण करता हुआ (विश्वा वसु) सब आध्यात्मिक ऐश्वर्यों को (हस्तयोः) उसके हाथों में (आदधानः) थमा देता है ॥४॥ इस मन्त्र में ‘रथो न वाजम्’ आदि में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःरथ जैसे प्रचुर अन्नादि की प्राप्ति का साधन बनता है, वैसे ही परमात्मा जीवात्मा के लिए प्रचुर बल, वेग आदि की प्राप्ति का साधन बनता है ॥४॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
त꣢क्ष꣣द्य꣢दी꣣ म꣡न꣢सो꣣ वे꣡न꣢तो꣣ वा꣡ग्ज्येष्ठ꣢꣯स्य꣣ ध꣡र्मं꣢ द्यु꣣क्षो꣡रनी꣢꣯के । आ꣡दी꣢माय꣣न्व꣢र꣣मा꣡ वा꣢वशा꣣ना꣢꣫ जुष्टं꣣ प꣡तिं꣢ क꣣ल꣢शे꣣ गा꣢व꣣ इ꣡न्दु꣢म् ॥५३७॥
पदार्थः(यदि) जब (वेनतः) कामना करनेवाले अर्थात् संकल्पवान् (मनसः) मन की (वाक्) संकल्परूप वाणी, स्तोता को (ज्येष्ठस्य) सबसे महान् परमात्मा के (धर्मन्) धर्म में अर्थात् गुण-समूह में, और (द्युक्षोः) दीप्ति के निवासक उस परमात्मा के (अनीके) समीप (तक्षत्) करती है, (आत्) उसके अनन्तर ही (आ वावशानाः) अतिशय पुनः-पुनः प्रीति करते हुए (गावः) स्तोता जन (ईम्) इस (वरम्) वरणीय वा श्रेष्ठ, (जुष्टम्) प्रिय (पतिम्) शरीर के पालनकर्ता अथवा स्वामी (इन्दुम्) तेजोमय अथवा चन्द्रतुल्य जीवात्मा को (कलशे) सोलह कलाओं से युक्त परमात्मा रूप द्रोणकलश में (आयन्) पहुँचाते हैं ॥५॥
भावार्थःमन का संकल्प सहायक होने पर जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त कर सकता है ॥५॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
सा꣣कमु꣡क्षो꣢ मर्जयन्त꣣ स्व꣡सा꣢रो꣣ द꣢श꣣ धी꣡र꣢स्य धी꣣त꣢यो꣣ ध꣡नु꣢त्रीः । ह꣢रिः꣣ प꣡र्य꣢द्रव꣣ज्जाः꣡ सूर्य꣢꣯स्य꣣ द्रो꣡णं꣢ ननक्षे꣣ अ꣢त्यो꣣ न꣢ वा꣣जी꣢ ॥५३८॥
पदार्थःप्रथम—सोम ओषधि के पक्ष में। (धीरस्य) बुद्धिमान् यजमान के (साकमुक्षः) साथ मिलकर सोमरस को निचोड़नेवाली, (धनुत्रीः) प्रेरक, (दश) दस (धीतयः) अंगुलियाँ जब सोमरस को (मर्जयन्ति) शुद्ध करती हैं, तब (सूर्यस्य) सूर्य का (जाः) पुत्र (हरिः) हरे रंग का सोमरस (पर्यद्रवत्) चारों ओर फैल जाता है। (न) जैसे (वाजी) वेगवान् (अत्यः) घोड़ा (द्रोणम्) लकड़ी से बने रथ को (ननक्षे) व्याप्त करता है अर्थात् रथ में नियुक्त होता है, वैसे ही सोमरस (द्रोणम्) द्रोणकलश में (ननक्षे) व्याप्त होता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (धीरस्य) ध्यान में स्थित योगी की (साकमुक्षः) साथ मिलकर ज्ञानों और कर्मों से सींचनेवाली, (स्वसारः) बहिनों के समान परस्पर सहायता करनेवाली, (धनुत्रीः) प्रेरक (दश) दस (धीतयः) यम-नियम-भावनाएँ, जब (मर्जयन्त) आत्मा को शुद्ध करती हैं, तब (सूर्यस्य) परमात्मा का (जाः) पुत्र (हरिः) उन्नति के मार्ग पर जानेवाला आत्मा (पर्यद्रवत्) क्रियाशील हो जाता है, और (न) जैसे (वाजी) वेगवान् (अत्यः) घोड़ा (द्रोणम्) लकड़ी से बने रथ को (ननक्षे) प्राप्त करता है, अर्थात् उसमें जुड़ता है, वैसे ही वह आत्मा (द्रोणम्) क्रियाशील परमात्मा-रूप द्रोणकलश को (ननक्षे) प्राप्त कर लेता है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी’ में श्लिष्टोपमा है। सकार-धकार-नकार तथा रेफ की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥६॥
भावार्थःअंगुलियों से परिशुद्ध सोमरस जैसे द्रोणकलश को प्राप्त करता है, वैसे ही यम-नियम की भावनाओं से परिशुद्ध हुआ जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त करता है ॥६॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣢धि꣣ य꣡द꣢स्मिन्वा꣣जि꣡नी꣢व꣣ शु꣢भः꣣ स्प꣡र्ध꣢न्ते꣣ धि꣢यः꣣ सू꣢रे꣣ न꣡ विशः꣢꣯ । अ꣣पो꣡ वृ꣢णा꣣नः꣡ प꣢वते꣣ क꣡वी꣢यान्व्र꣣जं꣡ न प꣢꣯शु꣣व꣡र्ध꣢नाय꣣ म꣡न्म꣢ ॥५३९॥
पदार्थः(यत्) जब (अस्मिन्) इस सोमनामक परमात्मा में (धियः) उपासक की ध्यानवृत्तियाँ (अधि स्पर्धन्ते) मानो “मैं पहले प्रवेश करूँ-मैं पहले करूँ” इस प्रकार स्पर्धा-सी करती हैं, किस प्रकार? (वाजिनि इव) जैसे घोड़े पर (शुभः) शोभाकारक अलङ्कार मानो उसे शोभित करने की स्पर्धा करते हैं, अथवा (वाजिनि इव) जैसे बलवान् पुरुष में (शुभः) शोभाकारी गुण निवास करने की स्पर्धा करते हैं, और (सूरे न) जैसे सूर्य में (विशः) उसकी प्रजाभूत किरणें व्याप्त होने की स्पर्धा करती हैं, तब (कवीयान्) अतिशय मेधावी सोम परमेश्वर (अपः) उपासक के प्राणों को (वृणानः) वरण करता हुआ, उसके (मन्म) मन को (पवते) पवित्र करता है, (न) जैसे, गोपालक मनुष्य (पशुवर्धनाय) गाय आदि पशुओं के पोषण के लिए (व्रजम्) गोशाला को स्वच्छ-पवित्र करता है ॥७॥ इस मन्त्र में ‘वाजिनीव शुभः’, ‘सूरे न विशः’, ‘व्रजं न पशुवर्धनाय’ ये तीन उपमाएँ हैं। चेतन के धर्म स्पर्धा का अलङ्कार, शुभगुण और ध्यानवृत्ति रूप अचेतनों के साथ योग में “मानो स्पर्धा करते हैं” यह अर्थ द्योतित होने से व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥७॥
भावार्थःजब साधक लोग परमात्मा में ध्यान केन्द्रित करते हैं, तब परमात्मा उनके हृदयों को पवित्र करके उनकी सब प्रकार से वृद्धि करता है ॥७॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
इ꣡न्दु꣢र्वा꣣जी꣡ प꣢वते꣣ गो꣡न्यो꣢घा꣣ इ꣢न्द्रे꣣ सो꣢मः꣣ स꣢ह꣣ इ꣢न्व꣣न्म꣡दा꣢य । ह꣢न्ति꣣ र꣢क्षो꣣ बा꣡ध꣢ते꣣ प꣡र्यरा꣢꣯तिं꣣ व꣡रि꣢वस्कृ꣣ण्व꣢न्वृ꣣ज꣡न꣢स्य꣣ रा꣡जा꣢ ॥५४०॥
पदार्थः(गोन्योघाः) गो-रसों के समान मधुर आनन्दरसों के समूह का स्वामी, (वाजी) वेगवान् (इन्दुः) तेजस्वी और रस से आर्द्र करनेवाला परमात्मा (पवते) उपासक के अन्तःकरण को पवित्र करता है। (सोमः) शान्तिदायक वह परमात्मा (मदाय) आनन्द देने के लिए (इन्द्रे) जीवात्मा में (सहः) बल को (इन्वन्) प्रेरित करता है। (वृजनस्य) बल का (राजा) राजा वह परमात्मा, अपने उपासकों को (वरिवः) शुभगुणों का अथवा योग-सिद्धियों का ऐश्वर्य (कृण्वन्) प्रदान करता हुआ (रक्षः) पापरूप राक्षस को (हन्ति) विनष्ट करता है, (अरातिम्) अदानभाव को (परि बाधते) सर्वथा दूर कर देता है ॥८॥
भावार्थःपरमेश्वर उपासकों को गाय के दूध के समान मधुर आनन्दरसों को, आत्मबल को, सद्गुणों को एवं अणिमा आदि योगसिद्धियों को प्रदान करता हुआ उनके हृदय से अदानवृत्ति को बाधित करता हुआ और उनके पापरूप शत्रु का संहार करता हुआ उन्हें विजयी बनाता है ॥८॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣡या꣢ प꣣वा꣡ प꣢वस्वै꣣ना꣡ वसू꣢꣯नि माꣳश्च꣣त्व꣡ इ꣢न्दो꣣ स꣡र꣢सि꣣ प्र꣡ ध꣢न्व । ब्र꣣ध्न꣢श्चि꣣द्य꣢स्य꣣ वा꣢तो꣣ न꣢ जू꣣तिं꣡ पु꣢रु꣣मे꣡धा꣢श्चि꣣त्त꣡क꣢वे꣣ न꣡रं꣢ धात् ॥५४१॥
पदार्थःहे (इन्दो) रस से आर्द्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (अया) इस (पवा) प्रवाहमयी धारा के साथ (एना) इन (वसूनि) सत्य, अहिंसा आदि ऐश्वर्यों को (पवस्व) क्षरित करो। (मांश्चत्वे) स्तुतिशब्दयुक्त (सरसि) मेरे हृदय-सरोवर में (प्र धन्व) भली-भाँति आओ, (यस्य) जिन आपका (ब्रध्नः चित्) महान् (वातः) वायु (न) जैसे (जूतिम्) वेग को (धात्) धारण करता है, वैसे ही (पुरुमेधाः चित्) बुद्धिमान् स्तोता (तकवे) कर्मयोग के लिए (नरम्) नेतृत्व के गुण को (धात्) धारण करता है ॥९॥ इस मन्त्र में ‘वातो न जूतिम्’ आदि में उपमालङ्कार है। ‘पवा, पव’ में छेकानुप्रास है ॥९॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर से रचित महान् वायु तीव्र वेग को धारण करता है, वैसे ही परमेश्वर का स्तोता महान् नेतृत्व-गुण को धारण करता है ॥९॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
म꣣ह꣡त्तत्सोमो꣢꣯ महि꣣ष꣡श्च꣢कारा꣣पां꣡ यद्गर्भोऽवृ꣢꣯णीत दे꣣वा꣢न् । अ꣡द꣢धा꣣दि꣢न्द्रे꣣ प꣡व꣢मान꣣ ओ꣡जोऽज꣢꣯नय꣣त्सू꣢र्ये꣣ ज्यो꣢ति꣣रि꣡न्दुः꣢ ॥५४२॥
पदार्थः(महिषः) महान् (सोमः) सोम ओषधि के समान रस का भण्डार, चन्द्रमा के समान आह्लादक तथा प्रेरक परमेश्वर (तत्) उस प्रसिद्ध (महत्) महान् कर्म को (चकार) करता है (यत्) कि (अपां गर्भः) सबके प्राणों में गर्भ के समान अन्तर्यामी वह (देवान्) मन सहित सब आँख, कान आदि इन्द्रियों को (अवृणीत) रक्ष्य रूप में वरण करता है। (पवमानः) पवित्र करनेवाला वह (इन्द्रे) जीवात्मा तथा विद्युत् में (ओजः) पवित्रता को वा बल को (अदधात्) स्थापित करता है। (इन्दुः) प्रकाशमय वह (सूर्ये) सूर्य में (ज्योतिः) ज्योति को (अदधात्) स्थापित करता है, अथवा (सूर्ये) शरीरस्थ आँख में (ज्योतिः) दर्शनशक्ति को (अदधात्) स्थापित करता है ॥१०॥ इस मन्त्र में ‘इन्दु’ का प्रसिद्ध अर्थ चन्द्रमा लेने पर ‘चन्द्रमा सूर्य में ज्योति उत्पन्न करता है’ यह विरोध आभासित होता है, क्योंकि सूर्य चन्द्रमा को ज्योति देता है, न कि चन्द्रमा सूर्य को। ‘इन्दु’ का यौगिक अर्थ ग्रहण करने पर उस विरोध का समाधान हो जाता है। ‘अपि’ शब्द न होने से यहाँ विरोधाभास अलङ्कार व्यङ्ग्य है ॥१०॥
भावार्थःशरीर के अन्दर मन, चक्षु, श्रोत्र आदि में और बाह्य जगत् में सूर्य, चन्द्र, विद्युत्, बादल आदि में जो शक्ति या ज्योति है, वह सब परमात्मा की ही दी हुई है ॥१०॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣡स꣢र्जि꣣ व꣢क्वा꣣ र꣢थ्ये꣣ य꣢था꣣जौ꣢ धि꣣या꣢ म꣣नो꣡ता꣢ प्रथ꣣मा꣡ म꣢नी꣣षा꣣ । द꣢श꣣ स्व꣡सा꣢रो꣣ अ꣢धि꣣ सा꣢नो꣣ अ꣡व्ये꣢ मृ꣣ज꣢न्ति꣣ व꣢ह्नि꣣ꣳ स꣡द꣢ने꣣ष्व꣡च्छ꣢ ॥५४३॥
पदार्थः(यथा) जिस प्रकार (रथ्ये) रथों से युद्ध करने योग्य (आजौ) संग्राम में (वक्वा) शब्द करनेवाला घोड़ा (असर्जि) प्रेरित किया जाता है, वैसे ही (मनोता) जिसमें ज्ञान ओत-प्रोत है, ऐसी (प्रथमा) श्रेष्ठ (मनीषा) मन को गति देनेवाली (धिया) बुद्धि से (वक्वा) शब्दकारी प्राण (असर्जि) प्रेरित किया जाता है। जैसे (दश) दस (स्वसारः) अंगुलियाँ (सदनेषु अच्छ) यज्ञ-सदनों में (अव्ये) भेड़ के बालों से निर्मित (सानौ अधि) ऊपर उठाये हुए दशापवित्र में (वह्निम्) यज्ञ के वाहक सोमरस को (मृजन्ति) छानकर शुद्ध करती हैं, वैसे ही (दश) दस (स्वसारः) बहिनों के समान परस्पर सम्बद्ध प्राणशक्तियाँ (सदनेषु अच्छ) शरीर रूप सदनों में (अव्ये) नाशरहित (सानौ अधि) सर्वोन्नत परमात्मा के सान्निध्य में (वह्निम्) शरीर के वाहक जीवात्मा को (मृजन्ति) शुद्ध करती हैं ॥११॥ इस मन्त्र के पूर्वार्द्ध में वाच्य उपमालङ्कार है। उत्तरार्द्ध में श्लेषमूलक व्यङ्ग्योपमा है। ‘मनो, मनी’ में छेकानुप्रास है। ‘मनोता, प्रथमा, मनीषा’ में मकार का और ‘रथ्ये यथाजौ धिया’ में यकार का अनुप्रास है ॥११॥
भावार्थःपरमात्मा के आश्रय को प्राप्त करके जीवात्मा वैसे ही शुद्ध हो जाता है, जैसे दशापवित्र रूप छन्नी को प्राप्त कर सोमरस शुद्ध होता है ॥११॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣पा꣢मि꣣वे꣢दू꣣र्म꣣य꣣स्त꣡र्त्तुराणाः꣢ प्र꣡ म꣢नी꣣षा꣡ ई꣢रते꣣ सो꣢म꣣म꣡च्छ꣢ । न꣣मस्य꣢न्ती꣣रु꣡प꣢ च꣣ य꣢न्ति꣣ सं꣡ चाच꣢꣯ विशन्त्युश꣣ती꣢रु꣣श꣡न्त꣢म् ॥५४४॥
पदार्थः(अपाम्) जलों की (ऊर्मयः इव) लहरों के समान (इत्) निश्चय ही (तर्तुराणाः) अतिशय शीघ्रता करती हुईं (मनीषाः) मेरी बुद्धियाँ (सोमम् अच्छ) रस के भण्डार परमात्मा के प्रति (प्र ईरते) प्रकृष्ट रूप से जा रही हैं। (नमस्यन्तीः) परमात्मा को नमस्कार करती हुईं (उपयन्ति च) परस्पर समीप आती हैं, (सं यन्ति च) परस्पर मिलती हैं और (उशतीः) परमात्मा से प्रीति रखती हुई वे (उशन्तम्) प्रीति करनेवाले परमात्मा में (आ विशन्ति च) प्रविष्ट हो जाती हैं ॥१२॥ इस मन्त्र में ‘अपामिवेदूर्मयः’ इत्यादि में पूर्णोपमालङ्कार है।
भावार्थःजैसे नदियों की लहरें कहीं नीची होती हैं, कहीं परस्पर पास जाती हैं, कहीं परस्पर मिलती हैं और लम्बा मार्ग तय करके अन्ततः समुद्र में प्रविष्ट हो जाती हैं, वैसे ही स्तोता की बुद्धियाँ भी परस्पर सान्निध्य करती हुई, परस्पर मिलती हुई परमात्मा की ओर चलती चली जाती हैं और परमात्मा में प्रविष्ट हो जाती हैं ॥१२॥ इस दशति में परमात्मा-रूप सोम का सेनापति-रूप में, आनन्दधाराओं को प्रवाहित करनेवाले के रूप में, पापादि के नष्टकर्ता के रूप में और ज्योति को उत्पन्न करनेवाले के रूप में वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ पप्रपाठक में प्रथम अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
पु꣣रो꣡जि꣢ती वो꣣ अ꣡न्ध꣢सः सु꣣ता꣡य꣢ मादयि꣣त्न꣡वे꣢ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢ꣳश्नथिष्टन꣣ स꣡खा꣢यो दीर्घजि꣣꣬ह्व्य꣢꣯म् ॥५४५॥
पदार्थःहे (सखायः) साथियो ! (वः) तुम (अन्धसः) ध्यान करने योग्य परमात्मा रूप सोम के (मादयित्नवे) हर्षित करनेवाले (सुताय) आनन्द-रस को (पुरोजिती) आगे बढ़ कर प्राप्त करने के लिए (दीर्घजिह्व्यम्) लम्बी जीभवाले अर्थात् निरन्तर बढ़ते रहनेवाले (श्वानम्) श्वान के स्वभाव को अर्थात् संसारिक विषय-भोगों के प्रति लोभ को (श्नथिष्टन) नष्ट कर दो। अभिप्राय यह है कि सांसारिक विषयों से मन को हटा कर परमात्मा में केन्द्रित करो ॥१॥ इस मन्त्र में लोभवृत्ति को कुत्तेवाची ‘श्वन्’ शब्द से कथित करने के कारण असम्बन्ध में सम्बन्धरूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःलम्बी जीभ से विषयभोगों के रस को चाटनेवाले लोभ रूप श्वान को विनष्ट करके ही मनुष्य परमात्मयोग-जन्य तीव्र आनन्द को पा सकते हैं ॥१॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣣यं꣢ पू꣣षा꣢ र꣣यि꣢꣫र्भगः꣣ सो꣡मः꣢ पुना꣣नो꣢ अ꣢र्षति । प꣡ति꣣र्वि꣡श्व꣢स्य꣣ भू꣡म꣢नो꣣꣬ व्य꣢꣯ख्य꣣द्रो꣡द꣢सी उ꣣भे꣢ ॥५४६॥
पदार्थः(पूषा) पुष्टिकर्ता, (रयिः) ऐश्वर्यवान् और ऐश्वर्यप्रदाता, (भगः) भजनीय (अयं सोमः) यह रसागार प्रेरक परमेश्वर (पुनानः) रची हुई सब वस्तुओं को पवित्र करता हुआ (अर्षति) सक्रिय हो रहा है। (विश्वस्य) सकल (भूमनः) ब्रह्माण्ड का (पतिः) स्वामी वा रक्षक यह परमेश्वर (उभे) दोनों (रोदसी) भूगोल व खगोल को (व्यख्यत्) तेज से प्रकाशित करता है। इस वर्णन से परमेश्वर का जगत् का शिल्पी होना व्यञ्जित हो रहा है ॥२॥
भावार्थःसब जगत् का रचयिता, धारक, प्रकाशक, ऐश्वर्यशाली तथा ऐश्वर्य का दाता जगदीश्वर सबके द्वारा भजन करने योग्य है ॥२॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
सु꣣ता꣢सो꣣ म꣡धु꣢मत्तमाः꣣ सो꣢मा꣣ इ꣡न्द्रा꣢य म꣣न्दि꣡नः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢वन्तो अक्षरन्दे꣣वा꣡न्ग꣢च्छन्तु वो꣢ म꣡दाः꣢ ॥५४७॥
पदार्थः(मधुमत्तमाः) सबसे अधिक मधुर, (मन्दिनः) हर्षजनक (सोमाः) परमानन्द-रस (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (सुतासः) अभिषुत किये हुए, (पवित्रवन्तः) मन रूप दशापवित्र से युक्त होकर (अक्षरन्) आत्मा रूप कलश में क्षरित होते हैं। वे (मदाः) परमानन्दरस (वः) आप (देवान्) सब विद्वान् जनों को (गच्छन्तु) प्राप्त होवें ॥३॥
भावार्थःध्यान द्वारा परमात्मा के पास से प्रादुर्भूत अत्यन्त मधुर परमानन्दरस मन के माध्यम से जीवात्मा को प्राप्त होते हैं ॥३॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
सो꣡माः꣢ पवन्त꣣ इ꣡न्द꣢वो꣣ऽस्म꣡भ्यं꣢ गातु꣣वि꣡त्त꣢माः । मि꣣त्राः꣢ स्वा꣣ना꣡ अ꣢रे꣣प꣡सः꣢ स्वा꣣꣬ध्यः꣢꣯ स्व꣣र्वि꣡दः꣢ ॥५४८॥
पदार्थः(इन्दवः) प्रकाशमय अथवा रस से आर्द्र करनेवाले (सोमाः) परमानन्दरस (पवन्ते) हमें पवित्र करते हैं, जो (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (गातुवित्तमाः) अतिशय सन्मार्ग को प्राप्त करानेवाले, (मित्राः) मित्रभूत, (स्वानाः) सद्गुणों की ओर प्रेरित करनेवाले, (अरेपसः) निष्पाप, निष्कलङ्क, निर्दोष, (स्वाध्यः) उत्कृष्ट ध्यान में सहायक और (स्वर्विदः) मोक्ष प्राप्त करानेवाले हैं ॥४॥ इस मन्त्र में अनेक साभिप्राय विशेषणों का योग होने से परिकरालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजो ब्रह्मानन्दरस जीवन में सन्मार्ग दिखानेवाले, मित्र के सदृश परम उपकारक, शुभगुण-प्रेरक, ध्यान में सहायक और मोक्षप्रापक होते हैं, वे पवित्रता देनेवाले क्यों न होंगे ॥४॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣣भी꣡ नो꣢ वाज꣣सा꣡त꣢मꣳ र꣣यि꣡म꣢र्ष शत꣣स्पृ꣡ह꣢म् । इ꣡न्दो꣢ स꣣ह꣡स्र꣢भर्णसं तुविद्यु꣣म्नं꣡ वि꣢भा꣣स꣡ह꣢म् ॥५४९॥
पदार्थःहे (इन्दो) आनन्दरस से आर्द्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (वाजसातमम्) अतिशय बल के प्रदाता, (शतस्पृहम्) बहुतों से स्पृहणीय, (सहस्रभर्णसम्) सहस्र गुणों को धारण करानेवाले अथवा सहस्रों जनों का पोषण करनेवाले, (तुविद्युम्नम्) बहुत यश को देनेवाले, (विभासहम्) शत्रु के प्रताप को अभिभूत करनेवाले (रयिम्) आध्यात्मिक तथा भौतिक ऐश्वर्य को (नः) हमें (अभि अर्ष) प्राप्त कराइए ॥५॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से और अपने पुरुषार्थ से सब लोग सत्य, अहिंसा, अणिमा, महिमा, लघिमा आदि आध्यात्मिक तथा सोना, चाँदी, मणि, मोती आदि भौतिक धन प्राप्त कर सकते हैं, जिससे वे आत्मिक और शारीरिक बल, सहस्रों गुण, सहस्रों के पोषण का सामर्थ्य और कीर्ति प्राप्त करने में तथा शत्रु के तेज को परास्त करने में समर्थ हो जाते हैं ॥५॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣣भी꣡ न꣢वन्ते अ꣣द्रु꣡हः꣢ प्रि꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ का꣡म्य꣢म् । व꣣त्सं꣢꣫ न पूर्व꣣ आ꣡यु꣢नि जा꣣त꣡ꣳ रि꣢हन्ति मा꣣त꣡रः꣢ ॥५५०॥
पदार्थः(अद्रुहः) द्रोह न करनेवाली, प्रत्युत स्नेह करनेवाली, (मातरः) माताओं के समान पालन करनेवाली मनोवृत्तियाँ (प्रियम्) प्रिय, (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (काम्यम्) चाहने योग्य परमात्मा की (अभि) ओर (नवन्ते) जाती हैं, और (जातम्) हृदय में प्रकट हुए उसे (रिहन्ति) चाटती हैं अर्थात् उससे सम्पर्क करती हैं, (जातम्) उत्पन्न हुए (वत्सम्) अपने बछड़े को (न) जैसे (पूर्वे आयुनि) प्रथम आयु में (मातरः) गौ-माताएँ (रिहन्ति) चाटती हैं ॥६॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। चाटना जिह्वा से होता है, वह मनोवृत्तियों के पक्ष में घटित नहीं होता। इसलिए यहाँ लक्षणा से संसर्ग अर्थ का बोध होता है, सामीप्य का अतिशय व्यङ्ग्य है। गाय के पक्ष में जिह्वा से चाटना सम्भव होने से लक्षणा नहीं है ॥६॥
भावार्थःजैसे नवजात बछड़े को गौएँ प्रेम से चाटती हैं, वैसे ही हृदय में प्रादुर्भूत परमेश्वर का उसके प्रेम में भरकर मनोवृत्तियाँ रसास्वादन करती हैं ॥६॥
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छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
आ꣡ ह꣢र्य꣣ता꣡य꣢ धृ꣣ष्ण꣢वे꣣ ध꣡नु꣢ष्टन्वन्ति꣣ पौ꣡ꣳस्य꣢म् । शु꣣क्रा꣢꣫ वि य꣣न्त्य꣡सु꣢राय नि꣣र्णि꣡जे꣢ वि꣣पा꣡मग्रे꣢꣯ मही꣣यु꣡वः꣢ ॥५५१॥
पदार्थः(हर्यताय) चाहने योग्य, (धृष्णवे) कामादि शत्रुओं का धर्षण करनेवाले सोम परमात्मा को पाने के लिए, योगसाधक लोग (पौंस्यम्) पुरुषार्थ-रूप (धनुः) धनुष् को (आ तन्वन्ति) तानते हैं अर्थात् पुरुषार्थरूप धनुष् पर ध्यानरूप डोरी को चढ़ाते हैं। (शुक्राः) पवित्र अन्तःकरणवाले वे (महीयुवः) पूजा के इच्छुक साधक लोग (असुराय) प्राणप्रदायक जीवात्मा को (निर्णिजे) शुद्ध करने के लिए (विपाम्) मेधावी विद्वानों के (अग्रे) संमुख (वि यन्ति) विशेष शिष्यभाव से पहुँचते हैं ॥७॥ इस मन्त्र में पौंस्य में धनुष् का आरोप होने से रूपकालङ्कार है। योगसाधना में धनुष् का रूपक मुण्डकोपनिषद् में इस प्रकार बाँधा गया है—“उपनिषदों में वर्णित ब्रह्मविद्यारूप धनुष् को पकड़कर, उस पर उपासनारूप बाण चढ़ाये। तन्मय चित्त से धनुष् को खींचकर अक्षर ब्रह्म रूप लक्ष्य को बींधे। प्रणव धनुष् है, आत्मा शर है, ब्रह्म उसका लक्ष्य है। अप्रमत्त होकर ब्रह्म को बींधना चाहिए, उपासक उस समय बाण की भाँति तन्मय हो जाये” (मु० २।२।३,४) ॥७॥
भावार्थःयोगसाधक लोग अपने पुरुषार्थ से, ध्यान से और गुरु की कृपा से अपने आत्मा को शुद्ध कर परमात्मा को पाने योग्य हो जाते हैं ॥७॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प꣢रि꣣ त्य꣡ꣳ ह꣢र्य꣣त꣡ꣳ हरिं꣢꣯ ब꣣भ्रुं꣡ पु꣢नन्ति꣣ वा꣡रे꣢ण । यो꣢ दे꣣वा꣢꣫न्विश्वा꣣ꣳ इ꣢꣫त्परि꣣ म꣡दे꣢न स꣣ह꣡ गच्छ꣢꣯ति ॥५५२॥
पदार्थःयोगसाधना करनेवाले लोग (त्यम्) उस (हर्यतम्) चाहने योग्य, (बभ्रुम्) शरीर के भरण-पोषणकर्ता (हरिम्) अपने आत्मा को (वारेण) दोष-निवारक यम, नियम आदि तथा ईश्वरप्रणिधान के द्वारा (पुनन्ति) शुद्ध करते हैं, (यः) जो आत्मा योगसिद्ध होने पर (मदेन सह) आनन्द के साथ (विश्वान् इत्) सभी (देवान्) प्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इन्द्रिय आदियों को (परिगच्छति) व्याप्त कर लेता है ॥ सोम ओषधि का रस भी हरि कहलाता है। श्लेष से उसके पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए। उस पक्ष में ‘बभ्रु’ का अर्थ होता है भूरे रंग का और ‘वार’ का अर्थ भेड़ के बालों से निर्मित दशापवित्र, जिससे सोमरस को छानकर शुद्ध करते हैं। वह सोमरस आनन्द देता हुआ सब पानकर्ताओं को प्राप्त होता है ॥८॥
भावार्थःअसत्य, हिंसा, छल, कपट, संशय, प्रमाद, आलस्य, भ्रान्ति आदि दोषों से दूषित अपने आत्मा को योग के उपायों से शुद्ध करके ही मनुष्य ऐहिक और पारमार्थिक उत्कर्ष पाने योग्य होता है ॥८॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡ सु꣢न्वा꣣ना꣡यास्यान्ध꣢꣯सो꣣ म꣢र्तो꣣ न꣡ व꣢ष्ट꣣ त꣡द्वचः꣢꣯ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢मरा꣣ध꣡स꣢ꣳ ह꣣ता꣢ म꣣खं꣡ न भृग꣢꣯वः ॥५५३॥
पदार्थः(अन्धसः) सोमरस के (सुन्वानाय) अभिषुत करनेवाले अर्थात् सोमयाग, समाजसेवा और प्रभुभक्ति करनेवाले जन के लिए, जो (मर्तः) मनुष्य (तत्) उस प्रशंसात्मक (वचः) वचन को (न प्र वष्ट) नहीं कहना चाहता, उस (अराधसम्) अयज्ञसेवी, असमाजसेवी और अप्रभुसेवी तथा (श्वानम्) श्वान के समान लोभी, अपना ही पेट भरनेवाले मनुष्य को (अपहत) दूर कर दो, (न) जैसे (भृगवः) तपस्वी लोग (मखम्) चंचलता को दूर करते हैं, अथवा (न) जैसे (भृगवः) तेजस्वी राजपुरुष (मखम्) मखासुर को अर्थात् यज्ञ का ढ़ोंग रचनेवाले को दण्डित करते हैं ॥९॥ ‘श्वानम्’ में साध्यवसानालक्षणामूलक अतिशयोक्ति अलङ्कार है। निरुक्त की पद्धति से ‘श्वानम्’ में लुप्तोपमा, अर्थोपमा या व्यङ्ग्योपमा है, जैसा कि निरुक्त (३।१८) में लुप्तोपमा के प्रसङ्ग में कहा है कि श्वा और काक निन्दा अर्थ में लुप्तोपमा के रुप में आते हैं। ‘मखं न भृगवः’ में उपमालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःपरमेश्वरद्रोही, यज्ञद्रोही, समाजद्रोही और श्वान के समान विषयलोभी जन को समाज से बहिष्कृत कर देना चाहिए ॥९॥ इस दशति में परमात्मारूप सोम तथा परमात्मजन्य ब्रह्मानन्द रस की प्राप्ति का उपाय वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣣भि꣢ प्रि꣣या꣡णि꣢ पवते꣣ च꣡नो꣢हितो꣣ ना꣡मा꣢नि य꣣ह्वो꣢꣫ अधि꣣ ये꣢षु꣣ व꣡र्ध꣢ते । आ꣡ सूर्य꣢꣯स्य बृह꣣तो꣢ बृ꣣ह꣢꣫न्नधि र꣢थं꣣ वि꣡ष्व꣢ञ्चमरुहद्विचक्ष꣣णः꣢ ॥५५४॥
पदार्थः(चनोहितः) आस्वाद में हितकर, (यह्वः) महान् परमात्मारूप सोम (प्रियाणि) प्रिय, (नामानि) नमनशील हृदयों की (अभि) ओर (पवते)प्रवाहित होता है, (येषु अधि) जिन हृदयों में, यह (वर्द्धते) बढ़ता है। (विचक्षणः) विशेष द्रष्टा, (बृहन्) बड़ी शक्तिवाला यही परमात्मा (बृहतः) विशाल (सूर्यस्य) सूर्य के (विष्वञ्चम्) विविध उत्कृष्ट गतिवाले (रथम् अधि) रथ के ऊपर (आ अरुहत्) आरूढ़ है, अर्थात् आदित्यमण्डल की कार्य-विधि का सञ्चालन भी वही कर रहा है, जैसा कि वेद में परमात्मा स्वयं कहता है—‘जो आदित्य में पुरुष है, वह मैं ही हूँ’ (य० ४०।२७) ॥१॥
भावार्थःसूर्य-चन्द्र आदि सकल सृष्टि का सञ्चालक परमेश्वर ध्यान करने पर उपासकों के हृदय में प्रकट हो जाता है ॥१॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣣चोद꣡सो꣢ नो धन्व꣣न्त्वि꣡न्द꣢वः꣣ प्र꣢ स्वा꣣ना꣡सो꣢ बृ꣣ह꣢द्दे꣣वे꣢षु꣣ ह꣡र꣢यः । वि꣡ चि꣢दश्ना꣣ना꣢ इ꣣ष꣢यो꣣ अ꣡रा꣢तयो꣣ऽर्यो꣡ नः꣢ सन्तु꣣ स꣡नि꣢षन्तु नो꣣ धि꣡यः꣢ ॥५५५॥
पदार्थः(अचोदसः) अन्य किसी से अप्रेरित अर्थात् स्वभाव से निकले हुए, (स्वानासः) शब्दकारी अर्थात् दिव्य सन्देश सुनानेवाले, (हरयः) पापहारी (इन्दवः) ब्रह्मानन्दरस (नः) हमारे (देवेषु) राष्ट्र के विद्वानों में और शरीर के मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि में (बृहत्) बहुत अधिक (प्र धन्वन्तु) भली-भाँति प्राप्त हों। (इषयः) केवल भोग की इच्छा करनेवाले, (अश्नानाः) स्वयं खाते रहनेवाले (अरातयः) अदानशील (नः अर्यः) हमारे आत्मिक और बाह्य शत्रु (वि चित् सन्तु) हमसे दूर ही हो जाएँ, और (धियः) सद्विचार (नः) हमें (सनिषन्तु) प्राप्त हों ॥२॥ इस मन्त्र में नकार आदि की अनेक बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है। ‘नः सन्तु निषन्तु’ में छेकानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःहमें चाहिए कि दुर्विचार रूप, कामक्रोधादि रूप और चोर-ठग आदि रूप शत्रुओं को दूर करें, सद्विचारों को पल्लवित करें और ब्रह्मानन्दरसों को अपने आत्मा में प्रवाहित करें ॥२॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
ए꣣ष꣢꣫ प्र कोशे꣣ म꣡धु꣢माꣳ अचिक्रद꣣दि꣡न्द्र꣢स्य꣣ व꣢ज्रो꣣ व꣡पु꣢षो꣣ व꣡पु꣢ष्टमः । अ꣣भ्यॄ꣢३त꣡स्य꣢ सु꣣दु꣡घा꣢ घृ꣣त꣡श्चुतो꣢ वा꣣श्रा꣡ अ꣢र्षन्ति꣣ प꣡य꣢सा च धे꣣न꣡वः꣢ ॥५५६॥
पदार्थः(एषः) यह (मधुमान्) मधुर परमात्मारूप सोम (कोशे) हमारे मनोमय कोश में (प्र अचिक्रदत्) दिव्य शब्द करा रहा है, जिससे (इन्द्रस्य) जीवात्मा का (वज्रः) काम, क्रोध आदि रिपुओं के वर्जन का सामर्थ्य (वपुषः वपुष्टमः) दीप्त से दीप्ततम अथवा विशाल से विशालतम हो गया है। (वाश्राः) शब्दायमान (धेनवः) वेदवाणी रूप गौएँ (ऋतस्य) सत्य की (सुदुघाः) उत्तम दोहन करनेवाली और (घृतश्चुतः) तेजरूप घी को क्षरित करनेवाली होती हुई (पयसा) वेदार्थरूप दूध के साथ (अभि अर्षन्ति) हमें प्राप्त हो रही हैं ॥३॥ इस मन्त्र में वेदवाणियों में धेनुओं का और वेदार्थ में दूध का आरोप होने से तथा उपमान द्वारा उपमेय का निगरण हो जाने से अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजब वेदवाणी-रूपिणी गौएँ अपना पवित्र और पवित्रताकारी वेदार्थरूप दूध पिलाती हैं, तब उस दूध से मनुष्य का आत्मा सत्यमय, तेजोमय, अतिशय बलवान्, पवित्र और परिपुष्ट हो जाता है ॥३॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
प्रो꣡ अ꣢यासी꣣दि꣢न्दु꣣रि꣡न्द्र꣢स्य निष्कृ꣣त꣢꣫ꣳ सखा꣣ स꣢ख्यु꣣र्न꣡ प्र मि꣢꣯नाति स꣣ङ्गि꣡र꣢म् । म꣡र्य꣢ इव युव꣣ति꣢भिः꣣ स꣡म꣢र्षति꣣ सो꣡मः꣢ क꣣ल꣡शे꣢ श꣣त꣡या꣢मना प꣣था꣢ ॥५५७॥
पदार्थः(इन्दुः) तेज से दीप्त, श्रद्धारस से परिपूर्ण जीवात्मा (इन्द्रस्य) परमात्मा के (निष्कृतम्) शरण-रूप घर को (प्र उ अयासीत्) प्रयाण करता है। (सखा) मित्र परमेश्वर (सख्युः) अपने मित्र जीवात्मा की (संगिरम्) स्तुति और प्रार्थना को (न प्रमिनाति) विफल नहीं करता, प्रत्युत पूर्ण ही करता है। (मर्यः) मनुष्य (इव) जैसे (शतयामना पथा) बहुत पद्धतियोंवाले व्यवहारमार्ग द्वारा (युवतिभिः) पत्नी, पुत्री, बहिन आदि युवतियों से (समर्षति) मिलता है, वैसे ही (सोमः) जीवात्मा (शतयामना पथा) अनेक साधनोंवाले योगमार्ग द्वारा (कलशे) षोडशकल परमात्मा रूप द्रोणकलश में (युवतिभिः) तरुण शक्तियों से (समर्षति) मिलता है ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेष से सोमरस-परक अर्थ की भी योजना करनी चाहिए। सोमरस और जीवात्मा में उपमानोपमेयभाव व्यञ्जित होता है। सोमरस जैसे दशापवित्र के बहुच्छिद्र मार्ग से द्रोणकलश में पहुँच कर ‘आपः’ रूप युवतियों से मिलता है, वैसे ही जीवात्मा बहुत साधनोंवाले योगमार्ग से परमात्मा को प्राप्त कर शक्तियों से संगत होता है ॥ ‘मर्य इव युवतिभिः’ इत्यादि में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःपरमात्मा से साथ मित्रता स्थापित करके मनुष्य का आत्मा कृतकृत्य हो जाता है ॥४॥
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छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
ध꣣र्ता꣢ दि꣣वः꣡ प꣢वते꣣ कृ꣢त्व्यो꣣ र꣢सो꣣ द꣡क्षो꣢ दे꣣वा꣡ना꣢मनु꣣मा꣢द्यो꣣ नृ꣡भिः꣢ । ह꣡रिः꣢ सृजा꣣नो꣢꣫ अत्यो꣣ न꣡ सत्व꣢꣯भि꣣र्वृ꣢था꣣ पा꣡जा꣢ꣳसि कृणुषे न꣣दी꣢ष्वा ॥५५८॥
पदार्थः(दिवः) द्युलोक अथवा सूर्य का (धर्ता) धारण करनेवाला, (कृत्व्यः) कर्मकुशल, (रसः) आनन्द-रसमय, (देवानाम्) विद्वानों का (दक्षः) बलप्रदाता, (नृभिः) पुरुषार्थी मनुष्यों से (अनुमाद्यः) प्रसन्न किये जाने योग्य परमात्मा (पवते) सब जड़-चेतन जगत् को पवित्र करता है। आगे प्रत्यक्षकृत वर्णन है—(हरिः) आकर्षण के बल से सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि लोकों के नियामक, (सृजानः) जगत् की रचना करनेवाले आप (वृथा) अनायास ही (सत्वभिः) अपने बलों से (नदीषु) नदियों में (पाजांसि) बलों और वेगों को (आ कृणुषे) स्थापित करते हो, (अत्यः न) जैसे घोड़ा रथ आदि में वेगों को स्थापित करता है ॥५॥ इस मन्त्र में लक्षणावृत्ति से रस का अर्थ रसवान् और दक्ष का अर्थ दक्षकारी है। ‘अत्यो न’ में उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजो परमेश्वर सारे संसार को रचनेवाला, धारण करनेवाला और बल, वेग आदि देनेवाला है, उसकी सब मनुष्य आराधना क्यों न करें? ॥५॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
वृ꣡षा꣢ मती꣣नां꣡ प꣢वते विचक्ष꣣णः꣢꣫ सोमो꣣ अ꣡ह्नां꣢ प्रतरी꣣तो꣡षसा꣢꣯ꣳ दि꣣वः꣢ । प्रा꣣णा꣡ सिन्धू꣢꣯नाꣳ क꣣ल꣡शा꣢ꣳ अचिक्रद꣣दि꣡न्द्र꣢स्य꣣ हा꣡र्द्या꣢वि꣣श꣡न्म꣢नी꣣षि꣡भिः꣢ ॥५५९॥
पदार्थः(विचक्षणः) विशेष द्रष्टा और दृष्टिप्रदाता (सोमः) परमात्मा (मतीनाम्) प्रज्ञाओं का (वृषा) वर्षक होता हुआ (पवते) उपासकों को प्राप्त होता है । वही (अह्नाम्) दिनों का, (उषसाम्) उषाओं का और (दिवः) सूर्य का (प्रतरीता) संतारक और सञ्चालक होता है। (प्राणा) सबका प्राणभूत वह (सिन्धूनाम्) नदियों के (कलशान्) कल-कल निनाद करनेवाले प्रवाहों को (अचिक्रदत्) शब्दयुक्त करता है। वही (मनीषिभिः) मन को सन्मार्ग में प्रेरित करनेवाले स्तोत्रों से (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (हार्दि) हृत्प्रदेश में (आ विशन्) प्रविष्ट होता है ॥६॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि सर्वद्रष्टा, सबको विवेक प्रदान करनेवाले, उषा-सूर्य-दिन आदि के व्यवस्थापक, नदियों को कल-कल निनाद करानेवाले परमात्मा को हृदय में धारण करें ॥६॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
त्रि꣡र꣢स्मै स꣣प्त꣢ धे꣣न꣡वो꣢ दुदुह्रिरे स꣣त्या꣢मा꣣शि꣡रं꣢ पर꣣मे꣡ व्यो꣢मनि । च꣣त्वा꣢र्य꣣न्या꣡ भुव꣢꣯नानि नि꣣र्णि꣢जे꣣ चा꣡रू꣢णि चक्रे꣣ य꣢दृ꣣तै꣡रव꣢꣯र्धत ॥५६०॥
पदार्थः(परमे) उत्कृष्ट (व्योमनि) हृदयाकाश में (अस्मै) इस स्तोता के लिए (त्रिः सप्त) इक्कीस छन्दोंवाली (धेनवः) वेदवाणी रूप गौएँ (सत्याम् आशिरम्) सत्य रूप दूध को (दुदुह्रिरे) देती हैं। (यत्) जब यह स्तोता (ऋतैः) सत्य ज्ञानों और सत्य कर्मों से (अवर्द्धत) वृद्धि को प्राप्त करता है, तब (निर्णिजे) अपने आत्मा के शोधन वा पोषण के लिए (चत्वारि) चार (अन्या) अन्य (चारूणि) सुरम्य (भुवनानि) धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप भुवनों को (चक्रे) उत्पन्न कर लेता है ॥७॥ धेनु निघण्टु (१।११) में वाणीवाची नामों में पठित है। ताण्ड्य एवं गोपथब्राह्मण में भी कहा है कि ‘वाणी ही धेनु है’ (तां० ब्रा० १८।९।२१, गो० पू० २।२१)। अथवा वेदवाणी में धेनुत्व का आरोप होने से तथा उपमेय का उपमान द्वारा निगरण होने से अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःसात गायत्र्यादि छन्द, सात अतिजगत्यादि छन्द और सात कृत्यादि छन्द मिलकर इक्कीस छन्द वेद में होते हैं। उन छन्दोंवाली इक्कीस प्रकार की वेदवाणियाँ मानो साक्षात् गौएँ हैं, जो अपने सेवक को सत्यज्ञानरूप और सत्कर्तव्यबोध रूप दूध देती हैं, जिससे परिपुष्ट हुआ वह धर्मार्थकाम-मोक्षरूप भुवनों में निवास करता हुआ जीवन की सफलता को प्राप्त कर लेता है ॥७॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ सु꣡षु꣢तः꣣ प꣡रि꣢ स्र꣣वा꣡पामी꣢꣯वा भवतु꣣ र꣡क्ष꣢सा स꣣ह꣢ । मा꣢ ते꣣ र꣡स꣢स्य मत्सत द्वया꣣वि꣢नो꣣ द्र꣡वि꣢णस्वन्त इ꣣ह꣢ स꣣न्त्वि꣡न्द꣢वः ॥५६१॥
पदार्थःहे (सोम) परब्रह्म परमात्मन् ! (सुषुतः) ध्यान द्वारा भली-भाँति निचोड़े हुए तुम (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (परिस्रव) परिस्रुत होवो, आनन्दरस को प्रवाहित करो। तुम्हारी सहायता से (रक्षसा सह) कामक्रोधादि रूप राक्षस के सहित (अमीवा) मन का सन्ताप रूप रोग (अप भवतु) हमसे दूर हो जाए। (द्वयाविनः) मन में कुछ तथा वाणी में कुछ, इस प्रकार दोहरे आचरणवाले कपटी, धूर्त, ठग लोग (ते) तुम्हारे (रसस्य) आनन्दरस का (मा मत्सत) स्वाद न ले सकें। (इह) हम सरल स्वभाववालों के अन्दर (इन्दवः) आर्द्र करनेवाले ब्रह्मानन्दरस (द्रविणस्वन्तः) समृद्ध और सबल (सन्तु) होवें ॥८॥ इस मन्त्र में सकार की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है ॥८॥
भावार्थःसरलवृत्तिवाले मनुष्य ही ब्रह्मानन्दरस के अधिकारी होते हैं, कुटिल वृत्तिवाले और दूसरों को ठगनेवाले लोग नहीं ॥८॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣡सा꣢वि꣣ सो꣡मो꣢ अरु꣣षो꣢꣫ वृषा꣣ ह꣢री꣣ रा꣡जे꣢व द꣣स्मो꣢ अ꣣भि꣡ गा अ꣢꣯चिक्रदत् । पु꣣नानो꣢꣫ वार꣣म꣡त्ये꣢ष्य꣣व्य꣡य꣢ꣳ श्ये꣣नो꣡ न योनिं꣢꣯ घृ꣣त꣡व꣢न्त꣣मा꣡स꣢दत् ॥५६२॥
पदार्थः(अरुषः) तेजस्वी, (वृषा) सुख आदि की वर्षा करनेवाले, (हरिः) पाप आदि को हरनेवाले (सोमः) आनन्दरस के भण्डार परमात्मा को (असावि) मैंने अपने हृदय में अभिषुत किया है, अर्थात् उससे आनन्दरस को पाया है। (दस्मः) दर्शनीय अथवा दुर्गुणों का संहारक वह परमात्मा (राजा इव) जैसे राजा (गाः अभि) भूमियों अर्थात् भूमिवासियों को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) उपदेश करता है, राजनियमों को घोषित करता है, वैसे ही (गाः अभि) स्तोताओं को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) उपदेश कर रहा है। हे भगवन् ! (पुनानः) पवित्रता देते हुए आप (वारम्) निवारक या बाधक काम-क्रोधादि को (अति) अतिक्रमण करके (अव्ययम्) विनाशरहित जीवात्मा को (एषि) प्राप्त होते हो। (श्येनः न) जैसे वायु (घृतवन्तम्) जलयुक्त (योनिम्) अन्तरिक्ष में (आसदत्) आकर स्थित हुआ है, वैसे ही वह परमात्मा (घृतवन्तम्) घी, जल, दीप्ति आदि से युक्त (योनिम्) ब्रह्माण्ड रूप घर में (आसदत्) स्थित है ॥९॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःपहले से ही सबके हृदय में बैठे हुए भी गुप्त रूप में स्थित परमेश्वर का श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि से साक्षात्कार करना चाहिए ॥९॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
प्र꣢ दे꣣व꣢꣫मच्छा꣣ म꣡धु꣢मन्त꣣ इ꣢न्द꣣वो꣡ऽसि꣢ष्यदन्त꣣ गा꣢व꣣ आ꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ । ब꣣र्हिष꣡दो꣢ वच꣣ना꣡व꣢न्त꣣ ऊ꣡ध꣢भिः परि꣣स्रु꣡त꣢मु꣣स्रि꣡या꣢ नि꣣र्णि꣡जं꣢ धिरे ॥५६३॥
पदार्थः(मधुमन्तः) मधुर व्यवहारवाले (इन्दवः) श्रद्धा-रस से भरपूर विद्वान् जन (देवम् अच्छ) दिव्यगुणों से युक्त परमात्मा को लक्ष्य करके (प्र असिष्यदन्त) श्रद्धारस को प्रवाहित करते हैं, (न) जैसे (धेनवः) तृप्ति प्रदान करनेवाली (गावः) गौएँ (असिष्यदन्त) बछड़ों के प्रति अपने दूध को प्रवाहित करती हैं। (बर्हिषदः) यज्ञिय कुशासन पर स्थित, (वचनावन्तः) स्तुति के उद्गार प्रकट करनेवाले वे विद्वान् लोग (निर्णिजम्) शुद्ध (परिस्रुतम्) उत्पन्न श्रद्धारस को (ऊधभिः) हृदयरूप ऊधसों में (धिरे) धारण करते हैं, जैसे (बर्हिषदः) यज्ञ में स्थित (वचनावत्यः) हम्भा शब्द करनेवाली (उस्रियाः) गौएँ (निर्णिजम्) शुद्ध दूध को (ऊधभिः) ऊधसों में (धिरे) धारण करती हैं ॥१०॥ इस मन्त्र में ‘गाव आ न धेनवः’ में उपमा और पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार है । उत्तरार्द्ध में ‘उस्रियाः’ में लुप्तोपमा है ॥१०॥
भावार्थःपरमात्मा के प्रति सब मनुष्यों को उसी प्रकार भक्तिरस क्षरित करना चाहिए, जैसे गौएँ बछड़ों के प्रति दूध क्षरित करती हैं ॥१०॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣣ञ्ज꣢ते꣣꣬ व्य꣢꣯ञ्जते꣣ स꣡म꣢ञ्जते꣣ क्र꣡तु꣢ꣳ रिहन्ति꣣ म꣢ध्वा꣣꣬भ्य꣢꣯ञ्जते । सि꣡न्धो꣢रुऽच्छ्वा꣣से꣢ प꣣त꣡य꣢न्तमु꣣क्ष꣡ण꣢ꣳ हिरण्यपा꣣वाः꣢ प꣣शु꣢म꣣प्सु꣡ गृ꣢भ्णते ॥५६४॥
पदार्थःउपासक लोग (क्रतुम्) कर्मवान् और प्रज्ञावान् परमात्मारूप सोम को (अञ्जते) अपने अन्दर व्यक्त करते हैं, (व्यञ्जते) विविध रूपों में व्यक्त करते हैं, (समञ्जते) उसके साथ संगम करते हैं, (रिहन्ति) उसका आस्वादन करते हैं, अर्थात् उससे प्राप्त आनन्दरस का पान करते हैं, (मध्वा) मधुर श्रद्धारस से (अभ्यञ्जते) उसे मानो लिप्त कर देते हैं। (सिन्धोः) आनन्दसागर के (उच्छ्वासे) तरङ्ग-समूह में (पतयन्तम्) मानो झूला झूलते हुए, (उक्षणम्) अपने सखाओं को भी आनन्द की लहरों से सींचते हुए (पशुम्) सर्वद्रष्टा तथा सबको दृष्टि प्रदान करनेवाले परमेश्वर को (हिरण्यपावाः) ज्योति, सत्य और आनन्दामृत से स्वयं को पवित्र करनेवाले वे विद्वान् जन (अप्सु) अपने प्राणों में (गृभ्णते) ग्रहण कर लेते हैं ॥११॥ इस मन्त्र में ‘ञ्जते’ इस अर्थहीन शब्दांश की अनेक बार आवृत्ति होने से यमकालङ्कार है। अञ्जते, व्यञ्जते, समञ्जते, रिहन्ति, अभ्यञ्जते, गृभ्णते इन अनेक क्रियाओं का एक कारक से योग होने के कारण दीपक अलङ्कार है। ‘समुद्र के उच्छ्वास में उड़ते हुए बैल को जलों में गोता लगवाते हैं, और चिकना करते हैं’ इस वाच्यार्थ के भी प्रतीत होने से प्रहेलिकालङ्कार भी है। ‘अभ्यञ्जते (मानो लिप्त करते हैं) पतयन्तम् (मानो झूला झूलते हुए) में गम्योत्प्रेक्षा है। समुद्र अचेतन होने से उच्छ्वास नहीं छोड़ता अतः उच्छ्वास की तरङ्गसमूह में लक्षणा है, तरङ्गों का ऊर्ध्वगमन व्यङ्ग्य है ॥११॥
भावार्थःपरमेश्वर के उपासक योगी जन उसे हृदय में अभिव्यक्त करके भक्तिरस से मानो स्नान कराकर जब अपने प्राणों का अङ्ग बना लेते हैं, तभी उनकी उपासना सफल होती है ॥११॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
प꣣वि꣡त्रं꣢ ते꣣ वि꣡त꣢तं ब्रह्मणस्पते प्र꣣भु꣡र्गात्रा꣢꣯णि꣣ प꣡र्ये꣢षि वि꣣श्व꣡तः꣢ । अ꣡त꣢प्ततनू꣣र्न꣢꣫ तदा꣣मो꣡ अ꣢श्नुते शृ꣣ता꣢स꣣ इ꣡द्व꣢꣯हन्तः꣣ सं꣡ तदा꣢꣯शत ॥५६५॥
पदार्थःहे (ब्रह्मणः पते) ब्रह्माण्ड के अथवा ज्ञान के अधिपति सोम परमात्मन् ! (ते) आपका (पवित्रम्) पवित्रता-सम्पादन का गुण (विततम्) सर्वत्र व्याप्त है। (प्रभुः) पवित्रता करने में समर्थ आप (विश्वतः) सब ओर से (गात्राणि) शरीरों अर्थात् शरीरधारियों के पास (पर्येषि) उन्हें पवित्र करने के लिए पहुँचते हो। किन्तु (अतप्ततनूः) जिसने तपस्या से शरीर को तपाया नहीं है, ऐसा (आमः) कच्चा मनुष्य (तत्) उस पवित्रता को (न अश्नुते) प्राप्त नहीं कर पाता। (शृतासः इत्) पके हुए लोग ही (वहन्तः) आपको हृदय में धारण करते हुए (तत्) आपसे होनेवाली पवित्रता को (सम् आशत) भली-भाँति प्राप्त करते हैं ॥१२॥
भावार्थःजो लोग तपस्वी हैं, उन्हीं के हृदय और आचरण पवित्र होते हैं ॥१२॥ इस दशति में भी सोम परमात्मा तथा उसके आनन्दरस की प्राप्ति का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में नवम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
इ꣢न्द्र꣣म꣡च्छ꣢ सु꣣ता꣢ इ꣣मे꣡ वृष꣢꣯णं यन्तु꣣ ह꣡र꣢यः । श्रु꣣ष्टे꣢ जा꣣ता꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः स्व꣣र्वि꣡दः꣢ ॥५६६॥
पदार्थः(सुताः) प्रवाहित किये गये (इमे) ये (हरयः) दुःखहारी ब्रह्मानन्दरस (वृषणम्) बलवान् (इन्द्रम्) जीवात्मा की (अच्छ) ओर (यन्तु) जाएँ। (जातासः) उत्पन्न हुए वे (इन्दवः) उपासक को भिगो देनेवाले ब्रह्मानन्दरस (श्रुष्टे) शीघ्र ही (स्वर्विदः) दिव्य प्रकाश को प्राप्त करानेवाले हों ॥१॥
भावार्थःवे जीवात्मा धन्य हैं, जो परमात्मा की उपासना से ब्रह्मानन्दरस प्राप्त करते हैं ॥१॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प्र꣡ ध꣢न्वा सोम꣣ जा꣡गृ꣢वि꣣रि꣡न्द्रा꣢येन्दो꣣ प꣡रि꣢ स्रव । द्यु꣣म꣢न्त꣣ꣳ शु꣢ष्म꣣मा꣡ भ꣢र स्व꣣र्वि꣡द꣢म् ॥५६७॥
पदार्थःहे (सोम) रस के भण्डार परमात्मन् ! (जागृविः) जागरूक आप (प्र धन्व) सक्रिय होवो। हे (इन्दो) भक्तों को आनन्दरस से भिगोनेवाले ! आप (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (परिस्रव) परिस्रुत होवो। उसे (द्युमन्तम्) देदीप्यमान, (स्वर्विदम्) विवेकख्यातिरूप दिव्य प्रकाश को प्राप्त करानेवाला (शुष्मम्) बल (आ भर) प्रदान करो ॥२॥
भावार्थःमनोयोग से उपासना किया गया परमेश्वर उपासकों को ज्योति-प्रदायक अध्यात्मबल प्रदान करता है ॥२॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
स꣡खा꣢य꣣ आ꣡ नि षी꣢꣯दत पुना꣣ना꣢य꣣ प्र꣡ गा꣢यत । शि꣢शुं꣣ न꣢ य꣣ज्ञैः꣡ परि꣢꣯ भूषत श्रि꣣ये꣢ ॥५६८॥
पदार्थःहे (सखायः) मित्रो ! तुम (आ निषीदत) आकर उपासनायज्ञ में बैठो। (पुनानाय) हृदय को पवित्र करनेवाले परमात्मारूप सोम के लिए (प्र गायत) भक्ति-भरे वेदमन्त्रों को गाओ। उस परमात्मारूप सोम को (श्रिये) शोभा के लिए (यज्ञैः) उपासनायज्ञों से (शिशुं न) शिशु के समान (परिभूषत) चारों ओर से अलङ्कृत करो अर्थात् जैसे शोभा के लिए शिशु को अलङ्कार-वस्त्र आदियों से अलङ्कृत करते हैं, वैसे ही शोभापूर्वक अपने आत्मा में प्रतिष्ठापित करने के लिए परमात्मा को उपासना-यज्ञों से अलङ्कृत करो ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। निषीदत, प्रगायत, परिभूषत इन अनेक क्रियाओं का एक कारक से योग होने से कारण दीपकालङ्कार भी है ॥३॥
भावार्थःउपासना-योग द्वारा रसागार परमात्मा को साक्षात् करके सबको आनन्दरस का उपभोग करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
तं꣡ वः꣢ सखायो꣣ म꣡दा꣢य पुना꣣न꣢म꣣भि꣡ गा꣢यत । शि꣢शुं꣣ न꣢ ह꣣व्यैः꣡ स्व꣢दयन्त गू꣣र्ति꣡भिः꣢ ॥५६९॥
पदार्थःहे (सखायः) मित्रो ! (वः) तुम (पुनानम्) पवित्र करनेवाले (तम्) उस प्रसिद्ध सोम नामक परमात्मा को (अभि) लक्ष्य करके (मदाय) आनन्दप्राप्ति के लिए (गायत) सामगान करो। उपासक जन उस परमात्मा को (हव्यैः) आत्मसमर्पणों द्वारा और (गूर्तिभिः) स्तुतियों तथा उद्यमों द्वारा (स्वदयन्त) प्रसन्न करते हैं, (शिशुं न) जैसे किसी शिशु को (हव्यैः) खिलौने आदि देय पदार्थों द्वारा और (गूर्तिभिः) गोद में उठाने के द्वारा माताएँ प्रसन्न करती हैं ॥४॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःआराधना और पुरुषार्थ से प्रसन्न किया हुआ परमेश्वर पवित्रता आदि के सम्पादन द्वारा और आनन्द-प्रदान द्वारा आराधक का हित करता है ॥४॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प्रा꣣णा꣡ शिशु꣢꣯र्म꣣ही꣡ना꣢ꣳ हि꣣न्व꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ दी꣡धि꣢तिम् । वि꣢श्वा꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣या꣡ भु꣢व꣣द꣡ध꣢ द्वि꣣ता꣢ ॥५७०॥
पदार्थः(प्राणा) उपासकों को प्राण के समान प्रिय, (महीनाम्) वेदवाणियों का (शिशुः) शिशु-तुल्य स्तवनीय, हृदय में (ऋतस्य) सत्य के (दीधितिम्) खजाने को या प्रकाश को (हिन्वन्) प्रेरित करता हुआ सोम परमात्मा (विश्वा) सब (प्रिया) प्रिय मन, बुद्धि आदि और अग्नि, जल, वायु आदियों को (परि भुवत्) व्याप्त किये हुए है। (अध) इस कारण (द्विता) अन्दर और बाहर दो प्रकार से महिमा को प्राप्त है ॥५॥ इस मन्त्र में ‘प्राणा’ तथा ‘शिशुः’ में लुप्तोपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःशरीररूप पिण्ड में तथा ब्रह्माण्ड में सर्वत्र जिसकी महिमा प्रकाशित है, वह जगदीश्वर किसका वन्दनीय नहीं है ॥५॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प꣡व꣢स्व दे꣣व꣡वी꣢तय꣣ इ꣢न्दो꣣ धा꣡रा꣢भि꣣रो꣡ज꣢सा । आ꣢ क꣣ल꣢शं꣣ म꣡धु꣢मान्त्सोम नः सदः ॥५७१॥
पदार्थःहे (इन्दो) आनन्दरस से भिगोनेवाले रसागार परमात्मन् ! आप (देवतीतये) दिव्यगुणों की उत्पत्ति के लिए (धाराभिः) धाराओं के साथ (ओजसा) वेग से (पवस्व) हमारे अन्तः करण में झरो। हे (सोम) जगदीश्वर ! (मधुमान्) मधुर आनन्द से परिपूर्ण आप (नः) हमारे (कलशम्) कलाओं से पूर्ण आत्मा में (आ सदः) आकर स्थित होओ ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेष से भौतिकसोम-परक अर्थ भी ग्राह्य होता है। उससे भौतिक सोम तथा परमात्मा का उपमानोपमेयभाव सूचित होता है। अतः उपनाध्वनि है ॥६॥
भावार्थःजैसे सोम ओषधि का रस धाराओं के साथ द्रोणकलश में आता है, वैसे ही मधुर ब्रह्मानन्दरस आत्मा में आये ॥६॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
सो꣡मः꣢ पुना꣣न꣢ ऊ꣣र्मि꣢꣫णाव्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति । अ꣡ग्रे꣢ वा꣣चः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥५७२॥
पदार्थः(सोमः) ब्रह्मानन्दरस (पुनानः) उपासक को पवित्र करता हुआ (ऊर्मिणा) लहर के साथ (अव्यं वारम्) भेड़ की ऊन से बने दशापवित्र के तुल्य दोषनिवारक अविनश्वर आत्मा के प्रति (वि धावति) वेग से दौड़ रहा है। (वाचः) प्रोच्चारित स्तुतिवाणी से (अग्रे) पहले ही (पवमानः) धारा रूप से बहता हुआ (कनिक्रदत्) कलकल ध्वनि कर रहा है ॥७॥ इस मन्त्र में ब्रह्मानन्द में कारणभूत स्तुति वाणी के उच्चारण से पूर्व ही ब्रह्मानन्द की उत्पत्ति का वर्णन होने से कारण के पूर्व कार्योदय वर्णित होना रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥७॥
भावार्थःउपासकों से ध्यान किया गया परमेश्वर अपने पास से आनन्दरस की प्रचुर धाराओं को उपासकों के हृदय में प्रेरित करता है ॥७॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प्र꣡ पु꣢ना꣣ना꣡य꣢ वे꣣ध꣢से꣣ सो꣡मा꣢य꣣ व꣡च꣢ उच्यते । भृ꣣तिं꣡ न भ꣢꣯रा म꣣ति꣡भि꣢र्जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥५७३॥
पदार्थः(पुनानाय) उपासक के हृदय को पवित्र करनेवाले, (वेधसे) आनन्द के विधायक (सोमाय) रसागार परमात्मा के लिए (वचः) धन्यवाद का वचन (प्र उच्यते) हमारे द्वारा कहा जा रहा है। हे मित्र ! तुम भी (मतिभिः) बुद्धियों से (जुजोषते) तुम्हें तृप्त करनेवाले उस परमात्मा के लिए (भृतिं न) वेतन-रूप या उपहार-रूप धन्यवादादि वचन को (भर) प्रदान करो, अर्थात् कार्य करनेवाले को जैसे कोई बदले में वेतन या उपहार देता है, वैसे ही बुद्धि देनेवाले उसे तुम बदले में धन्यवाद दो ॥८॥ इस मन्त्र में ‘भृतिं न भर’ में उत्प्रेक्षालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजो परमेश्वर सुमति-प्रदान आदि के द्वारा हमारा उपकार करता है, उसके प्रति हम कृतज्ञता क्यों न प्रकाशित करें ॥८॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
गो꣡म꣢न्न इन्दो꣣ अ꣡श्व꣢वत्सु꣣तः꣡ सु꣢दक्ष धनिव । शु꣡चिं꣢ च꣣ व꣢र्ण꣣म꣢धि꣣ गो꣡षु꣢ धारय ॥५७४॥
पदार्थःहे (सुदक्ष) अत्यन्त समृद्ध और (इन्दो) जैसे चन्द्रमा समुद्रों की वृद्धि करता है, वैसे ही मनुष्यों की समृद्धि करनेवाले परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! (सुतः) हृदय में प्रकट हुए, राष्ट्र में निर्वाचित हुए अथवा हम समित्पाणि शिष्यों से वरण किये गये आप (नः) हमारे लिए (गोमत्) गायों से अथवा भूमियों से अथवा वेदवाणियों से युक्त और (अश्ववत्) घोड़ों अथवा प्राणों से युक्त ऐश्वर्य को (धनिव) प्राप्त कराइये और (गोषु अधि) राष्ट्र-भूमियों में (शुचिं वर्णं च) पवित्र हृदयवाले ब्राह्मणादि वर्ण को भी, अथवा (गोषु अधि) वाणियों में (शुचिं वर्णं च) पवित्र अक्षर ‘ओम्’ को भी (धारय) धारण कराइये ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है ॥९॥
भावार्थःपरमेश्वर, राजा और आचार्य स्वयं धन, विद्या आदि से सुसमृद्ध होकर कृपापूर्वक हमें भी धन, विद्या आदि प्रदान करें। जिस राष्ट्र में पवित्र हृदयवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण होते हैं और जहाँ प्रजाओं की वाणियों में ओंकाररूप अक्षर जप आदि रूप में निरन्तर विराजमान रहता है, वह राष्ट्र धन्य कहाता है ॥९॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
अ꣣स्म꣡भ्यं꣢ त्वा वसु꣣वि꣡द꣢म꣣भि꣡ वाणी꣢꣯रनूषत । गो꣡भि꣢ष्टे꣣ व꣡र्ण꣢म꣣भि꣡ वा꣢सयामसि ॥५७५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे सोम परमात्मन् ! (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (वसुविदम्) ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले (त्वा अभि) आपको लक्ष्य करके (वाणीः) हमारी वाणियाँ (अनूषत) स्तुति कर रही हैं। हम (गोभिः) वेद-वाणियों द्वारा (ते) आपके (वर्णम्) स्वरूप को (अभिवासयामसि) अपने अन्दर बसाते हैं ॥ द्वितीय—वैद्य के पक्ष में। हे चिकित्सा के लिए सोम आदि ओषधियों का रस अभिषुत करनेवाले वैद्यराज ! (अस्मभ्यम्) हम रोगियों के लिए (वसुविदम्) स्वास्थ्य-सम्पत्ति प्राप्त करानेवाले (त्वा अभि) आपको लक्ष्य करके (वाणीः) हम कृतज्ञों की वाणियाँ (अनूषत) आपकी स्तुति कर रही हैं, अर्थात् आपके आयुर्वेद के ज्ञान की प्रशंसा कर रही हैं—यह रोगियों की उक्ति है। आगे वैद्य कहता है—हे त्वचारोग से ग्रस्त रोगी ! (गोभिः) गाय से प्राप्त होनेवाले दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर रूप पञ्च गव्यों से हम (ते) तेरे, तेरी त्वचा के (वर्णम्) स्वाभाविक रंग को (अभिवासयामसि) पुनः तुझमें बसा देते हैं, अर्थात् कुष्ठ आदि रोग के कारण तेरी त्वचा के विकृत हुए रूप को दूर करके त्वचा का स्वाभाविक रंग ला देते हैं। इससे कुष्ठ आदि त्वचा-रोगों की पञ्चगव्य द्वारा चिकित्सा की जाने की सूचना मिलती है ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःसब ऐश्वर्य देनेवाले परमात्मा के सत्य, शिव, सुन्दर, सच्चिदानन्दमय स्वरूप को हमें अपने हृदय में धारण करना चाहिए। इसी प्रकार श्रेष्ठ वैद्यों की बतायी रीति से पञ्चगव्यों द्वारा चिकित्सा से त्वचा आदि के रोग दूर करने चाहिएँ ॥१०॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प꣡व꣢ते हर्य꣣तो꣢꣫ हरि꣣र꣢ति꣣ ह्व꣡रा꣢ꣳसि꣣ र꣡ꣳह्या꣢ । अ꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष स्तो꣣तृ꣡भ्यो꣢ वी꣣र꣢व꣣द्य꣡शः꣢ ॥५७६॥
पदार्थःहे सोम परमात्मन् ! (हर्यतः) गतिमान्, कर्मण्य, पुरुषार्थी और तुम्हारी चाहवाला तुम्हारा प्रिय (हरिः) मनुष्य (रंह्या) वेग के साथ (ह्वरांसि) कुटिलता के मार्गों को (अति) अतिक्रमण करके (पवते) सन्मार्गों पर दौड़ रहा है। (त्वम्) तुम स्तोतृभ्यः) तुम्हारे गुण-कर्म-स्वभाव की स्तुति करनेवाले अपने उपासकों को (वीरवत्) वीरभावों अथवा वीर पुत्रों से युक्त (यशः) यश (अभ्यर्ष) प्राप्त कराओ ॥११॥ इस मन्त्र में र्, ह्, आदि की पृथक्-पृथक् अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है ॥११॥
भावार्थःपुरुषार्थी, कर्मण्य परमेश्वरोपासक मनुष्य अपने जीवन में कुटिलता छोड़कर और सरलता को स्वीकार करके वीरभावों और वीर सन्ततियों से युक्त होता हुआ परम उज्ज्वल यश से चमकता है ॥११॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प꣢रि꣣ को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣢त꣣ꣳ सो꣡मः꣢ पुना꣣नो꣡ अ꣢र्षति । अ꣣भि꣢꣫ वाणी꣣रृ꣡षी꣢णाꣳ स꣣प्ता꣡ नू꣢षत ॥५७७॥
पदार्थः(पुनानः) अन्तःकरण को पवित्र करता हुआ परमेश्वर अथवा ब्रह्मानन्दरस (मधुश्चुतम्) मधुर श्रद्धारस को प्रस्रुत करनेवाले (कोशम्) मनोमय कोश में (परि अर्षति) व्याप्त हो रहा है। उस परमेश्वर वा ब्रह्मानन्दरस की (ऋषीणां सप्त वाणीः) वेदों की आर्षेय गायत्री आदि सात छन्दोंवाली ऋचाएँ (अभि नूषत) सोम नाम से स्तुति करती हैं ॥ चौबीस अक्षरों से आरम्भ करके क्रमशः चार-चार अक्षरों की वृद्धि करके गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप्, जगती नामक सात छन्द ऋषि-छन्द कहाते हैं। वे ही यहाँ ‘ऋषीणां सप्त वाणीः’ शब्दों से ग्राह्य हैं ॥१२॥
भावार्थःपरब्रह्म और ब्रह्मानन्द रस की महिमा को गानेवाली वेदवाणियों के साथ अपना मन मिलाकर ब्रह्म के उपासक जन अपने हृदय में ब्रह्मानन्द रस के प्रवाह का अनुभव करें ॥१२॥ इस दशति में सोम परमात्मा के प्रति सामगान की प्रेरणा होने से तथा परमात्मा और उसके आनन्दरस की महिमा का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय से संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक, द्वितीय अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय का दशम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -ककुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प꣡व꣢स्व꣣ म꣡धु꣢मत्तम꣣ इ꣡न्द्रा꣢य सोम क्रतु꣣वि꣡त्त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ । म꣡हि꣢ द्यु꣣क्ष꣡त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ ॥५७८॥
पदार्थःहे (सोम) आनन्दरसागार परमात्मन् ! (मधुमत्तमः) सबसे अधिक मधुर, (क्रतुवित्तमः) सबसे अधिक प्रज्ञा और कर्म को प्राप्त करानेवाले, और (मदः) हर्षप्रदाता आप (इन्द्राय) मेरे आत्मा के लिए (पवस्व) आनन्द-रस को प्रवाहित कीजिए। (मदः) आपसे दिया हुआ आनन्द (महि) अत्यधिक (द्युक्षतमः) तेज का निवास करानेवाला होता है ॥१॥ इस मन्त्र में ‘तमो मदः’ की आवृत्ति में यमक अलङ्कार है। ‘तम, तमो, तमो’ में वृत्त्यनुप्रास है ॥१॥
भावार्थःअत्यन्त मधुर, ज्ञान तथा कर्म के उपदेशक, आनन्ददाता परमात्मा का ध्यान कर-करके योगीजन अपार आनन्दरस से परिपूर्ण हो जाते हैं ॥१॥
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छन्द -ककुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
अ꣣भि꣢ द्यु꣣म्नं꣢ बृ꣣ह꣢꣫द्यश꣣ इ꣡ष꣢स्पते दिदी꣣हि꣡ दे꣢व देव꣣यु꣢म् । वि꣡ कोशं꣢꣯ मध्य꣣मं꣡ यु꣢व ॥५७९॥
पदार्थःहे (इषः पते) अन्न, रस, धन, बल, विज्ञान आदि के स्वामी सोम परमात्मन् ! आप (द्युम्नम्) तेज को और (बृहद् यशः) महान् यश को (अभि) हमें प्राप्त कराइये। हे (देव) दान करने, चमकने, चमकाने आदि दिव्य कर्मों से युक्त भगवन् ! आप (देवयुम्) दिव्य गुणों के अभिलाषी मुझे (दिदीहि) दिव्य गुणों से प्रकाशित कर दीजिए। मेरे (मध्यमम्) मध्यम (कोशम्) कोश को, अर्थात् मध्यस्थ मनोमय कोश को (वि युव) खोल दीजिए, जिससे उपरले विज्ञानमय तथा आनन्दमय कोश में पहुँच सकूँ ॥२॥
भावार्थःजैसे मेघरूप मध्यम कोश के खुलने से ही ऊपर का सूर्यप्रकाश प्राप्त हो सकता है, वैसे ही कोशों में मध्यस्थ मनोमय कोश के खुलने से ही विज्ञानमय और आनन्दमय कोश की विपुल समृद्धि प्राप्त की जा सकती है, अन्यथा योग का साधक मनोमय भूमिका में ही रमता रहता है ॥२॥
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छन्द -ककुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
आ꣡ सो꣢ता꣣ प꣡रि꣢ षिञ्च꣣ता꣢श्वं꣣ न꣡ स्तोम꣢꣯म꣣प्तु꣡र꣢ꣳ रज꣣स्तु꣡र꣢म् । व꣣नप्रक्ष꣡मु꣢द꣣प्रु꣡त꣢म् ॥५८०॥
पदार्थःहे मित्रो ! तुम (स्तोमम्) समूह रूप में विद्यमान (अप्तुरम्) नदी-नद-समुद्र के जलों में वेग से यान चलाने के साधनभूत, (रजस्तुरम्) अन्तरिक्षलोक में यानों को तेजी से ले जाने में साधनभूत, (वनप्रक्षम्) वनों को जलानेवाले, (उदप्रुतम्) जलों को भाप बनाकर ऊपर ले जानेवाले (अश्वम्) आग, विद्युत् आदि रूप अग्नि को (न) जैसे, शिल्पी लोग (आ सुन्वन्ति) उत्पन्न करते हैं तथा (परि सिञ्चन्ति) जलादि से संयुक्त करते हैं, वैसे ही (स्तोमम्) स्तुति के पात्र, (अप्तुरम्) प्राणों को प्रेरित करनेवाले, (रजस्तुरम्) पृथिवी, चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र आदि लोकों को वेग से चलानेवाले, (वनप्रक्षम्) सूर्यकिरणों अथवा मेघ-जलों को भूमण्डल पर सींचनेवाले, (उदप्रुतम्) शरीरस्थ रक्त-जलों को अथवा नदियों के जलों को प्रवाहित करनेवाले सोम परमात्मा को (आ सोत) हृदय में प्रकट करो और (परि सिञ्चत) श्रद्धारसों से सींचो ॥३॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। आपः, वनम्, उदकम् ये सब निघण्टु (१।१२) में जलवाची पठित होने से तथा निरुक्त (१२।७) में रजस् शब्द के भी जलवाची होने से ‘अप्तुरम्, रजस्तुरम्, वन-प्रक्षम्, उदप्रुतम्’ ये सब समानार्थक प्रतीत होते हैं, किन्तु प्रदर्शित व्याख्या के अनुसार वस्तुतः भिन्न अर्थवाले हैं, अतः यहाँ पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार है। त्, म् आदि की आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है। ‘तुरम्’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास है ॥३॥
भावार्थःजैसे शिल्पी लोग विद्युत् आदि रूप अग्नि को यानों में संयुक्त करते तथा जल, वायु आदि से सिक्त करते हैं, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि प्राणों के प्रेरक, द्यावापृथिवी आदि लोकों के धारक, सूर्यकिरणों और मेघजलों के वर्षक परमात्मा को हृदय में संयुक्त कर श्रद्धा-रसों से सीचें ॥३॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
ए꣣त꣢मु꣣ त्यं꣡ म꣢द꣣च्यु꣡त꣢ꣳ स꣣ह꣡स्र꣢धारं वृष꣣भं꣡ दिवो꣣दु꣡ह꣢म् । वि꣢श्वा꣣ व꣡सू꣢नि꣣ बि꣡भ्र꣢तम् ॥५८१॥
पदार्थः(एतम् उ) इस, सबके समीपस्थ, (त्यम्) प्रसिद्ध, (मदच्युतम्) आनन्दस्रावी, (सहस्रधारम्) सत्य, अहिंसा, न्याय, दया आदि गुणों की सहस्र धाराएँ बहानेवाले, (वृषभम्) महाबली, (दिवोदुहम्) आकाशरूपी गाय को दुहनेवाले अर्थात् आकाश से सूर्य-किरणों, मेघजलों आदि की वर्षा करनेवाले, (विश्वा) सब (वसूनि) ऐश्वर्यों को (बिभ्रतम्) धारण करनेवाले सोम परमात्मा को (आ सोत) हृदय में प्रकट करो, तथा (परि षिञ्चत) श्रद्धारसों से सींचो ॥४॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि आनन्द की प्राप्ति के लिए रस के भण्डार और सहस्रों धाराओं से रस बरसानेवाले परमात्मा रूप सोम को अपने हृदय में श्रद्धाभाव से धारण करें ॥४॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -यवमध्या गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ सु꣢न्वे꣣ यो꣡ वसू꣢꣯नां꣣ यो꣢ रा꣣या꣡मा꣢ने꣣ता꣡ य इडा꣢꣯नाम् । सो꣢मो꣣ यः꣡ सु꣢क्षिती꣣ना꣢म् ॥५८२॥
पदार्थः(सः) वह (सोमः) सर्वोत्पादक रसमय परमेश्वर, (सुन्वे) ध्यान द्वारा हृदय में अभिषुत किया जाता है, (यः) जो (वसूनाम्) किरणों का (यः) जो (रायाम्) धनों का, (यः) जो (इडानाम्) भूमियों, वाणियों, अन्नों और गायों का और (यः) जो (सुक्षितीनाम्) श्रेष्ठ मनुष्यों का (आ नेता) प्राप्त करानेवाला है ॥५॥ इस मन्त्र में ‘यः’ की चार बार पुनरुक्ति यह द्योतित करने के लिए है कि वह परमेश्वर ही इन पदार्थों को प्राप्त करानेवाला है, अन्य कोई नहीं। ‘वसूनाम्, रायाम्’ इन दोनों के धनवाची होने के कारण और ‘इडानाम्’, सुक्षितीनाम्’ इनके भूमिवाची होने के कारण प्रथम दृष्टि में एकार्थता प्रतीत होती है, किन्तु व्याख्यात रूप में अर्थ-भेद है। अतः पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजो परमेश्वर जगत् में दिखायी देनेवाले सभी पदार्थों का उत्पादक और प्राप्त करानेवाला है, उसकी उपासना से सबको आनन्दरस प्राप्त करना चाहिए ॥५॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
त्वं꣢ ह्या३꣱ङ्ग꣡ दै꣢व्यं꣣ प꣡व꣢मान꣣ ज꣡नि꣢मानि द्यु꣣म꣡त्त꣢मः । अ꣣मृतत्वा꣡य꣢ घो꣣ष꣡य꣢न् ॥५८३॥
पदार्थः(अङ्ग) हे प्रिय (पवमान) पवित्रताकारी सोम परमात्मन् ! (त्वं हि) आप निश्चय ही (दैव्यम्) विद्वानों के हितकर कर्म को धारण करते हो। (द्युमत्तमः) सबसे अधिक देदीप्यमान आप (जनिमानि) जन्मों अर्थात् जन्मधारी विद्वान् सदाचारी मनुष्यों को (अमृतत्वाय) सांसारिक दुःखों से मुक्ति के लिए (घोषयन्) अधिकारी घोषित करते हो ॥६॥
भावार्थःपरमेश्वर कर्मानुसार फल प्रदान करता हुआ देव पुरुषों का हित ही सिद्ध करता है। वही मोक्ष के अधिकारी जनों को मोक्ष देकर सत्कृत करता है ॥६॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
ए꣣ष꣡ स्य धार꣢꣯या सु꣣तो꣢ऽव्या꣣ वा꣡रे꣢भिः पवते म꣣दि꣡न्त꣢मः । क्री꣡ड꣢न्नू꣣र्मि꣢र꣣पा꣡मि꣢व ॥५८४॥
पदार्थःप्रथम—सोम ओषधि के रस के पक्ष में। (एषः) यह (स्यः) वह हमारे द्वारा पर्वत से लाया गया, (अव्याः वारेभिः) भेड़ के बालों से अर्थात् भेड़ की ऊन से निर्मित दशापवित्रों से (सुतः) अभिषुत किया गया, (मदिन्तमः) अतिशय आनन्द उत्पन्न करनेवाला सोमरस (अपाम्) नदियों की (ऊर्मिः इव) लहर के समान (क्रीडन्) क्रीडा करता हुआ (धारया) धारा रूप से (पवते) द्रोणकलश में जा रहा है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (एषः) यह अनुभव किया जाता हुआ (स्यः) वह (अव्याः वारेभिः) भेड़ के बालों से निर्मित दशापवित्रों के तुल्य पवित्रताकारक यम, नियम आदि योगाङ्गों से (सुतः) हृदय में प्रकट किया गया, (मदिन्तमः) अतिशय आनन्द उत्पन्न करनेवाला सोम परमात्मा (अपाम् ऊर्मिः इव) नदियों की लहर के समान (कीडन्) क्रीडा करता हुआ (धारया) आनन्द की धारा के साथ (पवते) मेरे आत्मा में पहुँच रहा है ॥७॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। जलों की लहर के समान क्रीडा करता हुआ सोम ओषधि का रस जैसे दशापवित्रों से छाना हुआ द्रोणकलश में पहुँचता है, वैसे ही यम, नियम आदि योग-साधनों से हृदय में प्रकट किया गया परमात्मारूप सोम मानो क्रीडा करता हुआ आनन्दप्रवाह के साथ योगियों के आत्मा को प्राप्त होता है ॥७॥
भावार्थःसमाधिस्थ उपासक लोग परमात्मा के पास से अपने आत्मा में वेगपूर्वक आती हुई आनन्दधारा को साक्षात् अनुभव करते हैं ॥७॥
काण्ड -पावमानं काण्डम्| गान -प्रकृति गान| गानपर्व -पावमानं पर्व
छन्द -ककुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
य꣢ उ꣣स्रि꣢या꣣ अ꣢पि꣣ या꣢ अ꣣न्त꣡रश्म꣢꣯नि꣣ नि꣡र्गा अकृ꣢꣯न्त꣣दो꣡ज꣢सा । अ꣣भि꣢ व्र꣣जं꣡ त꣢त्निषे꣣ ग꣢व्य꣣म꣡श्व्यं꣢ व꣣र्मी꣡व꣢ धृष्ण꣣वा꣡ रु꣢ज । ओ꣡३म् व꣣र्मी꣡व꣢ धृष्ण꣣वा꣡ रु꣢ज ॥५८५॥
पदार्थः(उस्रियाः अपि) निकलने योग्य होती हुई भी (याः) जो (अश्मनि अन्तः) मेघ के अन्दर रुक जाती हैं, उन (गाः) सूर्य-किरणों को (यः) जो आप (ओजसा) अपने प्रताप से (निर् अकृन्तत्) मेघ के बाहर निकाल देते हो, वह आप (गव्यम्) भूमि-सम्बन्धी और (अश्व्यम्) सूर्यसम्बन्धी (व्रजम्) मण्डल को (अभितत्निषे) चारों ओर विस्तीर्ण करते हो। हे (धृष्णो) विपत्तियों का धर्षण करनेवाले परमात्मन् ! आप (वर्मी इव) कवचधारी योद्धा के समान (आरुज) हमारी विपदाओं को और हमारे शत्रुओं को भग्न कर दो ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘उस्रियाः अपि याः अन्तरश्मनि’ का यदि यह अर्थ करें कि ‘जो बहती हुई भी पत्थर के अन्दर रुकी हुई हैं’ तो विरोध प्रतीत होता है, ‘बहने के योग्य होती हुई भी मेघ में निरुद्ध’ इस अर्थ से विरोध का परिहार हो जाता है। अतः विरोधाभास अलङ्कार है ॥८॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर मध्य में स्थित मेघ की बाधा को विच्छिन्न करके सूर्यकिरणों को भूमि पर प्रसारित कर देता है, वैसे ही जीवात्मा योगमार्ग में आये सब विघ्नों का विदारण कर सफलता प्राप्त करे ॥८॥ इस दशति में भी सोम नाम से परमात्मा का और उसके आनन्दरस का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में एकादश खण्ड समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥
आरण्यं काण्डम्
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣢न्द्र꣣ ज्ये꣡ष्ठं꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र꣣ ओ꣡जि꣢ष्ठं꣣ पु꣡पु꣢रि꣣ श्र꣡वः꣢ । य꣡द्दिधृ꣢꣯क्षेम वज्रहस्त꣣ रो꣡द꣢सी꣣ उ꣢꣯भे सु꣢꣯शिप्र पप्राः ॥५८६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परम यशस्वी परमात्मन् ! आप (नः) हमें (ज्येष्ठम्) अत्यधिक प्रशंसनीय, (ओजिष्ठम्) अत्यधिक ओजस्वी, (पुपुरि) पूर्णता देनेवाला अथवा पालन करनेवाला (श्रवः) यश (आ भर) प्रदान कीजिए, (यत्) जिस यश को, हम (दिधृक्षेम) धारण करना चाहें। हे (वज्रहस्त) वज्रहस्त के समान यशोबाधक पाप, दुर्व्यसन आदि को चूर-चूर करनेवाले ! हे (सुशिप्र) सर्वव्यापक ! आपने (उभे रोदसी) भूमि-आकाश दोनों को (पप्राः) यश से परिपूर्ण किया हुआ है ॥१॥
भावार्थःजैसे परमात्मा से रचा हुआ सारा ब्रह्माण्ड यशोमय है, वैसे ही हम भी यशस्वी बनें ॥१॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
इ꣢न्द्रो꣣ रा꣢जा꣣ ज꣡ग꣢तश्चर्षणी꣣ना꣢꣯मधि꣢꣫क्ष꣣मा꣢ वि꣣श्व꣡रू꣢पं꣣ य꣡द꣢स्य । त꣡तो꣢ ददाति दा꣣शु꣢षे꣣ व꣡सू꣢नि꣣ चोद꣢꣫द्राध꣣ उ꣡प꣢स्तुतं चि꣣दर्वा꣢क् ॥५८७॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमात्मा (जगतः) जगत् के (चर्षणीनाम्) मनुष्यों का (राजा) राजा है। (अधिक्षमा) पृथिवी पर (यत्) जो (विश्वरूपम्) सभी रूपोंवाला धन है, वह (अस्य) इसी का है। (ततः) उसी धन में से, वह (दाशुषे) दानी को (वसूनि) धन (ददाति) देता है। वह (अर्वाक्) हमारी ओर (उपस्तुतं चित्) प्रशंसित ही (राधः) भौतिक धन को एवं योगैश्वर्य को (चोदत्) प्रेरित करे ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (इन्द्रः) शत्रुओं का विदारणकर्ता, यज्ञशीलों का आदरकर्ता, समस्त सद्गुणों की सम्पत्ति से युक्त ही मनुष्य (जगतः) राष्ट्र के (चर्षणीनाम्) मनुष्यों का (राजा) राजा होने योग्य है। (अधिक्षमा) राष्ट्रभूमि पर (यत्) जो (विश्वरूपम्) सब रूपोंवाला धन का भण्डार (अस्य) इसका है, (ततः) उसमें से, वह (दाशुषे) कर देनेवाले प्रजाजन के लिए (वसूनि) धनों को (ददाति) देवे। वह (उपस्तुतम्) प्रशंसित (राधः) धन को (अर्वाक्) नीची स्थितिवाले निर्धनों की ओर (चोदत्) प्रेरित करे ॥२॥
भावार्थःजैसे राजराजेश्वर परमेश्वर दानी को धन देता है, वैसे ही मानव-सम्राट् भी कर देनेवाले प्रजावर्ग को सुसमृद्ध करे। इसके लिए भी प्रयत्न करे कि प्रजा में धन की दृष्टि से अधिक विषमता न हो ॥२॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣢स्ये꣣द꣢मा꣣ र꣢जो꣣यु꣡ज꣢स्तु꣣जे꣢꣫ जने꣣ व꣢न꣣꣬ꣳ स्वः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ र꣡न्त्यं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥५८८॥
पदार्थः(आरजः) लोकलोकान्तर पर्यन्त (युजः) सब पदार्थों से योग करनेवाले (यस्य) जिस परमेश्वर का (तुजे जने) शीघ्र कार्य करनेवाले कर्मयोगी मनुष्य को (वनम्) सेवनीय (स्वः) धन प्राप्त होता है, उस (इन्द्रस्य) परमेश्वर का (रन्त्यम्) रमणीय ऐश्वर्य (बृहत्) बहुत बड़ा है ॥३॥
भावार्थःसंसार में जहाँ-तहाँ जो अनेक प्रकार का धन बिखरा पड़ा है, वह सब परमात्मा का ही है। पुरुषार्थी जन ही उसे प्राप्त करने के अधिकारी हैं ॥३॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -वरुणः| स्वर - धैवतः
उ꣡दु꣢त्त꣣मं꣡ व꣢रुण꣣ पा꣡श꣢म꣣स्म꣡दवा꣢꣯ध꣣मं꣡ वि꣢꣯ मध्य꣣म꣡ꣳ श्र꣢थाय । अ꣡था꣢दित्य व्र꣣ते꣢ व꣣यं꣡ तवा꣢꣯ना꣣ग꣢सो꣣ अ꣡दि꣢तये स्याम ॥५८९॥
पदार्थःहे (वरुण) मोक्षप्राप्ति के लिए सब मनुष्यों से वरे जानेवाले परमात्मन् ! आप (उत्तमं पाशम्) उत्कृष्ट कर्मों के बन्धन रूप उत्तम पाश को (अस्मत्) हमसे (उत्) उत्कृष्ट फलप्रदान द्वारा छुड़ा दीजिए, (अधमम्) निकृष्ट कर्मों के बन्धन रूप अधम पाश को (अव) निकृष्ट फलप्रदान द्वारा छुड़ा दीजिए, (मध्यमम्) मध्यम कर्मों के बन्धन रूप मध्यम पाश को (वि श्रथाय) विविध फल देकर छुड़ा दीजिए। (अथ) उसके पश्चात्, हे (आदित्य) नित्यमुक्त, अविनाशी, आदित्य के समान प्रकाशमान, सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! (तव) आपके (व्रते) निष्काम कर्म में चलते हुए (वयम्) हम (अनागसः) निष्पाप होते हुए (अदितये) मोक्ष के अधिकारी (स्याम) हो जाएँ ॥ अथवा उत्तम पाश है आत्मा के ज्ञान आदि के ग्रहण में जो बाधक होते हैं, उनसे किया गया बन्धन, मध्यम पाश है मन के श्रेष्ठ संकल्प आदि में जो बाधक होते हैं, उनसे किया गया बन्धन, अधम पाश है शरीर के व्यापार में जो बाधक रोग आदि होते हैं उनसे किया गया बन्धन। उन पाशों से छुड़ाकर परमेश्वर अथवा योगी गुरु हमें सुख का अधिकारी बना देवे ॥४॥
भावार्थःमनुष्य सभी सकाम कर्मों का फल अवश्य पाता है। जो लोग निष्काम होकर परमेश्वर के व्रत में रहते हुए निष्पाप जीवन व्यतीत करते हैं, वे ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं ॥४॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
त्व꣡या꣢ व꣣यं꣡ पव꣢꣯मानेन सोम꣣ भ꣡रे꣢ कृ꣣तं꣢꣯ वि꣢꣯ चिनुयाम꣣ श꣡श्व꣢त् । त꣡न्नो꣢ मि꣣त्रो꣡ वरु꣢णो मामहन्ता꣣म꣡दि꣢तिः꣣ सि꣡न्धुः꣢ पृ꣣थि꣢वी उ꣣त꣢ द्यौः ॥५९०॥
पदार्थःहे (सोम) प्रेरक परमात्मन् ! (पवमानेन) पवित्रकर्ता (त्वया) तुझ सहायक के द्वारा (वयम्) हम शूरवीर लोग (भरे) जीवन-संग्राम में (शश्वत्) निरन्तर (कृतम्) कर्म को (वि चिनुयाम) विशेषरूप से चुनें। (तत्) इस कारण (मित्रः) वायु, (वरुणः) अग्नि, (अदितिः) उषा, (सिन्धुः) अन्तरिक्ष-समुद्र अथवा पार्थिव समुद्र, (पृथिवी) भूमि (उत) और (द्यौः) द्युलोक अथवा सूर्य (नः) हमें (मामहन्ताम्) सत्कार से बढ़ाएँ। अथवा—(मित्रः) प्राण, (वरुणः) अपान, (अदितिः) वाणी, (सिन्धुः) हृदय-समुद्र, (पृथिवी) शरीर (उत) और (द्यौः) प्रकाशयुक्त बुद्धि वा आत्मा (नः मामहन्ताम्) हमें बढ़ाएँ। अथवा—(मित्रः) ब्राह्मणवर्ण, (वरुणः) क्षत्रियवर्ण, (अदितिः) न पीड़ित की जाने योग्य नारी जाति, (समुद्रः) समुद्र के तुल्य धन का संचय करनेवाला वैश्यवर्ण, (पृथिवी) राष्ट्रभूमि (उत) और (द्यौः) यशोमयी राजसभा (नः मामहन्ताम्) हम प्रजाजनों को अतिशय समृद्ध करें ॥५॥
भावार्थः‘मेरे दाहिने हाथ में कर्म है, बाएँ हाथ में विजय रखी हुई है।’ अथ० ७।५०।८, इस सिद्धान्त के अनुसार संसार में जो कर्म को अपनाता है, वही विजय पाता है। इस कर्मयोग के मार्ग में परमेश्वर के अतिरिक्त अग्नि-वायु-सूर्य आदि बाह्य देव, प्राण-अपान-वाणी-मन आदि आन्तरिक देव और ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि राष्ट्र के देव हमारे सहायक और प्रेरक बन सकते हैं ॥५॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -एकपात् त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
इ꣣मं꣡ वृष꣢꣯णं कृणु꣣तै꣢꣫क꣣मि꣢न्माम् ॥५९१
पदार्थःहे परमात्मा, जीवात्मा, मन, बुद्धि आदि सब देवो, सब विद्वान् गुरुजनो तथा राज्याधिकारियो ! तुम (इमम्) इस (माम्) मुझको (एकम् इत्) अद्वितीय (वृषणम्) मेघ के समान धन, अन्न, सुख आदि की वर्षा करनेवाला (कृणुत) कर दो ॥६॥
भावार्थःजैसे परमात्मा और शरीर में स्थित, समाज में स्थित तथा राष्ट्र में स्थित सब देव परोपकारी हैं, वैसे ही उनसे प्रेरणा लेकर मैं भी निर्धनों के ऊपर धन, अन्न आदि की वर्षा करनेवाला, अनाथों का नाथ और दूसरों के दुःख को हरनेवाला बनूँ ॥६॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ न꣣ इ꣡न्द्रा꣢य꣣ य꣡ज्य꣢वे꣣ व꣡रु꣢णाय म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । व꣣रिवोवि꣡त्परि꣢꣯स्रव ॥५९२॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म-पक्ष में। हे पवमान सोम अर्थात् सर्वोत्पादक, सकल ऐश्वर्य के अधिपति, रसमय, पवित्रतादायक परमात्मन् ! (सः) सुप्रसिद्ध आप (नः) हमारे (यज्यवे) देह-रूप यज्ञ के सञ्चालक (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए, (वरुणाय) श्रेष्ठ संकल्पों का वरण करनेवाले मन के लिए और (मरुद्भ्यः) प्राणों के लिए (वरिवोवित्) उनके बलरूप ऐश्वर्य के प्राप्त करानेवाले होकर (परिस्रव) हृदय में सञ्चार करो ॥ द्वितीय—राष्ट्र-परक। हे पवमान सोम अर्थात् सब राज्याधिकारियों को अपने-अपने कर्तव्य कर्मों में प्रेरित करने तथा उनके दोषों को दूर कर पवित्रता देनेवाले राजन् ! (सः) वह प्रजाओं द्वारा राजा के पद पर अभिषिक्त किये हुए आप (नः) हमारे (यज्यवे) राष्ट्र-यज्ञ के कर्ता (इन्द्राय) सेनाध्यक्ष के लिए, (वरुणाय) असत्याचरण करनेवालों को बन्धन में बाँधनेवाले कारागार-अधिकारी के लिए और (मरुद्भ्यः) योद्धा सैनिकों के लिए (वरिवोवित्) देने योग्य उचित वेतनरूप धन के प्राप्त करानेवाले होकर (परिस्रव) राष्ट्र में सञ्चार करो ॥७॥
भावार्थःपरमेश्वर कृपा करके हमारे आत्मा, मन, प्राण, इन्द्रिय आदि को शरीर-राज्य चलाने का बलरूप धन और राजा नियुक्त राज्याधिकारियों को देय वेतनरूप धन सदा देता रहे। जो राजा अन्याय से सेवकों को वेतन से वंचित करता है, उसके प्रति वे पूर्णतः विद्रोह कर देते हैं ॥७॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ना꣡ विश्वा꣢꣯न्य꣣र्य꣢꣫ आ द्यु꣣म्ना꣢नि꣣ मा꣡नु꣢षाणाम् । सि꣡षा꣢सन्तो वनामहे ॥५९३॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् सर्वोत्पादक पवित्रतादायक परमात्मन् ! (अर्यः) सबके स्वामी आप (एना) इन (सर्वाणि) सब (द्युम्नानि) धनों को (आ) प्राप्त कराओ। इन धनों को हम (मानुषाणाम्) सत्पात्र मनुष्यों को (सिषासन्तः) दान करने के अभिलाषी होते हुए (वनामहे) पाना चाहते हैं ॥८॥
भावार्थःजिस धन से दूसरों का हित नहीं होता, वह धन धन नहीं, किन्तु पुञ्जित अपयश ही है, क्योंकि वेद कहता है कि “अकेला खानेवाला पाप का भागी होता है (ऋ० १०।११७।६)” ॥८॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अन्नम्| स्वर - धैवतः
अ꣣ह꣡म꣢स्मि प्रथम꣣जा꣡ ऋ꣣त꣢स्य꣣ पू꣡र्वं꣢ दे꣣वे꣡भ्यो꣢ अ꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ ना꣡म꣢ । यो꣢ मा꣣ द꣡दा꣢ति꣣ स꣢꣫ इदे꣣व꣡मा꣢वद꣣ह꣢꣫मन्न꣣म꣡न्न꣢म꣣द꣡न्त꣢मद्मि ॥५९४
पदार्थः(अहम्) मैं परमेश्वर (ऋतस्य) जगत् में सर्वत्र दिखायी देनेवाले सत्य नियम का (प्रथमजाः) प्रथम उत्पादक (अस्मि) हूँ। मैं (देवेभ्यः) सब चमकनेवाले सूर्य, बिजली, अग्नि, तारामण्डल आदियों की उत्पत्ति से (पूर्वम्) पहले विद्यमान था। मैं (अमृतस्य) मोक्षावस्था में प्राप्त होनेवाले आनन्दामृत का (नाम) केन्द्र या स्रोत हूँ। (यः) जो मनुष्य (मा) मुझे (ददाति) अपने आत्मा में समर्पित करता है (सः इत् एव) निश्चय से वही (मा) मुझे (अवत्) प्राप्त होता है। (अहम्) मैं (अन्नम्) अन्न हूँ, भक्तों का भोजन हूँ और मैं (अन्नम् अदन्तम्) भोग भोगनेवाले प्रत्येक प्राणी को (अद्मि) खाता भी हूँ, अर्थात् प्रलयकाल में ग्रस भी लेता हूँ, इस कारण मैं अत्ता भी हूँ ॥ परमेश्वर के अन्न और अत्ता रूप को उपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्र में इस प्रकार कहा है—मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्नाद हूँ, मैं अन्नाद हूँ, मैं अन्नाद हूँ (तै० उप ०३।१०।६)। ‘परमेश्वर अत्ता इस कारण है, क्योंकि चर-अचर को ग्रसता है’ (ब्र० सू० १।२।९) ॥ निरुक्त में जो परोक्षकृत, प्रत्यक्षकृत तथा आध्यात्मिक तीन प्रकार की ऋचाएँ कही गयी हैं, उनमें यह ऋचा आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक ऋचाएँ वे होती हैं, जिनमें उत्तम पुरुष की क्रिया तथा ‘अहम्’ सर्वनाम का प्रयोग हो अर्थात् जिसमें देवता अपना परिचय स्वयं दे रहा हो ॥९॥ इस मन्त्र में ‘मैं अन्न हूँ, मैं अन्न खानेवाले को खाता हूँ’ में विरोध प्रतीत होने से विरोधालङ्कार व्यङ्ग्यहै ॥९॥
भावार्थःजैसे प्राणी भोजन के बिना, वैसे ही भक्तजन परमेश्वर के बिना नहीं जी सकते। जैसे प्राणी अन्न का ग्रास लेते हैं, वैसे ही परमेश्वर चराचर जगत् को ग्रसता है ॥९॥ पूर्व दशति में सोम नाम से परमात्मा का वर्णन होने से तथा इस दशति में भी इन्द्र, वरुण, सोम आदि नामों से परमात्मा का ही वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में तृतीय अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ षष्ठ अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्व꣢मे꣣त꣡द꣢धारयः कृ꣣ष्णा꣢सु꣣ रो꣡हि꣢णीषु च । प꣡रु꣢ष्णीषु꣣ रु꣢श꣣त्प꣡यः꣢ ॥५९५॥
पदार्थःप्रथम—गौओं के पक्ष में। हे इन्द्र जगदीश्वर !(त्वम्) सर्वशक्तिमान् आपने (कृष्णासु) काले रंग की, (रोहिणीषु च) और लाल रंग की (परुष्णीषु) बहुत स्नेहशील मातृभूत गौओं में (एतत्) इस, हमसे प्रतिदिन पान किये जानेवाले (रुशत्) उज्ज्वल (पयः) दूध को (अधारयः) निहित किया है ॥ द्वितीय—नदियों के पक्ष में। हे इन्द्र परमात्मन् ! (त्वम्) जगत् की व्यवस्था करनेवाले आपने (कृष्णासु) कृषिकर्म को सिद्ध करनेवाली, (रोहिणीषु च) और वृक्ष-वनस्पति आदियों को उगानेवाली (परुष्णीषु) पर्वोंवाली अर्थात् टेढ़ा चलनेवाली नदियों में (एतत्) इस (रुशत्) उज्ज्वल (पयः) जल को (अधारयः) निहित किया है ॥ तृतीय—नाड़ियों के पक्ष में। हे इन्द्र जगत्पति परमात्मन् ! (त्वम्) प्राणियों के देहों के सञ्चालक आपने (कृष्णासु) नीले रंगवाली शिरारूप (रोहिणीषु च) और लाल रंगवाली धमनिरूप (परुष्णीषु) अङ्ग-अङ्ग में जानेवाली अथवा रक्त को ले जानेवाली रक्तनाड़ियों में (एतत्) इस (रुशत्) चमकीले नीले रंग के और चमकीले लाल रंग के (पयः) रक्तरूप जल को (अधारयः) निहित किया है ॥ चतुर्थ—रात्रियों के पक्ष में। हे इन्द्र राजाधिराज परमेश्वर ! (त्वम्) दिन-रात्रि के चक्र के प्रवर्तक आपने (कृष्णासु) आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से काले रंगवाली (रोहिणीषु च) और प्रकाश से उज्ज्वल (परुष्णीषु) कृष्ण और शुक्ल पक्षों से युक्त रात्रियों में (एतत्) सबको दीखनेवाले इस (रुशत्) चमकीले (पयः) ओस-कण रूप जल को (अधारयः) निहित किया है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा का ही यह कौशल है कि वह विविध रंगोंवाली गौओं में श्वेत दूध को नदियों में उज्ज्वल जल को, शरीरस्थ नाड़ियों में नीले और लाल रुधिर को तथा कृष्णपक्ष एवं शुक्लपक्ष की रात्रियों में ओसरूप जल को उत्पन्न करता है ॥१॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣡रू꣢रुचदु꣣ष꣢सः꣢ पृ꣡श्नि꣢रग्रि꣣य꣢ उ꣣क्षा꣡ मि꣢मेति꣣ भु꣡व꣢नेषु वाज꣣युः꣢ । मा꣣यावि꣡नो꣢ ममिरे अस्य मा꣣य꣡या꣢ नृ꣣च꣡क्ष꣢सः पि꣣त꣢रो꣣ ग꣢र्भ꣣मा꣡द꣢धुः ॥५९६॥
पदार्थः(अस्य) इस पवमान सोम के अर्थात् सर्वव्यापक प्रेरक परमात्मा के (मायया) बुद्धि और कर्म के कौशल से (अप्रियः) आगे रहनेवाला (पृश्निः) सूर्य (उषसः) उषाओं को (अरूरुचत्) चमकाता है और (उक्षा) वर्षक बादल (भुवनेषु) भूतलों पर (वाजयुः) मानो अन्न उत्पन्न करना चाहता हुआ (मिमेति) गर्जता है, (मायाविनः) मेधावियों के तुल्य विद्यमान पवन (ममिरे) अपनी गति से सुदीर्घ प्रदेशों को मापते हैं और (नृचक्षसः) मनुष्यों को प्रकाश देनेवाली (पितरः) पालक सूर्य-किरणें (गर्भम् आदधुः) ओषधियों में गर्भ धारण कराती हैं अथवा पानी को भाप बनाकर गर्भरूप में ग्रहण करती हैं ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा ने ही अपने कौशलों से उषा, सूर्य, बादल, पवन एवं किरणों जैसे यन्त्र रचे हैं, जो हमारा बड़ा उपकार करते हैं ॥२॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्र꣣ इ꣢꣫द्धर्योः꣣ स꣢चा꣣ स꣡म्मि꣢श्ल꣣ आ꣡ व꣢चो꣣यु꣡जा꣢ । इ꣡न्द्रो꣢ व꣣ज्री꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥५९७॥
पदार्थः(इन्द्रः इत्) जगदीश्वर ही (वचोयुजा) आदेशवचन होते ही नियुक्त हो जानेवाले (हर्योः) भूमि-आकाश, दिन-रात, शुक्लपक्ष-कृष्णपक्ष, प्राण-अपान, ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय, ऋक्-साम रूप घोड़ों का (सचा) एक साथ (सम्मिश्लः) संयुक्त करनेवाला है। (इन्द्रः) वह जगदीश्वर (वज्री) वज्रधारी के समान निरङ्कुशों को नियम में रखनेवाला और (हिरण्ययः) प्रतापी है ॥३॥
भावार्थःमहाप्रतापी परमेश्वर ने ही सौरमण्डल में द्यावापृथिवी आदि रूप, शरीर में प्राण-अपान आदि रूप तथा मनोभूमि में ऋक्-साम आदि रूप अश्वों को सामञ्जस्यपूर्वक नियुक्त किया है ॥३॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्र꣣ वा꣡जे꣢षु नोऽव स꣣ह꣡स्र꣢प्रधनेषु च । उ꣣ग्र꣢ उ꣣ग्रा꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ ॥५९८॥
पदार्थःहे (उग्र) शत्रुओं पर प्रचण्ड (इन्द्र) शत्रुविदारक जगदीश्वर अथवा राजन् ! आप (वाजेषु) संकटों में (सहस्रप्रधनेषु च) और सहस्रों का संहार करनेवाले घोर देवासुर-संग्रामों में (उग्राभिः) उत्कट (ऊतिभिः) रक्षा-शक्तियों से (नः) हम धार्मिकों की (अव) रक्षा कीजिए ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है। ‘उग्र, उग्रा’ में छेकानुप्रास है ॥४॥
भावार्थःजीवन में पग-पग पर आये हुए संकटों में, बाह्य तथा आभ्यन्तर भीषण संग्रामों में, योगमार्ग में उपस्थित व्याधि, स्त्यान, संशय आदि विघ्नों में और राज्य में उत्पन्न राज्यविप्लव, शत्रु द्वारा चढ़ाई आदि में वीर परमेश्वर और राजा हमारी निरन्तर रक्षा करते रहें ॥४॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
प्र꣡थ꣢श्च꣣ य꣡स्य꣢ स꣣प्र꣡थ꣢श्च꣣ ना꣡मानु꣢꣯ष्टुभस्य ह꣣वि꣡षो꣢ ह꣣वि꣢र्यत् । धा꣣तु꣡र्द्युता꣢꣯नात्सवि꣣तु꣢श्च꣣ वि꣡ष्णो꣢ रथन्त꣣र꣡मा ज꣢꣯भारा꣣ व꣡सि꣢ष्ठः ॥५९९॥
पदार्थः(यस्य) जिस परमेश्वर के (प्रथः च सप्रथः च) सर्वत्र प्रख्यात होने से ‘प्रथ’ और सर्वत्र विस्तीर्ण या व्यापक होने से ‘सप्रथ’ (नाम) नाम हैं, (यत्) जो (आनुष्टुभस्य) अनुष्टुप् छन्दवाले मन्त्रों के पाठ-पूर्वक दी गयी (हविषः) उपासकों की आत्मसमर्पणरूप हवि का (हविः) केन्द्र है, उसी (द्युतानात्) द्योतमान (धातुः) सम्पूर्ण जगत् के धारक, (सवितुः च) और सम्पूर्ण जगत् के उत्पादक (विष्णोः) सर्वव्यापक परमेश्वर से (वसिष्ठः) अतिशय वसुयुक्त अर्थात् विद्या, विनय आदि धन से सम्पन्न विद्वान् मनुष्य (रथन्तरम्) आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि से अधिष्ठित शरीर-रथ द्वारा भवसागर को पार करानेवाले ब्रह्मवर्चस को (आ जभार) प्राप्त कर लेता है ॥ रथन्तर साम का भी नाम है जो वसिष्ठ ऋषि से दृष्ट ‘अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः’ (साम० २३३) आदि ऋचा पर गाया जाता है ॥५॥ इस मन्त्र में ‘प्रथश्च’ और ‘हवि’ की आवृत्ति में यमकालङ्कार तथा उत्तरार्ध में तकार और रेफ की आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःध्यान किया हुआ परमेश्वर साधक योगी को वह ब्रह्मवर्चस प्रदान करता है, जिससे वह विषयभोगों की कीचड़ में लिप्त न होता हुआ आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों और शरीर से मोक्षसाधक कर्मों को करता हुआ भव-सागर पार करके परम ब्रह्म को पा लेता है ॥५॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -वायुः| स्वर - षड्जः
नि꣣यु꣡त्वा꣢꣯न्वाय꣣वा꣡ ग꣢ह्य꣣य꣢ꣳ शु꣣क्रो꣡ अ꣢यामि ते । ग꣡न्ता꣢सि सुन्व꣣तो꣢ गृ꣣ह꣢म् ॥६००॥
पदार्थःहे (वायो) वायु के सदृश अनन्त बलवाले, सबको शुद्ध करनेवाले, सबके जीवनाधार, प्राणप्रिय परमात्मन् ! (नियुत्वान्) नियन्त्रण और नियोजन के सामर्थ्यवाले आप (आ गहि) मुझे नियन्त्रण में रखने तथा सत्कर्मों में नियुक्त करने के लिए आइए। (अयम्) यह (शुक्रः) पवित्र तथा प्रदीप्त ज्ञान, कर्म और भक्ति का सोमरस (ते) आपके लिए (अयामि) मेरे द्वारा अर्पित है। आप (सुन्वतः) ज्ञान, कर्म और भक्ति का यज्ञ करनेवाले यजमान के (गृहम्) हृदय-रूप गृह में (गन्ता) पहुँचनेवाले (असि) हो ॥६॥
भावार्थःज्ञानयज्ञ, कर्मयज्ञ और भक्तियज्ञ सम्मिलित होकर ही परमात्मा की कृपा प्राप्त कराते हैं ॥६॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣡ज्जाय꣢꣯था अपूर्व्य꣣ म꣡घ꣢वन्वृत्र꣣ह꣡त्या꣢य । त꣡त्पृ꣢थि꣣वी꣡म꣢प्रथय꣣स्त꣡द꣢स्तभ्ना उ꣣तो꣡ दिव꣢꣯म् ॥६०१॥
पदार्थःहे (अपूर्व्य) अद्वितीय (मघवन्) ऐश्वर्यशाली परमात्मन् ! (यत्) जब, आप (वृत्रहत्याय) सृष्टि के उत्पत्तिकाल में द्यावापृथिवी को फैलाने तथा आकाश में टिकाने में विघ्नभूत मेघों के वध के लिए (जायथाः) तत्पर हुए (तत्) तभी, आपने (पृथिवीम्) भूमि को (अप्रथयः) विस्तीर्ण किया, (उत उ) और (तत्) तभी (दिवम्) सूर्य को (उत् अस्तभ्नाः) आकाश में धारण किया ॥७॥
भावार्थःहमारे सौरमण्डल के जन्म से पूर्व आकाश में जलती हुई गैसों का समूह रूप प्रकाश-पुञ्जमयी एक नीहारिका थी। हमारी भूमि और अन्य ग्रह उसी से अलग हुए। नीहारिका का बचा हुआ अंश सूर्य कहलाया। नीहारिका से अलग हुई हमारी भूमि भी पहले जलती हुई गैसों का पिण्ड ही थी। शनैः-शनैः ठण्डी होती हुई वह द्रव रूप को प्राप्त हुई। तब बहुत-सी जलराशि सूर्य के तीव्र ताप से भाप बनकर बादल का रूप धारण कर सूर्य और भूमि के बीच में स्थित हो गयी। तब बादल से किये हुए गाढ़ अन्धकार के कारण भूमि पर सर्वत्र चिरस्थायिनी रात्रि व्याप गयी। सूर्य के ताप का स्पर्श न होने से द्रवरूप भूमि ठण्ड पाकर स्थल रूप को प्राप्त हो गयी। तब ईश्वरीय नियमों से वह विकराल मेघ-राशि बरसकर फिर भूमि पर ही आकर समुद्ररूप में स्थित हो गयी। मेघरूप वृत्र के संहार के पश्चात् स्थलरूप पृथिवी ग्रीष्म, वर्षा आदि विविध ऋतुओं के प्रादुर्भाव से नदी, पर्वत, वनस्पति आदि से युक्त होकर बहुत विस्तीर्ण हो गयी। सूर्य भी अपने आकर्षण के बल से उसे अपने चारों ओर घुमाता हुआ ऊपर आकाश में परमेश्वर की महिमा से बिना ही आधार से स्थित रहा। यही बात इस मन्त्र के शब्दों द्वारा संक्षेप में कही गयी है ॥७॥ इस दशति में इन्द्र, पवमान, धाता, सविता, विष्णु, वायु नामों से परमेश्वर का स्मरण होने से इसके विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में तृतीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ षष्ठ अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -प्रजापतिः| स्वर - गान्धारः
म꣢यि꣣ व꣢र्चो꣣ अ꣢थो꣣ य꣡शोऽथो꣢꣯ य꣣ज्ञ꣢स्य꣣ य꣡त्प꣢꣯यः । पर꣣मेष्ठी꣢ प्र꣣जा꣡प꣢तिर्दि꣣वि꣡ द्यामि꣢꣯व दृꣳहतु ॥६०२॥
पदार्थः(परमेष्ठी) सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित (प्रजापतिः) ब्रह्माण्ड की सब प्रजाओं का अधिपति परमात्मा, शरीर की मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि प्रजाओं का पति जीवात्मा और राष्ट्र की प्रजाओं का पति राजा (मयि) मुझ प्रार्थी में (वर्चः) ब्रह्मवर्चस, (अथ उ) और (यशः) कीर्ति, (अथ उ) और (यज्ञस्य) उपासना-यज्ञ का अथवा राष्ट्र-यज्ञ का (यत् पयः) आनन्दरूप वा समृद्धिरूप जो फल है, उसे (दृंहतु) वैसे ही स्थिर करे, (इव) जिस प्रकार (दिवि द्याम्) प्रजापति परमेश्वर आकाश में सूर्य को, प्रजापति जीवात्मा मस्तिष्क में उज्ज्वल विज्ञान को और प्रजापति राजा राष्ट्र में विद्याप्रकाश को स्थिर करता है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमा अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से, आत्मा के पुरुषार्थ से और राजा के राजधर्मपालन से मनुष्य ब्रह्मवर्चस, यश और यज्ञानुष्ठान के फल को शीघ्र प्राप्त कर सकते हैं ॥१॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -सोमः| स्वर - धैवतः
सं꣢ ते꣣ प꣡या꣢ꣳसि꣣ स꣡मु꣢ यन्तु꣣ वा꣢जाः꣣ सं꣢꣯ वृष्ण्या꣢꣯न्यभिमाति꣣षा꣡हः꣢ । आ꣣प्या꣡य꣢मानो अ꣣मृ꣡ता꣢य सोम दि꣣वि꣡ श्रवा꣢꣯ꣳस्युत्त꣣मा꣡नि꣢ धिष्व ॥६०३॥
पदार्थःहे (सोम) पवित्रतादायक, करुणारसागार परमात्मन् ! (अभिमातिषाहः) कामादि शत्रुओं का पराजय करनेवाले (ते) आपके (पयांसि) प्रेमरस और आनन्दरस (संयन्तु) हमें प्राप्त हों, (उ) और (वाजाः) बल (सम्) हमें प्राप्त हों, (वृष्ण्यानि) पुरुषार्थयुक्त कर्म (सम्) हमें प्राप्त हों। (आप्यायमानः) हृदय में बढ़ते हुए आप (अमृताय) अमरत्व-प्रदान के लिए (दिवि) हमारे आत्मा में (उत्तमानि) उत्कृष्टतम (श्रवांसि) यशों को (धिष्व) निहित कीजिए ॥२॥
भावार्थःयहाँ बढ़ते हुए चन्द्रमा का आकाश में उत्तम चाँदनी को फैलाने का अर्थ ध्वनित हो रहा है, उससे परमात्मा चन्द्रमा के समान है, यह उपमाध्वनि निकलती है ॥२॥ जैसे-जैसे परमात्मा में हमारा ध्यान बढ़ता है, वैसे-वैसे हमारे अन्तः- करण में परमात्मा मानो बढ़ता हुआ हमें आत्मबल, कर्मनिष्ठता और उत्तम यश प्रदान करता है ॥२॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -सोमः| स्वर - धैवतः
त्व꣢मि꣣मा꣡ ओष꣢꣯धीः सोम꣣ वि꣢श्वा꣣स्त्व꣢म꣣पो꣡ अ꣢जनय꣣स्त्वं꣢ गाः । त्व꣡मात꣢꣯नोरु꣣र्वा꣢३न्त꣡रि꣢क्षं꣣ त्वं꣡ ज्योति꣢꣯षा꣣ वि꣡ तमो꣢꣯ ववर्थ ॥६०४॥
पदार्थःहे (सोम) सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (त्वम्) सर्वशक्तिमान् आपने (इमाः) इन दृश्यमान (विश्वाः) सब (ओषधीः) रोगनिवारक सोमलता आदि ओषधियों को, (त्वम्) सर्वोपकारी आपने (अपः) जलों को, (त्वम्) सब प्राणियों के पालनकर्ता आपने (गाः) गौओं को (अजनयः) उत्पन्न किया है। (त्वम्) सबके विस्तारक आपने उरु विशाल (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को (आतनोः) विस्तीर्ण किया है। (त्वम्) सर्वप्रकाशक आप (ज्योतिषा) सूर्य की ज्योति से (तमः) रात्रि के अन्धकार को (वि ववर्थ) निवारण करते हो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा द्वारा ही यह चराचररूप सब जगत् उत्पन्न, पालित, पोषित और व्यवस्थित किया जाकर सबको सुख दे रहा है ॥३॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣡मी꣢डे पु꣣रो꣡हि꣢तं य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ दे꣣व꣢मृ꣣त्वि꣡ज꣢म् । हो꣡ता꣢रꣳ र꣣त्नधा꣡त꣢मम् ॥६०५॥
पदार्थःमैं (पुरोहितम्) जो ध्यानावस्था में सामने स्थित रहता है ऐसे, (यज्ञस्य) देवपूजा, संगतिकरण और दानरूप यज्ञ के (देवम्) प्रकाशक, (ऋत्विजम्) ग्रीष्म, वर्षा आदि सब ऋतुओं को संगत करनेवाले, अथवा प्रत्येक ऋतु में पूजा करने योग्य, (होतारम्) सुख आदि के देनेवाले, (रत्नधातमम्) सद्गुणरूप तथा सोना, चाँदी, हीरे आदि रूप रत्नों के अतिशय दानी (अग्निम्) अग्नि के समान प्रकाशमान, प्रकाशक, मलिनता के दाहक, अग्रनायक परमात्मा की (ईडे) पूजा करता हूँ ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर की पूजा के लिए कोई एक ही ऋतु नहीं है, प्रत्युत उसकी सदा सर्वत्र सबको पूजा करनी चाहिए और उससे प्रेरणा तथा बल प्राप्त कर यज्ञ आदि में प्रवृत्त होना चाहिए ॥४॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
ते꣡ म꣢न्वत प्र꣣थमं꣢꣫ नाम꣣ गो꣢नां꣣ त्रिः꣢ स꣣प्त꣡ प꣢र꣣मं꣡ नाम꣢꣯ जानन् । ता꣡ जा꣢न꣣ती꣢र꣣꣬भ्य꣢꣯नूषत꣣ क्षा꣢ आ꣣वि꣡र्भु꣣वन्नरु꣣णी꣡र्यश꣢꣯सा꣣ गा꣡वः꣣ ॥६०६॥
पदार्थःहे अग्रनायक परमात्मन् ! (ते) प्रसिद्ध विद्वान् जन (नाम) आपके नाम को (प्रथमम्) श्रेष्ठ (अमन्वत) मानते हैं। (गोनां त्रिःसप्त) इक्कीस वेदवाणियाँ, अर्थात् गायत्री आदि इक्कीस छन्दोंवाली ऋचाएँ भी (नाम) आपके नाम को (परमम्) श्रेष्ठ (जानन्) जनाती हैं। (जानतीः) आपके नाम को सर्वश्रेष्ठ जनाती हुई (ताः) वे अर्थगर्भित वेदवाणियाँ (यशसा) आपके महिमागान-जनित यश से (अरुणीः आरोचमान होती हुई (आविर्भुवन्) अध्येताओं के हृदय में प्रकट हो जाती हैं, अपने रहस्यार्थ को खोल देती हैं ॥५॥
भावार्थःवेदवाणियाँ मिलकर जिस परब्रह्म की महिमा को गाते-गाते नहीं थकतीं और जिस यशस्वी परब्रह्म के माहात्म्य-कीर्तन से वे स्वयं भी यशोमयी हो गयी हैं, उसकी महिमा को हम भी क्यों न गायें? ॥५॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अपांनपात्| स्वर - धैवतः
स꣢म꣣न्या꣡ यन्त्युप꣢꣯यन्त्य꣣न्याः꣡ स꣢मा꣣न꣢मू꣣र्वं꣢ न꣣꣬द्य꣢꣯स्पृणन्ति । त꣢मू꣣ शु꣢चि꣣ꣳ शु꣡च꣢यो दीदि꣣वा꣡ꣳस꣢म꣣पा꣡न्नपा꣢꣯त꣣मु꣡प꣢ य꣣न्त्या꣡पः꣢ ॥६०७॥
पदार्थः(अन्याः) कुछ नदियाँ (सं यन्ति) एक-दूसरी से मिलकर समुद्र को प्राप्त होती हैं, (अन्याः) और दूसरी कुछ नदियाँ (उपयन्ति) स्वतन्त्र रूप से पृथक्-पृथक् समुद्र में पहुँचती हैं। (नद्यः) वे सभी नदियाँ (समानम्) एक ही (ऊर्वम्) समुद्र की अग्नि को (पृणन्ति) तृप्त करती हैं। इसी प्रकार (तम् उ) उसी (शुचिम्) पवित्र (दीदिवांसम्) देदीप्यमान, (अपाम्) आप्त प्रजाओं को (नपातम्) पतित न करनेवाले, प्रत्युत उन्नत करनेवाले परमात्मारूप अग्नि को (आपः) आप्त प्रजाएँ (उपयन्ति) प्राप्त होती हैं ॥६॥ इस मन्त्र में व्यङ्ग्य-साम्यवाले दो वाक्यों में एक ही सामान्य धर्म ‘पृणन्ति’ और ‘उपयन्ति’ इन पृथक्-पृथक् शब्दों से वर्णित होने के कारण प्रतिवस्तूपमा अलङ्कार है। ‘सम, समा,’ ‘न्या, न्या,’ ‘यन्त्यु, यन्त्य,’ ‘पयन्त्य, पयन्त्या’ में छेकानुप्रास है ॥६॥
भावार्थःजैसे व्याप्त नदियाँ एक ही समुद्र को भरती हैं, वैसे ही आप्त प्रजाएँ एक ही परमात्मा को प्राप्त होती हैं ॥६॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -रात्रिः| स्वर - गान्धारः
आ꣡ प्रागा꣢꣯द्भ꣣द्रा꣡ यु꣢व꣣ति꣡रह्नः꣢꣯ के꣣तू꣡न्त्समी꣢꣯र्त्सति । अ꣡भू꣢द्भ꣣द्रा꣡ नि꣣वे꣡श꣢नी꣣ वि꣡श्व꣢स्य꣣ ज꣡ग꣢तो꣣ रा꣡त्री꣢ ॥६०८
पदार्थःप्रथम—रात्रि के पक्ष में। (भद्रा) सुखदायिनी (युवतिः) रात्रिरूप युवति (आ प्रागात्) भले प्रकार आयी है, (अह्नः) दिन की (केतून्) किरणों को (समीर्त्सति) समेट रही है। यह (रात्री) रात्रिरूप युवति (विश्वस्य) सम्पूर्ण (जगतः) संसार की (निवेशनी) विश्रामदायिनी और (भद्रा) कल्याणकारिणी (अभूत्) हुई है ॥ द्वितीय—योगनिद्रा के पक्ष में। (भद्रा) सुखदायिनी (युवतिः) योगनिद्रारूप युवति (आ प्रागात्) शीघ्र ही योगमार्ग में आयी है, (अह्नः) सांसारिक विषयभोग रूप दिन के (केतून्) प्रभावों को (समीर्त्सति) संकुचित कर रही है। यह (रात्री) समाधिदशा रूप योगनिद्रा (विश्वस्य) सम्पूर्ण (जगतः) क्रियामय मनोव्यापार को (निवेशनी) सुलानेवाली और इसीलिए (भद्रा) आनन्दजनक (अभूत्) हुई है ॥७॥ इस मन्त्र में रात्रि में युवतित्व के आरोप के कारण रूपकालङ्कार है। तात्पर्य यह है कि जैसे कोई युवति घर में इधर-उधर बिखरी हुई वस्तुओं को समेटती है और पति के लिए सुखदायिनी और विश्रामदायिनी होती है, वैसे ही यह रात्रि दिन में बिखरी किरणों को समेटती है और सबके लिए विश्रामदायिनी होती है ॥७॥
भावार्थःरात्रि के समान योगसमाधिरूप निद्रा योगियों के लिए भद्र, आह्लाददायक और विश्रामदायिनी होती है ॥७॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
प्र꣣क्ष꣢स्य꣣ वृ꣡ष्णो꣢ अरु꣣ष꣢स्य꣣ नू꣢꣫ महः꣣ प्र꣢ नो꣣ व꣡चो꣢ वि꣣द꣡था꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसे । वै꣣श्वानरा꣡य꣢ म꣣ति꣡र्नव्य꣢꣯से꣣ शु꣢चिः꣣ सो꣡म꣢ इव पवते꣣ चा꣡रु꣢र꣣ग्न꣡ये꣢ ॥६०९॥
पदार्थः(प्रक्षस्य) सब पदार्थों से संपृक्त अर्थात् सर्वव्यापक, (वृष्णः) सुख आदि की वर्षा करनेवाले, (अरुषस्य) दीप्तिमान् परमात्मा का (नु) निश्चय ही (महः) अत्यन्त महत्त्व व पूज्यत्व है। (विदथा) ज्ञानयज्ञ में (जातवेदसे) सब उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता वैश्नानर परमात्मा के लिए (नः वचः) हमारा स्तुति-वचन (प्र) भली-भाँति प्रवृत्त होता है और (नव्यसे) अतिशय नवीन (वैश्वानराय) सब जनों का हित करनेवाले (अग्नये) उस अग्रनायक परमात्मा के लिए, हमारी (शुचिः) पवित्र (चारुः) रमणीय (मतिः) बुद्धि, विचारधारा (पवते) प्रवृत्त हो रही है, (इव) जैसे (शुचिः) पवित्र (चारुः) मनोहर (सोमः) सोम ओषधि का रस (पवते) द्रोणकलश में जाने के लिए प्रवाहित होता है, अथवा जैसे (शुचिः) चमकीला, (चारुः) आह्लादकारी (सोमः) चन्द्रमा (वैश्वानराय) सूर्य की परिक्रमा करने के लिए (पवते) अन्तरिक्ष में गति करता है ॥८॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥८॥
भावार्थःसर्वान्तर्यामी, सुखवर्षक, तेजस्वी, सर्वज्ञ, सब जनों के हितकर्ता, मार्गदर्शक परमेश्वर के प्रति उत्तम स्तोत्र सबको प्रवृत्त करने चाहिएँ ॥८॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -जगती| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
वि꣡श्वे꣢ दे꣣वा꣡ मम꣢꣯ शृण्वन्तु य꣣ज्ञ꣢मु꣣भे꣢꣯ रोद꣢꣯सी अ꣣पां꣢꣯ नपा꣢꣯च्च꣣ म꣡न्म꣢ । मा꣢ वो꣣ व꣡चा꣢ꣳसि परि꣣च꣡क्ष्या꣢णि वोचꣳ सु꣣म्ने꣢꣫ष्विद्वो꣣ अ꣡न्त꣢मा मदेम ॥६१०॥
पदार्थःप्रथम—अध्यात्म-पक्ष में। (विश्वे देवाः) ज्ञानप्रकाशक शरीरस्थ सब मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय रूप देव, (उभे रोदसी) प्राण-अपान दोनों, (अपां नपात् च) और प्राणों को पतित न होने देनेवाला जीवात्मा तथा परमेश्वर (मम) मेरे (यज्ञम्) विषय और इन्द्रियों के संसर्ग से प्राप्त होनेवाले (मन्म) विज्ञान को (शृण्वन्तु) पूर्ण करें। हे शरीरस्थ देवो ! (वः) तुम्हारे लिए, मैं (परिचक्ष्याणि) निन्दनीय (वचांसि) वचनों को (मा वोचम्) न बोलूँ—‘अहो, मेरा मन कुण्ठित हो गया है, बुद्धि कुण्ठित हो गयी है, इन्द्रियाँ अशक्त हो गयी हैं’ इत्यादि प्रकार से निराशा भरे वचन न कहूँ, प्रत्युत तुम्हारी शक्ति का गुणगान करते हुए तुम्हारे पास से अधिकाधिक लाभ प्राप्त करूँ। हम सभी (वः) तुम्हारे (अन्तमाः) निकटतम होकर (सुम्नेषु) तुम्हारे दिये हुए सुखों में (मदेम) तृप्त होवें ॥ द्वितीय—राष्ट्र-पक्ष में (विश्वे देवाः) सब विद्वान् लोग, (उभे रोदसी) दोनों राज-परिषदें अर्थात् सभा और समिति (अपां नपात् च) और प्रजाओं का पतन न होने देनेवाला राजा (मम) मेरे (यज्ञम्) राष्ट्रयज्ञ- विषयक (मन्म) विचार को (शृण्वन्तु) सुनें। हे उक्त देवो ! (वः) तुम्हारे लिए, मैं (परिचक्ष्याणि) निन्दायोग्य (वचांसि) वचन (मा वोचम्) न बोलूँ। हम (वः) तुम्हारे (अन्तमाः) निकटतम रहते हुए (सुम्नेषु) तुम्हारे दिये हुए सुखों में (मदेम) आनन्दित रहें ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि शरीरस्थ देव आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण व इन्द्रियों की और राष्ट्रस्थ देव विद्वज्जन, राजमन्त्री, न्यायाधीश, राजा आदि की सहायता से सब प्रकार के उत्कर्ष को प्राप्त करें ॥९॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -महा पङ्क्तिः| देवता -लिंगोक्ताः| स्वर - पञ्चमः
य꣡शो꣢ मा꣣ द्या꣡वा꣢पृथि꣢वी꣢꣯ यशो꣢꣯ मेन्द्रबृहस्प꣣ती꣢ । य꣢शो꣣ भ꣡ग꣢स्य विन्दतु꣣ य꣡शो꣢ मा꣣ प्र꣡ति꣢मुच्यताम् । य꣣शसा꣢३स्याः꣢ स꣣ꣳ स꣢दो꣣ऽहं꣡ प्र꣢वदि꣣ता꣡ स्या꣢म् ॥६११॥
पदार्थः(द्यावापृथिवी) सूर्य-भूमि, प्राण-अपान, पिता-माता, सभा-समिति (मा) मुझे (यशः) कीर्ति प्राप्त करायें। (इन्द्रबृहस्पती) विद्युत्-वायु, परमात्मा-जीवात्मा, क्षत्रिय-ब्राह्मण (मा) मुझे (यशः) कीर्ति प्राप्त करायें। (भगस्य) चाँदी-सोना-मणि-मोती आदि रूप, सत्य-अहिंसा-अस्तेय-ज्ञान-वैराग्य आदि रूप, सुराज्य-चक्रवर्ती-राज्य आदि रूप धन की (यशः) कीर्ति (विन्दतु) मुझे प्राप्त हो। (यशः) सब प्रकार की कीर्ति (मा) मुझे (प्रतिमुच्यताम्) धारण करे। (अहम्) मैं (अस्याः) इस (संसदः) संसत् का (यशस्वी) यशस्वी (प्रवदिता) वक्ता (स्याम्) होऊँ ॥१०॥ इस मन्त्र में ‘यशः’ शब्द की पुनः-पुनः आवृत्ति से यश की अत्यन्त स्पृहणीयता सूचित होती है। ‘यशो’ की चार बार तथा ‘यशो मा’ की दो बार आवृत्ति में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःजैसे ब्रह्माण्ड में सूर्य-भूमि, शरीर में प्राण-अपान, समाज में माता-पिता और राष्ट्र में सभा-समिति अपने-अपने यश से भासित हैं और जैसे परमात्मा-जीवात्मा, बिजली-वायु और ब्राह्मण-क्षत्रिय का यश सर्वत्र फैला हुआ है, वैसे ही हम भी धन, धान्य, ज्ञान, स्वास्थ्य, दीघार्यु, चक्रवर्ती राज्य, अध्यात्म-योग आदि की सम्पदाओं से परम कीर्तिमान् और विविध सभाओं के यशस्वी वक्ता होवें ॥१०॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ नु꣢ वी꣣꣬र्या꣢꣯णि꣣ प्र꣡वो꣢चं꣣ या꣡नि꣢ च꣣का꣡र꣢ प्रथ꣣मा꣡नि꣢ व꣣ज्री꣢ । अ꣢ह꣣न्न꣢हि꣣म꣢न्व꣣प꣡स्त꣢तर्द꣣ प्र꣢ व꣣क्ष꣡णा꣢ अभिन꣣त्प꣡र्व꣢तानाम् ॥६१२॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा, सूर्य और विद्युत् के पक्ष में। मैं (इन्द्रस्य) वीर परमात्मा, पदार्थों को अवयव रूप में विछिन्न करनेवाले सूर्य और परमैश्वर्य की साधनभूत विद्युत् के (नु) शीघ्र (वीर्याणि) क्रमशः सृष्टि के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप, आकर्षण-प्रकाशन आदि रूप और भूयान, जलयान, अन्तरिक्षयान तथा विविध यन्त्रों के चलाने रूप वीरता के कर्मों का (प्र वोचम्) वर्णन करता हूँ, (यानि प्रथमानि) जिन उत्कृष्ट कर्मों को, वह (वज्री) शक्तिधारी (चकार) करता है। उन्हीं वीरता के कर्मों में से एक का कथन करते हैं—वह परमात्मा, वह सूर्य और वह विद्युत् (अहिम्) अन्तरिक्ष में स्थित बादल का (अहन्) संहार करता है, (अपः) बादल में स्थित जलों को (अनु ततर्द) तोड़-तोड़कर नीचे गिराता है, (पर्वतानाम्) पहाड़ों की (वक्षणाः) नदियों को (प्र अभिनत्) बर्फ तोड़-तोड़कर प्रवाहित करता है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। मैं (इन्द्रस्य) शत्रुविदारक राजा के (नु) शीघ्र ही (वीर्याणि) शत्रुविजय, राष्ट्रनिर्माण आदि वीरतापूर्ण कर्मों को (प्र वोचम्) भली-भाँति वर्णित करता हूँ, (यानि प्रथमानि) जिन श्रेष्ठ कर्मों को (वज्री) तलवार, बन्दूक, तोप, गोले आदि शस्त्रास्त्रों से युक्त वह (चकार) करता है। वह (अहिम्) साँप के समान टेढ़ी चालवाले, विषधर, राष्ट्र की उन्नति में बाधक शत्रु का (अहन्) संहार करता है, (अपः) जलों के समान उमड़नेवाले शत्रु-दलों को (ततर्द) छीलता है, (पर्वतानाम्) किलों की (वक्षणाः) सेनाओं को (अभिनत्) छिन्न-भिन्न करता है ॥११॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। अहन्, अनुततर्द, प्राभिनत् इन अनेक क्रियाओं में एक कारक का योग होने से दीपकालङ्कार भी है ॥११॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर सूर्य द्वारा अथवा आकाशीय बिजली द्वारा मेघ का संहार कर रुके हुए जलों को नीचे बरसाता और नदियों को बहाता है, वैसे ही राष्ट्र का राजा विघ्नकारी शत्रुओं को मार कर, किलों में भी स्थित सेनाओं को हरा कर राष्ट्र में सब ऐश्वर्यों को प्रवाहित करे ॥११॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -आत्मा अग्निर्वा| स्वर - धैवतः
अ꣣ग्नि꣡र꣢स्मि꣣ ज꣡न्म꣢ना जा꣣त꣡वे꣢दा घृ꣣तं꣢ मे꣣ च꣡क्षु꣢र꣣मृ꣡तं꣢ म आ꣣स꣢न् । त्रि꣣धा꣡तु꣢र꣣र्को꣡ रज꣢꣯सो वि꣣मा꣡नोऽज꣢꣯स्रं꣣ ज्यो꣡ति꣢र्ह꣣वि꣡र꣢स्मि꣣ स꣡र्व꣢म् ॥६१३॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। मैं परमात्मा (अग्निः अस्मि) सबका अग्रनायक और अग्नि के समान प्रकाशक होने से अग्नि नामवाला हूँ, (जन्मना) स्वरूप से ही (जातवेदाः) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, वेदों का प्रकाशक तथा सब धनों का उत्पादक हूँ। (मे) मेरी (चक्षुः) आँख अर्थात् देखने की शक्ति (घृतम्) अत्यन्त तीव्र है। (मे) मेरे (आसन्) मुख में (अमृतम्) अमृत है, मैं सदा अमृतत्व का आस्वादन करता रहता हूँ अर्थात् अमर हूँ। मैं (त्रिधातुः) जगत् की सृष्टि, स्थिति तथा संहार रूप तीनों क्रियाओं को करनेवाला हूँ, मैं (अर्कः) अर्चनीय हूँ। मैं (रजसः) सूर्य, चन्द्र, तारे, पृथिवी आदि लोकों का (विमानः) निर्माता अथवा अधिष्ठाता, (अजस्रं ज्योतिः) अक्षय तेजवाला, (हविः) सबका आह्वानयोग्य, और (सर्वम्) सर्वशक्तिमान् (अस्मि) हूँ ॥ यहाँ ‘मैं अमर हूँ’ इस व्यङ्ग्यार्थ को ही ‘मेरे मुख में अमृत है’ इस रूप में अभिहित करने से पर्यायोक्त अलङ्कार है ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में । शरीरधारी जीवात्मा कह रहा है—मैं (अग्निः अस्मि) आग हूँ, आग के समान प्रकाशक तथा दुर्गुणों और दुर्जनों को भस्म करनेवाला हूँ, (जन्मना) आचार्य के गर्भ से द्वितीय जन्म पाने के आरम्भ से ही (जातवेदाः) वेदविद्या का विद्वान् हूँ। (मे चक्षुः) मेरी आँख में (घृतम्) स्नेह है, अर्थात् मैं सबको स्नेहयुक्त आँख से देखता हूँ। (मे आसन्) मेरे मुख में (अमृतम्) अमृत अर्थात् वाणी का माधुर्य है। मैं (त्रिधातुः) सत्त्व-रजस्-तमस्, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, तप-स्वाध्याय-ईश्वरप्रणिधान, ऋग्-यजुः-साम आदि त्रिगणों से युक्त हूँ। मैं (अर्कः) परमेश्वर की अर्चना करनेवाला, सदाचारी तथा विद्यावृद्धों एवं वयोवृद्धों का सत्कार करनेवाला और सूर्य के समान तेजस्वी हूँ। मैं (रजसः) ग्रह-उपग्रह, सूर्य आदि लोकों को (विमानः) खगोल-गणित द्वारा मापने आदि में समर्थ, (अजस्रं ज्योतिः) अक्षय ज्योतिवाला और (सर्वं हविः) श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए सर्वस्व बलिदान कर देनेवाला (अस्मि) हूँ ॥१२॥ इस मन्त्र में ‘अग्निः अस्मि, अर्कः अस्मि’, ‘मैं आग हूँ, मैं सूर्य हूँ’ इस अर्थ में रूपकालङ्कार है। ‘अजस्रं ज्योतिः’ की ‘अजस्र ज्योतिवाले’ में और ‘सर्वं हविः’ की ‘सर्वस्व हवि देनेवाले’ में लक्षणा है। निरुक्तप्रोक्त त्रिविध ऋचाओं परोक्षकृत, प्रत्यक्षकृत तथा आध्यात्मिक में से यह ऋचा आध्यात्मिक है ॥१२॥
भावार्थःपरमेश्वर के समान मनुष्य का आत्मा भी बहुत-से विशिष्ट गुणोंवाला तथा महाशक्ति-सम्पन्न है। अतः उसे चाहिए कि महत्त्वाकांक्षी होकर महान् कर्मों में कदम रखे ॥१२॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
पा꣢त्य꣣ग्नि꣢र्वि꣣पो꣡ अग्रं꣢꣯ प꣣दं꣢꣯ वेः पाति꣢꣯ य꣣ह्व꣡श्चर꣢꣯ण꣣ꣳ सू꣡र्य꣢स्य । पा꣢ति꣣ ना꣡भा꣢ स꣣प्त꣡शी꣢र्षाणम꣣ग्निः꣡ पाति꣢꣯ दे꣣वा꣡ना꣢मुप꣣मा꣡द꣢मृ꣣ष्वः꣢ ॥६१४॥
पदार्थः(विपः) मेधावी (अग्निः) अग्रनायक जगदीश्वर (वेः) पक्षी की अथवा वेगवान् पवन की (अग्रम्) अग्रगामी (पदम्) उड़ान की (पाति) रक्षा करता है। (यह्वः) वही महान् जगदीश्वर (सूर्यस्य) सूर्य के (चरणम्) संवत्सरचक्रप्रवर्तन आदि व्यापार की (पाति) रक्षा करता है। (अग्निः) वही अग्रगन्ता जगदीश्वर (नाभा) केन्द्रभूत हृदय अथवा मस्तिष्क में (सप्तशीर्षाणम्) मन, बुद्धि तथा पञ्च ज्ञानेन्द्रिय रूप सात शीर्षस्थ प्राणों के स्वामी जीवात्मा की (पाति) रक्षा करता है। (ऋष्वः) वही दर्शनीय जगदीश्वर (देवानाम्) विद्वानों के (उपमादम्) यज्ञ की (पाति) रक्षा करता है ॥१३॥ इस मन्त्र में ‘पाति’ की अनेक बार आवृत्ति में लाटानुप्रास अलङ्कार है। पुनः-पुनः ‘पाति’ कहने से यह सूचित होता है कि इसी प्रकार अन्यों के भी कर्मों की जगदीश्वर रक्षा करता है। पूर्वार्ध में पठित भी ‘अग्निः’ पद को उत्तरार्ध में पुनः पठित करने से यह सूचित होता है कि उत्तरार्ध की अर्थयोजना पृथक् करनी है ॥१३॥
भावार्थःजगदीश्वर ही सूर्य, वायु, पृथिवी, चन्द्र आदि के, जीवात्मा, मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि के और सब विद्वान् लोगों के यज्ञमय व्यापार का रक्षक होता है ॥१३॥ इस दशति में प्रजापति, सोम, अग्नि, अपांनपात् एवं इन्द्र नामों से जगदीश्वर की महिमा का वर्णन होने से, तेज और यश की प्रार्थना होने से तथा दिव्य रात्रि का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में तृतीयार्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ षष्ठ अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
भ्रा꣡ज꣢न्त्यग्ने समिधान दीदिवो जि꣣ह्वा꣡ च꣢रत्य꣣न्त꣢रा꣣स꣡नि꣢ । स꣡ त्वं नो꣢꣯ अग्ने꣣ प꣡य꣢सा वसु꣣वि꣢द्र꣣यिं꣡ वर्चो꣢꣯ दृ꣣शे꣡ऽदाः꣢ ॥६१५
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (समिधान) अतिशय प्रकाशयुक्त, (दीदिवः) सबको प्रकाशित करनेवाले (अग्ने) जगन्नायक परमात्मन् ! आपकी कृपा से (आसनि अन्तः) हमारे मुख के अन्दर (भ्राजन्ती) शोभित होती हुई (जिह्वा) जीभ (चरति)रसों का स्वाद लेती और शब्दों का उच्चारण करती है। (सः) वह (वसुवित्) ऐश्वर्यों को प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप, हे (अग्ने) परमात्मन् ! (नः) हमें (पयसा) जल, दूध, घी आदि रस के साथ (रयिम्) धन को, और (दृशे) कर्तव्याकर्तव्य के दर्शन के लिए (वर्चः) ज्ञान रूप तेज (दाः) प्रदान किये हुए हो ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। आचार्य रूप अग्नि में स्वयं को आहुत करने के लिए गुरुकुल में आये हुए समित्पाणि शिष्य कह रहे हैं—हे (समिधान) स्वयं ज्ञान से प्रदीप्त तथा (दीदिवः) शिष्यों को ज्ञान से प्रदीप्त करनेवाले (अग्ने) विद्वान् आचार्यप्रवर ! आपके (आसनि अन्तः) मुख के अन्दर (भ्राजन्ती) शास्त्रों का ज्ञान से उपदेश देने के कारण यश से जगमगाती हुई (जिह्वा) जीभ (चरति) शब्दों के उच्चारण के लिए तालु, दन्त आदि स्थानों में विचरती है। (सः) वह महिमाशाली, (वसुवित्) विविध विद्याधनों को प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप, हे (अग्ने) आचार्यवर ! (नः) हमारे (दृशे) कर्तव्य-दर्शन के लिए (पयसा) वेदज्ञान रूप दूध के साथ (रयिम्) सदाचार की सम्पदा को और (वर्चः) ब्रह्मवर्चस को (दाः) हमें प्रदान कीजिए ॥ तृतीय—राजा के पक्ष में। सिंहासन पर चढ़े हुए राजा के प्रति प्रजाजन कह रहे हैं—हे (समिधान) राजोचित प्रताप से देदीप्यमान, (दीदिवः) प्रजाओं को यश से प्रदीप्त करनेवाले (अग्ने) अग्रनायक राजन् ! (आसनि अन्तः) आपके धनुष् पर (भ्राजन्ती) दमकती हुई (जिह्वा) डोरी (चरति) चलती है अर्थात् खिंचती, छूटती और बाणों को फेंकती है। (सः) वह (वसुवित्) प्रजाओं को निवास प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप, हे (अग्ने) अग्नि के समान जाज्वल्यमान राष्ट्राधिपति ! (दृशे) राष्ट्र की ख्याति के लिए, प्रजा को (पयसा) दूध आदि रसों के साथ (रयिम्) धन, धान्य आदि सम्पदा और (वर्चः) ब्राह्म तेज (दाः) प्रदान कीजिए ॥ चतुर्थ—यज्ञाग्नि के पक्ष में। यजमान कह रहे हैं—हे (समिधान) प्रज्वलित, (दीदिवः) याज्ञिक को तेज से प्रज्वलित करनेवाले (अग्ने) यज्ञाग्नि ! (आसनि अन्तः) यज्ञकुण्ड रूप मुख के अन्दर (भ्राजन्ती) जगमगाती हुई (जिह्वा) तेरी ज्वाला रूप जीभ (चरति) लपलपाती है। (सः) वह (वसुवित्) हविरूप धन को प्राप्त करनेवाला (त्वम्) तू हे (अग्ने) यज्ञाग्नि ! (पयसा) वर्षाजल के साथ (रयिम्) सस्य-सम्पदा रूप तथा बल, बुद्धि, दीर्घायु आदि रूप धन को तथा (दृशे) देखने के लिए (वर्चः) प्रकाश को (दाः) प्रदान कर ॥ मुण्डक उपनिषद् के ऋषि ने अग्नि की जिह्वाएँ इस प्रकार वर्णित की हैं—काली, कराली, मन जैसे वेगवाली, अत्यन्त लाल, धुमैले रंग की, चिनगारियाँ छोड़नेवाली और सब रंगोंवाली ज्वालाएँ ये अग्नि की सात लपलपाती जिह्वाएँ हैं (मु० २।४)। अग्नि के मुख और जिह्वाओं का वर्णन करने के कारण यज्ञाग्निपरक अर्थ में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर मनुष्यों को जल, दूध, घी, ज्ञान आदि और यज्ञाग्नि वृष्टि, जल, बल, बुद्धि, दीर्घायुष्य आदि देता है, वैसे ही आचार्य को शिष्यों के लिए वेदविद्या, सदाचार, ब्रह्मतेज आदि प्रदान करना चाहिए और राजा को राष्ट्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों की उन्नति द्वारा प्रजाओं को सुखी करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
व꣣स꣡न्त इन्नु रन्त्यो꣢꣯ ग्री꣣ष्म꣡ इन्नु रन्त्यः꣢꣯ । व꣣र्षा꣡ण्यनु꣢꣯ श꣣र꣡दो꣢ हेम꣣न्तः꣡ शिशि꣢꣯र꣣ इन्नु꣡ रन्त्यः꣢꣯ ॥६१६
पदार्थःपरमेश्वर की सृष्टि में (वसन्तः) वसन्त ऋतु (इत् नु) निश्चय ही (रन्त्यः) रमणीय है, (ग्रीष्मः) ग्रीष्म ऋतु (इत् नु) निश्चय ही (रन्त्यः) रमणीय है। (वर्षाणि अनु) वर्षा-दिनों के अनन्तर (शरदः) शरद् ऋतु के दिवस और (हेमन्तः) हेमन्त ऋतु भी, रमणीय हैं। (शिशिरः) शिशिर ऋतु भी (इत् नु) निश्चय ही (रन्त्यः) रमणीय है ॥२॥ इस मन्त्र में ‘इन्नु रन्त्यः’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःजो लोग परमेश्वर-विश्वासी होते हैं, वे प्रत्येक ऋतु को रमणीय और आह्लाददायक मानते हुए उससे उत्पादित आनन्द को अनुभव करते हैं। किन्तु जो लोग ‘अहह, ग्रीष्मऋतु बड़ी संतापक है, वर्षा ऋतु में कीचड़ ही कीचड़ हो जाती है, हेमन्त का शीत बड़ा कष्टदायक होता है’ इत्यादि प्रकार से दोष खोजते हुए सभी ऋतुओं को धिक्कारते हैं, वे निश्चय ही अभागे हैं ॥२॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पुरुषः| स्वर - गान्धारः
स꣣ह꣡स्र꣢शीर्षाः꣣ पु꣡रु꣢षः सहस्रा꣣क्षः꣢ स꣣ह꣡स्र꣢पात् । स꣢꣯ भूमि꣢꣯ꣳ स꣣र्व꣡तो꣢ वृ꣣त्वा꣡त्य꣢तिष्ठद्द꣣शाङ्गुल꣢म् ॥६१७॥
पदार्थः(पुरुषः) सबका अग्रनेता, सब जगत् में परिपूर्ण और सबका पालनकर्ता परमेश्वर (सहस्रशीर्षाः) सहस्रों सिरोंवाला अर्थात् अनन्तज्ञानी, (सहस्राक्षः) सहस्रों आँखोंवाला अर्थात् सर्वद्रष्टा, और (सहस्रपात्) सहस्रों पैरोंवाला अर्थात् सर्वत्र व्याप्त है। (सः) वह (भूमिम्) पृथिवी को (सर्वतः) सब ओर से (वृत्वा) घेरकर (दशाङ्गुलम्) दसों इन्द्रियों को (अति) अतिक्रान्त करके (अतिष्ठत्) स्थित है, अर्थात् दसों इन्द्रियों की पहुँच से परे है। कहा भी है—न वहाँ आँख की पहुँच है, न वाणी की, न मन की (केन उप० १।३) ॥३॥ यास्काचार्य पुरुष शब्द का निर्वचन करते हुए लिखते हैं—पुरी में बैठने से या पुरी में शयन करने से पुरुष कहाता है (पुरिसद् या पुरिश=पुरुष) अथवा यह वृद्ध्यर्थक पूरी धातु से निष्पन्न हुआ है (पूरी आप्यायने)। अन्तःपुरुष परमात्मा को पुरुष इस कारण कहते हैं, क्योंकि वह सारे ब्रह्माण्ड को अपनी सत्ता से पूर्ण किये हुए है। कहा भी है, “जिससे अधिक पर या अपर कोई वस्तु नहीं है, जिससे अधिक अणु या महान् कोई वस्तु नहीं है, वह एक पुरुष परमेश्वर वृक्ष के समान निश्चल होकर अपने तेजःस्वरूप में स्थित है, उस पुरुष से यह सकल ब्रह्माण्ड परिपूर्ण है” (निरु० २।३) ॥ इस मन्त्र में सहस्र सिरवाला होने आदि रूप तथा भूमि में सर्वत्र व्यापक होने रूप कारण के विद्यमान होते हुए भी इन्द्रियगोचर होने रूप कार्य की उत्पत्ति न होने से विशेषोक्ति अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःसबको उचित है कि सर्वज्ञाता, सर्वद्रष्टा, सर्वव्यापक, सर्वत्र भूगोल को व्याप्त करके स्थित, तथापि वाणी, आँख, कान, हाथ, पैर आदि की पहुँच से परे विद्यमान परमपुरुष परमात्मा का साक्षात्कार करके अनन्त सुख का भोग करें ॥३॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पुरुषः| स्वर - गान्धारः
त्रि꣣पा꣢दू꣣र्ध्व꣢꣫ उदै꣣त्पु꣡रु꣢षः꣣ पादो꣢ऽस्ये꣣हा꣡भ꣢व꣣त्पु꣡नः꣢ । त꣢था꣣ वि꣢ष्व꣣꣬ङ् व्य꣢꣯क्रामदशनानश꣣ने꣢ अ꣣भि꣢ ॥६१८॥
पदार्थः(त्रिपात्) तीन-चौथाई अंशवाला (पुरुषः) पूर्वोक्त परमेश्वर (ऊर्ध्वः उत् ऐत्) इस जगत् से ऊपर उठा हुआ है। (इह पुनः) इस जगत् में तो (अस्य) इस पूर्ण परमेश्वर का (पादः) एक-चतुर्थांश ही (अभवत्) विद्यमान है। (तथा) उसी प्रकार से अर्थात् एक-चतुर्थांश की ही व्याप्ति से (वि-स्वङ्) विविध पदार्थों में सम्यक् प्राप्त हुआ वह (अशनानशने अभि) चेतन-अचेतन को लक्ष्य करके (व्यक्रामत्) विविध रुप से चेष्टा कर रहा है, अर्थात् मनुष्य आदि प्राणियों तथा अग्नि, सूर्य, पवन, पर्वत, नदी आदि चेतन-अचेतन के यथायोग्य प्राणन आदि व्यापार को तथा स्थिति आदि व्यापार को कर रहा है ॥४॥
भावार्थःइस चेतन-अचेतन-रूप जगत् में जो महान् कर्तृत्व दृष्टिगोचर हो रहा है, उसमें परमेश्वर के सामर्थ्य का थोड़ा-सा अंश ही क्रियाशील है, परमेश्वर का वास्तविक सामर्थ्य और स्वरूप तो लोकातिक्रान्त है ॥४॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पुरुषः| स्वर - गान्धारः
पु꣡रु꣢ष ए꣣वे꣢꣫दꣳ सर्वं꣣ य꣢द्भू꣣तं꣢꣫ यच्च꣣ भा꣡व्य꣢म् । पा꣡दो꣢ऽस्य꣣ स꣡र्वा꣢ भू꣣ता꣡नि꣢ त्रि꣣पा꣡द꣢स्या꣣मृ꣡तं꣢ दि꣣वि꣢ ॥६१९॥
पदार्थः(पुरुषः एव) सर्वत्र परिपूर्ण परमेश्वर ही (इदम्) इस प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष-रूप (सर्वम्) सब (यद् भूतम्) जो उत्पन्न हो चुका है, (यत् च भाव्यम्) और जो भविष्य में उत्पन्न होनेवाला है, उस सबका अधिष्ठाता है। (सर्वा) सब (भूतानि) उत्पन्न सूर्य, पृथिवी आदि (अस्य) इस पुरुष परमेश्वर की महिमा के (पादः) चतुर्थांश-मात्र हैं, (अस्य) इस जगत्स्रष्टा की महिमा का (त्रिपात्) तीन-चौथाई रूप (अमृतम्) विनाशरहित है, जो (दिवि) प्रकाशमान मोक्षलोक में मुक्तात्माओं से अनुभव किया जाता है ॥५॥
भावार्थःभूत, वर्तमान और भावी सब पदार्थों को परमात्मा ही रचता है, और उनकी व्यवस्था करता है। परमात्मा का भौतिक लोकों से अतिक्रान्त तात्त्विक स्वरूप चर्म-चक्षु से नहीं, प्रत्युत आन्तरिक चक्षु से ही देखा जा सकता है ॥५॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पुरुषः| स्वर - गान्धारः
ता꣡वा꣢नस्य महि꣣मा꣢꣫ ततो꣣ ज्या꣡या꣢ꣳश्च꣣ पू꣡रु꣢षः । उ꣣ता꣡मृ꣢त꣣त्व꣡स्येशा꣢꣯नो꣣ य꣡दन्ने꣢꣯नाति꣣रो꣡ह꣢ति ॥६२०॥
पदार्थः(तावान्) उतनी पूर्वोक्त (अस्य) इस परमेश्वर की (महिमा) महिमा है, वस्तुतः तो (पुरुषः) वह पूर्ण परमेश्वर (ततः) उससे भी (ज्यायान्) अधिक बड़ा है। (उत) और (सः) वह (अमृतत्वस्य) मोक्ष का तथा (यत्) जो (अन्नेन) अन्न के खाने से (अतिरोहति) बढ़ता है उस सांसारिक प्राणी-समुदाय का भी (ईशानः) अधिष्ठाता है ॥६॥
भावार्थःपरमेश्वर की महिमा अवर्णनीय है, जो संसार-चक्रप्रवर्तन और मोक्ष दोनों का अधिष्ठाता है ॥६॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पुरुषः| स्वर - गान्धारः
त꣡तो꣢ वि꣣रा꣡ड꣢जायत वि꣣रा꣢जो꣣ अ꣢धि꣣ पू꣡रु꣢षः । स꣢ जा꣣तो꣡ अत्य꣢꣯रिच्यत प꣣श्चा꣢꣫द्भूमि꣣म꣡थो꣢ पु꣣रः꣢ ॥६२१॥
पदार्थः(ततः) उसी निमित्तकारणभूत परम पुरुष परमेश्वर से (विराट्) विशेषरूप से देदीप्यमान पिण्ड (अजायत) उत्पन्न हुआ। (पूरुषः) वह सर्वत्र पूर्ण परमेश्वर ही (विराजः अधि) उस विशेषरूप से देदीप्यमान पिण्ड का अधिष्ठाता था। (जातः सः) उत्पन्न हुआ वह विराट् पिण्ड (अत्यरिच्यत) भूमि आदि खण्डों में बँट गया। वह परमेश्वर (भूमिम्) भूमि आदि लोकों की उत्पत्ति के (पश्चात्) पश्चात् (अथ उ) और (पुरः) पूर्व भी विद्यमान था ॥७॥
भावार्थःहमारे सौरमण्डल का जन्म कैसे हुआ, यह इस मन्त्र में वर्णित किया गया है। प्रारम्भ में विशाल नीहारिका-रूप देदीप्यमान एक पिण्ड उत्पन्न हुआ। आकाश में वेग के साथ घूमते हुए उसमें से कुछ टुकड़े अलग हो गये। बचा भाग सूर्य हुआ और टूटकर अलग हुए खण्ड भूमि, मङ्गल, बुध, बृहस्पति आदि हो गये। इसी प्रकार अन्य सौरमण्डलों की भी उत्पत्ति हुई, यह जानना चाहिए। यह सब परमात्मा के अधिष्ठातृत्व में ही सम्पन्न हुआ ॥७॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -द्यावापृथिवी| स्वर - धैवतः
म꣡न्ये꣣ वां द्यावापृथिवी सु꣣भो꣡ज꣢सौ꣣ ये꣡ अप्र꣢꣯थेथा꣣म꣡मि꣢तम꣣भि꣡ योज꣢꣯नम् । द्या꣡वा꣢पृथिवी꣣ भ꣡व꣢तꣳ स्यो꣣ने꣡ ते नो꣢꣯ मुञ्चत꣣म꣡ꣳह꣢सः ॥६२२॥
पदार्थःहे (द्यावापृथिवी) भूमि-आकाश के सदृश माता-पिताओं अथवा अध्यापिका-उपदेशिकाओ ! मैं (वाम्) तुम दोनों को (सुभोजसौ) शुभ पालनकर्ता (मन्ये) जानता हूँ, (ये) जो तुम दोनों (अमितं योजनम् अभि) अपरिमित योजन पर्यन्त (अप्रथेथाम्) यश से प्रख्यात हो। हे (द्यावापृथिवी) पृथिवी और सूर्य के तुल्य माता-पिताओ अथवा अध्यापिका-उपदेशिकाओ ! तुम हमारे लिए (स्योने) सुखदायक (भवतम्) होवो। (ते) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) पाप से (मुञ्चतम्) छुडाओ ॥८॥
भावार्थःमाता-पिताओं और अध्यापिका-उपदेशिकाओं के पास से उत्तम विद्या और उत्तम उपदेश प्राप्त कर सन्तान श्रेष्ठ ज्ञानी, शुभ कर्म करनेवाले और निष्पाप होवें ॥८॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ह꣡री꣢ त इन्द्र꣣ श्म꣡श्रू꣢ण्यु꣣तो꣡ ते꣢ ह꣣रि꣢तौ꣣ ह꣡री꣢ । तं꣡ त्वा꣢ स्तुवन्ति क꣣व꣡यः꣢ पु꣣रु꣡षा꣢सो व꣣न꣡र्ग꣢वः ॥६२३
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (ते) तेरी रचित (श्मश्रूणि) मूँछों के समान प्रतीत होनेवाली सूर्यकिरणें (हरी) मलिनताओं को हरनेवाली हैं, (उत उ) और (ते) तेरी रचित (हरितौ) पूर्व-पश्चिमरूप, उत्तर-दक्षिणरूप अथवा ध्रुवा-ऊर्ध्वारूप दिशाएँ (हरी) मलिनता को हरनेवाली हैं। (तं त्वा) उस तेरी (वनर्गवः) वनगामी वानप्रस्थ (कवयः परुषासः) मेधावी पुरुष (स्तुवन्ति) स्तुति करते हैं ॥९॥ इस मन्त्र में ‘हरी’ की आवृत्ति में यमक तथा ‘हरी, हरि, हरी’ में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है। सूर्यकिरणों को श्मश्रु कहने में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥९॥
भावार्थःपरमात्मा द्वारा रचित सूर्य, चन्द्र, तारे, दिशाएँ, विदिशाएँ आदि सभी पदार्थ विलक्षण और उसकी महिमा के प्रकाशक हैं ॥९॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣢꣫द्वर्चो꣣ हि꣡र꣢ण्यस्य꣣ य꣢द्वा꣣ व꣢र्चो꣣ ग꣡वा꣢मु꣣त꣢ । स꣣त्य꣢स्य꣣ ब्र꣡ह्म꣢णो꣣ व꣢र्च꣣स्ते꣡न꣢ मा꣣ स꣡ꣳ सृ꣢जामसि ॥६२४
पदार्थः(यत्) जो अनुपम (वर्चः) तेज (हिरण्यस्य) सुवर्ण का होता है, (उत) और (यद् वा) जो अद्भुत (वर्चः) तेज (गवाम्) गौओं का अथवा सूर्य-किरणों का होता है और जो (सत्यस्य ब्रह्मणः) सत्य ज्ञान का (वर्चः) तेज होता है, (तेन) उस तेज से, हम (मा) अपने-आपको (संसृजामसि) संयुक्त करते हैं ॥१०॥
भावार्थःजो सुवर्ण में रमणीयता और बहुमूल्यता का, गायों में परोपकारिता का, सूर्यकिरणों में प्राणप्रदानता का, सत्य वेदज्ञान में शुद्धता का तेज होता है, वह तेज मनुष्यों को भी प्राप्त करना चाहिए ॥१०॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
स꣢ह꣣स्त꣡न्न꣢ इन्द्र꣣ द꣣द्ध्यो꣢ज꣡ ई꣢शे꣣꣬ ह्यस्य म꣢ह꣣तो꣡ वि꣢रप्शिन् । क्र꣢तुं꣣ न꣡ नृ꣣म्ण꣡ꣳ स्थवि꣢꣯रं च꣣ वा꣡जं꣢ वृ꣣त्रे꣢षु꣣ श꣡त्रू꣢न्त्सु꣣ह꣡ना꣢ कृधी नः ॥६२५
पदार्थःहे (इन्द्र) महावीर परमात्मन् अथवा राजन् ! आप (नः) हमें (तत्) वह सबके चाहने योग्य (सहः) शत्रुपराजयकारी (ओजः) आत्मिक और शारीरिक बल (दद्धि) प्रदान करो, (हि) क्योंकि, हे (विरप्शिन्) महामहिम ! (अस्य) इस (महतः) महान् बल के आप (ईशे) अधीश्वर हो। आप हमें (क्रतुं न नृम्णम्) प्रज्ञा को और बल को (स्थविरं च वाजम्) और प्रचुर ऐश्वर्य को (दद्धि) प्रदान करो और (वृत्रेषु) दुष्ट शत्रुओं के प्रति (नः) हमें (सहना) प्रहारों को सह सकनेवाला (शत्रून्) वधकर्ता (कृधि) बनाओ ॥११॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥११॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से, राजा की सहायता से और अपने पुरुषार्थ से हम बलवान्, धनवान् और शत्रु-विजयी होवें ॥११॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -गावः| स्वर - धैवतः
स꣣ह꣡र्ष꣢भाः स꣣ह꣡व꣢त्सा उ꣣दे꣢त꣣ वि꣡श्वा꣢ रू꣣पा꣢णि꣣ बि꣡भ्र꣢तीर्द्व्यूध्नीः । उ꣣रुः꣢ पृ꣣थु꣢र꣣यं꣡ वो꣢ अस्तु लो꣣क꣢ इ꣣मा꣡ आपः꣢꣯ सुप्रपा꣣णा꣢ इ꣣ह꣡ स्त ॥६२६
पदार्थःहे इन्द्रियरूप गौओ ! (सहर्षभाः) जीवात्मारूप वृषभ से युक्त, (सहवत्साः) मन रूप बछड़े से युक्त, (विश्वा रूपाणि) आँख, कान, त्वचा आदि विभिन्न नामों को (बिभ्रतीः) धारण करती हुई, (द्व्यूध्नीः) ज्ञान-कर्म रूप दो ऊधसों से युक्त होती हुई तुम (उदेत) उद्यम करो। (उरुः) बहुत लम्बा, (पृथुः) बहुत चौड़ा (अयम्) यह (लोकः) लोक (वः) तुम्हारे उपयोग के लिए (अस्तु) हो। (इमाः) ये (सुप्रपाणाः) सुख से आस्वादन किये जाने योग्य (आपः) जलों के समान प्राप्तव्य रूप, रस, गन्ध आदि विषय हैं, (इह) इनमें (स्त) रहो, अर्थात् इनका यथायोग्य आस्वादन करो ॥१२॥
भावार्थःगायों के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए। जैसे गायें वृषभ और बछड़ों के साथ विचरती हैं, वैसे ही इन्द्रियाँ आत्मा और मन के साथ। जैसे गायें सफेद, काले आदि रूपों को धारण करती हैं, वैसे इन्द्रियाँ आँख, कान आदि रूपों को। जैसे गायें प्रातः-सायं दोनों कालों में भरे हुए ऊधस् वाली होने से ‘द्व्यूध्नी’ कहलाती हैं, वैसे इन्द्रियाँ ज्ञान और कर्म रूप ऊधस् वाली होने से ‘द्व्यूध्नी’ होती हैं। जैसे गायें विस्तीर्ण चरागाहों में विचरती हैं, वैसे इन्द्रियाँ विस्तीर्ण विषयों में। जैसे गायें सुपेय जलों को पीती हैं, वैसे इन्द्रियाँ विषयरसों को। इन इन्द्रिय रूप गायों के श्रेष्ठ ज्ञान और श्रेष्ठ कर्म रूप दूध का सेवन कर निरन्तर शारीरिक और आत्मिक उन्नति सबको प्राप्त करनी चाहिए ॥१२॥ इस दशति में अग्नि की ज्वाला रूप जिह्वा, सब ऋतुओं की रमणीयता, परम पुरुष परमेश्वर की महिमा, माता-पिता के कर्तव्य, ब्रह्मवर्चस एवं बल की प्राप्ति आदि विषयों का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में तृतीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ षष्ठ अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः पवमानः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि पवस꣣ आ꣢सु꣣वो꣢र्ज꣣मि꣡षं꣢ च नः । आ꣣रे꣡ बा꣢धस्व दु꣣च्छु꣡ना꣢म् ॥६२७॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन्, विद्वन् अथवा राजन् ! आप (आयूंषि) हमारे जीवनों को (पवसे) पवित्र करो। (नः) हमारे लिए (ऊर्जम्) बल एवं प्राण को (इषं च) और विज्ञान को (आसुव) चारों ओर से प्रेरित करो, लाओ। (दुच्छुनाम्) दुर्गति को (आरे) दूर (बाधस्व) धकेल दो ॥१॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा की उपासना कर, विद्वान् स्त्री-पुरुषों की और राजा की संगति कर, जीवनों में पवित्रता लाकर, बल, प्राणशक्ति, विज्ञान आदि का संचय कर दुःख, दुर्गति आदि को विनष्ट करें ॥१॥
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छन्द -जगती| देवता -सूर्यः| स्वर - निषादः
वि꣣भ्रा꣢ड्बृ꣣ह꣡त्पि꣢बतु सो꣣म्यं꣢꣫ मध्वायु꣣र्द꣡ध꣢द्य꣣ज्ञ꣡प꣢ता꣣व꣡वि꣢ह्रुतम् । वा꣡त꣢꣯जूतो꣣ यो꣡ अ꣢भि꣣र꣡क्ष꣢ति꣣ त्म꣡ना꣢ प्र꣣जाः꣡ पि꣢पर्ति ब꣣हुधा꣡ वि रा꣢꣯जति ॥६२८॥
पदार्थः(विभ्राट्) सूर्य के समान तेजस्वी परमात्मा (बृहत्) महान्, (सोम्यम्) ज्ञान एवं कर्म रूप सोम से युक्त (मधु) मधुर भक्तिरस को (पिबतु) पान करे और वह (यज्ञपतौ) यजमान को (अविह्रुतम्) अकुटिल (आयुः) जीवन (दधत्) प्रदान करे, (वातजूतः) प्राणायाम से प्रेरित (यः) जो परमात्मा (त्मना) स्वयम् (प्रजाः) प्रजाओं की (अभिरक्षति) रक्षा करता है तथा (पिपर्ति) उन्हें शक्ति से पूर्ण करता है और (बहुधा) सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान् आदि अनेक रूपों में (विराजति) विशेष रूप से शोभित होता है। यहाँ श्लेष से सूर्य के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥२॥
भावार्थःजैसे तेजस्वी सूर्य समुद्र आदि के जल का पान करता है, वैसे तेजस्वी परमेश्वर भक्तजनों के भक्तिरस का पान करता है। जैसे सूर्य दीर्घायुष्य प्रदान करता है, वैसे परमेश्वर अकुटिल जीवन प्रदान करता है। जैसे अपने अन्दर विद्यमान घनीभूत हवाओं से गतिमान् हुआ सूर्य मनुष्यों की रक्षा करता है, वैसे योगियों के प्राणायाम के अभ्यासों द्वारा हृदय में प्रेरित परमेश्वर उन योगीजनों की रक्षा करता है। जैसे सूर्य प्रजाओं का पालन करता है और प्रतिमास विभिन्न रूपों में प्रकट होता है, वैसे परमेश्वर प्रजाजनों का पालन करता तथा उन्हें पूर्ण बनाता है और अनेक रूपों में उपासकों के हृदय में प्रकाशित होता है ॥२॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -सूर्यः| स्वर - धैवतः
चि꣣त्रं꣢ दे꣣वा꣢ना꣣मु꣡द꣢गा꣣द꣡नी꣢कं꣣ च꣡क्षु꣢र्मि꣣त्र꣢स्य꣣ व꣡रु꣢णस्या꣣ग्नेः꣢ । आ꣢प्रा꣣ द्या꣡वा꣢पृथि꣣वी꣢ अ꣣न्त꣡रि꣢क्ष꣣ꣳ सू꣡र्य꣢ आ꣣त्मा꣡ जग꣢꣯तस्त꣣स्थु꣡ष꣢श्च ॥६२९॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य के पक्ष में। (देवानाम्) प्रकाशक सूर्य-किरणों की (चित्रम्) अद्भुत अथवा रंगबिरंगी (अनीकम्) सेना (उद् अगात्) उदय को प्राप्त हुई है, जो (मित्रस्य) शरीर में प्राण की तथा बाहर दिन की, (वरुणस्य) शरीर में अपान की तथा बाहर रात्रि की और (अग्नेः) शरीर में वाणी की तथा बाहर पार्थिव अग्नि की (चक्षुः) प्रकाशक है। (सूर्यः) सूर्य ने (द्यावापृथिवी) द्युलोक और भूमिलोक को तथा (अन्तरिक्षम्) मध्यवर्ती अन्तरिक्षलोक को (आ अप्राः) प्रकाश से परिपूर्ण कर दिया है। वह सूर्य (जगतः) जंगम मनुष्य, पशु, पक्षी आदि का तथा (तस्थुषः) स्थावर वृक्ष, पर्वत आदि का (आत्मा) जीवनाधार है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (देवानाम्) सत्य, अहिंसा आदि दिव्यगुणों की (चित्रम्) चाहने योग्य (अनीकम्) सेना (उद् अगात्) मेरे हृदय में उदित हुई है, जो (मित्रस्य) मैत्री के गुण की, (वरुणस्य) पापनिवारण के गुण की और (अग्नेः) अध्यात्म-ज्योति की (चक्षुः) प्रकाशक है। हे परमात्मसूर्य ! आपने (द्यावापृथिवी) आनन्दमयकोश तथा अन्नमयकोश को और (अन्तरिक्षम्) मध्य के प्राणमय, मनोमय एवं विज्ञानमय कोश को (आ अप्राः) अपने तेज से भर दिया है, अथवा (द्यावापृथिवी) द्युलोक और भूलोक को, तथा (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्षलोक को (आ अप्राः) अपनी कीर्ति से भर दिया है। (सूर्यः) वह सूर्यवत् प्रकाशक आप (जगतः) जंगम के और (तस्थुषः) स्थावर के (आत्मा) अन्तर्यामी हो ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेष और स्वभावोक्ति अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे सूर्य किरणों को बखेर कर स्थावर-जंगम का उपकार करता है, वैसे ही परमेश्वर हृदय में दिव्यगुणों को विकीर्ण कर मनुष्यों का हित सिद्ध करता है ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
आ꣡यं गौः पृश्नि꣢꣯रक्रमी꣣द꣡स꣢दन्मा꣣त꣡रं꣢ पु꣣रः꣢ । पि꣣त꣡रं꣢ च प्र꣣य꣡न्त्स्वः꣢ ॥६३०॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य के पक्ष में। (अयम्) यह (पृश्निः गौः) रंग-बिरंगा सूर्य (आ अक्रमीत्) चारों ओर अक्ष-परिभ्रमण कर रहा है। (पुरः) सामने स्थित हुआ (मातरम्) हमारी मातृभूमि को (असदत्) किरणों द्वारा प्राप्त होता है, (च) और (पितरम्) हमारे पितृतुल्य (स्वः) अन्तरिक्ष को भी (प्रयन्) किरणों द्वारा प्राप्त होता हुआ स्थित है ॥ द्वितीय—भूमण्डल के पक्ष में। (अयम्) यह (पृश्निः) रंग-बिरंगा (गौः) भूमण्डल (आ अक्रमीत्) अपने चारों ओर अक्ष-परिभ्रमण कर रहा है और (पुरः) पश्चिम से पूर्व-पूर्व की ओर (पितरम्) अपने पिता (स्वः) सूर्य के चारों ओर भी (प्रयन्) गति करता हुआ (मातरम्) अन्तरिक्ष रूप माता की गोद में (असदत्) स्थित है। पृथिवी का भ्रमण भी सूर्य के ही महत्त्व को प्रकट करता है, अतः इस पक्ष में भी मन्त्र का देवता सूर्य होने में कोई दोष नहीं आता ॥ तृतीय—परमेश्वर के पक्ष में। (अयम्) यह (पृश्निः) ज्योतिर्मय (गौः) सर्वज्ञ, सर्वव्यापी परमेश्वर (आ अक्रमीत्) शरीर में और ब्रह्माण्ड में चारों ओर गया हुआ है, अर्थात् अन्तर्यामी है, (मातरम्) निश्चयात्मक ज्ञान की जननी बुद्धि के (पुरः) आगे (असदत्) स्थित होता है, (च) और (पितरम्) पालनकर्ता (स्वः) सुख के भोक्ता जीवात्मा को (प्रयन्) प्राप्त होता है ॥ चतुर्थ—जीवात्मा के पक्ष में। (अयम्) यह (पृश्निः) चित्र-विचित्र कर्मसंस्कारों से युक्त (गौः) प्रयत्नशील, विज्ञाता जीवात्मा (आ अक्रमीत्) कर्मों के अनुसार मनुष्य-शरीर को प्राप्त होता है। (पुरः) पहले (मातरम्) माता को अर्थात् माता के गर्भाशय को (असदत्) प्राप्त होता है, (च) और जन्म के अनन्तर (स्वः) विज्ञानप्रकाश से युक्त (पितरम्) पिता को (प्रयन्) प्राप्त होता है ॥ पञ्चम—स्तोता के पक्ष में। (अयम्) यह (पृश्निः) आश्चर्यमय गुणोंवाला (गौः) ज्ञानज्योति से सूर्यवत् भासमान स्तोता (आ अक्रमीत्) चारों ओर पुरुषार्थ करता है, (पुरः) आगे होकर (मातरम्) वेदवाणी रूप माता को (असदत्) प्राप्त करता है, (च) और (स्वः)प्रकाशमान (पितरम्) परमात्मा रूप पिता को (प्रयन्) प्राप्त करने का यत्न करता है ॥ निघण्टु ३।१६ के अनुसार गौ स्तोता का वाचक होता है ॥४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःसूर्य की स्थानान्तर गति नहीं है, वह अपनी धुरी पर ही घूमता है और पृथिवी तथा अन्य ग्रहों-उपग्रहों सोम, मङ्गल, बुध, बृहस्पति आदियों को अपनी किरणों से प्राप्त होकर प्रकाशित करता है। पृथिवी की दो प्रकार की गति है, पहली उसकी अपनी धुरी पर, जिसके द्वारा अहोरात्र बनते हैं, दूसरी अपनी नियत कक्षा में सूर्य के चारों ओर, जिससे संवत्सरचक्र चलता है। परमेश्वर सर्वव्यापक होता हुआ शरीर में स्थित आत्मा, मन और बुद्धि आदियों का तथा ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, चन्द्रमा एवं पृथिवी आदियों का सञ्चालन करता है। जीवात्मा शुभ और अशुभ कर्म के अनुसार माता के गर्भ को प्राप्त करके जन्म ग्रहण करता है और परमात्मा का स्तोता पुरुषार्थी होकर वेदवाणीरूप माता को तथा पिता परमात्मा को प्राप्त करता है ॥४॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
अ꣣न्त꣡श्च꣢रति रोच꣣ना꣢꣫स्य प्रा꣣णा꣡द꣢पान꣣ती꣢ । व्य꣢꣯ख्यन्महि꣣षो꣡ दिव꣢꣯म् ॥६३१॥
पदार्थः(अस्य) इस सूर्य वा परमात्मा की (रोचना) दीप्ति (प्राणात्) प्राण-व्यापार के पश्चात् (अपानती) अपान व्यापार कराती हुई (अन्तः) भूमि पर वा हृदय के अन्दर (चरति) विचरती है। यह (महिषः) महान् सूर्य वा परमात्मा (दिवम्) आकाश को वा जीवात्मा को (व्यख्यत्) प्रकाशित करता है ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजो यह प्राण प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान रूप से शरीर में स्थित हुआ प्राणन, अपानन आदि व्यापार करता है, वह परमेश्वर की ही महिमा से करता है, जैसाकि उपनिषद् के ऋषि ने कहा है—‘परमेश्वर प्राण का भी प्राण है' (केन० १।२)। परमेश्वर से रचित सूर्य भी अपनी किरणों से प्राणियों को प्राण प्रदान करता हुआ प्राणापान आदि क्रियाओं में सहायक होता है, जैसाकि प्रश्नोपनिषद् में कहा है—‘यह सूर्य प्रजाओं का प्राण होकर उदित हो रहा है।’ (प्रश्न० १।८) परमेश्वर ही सूर्य के द्वारा आकाशस्थ पिण्डों को भी प्रकाशित करता है ॥५॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
त्रि꣣ꣳश꣢꣫द्धाम꣣ वि꣡ रा꣢जति꣣ वा꣡क्प꣢त꣣ङ्गा꣡य꣢ धीयते । प्र꣢ति꣣ व꣢स्तो꣣र꣢ह꣣ द्यु꣡भिः꣢ ॥६३२॥
पदार्थःयह सूर्य वा परमात्मा (त्रिंशद् धाम) मास के तीसों दिन-रातों में (वि राजति) विशेष रूप से भासित होता है। उस (पतङ्गाय) अक्ष-परिभ्रमण करनेवाले सूर्य के लिए वा कर्मण्य परमात्मा के लिए अर्थात् उनका गुण-कर्म-स्वरूप वर्णन करने के लिए (वाक्) वाणी (धीयते) प्रयुक्त की जाती है। वह सूर्य और परमात्मा (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन (अह) ही (द्युभिः) किरणों वा तेजों से, सबको प्रकाशित करता है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजैसे सूर्य प्रतिदिन द्युलोक, अन्तरिक्षलोक और भूलोक में प्रकाशित होता है, वैसे ही परमात्मा भी अपनी कृतियों से सर्वत्र यश से भासमान है। उस सूर्य और परमात्मा के गुण-कर्म आदि वर्णन करके लाभ सबको प्राप्त करने उचित हैं ॥६॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
अ꣢प꣣ त्ये꣢ ता꣣य꣡वो꣢ यथा꣣ न꣡क्ष꣢त्रा यन्त्य꣣क्तु꣡भिः꣢ । सू꣡रा꣢य वि꣣श्व꣡च꣢क्षसे ॥६३३॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य के पक्ष में। (विश्वचक्षसे) सर्वप्रकाशक (सूराय) सूर्य के लिए, अर्थात् मानो भय के मारे उसे स्थान देने के लिए (अक्तुभिः) रात्रियों सहित (नक्षत्रा) तारावलियाँ (अप यन्ति) अदृश्य हो जाती हैं, (यथा) जैसे (त्ये) वे, दूसरों के घर में सेंध लगानेवाले (तायवः) चोर, सूर्य के आने पर कहीं छिप जाते हैं ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। जब हृदयाकाश में परमात्मारूप सूर्य उदयोन्मुख होता है, तब (विश्वचक्षसे) सर्वप्रकाशक (सूराय) उस प्रेरक परमात्मा के लिए, अर्थात् मानो भय के मारे उसे स्थान देने के लिए (त्ये तायवः यथा) वे उन परपीडक प्रसिद्ध चोरों की भाँति (नक्षत्रा) सक्रिय काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि (अक्तुभिः) तमोगुण की व्याप्ति रूप रात्रियों सहित (अप यन्ति) हट जाते हैं ॥७॥ इस मन्त्र में उपमा और श्लेष अलङ्कार हैं ॥७॥
भावार्थःजैसे आकाश में सूर्य को उदयोन्मुख देखकर मानो उसकी तीव्र प्रभा से भयभीत हुए तारागण चोरों के समान छिप जाते हैं, वैसे ही तेज के निधि परमेश्वर को हृदयाकाश में उदित होता हुआ देख, उसके दुर्धर्ष प्रताप से त्रस्त हुए काम-क्रोध आदि भाग खड़े होते हैं ॥७॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
अ꣡दृ꣢श्रन्नस्य के꣣त꣢वो꣣ वि꣢ र꣣श्म꣢यो꣣ ज꣢ना꣣ꣳ अ꣡नु꣢ । भ्रा꣡ज꣢न्तो अ꣣ग्न꣡यो꣢ यथा ॥६३४॥
पदार्थः(अस्य) इस सूर्य के अथवा सूर्य के समान भासमान परमात्मा के (केतवः) प्रज्ञापक (रश्मयः) किरणों वा प्रकाश (जनान् अनु) उत्पन्न पदार्थों को वा उपासक मनुष्यों को प्राप्त होकर (भ्राजमानाः) चमकती हुई (अग्नयः यथा) अग्नियों के समान (वि अदृश्रन्) दिखायी देते हैं ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं उत्प्रेक्षा नहीं, क्योंकि काव्यसम्प्रदाय में यथा शब्द उत्प्रेक्षावाचक नहीं माना गया है ॥८॥
भावार्थःसूर्य की किरणें जब स्वच्छ सोने, चाँदी, तांबे, पीतल, काँच आदि पर पड़ती हैं, तब उन पर चमकती हुई वे जलती हुई अग्नि के तुल्य प्रतीत होती हैं। उसी प्रकार मनोभूमि पर पड़ते हुए परमेश्वर के तेज को भी योगी लोग प्रज्वलित अग्नि के तुल्य अनुभव करते हैं ॥८॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
त꣣र꣡णि꣢र्वि꣣श्व꣡द꣢र्शतो ज्योति꣣ष्कृ꣡द꣢सि सूर्य । वि꣢श्व꣣मा꣡भा꣢सि रोच꣣न꣢म् ॥६३५॥
पदार्थःहे (सूर्य) सूर्य के समान तेजस्वी सर्वप्रेरक परमात्मन् ! आप (तरणिः) भवसागर से तरानेवाले, (विश्वदर्शतः) सब मुमुक्षुओं से दर्शन किये जाने योग्य और सर्वद्रष्टा, तथा (ज्योतिष्कृत्) विवेकख्यातिरूप अन्तर्ज्योति को उत्पन्न करनेवाले (असि) हो। और (विश्वम्) समस्त (रोचनम्) चमकीले ब्रह्माण्ड को (आभासि) चारों ओर से प्रकाशित करते हो ॥ भौतिक सूर्य भी (तरणिः) रोगों से तरानेवाला, (विश्वदर्शतः) अपने प्रकाश से सब पदार्थों को दिखानेवाला और (ज्योतिष्कृत्) पृथिवी आदि लोकों में प्रकाश देनेवाला है और (विश्वम्) सब (रोचनम्) प्रदीप्त मङ्गल, बुध, चन्द्रमा आदि ग्रहोपग्रहों को प्रकाशित करता है ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
भावार्थःसूर्य तथा परमात्मा के मन्त्रोक्त गुण-धर्मों को जानकर सूर्य के सेवन द्वारा रोगादि का निवारण करना चाहिए तथा परमात्मा के ध्यान द्वारा दुःखों को दूर कर मोक्ष का आनन्द प्राप्त करना चाहिए ॥९॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
प्र꣣त्य꣢ङ् दे꣣वा꣢नां꣣ वि꣡शः꣢ प्र꣣त्य꣡ङ्ङुदे꣢꣯षि꣣ मा꣡नु꣢षान् । प्र꣣त्य꣢꣫ङ् विश्व꣣꣬ꣳ स्व꣢꣯र्दृ꣣शे꣢ ॥६३६॥
पदार्थःहे परमात्मारूप सूर्य ! आप (देवानाम्) विद्या के प्रकाशक आचार्यों की (विशः) प्रजाओं अर्थात् पढ़े हुए स्नातकों के (प्रत्यङ्) अभिमुख होते हुए और (मानुषान्) अन्य मननशील मनुष्यों के (प्रत्यङ्) अभिमुख होते हुए (उदेषि) उनके अन्तःकरणों में प्रकट होते हो और (विश्वम्) सभी वर्णाश्रमधर्मों का पालन करनेवाले जनों के (प्रत्यङ्) अभिमुख होते हुए आप (दृशे) कर्तव्याकर्तव्य को देखने के लिए (स्वः) ज्ञानरूप ज्योति प्रदान करते हो ॥ भौतिक सूर्य भी (देवानां विशः) पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश रूप देवों की प्रजाओं मिट्टी, पत्थर, पर्वत, नदी, वृक्ष, वनस्पति आदियों के (प्रत्यङ्) अभिमुख होता हुआ और (मानुषान्) मनुष्यों के (प्रत्यङ्) अभिमुख होता हुआ उदय को प्राप्त होता है और (विश्वम्) समस्त सोम, मङ्गल, बुध, बृहस्पति आदि ग्रहोपग्रहों के (प्रत्यङ्) अभिमुख होता हुआ (दृशे) हमारे देखने के लिए (स्वः) ज्योति प्रदान करता है ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘प्रत्यङ्’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास है ॥१०॥
भावार्थःजैसे सूर्य सब पदार्थों को अपनी किरणों से प्राप्त होकर प्रकाशित करता है, वैसे ही जगदीश्वर समस्त चेतन-अचेतनों को प्रकाशित करता है और सबके हृदय में ज्ञान-प्रकाश को सञ्चारित करता है ॥१०॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
ये꣡ना꣢ पावक꣣ च꣡क्ष꣢सा भु꣣रण्य꣢न्तं꣣ ज꣢ना꣣ꣳ अ꣡नु꣢ । त्वं꣡ व꣢रुण꣣ प꣡श्य꣢सि ॥६३७॥
पदार्थःहे (पावक) हृदयों को पवित्र करनेवाले (वरुण) पापनिवारक, मुमुक्षुओं से वरणीय, सर्वश्रेष्ठ सूर्यसदृश परमात्मन् ! आप (भुरण्यन्तम्) शीघ्र पुरुषार्थ करनेवाले जीवात्मा को तथा (जनान्) उपासक जनों को (येन) जिस अद्भुत (चक्षसा) ज्ञान से (अनु) अनुगृहीत करते हो, उस ज्ञान से (त्वम्) आप (पश्यसि) स्वयं भी सब कुछ प्राणियों के शुभाशुभ कर्म आदि को जानते हो ॥ भौतिक सूर्य भी (पावकः) शोधक और (वरुणः) रोगादि का निवारक होता है, तथा वह (जनान्) उत्पन्न प्राणियों को (भुरण्यन्तम्) धारण करनेवाले भूमण्डल को (येन) जिस (चक्षसा) प्रकाश से (अनु) अनुगृहीत करता है, उससे वह (पश्यति) स्वयं भी प्रकाशमान है ॥११॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥११॥
भावार्थःजैसे प्रकाशमान सूर्य अन्यों को प्रकाशित करता है, वैसे ही ज्ञानवान् परमेश्वर अन्यों को ज्ञान देता है ॥११॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
उ꣡द्द्यामे꣢꣯षि꣣ र꣡जः꣢ पृ꣣थ्व꣢हा꣣ मि꣡मा꣢नो अ꣣क्तु꣡भिः꣢ । प꣢श्य꣣ञ्ज꣡न्मा꣢नि सूर्य ॥६३८॥
पदार्थःहे (सूर्य) चराचर में अन्तर्यामी जगदीश्वर ! आप (अक्तुभिः) प्रलय-रात्रियों के साथ (अहा) सृष्टिरूप दिनों को (मिमानः) रचते हुए तथा (जन्मानि) प्राणियों के पूर्वापर जन्मों को (पश्यन्) जानते हुए (पृथु) यशोमय (रजः) लोक (द्याम्) प्रकाशपूर्ण ब्रह्माण्ड को (उद् एषि) सञ्चालित करते हो ॥ भौतिक सूर्य भी (अक्तुभिः) रात्रियों के साथ (अहा) दिनों को (मिमानः) रचता हुआ और (जन्मानि) उत्पन्न पदार्थों को (पश्यन्) प्रकाशित करता हुआ (पृथु) विस्तीर्ण (रजः) लोक (द्याम्) द्यौ में (उदेति) उदित है ॥१२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१२॥
भावार्थःसौर लोक में परमात्मा से सञ्चालित सूर्य ही दिन-रात, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर आदि के चक्र का प्रवर्तन करता है और सबको प्रकाशित करता है। परमात्मा भी प्रलयरात्रि के अनन्तर सृष्टिरूप ब्राह्म दिन को रचता है और मनुष्यों के जन्म-जन्म में किये हुए शुभाशुभ फल प्रदान करता है ॥१२॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
अ꣡यु꣢क्त स꣣प्त꣢ शु꣣न्ध्यु꣢वः꣣ सू꣢रो꣣ र꣡थ꣢स्य न꣣꣬प्त्र्यः꣢꣯ । ता꣡भि꣢र्याति꣣ स्व꣡यु꣢क्तिभिः ॥६३९॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य के पक्ष में। (सूरः) सूर्यः (रथस्य)सौरमण्डलरूप रथ को (नप्त्र्यः) न गिरने देनेवाली (सप्त) सात (शुन्ध्युवः) शोधक किरणों को (अयुक्त) पृथिवी आदि ग्रह-उपग्रहों के साथ युक्त करता है। (स्वयुक्तिभिः) स्वयं युक्त की गयी (ताभिः) उन किरणों से, वह (याति) भूमण्डल आदि के उपकार के लिए चेष्टा करता है ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (सूरः) प्रेरक जीवात्मा (रथस्य) शरीर-रूप रथ को (नप्त्र्यः) न गिरने देनेवाली (शुन्ध्युवः) ज्ञान-शोधक ज्ञानेन्द्रिय, मन और बुद्धि (सप्त) इन सात को (अयुक्त) शरीर-रथ में जोड़ता है और (स्वयुक्तिभिः) स्वयं जोड़ी हुई (ताभिः) उनके द्वारा (याति) जीवन-यात्रा को करता है ॥ तृतीय—परमात्मा के पक्ष में। (सूरः) सूर्य, चन्द्र आदि लोकों को चलानेवाले परमात्मा ने (रथस्य) ब्रह्माण्डरूप रथ को (नप्त्र्यः) न गिरने देनेवाली (सप्त) सात (शुन्ध्युवः) शुद्ध भूमियों को अर्थात् भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् इन क्रमशः ऊपर-ऊपर विद्यमान सात लोकों को (अयुक्त) कार्य में नियुक्त किया है (स्वयुक्तिभिः) स्वयं नियुक्त की हुई उन सात भूमियों अर्थात् लोकों से, वह (याति) ब्रह्माण्ड-सञ्चालन के व्यापार को कर रहा है ॥१३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१३॥
भावार्थःसूर्य सात रंग की किरणों से सौरमण्डल का, जीवात्मा मन, बुद्धि तथा ज्ञानेन्द्रियरूप सात तत्त्वों से शरीर का और परमेश्वर स्वरचित सात लोकों से ब्रह्माण्ड का सञ्चालन करता है ॥१३॥
काण्ड -आरण्यं काण्डम्| गान -आरण्य गान| गानपर्व -
छन्द -गायत्री| देवता -सूर्यः| स्वर - षड्जः
स꣣प्त꣡ त्वा꣢ ह꣣रि꣢तो꣣ र꣢थे꣣ व꣡ह꣢न्ति देव सूर्य । शो꣣चि꣡ष्के꣢शं विचक्षण ॥६४०॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। हे (देव) दिव्यशक्ति-सम्पन्न, (विचक्षण) विविध ज्ञानों से युक्त (सूर्य) शरीररथ को भली-भाँति चलानेवाले जीवात्मन् ! (शोचिष्केशम्) तेजरूप केशोंवाले (त्वा) तुझे (सप्त हरितः) मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय रूप सात घोड़े (रथे) शरीररूप रथ में (वहन्ति) वहन करते हैं ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। हे (देव) दानादिगुण-युक्त, दिव्यगुण-कर्म-स्वभाव, (विचक्षण) सर्वद्रष्टा, (सूर्य) शुभ मार्ग में भली-भाँति प्रेरित करनेवाले परमात्मन् ! (शोचिष्केशम्) ज्ञानरश्मिरूप केशोंवाले (त्वा) तुझ परम पुरुष को (सप्त हरितः) गायत्री आदि सात छन्दों से युक्त सात प्रकार की वेदवाणियाँ (रथे) उपासक के रमणीय हृदय में (वहन्ति) पहुँचाती हैं ॥ भौतिक सूर्य भी (देवः) प्रकाशमान तथा प्रकाशक, (विचक्षणः) विविध पदार्थों का दर्शन करानेवाला और (शोचिष्केशः) किरणरूप केशोंवाला है। उसे (सप्त) सात (हरितः) दिशाएँ (रथे) आकाशरूप रथ में बैठाकर (वहन्ति) यात्रा कराती हैं ॥ यहाँ सूर्य का शिशु होना तथा दिशाओं का माता होना ध्वनित हो रहा है। जैसे माताएँ शिशु को बच्चागाड़ी में बैठाकर सैर कराती हैं, वैसे ही दिशाएँ सूर्य को आकाश-रथ में बैठाकर घुमाती हैं ॥ दिशाएँ चार, पाँच, छः, सात, आठ, दस आदि विभिन्न संख्यावाली सुनी जाती हैं। ‘सात दिशाएँ हैं, नाना सूर्य हैं’ (ऋ० ९।११४।३) इस श्रुति के अनुसार दिशाओं की सात संख्या भी प्रमाणित होती है। चार पूर्व आदि हैं, अधः, ऊर्ध्वा मिलकर छह होती हैं और सातवीं मध्य दिशा है। इस प्रकार सात संख्या पूरी होती है ॥१४॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। शोचियों में केशों का आरोप शाब्द तथा सूर्य में पुरुष का आरोप आर्थ होने से एकदेशविवर्ती रूपक भी है ॥१४॥
भावार्थःजैसे किसी प्रतापी पुरुष को सात घोड़े रथ में वहन करें, वैसे ही किरण-रूप केशोंवाले सूर्य-रूप पुरुष को दिशाएँ आकाश-रथ में तथा तेज-रूप केशोंवाले जीवात्मा-रूप पुरुष को इन्द्रियरूप घोड़े शरीर-रथ में और ज्ञान-रूप केशोंवाले परमात्मा-रूप पुरुष को वेदों के सात छन्द उपासक के हृदय-रथ में वहन करते हैं ॥१४॥ इस दशति में अग्नि नामक परमेश्वर से पवित्रता, दुःख-विनाश आदि की प्रार्थना होने से और सूर्य नाम से भौतिक सूर्य, जीवात्मा एवं परमात्मा का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में तृतीय अर्ध की पञ्चम दशति समाप्त ॥ षष्ठ अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥ यह षष्ठ प्रपाठक और षष्ठ अध्याय समाप्त हुआ ॥
महानाम्न्यार्चिकः
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काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
वि꣣दा꣡ म꣢घवन् वि꣣दा꣢ गा꣣तु꣢꣯मनु꣢꣯शꣳसिषो꣣ दि꣡शः꣢ । शि꣡क्षा꣢ शचीनां पते पूर्वी꣣णां꣡ पुरू꣢वसो ॥६४१
पदार्थःहे (मघवन्) ज्ञानरूप ऐश्वर्य के धनी परमात्मन् ! आप (विदाः) हमें जानिए, (गातुम्) हमारे आचरण को (विदाः) जानिए, (दिशः) गन्तव्य दिशाओं का (अनुशंसिषः) उपदेश कीजिए। हे (शचीनां पते) ज्ञानों और कर्मों के अधिपति ! आप हमें भी (शिक्ष) ज्ञान और कर्म प्रदान कीजिए। हे (पुरुवसो) प्रचुर धनवाले ! आप (पूर्वीणाम्) श्रेष्ठ दानों के स्वामी हैं, हमें भी उन दानों का पात्र बनाइए ॥१॥ इस मन्त्र में अनेक क्रियाओं का एक कारक से योग होने के कारण दीपक अलङ्कार है। ‘विदा’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास है। ‘पूर्वी, पुरूव’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा से सब मनुष्यों को कर्तव्यज्ञान और कर्मसम्पति प्राप्त करके, पुरुषार्थ से धन कमा कर सदाचारपूर्वक समृद्ध जीवन बिताना चाहिए ॥१॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣣भि꣢꣫ष्ट्वम꣣भि꣡ष्टि꣢भिः꣣ स्वा꣢ऽ३र्न्ना꣢ꣳशुः । प्र꣡चे꣢तन꣣ प्र꣡चे꣢त꣣ये꣡न्द्र꣢ द्यु꣣म्ना꣡य꣢ न इ꣣षे꣢ ॥६४२
पदार्थःहे परमात्मन् ! आप (आभिः) इन हमसे माँगी गयी (अभिष्टिभिः) अभीष्ट सिद्धियों से, हमें कृतार्थ कीजिए। आप (स्वः न) सूर्य के समान (अंशुः) अंशुमाली हैं। हे (प्रचेतन) प्रकृष्ट चेतनावाले जागरूक परमेश्वर ! आप हमें (प्रचेतय) प्रकृष्ट चेतनावाला जागरूक बनाइए। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशालिन् ! आप (नः) हमें (द्युम्नाय) धन, यश और तेज के लिए, तथा (इषे) अन्न, रस और विज्ञान के लिए, पुरुषार्थी कीजिए ॥२॥ इस मन्त्र में ‘प्रचेत’ की आवृत्ति में यमक अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की संगति से हम अध्यात्म-ज्योति से प्रकाशमान, जागरूक, धनवान्, अन्नवान्, तेजस्वी, यशस्वी और विज्ञानवान् होवें ॥२॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ए꣣वा꣢꣫ हि श꣣क्रो꣢ रा꣣ये꣡ वाजा꣢꣯य वज्रिवः । श꣡वि꣢ष्ठ वज्रिन्नृ꣣ञ्ज꣢से꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठ वज्रिन्नृ꣣ञ्ज꣢स꣣ । आ꣡ या꣢हि꣣ पि꣢ब꣣ म꣡त्स्व꣢ ॥६४३
पदार्थःहे परमैश्वर्यशालिन् इन्द्र परमात्मन् ! आप (एव हि) सचमुच ही (शक्रः) शक्तिशाली हैं। हे (वज्रिवः) वज्रधर के समान शत्रुविदारक ! हमें (राये) अध्यात्म-सम्पदा और (वाजाय) शारीरिक एवं आत्मिक बल का पात्र बनाओ। हे (शविष्ठ) बलिष्ठ ! हे (वज्रिन्) पापों पर वज्र-प्रहार करनेवाले ! आप (ऋञ्जसे) हमें सद्गुणों के अलङ्कारों से अलङ्कृत कीजिए। हे (मंहिष्ठ) अतिशय दानशील ! हे (वज्रिन्) ओजस्वी ! आप, हमें (ऋञ्जसे) परिपक्व करके ओजस्वी बना दीजिए। हे भगवन् ! (आ याहि) आइए, (पिब) हमारे श्रद्धारस का पान कीजिए, (मत्स्व) हमें कर्तव्यपरायण देखकर प्रसन्न होइए ॥३॥ इस मन्त्र में ‘ष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे’ की आवृत्ति में यमकालङ्कार है। ‘वज्रि’ की तीन बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है। ‘आयाहि, पिब, मत्स्व’ इन अनेक क्रियाओं का एक कारक के साथ योग होने के कारण दीपक अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजो परमेश्वर सब कर्मों में समर्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी, सबसे बड़ा दानी, पापादि का विनाशक और गुणों से अलङ्कृत करनेवाला है, उसमें सबको श्रद्धा करनी चाहिए ॥३॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
वि꣣दा꣢ रा꣣ये꣢ सु꣣वी꣢र्यं꣣ भ꣢वो꣣ वा꣡जा꣢नां꣣ प꣢ति꣣र्व꣢शा꣣ꣳ अ꣡नु꣢ । म꣡ꣳहिष्ठ वज्रिन्नृ꣣ञ्ज꣢से꣣ यः꣡ शवि꣢꣯ष्ठः꣣ शू꣡रा꣢णाम् ॥६४४
पदार्थःहे जगदीश्वर ! आप (राये) विद्या, आरोग्य, धन, स्वराज्य, चक्रवर्ती राज्य आदि ऐश्वर्य के लिए तथा मोक्ष-रूप ऐश्वर्य के लिए हमें (सुवीर्यम्) उत्कृष्ट शारीरिक तथा आत्मिक बल (विदाः) प्राप्त कराइए। आप (वाजानाम्) बलों के (पतिः) अधीश्वर (भवः) हैं। (वशान्) आपकी कामना करनेवाले, आपकी प्रीति के अधीन हमें (अनु) अनुगृहीत कीजिए। हे (मंहिष्ठ) सबसे बड़े दानी, हे (वज्रिन्) ओजस्वी परमेश्वर ! आप (ऋञ्जसे) हमें ओज आदि गुणों से अलङ्कृत कीजिए, (यः) जो आप (शूराणाम्) शूरवीरों में (शविष्ठः) सबसे अधिक बली हैं ॥४॥
भावार्थःजो शरीर और आत्मा से बलवान् है, वही ऐश्वर्य प्राप्त करता है। अतः बलिष्ठ परमेश्वर के समान हम भी बलवान् बनें ॥४॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
यो꣢꣯ मꣳहि꣢꣯ष्ठो मघोनामꣳशुर्न शोचिः । चि꣡कि꣢त्वो अ꣣भि꣡ नो꣢ न꣣ये꣡न्द्रो꣢ विदे꣢꣯ तमु꣢꣯ स्तुहि ॥६४५
पदार्थः(यः) जो आप (मघोनाम्) धनियों में (मंहिष्ठः) सबसे अधिक दानी हैं और (अंशुः न) सूर्यकिरण के समान (शोचिः) तेजस्वी हैं, वह, हे (चिकित्वन्) ज्ञानी, जागरूक परमात्मन् ! आप (नः अभि) हमारी ओर भी (नय) इन दान, तेज, ज्ञान, जागरूकता आदि को लाइए। हे मनुष्य ! (इन्द्रः) परमेश्वर (विदे) उपकार करना जानता है, (तम् उ) उसी को (स्तुहि) स्तुति से सम्मानित कर ॥५॥ इस मन्त्र में ‘अंशुः न शोचिः’ में उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजो जगदीश्वर परम दानी, परम तेजस्वी, परम विद्वान्, परम जागरूक और परम परोपकारी है, उसकी उपासना करके सबको दानी, तेजस्वी, विद्वान्, जागरूक और परोपकारी बनना चाहिए ॥५॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ई꣢शे꣣ हि꣢ श꣣क्र꣢꣫स्तमू꣣त꣡ये꣢ हवामहे꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡प꣢राजितम् । स꣡ नः꣢ स्व꣣र्ष꣢द꣣ति द्वि꣢षः꣣ क्र꣢तु꣣श्छ꣡न्द꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥६४६
पदार्थः(शक्रः) शक्तिशाली इन्द्र परमेश्वर (हि) निश्चय ही (ईशे) सकल जगत् का अधीश्वर है। (तम्) उसे, हम (ऊतये) रक्षा के लिए (हवामहे) पुकारते हैं। कैसे परमेश्वर को? (जेतारम्) जो सब वस्तुओं को जीत लेनेवाला है, तथा (अपराजितम्) जो स्वयं किसी से पराजित नहीं होता। (सः) वह परमेश्वर (नः) हमें (द्विषः) आन्तरिक तथा बाह्य शत्रु से (अति स्वर्षत्) पार करे। (ऋतुः) ज्ञान, कर्म, शिव संकल्प और यज्ञ, (छन्दः) गायत्री आदि छन्द, (ऋतम्) सत्य और (बृहत्) बृहत् नामक साम हमारे उपकारक हों ॥६॥ ‘त्वामिद्धि हवामहे’ (साम २३४) इस ऋचा पर गाया जानेवाला साम बृहत् साम कहलाता है ॥६॥
भावार्थःविजेता, अपराजित परमात्मा का आश्रय लेकर उसके उपासक भी विजयी तथा अपराजित हो जाते हैं ॥६॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣢न्द्रं꣣ ध꣡न꣢स्य꣣ सा꣡त꣢ये हवामहे꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡प꣢राजितम् । स꣡ नः꣢ स्वर्ष꣣द꣢ति꣣ द्वि꣢षः꣣ स꣡ नः꣢ स्वर्ष꣣द꣢ति꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥६४७
पदार्थः(इन्द्रम्) शूरवीर परमैश्वर्यशाली परमेश्वर को हम योगाभ्यासी जन (धनस्य) विवेकख्यातिरूप ऐश्वर्य की (सातये) प्राप्ति के लिए (हवामहे) पुकारते हैं। कैसे परमेश्वर को? (जेतारम्) जो शत्रुओं और विघ्नों का विजेता, तथा (अपराजितम्) करोड़ों भी शत्रुओं एवं विघ्नों से न हारनेवाला है। (सः) वह विजेता परमेश्वर (नः) हमें (द्विषः) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रूप पञ्च क्लेशों से (अति स्वर्षत्) पार कर दे, (सः) वह अपराजित परमेश्वर (नः) हमें (द्विषः) व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्त्व इन चित्तविक्षेपरूप योगमार्ग के विघ्नों से (अति स्वर्षत्) पार कर दे ॥७॥
भावार्थःपरमेश्वर की ही कृपा से योगाभ्यासी जन योग के विघ्नों को जीतकर विवेकख्याति द्वारा मोक्ष प्राप्त करने योग्य होते हैं ॥७॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
पू꣡र्व꣢स्य꣣ य꣡त्ते꣢ अद्रिवो꣣ꣳऽशु꣢꣯र्मदा꣢꣯य । सु꣣म्न꣡ आ धे꣢꣯हि नो वसो पू꣣र्तिः꣡ श꣢विष्ठ शस्यते । व꣣शी꣢꣫ हि श꣣क्रो꣢ नू꣣नं꣡ तन्नव्य꣢꣯ꣳ सं꣣न्य꣡से꣢ ॥६४८
पदार्थःहे (अद्रिवः) मेघों के स्वामिन् अथवा धर्ममेघ समाधि में सहायक परमेश्वर ! (यत्) क्योंकि (पूर्वस्य) श्रेष्ठ (ते) आपकी (अंशुः) तेज की किरण (मदाय) आनन्द के लिए होती है, इस कारण, हे (वसो) निवासक ! (नः) हमें (सुम्ने) मोक्ष के आनन्द में (आ धेहि) स्थित करो। हे (शविष्ठ) बलिष्ठ परमात्मन् ! (पूर्तिः) आपसे उत्पन्न की हुई पूर्णता (शस्यते) सबसे प्रशंसा की जाती है। (शक्रः) सर्वशक्तिमान् आप (नूनम्) आज (वशी हि) मेरे वशकर्ता हो गये हो, (तत्) इसलिए, आपके वशवर्ती हुआ मैं (नव्यम्) नवीन प्रतीत होनेवाली पुत्रेषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा रूप लौकिक चमक-दमक का (संन्यसे) परित्याग करता हूँ, परित्याग करके संन्यासाश्रम में प्रवेश करता हूँ और उस आश्रम में रहता हुआ (नव्यम्) स्तुति करने योग्य इन्द्र परमेश्वर को (संन्यसे) भली-भाँति हृदय में धारण करता हूँ, श्लेष से यह दूसरा अर्थ भी जानना चाहिए ॥८॥
भावार्थःभोग-विलास देखने में ही रमणीय प्रतीत होते हैं। वे लोग धन्य हैं, जो उनका परित्याग करके, संन्यासाश्रम में प्रविष्ट होकर, निष्काम लोकसेवा के व्रत को स्वीकार कर ब्रह्म में लीन रहते हैं ॥८॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
प्र꣣भो꣢꣯ जन꣢꣯स्य वृत्रह꣣न्त्स꣡मर्ये꣢षु ब्रवावहै । शू꣢रो꣣ यो꣢꣫ गोषु꣣ ग꣡च्छ꣢ति꣣ स꣡खा꣢ सु꣣शे꣢वो꣣ अ꣡द्व꣢युः ॥६४९
पदार्थःहे (प्रभो) जगदीश्वर ! हे (जनस्य) मुझ उपासक के (वृत्रहन्) पापहर्ता ! आओ, मैं और तुम (अर्येषु) प्राप्तव्य आध्यात्मिक ऐश्वर्यों के विषय में (सं ब्रवावहै) संवाद करें कि कौन-कौन-से ऐश्वर्य मुझे प्राप्त करने तथा तुम्हें देने हैं, (शूरः) विघ्नों के वध में शूर (यः) जो तुम (गोषु) स्तोताओं के हृदयों में (गच्छति) पहुँचते हो और जो तुम (सखा) स्तोताओं के सखा, (सुशेवः) उत्कृष्ट सुख के दाता तथा (अद्वयुः) सामने कुछ और पीछे कुछ इस प्रकार के दोहरे आचरण से रहित अर्थात् सदा हितकर ही होते हो ॥९॥
भावार्थःउपासकों का हार्दिक प्रेम देखकर उनके साथ मानो संवाद करता हुआ परमेश्वर उनका सखा, विघ्नों को हरनेवाला तथा मोक्ष के आनन्द को देनेवाला हो जाता है ॥९॥
काण्ड --| गान -?| गानपर्व -
छन्द -पदपङ्क्तिः| देवता -लिङ्गोक्ताः| स्वर - पञ्चमः
ए꣣वा꣢ह्येऽ३ऽ३ऽ३व꣡ । ए꣣वा꣡ ह्य꣢ग्ने । ए꣣वा꣡ही꣢न्द्र । ए꣣वा꣡ हि पू꣢꣯षन् । ए꣣वा꣡ हि दे꣢꣯वाः ॐ ए꣣वा꣡हि दे꣢꣯वाः ॥६५०
पदार्थःहे इन्द्र परमेश्वर ! (एव हि एव) सचमुच आप ऐसे ही पूर्वोक्त गुणों वाले हो। हे (अग्ने) अग्रनायक इन्द्र परमात्मन् ! (एव हि) सचमुच आप ऐसे ही हो। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन्, शत्रुविदारक, विद्याविवेक आदि के प्रकाशक जगदीश्वर ! (एव हि) सचमुच आप पूर्वोक्त गुणों से विशिष्ट हो। हे (पूषन्) पुष्टिप्रदाता जगत्पते ! (एव हि) सचमुच आप पूर्वोक्त गुणों से युक्त हो। हे (देवाः) इन्द्र परमेश्वर की अधीनता में रहनेवाले दिव्यगुणविशिष्ट विद्वानो ! (एव हि) सचमुच तुम इन्द्र परमेश्वर की प्रजा हो ॥१०॥ अन्तिम ‘पुरीष पद’ भी इन्द्र-विषयक ही है, जैसा कि शतपथकार कहते हैं—‘क्योंकि इन्द्र में ही सब देवता स्थित हैं, अतः इन्द्र को सर्वदेवतात्मक कहा गया है’ (श० १।६।३।२२) ॥१०॥
भावार्थःइन्द्र परमात्मा में सचमुच मघवत्व, शचीपतित्व, प्रचेतनत्व, शक्रत्व, मंहिष्ठत्व, शविष्ठत्व, वज्रित्व, जेतृत्व आदि वेदोक्त गुण विद्यमान हैं, जिनका सबको अनुकरण करना चाहिए ॥१०॥
उत्तरार्चिकः
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣡पा꣢स्मै गायता नरः꣣ प꣡व꣢माना꣣ये꣡न्द꣢वे । अ꣣भि꣢ दे꣣वा꣡ꣳ इय꣢꣯क्षते ॥६५१॥
पदार्थःहे (नरः) मनुष्यो ! तुम (देवान्) अहिंसा, सत्य, न्याय आदि दिव्यगुणों को (इयक्षते) प्रदान करने की इच्छावाले (अस्मै) इस (पवमानाय) पवित्रता देनेवाले, (इन्दवे) आनन्दरस से भिगोनेवाले परमात्मा के लिए (उपगायत) समीप होकर स्तुतिगीत गाया करो ॥१॥
भावार्थःसब स्त्री-पुरुषों को चाहिए कि जगदीश के स्तुतिगीतों का कीर्तन कर और उससे प्रेरणा पाकर अपनी उन्नति करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣢ ते꣣ म꣡धु꣢ना꣣ प꣡योऽथ꣢꣯र्वाणो अशिश्रयुः । दे꣣वं꣢ दे꣣वा꣡य꣢ देव꣣यु꣢ ॥६५२॥
पदार्थःहे पवित्रतादायक सोम परमात्मन् ! (अथर्वाणः) अचञ्चल चित्तवृत्तिवाले उपासक जन (ते) तेरे (मधुना) मधुर आनन्द-रस के साथ (पयः) अपने विशुद्ध ज्ञान और कर्म के दूध को (अभि अशिश्रयुः) मिलाते हैं। (देवयु) दिव्यगुणयुक्त परमेश्वर से प्रीति चाहनेवाला सारा ही भगवद्भक्त-समाज (देवाय) दिव्य प्रकाश पाने के लिए (देवम्) तुझ प्रकाशदाता की उपासना करता है ॥२॥ इस मन्त्र में ‘देवाय, देवयु’ में छेकानुप्रास तथा ‘देवं, देवा, देव’ में वृत्त्यनुप्रास होने से दोनों अलङ्कारों का एकाश्रयानुप्रवेशरूप संकर है ॥२॥
भावार्थःज्ञान और कर्म से समन्वित भक्ति ही सब मनुष्यों का कल्याण करती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ नः꣢ पवस्व꣣ शं꣢꣫ गवे꣣ शं꣡ जना꣢꣯य꣣ श꣡मर्व꣢꣯ते । श꣡ꣳ रा꣢ज꣣न्नो꣡ष꣢धीभ्यः ॥६५३॥
पदार्थःहे (राजन्) विश्व के सम्राट् परमात्मन् ! (सः) वह प्रसिद्ध आप (नः) हमारे (गवे) गाय, वाणी और इन्द्रियों आदि के लिए (शम्) कल्याण को,(जनाय) माता, पिता, पुत्र, पौत्र, पत्नी, सेवक आदि जनों के लिए (शम्) कल्याण को, (अर्वते) घोड़े, प्राण और शत्रुहिंसक वीर के लिए (शम्) कल्याण को, (ओषधीभ्यः) धान, जौ, गेहूँ, लता, गुल्म, वृक्ष, वनस्पति आदियों के लिए और दोषनिवारक शुद्ध चित्तवृत्तियों के लिए (शम्) कल्याण को (पवस्व) बरसाइये ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से सबको शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रिय कल्याण प्राप्त करना योग्य है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
द꣡वि꣢द्युतत्या रु꣣चा꣡ प꣢रि꣣ष्टो꣡भ꣢न्त्या कृ꣣पा꣢ । सो꣡माः꣢ शु꣣क्रा꣡ गवा꣢꣯शिरः ॥६५४॥
पदार्थः(दविद्युतत्या) अतिशय देदीप्यमान (रुचा) कान्ति तथा (परिष्टोभन्त्या) चारों ओर से सहारा देनेवाली (कृपा) शक्ति के साथ (गवाशिरः) उपासक के आत्मा में आश्रित (सोमाः) ब्रह्मानन्द-रस (शुक्राः) अत्यन्त पवित्रकारी हो जाते हैं ॥१॥
भावार्थःजब ब्रह्मानन्द-रस उपासक को प्राप्त होते हैं, तब वे उसके आत्मा को स्थायी रूप से अतिशय निर्मल कर देते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
हि꣣न्वानो꣢ हे꣣तृ꣡भि꣢र्हि꣣त꣡ आ वाजं꣢꣯ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्रमीत् । सी꣡द꣢न्तो व꣣नु꣡षो꣢ यथा ॥६५५॥
पदार्थः(हेतृभिः) प्रेरक गुरुजनों के द्वारा (हितः) शिष्य के आत्मा में स्थापित किया हुआ, (हिन्वानः) तृप्ति प्रदान करता हुआ, (वाजी) बलवान् परमात्मा-रूप सोम (वाजम्) अन्तःकरण में चल रहे देवासुरसंग्राम पर (आ अक्रमीत्) चारों ओर से आक्रमण कर देता है, (यथा) जैसे (सीदन्तः) प्रयाण करते हुए (वनुषः) हिंसक योद्धा लोग [शत्रुओं पर आक्रमण करते हैं।] ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःहृदय में धारण किया हुआ परमेश्वर आन्तरिक देवासुरसंग्राम में अपने उपासक को सदा विजय दिलाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ऋ꣣ध꣡क्सो꣢म स्व꣣स्त꣡ये꣢ संजग्मा꣣नो꣢ दि꣣वा꣡ क꣢वे । प꣡व꣢स्व꣣ सू꣡र्यो꣢ दृ꣣शे꣢ ॥६५६॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। हे (कवे) बुद्धिमान्, दूरदर्शी (सोम) चन्द्रमा के समान उन्नतिशील जीवात्मन् ! तू (दिवा) परमात्मा की ज्योति से (संजग्मानः) संयुक्त होता हुआ (स्वस्तये) उत्कृष्ट जीवन के लिए (ऋधक्) उन्नति प्राप्त कर। (सूर्यः) सूर्य के समान प्रकाशमान होकर (दृशे) मुक्ति का मार्ग देखने के लिए (पवस्व) प्रयत्न कर ॥ द्वितीय—चन्द्रमा के पक्ष में। हे (कवे) पृथिवी की परिक्रमा करनेवाले (सोम) चन्द्रमा ! तू (दिवा) सूर्य के प्रकाश से (संजग्मानः) संयुक्त होता हुआ (स्वस्तये) हमारे सुख के लिए (ऋधक्) एक-एक कला से प्रतिदिन बढ़ता चल। पूर्णिमा को (सूर्यः) सूर्य के समान सम्पूर्ण प्रभामण्डलवाला होकर (दृशे) हमारे देखने के लिए (पवस्व) भूमण्डल पर अपनी चांदनी को फैला ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘सूर्यः’ अर्थात् ‘सूर्य के सदृश’ में लुप्तोपमा है। चन्द्रमा के पक्ष में जड़ वस्तु में चेतनवत् व्यवहार आलङ्कारिक है ॥३॥
भावार्थःजैसे सूर्य से चन्द्रमा प्रकाशित होता है, वैसे ही परमात्मारूप सूर्य से हम प्रकाशित होते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानस्य ते कवे꣣ वा꣢जि꣣न्त्स꣡र्गा꣢ असृक्षत । अ꣡र्व꣢न्तो꣣ न꣡ श्र꣢व꣣स्य꣡वः꣢ ॥६५७॥
पदार्थःहे (कवे) वेदकाव्य के कवि ! हे (वाजिन्) बली परमेश्वर ! (पवमानस्य ते) तुझ पवित्र करनेवाले की (सर्गाः) आनन्द-धाराएँ (श्रवस्यवः) हमें यशस्वी बनाना चाहती हुई (असृक्षत) छूट रही हैं, (न) जैसे (अर्वन्तः) घोड़े [घुड़साल से छूटते हैं।] घोड़े भी कैसे होते हैं? (श्रवस्यवः) घासादि भोज्य को चाहनेवाले। अभिप्राय यह है कि जैसे बाहर जाकर चरागाहों में घास चरना चाहनेवाले घोड़े घुड़साल में से उत्सुकतापूर्वक निकलते हैं, ऐसे ही आपकी आनन्दधाराएँ आपमें से निकलकर हमें आनन्दित कर रही हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘श्रवस्यवः’ में श्लेष है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के उपासक लोग परमात्मा से अपने आत्मा में प्रवेश करते हुए महान् आनन्द के झरनों को साक्षात् अनुभव करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣢च्छा꣣ को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣢त꣣म꣡सृ꣢ग्रं꣣ वा꣡रे꣢ अ꣣व्य꣡ये꣢ । अ꣡वा꣢वशन्त धी꣣त꣡यः꣢ ॥६५८॥
पदार्थःप्रथम—सोमौषधिरस के पक्ष में। मैं (मधुश्चुतम्) मधुस्रावी सोमरस को (कोशम् अच्छ) द्रोणकलश में पहुँचाने के लिए (अव्यवे वारे) भेड़ के बालों से बनी हुई छन्नी में (असृग्रम्) छोड़ता हूँ। मेरी (धीतयः) अंगुलियाँ (अवावशन्त) सोमरस को छानने में प्रवृत्त हो रही हैं। द्वितीय—ब्रह्मानन्द के पक्ष में। मैं (मधुश्चुतम्) माधुर्यस्रावी ब्रह्मानन्दरूप सोमरस को (कोशम् अच्छ) मन, बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियरूप विज्ञानमय कोश में पहुँचाने के लिए (अव्यये वारे) अविनश्वर तथा कामक्रोधादि शत्रुओं का निवारण करनेवाले आत्मा में (असृग्रम्) छोड़ता हूँ। मेरी (धीतयः) स्तुतियाँ (अवावशन्त) प्रभु के गीतों का गान कर रही हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे सोमौषधि का रस छन्नी के माध्यम से द्रोणकलश में प्रविष्ट कराया जाता है, वैसे ही ब्रह्मानन्दरस को आत्मा के माध्यम से सभी मन-बुद्धि आदियों में प्रविष्ट कराना चाहिए, जिससे हमारे दर्शन, श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि सब व्यवहार ब्रह्मानन्दमय हो जाएँ ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡च्छा꣢ समु꣣द्र꣢꣫मिन्द꣣वो꣢ऽस्तं꣣ गा꣢वो꣣ न꣢ धे꣣न꣡वः꣢ । अ꣡ग्म꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ यो꣢नि꣣मा꣢ ॥६५९॥
पदार्थः(इन्दवः) ब्रह्मानन्द-रस (समुद्रम् अच्छ) हृदय-समुद्र की ओर बहते हुए (ऋतस्य) सत्य के (योनिम्) गृहरूप मेरे अन्तरात्मा को (आ अग्मन्) प्राप्त हुए हैं। किस प्रकार? ( न) जैसे (धेनवः) दूध से तृप्ति प्रदान करनेवाली (गावः) गौएँ (अस्तम्) गोशाला को प्राप्त होती हैं ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे गौएँ गोशाला को प्राप्त करके अपने दूध आदि से लोगों को तृप्त करती हैं, वैसे ही ब्रह्मानन्द हृदय और आत्मा में प्रविष्ट होकर उपासकों को तृप्ति प्रदान करते हैं ॥३॥ प्रथम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्न꣣ आ꣡ या꣢हि वी꣣त꣡ये꣢ गृणा꣣नो꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये । नि꣡ होता꣢꣯ सत्सि ब꣣र्हि꣡षि꣢ ॥६६०॥
पदार्थःप्रथम—यज्ञाग्नि के पक्ष में। अग्निहोत्र के माध्यम से परमात्मा के तेज को अपने हृदय में प्रदीप्त करना चाहता हुआ उपासक यज्ञाग्नि का आह्वान कर रहा है। हे (अग्ने) यज्ञाग्नि ! तू (आयाहि) हमारे यज्ञ में आ। किसलिए? (वीतये) हवियों को खाने के लिए। (गृणानः) मन्त्रपाठ द्वारा हमसे स्तुति किया जाता हुआ अथवा हमारे रोग, पाप आदि को निगलता हुआ तू (हव्यदातये) दातव्य तेज आदि को देने के लिए, अथवा होमी हुई सुगन्धित, मधुर, पुष्टिप्रद तथा रोगनाशक गुणों से युक्त हवियों को सूक्ष्म करके वायुमण्डल में फैलाने के लिए आ। (होता) होमे हुए द्रव्यों का स्वीकार करनेवाला तथा आरोग्य, दीर्घायुष्य आदि को देनेवाला तू (बर्हिषि) यज्ञवेदि के आकाश में (नि सत्सि) बैठ। यहाँ अचेतन यज्ञाग्नि में चेतन के समान व्यवहार आलङ्कारिक है ॥ द्वितीय—आत्मोद्बोधन के पक्ष में। हे (अग्ने) मेरे अन्तरात्मन् ! तू (आयाहि) कर्मभूमि में पदार्पण कर। किसलिए? (वीतये) कर्म करने के लिए। (गृणानः) कर्मयोग का उपदेश करता हुआ तू (हव्यदातये) परोपकारार्थ आत्मोसर्ग करने के लिए आ। (होता) राष्ट्र के संगठन के लिए लोगों का आह्वान करनेवाला तू (बर्हिषि) उच्चपद पर (नि सत्सि) बैठ ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःसबको चाहिए कि ऋतु के अनुकूल हवियों से अग्निहोत्र द्वारा वायुमण्डल को सुगन्धित तथा रोग के कीटाणुओं से रहित करके और यज्ञाग्नि के समान तीव्र तेज को तथा परमात्मा की ज्योति को अपने अन्तःकरण में धारण करके भौतिक एवम् आध्यात्मिक सम्पत्ति प्राप्त करें। साथ ही ‘मेरे दाहिने हाथ में कर्म है तो बाएँ हाथ में विजय रखी हुई है।’ अथ० ७।५२।८ इस वैदिक सन्देश को मुखर करके अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर जनहित के महान् कर्म करने चाहिएँ और राष्ट्र के हितार्थ अपना बलिदान देने से भी नहीं हिचकना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
तं꣡ त्वा꣢ स꣣मि꣡द्भि꣢रङ्गिरो घृ꣣ते꣡न꣢ वर्धयामसि । बृ꣣ह꣡च्छो꣢चा यविष्ठ्य ॥६६१॥
पदार्थःप्रथम—यज्ञाग्नि के पक्ष में। हे (अङ्गिरः) चंचल ज्वालावाले यज्ञाग्नि ! (तं त्वा) उस तुझको, हम (समिद्भिः) समिधाओं से, और (घृतेन) घृत से (वर्धयामसि) बढ़ाते हैं। हे (यविष्ठ्य) अतिशय युवा अग्ने ! तू (बृहत्) बहुत अधिक (शोच) चमक ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। मनुष्य अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन दे रहा है—हे (अङ्गिरः) कर्मशील मेरे अन्तरात्मन् ! (तं त्वा) उस बहुत कर्म करने में समर्थ तुझे, हम (समिद्भिः) ज्ञानरूप समिधाओं से और (घृतेन) सत्कर्मरूप घृत से (वर्धयामसि) बढ़ाते हैं। हे (यविष्ठ्य) अतिशय तरुण ! तू संसार में (बृहत्) बहुत अधिक (शोच) चमक ॥ तृतीय—परमात्मा के पक्ष में। हे (अङ्गिरः) प्राणप्रिय परमात्मन् ! (तं त्वा) सब कर्मों में समर्थ उन आपको हम (समिद्भिः) प्रदीप्त करने के साधन योगाङ्गों से और (घृतेन) स्नेहयुक्त भक्तिभावों से, अपने अन्तःकरण में (वर्धयामसि) बढ़ाते हैं। हे (यविष्ठ्य) सर्वातिशय समृद्ध भगवन् ! तुम, हमारे अन्तःकरण में (बृहत्) अधिक (शोच) चमको ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि यज्ञाग्नि को प्रदीप्त [और संवृद्ध करके स्वयं भी तेज से प्रदीप्त] तथा संवृद्ध हों। इसी प्रकार अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर निर्भ्रान्त ज्ञानराशि का संचय करके महान् कीर्ति प्राप्त करें और योगाभ्यास एवं भक्ति से परमात्मा-रूप अग्नि को अपने आत्मा में प्रदीप्त करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣡ नः꣢ पृ꣣थु꣢ श्र꣣वा꣢य्य꣣म꣡च्छा꣢ देव विवाससि । बृ꣣ह꣡द꣢ग्ने सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥६६२॥
पदार्थःहे (देव) उत्तम प्रकाशक (अग्ने) भौतिक अग्नि, अन्तरात्मन् और परमात्मन् ! (सः) वह प्रसिद्ध, तू (नः अच्छ) हमारी ओर (पृथु) विस्तीर्ण, (श्रवाय्यम्) कीर्तिजन, (बृहत्) प्रचुर, तथा (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ बल-युक्त भौतिक एवं आध्यात्मिक ऐश्वर्य (विवाससि) प्रेरित कर ॥३॥
भावार्थःभौतिक अग्नि जैसे यज्ञ में और शिल्पकर्म में उपयोग करने पर स्वास्थ्य, धन, धान्य आदि प्राप्त कराता है, वैसे ही आत्माग्नि उद्बोधन देने पर तथा परमात्माग्नि उपासना करने पर महान् अध्यात्मसम्पत्ति प्रदान करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
आ꣡ नो꣢ मित्रावरुणा घृ꣣तै꣡र्गव्यू꣢꣯तिमुक्षतम् । म꣢ध्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि सुक्रतू ॥६६३॥
पदार्थःहे (शुचिव्रता) पवित्र कर्मोंवाले परमात्मा और जीवात्मा ! (उरुशंसा) बहुत प्रशंसा को प्राप्त, (नमोवृधा) नमस्कार को ग्रहण कर बढ़ानेवाले व नमस्कार के प्रदान से वृद्धि४ को प्राप्त तुम (दक्षस्य) बल की (मह्ना) महिमा से और (द्राघिष्ठाभिः) अतिशय दीर्घ क्रियाओं, सम्पत्तियों वा स्तुतियों से (राजथः) राजा बने हुए हो ॥२॥
भावार्थःसम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सम्राट् महाबली परमेश्वर का ध्यान करके और देहपिण्ड के सम्राट् जीवात्मा को भली-भाँति उद्बोधन देकर सब स्त्री-पुरुषों को अपनी उन्नति करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
उ꣣रुश꣡ꣳसा꣢ नमो꣣वृ꣡धा꣢ म꣣ह्ना꣡ दक्ष꣢꣯स्य राजथः । द्रा꣣घि꣢ष्ठाभिः शुचिव्रता ॥६६४॥
पदार्थःहे परमात्मा-जीवात्मा रूप मित्र-वरुणो ! (जमदग्निना) अग्निहोत्रार्थ अग्नि को प्रज्वलित करनेवाले यजमान से (गृणाना) स्तुति किये जाते हुए तुम दोनों (ऋतस्य यौनौ) सत्य के मन्दिर हृदय में (सीदतम्) स्थित रहो। हे (ऋतावृधा) सत्य के बढ़ानेवालो ! तुम दोनों (सोमम्) शान्ति की (पातम्) रक्षा करो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा से प्रेरणा पाकर जीवात्माएँ जब जगत् में शान्ति-रक्षा का प्रयत्न करती हैं, तभी आपस में सौहार्द और सांमनस्य उत्पन्न होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
गृ꣣णाना꣢ ज꣣म꣡द꣢ग्निना꣣ यो꣡ना꣢वृ꣣त꣡स्य꣢ सीदतम् । पा꣣त꣡ꣳ सोम꣢꣯मृतावृधा ॥६६५॥
पदार्थःहे परमात्मा-जीवात्मा रूप मित्र-वरुणो ! (जमदग्निना) अग्निहोत्रार्थ अग्नि को प्रज्वलित करनेवाले यजमान से (गृणाना) स्तुति किये जाते हुए तुम दोनों (ऋतस्य यौनौ) सत्य के मन्दिर हृदय में (सीदतम्) स्थित रहो। हे (ऋतावृधा) सत्य के बढ़ानेवालो ! तुम दोनों (सोमम्) शान्ति की (पातम्) रक्षा करो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा से प्रेरणा पाकर जीवात्माएँ जब जगत् में शान्ति-रक्षा का प्रयत्न करती हैं, तभी आपस में सौहार्द और सांमनस्य उत्पन्न होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ या꣢हि सुषु꣣मा꣢꣫ हि त꣣ इ꣢न्द्र꣣ सो꣢मं꣣ पि꣡बा꣢ इ꣣म꣢म् । एदं꣢꣫ ब꣣र्हिः꣡ स꣢दो꣣ म꣡म꣢ ॥६६६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) अन्तरात्मन् ! तू (आयाहि) आ, (ते) तेरे लिए, हमने (सोमम्) ज्ञानरस को (सुषुम) आँख, कान आदि ज्ञान के साधनों से अभिषुत किया है। तू (इमम्) इस ज्ञानरस को (पिब) पी, अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त इस ज्ञान का मनन कर। तू (इदम्) इस (मम) मेरे (बर्हिः) हृदयासन पर (आ सदः) बैठा हुआ है ॥१॥
भावार्थःमन के माध्यम से ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान का मनन और निदिध्यासन द्वारा पूर्ण साक्षात्कार करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ त्वा꣢ ब्रह्म꣣यु꣢जा꣣ ह꣢री꣣ व꣡ह꣢तामिन्द्र के꣣शि꣡ना꣢ । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि नः शृणु ॥६६७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (ब्रह्मयुजा) परमात्मा द्वारा शरीर में नियुक्त, (केशिना) प्रकाश को प्राप्त (हरी) ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियरूप अश्व (त्वा) तुझे (वहताम्) ज्ञान और कर्म में प्रवृत्त करें। तू (नः) हम गुरुओं के (ब्रह्माणि) ज्ञानमय वचनों को (शृणु) सुन ॥२॥
भावार्थःशरीर में नियुक्त इन्द्रियों के सदुपयोग से और गुरुओं का उपदेश सुनकर सबको अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ब्र꣣ह्मा꣡ण꣢स्त्वा यु꣣जा꣢ व꣣य꣡ꣳ सो꣢म꣣पा꣡मि꣢न्द्र सो꣣मि꣡नः꣢ । सु꣣ता꣡व꣢न्तो हवामहे ॥६६८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) आत्मन् ! हे शिष्य ! (सोमपाम्) ज्ञान का पान करनेवाले (त्वा) तुझे (सोमिनः) ज्ञानवान्, (सुतावन्तः) शिष्यरूप पुत्रोंवाले, (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानी (वयम्) हम गुरुजन (युजा) पारस्परिक सहयोग के साथ अथवा तेरे साथ घनिष्ठ सम्बन्धपूर्वक (हवामहे) विद्या पढ़ाने और सदाचार सिखाने के लिए बुलाते हैं ॥३॥
भावार्थःजो स्वयं विद्यावान्, सदाचारी और ब्रह्म का अनुभव प्राप्त किये हुए गुरु होते हैं, वे ही शिष्यों को विद्वान् सदाचारी और ब्रह्मज्ञानी बना सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ आ꣡ ग꣢तꣳ सु꣣तं꣢ गी꣣र्भि꣢꣫र्न꣣भो व꣡रे꣢ण्यम् । अ꣣स्य꣡ पा꣢तं धि꣣ये꣢षि꣣ता꣢ ॥६६९॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! तुम दोनों (गीर्भिः) गुरुओं की वाणियों से (सुतम्) निष्पादित, (नभः) सूर्य के समान प्रकाशयुक्त (वरेण्यम्) वरणीय श्रेष्ठ ज्ञानरस को ग्रहण करने के लिए (आगतम्) आओ। (इषिता) तत्पर एवं प्रयत्नशील होकर तुम दोनों (धिया) बुद्धि द्वारा (अस्य) इस ज्ञान की (पातम्) रक्षा करो ॥१॥ इस मन्त्र में ‘नभः’ अर्थात् ‘सूर्य के समान प्रकाशमान’ में वाचकधर्मलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःवाणी का अधिपति गुरु शिष्य को जिस ज्ञान का उपदेश करता है, उसे उसको सावधानी के साथ अपने आत्मा, मन और बुद्धि के योगपूर्वक सुनकर और उस पर मनन करके हृदय में धारण कर लेना चाहिए, उसका प्रचार करना चाहिए तथा उसके अनुसार आचरण करना-करवाना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी जरि꣣तुः꣡ सचा꣢꣯ य꣣ज्ञो꣡ जि꣢गाति꣣ चे꣡त꣢नः । अ꣣या꣡ पा꣢तमि꣣म꣢ꣳ सु꣣त꣢म् ॥६७०॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (जरितुः) विद्याओं का वर्णन करनेवाले उपदेष्टा आचार्य का (सचा) गुरु-शिष्यों द्वारा साथ मिलकर किया हुआ (चेतनः) चेतानेवाला (यज्ञः) विद्यायज्ञ (जिगाति) प्रवृत्त हो रहा है। तुम दोनों (अया) इस पद्धति से (सुतम्) निष्पादित (इमम्) इस विद्या-यज्ञ की (पातम्) रक्षा करते हो ॥२॥
भावार्थःगुरु-शिष्य आपस में मिलकर ही ज्ञान-यज्ञ का अनुष्ठान करके राष्ट्र में सब प्रकार की विद्याओं का प्रचार करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्र꣢म꣣ग्निं꣡ क꣢वि꣣च्छ꣡दा꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ जू꣣त्या꣡ वृ꣢णे । ता꣡ सोम꣢꣯स्ये꣣ह꣡ तृ꣢म्पताम् ॥६७१॥
पदार्थःमैं (यज्ञस्य) विद्यायज्ञ की (जूत्या) शीघ्र सिद्धि के लिए (कविच्छदा) मेधावियों को दुःख, विपत्ति आदि से बचानेवाले (इन्द्रम् अग्निम्) आत्मा और मन को (वृणे) स्वीकार करता हूँ। (ता) वे दोनों (इह) इस विद्यायज्ञ में (सोमस्य) ज्ञानरस से (तृम्पताम्) तृप्ति प्रदान करें ॥३॥
भावार्थःआत्मा-रूप यजमान, मन-रूप होता और आचार्य-रूप ब्रह्मा के द्वारा सम्पादित विद्या-यज्ञ सफल एवं प्रभावकारी होता है ॥३॥ प्रथम खण्ड में परब्रह्म और ब्रह्मानन्द का वर्णन है और द्वितीय खण्ड में यह वर्णन है कि वह ब्रह्मानन्द तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब आत्मा और मन उसके लिए प्रयत्नशील होते हैं। अतः द्वितीय खण्ड की प्रथम खण्ड के साथ संगति है ॥ प्रथम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣣च्चा꣡ ते꣢ जा꣣त꣡मन्ध꣢꣯सो दि꣣वि꣡ सद्भूम्या ददे꣢꣯ । उ꣣ग्र꣢꣫ꣳ शर्म꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥६७२॥
पदार्थःहे जीवन को पवित्र करनेवाले गुरु ! (ते) आपके (अन्धसः) ज्ञानरस का (जातम्) उत्पन्न स्वरूप (उच्चा) अत्यन्त उच्च है। (दिवि सत्) प्रकाश में विद्यमान अर्थात् प्रकाशित उस ज्ञान को (भूमि) भूमि के समान स्वतः प्रकाश से रहित मैं (आददे) ग्रहण करता हूँ। उसके ग्रहण करने से मुझे (उग्रम्) प्रबल (शर्म) सुख और (महि) महान् (श्रवः) यश तथा धन प्राप्त होगा ॥१॥
भावार्थःगुरु से शास्त्रों का अध्ययन करके और ब्रह्मविद्या का अनुभव प्राप्त करके शिष्य अपने जीवन में शान्त, सुखी और यशस्वी होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ न꣣ इ꣡न्द्रा꣢य꣣ य꣡ज्य꣢वे꣣ व꣡रु꣢णाय म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । व꣣रिवोवि꣡त्परि꣢꣯ स्रव ॥६७३॥
पदार्थःहे ज्ञानरस के भण्डार गुरु ! (सः) वह अतिशय गुणी आप (नः) हमारे (यज्यवे) विद्याध्ययन-यज्ञ के यजमानभूत (इन्द्राय) आत्मा के लिए, (वरुणाय) श्रेष्ठ मन के लिए और (मरुद्भ्यः) प्राणों के लिए (वरिवोवित्) उन-उनके अपने-अपने ऐश्वर्यों को प्राप्त करानेवाले होकर (परिस्रव) शिष्यों के मध्य विचरण कीजिए ॥२॥
भावार्थःगुरुओं को उचित है कि वे विद्या पढ़ाने के अतिरिक्त शिष्य के आत्मा, मन और प्राणों का भी विकास करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ना꣡ विश्वा꣢꣯न्य꣣र्य꣢꣫ आ द्यु꣣म्ना꣢नि꣣ मा꣡नु꣢षाणाम् । सि꣡षा꣢सन्तो वनामहे ॥६७४॥
पदार्थःहे हमारे अन्तःकरणों को पवित्र करनेवाले गुरुवर ! (अर्यः) विद्याओं के स्वामी आप (एना) इन (विश्वानि) सब (द्युम्नानि) विद्याधनों को (मानुषाणाम्) हम मननशील शिष्यों को (आ) प्राप्त कराओ। उन विद्याधनों को (सिषासन्तः) अन्यों को प्रदान करने की इच्छावाले हम (वनामहे) आपसे सीखते हैं ॥३॥
भावार्थःजो मनुष्य गुरुओं के पास से अनेक प्रकार की भौतिक विद्याओं तथा आध्यात्मिक विद्याओं को पढ़कर अन्यों को पढ़ाते हैं, वे ही गुरु-ऋण से मुक्त होते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
पु꣣नानः꣡ सो꣢म꣣ धा꣡र꣢या꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो अर्षसि । आ꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ योनि꣢꣯मृ꣣त꣡स्य꣢ सीद꣣स्यु꣡त्सो꣢ दे꣣वो꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥६७५॥
पदार्थःहे (सोम) ज्ञानरस के खजाने गुरुवर ! आप (धारया) ज्ञान की धारा से (पुनानः) शिष्यों को पवित्र करते हुए (अर्षसि) शिष्यों के मध्य जाते हो। (रत्नधाः) रमणीय गुणों को धारण करनेवाले आप (ऋतस्य योनिम्) सत्य के भण्डार परमात्मा को (आसीदसि) उपासते हो। आप (उत्सः) विद्या के स्रोत, (देवः) प्रकाशक और (हिरण्ययः) तेजस्वी हो ॥१॥
भावार्थःवही गुरु होने योग्य है, जो सब विद्याओं में पारंगत, अध्यापनकला में प्रवीण, चारित्र्यवान्, सच्चरित्र बनानेवाला, शिष्यों का पितृतुल्य, तेजस्वी, गुणवान्, गुणप्रशंसक, परब्रह्म का द्रष्टा और परब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ हो ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
दु꣣हान꣡ ऊध꣢꣯र्दि꣣व्यं꣡ मधु꣢꣯ प्रि꣣यं꣢ प्र꣣त्न꣢ꣳ स꣣ध꣢स्थ꣣मा꣡स꣢दत् । आ꣣पृ꣡च्छ्यं꣢ ध꣣रु꣡णं꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯र्षसि꣣ नृ꣡भि꣢र्धौ꣣तो꣡ वि꣢चक्ष꣣णः꣢ ॥६७६॥
पदार्थःयह शिष्य (ऊधः) विशाल ऊधवाली गुरुरूप गाय से (दिव्यम्) अलौकिक, (प्रियम्) प्रिय मधु ब्रह्मविद्यारूप मधु को (दुहानः) दुहता हुआ (प्रत्नम्) प्राचीन, (सधस्थम्) गुरु और छात्र जहाँ एकसाथ रहते हैं, उस गुरुकुल में (आसदत्) निवास करता है। आगे प्रत्यक्ष पद्धति से कहते हैं—हे शिष्य ! (नृभिः) नेता गुरुओं से (धौतः) पवित्र किया हुआ, (विचक्षणः) पण्डित, और (वाजी) आत्मबल से बली बना हुआ तू (आपृच्छ्यम्) सबसे प्रश्न करने योग्य, (धरुणम्) सब जगत् के आधारस्तम्भ परमेश्वर को (अर्षसि) पा लेता है अर्थात् आवागमन के चक्र से छुटकर दुःखों से सदा के लिए मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥२॥
भावार्थःयोग्य गुरु को पाकर ही मनुष्य ब्रह्म का साक्षात्कार और मोक्ष प्राप्त कर सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ तु द्र꣢꣯व꣣ प꣢रि꣣ को꣢शं꣣ नि꣡ षी꣢द꣣ नृ꣡भिः꣢ पुना꣣नो꣢ अ꣣भि꣡ वाज꣢꣯मर्ष । अ꣢श्वं꣣ न꣡ त्वा꣢ वा꣣जि꣡नं꣢ म꣣र्ज꣢य꣣न्तो꣡ऽच्छा꣢ ब꣣र्ही꣡ र꣢श꣣ना꣡भि꣢र्नयन्ति ॥६७७॥
पदार्थःहे शिष्य ! तू (तु) शीघ्र ही (प्र द्रव) उत्कृष्ट बनने के लिए प्रयत्न कर, उसके लिए (कोशम्) विद्या के खजाने गुरु का (परि निषीद) सेवन कर। (नृभिः) नेता गुरुजनों की सहायता से (पुनानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (वाजम्) शारीरिक और आत्मिक बल (अभ्यर्ष) प्राप्त कर। ये गुरुजन (वाजिनम्) बलवान् (त्वा) तुझे (मर्जयन्तः) शुद्ध करते हुए (रशनाभिः) नियन्त्रणों और मर्यादाओं से (बर्हिः अच्छ) ज्ञानकाण्ड व कर्मकाण्ड के प्रति (नयन्ति) प्रेरित करते हैं। कैसे? (वाजिनम् अश्वं न) जैसे बलवान् घोड़े को योद्धा लोग (रशनाभिः) लगामों से नियन्त्रित करके (बर्हिः अच्छ) संग्राम की ओर (नयन्ति) ले जाते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःगुरुओं का हम पर महान् उपकार है, जो हम अबोध जनों को विद्यावान्, तपस्वी तथा पवित्र आचरणवाला बनाकर समुन्नत करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
स्वा꣣युधः꣡ प꣢वते दे꣣व꣡ इन्दुर꣢꣯शस्ति꣣हा꣢ वृ꣣ज꣢ना꣣ र꣡क्ष꣢माणः । पि꣣ता꣢ दे꣣वा꣡नां꣢ जनि꣣ता꣢ सु꣣द꣡क्षो꣢ विष्ट꣣म्भो꣢ दि꣣वो꣢ ध꣣रु꣡णः꣢ पृथि꣣व्याः꣢ ॥६७८॥
पदार्थः(स्वायुधः) भद्र दण्डवाला, (देवः) सुख आदि का दाता, (अशस्तिहा) अप्रशस्ति को दूर करनेवाला, (वृजना) बलों की (रक्षमाणः) रक्षा करनेवाला, (पिता) पितृतुल्य, (देवानां जनिता) विद्वानों को उत्पन्न करनेवाला, (सुदक्षः) उत्तम बलवाला, (दिवः) विद्या के सूर्य का (विष्टम्भः) आधारभूत, (पृथिव्याः) राष्ट्रभूमि का (धरुणः) धारण करनेवाला (इन्दुः) तेजस्वी गुरु (पवते) पवित्रता प्रदान करता है ॥२॥
भावार्थःमन्त्रोक्त गुणों से युक्त गुरु का जो सेवन करते हैं, वे विद्वान्, सदाचारी और प्रशस्त कीर्तिवाले होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
ऋ꣢षि꣣र्वि꣡प्रः꣢ पुरए꣣ता꣡ जना꣢꣯नामृ꣣भु꣡र्धीर꣢꣯ उ꣣श꣢ना꣣ का꣡व्ये꣢न । स꣡ चि꣢द्विवेद꣣ नि꣡हि꣢तं꣣ य꣡दा꣢सामपी꣣च्या꣢३꣱ꣳ गु꣢ह्यं꣣ नाम गो꣡ना꣢म् ॥६७९॥
पदार्थःहमारा गुरु (ऋषिः) वेदमन्त्रों के रहस्य का द्रष्टा, (विप्रः) ब्राह्मण वृत्तिवाला, (जनानाम्) मनुष्यों में (पुरः एता) आगे चलनेवाला, (ऋभुः) मेधावान् (धीरः) धैर्यवान् और (काव्येन) काव्य-रचना से (उशना) जगत् का हित चाहनेवाला है। (सः चित्) वही (आसां गोनाम्) इन वेदवाणियों का (यत्) जो (अपीच्यम्) छिपा हुआ, (गुह्यम्) रहस्यमय (नाम) अर्थ है, उसे (विवेद) विशेष रूप से जानता है ॥३॥
भावार्थःजो अति गम्भीर भी वेदादि वाङ्मय के रहस्यार्थ को हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष रूप से जानता हो, उसी ऋषि, मेधावी ब्राह्मण को गुरुरूप में स्वीकार करना चाहिए ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य के सम्बन्ध का वर्णन है और गुरु से लौकिक विद्या तथा ब्रह्मविद्या का अध्ययन करके ही मनुष्य परब्रह्म का साक्षात्कार कर सकते हैं, इसका वर्णन है, अतः इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ संगति है, यह जानना चाहिए ॥ प्रथम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ शूर नोनु꣣मो꣡ऽदु꣢ग्धा इव धे꣣न꣡वः꣢ । ई꣡शा꣢न꣣म꣡स्य जग꣢꣯तः स्व꣣र्दृ꣢श꣣मी꣡शा꣢नमिन्द्र त꣣स्थु꣡षः꣢ ॥६८०॥
पदार्थःहे (शूर इन्द्र) शूरवीर हमारे अन्तरात्मन् ! हम (त्वा अभि) तेरे प्रति (नोनुमः) बारम्बार स्तुति-शब्द बोलते हैं। किस तरह? (अदुग्धाः न) दुही हुई (धेनवः इव) गौएँ जैसे दुहे जाने की उत्कण्ठा को प्रकट करने के लिए बारम्बार शब्द करती हैं। तू कैसा है? (अस्य) इस (जगतः) दूर-दूर तक जानेवाले मन का (ईशानम्) स्वामी, (स्वर्दृशम्) आनन्द का द्रष्टा और (तस्थुषः) शरीर में अजंगम रूप में स्थित अङ्ग-प्रत्यङ्गों का भी (ईशानम्) स्वामी है। अतः हम (नोनुमः) तेरे गुणों का बार-बार वर्णन करते हैं, तुझे (उद्बोधन) देते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य के आत्मा में महान् शक्तियाँ प्रसुप्त पड़ी हैं। सारे शरीरचक्र के अधिष्ठाता उस आत्मा को उद्बोधन देकर सभी लौकिक और आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
न꣡ त्वावा꣢꣯ꣳ अ꣣न्यो꣢ दि꣣व्यो꣡ न पार्थि꣢꣯वो꣣ न꣢ जा꣣तो꣡ न ज꣢꣯निष्यते । अ꣣श्वाय꣡न्तो꣢ मघवन्निन्द्र वा꣣जि꣡नो꣢ ग꣣व्य꣡न्त꣢स्त्वा हवामहे ॥६८१॥
पदार्थःहे परमेश्वर ! (अन्यः) दूसरा (त्वावान्) तेरे समान (न दिव्यः) न आकाशवर्ती और (न पार्थिवः) न भूमिवर्ती कोई पदार्थ है। तेरे समान (न जातः) न कोई पदार्थ उत्पन्न हुआ है, (न जनिष्यते) न भविष्य में उत्पन्न होगा। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् (इन्द्र) परमात्मन् ! (वाजिनः) बलवान् तथा पुरुषार्थी हम (अश्वायन्तः) श्रेष्ठ प्राणों की कामनावाले और (गव्यन्तः) इन्द्रियरूप गौओं के श्रेष्ठ ज्ञान व कर्म रूप दूध की कामनावाले होकर (त्वा) तुझे (हवामहे) पुकार रहे हैं ॥२॥ इस मन्त्र में ‘उसके मुख के तुल्य कोई अन्य वस्तु नहीं है, न ही नेत्रों के तुल्य है’ इस अर्थवाली साहित्यदर्पण १०।२० में उदाहृत उक्ति के समान उपमानलुप्तोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःअलौकिक तथा अद्वितीय परमात्मा की उपासना करके बलवान् और पुरुषार्थी होकर सब लोग ऐहलौकिक तथा पारलौकिक अभीष्ट को प्राप्त कर सकते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क꣡या꣢ नश्चि꣣त्र꣡ आ भुव꣢꣯दू꣣ती꣢ स꣣दा꣢वृ꣣धः꣢ स꣡खा꣢ । क꣢या꣣ श꣡चि꣢ष्ठया वृ꣣ता꣢ ॥६८२॥
पदार्थःयह (चित्रः) अद्भुत शक्तिवाला शरीर का अध्यक्ष इन्द्र आत्मा (कदा) किस अपूर्व (ऊती) रक्षा के द्वारा, और (कया) किस अद्वितीय (शचिष्ठया) अत्यन्त बुद्धिपूर्ण तथा क्रियाकौशलपूर्ण (वृता) वृत्ति के द्वारा (नः) हमारा (सदावृधः) सदा बढ़ानेवाला (सखा) मित्र (भुवत्) होता है ॥१॥
भावार्थःजिस आत्मा के बल से सब लोग सम्पूर्ण ऐहलौकिक और पारलौकिक उन्नति करने में समर्थ होते हैं, उस आत्मा का अवश्य सबको श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क꣡स्त्वा꣢ स꣣त्यो꣡ मदा꣢꣯नां꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठो मत्स꣣द꣡न्ध꣢सः । दृ꣣ढा꣡ चि꣢दा꣣रु꣢जे꣣ व꣡सु꣢ ॥६८३॥
पदार्थःहे मेरे अन्तरात्मन् ! (कः) सुन्दर, सबसे बड़ा तथा सुखस्वरूप, (सत्यः) सत्यमय, (मदानाम्) आनन्दों का (मंहिष्ठः) सबसे अधिक दाता इन्द्र परमेश्वर (त्वा) तुझे (अन्धसः) आनन्द रस से (मत्सत्) आनन्दित करे और वह (दृढा चित्) दृढ़ से दृढ़ विघ्न-बाधा आदियों को (आरुजे) छिन्न-भिन्न करने के लिए (वसु) शक्तिरूप ऐश्वर्य प्रदान करे ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा परमात्मा द्वारा दिये हुए बल और आनन्द से ही बली और आनन्दवान् बनता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पादनिचृत् (गायत्री)| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣भी꣢꣫ षु णः꣣ स꣡खी꣢नामवि꣣ता꣡ ज꣢रितॄ꣣णा꣢म् । श꣣तं꣡ भ꣢वास्यू꣣त꣡ये꣢ ॥६८४॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! आप (सखीनाम्) आपके सखा (जरितॄणां नः) हम स्तोताओं की (शतम् ऊतये) सौ वर्ष तक प्रीति के लिए (अविता) रक्षक (सु) भली-भाँति (अभि) चारों ओर (भवासि) होओ ॥३॥
भावार्थःजो जीवात्मा परमात्मा के सखा हो जाते हैं, उनका वह महान् कल्याण करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
तं꣡ वो꣢ द꣣स्म꣡मृ꣢ती꣣ष꣢हं꣣ व꣡सो꣢र्मन्दा꣣न꣡मन्ध꣢꣯सः । अ꣣भि꣢ व꣣त्सं꣡ न स्वस꣢꣯रेषु धे꣣न꣢व꣣ इ꣡न्द्रं꣢ गी꣣र्भि꣡र्न꣢वामहे ॥६८५॥
पदार्थःहे मन, इन्द्रिय आदि प्राणो ! हम (वः) तुम्हारे (दस्मम्) दोषों को नष्ट करनेवाले, (ऋतीषहम्) आक्रमणकारी काम, क्रोध आदि शत्रुओं को परास्त करनेवाले, (वसोः) निवासप्रद (अन्धसः) आनन्दरस से (मन्दानम्) आनन्दित होनेवाले (इन्द्रम्) अपने अन्तरात्मा के (अभि) अभिमुख होकर (स्वसरेषु) दिनों के उदय के समय अर्थात् प्रभात कालों (गीर्भिः) उद्बोधक वाणियों से (नवामहे) गुण वर्णनरूप स्तुति करते हैं। किस प्रकार? (स्वसरेषु) गोशालाओं में (धेनवः) गौएँ (वत्सम् अभि) नवजात बछड़े के अभिमुख होकर (न) जैसे रंभाती हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःअपने अन्तरात्मा को भली-भाँति उद्बोधन देकर, दोषों को दूर करके तथा सद्गुणों को प्राप्त करके हम परम यशस्वी बन सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
द्यु꣣क्ष꣢ꣳ सु꣣दा꣢नुं꣣ त꣡वि꣢षीभि꣣रा꣡वृ꣢तं गि꣣रिं꣡ न पु꣢꣯रु꣣भो꣡ज꣢सम् । क्षु꣣म꣢न्तं꣣ वा꣡ज꣢ꣳ श꣣ति꣡न꣢ꣳ सह꣣स्रि꣡णं꣢ म꣣क्षू꣡ गोम꣢꣯न्तमीमहे ॥६८६॥
पदार्थः(द्युक्षम्) अन्तरात्मा में तेज के निवासक, (सुदानुम्) श्रेष्ठ दानी, (तविषीभिः) बलों से (आवृतम्) परिपूर्ण, (गिरिं न) पर्वत और बादल के समान (पुरुभोजसम्) बहुत पालन करनेवाले, अर्थात् जैसे पर्वत और बादल अनेक ओषधियों तथा वर्षाओं द्वारा पालन करते हैं, वैसे ही जड़-चेतन जगत् का पालन करनेवाले, (क्षुमन्तम्) अन्न-भण्डार के भण्डारी, (शतिनम्) सैकड़ों ऐश्वर्यों से युक्त, (सहस्रिणम्) सहस्रों गुणों से युक्त, (गोमन्तम्) गति करनेवाले सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र आदियों के स्वामी इन्द्र परमेश्वर से हम (मक्षु) शीघ्र ही (वाजम्) अन्न, धन, ज्ञान, बल, वेग, सुख आदि की (ईमहे) याचना करते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है। विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर है ॥२॥
भावार्थःसब मनुष्यों को उचित है कि जो परमेश्वर सब विद्याओं और सब ऐश्वर्यों का परम खजाना है, उसकी उपासना करके सब विद्याओं तथा समस्त भौतिक और आध्यात्मिक सम्पदाओं को प्राप्त करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त꣡रो꣢भिर्वो वि꣣द꣡द्व꣢सु꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣बा꣡ध꣢ ऊ꣣त꣡ये꣢ । बृ꣣ह꣡द्गाय꣢꣯न्तः सु꣣त꣡सो꣢मे अध्व꣣रे꣢ हु꣣वे꣢꣫ भरं꣣ न꣢ का꣣रि꣡ण꣢म् ॥६८७॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (सबाधः) अविद्यारूप बाधा से पीड़ित होने पर (वः) आप लोग (ऊतये) रक्षा के लिए (तरोभिः) वेगों के साथ (विदद्वसुम्) ब्रह्मविद्यारूप धन को प्राप्त करानेवाले (इन्द्रम्) आचार्य का (बृहत्) बहुत अधिक (गायन्तः) महिमा-गान करो। मैं भी (सुतसोमे) जिसमें विद्यारस का निष्पादन होता है, उस (अध्वरे) विद्या-यज्ञ में (भरं न) कुटुम्बभार को वहन करनेवाले गृहस्वामी के समान (कारिणम्) कर्मयोगी आचार्य को (हुवे) ब्रह्मविद्या ग्रहण करने के लिए पुकारता हूँ ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि ब्रह्म का साक्षात्कार पाने के लिए ऐसे सुयोग्य गुरु का आश्रय लें, जिसने स्वयं भी ब्रह्म का साक्षात्कार किया हो ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
न꣢꣫ यं दु꣣ध्रा꣡ वर꣢꣯न्ते꣣ न꣢ स्थि꣣रा꣢꣫ मुरो꣣ म꣡दे꣢षु शि꣣प्र꣡मन्ध꣢꣯सः । य꣢ आ꣣दृ꣡त्या꣢ शशमा꣣ना꣡य꣢ सुन्व꣣ते꣡ दाता꣢꣯ जरि꣣त्र꣢ उ꣣꣬क्थ्य꣢꣯म् ॥६८८॥
पदार्थः(शिप्रम्) सर्वान्तर्यामी (यम्) जिस परमेश्वर को (अन्धसः) आनन्दरस के (मदेषु) तृप्ति-प्रदानों में (दुध्राः) दुर्धर शत्रु भी (न वरन्ते) नहीं रोक सकते, (न) न ही (स्थिराः) स्थिर, अविचल (मुरः) मनुष्य रोक सकते हैं, (यः) जो परमेश्वर (शशमानाय) उद्योगी, पुरुषार्थी, (सुन्वते) भक्तिरस बहानेवाले (जरित्रे) स्तोता के लिए (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय दिव्य ऐश्वर्य (आदृत्य) अपने खजाने में से निकालकर (दाता) देनेवाला होता है ॥२॥
भावार्थःजब परमेश्वर अपने उपासक को ब्रह्मानन्द की वर्षा से तृप्त करना चाहता है, तब उसे उस कार्य से रोकने का किसी में सामर्थ्य नहीं होता है ॥२॥ पूर्व खण्ड में गुरु-शिष्य का सम्बन्ध वर्णित होने से तथा इस खण्ड में जीवात्मा और परमात्मा का एवं परमात्मा का साक्षात्कार करानेवाले आचार्य का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ संगति है ॥ प्रथम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स्वा꣡दि꣢ष्ठया꣣ म꣡दि꣢ष्ठया꣣ प꣡व꣢स्व सोम꣣ धा꣡र꣢या । इ꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे सु꣣तः꣢ ॥६८९॥
पदार्थःहे (सोम) ब्रह्मज्ञानरस ! तू (स्वादिष्ठया) अत्यन्त स्वादु, (मदिष्ठया) अतिशय हर्षप्रदायक (धारया) धारा से (पवस्व) हमें पवित्र कर। तू (इन्द्राय) मेरे आत्मा के (पातवे) पान करने के लिए (सुतः) आचार्य द्वारा प्रेरित किया गया है ॥१॥
भावार्थःशिष्य को चाहिए कि आचार्य से वह जो भौतिक विज्ञान या ब्रह्मविज्ञान प्राप्त करता है, उसे अपने आत्मा में स्थिर रूप से धारण कर ले ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
र꣣क्षोहा꣢ वि꣣श्व꣡च꣢र्षणिर꣣भि꣢꣫ योनि꣣म꣡यो꣢हते । द्रो꣡णे꣢ स꣣ध꣢स्थ꣣मा꣡स꣢दत् ॥६९०॥
पदार्थः(रक्षोहा) काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि राक्षसों का विनाशक, (विश्वचर्षणिः) विश्वरूप परमात्मा का दर्शन करानेवाला ब्रह्मज्ञानरूप सोम (योनिम्) शरीर-स्थिति इत्यादि के कारणभूत, (सधस्थम् अभि) जिसमें सब ज्ञानेन्द्रियों से उपलब्ध ज्ञान एकत्र स्थित होते हैं, उस आत्मा को लक्ष्य करके अर्थात् आत्मा में जाने के लिए (अयोहते) यम-नियम आदि रूप लोहे के हथौड़ों से ताड़ित अर्थात् संस्कृत (द्रोणे) मनरूप द्रोणकलश में (आ असदत्) आकर स्थित होता है ॥२॥
भावार्थःगुरुओं से समित्पाणि शिष्य के प्रति प्रवाहित किया हुआ ब्रह्मज्ञान का रस मन के माध्यम से आत्मा को ही प्राप्त होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
व꣣रिवोधा꣡त꣢मो भुवो꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठो वृत्र꣣ह꣡न्त꣢मः । प꣢र्षि꣣ रा꣡धो꣢ म꣣घो꣡ना꣢म् ॥६९१॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन् ! आप (वरिवोधातमः) अतिशय ऐश्वर्य को धारण करनेवाले, (मंहिष्ठः) सबसे बढ़कर दानी, (वृत्रहन्तमः) सबसे बड़े पापहन्ता (भुवः) सिद्ध हुए हो। आप ही (मघोनाम्) हम भौतिक धनों के धनियों को (राधः) सत्य, न्याय, दया, मोक्ष, आदि दिव्य धन (पर्षि) प्रदान करो ॥३॥
भावार्थःवही मनुष्य वस्तुतः धनी है, जो भौतिक धन के साथ अध्यात्म धन भी कमाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प꣡व꣢स्व꣣ म꣡धु꣢मत्तम꣣ इ꣡न्द्रा꣢य सोम क्रतु꣣वि꣡त्त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ । म꣡हि꣢ द्यु꣣क्ष꣡त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ ॥६९२॥
पदार्थःहे (सोम) ब्रह्मज्ञान-रस ! (मधुमत्तमः) सबसे अधिक मधुर तू (पवस्व) हमें पवित्र कर। तेरा (मदः) आनन्द (इन्द्राय) मेरे अन्तरात्मा के लिए (क्रतुवित्तमः) प्रज्ञा तथा कर्म को अत्यधिक प्राप्त करानेवाला होता है। तेरा (मदः) आनन्द (महि) अत्यधिक (द्युक्षतमः) तेज को बसानेवाला होता है ॥१॥
भावार्थःआचार्य से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके ब्रह्म के गुण-कर्म-स्वभाव का ध्यान कर-करके अपने जीवन को पवित्र करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
य꣡स्य꣢ ते पी꣣त्वा꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ वृ꣢षा꣣य꣢ते꣣ऽस्य꣢ पी꣣त्वा꣢ स्व꣣र्वि꣡दः꣢ । स꣢ सु꣣प्र꣡के꣢तो अ꣣꣬भ्य꣢꣯क्रमी꣣दि꣢꣫षोऽच्छा꣣ वा꣢जं꣣ नै꣡त꣢शः ॥६९३॥
पदार्थःहे पवमान सोम ! हे पवित्रतादायक रसागार परमात्मन् ! (यस्य ते) जिन आपके शान्तिरस का (पीत्वा) पान करके (वृषभः) भगवान् को भक्तिरस से सींचनेवाला उपासक (वृषायते) वर्षाकारी बादल के समान आचरण करने लगता है, अर्थात् जैसे बादल गर्मी से झुलसते हुओं पर शान्तिदायक जल बरसाता है, वैसे ही वह अशान्ति से झुलसते हुओं पर शान्तिरस बरसाता है, (अस्य) उन आपके शान्तिरस को (पीत्वा) पीकर, लोग (स्वर्विदः) मोक्षसुख के प्राप्तकर्ता हो जाते हैं। (सुप्रकेतः) उत्कृष्ट ज्ञानी (सः) वह आपका उपासक (इषः अभि) इच्छासिद्धियों की ओर (अक्रमीत्) कदम बढ़ाता चलता है, (न) जैसे (एतशः) घोड़ा (वाजम् अच्छ) संग्राम की ओर पग बढाता है ॥२॥ इस मन्त्र में ‘वृषभो वृषायते’ में मम्मट के मत से वाचकलुप्तोपमा तथा दर्पणकार के मत से धर्मलुप्तोपमा है। ‘वृष, वृषा’ में छेकानुप्रास है। उत्तरार्ध में पूर्णोपमा है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से भगवान् का भक्त जैसे स्वयं शान्ति प्राप्त करता है, वैसे ही अन्यों के लिए भी शान्ति बरसाता है और उसके सब धर्मानुकूल मनोरथ शीघ्र ही फल जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
इ꣢न्द्र꣣म꣡च्छ꣢ सु꣣ता꣢ इ꣣मे꣡ वृष꣢꣯णं यन्तु꣣ ह꣡र꣢यः । श्रु꣣ष्टे꣢ जा꣣ता꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः स्व꣣र्वि꣡दः꣢ ॥६९४॥
पदार्थः(सुताः) आचार्य द्वारा प्रेरित (इमे) ये (हरयः) ज्ञान-कर्म-उपासनारूप सोमरस (वृषणम्) बलवान् (इन्द्रम्) आत्मा की (अच्छ) ओर (यन्तु) जाएँ। (जातासः) उत्पन्न हुए (इन्दवः) चन्द्रकिरणों के समान आह्लाददायक ये रस (श्रुष्टे) शीघ्र ही (स्वर्विदः) मोक्षसुख को प्राप्त करानेवाले हों ॥१॥
भावार्थःज्ञान, कर्म और उपासना के रस ही वास्तविक सोम हैं, जो पीने पर मनुष्य को उन्नत कर देते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
अ꣣यं꣡ भरा꣢꣯य सान꣣सि꣡रिन्द्रा꣢꣯य पवते सु꣣तः꣢ । सो꣢मो꣣ जै꣡त्र꣢स्य चेतति꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ ॥६९५॥
पदार्थः(भराय) देवासुरसंग्राम में जीतने के लिए (सानसिः) संभजनीय, (सुतः) आचार्य द्वारा शिष्यों में प्रेरित (अयम्) यह ज्ञान-कर्म-उपासना का रस (इन्द्राय) आत्मा के लिए (पवते) प्रवाहित हो रहा है। (जैत्रस्य) विजयशील उस आत्मा का (सोमः) वह ज्ञान-कर्म-उपासना का रस (चेतति) सदैव जागता रहे, (यथा) जिससे, वह (विदे) सदा कर्तव्य-अकर्तव्य को पहचानता रहे ॥२॥
भावार्थःज्ञान, तदनुकूल कर्म और परमेश्वर की उपासना सदैव मनुष्य को संसार के समरांगण में विजय दिलाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
अ꣣स्ये꣢꣫दिन्द्रो꣣ म꣢दे꣣ष्वा꣢ ग्रा꣣भं गृ꣢भ्णाति सान꣣सि꣢म् । व꣡ज्रं꣢ च꣣ वृ꣡ष꣢णं भर꣣त्स꣡म꣢प्सु꣣जि꣢त् ॥६९६॥
पदार्थः(अस्य इत्) इस ज्ञान-कर्म-उपासना रूप सोमरस के ही (मदेषु) उत्साहों में (इन्द्रः) वीर मनुष्य (सानसिम्) ग्रहण करने योग्य (ग्राभम्) धनुष् को (आ गृभ्णाति) थामता है, (च) और (अप्सुजित्) समुद्र के जल में तथा अन्तरिक्ष में भी शत्रु को जीतनेवाला वह वीर (वृषणम्) गोली या गोले बरसानेवाले (वज्रम्) बन्दूक, तोप आदि सुदृढ़ हथियार का (संभरत्) संधान कर लेता है ॥३॥
भावार्थःज्ञान-कर्म-उपासना रूप दिव्य सोमरस के पान से अपूर्व उत्साहवान् होकर मनुष्य भूमि, जल, आकाश कहीं भी विद्यमान दुर्दान्त शत्रुओं को भी जीतने में समर्थ हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
पु꣣रो꣡जि꣢ती वो꣣ अ꣡न्ध꣢सः सु꣣ता꣡य꣢ मादयि꣣त्न꣡वे꣢ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢ꣳ श्नथिष्टन꣣ स꣡खा꣢यो दीर्घजि꣣꣬ह्व्य꣢꣯म् ॥६९७॥
पदार्थःहे (सखायः) मित्रो ! (वः) तुम (अन्धसः) ज्ञान-कर्म-उपासनारूप सोम को (पुरोजिती) आगे बढ़कर जीतने के लिए और उस सोम के (मादयित्नवे) आनन्दप्रदायक (सुताय) रस को प्राप्त करने के लिए (दीर्घजिह्व्यम्) लम्बी जीभवाले अर्थात् दूरस्थ विषयों के भी ग्रहण में समर्थ (श्वानम्) वेगवान् मन को (अपश्नथिष्टन) प्रवृत्त करो ॥१॥
भावार्थःज्ञान, कर्म और उपासना में मन को प्रवृत्त करके उससे मिलनेवाला आनन्द सबको प्राप्त करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
यो꣡ धार꣢꣯या पाव꣣क꣡या꣢ परिप्र꣣स्य꣡न्द꣢ते सु꣣तः꣢ । इ꣢न्दु꣣र꣢श्वो꣣ न꣡ कृत्व्यः꣢꣯ ॥६९८॥
पदार्थः(सुतः) उत्पन्न किया गया (यः) जो (पावकया) पवित्र करनेवाली (धारया) धारा के साथ (परिप्रस्यन्दते) चारों ओर बहता है, वह (इन्दुः) ज्ञान, कर्म और उपासना से मिलनेवाला आनन्द (कृत्व्यः) संग्राम में कुशल (अश्वः न) घोड़े के समान (कृत्व्यः) कृतार्थ करनेवाला होता है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःवे लोग धन्य हैं, जो ज्ञान, कर्म और उपासना से प्राप्त होनेवाले अगाध आनन्द का अनुभव करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
तं꣢ दु꣣रो꣡ष꣢म꣣भी꣢꣫ नरः꣣ सो꣡मं꣢ वि꣣श्वा꣡च्या꣢ धि꣣या꣢ । य꣣ज्ञा꣡य꣢ स꣣न्त्व꣡द्र꣢यः ॥६९९॥
पदार्थः(दुरोषम्) जलाये या सुखाये न जा सकने योग्य (तम्) उस पूर्ववर्णित (सोमम्) ज्ञान-कर्म-उपासनारूप सोमरस को (नरः) सज्जन लोग (विश्वाच्या) सब उत्कृष्ट विषयों के विवेचन में व्याप्त होनेवाली (धिया) बुद्धि से (अभि) अभिषुत करें, जिससे (अद्रयः) किसी भी आन्तरिक या बाह्य शत्रु से विदीर्ण न होनेवाले वे लोग (यज्ञाय) परमेश्वर की पूजा, विद्वानों के सत्कार, संगठन और परोपकार-रूप यज्ञ के लिए (सन्तु) होवें ॥३॥
भावार्थःश्रेष्ठज्ञान, सत्कर्म और परमेश्वर की उपासना को जो अपने जीवन में ग्रहण करते हैं वे सदा विजयी और यज्ञपरायण होते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣣भि꣢ प्रि꣣या꣡णि꣢ पवते꣣ च꣡नो꣢हितो꣣ ना꣡मा꣢नि य꣣ह्वो꣢꣫ अधि꣣ ये꣢षु꣣ व꣡र्ध꣢ते । आ꣡ सूर्य꣢꣯स्य बृह꣣तो꣢ बृ꣣ह꣢꣫न्नधि꣣ र꣢थं꣣ वि꣡ष्व꣢ञ्चमरुहद्विचक्ष꣣णः꣢ ॥७००॥
पदार्थः(चनोहितः) भोगों को भोगने के लिए शरीर में प्रेषित, (यह्वः) महाशक्तिशाली जीवात्मा (प्रियाणि) प्रिय (नामानि) लचकीले अङ्गों में (पवते) जाता है, (येषु अधि) जिनमें, यह (वर्धते) महिमा को प्राप्त करता है। (बृहन्) महान् (विचक्षणः) ज्ञानवान् यह जीवात्मा (बृहतः) महान् (सूर्यस्य) गतिमय प्राण के (वि-स्वञ्चम्) विशिष्ट शुभगतिवाले (रथम् अधि) देहस्य रथ पर (आ अरुहत्) चढ़कर बैठा हुआ है ॥१॥
भावार्थःआत्मा कर्मफल-भोग के लिए प्राणयुक्त देह का आश्रय लेकर शुभाशुभ भोगों को भोगता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
ऋ꣣त꣡स्य꣢ जि꣣ह्वा꣡ प꣢वते꣣ म꣡धु꣢ प्रि꣣यं꣢ व꣣क्ता꣡ पति꣢꣯र्धि꣣यो꣢ अ꣣स्या꣡ अदा꣢꣯भ्यः । द꣡धा꣢ति पु꣣त्रः꣢ पि꣣त्रो꣡र꣢पी꣣च्यां꣢३꣱ ना꣡म꣢ तृ꣣ती꣢य꣣म꣡धि꣢ रोच꣣नं꣢ दि꣣वः꣢ ॥७०१
पदार्थः(ऋतस्य) सत्यस्वरूप जगदीश्वर की (जिह्वा) वेदवाणी (प्रियम्) प्रिय (मधु) अध्यात्मज्ञानरूप मधु को (पवते) बहा रही है। (अस्याः धियः) इस ज्ञानमयी वेदवाणी का (वक्ता) वक्ता (पतिः) जगत्पति परमेश्वर (अदाभ्यः) अजर-अमर है। इस वेदवाणी के माध्यम से (पुत्रः) अमृतमय परमात्मा का पुत्र उपासक (पित्रोः) माता-पिता से भी (अपीच्यम्) छिपे हुए, (दिवः रोचनम्) जीवात्मा को प्रकाशित करनेवाले (तृतीयं नाम) तृतीय पद ओंकार को (अभिदधाति) हृदय में धारण कर लेता है। कहा भी है-“तत्त्वदर्शी विद्वान् लोग विष्णु परमात्मा के उस परमपद का वैसे ही स्वाभाविक रूप से दर्शन करते हैं, जैसे सूर्यप्रकाश में आँख पदार्थों को देखती है'' (य० ६।५) ॥२॥
भावार्थःप्रकृति, जीवात्मा और ओंकार ये तीन पद हैं। ईश्वररचित वेदों का रहस्यार्थ जानकर मनुष्य अपने माता-पिता से भी अधिक ज्ञानी होकर ओंकार-रूप परमपद को प्राप्त करने योग्य हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣡व꣢ द्युता꣣नः꣢ क꣣ल꣡शा꣢ꣳ अचिक्रद꣣न्नृ꣡भि꣢र्येमा꣣णः꣢꣫ कोश꣣ आ꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡ये꣢ । अ꣣भी꣢ ऋ꣣त꣡स्य꣢ दो꣣ह꣡ना꣢ अनूष꣣ता꣡धि꣢ त्रिपृ꣣ष्ठ꣢ उ꣣ष꣢सो꣣ वि꣡ रा꣢जसि ॥७०२॥
पदार्थः(नृभिः) उपासक जनों द्वारा (हिरण्यये कोशे) ज्योतिर्मय विज्ञानमय कोश में (येमाणः) नियन्त्रित किया जाता हुआ, (द्युतानः) प्रकाशमान ब्रह्मानन्दरूप सोमरस (कलशान्) आत्मारूप द्रोणकलशों में (अव अचिक्रदत्) कल-कल ध्वनि-सी करता हुआ प्रवेश करता है। (ऋतस्य) सच्चे ब्रह्मानन्द-रस को (दोहनाः) दुहनेवाले उपासक लोग उस रस की (अभि अनूषत) स्तुति करते हैं। (त्रिपृष्ठः) ज्ञानकर्मोपासनारूप तीन आधारोंवाला तू, हे ब्रह्मानन्द-रस ! (उषसः अधि) उषाकाल में सन्ध्योपासना में (विराजसि) विशेष रूप से प्रकाशित होता है ॥३॥
भावार्थःयोग द्वारा ब्रह्मानन्द-रस से अपने आत्मा को सींचकर योगी जन कृतार्थ होवें ॥३॥ इस खण्ड में आचार्य, परमात्मा, जीवात्मा, ज्ञानकर्मोपासना, वेद एवं ब्रह्मानन्द का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ प्रथम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
य꣣ज्ञा꣡य꣢ज्ञा वो अ꣣ग्न꣡ये꣢ गि꣣रा꣡गि꣢रा च꣣ द꣡क्ष꣢से । प्र꣡प्र꣢ व꣣य꣢म꣣मृ꣡तं꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसं प्रि꣣यं꣢ मि꣣त्रं꣡ न श꣢꣯ꣳसिषम् ॥७०३॥
पदार्थःहे भाइयो ! मैं (यज्ञायज्ञा) प्रत्येक यज्ञ में (वः) तुम्हें (अग्नये) अपने अन्तरात्मा में अग्नि प्रज्वलित करने के लिये प्रेरित करता हूँ। (गिरागिरा च) और प्रत्येक वाणी द्वारा (दक्षसे) आत्मोन्नति के लिऐ, प्रेरित करता हूँ। (वयम्) हम सब मिल कर (अमृतम्) अमर, (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता जीवात्मा को (प्रप्र) अधिकाधिक प्रोद्बोधन देते हैं। मैं अलग भी (मित्रं न) मित्र के समान (प्रियम्) प्रिय उस जीवात्मा का (प्रप्र शंसिषम्) अधिकाधिक गुणकीर्तन करता हूँ ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य के अन्तरात्मा के अन्दर महान् शक्ति छिपी पड़ी है, उसे जगाकर बड़े-बड़े कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
ऊ꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣ꣳ स꣢ हि꣣ना꣡यम꣢꣯स्म꣣यु꣡र्दाशे꣢꣯म ह꣣व्य꣡दा꣢तये । भु꣢व꣣द्वा꣡जे꣢ष्ववि꣣ता꣡ भुव꣢꣯द्वृ꣣ध꣢ उ꣣त꣢ त्रा꣣ता꣢ त꣣नू꣡ना꣢म् ॥७०४॥
पदार्थः(ऊर्जः) बल के (नपातम्) न गिरने देनेवाले परमेश्वर की, मैं (प्रप्र शंसिषम्) पुनः पुनः प्रशंसा करता हूँ। (सः अयम्) वह यह (हिन) निश्चय ही (अस्मयुः) हमसे प्रीति करनेवाला है। (हव्यदातये) देने योग्य सद्गुण आदि के दाता उस परमेश्वर के लिये, हम (दाशेम) आत्मसमर्पण करें। वह (वाजेषु) देवासुरसंग्रामों में, हमारा (अविता) रक्षक (भुवत्) होवे, (वृधः) वृद्धिकर्ता (भुवत्) होवे, (उत्) और (तनूनाम्) हमारे अन्नमय प्राणमय, मनोमय आदि शरीरों का (त्राता) त्राणकर्ता, होवे ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को योग्य है कि परमात्मा को आत्मसमर्पण करके महान् कल्याण प्राप्त करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ए꣢ह्यू꣣ षु꣡ ब्रवा꣢꣯णि꣣ ते꣡ऽग्न꣢ इ꣣त्थे꣡त꣢रा꣣ गि꣡रः꣢ । ए꣣भि꣡र्व꣢र्धास꣣ इ꣡न्दु꣢भिः ॥७०५॥
पदार्थःहे (अग्ने) तपस्वी विद्यार्थी ! (एहि उ) आ, मैं (ते) तेरे लिये (सु) भली-भाँति (इत्था) सच्चे रूप में (इतराः) सामान्य वाणियों से विलक्षण प्रकार की (गिरः) शास्त्रवाणियों का (ब्रवाणि) उपदेश करूँ। तू (एभिः) इन (इन्दुभिः) विद्या-रसों से (वर्धासे) वृद्धि को प्राप्त कर ॥१॥
भावार्थःगुरुओं को चाहिये कि प्रेम से बुलाकर शिष्यों को मनोयोग से पढ़ाएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣢त्र꣣꣬ क्व꣢꣯ च ते꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्षं꣢ दधस꣣ उ꣡त्त꣢रम् । त꣢त्र꣣ यो꣡निं꣢ कृणवसे ॥७०६॥
पदार्थःहे विद्यार्थिन् ! (यत्र क्व च) जिस किसी भी विज्ञान में (ते मनः) तेरा मन है, अर्थात् तेरी रुचि है, उसमें (उत्तरम्) अधिकाधिक (दक्षम्) बल को, निपुणता को (दधसे) धारण कर और (तत्र)उस विज्ञान में (योनिम्) घर (कृणवसे) कर ले, अर्थात् उस विद्या में पारंगत हो जा ॥२॥
भावार्थःजिन भी विद्याओं में शिष्यों की रुचि तथा ग्रहणशक्ति हो, उन विद्याओं में गुरुजन उन्हें निष्णात करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
न꣡ हि ते꣢꣯ पू꣣र्त꣡म꣢क्षि꣣प꣡द्भुव꣢꣯न्नेमानां पते । अ꣢था꣣ दु꣡वो꣢ वनवसे ॥७०७॥
पदार्थःहे (नेमानां पते) हम अपूर्णों के पालनकर्ता आचार्यवर ! (ते) आपका (पूर्तम्) पालनपूरण (अक्षिपत्) आँख आदि इन्द्रियों को पतन की ओर ले जानेवाला (नहि) न (भुवत्) होवे। (अथ) और, आप हमारे (दुवः) सत्कार को (वनवसे) स्वीकार कीजिए ॥३॥
भावार्थःगुरुजन शिष्यों को भली-भाँति पढ़ाकर सदाचार में प्रवृत्त करें और शिष्य उनका श्रद्धा के साथ सत्कार करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
व꣣य꣢मु꣣ त्वा꣡म꣢पूर्व्य स्थू꣣रं꣢꣫ न कच्चि꣣द्भ꣡र꣢न्तोऽव꣣स्य꣡वः꣢ । व꣡ज्रि꣢ञ्चि꣣त्र꣡ꣳ ह꣢वामहे ॥७०८॥
पदार्थःहे (अपूर्व्य) अद्वितीय बल से युक्त, (वज्रिन्) काम, क्रोध आदि शत्रुओं पर वज्र-प्रहार करनेवाले मेरे अन्तरात्मा ! (अवस्यवः) प्रगति को चाहनेवाले (वयम्) हम (चित्रम्) अद्भुत गुण-कर्म-स्वभाववाले (त्वाम्) आपको (आह्वयामः) पुकारते हैं। किस प्रकार? (न) जैसे (कच्चित्) किसी (स्थूरम्) स्थूल बड़ी वस्तु को (हरन्तः) दूसरे स्थान पर ले जाते हुए लोग, सहायता के लिये किसी को पुकारते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःप्रगति के मार्ग पर दौड़ने के लिये अपना अन्तरात्मा मनुष्य का परम सहायक होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
उ꣡प꣢ त्वा꣣ क꣡र्म꣢न्नू꣣त꣢ये꣣ स꣢ नो꣣ यु꣢वो꣣ग्र꣡श्च꣢क्राम꣣ यो꣢ धृ꣣ष꣢त् । त्वा꣡मिध्य꣢꣯वि꣣ता꣡रं꣢ व꣣वृ꣢म꣣हे स꣡खा꣢य इन्द्र सान꣣सि꣢म् ॥७०९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमसहायक परमात्मन् ! (कर्मन्) कर्मों में (ऊतये) रक्षा के लिये हम (त्वा) आपको (उप) प्राप्त होते हैं। भाइयो ! देखो (सः) वह (नः) हमारा (युवा) सदा युवा रहनेवाला (उग्रः)वीर प्रभु, उस पर (चक्राम) आक्रमण कर देता है, (यः) जो आन्तरिक या बाह्य शत्रु (धृषत्) हमें दबाता है। हे परमेश ! (सखायः) आपके सखा हम (अवितारम्) रक्षक, (सानसिम्) संभजनीय (त्वाम् इत् हि) आपको ही (ववृमहे) वरण करते हैं ॥२॥
भावार्थःमहाशक्तिशाली जीव को भी संसार-समराङ्गण में विजय पाने के लिये परमात्मा की सहायता अपेक्षित होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -ककुबुष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
अ꣢धा꣣꣬ ही꣢꣯न्द्र गिर्वण꣣ उ꣡प꣢ त्वा꣣ का꣡म꣢ ई꣣म꣡हे꣢ ससृ꣣ग्म꣡हे꣢ । उ꣣दे꣢व꣣ ग्म꣡न्त꣢ उ꣣द꣡भिः꣢ ॥७१०॥
पदार्थःहे (गिर्वणः) उपदेशवाणियों के लिये सेवनीय (इन्द्र) ब्रह्मवेत्ता आचार्यप्रवर ! (अध हि) अब हम शिष्य लोग (कामे) ब्रह्मसाक्षात्काररूपी मनोरथ की पूर्ति के लिये (त्वा) तेरे (उप) (ईमहे) समीप पहुँचते हैं और (ससृग्महे) तेरे साथ निकट संसर्ग प्राप्त करते हैं। कैसे? (उदा इव) जैसे जलों के बीच से (ग्मन्तः) जाते हुए लोग (उदभिः) जलों से संसर्ग को पाते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘महे, महे’ और ‘उदे, उद’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःजब जिज्ञासुजन समित्पाणि होकर आचार्य के प्रति स्वयं को समर्पित करके उसके सान्निध्य में रहते हैं और उससे कुछ भी नहीं छिपाते हैं, तभी वे उसके पास से अपरा विद्या और परा विद्या सीख पाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
वा꣡र्ण त्वा꣢꣯ य꣣व्या꣢भि꣣र्व꣡र्ध꣢न्ति शूर꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि । वा꣣वृध्वा꣡ꣳसं꣢ चिदद्रिवो दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥७११॥
पदार्थःहे (शूर) शूरवीर, (अद्रिवः) किसी से विदारण न किये जा सकनेवाले अजर-अमर इन्द्र प्रभु ! (यव्याभिः) नहरों द्वारा जल लाकर (वाः न) जैसे सरोवर आदि में लोग जल के परिमाण को बढ़ाते रहते हैं, वैसे ही (वावृध्वांसं चित्) पहले से बढ़े हुए भी (त्वा) तुझे (ब्रह्माणि) उपासक के स्तोत्र (वर्धन्ति) अपने हृदय में बढ़ाते हैं या समाज में प्रचारित करते हैं ॥२॥ ‘जो पहले से ही बढ़ा हुआ है, उसे भी बढ़ाते हैं’ इसमें विरोधालङ्कार है। बढ़ाने से स्मरण तथा प्रचार अभिप्रेत होने पर विरोध का परिहार हो जाता है ॥२॥
भावार्थःसर्वान्तर्यामी ह्रासवृद्धिरहित भी परमेश्वर लोगों द्वारा भुला दिये जाने से और नास्तिकता का प्रचार हो जाने के कारण मानो ह्रास को प्राप्त हो जाता है। भक्तजनों को चाहिए कि उसके स्तोत्रों का गान करके उसे बढ़ायें तथा उसका प्रचार करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पुर उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
यु꣣ञ्ज꣢न्ति꣣ ह꣡री꣢ इषि꣣र꣢स्य꣣ गा꣡थ꣢यो꣣रौ꣡ रथ꣢꣯ उ꣣रु꣡यु꣢गे वचो꣣यु꣡जा꣢ । इ꣣न्द्रवा꣡हा꣢ स्व꣣र्वि꣡दा꣢ ॥७१२॥
पदार्थःउपासक लोग (इषिरस्य) सर्वान्तर्यामी परमेश्वर के (गाथया) कीर्तिगान के साथ (उरुयुगे) जिसमें पृष्ठवंशरूप विस्तीर्ण धुरा लगा है ऐसे, (उरौ) विशाल (रथे) देहरूप रथ में (वचोयुजा) कहते ही कार्यसंलग्न हो जानेवाले, (इन्द्रवाहा) आत्मा से प्रेरित होनेवाले, (स्वर्विदा) ज्ञान तथा कर्म को प्राप्त करानेवाले (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-रूप घोड़ों को (युञ्जन्ति) कार्यतत्पर कर देते हैं ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना के साथ जीवन में ज्ञान का संचय तथा पुरुषार्थ भी करना चाहिये ॥३॥ इस खण्ड में आत्मोद्बोधन, जीवात्मा, परमात्मा, गुरु-शिष्य आदि का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ प्रथम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ प्रथम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
पा꣢न्त꣣मा꣢ वो꣣ अ꣡न्ध꣢स꣣ इ꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । वि꣣श्वासा꣡ह꣢ꣳ श꣣त꣡क्र꣢तुं꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठं चर्षणी꣣ना꣢म् ॥७१३॥
पदार्थःहे शिष्यो ! (वः) तुम (अन्धसः) विद्या-रस की (पान्तम्) रक्षा करनेवाले, (विश्वासाहम्) काम, क्रोध, अज्ञान, आलस्य आदि सब शत्रुओं को पराजित करनेवाले, (शतक्रतुम्) बहुत बुद्धिमान् तथा बहुत कर्मण्य, (चर्षणीनाम्) पुरुषार्थी छात्रों को (मंहिष्ठम्) अतिशय विद्या और सदाचार का दान करनेवाले (इन्द्रम् अभि) अगाध ज्ञान आदि ऐश्वर्य से शोभायमान आचार्य को लक्ष्य करके (प्र गायत) भली-भाँति स्तुति करो ॥१॥
भावार्थःजो शिष्य विद्या के समुद्र, शिक्षण-कला में कुशल, सदाचारी, ब्रह्मिष्ठ गुरु की श्रद्धा के साथ सेवा करते हैं, वे विद्वान्, सदाचारी, ब्रह्मज्ञानी होकर अभ्युदय प्राप्त करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
पु꣣रुहूतं꣡ पु꣢रुष्टु꣣तं꣡ गा꣢था꣣न्या꣡३꣱ꣳस꣡न꣢श्रुतम् । इ꣢न्द्र꣣ इ꣡ति꣢ ब्रवीतन ॥७१४॥
पदार्थःहे शिष्यो ! तुम (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे जानेवाले, (पुरुस्तुतम्) बहुत स्तुति किये जानेवाले, (गाथान्यम्) वेदवाणियों को प्राप्त करानेवाले अर्थात् वेदवाणियों के उपदेष्टा, (सनश्रुतम्) सनातन-रूप से प्रसिद्ध परमेश्वर को ही (इन्द्रः इति) इन्द्र नाम से (ब्रवीतन) कहा करो ॥२॥
भावार्थःयद्यपि इन्द्र का अर्थ आचार्य भी होता है तथापि इन्द्रों का भी इन्द्र परमेश्वर ही है, जैसा कि योगदर्शन १।२६ में वर्णित है कि ‘ईश्वर काल से बंधा न होने के कारण प्राचीनों का भी गुरु है’ ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्र꣣ इ꣡न्नो꣢ म꣣हो꣡नां꣢ दा꣣ता꣡ वाजा꣢꣯नां नृ꣣तुः꣢ । म꣣हा꣡ꣳ अ꣢भि꣣ज्ञ्वा꣡ य꣢मत् ॥७१५॥
पदार्थः(इन्द्रः इत्) जगदीश्वर ही (नः) हमारे लिये (महोनाम्) महान् (वाजानाम्) धन, अन्न, बल, वेग, विज्ञान आदि का (दाता) दाता और (नृतुः) जगत् के प्राङ्गण में सब प्राणियों को उन-उनके कर्मों के अनुसार नचानेवाला है। (महान्) महान् वह माता के गर्भ में प्राणियों को (अभिज्ञु) घुटने मोड़े हुए (आयमत्) बाँधे रखता है ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर ही सबका उत्पादक, पालक, संहारक और कर्मफलों का प्रदाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य꣣ मा꣡द꣢न꣣ꣳ ह꣡र्य꣢श्वाय गायत । स꣡खा꣢यः सोम꣣पा꣡व्ने꣢ ॥७१६॥
पदार्थःहे (सखायः) साथियो ! (वः) तुम (हर्यश्वाय) ज्ञान ग्रहण कराने और कर्मों को करानेवाले ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय रूप घोड़े जिसके पास हैं ऐसे, (सोमपाव्ने) ब्रह्मानन्दरस का पान करनेवाले (इन्द्राय)अपने अन्तरात्मा के लिये (मादनम्) हर्षक एवं उद्बोधक गीत (प्र गायत) भली-भाँति गाया करो ॥१॥
भावार्थःअपने आत्मा को उद्बोधन देकर ही सब लोग संसार-समर में विजय तथा ब्रह्मानन्दरस पा सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
श꣢꣫ꣳसेदु꣣क्थ꣢ꣳ सु꣣दा꣡न꣢व उ꣣त꣢ द्यु꣣क्षं꣢꣫ यथा꣣ न꣡रः꣢ । च꣣कृमा꣢ स꣣त्य꣡रा꣢धसे ॥७१७॥
पदार्थःहे साथी ! तू (सुदानवे) उत्कृष्ट दानी इन्द्र परमात्मा के लिए (उक्थम्) स्तोत्र का (उत) और (द्युक्षम्) तेज का निवास करानेवाले उसके गुण-कर्म-स्वभाव का (शंस इत्) अवश्य कीर्तन कर, (यथा) जिस प्रकार (नरः) नेता हम लोग (सत्यराधसे) सच्चे धनवाले उसके लिये (चकृम) स्तोत्र का तथा उसके गुण-कर्म-स्वभाव का कीर्तन करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चहिये कि जगदीश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का कीर्तन करके उसके अनुकूल अपना जीवन बनायें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्वं꣡ न इ꣢न्द्र वाज꣣यु꣢꣫स्त्वं ग꣣व्युः꣡ श꣢तक्रतो । त्व꣡ꣳ हि꣢रण्य꣣यु꣡र्व꣢सो ॥७१८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (नः) हमारे लिये (वाजयुः) अन्न, धन, बल, विज्ञान आदि प्रदान करने के इच्छुक होवो। हे (शतक्रतो) अनन्त ज्ञान तथा अनन्त कर्मोंवाले जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (गव्युः) हमें गाय प्रदान करने के इच्छुक होवो। हे (वसो) निवास देनेवाले जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (हिरण्ययुः) हमें सुवर्ण और ज्योति प्रदान करने के इच्छुक होवो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना करके उसकी कृपा से हम अन्न, धन, गाय, बल, वेग, विज्ञान, श्रेष्ठ संकल्प, श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ विवेक, श्रेष्ठ प्रकाश, श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ गुण तथा दुःखों से मोक्ष आदि सभी भौतिक और दिव्य सम्पदा पाने योग्य होवें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
व꣣य꣡मु꣢ त्वा त꣣दि꣡द꣢र्था꣣ इ꣡न्द्र꣢ त्वा꣣य꣢न्तः꣣ स꣡खा꣢यः । क꣡ण्वा꣢ उ꣣क्थे꣡भि꣢र्जरन्ते ॥७१९॥
पदार्थःहे आचार्यप्रवर ! (तदिदर्थाः) वह लौकिक विद्या तथा ब्रह्मविद्या का अध्ययन ही जिनका उद्देश्य है, ऐसे (वयम्) हम विद्यार्थी (त्वा) आपके समीप आते हैं। हे (इन्द्र) विद्याओं के अधिपति ! (सखायः) सहाध्यायी हम (त्वायन्तः) आपको चाहते हैं। सभी (कण्वाः) मेधावी विद्यार्थी (उक्थेभिः) स्तोत्रों से आपकी (जरन्ते) स्तुति करते हैं ॥१॥
भावार्थःशिष्यों को चाहिये कि गुरुओं के प्रति सदा ही विनय का व्यवहार करें, नित्य उनकी सेवा करें। कहा भी है—“पढ़ाए हुए जो विप्र छात्र मन-वाणी-कर्म से गुरु का आदर नहीं करते, वे गुरु के कृपापात्र नहीं बनते और न ही पढ़ी हुई विद्या उनकी रक्षा करती है (निरुक्त २।४) ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
न꣡ घे꣢म꣣न्य꣡दा प꣢꣯पन꣣ व꣡ज्रि꣢न्न꣣प꣢सो꣣ न꣡वि꣢ष्टौ । त꣢꣯वेदु꣣ स्तो꣡मै꣢श्चिकेत ॥७२०॥
पदार्थःहे (वज्रिन्) कठोर नियन्त्रण रूप वज्र से शिष्यों को संस्कृत करनेवाले गुरुवर ! (अपसः) विद्याध्ययनरूप कर्म के (नविष्टौ) नवीन सत्र के आरम्भ में, मैं (अन्यत्) किसी अन्य की (न घ ईम्) नहीं (आ पपन) स्तुति करता हूँ (तव इत् उ) आपकी ही (स्तोमैः) सूक्तियों से (चिकेत) ज्ञानी बनता हूँ ॥२॥
भावार्थःशिष्यों को चाहिए कि विद्या के लिए यथासंभव उस विद्या में निष्णात एक ही गुरु को चुनें, क्योंकि अनेकों को चुनने में उनके पारस्परिक मतभेदों के कारण नाना सन्देह उत्पन्न हो सकते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣च्छ꣡न्ति꣢ दे꣣वाः꣢ सु꣣न्व꣢न्तं꣣ न꣡ स्वप्ना꣢꣯य स्पृहयन्ति । य꣡न्ति꣢ प्र꣣मा꣢द꣣म꣡त꣢न्द्राः ॥७२१॥
पदार्थः(देवाः) विद्वान् गुरुजन (सुन्वन्तम्) पुरुषार्थरूप सोमयाग करनेवाले विद्यार्थी को ही (इच्छन्ति) शिष्यरूप में स्वीकार करना चाहते हैं। वे (स्वप्नाय) निद्रालु आलसी शिष्य को (न स्पृहयन्ति) नहीं पसन्द करते। (प्रमादम्) जो विद्याध्ययन से प्रहृष्ट हो जानेवाला है, उसके पास वे (अतन्द्राः) निरालस्य होकर (यन्ति) जाते हैं ॥३॥
भावार्थःलौकिक विद्या और ब्रह्मविद्या की भी प्राप्ति पुरुषार्थ से ही होती है। पुरुषार्थी की ही दूसरे लोग भी सहायता करते हैं, निष्कर्मण्य की नहीं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ म꣡द्व꣢ने सु꣣तं꣡ परि꣢꣯ ष्टोभन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ । अ꣣र्क꣡म꣢र्च्चन्तु का꣣र꣡वः꣢ ॥७२२॥
पदार्थः(मद्वने) ब्रह्मविद्या में आनन्द अनुभव करनेवाले (इन्द्राय)शिष्यों के आत्मा के लिए (नः) हमारी (गिरः) वाणियाँ (सुतम्) अभिषुत ज्ञान को (परिष्टोभन्तु) परिधारित करें, देवें, जिससे (कारवः) स्तुतिकर्ता होते हुए वे (अर्कम्) पूजनीय परमात्मदेव की (अर्चन्तु) पूजा किया करें ॥१॥
भावार्थःशिष्यों को चाहिए कि गुरुओं से लौकिक ज्ञान और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके गुरुजनों द्वारा उपदेश किये गये मार्ग से परमात्मा का ध्यान करते हुए उसका साक्षात्कार करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣢स्मि꣣न्वि꣢श्वा꣣ अ꣢धि꣣ श्रि꣢यो꣣ र꣡ण꣢न्ति स꣣प्त꣢ स꣣ꣳस꣡दः꣢ । इ꣡न्द्र꣢ꣳ सु꣣ते꣡ ह꣢वामहे ॥७२३॥
पदार्थः(यस्मिन् अधि) जिसके अधिष्ठातृत्व में (विश्वाः श्रियः) सब शोभाएँ विद्यमान हैं, और जिसकी (सप्त संसदः) सात ऋत्विज्, सात दिशाएँ, सात प्रकार की सूर्यकिरणें, सात छन्द, सात मन-बुद्धि-सहित ज्ञानेन्द्रियाँ और सात आकाशस्थ ऋषि (रणन्ति) स्तुति कर रहे हैं, उस (इन्द्रम्) जगदीश्वर को (सुते) उपासना-यज्ञ में या जीवन-यज्ञ में, हम (हवामहे) पुकारते हैं ॥ सात ऋत्विज् ऋग्वेद २।१।२ में इस प्रकार परिगणित किये गये हैं—होता, पोता, नेष्टा, अग्नीत्, प्रशास्ता, अध्वर्यु और ब्रह्मा। सोमयाग के सात ऋत्विज् हैं—तीन उद्गाता, एक होता, एक मैत्रावरुण, एक ब्राह्मणाच्छंसी और एक अच्छावाक ॥ सात दिशाएँ हैं—पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, ध्रुवा, ऊर्ध्वा और केन्द्र। आकाश में स्थित सप्तर्षियों के नाम ये हैं—मरीचि, वसिष्ठ, अङ्गिरस्, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु ॥ ऋग्वेद ९।११४।३ में सात-सात वस्तुएँ गिनाते हुए कहा गया है कि सात दिशाएँ हैं, सात होता ऋत्विज् हैं, सात आदित्य-किरणें हैं ॥ यजुर्वेद २६।१ में सप्त संसद् बतायी गयी हैं—अग्नि, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यौ, आपः और वरुण। आठवीं भूतसाधनी पृथिवी कही गयी है ॥२॥
भावार्थःब्रह्माण्ड में स्थित सभी दिशा, विदिशा आदि पदार्थ, शरीर में स्थित मन, बुद्धि आदि और यज्ञ में स्थित सब ऋत्विज् जगदीश्वर की ही महिमा का गान करते प्रतीत होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्रि꣡क꣢द्रुकेषु꣣ चे꣡त꣢नं दे꣣वा꣡सो꣢ य꣣ज्ञ꣡म꣢त्नत । त꣡मि꣢꣯द्वर्धन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ ॥७२४॥
पदार्थः(देवासः) विद्वान् लोग (त्रिकद्रुकेषु) जिनमें आत्मा, मन और बुद्धि ये तीन मूल केन्द्र होते हैं उन व्यवहारों में (चेतनम्) चेतना प्रदान करनेवाले (यज्ञम्) उपासनायज्ञ को (अत्नत) फैलाते हैं। (तम् इत्) उसी उपासनायज्ञ को (नः) हमारी (गिरः) स्तुतिवाणियाँ (वर्धन्तु) बढ़ायें ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से मनुष्य की आत्मा में चेतना का प्रवाह, जागरूकता, कर्तव्यनिष्ठा, शूरता, कर्मण्यता, विजयशीलता, परोपकारिता इत्यादि गुण स्वयं ही आ जाते हैं ॥३॥ इस खण्ड में जीवात्मा-परमात्मा व गुरु-शिष्य विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ द्वितीय अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣यं꣡ त꣢ इन्द्र꣣ सो꣢मो꣣ नि꣡पू꣢तो꣣ अ꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ए꣡ही꣢म꣣स्य꣢꣫ द्रवा꣣ पि꣡ब꣢ ॥७२५॥
पदार्थःआचार्य कह रहा है—हे (इन्द्र) शिष्य के अन्तरात्मन् ! (अयम्) यह (सोमः) अध्यात्म-विद्या का रस (ते) तेरे लिए (बर्हिषि अधि) विद्या-यज्ञ में (निपूतः) अत्यधिक पवित्र रूप में उपस्थित है। (एहि) आ, (ईम्) इसके प्रति (द्रव) झपट, (अस्य) इस अध्यात्म-विद्या के रस को (पिब) पान कर ॥१॥
भावार्थःजिसका आत्मा अध्यात्मविद्या के ग्रहण के लिए अत्यधिक उत्कण्ठित है, वही गुरु के पास से ब्रह्मज्ञान पा सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
शा꣡चि꣢गो꣣ शा꣡चि꣢पूजना꣣य꣡ꣳ रणा꣢꣯य ते सु꣣तः꣢ । आ꣡ख꣢ण्डल꣣ प्र꣡ हू꣢यसे ॥७२६॥
पदार्थःहे (शाचिगो) जिसकी वाणियाँ ज्ञान और कर्म का उपदेश करनेवाली हैं, ऐसे जगदीश्वर ! हे (शाचिपूजन) ज्ञानी पुरुषार्थियों से पूजे जानेवाले परमात्मन् ! (अयम्) यह भक्ति-रस (ते) आपके (रणाय) रमने के लिए (सुतः) हमारे द्वारा उत्पन्न किया गया है। हे (आखण्डल) दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि को खण्ड-खण्ड करनेवाले देव ! आप उस भक्ति-रस का पान करने के लिए (प्रहूयसे) हमारे द्वारा चाव से बुलाए जा रहे हो ॥२॥
भावार्थःज्ञान और पुरुषार्थपूर्वक भक्तिभाव से आराधना किया हुआ परमेश्वर उपासकों के दुःख, दारिद्र्य आदि को खण्डित करके उन्हें ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करके सुखी करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡स्ते꣢ शृङ्गवृषो णपा꣣त्प्र꣡ण꣢पात्कुण्ड꣣पा꣡य्यः꣢ । न्य꣢꣯स्मिन् दध्र꣣ आ꣡ मनः꣢꣯ ॥७२७॥
पदार्थःहे (शृङ्गवृषः नपात्) रश्मियों से वर्षा करनेवाले सूर्य को बिना ही आधार के आकाश में स्थिर करनेवाले जगदीश्वर ! (यः ते) जो आपका (प्र नपात्) प्रकृष्ट रूप से रक्षक (कुण्डपाय्यः) समुद्ररूप कुण्ड जिसमें सूर्य द्वारा पिये जाते हैं, ऐसा वृष्टिरूप यज्ञ है, (अस्मिन्) इसमें, उपासक लोग (मनः) अपने मन को (आ निदध्रे) निहित करते हैं ॥३॥
भावार्थःजैसे सूर्य समुद्ररूप कुण्डों को पीकर बादल बना कर वर्षा करता है, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि धन कमाकर और योगसिद्धियाँ प्राप्त करके सत्पात्रों में उनकी वर्षा करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ तू न꣢꣯ इन्द्र क्षु꣣म꣡न्तं꣢ चि꣣त्रं꣢ ग्रा꣣भ꣡ꣳ सं गृ꣢꣯भाय । म꣣हाहस्ती꣡ दक्षि꣢꣯णेन ॥७२८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त गुरुवर ! आप (तु) शीघ्र ही (दक्षिणेन) उदारता से (नः) हमारे अन्दर (क्षुमन्तम्) शब्दशास्त्र के ज्ञान से युक्त, (चित्रम्) अद्भुत, दिव्य (ग्राभम्) ब्रह्मविद्यारूप धन को (सं गृभाय) संगृहीत कीजिए, जैसे (महाहस्ती) बड़े हाथोंवाला कोई पुरुष (दक्षिणेन) दाहिने हाथ से (ग्राभम्) ग्राह्य धन को संगृहीत करता है ॥१॥ यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःशिष्यों को चाहिए कि गुरुओं के पास से सब लौकिक विद्याओं तथा ब्रह्मविद्याओं को यत्न से संचित करें और गुरुओं को चाहिए कि वे प्रेमपूर्वक यत्न से उन्हें दें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
वि꣣द्मा꣡ हि त्वा꣢꣯ तुविकू꣣र्मिं꣢ तु꣣वि꣡दे꣢ष्णं तु꣣वी꣡म꣢घम् । तु꣣विमात्र꣡मवो꣢꣯भिः ॥७२९॥
पदार्थःहे सर्वान्तर्यामिन् परब्रह्म ! हम (हि) निश्चयपूर्वक (त्वा) आपको (तुविकूर्मिम्) उत्पत्ति, धारण, पालन आदि बहुत से कर्मों का कर्त्ता, (तुविदेष्णम्) बहुत से पदार्थों तथा सुख आदियों का दाता, (तुवीमघम्) बहुत धनी और (अवोभिः) रक्षाओं के साथ (तुविमात्रम्) सूर्य, चन्द्र, तारामण्डलादि बहुतों को मापनेवाला (विद्म) जानते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव को जानकर उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञता सबको प्रकट करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
न꣡ हि त्वा꣢꣯ शूर दे꣣वा꣡ न मर्ता꣢꣯सो꣣ दि꣡त्स꣢न्तम् । भी꣣मं꣢꣫ न गां वा꣣र꣡य꣢न्ते ॥७३०॥
पदार्थःहे (शूर) दानशूर परमात्मन् ! (दित्सन्तम्) जब आप किसी को भौतिक या दिव्य ऐश्वर्य देना चाहते हो, तब (त्वा) आपको (नहि) न तो (देवाः) चमकीले अग्नि, सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि कोई जड़ पदार्थ और (न) न ही (मर्तासः) मनुष्य (वारयन्ते) रोक सकते हैं, (भीमं गां न) जैसे भंयकर दुर्दान्त विद्युत् रूप अग्नि को कोई नहीं रोक सकता ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजो कृपालु परमेश्वर सूर्यकिरण, पत्र, पुष्प, फल, वायु जल आदि वस्तुओं को और सत्य, न्याय, दया, उदारता आदि को बिना मूल्य के ही प्रदान करता है, उसकी सबको कृतज्ञता के साथ वन्दना करनी चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ वृषभा सु꣣ते꣢ सु꣣त꣡ꣳ सृ꣢जामि पी꣣त꣡ये꣢ । तृ꣣म्पा꣡ व्य꣢श्नुही꣣ म꣡द꣢म् ॥७३१॥
पदार्थःहे (वृषभ) शक्तिशाली मेरे अन्तरात्मन् ! (सुते) इस उपासना-यज्ञ के प्रवृत्त होने पर (त्वा अभि) तेरे प्रति (पीतये) पान करने के लिए (सुतम्) श्रद्धा-रस (सृजामि) उत्पन्न कर रहा हूँ। इससे तू (तृम्प)तृप्त हो, (मदम्) हर्ष को (व्यश्नुहि) प्राप्त कर ॥१॥
भावार्थःसबको चाहिए कि अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर उसके अन्दर श्रद्धा-रस का सञ्चार करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
मा꣡ त्वा꣢ मू꣣रा꣡ अ꣢वि꣣ष्य꣢वो꣣ मो꣢प꣣ह꣡स्वा꣢न꣣ आ꣡ द꣢भन् । मा꣡ कीं꣢ ब्रह्म꣣द्वि꣡षं꣢ वनः ॥७३२॥
पदार्थःहे मेरे अन्तरात्मन् ! (मा) न तो (मूराः) मूढ़, अविवेकी (अविष्यवः) हिंसा करने के इच्छुक लोग और (मा) न ही (उपहस्वानः) उपहास करनेवाले लोग (त्वा) तेरी (आ दभन्) हिंसा कर सकें और (मा कीम्) न ही तू (ब्रह्मद्विषम्) ब्रह्मद्वेषी का (वनः) सङ्ग कर ॥२॥
भावार्थःमनुष्य का अन्तरात्मा यदि जागरूक रहे तो उसे कोई भी बाहरी या अन्तरिक्ष शत्रु पराजित नहीं कर सकता ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣ह꣢ त्वा꣣ गो꣡प꣢रीणसं म꣣हे꣡ म꣢न्दन्तु꣣ रा꣡ध꣢से । स꣡रो꣢ गौ꣣रो꣡ यथा꣢꣯ पिब ॥७३३॥
पदार्थःहे मेरे अन्तरात्मन् ! (इह) इस शरीर में (गोपरीणसम्) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियाँ आदि बहुत सी गौएँ जिसके पास हैं, ऐसे (त्वा) तुझे, हमारी उद्बोधक वाणियाँ (महे राधसे) महान् ऐश्वर्य के लिए (मन्दन्तु) उत्साहित करें। (गौरः) गौर मृग प्यास से व्याकुल होकर (यथा) जैसे उत्कण्ठा के साथ (सरः) जल को पीता है, वैसे ही तू (सरः) वेदवाणी के रस, ज्ञान-रस, कर्म-रस और ब्रह्मानन्द के रस को (पिब) पी ॥३॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्य अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर अपनी महत्वाकांक्षा के अनुरूप सब लौकिक और दिव्य सम्पदाओं को प्राप्त कर सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣द꣡म् व꣢सो सु꣣त꣢꣫मन्धः꣣ पि꣢बा꣣ सु꣡पू꣢र्णमु꣣द꣡र꣢म् । अ꣡ना꣢भयिन्ररि꣣मा꣡ ते꣢ ॥७३४॥
पदार्थःहे (वसो) गुरुकुलनिवासी, व्रतपालक ब्रह्मचारी ! (इदम् अन्धः) यह ब्रह्मविज्ञान, तेरे लिए (सुतम्) अभिषुत है, तू इसे (सुपूर्णम् उदरम्) पेट भरकर (पिब) पान कर। हे (अनाभयिन्) निर्भय शिष्य ! हम (ते) तेरे लिए, यह विज्ञान (ररिम) दे रहे हैं ॥१॥
भावार्थःजिन्होंने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे गुरुजनों को उचित है कि वे छात्रों को ब्रह्मज्ञान देकर अनुगृहीत करें ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
नृ꣡भि꣢र्धौ꣣तः꣢ सु꣣तो꣢꣫ अश्नै꣣र꣢व्या꣣ वा꣢रैः꣣ प꣡रि꣢पूतः । अ꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ न꣣दी꣡षु꣢ ॥७३५॥
पदार्थःहे शिष्य ! मेरे द्वारा जो तुझे ब्रह्मज्ञान-रस दिया जा रहा है वह (नृभिः) उन्नायक श्रेष्ठ विचारों द्वारा (धौतः) धोया गया है, (अश्नैः) पाषाणों के समान कठोर व्रताचरणों द्वारा (सुतः) अभिषुत किया गया है, (अव्याः) रक्षा करनेवाली बुद्धि के (वारैः) दोषनिवारक तर्कों द्वारा (परिपूतः) पवित्र किया गया है और (नदीषु) नदियों में (निक्तः) नहलाकर साफ किये गये (अश्वः न) घोड़े के समान (नदीषु) वेदवाणी की धाराओं में (निक्तः) शुद्ध किया गया है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। यहाँ श्लेष से सोम ओषधि के पक्ष में भी अर्थ-योजना करनी चाहिए। इससे ‘ब्रह्मविज्ञान सोमरस के समान है’ यह उपमानोपमेयभाव द्योतित होगा ॥२॥
भावार्थःजैसे ऋत्विज् लोग सोमलता को पवित्र जल से धोकर, सिल-बट्टों से कूटकर, रस निचोड़ कर, दशापवित्र नामक छन्नी से छानकर शुद्ध हुए सोमरस को अग्नि में होम करते हैं, वैसे ही गुरुजन ब्रह्मविद्यारूप लता को सद्विचारों से धोकर, कठोर व्रताचरणों से कूटकर, बुद्धि के तर्कों से छानकर, वेदवाणी की धाराओं में पवित्र करके शिष्य की आत्माग्नि में होम करते हैं ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
तं꣢ ते꣣ य꣢वं꣣ य꣢था꣣ गो꣡भिः꣢ स्वा꣣दु꣡म꣢कर्म श्री꣣ण꣡न्तः꣢ । इ꣡न्द्र꣢ त्वा꣣स्मिं꣡त्स꣢ध꣣मा꣡दे꣢ ॥७३६॥
पदार्थःहे शिष्य ! (तम्) उस ब्रह्मविद्यारूप सोमरस को (गोभिः) मधुर वाणियों से (श्रीणन्तः) परिपक्व करते हुए हमने (स्वादुम्) स्वादु (अकर्म) कर लिया है, (यथा) जैसे (यवम्) जौ के रस को (गोभिः) गाय के दूध से मधुर कर लेते हैं। हे (इन्द्र) प्रिय शिष्य ! (अस्मिन्) इस (सधमादे) जिसमें साथ मिलकर ब्रह्मज्ञान का पान करते हैं, ऐसे विद्या-यज्ञ में (त्वा) तुझे, हम ब्रह्मज्ञान का रस पीने के लिए बुला रहे हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःगुरुओं को चाहिए कि वे शिष्यों को लौकिक ज्ञान तथा ब्रह्मज्ञान नीरस रूप में नहीं, किन्तु सरस रूप में दें, जिससे उनकी उसमें रुचि हो ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य का विषय, परमेश्वर-जीवात्मा का विषय तथा ब्रह्मज्ञान का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣द꣡ꣳ ह्यन्वोज꣢꣯सा सु꣣त꣡ꣳ रा꣢धानां पते । पि꣢बा꣣ त्वा꣢३स्य꣡ गि꣢र्वणः ॥७३७॥
पदार्थःहे (राधानां पते) सदिच्छा, महत्वाकांक्षा, सत्प्रयत्न, सुख, ज्ञान आदि के स्वामी मेरे अन्तरात्मन् ! (इदं हि) यह ब्रह्मानन्द-रस (ओजसा) बल और वेग के साथ (अनु सुतम्) अनुकूल रूप में अभिषुत हुआ है। हे (गिर्वणः) वाणियों से प्रभुभक्ति में संलग्न आत्मन् ! तू (अस्य) इस ब्रह्मानन्दरूप सोमरस को (तु) शीघ्र (पिब) पान कर ले ॥१॥
भावार्थःयोग का अनुष्ठान करने से ब्रह्मानन्द के रस की धारा जब आत्मा को व्याप लेती है, तब योगी कृतकृत्य हो जाता है ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣢स्ते꣣ अ꣡नु꣢ स्व꣣धा꣡मस꣢꣯त्सु꣣ते꣡ नि य꣢꣯च्छ त꣣꣬न्व꣢꣯म् । स꣡ त्वा꣢ ममत्तु सोम्य ॥७३८॥
पदार्थःहे मेरे अन्तरात्मन् ! (यः) जो ब्रह्मानन्दरस (ते) तेरी (स्वधाम् अनु) आनन्द-भोगेच्छा के अनुकूल (असत्) उत्पन्न हुआ है,उस ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस के (सुते) अनुभव में आने पर, तू (तन्वम्) अपने शरीर को (नियच्छ) यम-नियम की रस्सियों से नियन्त्रित करते हुए चल। हे (सोम्य) सौम्य आत्मन् ! (सः) वह ब्रह्मानन्द-रस (त्वा) तुझे (ममत्तु) हर्षित एवं तरङ्गित कर दे ॥२॥
भावार्थःउपासना से जब ब्रह्मानन्द-रस आत्मा को प्राप्त होता है, तब शरीर के तथा मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि के भी सब व्यवहार सात्त्विक हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ ते꣢ अश्नोतु कु꣣क्ष्योः꣢꣫ प्रेन्द्र꣣ ब्र꣡ह्म꣢णा꣣ शि꣡रः꣢ । प्र꣢ बा꣣हू꣡ शू꣢र꣣ रा꣡ध꣢सा ॥७३९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! वह ब्रह्मानन्द-रस (ते) तेरे (कुक्ष्योः)दोनों कोखों में (प्र अश्नोतु) भली-भाँति व्याप जाए, (ब्रह्मणा)ब्रह्मज्ञान के साथ (शिरः) सिर में (प्र) भली-भाँति व्याप जाए, हे (शूर) शूरवीर मेरे अन्तरात्मन् ! (राधसा) सिद्धि एवं सफलता के साथ (बाहू) दोनों भुजाओं में (प्र) भली-भाँति व्याप जाए ॥३॥
भावार्थःब्रह्मज्ञान और ब्रह्मानन्द जब जीवात्मा में व्यापता है तब उसका प्रभाव देह में स्थित सभी अङ्गों पर पड़ता है। मन में श्रेष्ठ संकल्प, सिर में ज्ञानेन्द्रियों तथा बुद्धि के व्यापार और भुजाओं में सत्कर्म भली-भाँति तरंगित होने लगते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣢꣫ त्वेता꣣ नि꣡ षी꣢द꣣ते꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । स꣡खा꣢य꣣ स्तो꣡म꣢वाहसः ॥७४०॥
पदार्थःहे (स्तोमवाहसः) गीतों को गानेवाले (सखायः) मित्रो ! तुम (तु) शीघ्र ही (आ एत) आओ, (निषीदत) बैठो, (इन्द्रम् अभि) अपने अन्तरात्मा को लक्ष्य करके (प्र गायत) भली-भाँति उद्बोधन-गीत गाओ ॥१॥
भावार्थःपरस्पर मिलकर आत्मा को उद्बोधन देने से वह शक्ति जागती है, जिससे मार्ग की सभी बाधाएँ हटायी जा सकती हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
पु꣣रूत꣡मं꣢ पु꣣रूणा꣡मीशा꣢꣯नं꣣ वा꣡र्या꣢णाम् । इ꣢न्द्र꣣ꣳ सो꣢मे꣣ स꣡चा꣢ सु꣣ते꣢ ॥७४१॥
पदार्थःहे साथियो ! (पुरूणाम्) पूर्णों एवं पालनकर्त्ताओं में (पुरूतमम्) पूर्णतम और सर्वाधिक पालक, (वार्याणाम्) वरणीय गुणों के (ईशानम्) अधीश्वर (इन्द्रम्) परमात्मा के प्रति (सुते) श्रद्धारस के तैयार हो जाने पर (सचा) साथ मिलकर (प्र गायत) स्तुति-गीत गाओ। [यहाँ ‘प्रगायत’ शब्द पूर्व मन्त्र से आया है] ॥२॥
भावार्थःजो स्वयं पूर्ण और अन्यों को पूर्ण करनेवाला, समस्त गुणों से विभूषित परमेश्वर है, उसकी सबको मिलकर श्रद्धा के साथ उपासना करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स꣡ घा꣢ नो꣣ यो꣢ग꣣ आ꣡ भु꣢व꣣त्स꣢ रा꣣ये꣡ स पुर꣢꣯न्ध्या । ग꣢म꣣द्वा꣡जे꣢भि꣣रा꣡ स नः꣢꣯ ॥७४२॥
पदार्थः(सः) वह प्रसिद्ध (इन्द्र) परमात्मा (नः) हमारे (योगे) अष्टाङ्गयोग की सिद्धि में (आ भुवत्) सहायक होवे। (सः) वह (राये) अणिमा, लघिमा, महिमा आदि ऐश्वर्यों की प्राप्ति के लिए, हमारा सहायक होवे। (सः) वह (पुरन्ध्या) पालन करनेवाली बुद्धि से हमें संयुक्त करे। (सः) वह (वाजेभिः) अध्यात्म-बलों के साथ (नः) हमारे पास (आगमत्) आये ॥३॥
भावार्थःयोगसिद्धि के मार्ग में जो विघ्न उपस्थित होते हैं, वे परमात्मा की सहायता से दूर किये जा सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
यो꣡गे꣣योगे त꣣व꣡स्त꣢रं꣣ वा꣡जे꣢वाजे हवामहे । स꣡खा꣢य꣣ इ꣡न्द्र꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥७४३॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (सखायः) हम सहयोगी उपासक लोग (योगेयोगे) प्रत्येक नवीन उपलब्धि के लिए और (वाजेवाजे) प्रत्येक बल की प्राप्ति के लिए और (ऊतये) प्रगति के लिए (तवस्तरम्) अतिशय बलवान् (इन्द्रम्) विघ्नविघातक तथा परमैश्वर्यशाली परमेश्वर की (हवामहे) स्तुति करते हैं ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। (सखायः) परस्पर मित्रता में बंधे हुए हम सहाध्यायी लोग (योगेयोगे) प्रत्येक विद्या की प्राप्ति में और (वाजेवाजे) अविद्या, काम, क्रोध, मोह आदियों के साथ होनेवाले प्रत्येक संग्राम में (ऊतये) रक्षा के लिए (तवस्तरम्) विद्याबल, योगबल आदि में सर्वाधिक समृद्ध (इन्द्रम्) आचार्यप्रवर को (हवामहे) बुलाते हैं ॥ तृतीय—शिल्पविद्या के पक्ष में। यन्त्रकलाओं में बिजली का प्रयोग करनेवाला शिल्पी कह रहा है—(सखायः) हम सहयोगीगण (योगेयोगे) पदार्थों के मिश्रण से बननेवाली प्रत्येक नवीन वस्तु के निर्माण में और (वाजेवाजे) प्रत्येक बलसाध्य कार्य में (ऊतये) शिल्पविद्या के व्यवहार के लिए (तवस्तरम्) अतिशय बलवान् (इन्द्रम्) बिजलीरूप अग्नि को (हवामहे) बुलाते हैं, अर्थात् यन्त्रकलाओं में प्रयुक्त करते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे बल आदि की प्राप्ति के लिए परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए, वैसे ही सब विद्याएँ पढ़ने के लिए और अन्तःकरण में होनेवाले देवासुरसंग्रामों में विजय के लिए विद्वान्, सदाचारी गुरु को स्वीकार करना चाहिए। कारखानों में व्यवहारोपयोगी पदार्थों के निर्माण के लिए तथा संग्रामों में शस्त्रास्त्र चलाने के लिए बिजली का प्रयोग करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡नु꣢ प्र꣣त्न꣡स्यौक꣢꣯सो हु꣣वे꣡ तु꣢विप्र꣣तिं꣡ नर꣢꣯म् । यं꣢ ते꣣ पू꣡र्वं꣢ पि꣣ता꣢ हु꣣वे꣢ ॥७४४॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। मैं उपासक (प्रत्नस्य) चिरकाल से बने हुए (ओकसः) ब्रह्माण्डरूप घर के (नरम्) नेता, (तुविप्रतिम्) बहुत से पदार्थों का निर्माण करनेवाले तुझ (इन्द्र) जगदीश्वर को (अनुहुवे) अनुकूल करने के लिए पुकारता हूँ, (यं ते) जिस तुझ जगदीश को (पूर्वम्) पहले (पिता) मेरा पिता (हुवे) पुकारा करता था ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। हे बालक ! मैं तेरा चाचा आदि (तुविप्रतिम्) बहुत सी विद्याओं की प्रतिमूर्ति, (प्रत्नस्य) पुरातन (ओकसः) विद्यागृह के (नरम्) नेता आचार्य को (अनु) अनुकूल करके, तेरे पढ़ाने तथा सदाचार सिखाने के लिए (हुवे) पुकारता हूँ, (यम्) जिस आचार्य को (पूर्वम्) पहले (ते) तेरा (पिता) पिता अन्य बालकों को पढ़ाने के लिए (हुवे) पुकारता रहा है ॥२॥
भावार्थःसब मनुष्यों को परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए और बालकों के संरक्षक पिता, चाचा आदि को चाहिए कि विद्या पढ़ने के लिए बालकों को सुयोग्य गुरु के पास भेजें, जिससे वे विद्वान् होकर कुशल नागरिक बनें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ घा꣢ गम꣣द्य꣢दि꣣ श्र꣡व꣢त्सह꣣स्रि꣡णी꣢भिरू꣣ति꣡भिः꣢ । वा꣡जे꣢भि꣣रु꣡प꣢ नो꣣ ह꣡व꣢म् ॥७४५॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (इन्द्र) जगदीश्वर (यदि) यदि (श्रवत्) हमारी पुकार को सुन ले, तो वह (घ) अवश्य ही (सहस्रिणीभिः) हजारों (ऊतिभिः) रक्षाओं के साथ और (वाजेभिः) बलों तथा ऐश्वर्यों के साथ (नः) हमारी (हवम्) पुकार पर (उप आ गमत्) हमारे समीप आ जाए ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य के पक्ष में। (यदि) यदि, यह विद्यार्थी (श्रवत्) गुरु-मुख से शास्त्रों को सुन चुकेगा, तो (सहस्रिणीभिः) सहस्रों (ऊतिभिः) विद्याजन्य तृप्तियों तथा (वाजेभिः) आत्मबलों के साथ (नः) हम नागरिकों के (हवम्) उत्सव आदि समारोह में (घ) निश्चय ही (उप आ गमत्) आयेगा और अपने विद्वत्तापूर्ण विचारों से हमें कृतार्थ करेगा ॥३॥
भावार्थःहृदय से निकली हुई पुकार को जगदीश्वर अवश्य सुनता है। सुयोग्य गुरुओं के सान्निध्य में गुरुकुल में निवास करनेवाले विद्यार्थी विद्वान् होकर समावर्तन संस्कार के पश्चात् जब बाहर आयें, तब सबको उपदेश देकर श्रेष्ठ मार्ग में प्रवृत्त करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
इ꣡न्द्र꣢ सु꣣ते꣢षु꣣ सो꣣मे꣢षु꣣ क्र꣡तुं꣢ पुनीष उ꣣꣬क्थ्य꣢꣯म् । वि꣣दे꣢ वृ꣣ध꣢स्य꣣ द꣡क्ष꣢स्य म꣣हा꣢ꣳ हि षः ॥७४६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्यवर ! आप (सोमेषु) ज्ञानरसों के (सुतेषु) अभिषुत करने के साथ-साथ, हम विद्यार्थियों के (क्रतुम्) कर्म को भी (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय रूप में (पुनीषे) पवित्र करते हो। (वृधस्य) बढ़े हुए (दक्षस्य) उत्साह के (विदे) प्राप्त कराने के लिए (सः) वह आप (महान् हि) बड़े महत्त्वपूर्ण हो ॥१॥
भावार्थःजैसे विद्याप्रदान करना आचार्य का कर्तव्य है, वैसे पवित्र आचार का प्रदान करना भी कर्तव्य है। कहा भी है—“आचार्य को आचार्य इस कारण कहते हैं क्योंकि वह आचार का ग्रहण कराता है” (निरु० १|४) ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
स꣡ प्र꣢थ꣣मे꣡ व्यो꣢मनि दे꣣वा꣢ना꣣ꣳ स꣡द꣢ने वृ꣣धः꣢ । सु꣣पारः꣢ सु꣣श्र꣡व꣢स्तमः꣣ स꣡म꣢प्सु꣣जि꣢त् ॥७४७॥
पदार्थः(सः) वह विद्याप्रदाता आचार्य (प्रथमे) श्रेष्ठ (व्योमनि) आकाश के समान व्यापक ओंकारपदवाच्य ब्रह्म में स्थित हुआ (देवानां सदने) विद्वानों के सदन गुरुकुल में रहता हुआ (वृधः) छात्रों की उन्नति करानेवाला, (सुपारः) विद्या के समुद्र से पार करनेवाला, (सुश्रवस्तमः) अत्यन्त यशस्वी, (अप्सुजित्) व्याप्त विद्याओं में तथा शुभकर्मों में अन्यों को जीत लेनेवाला अर्थात् अन्यों की अपेक्षा अधिक पारंगत है। मैं (सम्) उसकी भली-भाँति स्तुति करता हूँ ॥२॥
भावार्थःसुयोग्य, विद्या के सागर, कर्मयोगी आचार्य को पाकर विद्यार्थी भी वैसे ही बनते हैं ॥२॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त꣡मु꣢ हुवे꣣ वा꣡ज꣢सातय꣣ इ꣢न्द्रं꣣ भ꣡रा꣢य शु꣣ष्मि꣡ण꣢म् । भ꣡वा꣢ नः सु꣣म्ने꣡ अन्त꣢꣯मः꣣ स꣡खा꣢ वृ꣣धे꣢ ॥७४८॥
पदार्थःमैं विद्यार्थी (वाजसातये) विद्या-बलों तथा आत्म-बलों की प्राप्ति करानेवाले (भराय) अध्ययनाध्यापन रूप यज्ञ के लिए (तम् उ) उस (शुष्मिणम्) आत्म-बल तथा विद्या-बल से युक्त (इन्द्रम्) आचार्य को (हुवे) पुकारता हूँ। हे आचार्यवर ! आप (सुम्ने) सुख के लिए और (वृधे) उन्नति के लिए (नः) हमारे (अन्तमः) निकटतम (सखा) मित्र (भव) होवो ॥३॥
भावार्थःनिकटता, सखिभाव और सौहार्द के साथ सब लोक-विद्याओं और ब्रह्म-विद्याओं की शिक्षा देता हुआ तथा सुख प्रदान करता हुआ आचार्य छात्रों की चहुँमुखी उन्नति करता रहे ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, आत्मोद्बोधन एवं गुरुशिष्य विषयों का तथा प्रसङ्गतः शिल्पविज्ञान का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ द्वितीय अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
ए꣣ना꣡ वो꣢ अ꣣ग्निं꣡ नम꣢꣯सो꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣मा꣡ हु꣢वे । प्रि꣣यं꣡ चेति꣢꣯ष्ठमर꣣ति꣡ꣳ स्व꣢ध्व꣣रं꣡ विश्व꣢꣯स्य दू꣣त꣢म꣣मृ꣡त꣢म् ॥७४९॥
पदार्थःहे साथियो ! मैं (ऊर्जः नपातम्) बल और प्राणशक्ति को बढ़ानेवाले, (प्रियम्) प्रिय, (चेतिष्ठम्) अतिशय जागरूक करनेवाले, (अरतिम्) गतिशील, (स्वध्वरम्) उत्कृष्ट यज्ञ जिससे चलता है ऐसे, (विश्वस्य दूतम्) सब यजमानों के लिए दूत का कार्य करनेवाले, अर्थात् दूत जैसे संदेश लाने और ले जाने में दोनों पक्षों के बीच में माध्यम बनता है, वैसे ही होमे हुए पदार्थ को सूक्ष्म करके उसके सुगन्ध को सब जगह फैलाने में माध्यम बननेवाले, (अमृतम्) सब पदार्थों में अव्यक्त रूप से स्थित होने के कारण अमर (अग्निम्) यज्ञाग्नि में (वः)तुम्हारे व अपने हित के लिए (एना) इस प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले (नमसा) श्रद्धाभाव से वा अन्नादि की हवि से (आहुवे) आहुति देता हूँ ॥१॥
भावार्थःअग्निहोत्र से जैसे जल, वायु आदि की शुद्धि होती है, वैसे ही अन्तःकरण की भी शुद्धि होती है तथा शारीरिक बल, आत्मबल, प्राणशक्ति, जागरूकता और त्यागभावना की उपलब्धि होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
स꣡ यो꣢जते अरु꣣षा꣢ वि꣣श्व꣡भो꣢जसा꣣ स꣡ दु꣢द्रव꣣꣬त्स्वा꣢꣯हुतः । सु꣣ब्र꣡ह्मा꣢ य꣣ज्ञः꣢ सु꣣श꣢मी꣣ व꣡सू꣢नां दे꣣व꣢꣫ꣳ राधो꣣ ज꣡ना꣢नाम् ॥७५०॥
पदार्थः(सः) वह यज्ञाग्नि (विश्वभोजसा) सबका पालन करनेवाले (अरुषा) चमकते तेज से (योजते) संयुक्त होता है तथा यजमानों को संयुक्त करता है। (सः) वह यज्ञाग्नि (स्वाहुतः) भले प्रकार आहुति दिये जाने पर (दुद्रवत्) अत्यधिक गतिमय हो जाता है, ज्वालाओं को लपलपाने लगता है। (सुब्रह्मा) श्रेष्ठ ब्रह्मा जिसमें बना है, ऐसा (यज्ञः) यज्ञ (वसूनाम्) आहिताग्नि यजमानों को (सुशमी) उत्तम शान्ति देनेवाला होता है। वह यज्ञ (जनानाम्) अग्निहोत्री जनों को (देवम्) प्रकाशक (राधः) ज्योतिरूप धन देता है ॥२॥
भावार्थःसुयोग्य ब्रह्मा को अध्यक्ष पद पर नियुक्त करके किया हुआ यज्ञ, सुख, शान्ति और स्वास्थ्य देनेवाला, लोगों को ज्योति प्रदान करनेवाला तथा अध्यात्ममार्ग में प्रेरित करनेवाला होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -उषाः| स्वर - मध्यमः
प्र꣡त्यु꣢ अदर्श्याय꣣त्यू꣢३꣱च्छ꣡न्ती꣢ दुहि꣣ता꣢ दि꣣वः꣢ । अ꣡पो꣢ म꣣ही꣡ वृ꣢णुते꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ त꣢मो꣣ ज्यो꣡ति꣢ष्कृणोति सू꣣न꣡री꣢ ॥७५१॥
पदार्थः(आयती) आती हुई, (उच्छन्ती) हृदय-प्राङ्गण में उदित होती हुई, (दिवः दुहिता) तेजस्वी परमात्मा की पुत्री के समान विद्यमान अध्यात्मप्रभा (चक्षुषा) अपने दिव्य प्रकाश से (तमः) मोहरूप अन्धकार को (अप उ वृणुते) दूर कर रही है। (सूनरी) उत्कृष्ट नेतृत्व करनेवाली यह अध्यात्मप्रभारूप उषा (ज्योतिः) विवेकख्यातिरूप ज्योति को (कृणोति) उत्पन्न कर रही है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से हृदय में प्रकट होती हुई दिव्यप्रभा समस्त तामसिकता के जाल को विच्छिन्न करके अन्तःकरण को निर्मल बना देती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -उषाः| स्वर - पञ्चमः
उ꣢दु꣣स्रि꣡याः꣢ सृजते꣣ सू꣢र्यः꣣ स꣡चा꣢ उ꣣द्य꣡न्नक्ष꣢꣯त्रमर्चि꣣व꣢त् । त꣡वेदु꣢꣯षो꣣ व्यु꣢षि꣣ सू꣡र्य꣢स्य च꣣ सं꣢ भ꣣क्ते꣡न꣢ गमेमहि ॥७५२॥
पदार्थःप्रथम—प्राकृतिक सूर्य और उषा के पक्ष में। (सूर्यः) सूर्य (सचा) एक साथ (उस्रियाः) किरणों को (उत्सृजते) छोड़ता है, जिससे (उद्यत्) उदित होते हुए (नक्षत्रम्) गतिमय ग्रह-उपग्रह आदि (अर्चिवत्) दीप्तिमान् हो जाते हैं। (उषः) हे उषा ! (तव इत्) तेरे (सूर्य्यस्य च) और सूर्य के (व्युषि) प्रकाशित होने पर, हम (भक्तेन) एश्वर्य से (सं गमेमहि) संयुक्त होवें ॥ द्वितीय—अध्यात्म पक्ष में। (सूर्यः) सूर्य के समान प्रकाशमय और प्रकाशक परमात्मा (सचा) एक साथ (उस्रियाः) दिव्य प्रकाश की रश्मियों को (उत्सृजते) छोड़ता है, जिससे (उद्यत्) उन्नत होते हुए (नक्षत्रम्) प्रगतिशील मन, बुद्धि आदि (अर्चिवत्) प्रकाशमान हो जाते हैं। (उषः) हे अध्यात्मप्रभा ! (तव इत्) तेरे (सूर्यस्य च) और परमात्मा रूप सूर्य के (व्युषि) प्रकाशित होने पर, हम (भक्तेन) दिव्य ऐश्वर्य से (सं गमेमहि) संयुक्त होवें ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। उपमानोपमेयभाव व्यङ्ग्य है ॥२॥
भावार्थःजैसे उषा और सूर्य के उदय होने पर सब कुछ प्रकाशित हो उठता है, वैसे ही आध्यात्मिक प्रभा और परमात्मा के उदय होने पर उपासकों का हृदय प्रकाशित हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अश्विनौ| स्वर - मध्यमः
इ꣣मा꣡ उ꣢ वां꣣ दि꣡वि꣢ष्टय उ꣣स्रा꣡ ह꣢वन्ते अश्विना । अ꣣यं꣡ वा꣢म꣣ह्वे꣡ऽव꣢से शचीवसू꣣ वि꣡शं꣢विश꣣ꣳ हि꣡ गच्छ꣢꣯थः ॥७५३॥
पदार्थःहे (अश्विना) ज्ञान एवं रक्षा से व्याप्त होनेवाले ब्राह्मण और क्षत्रियो ! (इमाः उ) ये (दिविष्टयः) यश के प्रकाश की इच्छुक (उस्राः) प्रजाएँ (वाम्) तुम निवासकों को (हवन्ते) पुकार रही हैं। हे (शचीवसू) कर्म-धन और प्रज्ञा-धन के धनियो ! (अयम्) यह मैं भी (अवसे) रक्षा के लिए (वाम्) तुम्हें (अह्वे) पुकारता हूँ, (हि) क्योंकि, तुम (विशं विशम्) प्रत्येक प्रजा के पास (गच्छथः) पहुँचा करते हो ॥१॥
भावार्थः“जहाँ ब्रह्म और क्षत्र एक साथ मिलकर रहते हैं, उस राष्ट्र को मैं पुण्यवान् समझता हूँ” (य० २०।२५)। इस वेदोक्ति के अनुसार जो ब्राह्मण और क्षत्रिय राष्ट्र को सौभाग्यशाली बनाने के योग्य होते हैं, उनका संरक्षण सब प्रजाओं को प्राप्त करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अश्विनौ| स्वर - पञ्चमः
यु꣣वं꣢ चि꣣त्रं꣡ द꣢दथु꣣र्भो꣡ज꣢नं नरा꣣ चो꣡दे꣢थाꣳ सू꣣नृ꣡ता꣢वते । अ꣣र्वा꣢꣫ग्रथ꣣ꣳ स꣡म꣢नसा꣣ नि꣡ य꣢च्छतं꣣ पि꣡ब꣢तꣳ सो꣣म्यं꣡ मधु꣢꣯ ॥७५४॥
पदार्थःहे (नरा) नेतृत्व करनेवाले ब्राह्मण और क्षत्रियो ! (युवम्) तुम (चित्रम्) अद्भुत (भोजनम्) पालन को (ददथुः) देते हो। उस पालन को तुम (सूनृतावते) प्रिय-सत्य वाणीवाले मेरे लिए भी (चोदेथाम्) प्रेरित करो, प्रदान करो। (समनसा) अनुकूल मनवाले होते हुए तुम दोनों, अपने (रथम्) रथ को (अर्वाक्) हमारी ओर (नि यच्छतम्) मोड़ो, अर्थात् हमारी ओर आओ और आकर (सोम्यम्) सोमरस से युक्त (मधु) मधु को (पिबतम्) पिओ, अर्थात् हमारे द्वारा किये गये सत्कार को ग्रहण करो ॥२॥
भावार्थःब्राह्मण लोग ज्ञान-दान के द्वारा और क्षत्रिय लोग रक्षा-प्रदान द्वारा प्रजाजनों का उपकार करते हैं, अतः उनका यथोचित सत्कार और उनसे लाभग्रहण सबको करना चाहिए ॥२॥ इस खण्ड में अग्निहोत्र, दिव्य उषा, दिव्य सूर्य तथा ब्रह्म-क्षत्र का वर्णन होने से पूर्व खण्ड के साथ इस खण्ड की सङ्गति है ॥ द्वितीय अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣स्य꣢ प्र꣣त्ना꣢꣫मनु꣣ द्यु꣡त꣢ꣳ शु꣣क्रं꣡ दु꣢दुह्रे꣣ अ꣡ह्र꣢यः । प꣡यः꣢ सहस्र꣣सा꣡मृषि꣢꣯म् ॥७५५॥
पदार्थः(अस्य) इस (सोम) की अर्थात् सौम्य तेजवाले परमात्मा की (प्रत्नाम्) पुरातन, (सहस्रसाम्) असंख्यात फल प्रदान करनेवाली, (ऋषिम्) अनेक कार्यों को सिद्ध करनेवाली (द्युतम्) सौम्य द्युति का (अनु) अनुकूल ध्यान करके (अह्रयः) व्याप्त विद्यावाले विद्वान् उपासकजन (शुक्रम्) शुद्ध (पयः) ब्रह्मानन्दरूप रस को (दुदुह्रे) दुह लेते हैं, पा लेते हैं ॥१॥
भावार्थःजो सौम्य, शुद्ध परमात्मा अपने उपासकों के हृदय में शुद्ध ब्रह्मानन्द रस को बहाता है, उसकी सौम्य द्युति में ध्यान सबको लगाना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣य꣡ꣳ सूर्य꣢꣯ इवोप꣣दृ꣢ग꣣य꣡ꣳ सरा꣢꣯ꣳसि धावति । स꣣प्त꣢ प्र꣣व꣢त꣣ आ꣡ दिव꣢꣯म् ॥७५६॥
पदार्थः(अयम्) यह सोम अर्थात् सौम्य परमात्मा (सूर्यः इव) सूर्य के समान (उपदृक्) दर्शानेवाला है। (अयम्) यह सौम्य परमात्मा (सरांसि) हृदय-सरोवरों में (धावति) शीघ्र पहुँचता है तथा उन्हें धोकर शुद्ध कर देता है। यह सौम्य परमात्मा (सप्त) सात (प्रवतः) ज्ञानेन्द्रियों सहित मन और बुद्धि को और (दिवम्) तेजस्वी जीवात्मा को (आ) प्राप्त होता है तथा उन्हें धोकर शुद्ध करता है ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे सूर्य सब वस्तुओं को दिखाता है, अपनी किरणों से बादलरूप सरोवरों में पहुँचता है, भूमि-चन्द्रमा आदि सात ग्रहों-उपग्रहों को अपने प्रकाश से शुद्ध करता है और द्युलोक में स्थित होता है, वैसे ही परमात्मा सबको दृष्टि प्रदान करनेवाला, सबके हृदय-सरोवरों में पहुँचनेवाला, देहवर्ती सात प्राणों को शुद्ध करनेवाला और आत्मपुरी में स्थित होनेवाला है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣यं꣡ विश्वा꣢꣯नि तिष्ठति पुना꣣नो꣡ भुव꣢꣯नो꣣प꣡रि꣢ । सो꣡मो꣢ दे꣣वो꣡ न सूर्यः꣢꣯ ॥७५७॥
पदार्थः(अयम्) यह (सोमः) सौम्य, जगत्स्रष्टा परमात्मा (देवः) प्रकाशक (सूर्यः न) सूर्य के समान (विश्वानि) सब हृदयों को (पुनानः) पवित्र करता हुआ (भुवना उपरि) सब भुवनों के ऊपर, उनका अधिष्ठाता बनकर (तिष्ठति) विराजमान है ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे सूर्य सौरमण्डल का अधिष्ठाता है, वैसे ही परमात्मा विश्वब्रह्माण्ड का अधिष्ठाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना दे꣣वो꣢ दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सु꣣तः꣢ । ह꣡रि꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अर्षति ॥७५८॥
पदार्थः(प्रत्नेन जन्मना) पुरातन स्वभाव के अनुसार (देवेभ्यः) प्रकाशक आत्मा तथा मन, बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियों के लिए (सुतः) अभिषुत हुआ (एषः) यह (देवः) प्रकाशक (हरिः) पापहारी परमात्मारूप सोम (पवित्रे) पवित्र हृदय में (अर्षति) पहुँचता है ॥१॥
भावार्थःसुचारू विधि से भली-भाँति आराधना किया गया परमात्मा अवश्य ही उपासक को अपनी अनुभूति कराता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ म꣡न्म꣢ना दे꣣वो꣢ दे꣣वे꣢भ्य꣣स्प꣡रि꣢ । क꣣वि꣡र्विप्रे꣢꣯ण वावृधे ॥७५९॥
पदार्थः(एषः) यह (देवः) प्रकाशक, (कविः) बुद्धिमान् परमात्मारूप सोम (प्रत्नेन मन्मना) पुरातन वैदिक स्तोत्र द्वारा (देवेभ्यः) दिव्य गुणों के प्रदान के लिए (विप्रेण) बुद्धिमान् विद्वान् उपासक के द्वारा (परि वावृधे) चारों ओर बढ़ता है ॥२॥ परमात्मा में वस्तुतः बढ़ना रूप धर्म न होने से यहाँ असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःउपासक से वेदमन्त्रों द्वारा भली-भाँति उपासना किया गया परमात्मा सर्वत्र प्रचार पाकर मानो बढ़ता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
दु꣣हानः꣢ प्र꣣त्न꣡मित्पयः꣢꣯ प꣣वि꣢त्रे꣣ प꣡रि꣢ षिच्यसे । क्र꣡न्दं꣢ दे꣣वा꣡ꣳ अ꣢जीजनः ॥७६०॥
पदार्थःहे रस के भण्डार परमात्मारूप सोम ! (प्रत्नम् इत्) सनातन (पयः) आनन्द-रस को (दुहानः) दुहकर देते हुए, आप (पवित्रे) पवित्र हृदय में (परिषिच्यसे) चारों ओर सींचे जाते हो। (क्रन्दन्) मानो कल-कल शब्द करते हुए, आप (देवान्) दिव्य तरंगों को (अजीजनः) उत्पन्न करते हो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की स्तुति से उपासक के हृदय में ब्रह्मानन्द के प्रवाह बहने लगते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ शिक्षापत꣣स्थु꣡षो꣢ भि꣣य꣢स꣣मा꣡ धे꣢हि꣣ श꣡त्र꣢वे । प꣡व꣢मान वि꣣दा꣢ र꣣यि꣢म् ॥७६१॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (पवमान) पवित्रताप्रदायक, सर्वान्तर्यामी सोम परमात्मन् ! आप (अप तस्थुषः) हमसे दूर स्थित सद्गुणों को (उप शिक्ष) हमारे समीप ले आओ। (शत्रवे) काम, क्रोध आदि शत्रु के लिए (भियसम्) भय (आधेहि) प्रदान करो और हमें (रयिम्) सत्य, अहिंसा, न्याय आदि दिव्य सम्पत्ति (विदाः) प्राप्त कराओ ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (पवमान) गतिमय, कर्मवीर राजन् ! आप (अप तस्थुषः) हमसे दूर होकर विरोधी पक्ष में स्थित हुए वीरों को (उप शिक्ष) दण्डित करो, (शत्रवे) शत्रु के लिए (भियसम्) भय (आधेहि) उत्पन्न करो और हमें (रयिम्) धन, धान्य, सुवर्ण आदि सम्पत्ति (विदाः) प्राप्त कराओ ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर काम, क्रोध आदि शत्रुओं को पराजित करके स्तोता को सद्गुणों की सम्पदा प्रदान करता है, वैसे ही राष्ट्र में राजा को चाहिए कि शत्रुओं को धूल में मिलाकर प्रजा को सब धन, धान्य आदि प्रदान करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣢पो꣣ षु꣢ जा꣣त꣢म꣣प्तु꣢रं꣣ गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम् । इन्दुं देवा अयासिषुः ॥७६२॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। (सुजातम्) सुप्रसिद्ध, (अप्तुरम्) कर्म में त्वरा करनेवाले, कर्मशूर, (भङ्गम्) शत्रु, विपत्ति आदि के भञ्जक, (गोभिः परिष्कृतम्) वाणियों तथा इन्द्रियों से सुसज्जित (इन्दुम्) दीप्तिमान् जीवात्मा को (देवाः) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदि देव, बलप्राप्ति के लिए (उप उ अयासिषुः) समीपता से प्राप्त करते हैं ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (सु जातम्) भली-भाँति प्रजाओं के बीच से चुनकर बने हुए, (अप्तुरम्) कर्मयोगी, (भङ्गम्) शत्रुओं के भञ्जक, (गोभिः परिष्कृतम्) भूमियों से परिष्कृत अर्थात् परिष्कृत भूमियोंवाले (इन्दुम्) तेजस्वी तथा मधुर स्वभाववाले राजा को (देवाः) दिव्यगुणोंवाले प्रजाजन (उप उ अयासिषुः) निकटता से प्राप्त करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। विशेषणों से साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार भी है ॥२॥
भावार्थःजैसे देह में स्थित मन, बुद्धि आदि जीवात्मा से ही बल पाते हैं, वैसे ही प्रजाजन वीर राजा से बलवान् बनते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣡पा꣢स्मै गायता नरः꣣ पवमानायेन्दवे । अभि देवाꣳ इयक्षते ॥७६३॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। हे (नरः) मनुष्यो ! तुम (देवान्) प्रकाशक मन, बुद्धि और ज्ञानेन्द्रिय रूप देवों में (अभि इयक्षते) परस्पर सङ्गति करानेवाले, (पवमानाय) मन को पवित्र करनेवाले (अस्मै) इस (इन्दवे) तेजस्वी जीवात्मा के लिए अर्थात् तेजस्वी जीवात्मा को लक्ष्य करके (गायत) उद्बोधन-गीत गाओ ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (नरः) राष्ट्र के प्रजाजनो ! तुम (देवान्) विद्वान् जनों की (अभि इयक्षते) पूजा करनेवाले, (पवमानाय) राष्ट्र के प्रदेशों में इधर-उधर सञ्चार करनेवाले (अस्मै) इस (इन्दवे) तेजस्वी, धन-धान्य-दूध आदि से राष्ट्रभूमि को सींचनेवाले राजा के लिए अर्थात् राजा को लक्ष्य करके (गायत) उद्बोधन-गीत तथा अभिनन्दन-गीत गाओ ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि अपने आत्मा को तथा स्वराष्ट्र के राजा को उद्बोधन देकर वैयक्तिक तथा राष्ट्रिय उन्नति करें ॥३॥ इस खण्ड में मनुष्यों के अभ्युदय और निःश्रेयस के लिए परमात्मा तथा राजा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ सोमा꣢꣯सो विप꣣श्चि꣢तो꣣ऽपो꣡ न꣢यन्त ऊ꣣र्म꣡यः꣢ । व꣡ना꣢नि महि꣣षा꣡ इ꣢व ॥७६४॥
पदार्थः(विपश्चितः) विद्वान्, (ऊर्मयः) पढ़ायी हुई विद्याओं से शिष्य के हृदय को आच्छादित करनेवाले अथवा क्रियाशील, (सोमासः) शिष्यों को द्वितीय जन्म देनेवाले आचार्य लोग (अपः) शिष्यों के कर्म को (प्र नयन्त) उत्कृष्ट दिशा में ले जाते हैं, (इव) जैसे (महिषाः) महान् सूर्यकिरणें (वनानि) जलों को, बादल बनाने के लिए (प्र नयन्त) ऊपर अन्तरिक्ष में ले जाती हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे विद्वान् गुरुजन ज्ञान-दान तथा आचार-निर्माण के द्वारा विद्यार्थियों का उपकार करते हैं, वैसे ही विद्यार्थियों को भी चाहिए कि मन, वचन और कर्म से उनका सत्कार करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ द्रोणा꣢꣯नि ब꣣भ्र꣡वः꣢ शु꣣क्रा꣢ ऋ꣣त꣢स्य꣣ धा꣡र꣢या । वा꣢जं꣣ गो꣡म꣢न्तमक्षरन् ॥७६५॥
पदार्थःआचार्य से दिये जाते हुए (बभ्रवः) धारण-पोषण करनेवाले, (शुक्राः) पवित्र और प्रदीप्त ज्ञानरसरूप सोम (ऋतस्य) सत्य की (धारया) धारा के साथ (द्रोणानि) शिष्यों के हृदय-रूप द्रोण-कलशों को (अभि) लक्ष्य करके तीव्रता से बहते हैं और (गोमन्तम्) प्रकाशमय (वाजम्) आत्मबल को (अक्षरन्) स्रवित करते हैं ॥२॥
भावार्थःसुयोग्य आचार्य को पाकर विद्यार्थी लोग विद्यावान्, विवेकवान्, सत्यवान्, ज्योतिष्मान्,पवित्रहृदय तथा आत्मबलयुक्त होवें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सु꣣ता꣡ इन्द्रा꣢꣯य वा꣣य꣢वे꣣ व꣡रु꣢णाय म꣣रु꣡द्भ्यः꣣ । सो꣡मा꣢ अर्षन्तु꣣ वि꣡ष्ण꣢वे ॥७६६॥
पदार्थः(सुताः) आचार्य द्वारा प्रेरित (सोमाः) ज्ञानरस (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए, (वायवे) प्राण के लिए, (वरुणाय) वरणीय मन के लिए, (मरुद्भ्यः) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप प्राणों के लिए, अर्थात् इन सबके प्रति (विष्णवे) यज्ञार्थ (अर्षन्तु) पहुँचें ॥३॥
भावार्थःगुरुजनों से प्रदत्त ज्ञानरसों से विद्यार्थियों के आत्मा, प्राण, मन, इन्द्रियाँ सब तरङ्गित होकर देवपूजा, सङ्गतिकरण और दान रूप यज्ञ के लिए समर्थ हो जाते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
प्र꣡ सो꣢म दे꣣व꣡वी꣢तये꣣ सि꣢न्धु꣣र्न꣡ पि꣢प्ये꣣ अ꣡र्ण꣢सा । अ꣣ꣳशोः꣡ पय꣢꣯सा मदि꣣रो꣡ न जागृ꣢꣯वि꣣र꣢च्छा꣣ को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣡त꣢म् ॥७६७॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमात्मन् ! आप (देववीतये) उपासक के हृदय में दिव्य गुण उत्पन्न करने के लिए (अर्णसा) आनन्द-रस से (प्र पिप्ये) भरपूर हो, (अर्णसा) जल से (सिन्धुः न) जैसे बादल भरपूर होता है। आगे उपासक के प्रति कहते हैं—हे उपासक ! (अंशोः) अंशुमाली सूर्य के (पयसा) वर्षाजल से (मदिरः) हर्ष को प्राप्त किसान के समान (जागृविः) जागरूक हुआ तू (मधुश्चुतम्) आनन्दरूप मधु को चुआनेवाले (कोशम्) आनन्द के निधि परमात्मा के (अच्छ) अभिमुख हो ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःआनन्द-रस की प्राप्ति के लिए आनन्द-रस के खजाने परमेश्वर का ही मनुष्यों को ध्यान करना चाहिए, भौतिक प्रतिमा आदियों के पूजने से क्या लाभ है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ ह꣢र्य꣣तो꣡ अर्जु꣢꣯नो꣣ अ꣡त्के꣢ अव्यत प्रि꣣यः꣢ सू꣣नु꣡र्न मर्ज्यः꣢꣯ । त꣡मी꣢ꣳ हिन्वन्त्य꣣प꣢सो꣣ य꣢था꣣ र꣡थं꣢ न꣣दी꣡ष्वा गभ꣢꣯स्त्योः ॥७६८॥
पदार्थः(हर्यतः) चाहने योग्य, (अर्जुनः) गौरवर्ण, (प्रियः) प्यारा, (मर्ज्यः) अलङ्कार पहनाने योग्य (सूनुः) पुत्र (न) जैसे (अत्के) घोड़े पर बैठाया जाता है, वैसे ही (हर्यतः) सर्वान्तर्यामी और कमनीय, (अर्जुनः) शुद्ध, सात्त्विक, (प्रियः) प्यारा, (मर्ज्यः) वक्ष पर अलङ्कार के समान हृदय में धारण करने योग्य सौम्य परमेश्वर (अत्के) उपासकों की आत्मा में (आ अव्यत) बैठाया जाता है। (तम् ईम्) उसे (अपसः) कर्मण्य लोग (आ हिन्वन्ति) सर्वत्र ले जाते हैं, प्रचारित करते हैं, (यथा) जैसे नाविक लोग (नदीषु) नदियों में (गभस्त्योः) बाहुओं से (रथम्) जलयान को (आ हिन्वन्ति) ले जाते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में दो उपमाओं की संसृष्टि है। पूर्वार्ध में श्लिष्टोपमा है ॥२॥
भावार्थःउपासक योगी लोगों को चाहिए कि परमात्मा को अपने आत्मा में धारण करके सर्वत्र उसका प्रचार करें, जिससे संसार में आस्तिकता का वातावरण पैदा हो ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ सोमा꣢꣯सो मद꣣च्यु꣢तः श्र꣡व꣢से नो म꣣घो꣡ना꣢म् । सु꣣ता꣢ वि꣣द꣡थे꣢ अक्रमुः ॥७६९॥
पदार्थः(सुताः) आचार्य के द्वारा उत्पन्न किये गए, (मदच्युतः)आनन्दवर्षक (सोमासः) अध्यात्मविद्या के रस (मघोनाम् नः) हम विद्याधन के धनियों के (श्रवसे) यश के लिए (विदथे) विद्या-यज्ञ में (प्र अक्रमुः) प्रवाहित हो रहे हैं ॥१॥
भावार्थःशिष्यों को चाहिए कि सुयोग्य गुरुओं के पास जाकर उनके पास से सब अध्यात्म विज्ञान ग्रहण करके परमात्मा का साक्षात्कार करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡दी꣢ꣳ ह꣣ꣳसो꣡ यथा꣢꣯ ग꣣णं꣡ विश्व꣢꣯स्यावीवशन्म꣣ति꣢म् । अ꣢त्यो꣣ न꣡ गोभि꣢꣯रज्यते ॥७७०॥
पदार्थः(आत्) ग्रहण किये जाने के अनन्तर (ईम्) यह अध्यात्मज्ञान का और ब्रह्मानन्द का रस (यथा) जैसे (हंसः) सूर्य (गणम्) भूमि, चन्द्रमा आदि ग्रह-उपग्रहों के गण को वश में किये हुए है, वैसे ही (विश्वस्य) सब उपासकों की (मतिम्) बुद्धि को (अवीवशत्) वश में कर लेता है, बुद्धि में छा जाता है। और, (अत्यः न) घोड़ा जैसे (गोभिः) जलों से (अज्यते) स्नान करा कर साफ किया जाता है, वैसे ही यह अध्यात्मज्ञान का रस (गोभिः) वेद-वाणियों से (अज्यते) प्रकट किया जाता है ॥२॥ इस मन्त्र में दो उपमाओं की संसृष्टि है ॥२॥
भावार्थःब्रह्मज्ञान का और ब्रह्मानन्द का रस उपासक के आत्मा, मन, बुद्धि आदि में जब व्याप जाता है, तब उसकी तरङ्गों से तरङ्गित हुआ वह उपासक महाभाग्य का अनुभव करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡दीं꣢ त्रि꣣त꣢स्य꣣ यो꣡ष꣢णो꣣ ह꣡रि꣢ꣳ हिन्व꣣न्त्य꣡द्रि꣢भिः । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य पी꣣त꣡ये꣢ ॥७७१॥
पदार्थः(आत्) और तब (त्रितस्य) ज्ञान-कर्म-उपासना इन तीनों से युक्त जीवात्मा की (योषणः) पत्नियों के समान सहचारिणी बुद्धियाँ (इन्द्राय) जीवात्मा के (पीतये)पान के लिए (ईम्) इस (इन्दुम्) भिगोनेवाले (हरिम्)पापहर्ता ब्रह्मानन्दरस को (अद्रिभिः) विदीर्ण न होनेवाले मनःसंकल्पों द्वारा (हिन्वन्ति) जीवात्मा में पहुँचाती हैं ॥३॥
भावार्थःजब ब्रह्मानन्द-रस जीवात्मा में व्याप जाता है, तब उपासक को परम माहात्म्य का अनुभव होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
अ꣣या꣡ प꣢वस्व देव꣣यू꣡ रेभ꣢꣯न्प꣣वि꣢त्रं꣣ प꣡र्ये꣢षि वि꣣श्व꣡तः꣢ । म꣢धो꣣र्धा꣡रा꣢ असृक्षत ॥७७२॥
पदार्थःहे पवित्र करने हारे रसागार परमात्मन् ! (देवयुः) स्तोता उपासक से प्रीति करनेवाले आप (अया) इस आनन्दधारा के साथ (पवस्व) प्रवाहित होवो। (रेभन्) उपदेश करते हुए आप (विश्वतः) सब ओर से (पवित्रम्) पवित्र अन्तःकरण में (पर्येषि) आते हो। आपके पास से (मधोः) मधुर आनन्द की (धाराः)धाराएँ (असृक्षत) छूटती हैं ॥१॥
भावार्थःआनन्द-रस के भण्डार परमेश्वर से प्राप्त आनन्द-धाराएँ उपासक को कृत-कृत्य कर देती हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प꣡व꣢ते हर्य꣣तो हरि꣢꣯रति ह्वराꣳसि रꣳह्या । अभ्यर्ष स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः ॥७७३॥
पदार्थः(हर्यतः) चाहने योग्य, (हरिः) अज्ञान, पाप आदि का हर्ता जगदीश्वर (रंह्या) वेग के साथ (ह्वरांसि) अति कुटिलताओं को पार कराकर (पवते) उपासकों को पवित्र करता है। हे जगदीश्वर ! आप (स्तोतृभ्यः)स्तुति करनेवाले उपासकों के लिए (वीरवत्) वीर भावों से युक्त (यशः) कीर्ति (अभ्यर्ष) प्राप्त कराओ ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के उपासक जन दुर्गुण, दुर्व्यसन, दुःख, पाप, कुटिलता आदियों से छूटकर वीर्य तथा उत्साह से युक्त होकर जीवन बिताते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡ सु꣢न्वा꣣ना꣡यान्ध꣢꣯सो꣣ म꣢र्तो꣣ न꣡ व꣢ष्ट꣣ तद्वचः꣢꣯ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢मरा꣣ध꣡सं꣢ ह꣣ता꣢ म꣣खं न भृग꣢꣯वः ॥७७४॥
पदार्थः(अन्धसः) अन्नादि भोज्य पदार्थों को (सुन्वानाय) उत्पन्न करनेवाले जगदीश्वर के लिए (मर्तः न) उपासक मनुष्य के समान, तुम (तत्) उस स्तुति-रूप (वचः) वचन को बोलने की (वष्ट) कामना करो। और, (अराधसम्) भक्ति न करनेवाले (श्वानम्) कुत्ते की वृत्तिवाले अर्थात् सांसारिक पदार्थों का लोभ करनेवाले मनुष्य को (अप हत) दूर कर दो, किस प्रकार? (भृगवः) तपस्वी महर्षि जन (मखं न) जैसे मन की चञ्चलता को दूर करते हैं ॥३॥ इस मन्त्र में दो उपमाओं की संसृष्टि है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की भक्ति करनेवाले लोगों को चाहिए कि वे भक्ति न करनेवाले, सांसारिक भोगों के लोभियों की सङ्गति न करें ॥३॥ इस खण्ड में विद्वान् आचार्य, उससे मिलनेवाले भौतिक तथा आध्यात्मिक ज्ञानरस, परमात्मा और उससे मिलनेवाले आनन्द-रस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय अध्याय का षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ प्रथम प्रपाठक का द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व वा꣣चो꣡ अ꣢ग्रि꣣यः꣡ सोम꣢꣯ चि꣣त्रा꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ । अ꣣भि꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ का꣡व्या꣢ ॥७७५॥
पदार्थःहे (सोम) सबको उत्पन्न करनेवाले, सबको प्रेरणा देनेवाले, सब ऐश्वर्यों से युक्त, रस के भण्डार, चन्द्रमा के समान आह्लादक जगदीश्वर ! हमारी (वाचः) जिह्वा के (अग्रियः) आगे रहनेवाले आप (चित्राभिः) अद्भुत (ऊतिभिः) रक्षाओं के साथ (पवस्व) हमें पवित्र कीजिए। आप (विश्वानि) सब (काव्या) वेदकाव्यों में (अभि) चारों ओर व्याप्त हैं। कहा भी है—“जिसने ऋचाएँ पढ़कर भी जगदीश्वर को नहीं जाना, वह ऋचाओं से क्या करेगा? जो ऋचाओं से उसे जान लेते हैं, वे समाधिस्थ हो जाते हैं” (ऋ० १|१६४|३९) ॥१॥
भावार्थःजिसकी जगदीश्वर रक्षा करता है, उसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्व꣡ꣳ स꣢मु꣣द्रि꣡या꣢ अ꣣पो꣢ऽग्रि꣣यो꣡ वाच꣢꣯ ई꣣र꣡य꣢न् । प꣡व꣢स्व विश्वचर्षणे ॥७७६॥
पदार्थःहे (विश्वचर्षणे) सबके द्रष्टा, अथवा सब मनुष्यों के स्वामी जगदीश्वर ! (वाचः) उपासकों की वाणी के (अग्रियः) आगे रहनेवाले (त्वम्) पवित्रकर्ता आप (समुद्रियाः) आनन्दसागर के (अपः) रसों को (ईरयन्) हमारी ओर भेजते हुए, हमें (पुनीहि) पवित्र कीजिए ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर की स्तुति निष्फल नहीं जाती, प्रत्युत वह अपने उपासकों को आनन्दरस से सरस और पवित्र कर देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
तु꣢भ्ये꣣मा꣡ भुव꣢꣯ना कवे महि꣣म्ने꣡ सो꣢म तस्थिरे । तु꣡भ्यं꣢ धावन्ति धे꣣न꣡वः꣢ ॥७७७॥
पदार्थःहे (कवे) मेधावी, दूरदर्शी (सोम) जगदीश्वर ! (इमा भुवना) ये लोक-लोकान्तर (तुभ्य) आपकी ही पूजा के लिए (महिम्ने तस्थिरे) महिमावान् हुए हैं। (तुभ्यम्) आपकी ही पूजा के लिए (धेनवः) गौएँ, मेघ-मालाएँ और सूर्यकिरणें (धावन्ति) दौड़ लगा रही हैं ॥३॥
भावार्थःइस विशाल ब्रह्माण्ड में सूर्य, चाँद, तारे, भूमि, ऋतुएँ, नदियाँ, समुद्र, मेघ-घटाएँ, गौएँ, घोड़े, मनुष्य, मङ्गल-बुध-बृहस्पति आदि ग्रह सब परमेश्वर की ही महिमा का गान कर रहे हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्वेन्दो꣣ वृ꣡षा꣢ सु꣣तः꣢ कृ꣣धी꣡ नो꣢ य꣣श꣢सो꣣ ज꣡ने꣢ । वि꣢श्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षो꣢ जहि ॥७७८॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी परमात्मन्, आचार्य और राजन् ! (वृषा) विद्या और सुख की वर्षा करनेवाले, (सुतः) हमसे प्रार्थना और प्रेरणा किये गये आप (पवस्व) हमें पवित्र कीजिए । (जने) जन-समुदाय में (नः) हमें (यशसः) यशस्वी (कृधि) कीजिए, (विश्वाः द्विषः) सब द्वेष-वृत्तियों को और सब द्वेषियों को (अप जहि) विनष्ट कर दीजिए ॥१॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर, आचार्य और राजा से विद्या, सुख, पवित्रता, कीर्ति और द्वेष-पाप आदि का विनाश प्राप्त करके सब लोग सफल जीवनवाले होवें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
य꣡स्य꣢ ते स꣣ख्ये꣢ व꣣य꣡ꣳ सा꣢स꣣ह्या꣡म꣢ पृतन्य꣣तः꣢ । त꣡वे꣢न्दो द्यु꣣म्न꣡ उ꣢त्त꣣मे꣢ ॥७७९॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी जगदीश्वर, आचार्य और राजन् ! (यस्य ते) जिन आपकी (सख्ये) मित्रता में (वयम्) हम हैं, वे हम लोग (पृतन्यतः) सेना से चढ़ाई करनेवाले आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को (सासह्याम)अतिशय रूप से बार-बार पराजित कर देवें और (तव) आपके दिये हुए (उत्तमे) उत्तम (दयुम्ने) यश में,हम रहें ॥२॥
भावार्थःसबको चाहिए कि परमेश्वर की उपासना करके, गुरु को शिष्यभाव से प्राप्त करके और राजा की सहायता पाकर सब काम, क्रोध आदि आन्तरिक रिपुओं को एवं बाह्य शत्रुओं को निर्मूल करके यशस्वी बनें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
या꣡ ते꣢ भी꣣मा꣡न्यायु꣢꣯धा ति꣣ग्मा꣢नि꣣ स꣢न्ति꣣ धू꣡र्व꣢णे । र꣡क्षा꣢ समस्य नो नि꣣दः꣢ ॥७८०॥
पदार्थःहे पवमान सोम ! हे कर्मशूर जगदीश्वर, आचार्य और राजन् ! (धूर्वणे) हिंसक के लिए (या) जो (ते) आपके (भीमानि) भयंकर, (तिग्मानि) तीक्ष्ण (आयुधा) हथियार (सन्ति) हैं, उनके द्वारा आप (समस्य) सब शत्रुओं से की जानेवाली (निदः) निन्दा से (नः) हमें (रक्ष) बचाइये ॥३॥ यहाँ अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर दण्डशक्तिरूप शस्त्रास्त्रों से, आचार्य ब्रह्मतेजरूप शस्त्रास्त्रों से और राजा भौतिक शस्त्रास्त्रों से दुष्टों की दुष्टता को दूर करके उनसे की जानेवाली निन्दा से मनुष्यों, शिष्यों और प्रजाजनों की रक्षा करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣡षा꣢ सोम द्यु꣣मा꣡ꣳ अ꣢सि꣣ वृ꣡षा꣢ देव꣣ वृ꣡ष꣢व्रतः । वृ꣢षा꣣ ध꣡र्मा꣣णि दध्रिषे ॥७८१॥
पदार्थःहे (सोम) सत्कर्मों में प्रेरणा करनेवाले जगदीश्वर, आचार्य वा राजन् ! (वृषा) सुख, विद्या एवं समृद्धि की वर्षा करनेवाले आप (द्युमान्) तेजस्वी (असि) हो। हे (देव) सूर्यादियों के प्रकाशक परमात्मन्, वेदविद्या के प्रकाशक आचार्य तथा राजनियमों के प्रकाशक राजन् ! (वृषव्रतः) धर्म, विद्या एवं समृद्धि की वर्षा करना ही जिनका व्रत है, ऐसे आप (वृषा) सचमुच बादल हो। (वृषा) ब्रह्मबल, आत्मबल अथवा देहबल से युक्त आप (धर्माणि) चरित्र के नियमों, विद्या के नियमों तथा राजनियमों को (दध्रिषे) धारण करते हो ॥१॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है। सोम में वृषत्व (पर्जन्यत्व) का आरोप होने से रूपक है। उस आरोप में ‘वृषव्रतः’ इस पद का अर्थ हेतु बन रहा है, अतः काव्यलिङ्ग है। ‘वृषा’ की आवृत्ति में यमक है ॥१॥
भावार्थःजिस राष्ट्र में महान् परमेश्वर सुख आदि की, विद्वान् आचार्य विद्या की और धनी राजा धन की वर्षा करते हैं, वह राष्ट्र महिमा से बहुत शोभा पाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣡ष्ण꣢स्ते꣣ वृ꣢ष्ण्य꣣ꣳ श꣢वो꣣ वृ꣢षा꣣ व꣢नं꣣ वृ꣡षा꣢ सु꣣तः꣢ । स꣡ त्वं वृ꣢꣯ष꣣न्वृ꣡षेद꣢꣯सि ॥७८२॥
पदार्थःहे (वृषन्) सुख, सम्पत्ति, विद्या आदि की वर्षा करनेवाले परमात्मन्, आचार्य और राजन् ! (वृष्णः ते) वर्षक आपका (शवः) बल (वृष्ण्यम्) सुख, शान्ति, धन आदि की वर्षा करने के स्वभाववाला है। आपका (वनम्) तेज भी (वृषा) सुख आदि की वर्षा करनेवाला है। (सुतः) आपसे उत्पन्न किया गया वृष्टिरस, विद्यारस और रक्षारस भी (वृषा) सुख आदि की वर्षा करनेवाला है। (सः त्वम्) वह आप (वृषा इत्) बादल ही (असि) हो ॥२॥ इस मन्त्र में सोमपदवाच्य परमेश्वर आदि में बादल का आरोप होने से रूपकालङ्कार है। ‘वृष्ण, वृष्ण’ में छेकानुप्रास, ‘वृषा, वृषा’ में लाटानुप्रास और ‘वृष्, वृष्, वृषा, वृषा, वृष, वृषे’ में वृत्त्यनुप्रास है ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर, राजा और आचार्य ये तीनों ही मनुष्यों को ऐहिक तथा पारलौकिक उन्नति प्राप्त कराने में सहायक होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣢श्वो꣣ न꣡ च꣢क्रदो꣣ वृ꣢षा꣣ सं꣡ गा इ꣢꣯न्दो꣣ स꣡मर्व꣢꣯तः । वि꣡ नो꣢ रा꣣ये꣡ दुरो꣢꣯ वृधि ॥७८३॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रताप्रदायक जगदीश्वर, आचार्य और राजन् ! (वृषा) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की वर्षा करनेवाले आप (अश्वः न) फैले हुए बादल के समान (चक्रदः) शब्द करते हो। हे (इन्दो) तेजस्विन् ! आप (गाः) गौओं, भूमियों और वेदवाणियों को (सम्) हमें संप्राप्त कराओ। (अर्वतः) घोड़ों, बलों और प्राणों को (सम्) संप्राप्त कराओ और (नः) हमारी (राये) ऐश्वर्यप्राप्ति के लिए (दुरः) द्वारों को (विवृधि) खोल दो ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार तथा अर्थश्लेष है ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर सबके हृदय में स्थित हुआ सत्प्रेरणा देता है, आचार्य विद्यागृह में स्थित हुआ शिष्यों को उपदेश करता है और राजा राष्ट्र में स्थित हुआ राजनियमों को उद्घोषित करता है। वे सभी यथायोग्य दीर्घायुष्य, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मवर्चस आदि प्रदान करते और रास्ते से विघ्न-बाधाओं को दूर करते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣢षा꣣ ह्य꣡सि꣢ भा꣣नु꣡ना꣢ द्यु꣣म꣡न्तं꣢ त्वा हवामहे । प꣡व꣢मान स्व꣣र्दृ꣡श꣢म् ॥७८४॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रता देनेवाले जगदीश्वर और राजन् ! आप (वृषा) हि) सचमुच सद्गुण, विद्या, सुराज्य, धन आदि की वर्षा करनेवाले (असि) हो। (भानुना) तेज से (द्युमन्तम्) देदीप्यमान, (स्वर्दृशम्) मोक्ष के आनन्द वा लौकिक सुख का दर्शन करानेवाले (त्वा) आपको, हम (हवामहे) पुकारते हैं ॥१॥
भावार्थःजैसे उपासना किया हुआ परमेश्वर हृदय को पवित्र करके उसमें दिव्य ऐश्वर्यों को बरसाता है और मोक्ष का आनन्द देता है, वैसे ही राज्य में राजा राष्ट्रवासियों के भ्रष्टाचार को दूर करके, पवित्र आचरण का प्रचार करके, विविध ऐश्वर्यों की वर्षा करके प्रजाओं को सुख प्रदान करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
य꣢द꣣द्भिः꣡ प꣢रिषि꣣च्य꣡से꣢ मर्मृ꣣ज्य꣡मा꣢न आ꣣यु꣡भिः꣢ । द्रो꣡णे꣢ स꣣ध꣡स्थ꣢मश्नुषे ॥७८५॥
पदार्थःप्रथम—जगदीश्वर के पक्ष में। हे राजन् ! (यत्) जब (आयुभिः) उपासक मनुष्यों से (मर्मृज्यमानः) बार-बार अत्यधिक सात्त्विक भावों से अलङ्कृत किये जाते हुए आप (अद्भिः) भक्तिरसों से (परिषिच्यसे) सींचे जाते हो, तब (द्रोणे) हृदयरूप द्रोणकलश में (सधस्थम्) स्थान (अश्नुषे) पा लेते हो ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे राजन् ! (यत्) जब (आयुभिः) राष्ट्रवासी प्रजाजनों द्वारा (मर्मृज्यमानः) मालाओं आदि से अलङ्कृत किये जाते हुए आप (अद्भिः) अभिषेकजलों से (परिषिच्यसे) सींचे जाते हो, तब (द्रोणे) लकड़ी के बने सिंहासन पर (सधस्थम्) स्थान (अश्नुषे) पा लेते हो ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सोम ओषधि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥२॥
भावार्थःजैसे याज्ञिकों द्वारा सोम ओषधि का रस जलों के साथ द्रोणकलश में सींचा जाता है और जैसे प्रजाजनों द्वारा कोई सुयोग्य मनुष्य राजा के पद पर अभिषिक्त किया जाता है, वैसे ही स्तोताओं को चाहिए कि परमेश्वर को भक्तिरसों द्वारा हृदय में अभिषिक्त करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ प꣢वस्व सु꣣वी꣢र्यं꣣ म꣡न्द꣢मानः स्वायुध । इ꣣हो꣡ ष्वि꣢न्द꣣वा꣡ ग꣢हि ॥७८६॥
पदार्थःहे (स्वायुध) उत्कृष्ट दण्डसामर्थ्यवाले जगदीश्वर तथा तीक्ष्ण शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित राजन् ! (मन्दमानः) प्रसन्न होते हुए आप (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ आत्मबल, धैर्यबल, उत्साहबल और शारीरिक बल को (आ पवस्व) हमारे अन्दर प्रवाहित कीजिए। हे (इन्दो)तेजस्वी राजराजेश्वर परमात्मन् और राजन् ! आप(इह उ) यहाँ हमारे हृदय में वा राजगद्दी पर (सु आगहि) भली-भाँति पधारिए ॥३॥
भावार्थःजैसे परमात्मा अपने उपासकों का हार्दिक निवेदन सुनकर सज्जनों को उत्साहित और दुर्जनों को दण्डित करता है, वैसे ही राजा को चाहिए कि वह राष्ट्रवासियों का निवेदन सुनकर प्रजा को रक्षित और उत्साहित करे तथा पापी शत्रुओं को बन्दूक, तोप, आकाशीय गोले आदि हथियारों से विनष्ट करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानस्य ते व꣣यं꣢ प꣣वि꣡त्र꣢मभ्युन्द꣣तः꣢ । स꣣खित्व꣡मा वृ꣢꣯णीमहे ॥७८७॥
पदार्थःहे (सोम) ! ज्ञान को प्रेरित करनेवाले परमात्मा और आचार्य ! (पवमानस्य) हृदय को पवित्र करनेवाले, तथा (पवित्रम्) पवित्र हृदय को (अभ्युन्दतः) आनन्दरस वा विद्यारस से भिगोनेवाले (ते) आपकी (सखित्वम्) मित्रता को, हम (आ वृणीमहे) स्वीकार करते हैं ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर उपासकों के और आचार्य शिष्यों के हृदय को पवित्र करके उसमें आनन्दरस वा विद्यारस को सींचते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ये꣡ ते꣢ प꣣वि꣡त्र꣢मू꣣र्म꣡यो꣢ऽभि꣣क्ष꣡र꣢न्ति꣣ धा꣡र꣢या । ते꣡भि꣢र्नः सोम मृडय ॥७८८॥
पदार्थःहे (सोम) ज्ञान के प्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! (ये ते) जो आपकी (ऊर्मयः) आनन्दरस और ज्ञानरस की लहरें (धारया) धारारूप से (पवित्रम्) पवित्र हृदय को (अभि) लक्ष्य करके (क्षरन्ति) बहती हैं, (तेभिः) उनसे (नः) हमें (मृडय) सुखी कीजिए ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर स्तोताओं को आनन्दरस की लहरों से और आचार्य शिष्यों को ज्ञानरस की लहरों से तरङ्गित करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ नः꣢ पुना꣣न꣡ आ भ꣢꣯र र꣣यिं꣢ वी꣣र꣡व꣢ती꣣मि꣡ष꣢म् । ई꣡शा꣢नः सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ ॥७८९॥
पदार्थःहे (सोम) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर वा आचार्य ! (ईशानः) समर्थ (सः) वह प्रसिद्ध आप (नः) हमें (पुनानः) पवित्र अन्तःकरणवाला करते हुए (विश्वतः) सब ओर से (रयिम्) आध्यात्मिक तथा भौतिक ऐश्वर्य को और (वीरवतीम्) वीरतायुक्त (इषम्) प्रगति को (आ भर) प्रदान कीजिए ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर और आचार्य से सत्प्रेरणा प्राप्त करके पवित्र हृदयवाले होकर मनुष्य महान् उन्नति कर सकते हैं ॥३॥ इस खण्ड में जगदीश्वर, आचार्य और राजा के गुण-कर्म आदि का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ तृतीय अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्निं꣢ दू꣣तं꣡ वृ꣢णीमहे꣣ हो꣡ता꣢रं वि꣣श्व꣡वे꣢दसम् । अ꣣स्य꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ सु꣣क्र꣡तु꣢म् ॥७९०॥
पदार्थःप्रथम—आचार्य के पक्ष में। हम (होतारम्) विद्या और आचार के दाता, (विश्ववेदसम्) सम्पूर्ण वाङ्मय के ज्ञाता, (अस्य) इस किये जाते हुए (यज्ञस्य) विद्या-यज्ञ के (सुक्रतुम्) सुकर्ता, (दूतम्) दुर्गुण, दुर्व्यसन, प्रमाद, आलस्य, दुःख आदि को संतप्त करनेवाले (अग्निम्) तेजस्वी, कर्मनिष्ठ, अग्रनेता आचार्य को (वृणीमहे) गुरुरूप से वरते हैं ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हम (होतारम्) सुराज्य-व्यवस्था से प्रजाओं को सुख देनेवाले, (विश्ववेदसम्) सम्पूर्ण राजनीतिविज्ञान के ज्ञाता, (अस्य) इस किये जाते हुए (यज्ञस्य) राष्ट्र-यज्ञ के (सुक्रतुम्) सुकर्ता, दूतम् शत्रुओं तथा भ्रष्टाचारियों के संतापक, (अग्निम्) अग्रनेता, कर्मठ, सुयोग्य जन को (वृणीमहे) प्रजा के बीच से राजारूप में चुनते हैं ॥ तृतीय—भौतिक अग्नि के पक्ष में। हम शिल्पविद्या के ज्ञाता विद्वान् लोग (होतारम्) यानों और यन्त्रों में वेगादि गुण को देनेवाले, (विश्ववेदसम्) सब सुख के साधन जिससे प्राप्त होते हैं ऐसे, (अस्य) इस किये जाते हुए (यज्ञस्य) शिल्पयज्ञ के (सुक्रतुम्) सुसम्पादन में साधनभूत, दूतम् यन्त्रकलाओं को गति देनेवाले (अग्निम्) विद्युत् को (वृणीमहे) शिल्पक्रियाओं में प्रयुक्त करते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि जगदीश्वर की उपासना से शुभ प्रेरणा पाकर, सुयोग्य, उत्तम शिक्षा देनेवाले आचार्य को वरकर, सब विद्याएँ पढ़कर, सदाचार को स्वीकार करके, विद्युद्-विद्या से शिल्पविद्या की उन्नति द्वारा भू-यान, जल-यान और अन्तरिक्ष-यानों को तथा तरह-तरह के यन्त्रों को बना कर राष्ट्र की उन्नति करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣡म꣢ग्नि꣣ꣳ ह꣡वी꣢मभिः꣣ स꣡दा꣢ हवन्त वि꣣श्प꣡ति꣢म् । ह꣣व्यवा꣡हं꣢ पुरुप्रि꣣य꣢म् ॥७९१॥
पदार्थः(अग्निम् अग्निम्) प्रत्येक अग्नि को—परमात्माग्नि को, आत्माग्नि को, जाठराग्नि को, यज्ञाग्नि को, शिल्पाग्नि को, आचार्याग्नि को, राजाग्नि को (हवीमभिः) हवियों के साथ, मनुष्य (सदा) हमेशा (हवन्त) पुकारें,स्वीकार करें। कैसे अग्नि को? (विश्पतिम्) जो प्रजाओं का पालक, (हव्यवाहम्) दातव्य वस्तुओं को या सद्गुण, विद्या आदि को प्राप्त करानेवाला, तथा (पुरुप्रियम्) बहुत प्रिय अथवा बहुतों का प्रिय है ॥२॥
भावार्थःआराधना किया हुआ परमात्माग्नि उपासक के आत्मसमर्पण को स्वीकार करके उसे भद्र गुण-कर्म-स्वभाव प्रदान करता है। उद्बोधन दिया गया आत्माग्नि मन, आँख आदि ज्ञानसाधनों से ज्ञान को स्वीकार करके मनुष्य को बल देता है। जाठराग्नि भोज्य, पेय आदि हवि को स्वीकार करके उसे रस-रक्त आदि के रूप में परिणत करता है। यजमान से होमा हुआ यज्ञाग्नि हवियों को स्वीकार करके वायु के माध्यम से आरोग्यकारी सुगन्ध को इधर-उधर ले जाता है। यान-यन्त्र आदि में प्रयुक्त विद्युत्-रूप अग्नि विमानादि यानों को स्थानान्तर में पहुँचाता है और यन्त्र-कलाओं का सञ्चालन कर विविध पदार्थों के निर्माण में साधन बनता है। आचार्यरूप अग्नि समित्पाणि शिष्यों के समर्पण को स्वीकार करके उन्हें विद्या और सदाचार ग्रहण कराता है। राजारूप अग्नि प्रजाओं से राजकर स्वीकार करके प्रजाओं को सुख देता है। इसलिए सबको चाहिए कि इन अग्नियों का व्यवहार में यथायोग्य प्रयोग करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡ग्ने꣢ दे꣣वा꣢ꣳ इ꣣हा꣡ व꣢ह जज्ञा꣣नो꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषे । अ꣢सि꣣ हो꣡ता꣢ न꣣ ई꣡ड्यः꣢ ॥७९२॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक तेजस्वी परमात्मन्, आचार्य और राजन् ! (वृक्तबर्हिषे) उपासना-यज्ञ, विद्या-यज्ञ और राष्ट्रसेवा-यज्ञ के हेतु जिसने आसन बिछा लिया है, ऐसे मनुष्य के लिए (जज्ञानः) प्रकट होते हुए अर्थात् अपने दर्शन देते हुए आप (इह) इस उपासना-यज्ञ, विद्या-यज्ञ और राष्ट्र-यज्ञ में (देवान्) दिव्यगुणों को, विद्वानों को और राष्ट्रसेवकों को (आवह) उत्पन्न कीजिए। आप (होता) सुख, संपत्ति, विद्या, सदाचार आदि के दाता और (नः) हमारे (ईड्यः) स्तुति-योग्य (असि) हो ॥३॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर उपासना-यज्ञ में स्तोताओं के हृदय में दिव्यगुण उत्पन्न करता है, वैसे ही आचार्य विद्या-यज्ञ में विद्वान् जनों को तथा राजा राष्ट्र-यज्ञ में राष्ट्र-सेवकों को उत्पन्न करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
मि꣣त्रं꣢ व꣣य꣡ꣳ ह꣢वामहे꣣ व꣡रु꣢ण꣣ꣳ सो꣡म꣢पीतये । या꣢ जा꣣ता꣢ पू꣣त꣡द꣢क्षसा ॥७९३॥
पदार्थः(वयम्) हम लोग (सोमपीतये) यश की रक्षा के लिए (मित्रम्) बाहर और अन्दर स्थित जीवन-हेतु प्राण को अथवा ब्रह्म-बल को, (वरुणम्) ऊर्ध्वगति तथा बल के हेतु उदान को अथवा क्षत्र-बल को (हवामहे) पुकारते हैं, ग्रहण करते हैं, (या) जो (पूतदक्षसा) पवित्र बलवाले अथवा बल को पवित्र करनेवाले (जाता) हुए हैं ॥१॥
भावार्थःसब लोगों को चाहिए कि शरीर में प्राणनक्रिया के हेतु प्राण को और ऊर्ध्वगति के हेतु उदान को तथा राष्ट्र में ब्रह्म-बल और क्षत्र-बल को बढ़ाकर शरीर तथा राष्ट्र के स्वास्थ्य को उन्नत करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
ऋ꣣ते꣢न꣣ या꣡वृ꣢ता꣣वृ꣡धा꣢वृ꣣त꣢स्य꣣ ज्यो꣡ति꣢ष꣣स्प꣡ती꣢ । ता꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा हुवे ॥७९४॥
पदार्थःप्रथम—प्राण-उदान के पक्ष में। (यौ) जो (ऋतेन) प्राण-क्रिया एवं उदान-क्रिया रूप सत्य व्यापार से (ऋतावृधौ) सत्यक्रियायुक्त मनोमय एवं विज्ञानमय कोशों को बढ़ानेवाले, (ऋतस्य) ऋतम्भरा प्रज्ञा, एवं (ज्योतिषः) ज्योतिष्मती वृत्ति के (पत्ती) रक्षक हैं, (ता) उन (मित्रावरुणा) प्राण-उदान को, मैं (हुवे) पुकारता हूँ, स्वस्थरूप से शरीर में प्रवृत्त करता हूँ ॥ द्वितीय—ब्रह्म-क्षत्र के पक्ष में। (यौ) जो (ऋतेन) सत्य ज्ञान और सत्य क्षात्र-बल से (ऋतावृधौ) सत्यमय राष्ट्र को बढ़ानेवाले और (ऋतस्य ज्योतिषः) सत्यरूप ज्योति के (पती) रक्षक हैं, (ता) उन (मित्रावरुणा) ब्राह्मण और क्षत्रियों को, मैं (हुवे) पुकारता हूँ ॥२॥
भावार्थःजैसे प्राण और उदान से शरीर का स्वास्थ्य, वैसे ही ब्राह्मण और क्षत्रियों से राष्ट्र का स्वास्थ्य चिरस्थायी होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
व꣡रु꣢णः प्रावि꣣ता꣡ भु꣢वन्मि꣣त्रो꣡ विश्वा꣢꣯भिरू꣣ति꣡भिः꣢ । क꣡र꣢तां नः सु꣣रा꣡ध꣢सः ॥७९५॥
पदार्थः(वरुणः) शरीर में उदान और राष्ट्र में क्षत्रिय, (मित्रः) शरीर में प्राण और राष्ट्र में ब्राह्मण (विश्वाभिः) सब (ऊतिभिः) रक्षाओं से (प्राविता) हमारे प्रकृष्ट रूप से रक्षक (भुवत्) होवें। साथ ही (नः) हमें (सुराधसः) उत्तम धन से युक्त तथा उत्तम सिद्धिवाला (करताम्) करें ॥३॥
भावार्थःप्राण-उदान द्वारा शरीर में स्वास्थ्यरूप तथा योगसिद्धिरूप धन को और ब्राह्मण-क्षत्रिय द्वारा राष्ट्र में विद्या, चक्रवर्ती राज्य आदि धन को सब प्राप्त करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्र꣣मि꣢द्गा꣣थि꣡नो꣢ बृ꣣ह꣡दिन्द्र꣢꣯म꣣र्के꣡भि꣢र꣣र्कि꣡णः꣢ । इ꣢न्द्रं꣣ वा꣡णी꣢रनूषत ॥७९६॥
पदार्थः(इन्द्रम्) देह के अधिष्ठाता, काम-क्रोध आदि शत्रुओं को पराजित करनेवाले वीर जीवात्मा की (इत्) निश्चय ही (गाथिनः) गायक लोग (बृहत्) बहुत अधिक (अनूषत) स्तुति करते हैं। (इन्द्रम्) जीवात्मा की (अर्किणः) मन्त्रपाठी लोग (अर्कैः) वेदमन्त्रों से (अनूषत) स्तुति करते हैं। (इन्द्रम्) उसी जीवात्मा की (वाणीः) अन्य वाणियाँ (अनूषत) स्तुति करती हैं ॥१॥
भावार्थःजीवात्मा ही देहराज्य का सम्राट् है, जो मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदियों को यथास्थान बैठाकर देहराज्य का सञ्चालन करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्र꣣ इ꣢꣯द्धर्योः꣣ स꣢चा꣣ स꣡म्मि꣢श्ल꣣ आ꣡ व꣢चो꣣यु꣡जा꣢ । इ꣡न्द्रो꣢ व꣣ज्री꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥७९७॥
पदार्थः(इन्द्रः इत्) देह का अधिष्ठाता जीवात्मा ही (वचोयुजा) कहते ही जुड़ जानेवाले (हर्योः) ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय रूप घोड़ों का (सचा) एक साथ (आ सम्मिश्लः) ज्ञान और कर्मों में जोड़नेवाला है। (इन्द्रः) वह जीवात्मा (वज्री) वाणी रूप वज्र का धारण करनेवाला और (हिरण्ययः) प्राणमय, ज्योतिर्मय, तथा कीर्तिमय है ॥२॥
भावार्थःजिस जीवात्मा की प्रेरणा से ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ अपने-अपने व्यापारों में नियुक्त होती हैं, जो जीवात्मा वाणीरूप वज्र से कुतार्किकों के कुतर्कों का खण्डन करता है, जो प्राणों का अधिष्ठाता, तेजस्वी और यशस्वी है, उसे उद्बोधन देकर सब लोग अपने अभीष्टों को सिद्ध करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्र꣣ वा꣡जे꣢षु नोऽव स꣣ह꣡स्र꣢प्रधनेषु च । उ꣣ग्र꣢ उ꣣ग्रा꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ ॥७९८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) शरीर के अधिष्ठाता जीवात्मन् ! (उग्रः) वीर तू (वाजेषु) संग्रामों में (सहस्रप्रधनेषु च) तथा सहस्रों प्रकृष्ट धन जिनमें प्राप्त होते हैं, ऐसे चक्रवर्ती-राज्य-साधक महायुद्धों में (उग्राभिः) अत्यन्त उत्कृष्ट (ऊतिभिः) रक्षाओं से (नः) हमारी (रक्ष) रक्षा कर ॥३॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा यदि बलवान् है तो उसे कोई भी पराजित नहीं कर सकता ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रो꣢ दी꣣र्घा꣢य꣣ च꣡क्ष꣢स꣣ आ꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयद्दि꣣वि꣢ । वि꣢꣫ गोभि꣣र꣡द्रि꣢मैरयत् ॥७९९॥
पदार्थः(इन्द्रः) सारे संसार को उत्पन्न करनेवाले परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर ने (दीर्घाय) दीर्घ (चक्षसे) प्रकाश के लिए (दिवि) द्युलोक में (सूर्यम्) सूर्य को (आरोहयत्) चढ़ाया हुआ है। वही (गोभिः) सूर्य-किरणों से (अद्रिम्) बादल को (वि ऐरयत्) विकम्पित करता है, बरसाता है ॥४॥
भावार्थःजगदीश्वर की ही यह महिमा है कि वह सूर्य को रच कर उसके द्वारा पदार्थों को प्रकाशित करता, दिन-रात-पक्ष-मास-ऋतु-अयन-वर्ष के चक्र को चलाता, बादल बनाता, वर्षा करता और प्राण-प्रदान आदि कार्य करता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रे꣢ अ꣣ग्ना꣡ नमो꣢꣯ बृ꣣ह꣡त्सु꣢वृ꣣क्ति꣡मेर꣢꣯यामहे । धि꣣या꣡ धेना꣢꣯ अव꣣स्य꣡वः꣢ ॥८००॥
पदार्थः(अवस्यवः) रक्षा के इच्छुक, हम लोग (इन्द्रे)जीवात्मा को लक्ष्य करके (बृहत्) महान् (नमः) नमस्कार को, (सुवृक्तिम्) निर्दोष क्रिया को और (धिया) ध्यान तथा बुद्धि के साथ (धेनाः) स्तुतिरूप वाणियों को (आ ईरयामहे) प्रेरित करते हैं ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना के लिए और जीवात्मा को उद्बोधन देने के लिए नमस्कार, गुणवर्णनरूप स्तुति और तदनुरूप क्रिया निरन्तर अपेक्षित होती है। पुरुषार्थ के बिना केवल नमस्कार से या स्तुति से कुछ भी नहीं सिद्ध होता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
ता꣡ हि शश्व꣢꣯न्त꣣ ई꣡ड꣢त इ꣣त्था꣡ विप्रा꣢꣯स ऊ꣣त꣡ये꣢ । स꣣बा꣢धो꣣ वा꣡ज꣢सातये ॥८०१॥
पदार्थः(ता हि) उन दोनों इन्द्र और अग्नि अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा की (इत्था) सत्यभाव से (शश्वन्तः) बहुत से, (सबाधः) बाधाओं से पीड़ित (विप्रासः) विप्र जन (ऊतये) रक्षा के लिए और (वाजसातये) बलप्राप्ति के लिए (ईडते) स्तुति करते हैं, अर्थात् उनके गुण-कर्म-स्वभावों का वर्णन करते हैं ॥२॥
भावार्थःसांसारिक दुःखों को दूर करने के लिए तथा विपत्तियों में रक्षा की प्राप्ति और बल की प्राप्ति के लिए जगदीश्वर की उपासना करनी चाहिए और जीवात्मा को उद्बोधन देना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
ता꣡ वां꣢ गी꣣र्भि꣡र्वि꣢प꣣न्यु꣢वः꣣ प्र꣡य꣢स्वन्तो हवामहे । मे꣣ध꣡सा꣢ता सनि꣣ष्य꣡वः꣢ ॥८०२॥
पदार्थः(ता) उन (वाम्) तुम दोनों जीवात्मा और परमात्मा को (विपन्युवः) विशेष स्तुति से युक्त, (प्रयस्वन्तः) पुरुषार्थ से युक्त, (सनिष्यन्तः) पाने के इच्छुक हम श्रद्धालु लोग (मेधसाता) सङ्गम की प्राप्ति के निमित्त (गीर्भिः) वेदवाणियों से (हवामहे) पुकारते हैं ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा और जीवात्मा को अनुकूल करने के लिए वाणी से स्तुति, शरीर से प्रयत्न और मन से श्रद्धा तीनों अपेक्षित होते हैं ॥३॥ इस खण्ड में विविध अग्नियों का, आचार्य और राजा का, प्राण-अपान का, ब्रह्म-क्षत्र का और जीवात्मा-परमात्मा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ तृतीय अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣡षा꣢ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या म꣣रु꣡त्व꣢ते च मत्स꣣रः꣢ । वि꣢श्वा꣣ द꣡धा꣢न꣣ ओ꣡ज꣢सा ॥८०३॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेवाले आचार्य ! (वृषा) विद्या के वर्षक आप (धारया) ज्ञान-धारा से (पवस्व) शिष्यों को पवित्र कीजिए। (मरुत्वते) प्राणायाम का अभ्यास करनेवाले शिष्य के लिए (मत्सरः) ब्रह्मानन्द के स्रावक होइए। साथ ही (ओजसा) विद्या-बल, सदाचार-बल और ब्रह्मचर्य-बल से (विश्वा) सब शिष्यों को (दधानः) धारण कीजिए ॥१॥
भावार्थःवही आचार्य होता है, जो शिष्यों को विद्या की धाराओं से स्नान कराता हुआ, उनका पिता के समान पालन करता हुआ उन्हें महान् पण्डित, तेजस्वी, ब्रह्मचारी, ब्रह्मानन्द में मग्न तथा सदाचारी बनाये ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
तं꣡ त्वा꣢ ध꣣र्त्ता꣡र꣢मो꣣ण्यो꣢३: प꣡व꣢मान स्व꣣र्दृ꣡श꣢म् । हि꣣न्वे꣡ वाजे꣢꣯षु वा꣣जि꣡न꣢म् ॥८०४॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रकर्त्ता, सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! (ओण्योः) द्युलोक और भूलोक को (धर्तारम्) धारण करनेवाले, (स्वर्दृशम्) सूर्य वा मोक्षानन्द का दर्शन करानेवाले, (वाजिनम्) बलवान् (तं त्वा) उस प्रसिद्ध तुझको, मैं (वाजेषु) बलों के निमित्त से (हिन्वे) प्रसन्न करता हूँ ॥२॥
भावार्थःजो जगदीश्वर सूर्य, भूमि आदि को धारण करता है, वह विपत्तियों में बल-प्रदान द्वारा अपने उपासकों को भी क्यों न धारण करेगा ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣या꣢ चि꣣त्तो꣢ वि꣣पा꣢꣫नया꣣ ह꣡रिः꣢ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या । यु꣢जं꣣ वा꣡जे꣢षु चोदय ॥८०५॥
पदार्थःहे पवमान सोम ! हे पवित्रकर्त्ता परमात्मन् ! (विपा) मुझ मेधावी के द्वारा (चित्तः) जाने हुए (हरिः) दुःखों एवं पापों के हर्त्ता आप (अया) वेगवती (अनया) इस (धारया) आनन्द-धारा से (पवस्व) मुझ स्तोता को पवित्र कीजिए। (युजम्) अपने सखा मुझको (वाजेषु) जीवनसंग्रामों में (चोदय) विजय के लिए प्रेरित कीजिए ॥३॥
भावार्थःस्तुति किया गया परमात्मा स्तोताओं को आनन्द-धाराओं से सींचकर, बल देकर देवासुरसंग्रामों में विजयी करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
वृ꣢षा꣣ शो꣡णो꣢ अभि꣣क꣡नि꣢क्रद꣣द्गा꣢ न꣣द꣡य꣢न्नेषि पृथि꣣वी꣢मु꣣त꣢ द्याम् । इ꣡न्द्र꣢स्येव व꣣ग्नु꣡रा शृ꣢꣯ण्व आ꣣जौ꣡ प्र꣢चो꣣द꣡य꣢न्नर्षसि꣣ वा꣢च꣣मे꣢माम् ॥८०६॥
पदार्थःहे सोम परमात्मन् ! (वृषा) वर्षा करनेवाले, (शोणः) क्रियाशील आप (गाः) विद्युद्वाणियों को (अभि कनिक्रदत्) गर्जाते हुए, तथा उससे (पृथिवीम्) भूमि को (उत) और (द्याम्) आकाश को (नदयन्) नादयुक्त करते हुए (एषि) व्यवहार करते हो। उस समय ऐसा लगता है कि (आजौ) युद्ध में (इन्द्रस्य इव) मानों सेनापति का (वग्नुः) दुन्दुभि आदि का नाद (आ शृण्वे) सुनाई दे रहा हो। आप ही (इमाम्) इस (वाचम्) मनुष्यों से उच्चारण की जानेवाली व्यक्त वाणी को (प्रचोदयन्) प्रेरित करते हुए (आ अर्षसि) आते हो ॥१॥ इस मन्त्र में उत्प्रेक्षालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजल-वाष्पों का उपर जाना, मेघघटाओं का निर्माण, विद्युत् का चमकना, मेघों का गरजना इत्यादि सभी कार्य सूर्य, पवन आदि के माध्यम से परमेश्वर ही करता है। इसके करने में हम जैसों का सामर्थ्य नहीं है। वही मनुष्यों को व्यक्त वाणी प्रदान करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
र꣣सा꣢य्यः꣣ प꣡य꣢सा꣣ पि꣡न्व꣢मान ई꣣र꣡य꣢न्नेषि꣣ म꣡धु꣢मन्तम꣣ꣳशु꣢म् । प꣡व꣢मान सन्त꣣नि꣡मे꣢षि कृ꣣ण्व꣡न्निन्द्रा꣢꣯य सोम परिषि꣣च्य꣡मा꣢नः ॥८०७॥
पदार्थःहे (पवमान सोम) सम्पूर्ण जगत् के स्रष्टा, शुभगुणों के प्रेरक, सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! (रसाय्यः) रस से पूर्ण, (पयसा) रस से (पिन्वमानः) मुझ उपासक के हृदय को सींचते हुए आप (मधुमन्तम्) मधुर (अंशुम्) आनन्द को (ईरयन्) प्रेरित करते हुए (एषि) मुझे प्राप्त होते हो। (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (परिषिच्यमानः) झरते हुए आप, वहाँ (सन्तनिम्) विस्तार को (कृण्वन्) प्राप्त करते हुए (एषि) व्याप्त होते हो ॥२॥
भावार्थःआनन्दरस से पूर्ण परमात्मा की आनन्दरस की धारा से सिंचे हुए स्तोताओं के हृदय सरस हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
ए꣣वा꣡ प꣢वस्व मदि꣣रो꣡ मदा꣢꣯योदग्रा꣣भ꣡स्य꣢ न꣣म꣡य꣢न्वध꣣स्नु꣢म् । प꣢रि꣣ व꣢र्णं꣣ भ꣡र꣢माणो꣣ रु꣡श꣢न्तं ग꣣व्यु꣡र्नो꣢ अर्ष꣣ प꣡रि꣢ सोम सि꣣क्तः꣢ ॥८०८॥
पदार्थःहे (सोम) रस के भण्डार परमात्मन् ! (उदग्राभस्य) जल में निवास करनेवाले ग्राह के समान हिंसक कामादि शत्रु के (वधस्नुम्) वज्रशिखर को अर्थात् उसके हिंसकव्यापार को, (नमयन्) नीचे करते हुए, दूर करते हुए (मदिरः) आनन्दजनक आप (मदाय) आनन्द के लिए (एव) यथोचित रूप से (पवस्व) प्रस्रुत होवो, बहो और (सिक्तः) हृदय में सिंचे हुए आप (रुशन्तं वर्णम्) तेजस्वी रूप को (परि भरमाणः) धारण करते हुए (गव्युः) दिव्य प्रकाश की किरणें प्रदान करना चाहते हुए (नः) हमें (परि अर्ष) चारों ओर से प्राप्त होवो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से दुर्विचार नष्ट होते हैं, सद्विचार तथा सद्गुण उत्पन्न होते हैं, दिव्य ज्योति चमकने लगती है और आनन्दरस की धाराएँ उपासक को आप्लुत कर देती हैं ॥३॥ इस खण्ड में ब्रह्मविद्या में आचार्य का योगदान कहकर परमात्मा के पास से जीवात्मा में ब्रह्मानन्द का प्रवाह वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ तृतीय अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्वा꣡मिद्धि हवा꣢꣯महे सा꣣तौ꣡ वाज꣢꣯स्य का꣣र꣡वः꣢ । त्वां꣢ वृ꣣त्रे꣡ष्वि꣢न्द्र꣣ स꣡त्प꣢तिं꣣ न꣢र꣣स्त्वां꣢꣫ काष्ठा꣣स्व꣡र्व꣢तः ॥८०९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमात्मन् वा जीवात्मन् ! (कारवः) कर्मशूर हम (वाजस्य) संग्राम की (सातौ) प्राप्ति होने पर (त्वाम् इत् हि) तुझे ही (हवामहे) पुकारते या उद्बोधन देते हैं। (वृत्रेषु) शत्रुओं वा विघ्नों के उमड़ने पर (सत्पतिम्) सज्जनों के पालनकर्ता (त्वाम्) तुझे ही पुकारते या उद्बोधन देते हैं। (नरः) सभी मनुष्य (काष्ठासु) दिशाओं में (अर्वतः) हिंसक शत्रु से रक्षार्थ (त्वाम्) तुझे ही पुकारते या उद्बोधन देते हैं ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से और आत्मोद्बोधन से सभी विघ्न और सभी शत्रु क्षण भर में पराजित किये जा सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
स꣡ त्वं न꣢꣯श्चित्र वज्रहस्त धृष्णु꣣या꣢ म꣣ह꣡ स्त꣢वा꣣नो꣡ अ꣢द्रिवः । गा꣡मश्व꣢꣯ꣳ र꣣꣬थ्य꣢꣯मिन्द्र꣣ सं꣡ कि꣢र स꣣त्रा꣢꣫ वाजं꣣ न꣢ जि꣣ग्यु꣡षे꣢ ॥८१०॥
पदार्थःहे (चित्र) अद्भुत गुण, कर्म, स्वभाववाले, (वज्रहस्त) दण्डसामर्थ्ययुक्त अथवा शस्त्रास्त्र हाथ में धारण करनेवाले, (अद्रिवः) शत्रुओं से विदारण न किये जा सकनेवाले (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् परमात्मन् वा जीवात्मन् ! (स्तवानः) स्तुति या गुण-वर्णन किया जाता हुआ, (धृष्णुया) धर्षक बल से (महः) महान् (सः) वह प्रसिद्ध (त्वम्) तू (नः) हमें (रथ्यम्) शरीर-रथ के वाहक (गाम्) प्राण-बल को तथा (अश्वम्) इन्द्रिय-बल को (संकिर) प्रदान कर, (न) जैसे (जिग्युषे) संग्राम को जीत लेनेवाले योद्धाजन को (सत्रा) सदा (वाजम्) अन्न, धन आदि का पुरस्कार राजा आदि प्रदान करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःआध्यात्मिक विजय के लिए और बाह्य विजय के लिए भी आत्मोद्बोधन के साथ परमात्मा की भी सहायता अपेक्षित होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣भि꣡ प्र वः꣢꣯ सु꣣रा꣡ध꣢स꣣मि꣡न्द्र꣢मर्च꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ । यो꣡ ज꣢रि꣣तृ꣡भ्यो꣢ म꣣घ꣡वा꣢ पुरू꣣व꣡सुः꣢ स꣣ह꣡स्रे꣢णेव꣣ शि꣡क्ष꣢ति ॥८११॥
पदार्थःहे छात्रो ! (वः) तुम (सुराधसम्) उत्तम सिद्धि देनेवाले (इन्द्रम्) तपस्यारूप ऐश्वर्य से युक्त आचार्य की (अर्च) अर्चना करो, अर्थात् समित्पाणि होकर उसकी शरण में जाकर उसकी सेवा करो, (यथा विदे) जिससे वह तुम्हारी विद्याग्रहण की योग्यता को जाने। कैसे आचार्य की? (यः) जो (पुरूवसुः) बहुत विद्यारूप धनवाला, (मघवा) विद्या का दान करनेवाला आचार्य (जरितृभ्यः) स्तोता छात्रों को (सहस्रेण इव) मानों हजार मुखों से (शिक्षति) शिक्षा देता है ॥१॥ इस मन्त्र में ‘मानो हजार मुखों से’ में उत्प्रेक्षालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःआचार्य के पास से ही लोकविद्या और ब्रह्मविद्या प्राप्त होती है। इस रूप में उसका महत्त्व जानकर कृतज्ञतापूर्वक उसका सबको सम्मान करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
श꣣ता꣡नी꣢केव꣣ प्र꣡ जि꣢गाति धृष्णु꣣या꣡ हन्ति꣢꣯ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ । गि꣣रे꣡रि꣢व꣣ प्र꣡ रसा꣢꣯ अस्य पिन्विरे꣣ द꣡त्रा꣢णि पुरु꣣भो꣡ज꣢सः ॥८१२॥
पदार्थःयह इन्द्र अर्थात् परमैश्वर्ययुक्त परमात्मा वा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य (दाशुषे) आत्मसमपर्ण करनेवाले उपासक वा शिष्य के हितार्थ (धृष्णुया) अपने धर्षक गुण से (शतानीका इव) सौ शत्रुसेनाओं के तुल्य (वृत्राणि) उपासक या शिष्य के दोषों पर (प्र जिगाति) आक्रमण करता है और (हन्ति) उन्हें नष्ट कर देता है। (पुरुभोजसः) बहुत पालन करनेवाले (अस्य) इस परमात्मा वा आचार्य के (दत्राणि) दान (पिन्विरे) उपासक वा शिष्य के प्रति प्रवाहित होते हैं, (गिरेः इव रसाः) जैसे पर्वत के जल प्रवाहित हुआ करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में दो उपमाओं की संसृष्टि है ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा वा आचार्य के प्रति समर्पणभाव में पहुँचकर उनकी सहायता से दोषों को दूर कर आनन्द-रस और विद्या-रस प्राप्त करने चाहिएँ ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्वा꣢मि꣣दा꣡ ह्यो नरोऽपी꣢꣯प्यन्वज्रि꣣न्भू꣡र्ण꣢यः । स꣡ इ꣢न्द्र꣣ स्तो꣡म꣢वाहस इ꣣ह꣢ श्रु꣣ध्यु꣢प꣣ स्व꣡स꣢र꣣मा꣡ ग꣢हि ॥८१३॥
पदार्थःहे (वज्रिन्) दोषों का वर्णन करनेवाले विद्वन् ! (त्वाम् इत्) आपको ही (भूर्णयः) वैभवशाली (नरः) लोग (इदा) इस काल में और (ह्यः) अतीत काल में (अपीप्यन्) उपहार आदि प्रदान कर बढ़ाते हैं और बढ़ाते रहे हैं। (सः) वह, हे (इन्द्र) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त विद्वन् ! (स्तोमवाहसः) आपके प्रति स्तोत्र या पदार्थसमूह पहुँचानेवाले हम लोगों को, अर्थात् हमारे निवेदन को (इह) यहाँ (श्रुधि) आप सुनिए और सुनकर हमारा आतिथ्य ग्रहण करने तथा हमें उपदेश देने के लिए (स्वसरम्) हमारे घर (उप आगहि) आइए ॥१॥
भावार्थःसब उन्नति चाहनेवाले लोगों को चाहिए कि विद्वानों का सत्कार करें और विद्वानों को भी चाहिए कि अध्ययन की हुई सब विद्याएँ उन्हें दें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
म꣡त्स्वा꣢ सुशिप्रिन्हरिव꣣स्त꣡मी꣢महे꣣ त्व꣡या꣢ भूषन्ति वे꣣ध꣡सः꣢ । त꣢व꣣ श्र꣡वा꣢ꣳस्युप꣣मा꣡न्यु꣢क्थ्य सु꣣ते꣡ष्वि꣢न्द्र गिर्वणः ॥८१४॥
पदार्थःहे (सुशिप्रिन्) सर्वान्तर्यामी, (हरिवः) आकर्षणशील सूर्य, चन्द्र आदि लोकों के स्वामी परमात्मन् ! आप (मत्स्व) हमें आनन्दित कीजिए। (तम्) उन आनन्दप्रद आपसे हम (ईमहे) याचना करते हैं। (वेधसः) मेधावी उपासक (त्वया) आप से (भूषन्ति) स्वयं को अलङ्कृत करते हैं। हे (उक्थ्य) प्रशंसनीय, (गिर्वणः) वाणियों से संभजनीय (इन्द्र) जगदीश्वर ! (तव) आपके (श्रवांसि) यश (सुतेषु) आपके पुत्र मनुष्यों में (उपमानि) उपमान योग्य होते हैं, अर्थात् मनुष्यों के यश परमात्मा के यशों के समान उज्ज्वल हों, इस प्रकार उपमान बनते हैं ॥२॥
भावार्थःहृदय में परमात्मा को धारण करने से ही लोग अलङ्कृत होते हैं, शरीर के अङ्गों में कटक, कुण्डल, स्वर्णहार आदि धारण करने से नहीं ॥२॥ इस खण्ड में विद्वानों का और आचार्य का ब्रह्मविद्या में योगदान कहकर जीवात्मा और परमात्मा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ तृतीय अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
य꣢स्ते꣣ म꣢दो꣣ व꣡रे꣢ण्य꣣स्ते꣡ना꣢ पव꣣स्वा꣡न्ध꣢सा । दे꣣वावी꣡र꣢घशꣳस꣣हा꣢ ॥८१५॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्त्ता आनन्दरसागार परमात्मन् वा ज्ञानरसागार आचार्य ! (यः ते) जो आपका (वरेण्यः) वरणीय, (मदः) उत्साहप्रद आनन्द-रस वा ज्ञानरस है, (तेन अन्धसा) उस आनन्दरस वा ज्ञानरस से (पवस्व) हम उपासकों वा शिष्यों को पवित्र करो और, आप (देवावीः) दिव्यगुणप्राप्ति करानेवाले, तथा (अघशंसहा) पापप्रशंसक दुर्विचारों का विनाश करनेवाले होवो ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर उपासकों को आनन्दरस प्रदान करता, दिव्य गुण प्राप्त कराता और उनके दुर्विचारों को नष्ट करता है, वैसे ही शिष्यों को विद्या देना, उनका आनन्द बढ़ाना, उनके दोषों को नष्ट करना और उनमें सद्गुणों का आरोपण करना गुरुओं का कर्तव्य है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ज꣡घ्नि꣢र्वृ꣣त्र꣡म꣢मि꣣त्रि꣢य꣣ꣳ स꣢स्नि꣣र्वा꣡जं꣢ दि꣣वे꣡दि꣢वे । गो꣡षा꣢तिरश्व꣣सा꣡ अ꣢सि ॥८१६॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्त्ता सद्बुद्धिप्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! आप (आमित्रियम्) शत्रु से आनेवाले (वृत्रम्) पाप के (जघ्निः) नष्ट करनेवाले, (दिवेदिवे) प्रतिदिन (वाजम्) बल को (सस्निः) शुद्ध करनेवाले, (गोषातिः) भूमियों, गायों वा वाणियों के दाता और (अश्वसाः) घोड़ों वा प्राणों के दाता (असि) हो ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर के समान गुरु भी पाप आदियों का विनाशक, आत्मबल, मनोबल, बुद्धिबल, चित्तबल आदि को पवित्र करनेवाला, समस्त वाङ्मय को पढ़ानेवाला और प्राणों को परिष्कृत करनेवाला होवे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡म्मि꣢श्लो अरु꣣षो꣡ भु꣢वः सूप꣣स्था꣡भि꣣र्न꣢ धे꣣नु꣡भिः꣢ । सी꣡द꣢ञ्छ्ये꣣नो꣢꣫ न यो꣣निमा꣢ ॥८१७॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्त्ता, सद्गुणकर्मस्वभावप्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! (अरुषः) तेज से देदीप्यमान आप (सूपस्थाभिः धेनुभिः) भली-भाँति उपस्थित तृप्तिप्रद स्तुतिवाणियों वा गायों से (न) इस समय (सम्मिश्लः) सम्मानित (भुवः) होवो। और, (श्येनः योनिं न) बाज पक्षी जैसे आवासवृक्ष पर अथवा सूर्य जैसे द्युलोकरूप घर में स्थित होता है, वैसे ही (श्येनः) प्रशंसनीय गतिवाले आप (योनिम्) हृदय-मन्दिर वा गुरुकुलरूप गृह में (आसीदन्) निवास करनेवाले (भुवः) होवो ॥३॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे द्रोणकलश में स्थापित सोमरस गोदुग्ध के साथ मिश्रित कर सम्मानित किया जाता है, वैसे ही हृदय-गृह में स्थापित परमेश्वर का स्तुति-वाणियों से और गुरुकुल में स्थापित आचार्य का धेनुओं से सम्मान करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣣यं꣢ पू꣣षा꣢ र꣣यि꣢꣫र्भगः꣣ सो꣡मः꣢ पुना꣣नो꣡ अ꣢र्षति । प꣢ति꣣र्वि꣡श्व꣢स्य꣣ भू꣡म꣢नो꣣꣬ व्य꣢꣯ख्य꣣द्रो꣡द꣢सी उ꣣भे꣢ ॥८१८॥
पदार्थः(पूषा) शारीरिक तथा आत्मिक पुष्टि का प्रदाता, (रयिः) विद्याधन से युक्त, (भगः) भजनीय, समित्पाणि शिष्यों से सेवनीय (अयं सोमः) यह सद्विद्याओं का प्रेरक आचार्य (पुनानः) शिष्यों को पवित्र करता हुआ (अर्षति) क्रियाशील होता है। (विश्वस्य भूमनः) समस्त विस्तृत ज्ञान का (पतिः) स्वामी यह आचार्य, ज्ञान-प्रदान द्वारा शिष्यों के सम्मुख (उभे रोदसी) आकाश-भूमि दोनों को (व्यख्यत्) प्रकाशित कर देता है। कहा भी है—“आचार्य विस्तृत, गम्भीर इन दोनों द्यावापृथिवी को ब्रह्मचारी के सम्मुख घड़कर प्रकट कर देता है। उन्हें वह ब्रह्मचारी तप से अपने अन्दर धारण करता है। उसमें सब देव अनुकूल मनवाले हो जाते हैं (अथ० ११।५।८) ॥१॥
भावार्थःविद्वान् आचार्य को चाहिए कि वह ब्रह्मचारियों को आकाश-भूमि दोनों के सूर्य, नक्षत्र, जल, वायु, विद्युत्, मेघ, नदी, समुद्र, ओषधि, वनस्पति, भूगर्भ आदि का ज्ञान और चारित्रिक शिक्षा देता हुआ उन्हें पवित्र करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
स꣡मु꣢ प्रि꣣या꣡ अ꣢नूषत꣣ गा꣢वो꣣ म꣡दा꣢य꣣ घृ꣡ष्व꣢यः । सो꣡मा꣢सः कृण्वते प꣣थः꣡ पव꣢꣯मानास꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥८१९॥
पदार्थःप्रथम—ब्रह्मानन्द-रस के पक्ष में। (प्रियाः) परमेश्वर के प्रिय, (घृष्वयः) मानसिक संघर्ष में संलग्न (गावः) स्तोताजन (मदाय) आनन्द-प्राप्ति के लिए (सम् उ अनूषत) भली-भाँति परमेश्वर की स्तुति करते हैं। उसकी स्तुति से प्राप्त (इन्दवः) दीप्त या सराबोर करनेवाले (सोमासः) ब्रह्मानन्द-रस (पवमानासः) स्तोताओं को पवित्र करते हुए, उनके सम्मुख (पथः) कर्तव्य-मार्गों को (कृण्वते) स्पष्ट कर देते हैं ॥ द्वितीय—गुरुओं के पक्ष में। (प्रियाः) प्रिय, मधुर, (घृष्वयः) घर्षण अर्थात् पुनः-पुनः अभ्यास से उज्ज्वल (गावः) शिष्यों की वाणियाँ (मदाय) आनन्द-प्राप्ति के लिए (सम् उ अनूषत) गुरुओं की सम्यक् स्तुति करती हैं। वे (इन्दवः) ज्ञान से दीप्त (सोमासः) ज्ञानप्रेरक गुरुजन (पवमानासः) शिष्यों को पवित्र करते हुए, उनके सम्मुख (पथः) गन्तव्य मार्गों को (कृण्वते) स्पष्ट कर देते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा की और गुरुजनों की भली-भाँति स्तुति करके आनन्द-रस तथा ज्ञान-रस को दुहकर उसके पान से स्वयं को पवित्र करके सन्मार्ग का अनुसरण करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
य꣡ ओजि꣢꣯ष्ठ꣣स्त꣡मा भ꣢꣯र꣣ प꣡व꣢मान श्र꣣वा꣡य्य꣢म् । यः꣡ पञ्च꣢꣯ चर्ष꣣णी꣢र꣣भि꣢ र꣣यिं꣢꣫ येन꣣ व꣡ना꣢महे ॥८२०॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रकर्त्ता परमात्मन् वा आचार्य (यः) जो आपका (ओजिष्ठः) अतिशय ओजस्वी आनन्दरस वा ज्ञानरस है, (तम्) उस (श्रवाय्यम्) यश के हेतु रस को (आ भर) प्रदान कीजिए, (यः) जो आनन्द-रस या ज्ञान-रस (पञ्च चर्षणीः) पाँच ज्ञान की साधन इन्द्रियों को या पाँच प्राणों को (अभि) अभिव्याप्त कर लेवे और (येन) जिस आनन्द-रस वा ज्ञान-रस से, हम (रयिम्) भौतिक और आध्यात्मिक धन को (वनामहे) प्राप्त करें ॥३॥
भावार्थःजैसे परमात्मा अपने उपासक को ऐसा आनन्द प्रदान करता है, जिससे वह दिव्य सम्पत्ति पा लेता है, वैसे ही गुरुओं को चाहिए कि वे विद्यार्थियों को वैसा ज्ञान देवें जिससे धन कमाना सुलभ हो ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
वृ꣡षा꣢ मती꣣नां꣡ प꣢वते विचक्ष꣣णः꣢꣫ सोमो꣣ अ꣡ह्नां꣢ प्रतरी꣣तो꣡षसां꣢꣯ दि꣣वः꣢ । प्रा꣣णा꣡ सिन्धू꣢꣯नां क꣢ल꣡शा꣢ꣳ अचिक्रद꣣दि꣡न्द्र꣢स्य꣣ हा꣡र्द्या꣢वि꣣श꣡न्म꣢नी꣣षि꣡भिः꣢ ॥८२१॥
पदार्थः(सोमः) एक सोम (विचक्षणः) विद्वान आचार्य है, जो (मतीनाम्) ज्ञानों का (वृषा) बरसानेवाला होता हुआ (पवते)शिष्यों को पवित्र करता है। द्वितीय सोम परमेश्वर है, जो (अह्नाम्) दिनों का, (उषसाम्) उषाओं का और (दिवः) सूर्य का (प्रतरीता) उत्तम रूप से तरानेवाला अर्थात् व्यतीत करानेवाला है। तृतीय सोम चन्द्रमा है, जो (सिन्धूनाम्) समुद्रों का (प्राणा) बढ़ानेवाला होता है। चौथा सोम सोमौषधि का रस है, जो (कलशान्) द्रोणकलशों को (अचिक्रदत्) शब्दायमान करता है। पाँचवाँ सोम ब्रह्मानन्द-रस है, जो (मनीषिभिः) मन से किये जाते हुए स्तोत्रों के साथ (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (हार्दि) हृदय में (आ विशत्) प्रविष्ट होता है ॥१॥
भावार्थःवेदों में सोम शब्द के बहुत से वाच्यार्थ होते है, जो प्रकरणानुसार वेदज्ञ विद्वानों को समझ लेने चाहिएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
म꣣नीषि꣡भिः꣢ पवते पू꣣र्व्यः꣢ क꣣वि꣡र्नृभि꣢꣯र्य꣣तः꣢꣫ परि꣣ को꣡शा꣢ꣳ असिष्यदत् । त्रि꣣त꣢स्य꣣ ना꣡म꣢ ज꣣न꣢य꣣न्म꣢धु꣣ क्ष꣢र꣣न्नि꣡न्द्र꣢स्य वा꣣यु꣢ꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ व꣣र्ध꣡य꣢न् ॥८२२॥
पदार्थः(पूर्व्यः) श्रेष्ठ, (कविः) वेदकाव्य का कवि, क्रान्तद्रष्टा, मेधावी वह सोम परमेश्वर (पवते) हृदयों को पवित्र करता है। (मनीषिभिः) बुद्धिमान् (नृभिः) उपासक जनों से (यतः) ग्रहण किया हुआ, ध्यान किया गया वह (कोशान्) शरीरस्थ पञ्च कोशों में (परि असिष्यदत्) रस को प्रवाहित करता है। वह (त्रितस्य) ज्ञान, कर्म, उपासना तीनों से युक्त उपासक के (नाम) यश को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ, (मधु) आनन्द को (क्षरन्) झराता हुआ (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (सख्याय) सहयोग के लिए, उसके (वायुम्) प्राण को (वर्धयन्) बढ़ाता रहता है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर उपासक को अपना सखा बनाकर उसके लिए दिव्य आनन्द-रूप मधु टपकाता रहता है ॥२॥
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छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣣यं꣡ पु꣢ना꣣न꣢ उ꣣ष꣡सो꣢ अरोचयद꣣य꣡ꣳ सिन्धु꣢꣯भ्यो अभवदु लोक꣣कृ꣢त् । अ꣣यं꣢꣫ त्रिः स꣣प्त꣡ दु꣢दुहा꣣न꣢ आ꣣शि꣢र꣣ꣳ सो꣡मो꣢ हृ꣣दे꣡ प꣢वते꣣ चा꣡रु꣢ मत्स꣣रः꣢ ॥८२३॥
पदार्थः(अयम्) इस (पुनानः) पवित्र करते हुए सोम ने, सर्वोत्पादक परमात्मा ने (उषसः) उषाओं को (अरोचयत्) चमकाया है। (अयम्) यह सोम, सर्वप्रेरक परमात्मा (सिन्धुभ्यः) नदियों के लिए (लोककृत्) यश करनेवाला (अभवत् उ) हुआ है। (अयम्) यह (सोमः) रसागार परमात्मा (त्रिः सप्त) इक्कीस छन्दों से युक्त वेदवाणी रूप गौओं से (आशिरम्) ज्ञानरूप दुग्ध (दुदुहानः) दुहता हुआ (हृदे) उपासक के हृदय के लिए (मत्सरः) आनन्दजनक होता हुआ (चारु) सुन्दर रूप में (पवते) प्रवाहित हो रहा है ॥३॥ यहाँ एक सोमरूप कर्त्ता कारक से अनेक क्रियाओं का योग होने से दीपक अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा ही सारे सृष्टि के कार्य का सञ्चालन करता है, उसी ने हमें वेद-रूपिणी गाय दी है, वही स्तोता के हृदय में रस का सञ्चार करता है ॥३॥ इस खण्ड में भी परमेश्वर, आचार्य तथा ब्रह्मानन्द-रस आदि का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ तृतीय अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ए꣣वा꣡ ह्यसि꣢꣯ वीर꣣यु꣢रे꣣वा꣡ शूर꣢꣯ उ꣣त꣢ स्थि꣣रः꣢ । ए꣣वा꣢ ते꣣ रा꣢ध्यं꣣ म꣡नः꣢ ॥८२४॥
पदार्थःहे मेरे अन्तरात्मा ! तू (एव हि) सचमुच (वीरयुः) वीरों का प्रेमी (असि) है, (एव) सचमुच, तू (शूरः) शूर (उत) और (स्थिरः) विपत्तियों तथा युद्धों में अविचल रहनेवाला है। (एव) सचमुच (ते) तेरा (मनः) मन (राध्यम्) सिद्धि प्राप्त करने योग्य है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा यदि अपनी शक्ति को पहचान ले तो संसार में महान् कार्यों को कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ए꣣वा꣢ रा꣣ति꣡स्तु꣢विमघ꣣ वि꣡श्वे꣢भिर्धायि धा꣣तृ꣡भिः꣢ । अ꣡धा꣢ चिदिन्द्र नः꣣ स꣡चा꣢ ॥८२५॥
पदार्थःहे (तुविमघ) बहुत धनी परमेश ! (एव) सचमुच, तेरा (रातिः) दान (विश्वेभिः) सब (धातृभिः) धारकों के द्वारा (धायि) धारण किया हुआ है। (अध चित्) इसके अतिरिक्त, हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् विपत्तिविदारक परमात्मन् ! तू (नः) हमारा (सचा) नित्य का साथी है ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर यदि हमारा सखा हो जाता है तो हमारे लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
मो꣢꣫ षु ब्र꣣ह्मे꣡व꣢ तदिन्द्र꣣यु꣡र्भुवो꣢꣯ वाजानां पते । म꣡त्स्वा꣢ सु꣣त꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तः ॥८२६॥
पदार्थःहे (वाजानां पते) बलों के अधिपति मेरे अन्तरात्मन् ! (ब्रह्मा इव) यज्ञ के ब्रह्मा के समान उच्च पद पर विद्यमान तू (मा उ सु) कभी मत (तन्द्रयुः) आलसी (भुवः) हो और (गोमतः सुतस्य) गोदुग्धयुक्त सोमरस से अर्थात् ज्ञानकर्मयुक्त उपासना-रस से (मत्स्व) आनन्द लाभ करता रह ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कभी कि प्रमाद न करें, प्रत्युत जागरूक होकर सब शुभकर्मों में उत्साह धारण करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣢न्द्रं꣣ वि꣡श्वा꣢ अवीवृधन्त्समु꣣द्र꣡व्य꣢चसं꣣ गि꣡रः꣢ । र꣣थी꣡त꣢मꣳ र꣣थी꣢नां꣣ वा꣡जा꣢ना꣣ꣳ स꣡त्प꣢तिं꣣ प꣡ति꣢म् ॥८२७॥
पदार्थः(विश्वाः) सब (गिरः) वाणियाँ (समुद्रव्यचसम्) समुद्र या अन्तरिक्ष के समान विशाल अर्थात् उदारहृदय, (रथीनाम्) रथस्वामियों के मध्य (रथीतमम्) श्रेष्ठ रथस्वामी, (वाजानाम्) आत्मबलों और विद्याबलों के (पतिम्) अधीश्वर, (सत्पतिम्) श्रेष्ठ मनुष्यों वा श्रेष्ठ विद्यार्थियों के पालनकर्त्ता (इन्द्रम्) जगदीश्वर वा विद्वान् आचार्य को (अवीवृधन्) महिमा से बढ़ाती हैं ॥१॥ ‘समुद्रव्यचसम् इन्द्रम्’ में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर ब्रह्माण्डरूप रथ का श्रेष्ठ स्वामी है, वैसे ही आचार्य गुरुकुलरूप रथ का श्रेष्ठ कुलपति होता है ॥१॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
स꣣ख्ये꣡ त꣢ इन्द्र वा꣣जि꣢नो꣣ मा꣡ भे꣢म शवसस्पते । त्वा꣢म꣣भि꣡ प्र नो꣢꣯नुमो꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡परा꣢जितम् ॥८२८॥
पदार्थःहे (शवसः पते) बल के अधीश्वर (इन्द्र) परमैश्वर्यवान्, अविद्याविदारक जगदीश्वर वा आचार्य ! (वाजिनः) बलवान् हम (ते) आपकी (सख्ये) मित्रता में रहते हुए (मा भेम) भयभीत न हों। (जेतारम्) सब विघ्नों पर विजय पानेवाले, (अपराजितम्) किसी भी बाधा से पराजित न होनेवाले (त्वाम्) तुझ जगदीश्वर वा आचार्य को (अभि) लक्ष्य करके, हम (प्र नोनुमः) अतिशय बार-बार स्तुति करते हैं ॥२॥
भावार्थःब्रह्मबल, आत्मबल, विद्याबल आदियों में बलिष्ठ, सब विपत्तियों पर विजय पानेवाले, किसी से भी पराजित न होनेवाले जगदीश्वर और आचार्य यदि हमारे साथी हो जाते हैं तो निर्भय रहते हुए हम सम्पूर्ण उत्कर्ष को पा सकते हैं ॥२॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
पू꣣र्वी꣡रिन्द्र꣢꣯स्य रा꣣त꣢यो꣣ न꣡ वि द꣢꣯स्यन्त्यू꣣त꣡यः꣢ । य꣣दा꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢त स्तो꣣तृ꣢भ्यो꣣ म꣡ꣳह꣢ते म꣣घ꣢म् ॥८२९॥
पदार्थः(इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवान् अविद्याविदारक जगदीश्वर वा आचार्य के (रातयः) दान (पूर्वीः) श्रेष्ठ हैं। उस जगदीश्वर वा आचार्य की (ऊतयः) रक्षाएँ (न विदस्यन्ति) कभी क्षीण नहीं होतीं, (यदा) जब वह (स्तोतृभ्यः) अपने सद्गुण व सत्कर्मों के प्रशंसकों को (गोमतः) प्रशस्त गाय, वाणी, विद्या, भूमि, इन्द्रिय आदि से युक्त (वाजस्य) बल का (मघम्) धन (मंहते) प्रदान करता है ॥३॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर के दान, रक्षण आदि सबको नित्य प्राप्त होते हैं, वैसे ही आचार्य के भी सदाचार-विद्या आदि के दान और अविद्या, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि से रक्षण निरन्तर प्रजाओं को प्राप्त करने चाहिएँ ॥३॥ इस खण्ड में अन्तरात्मा के उद्बोधनपूर्वक जगदीश्वर तथा आचार्य का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ तृतीय अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ द्वितीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣त꣡ अ꣢सृग्र꣣मि꣡न्द꣢वस्ति꣣रः꣢ प꣣वि꣡त्र꣢मा꣣श꣡वः꣢ । वि꣡श्वा꣢न्य꣣भि꣡ सौभ꣢꣯गा ॥८३०॥
पदार्थः(एते) ये (तिरः) तिरछी गति से (आशवः) शीघ्र आगे बढ़नेवाले (इन्दवः) तेजस्वी उपासक लोग (पवित्रम्) पवित्र व्यवहार को (असृग्रम्) उत्पन्न करते हैं। इसीलिए (विश्वानि) सब (सौभगा) सौभाग्यों को (अभि) प्राप्त कर लेते हैं।
भावार्थःजगदीश्वर की उपासना से अपने हृदय को पवित्र करके समाज में सबके प्रति पवित्र व्यवहार यदि किया जाए तो निश्चय ही सब सौभाग्य प्राप्त हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वि꣣घ्न꣡न्तो꣢ दुरि꣣ता꣢ पु꣣रु꣢ सु꣣गा꣢ तो꣣का꣡य꣢ वा꣣जि꣡नः꣢ । त्म꣡ना꣢ कृ꣣ण्व꣢न्तो꣣ अ꣡र्व꣢तः ॥८३१॥
पदार्थः(वाजिनः) आत्मबल से युक्त ये सोम अर्थात् सौम्यगुणी उपासक (पुरु) बहुत से (दुरिता) दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को (विघ्नन्तः) विनष्ट करते हुए, (तोकाय) सन्तान के लिए (सुगा) आसानी से प्राप्त होने योग्य भद्रों को रचते हुए और (त्मना) स्वयं को (अर्वतः) घोड़ों के समान प्रगतिशील (कृण्वन्तः) करते हुए (सुष्टुतिम्) उत्तम प्रशस्ति को (अभ्यर्षन्ति) प्राप्त करते हैं। [अभ्यर्षन्ति सुष्टुतिम्—यह वाक्य अगले मन्त्र से यहाँ लाया गया है] ॥२॥
भावार्थःहृदय से की गयी उपासना का यह अनिवार्य फल होता है कि उपासक के दुरित नष्ट हों, भद्र की प्राप्ति हो और वह आगे बढ़े ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
कृ꣣ण्व꣢न्तो꣣ व꣡रि꣢वो꣣ ग꣢वे꣣꣬ऽभ्य꣢꣯र्षन्ति सुष्टु꣣ति꣢म् । इ꣡डा꣢म꣣स्म꣡भ्य꣢ꣳ सं꣣य꣡त꣢म् ॥८३२॥
पदार्थःये सोम अर्थात् तेजस्वी उपासक लोग (गवे)अपने जीवात्मा और इन्द्रियसमूह के लिए (वरिवः) ऐश्वर्य को और (अस्मभ्यम्) हम सखाओं के लिए (संयतम्) संयमयुक्त (इडाम्) भद्र वाणी को (कृण्वन्तः) प्रयुक्त करते हुए (सुष्टुतिम्) उत्तम प्रशस्ति को (अभ्यर्षन्ति) प्राप्त करते हैं ॥३॥
भावार्थःउपासक के आत्मा, मन, बुद्धि, वाणी, प्राण, इन्द्रिय आदि सब दिव्य ऐश्वर्य से युक्त हो जाते हैं और वह अन्यों के प्रति मधुर तथा भद्र वाणी का ही प्रयोग करता हुआ सुप्रशस्ति प्राप्त करता है ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
रा꣡जा꣢ मे꣣धा꣡भि꣢रीयते꣣ प꣡व꣢मानो म꣣ना꣡वधि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षेण꣣ या꣡त꣢वे ॥८३३॥
पदार्थःप्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (राजा) विश्वब्रह्माण्ड का सम्राट्, (पवमानः) पवित्रतादायक सोम परमेश्वर (मनौ अधि) मननशील उपासक के अन्तःकरण में (मेधाभिः) धारणावती बुद्धियों के साथ (ईयते) पहुँचता है। वही मङ्गल, बुध, बृहस्पति, पृथिवी, चन्द्र आदि ग्रहोपग्रहों को तथा पक्षी आदियों को (अन्तरिक्षेण) आकाश मार्ग से (यातवे) गति करने के लिए समर्थ करता है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (राजा) राष्ट्र का सम्राट् (पवमानः) राष्ट्रवासियों के आचरण में पवित्रता उत्पन्न करता हुआ (मनौ अधि) विद्वान् प्रजावर्ग के मध्य में (मेधाभिः) शिल्पियों के बुद्धिकौशलों से (अन्तरिक्षेण यातवे) विमानों द्वारा आकाशमार्ग से यात्रा करने के लिए (ईयते) समर्थ होता है॥ तृतीय—योगी के पक्ष में। (राजा) योगिराज (पवमानः) अपने अन्तःकरण व व्यवहार को पवित्र करता हुआ (अन्तरिक्षेण यातवे) अन्तरिक्ष से जाने के लिए अर्थात् आकाशगमन की सिद्धि प्राप्त करने के लिए (मेधाभिः) ध्यानों के द्वारा (मनौ अधि) मननशील अपनी अन्तरात्मा में तथा सर्वज्ञ परमात्मा में (ईयते) पहुँचता है, अर्थात् मन को अपने अन्तरात्मा में और परमात्मा में केन्द्रित करता है ॥ चतुर्थ—चन्द्रमा के पक्ष में। (राजा) देदीप्यमान चन्द्ररूप सोम (पवमानः) अपनी चाँदनी से भूमण्डल को पवित्र करता हुआ (मनौ अधि) दीप्तिमान् सूर्य के अधिष्ठातृत्व में (मेधाभिः) आकर्षण द्वारा सूर्य के साथ सङ्गम करके (अन्तरिक्षेण यातवे) आकाशमार्ग से भूमि और सूर्य की परिक्रमा करने के लिए (ईयते) प्रवृत्त होता है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे पक्षी और ग्रह-उपग्रह आकाश में भ्रमण करते हैं और मनुष्य विमानों के द्वारा आकाश में यात्रा करते हैं, वैसे ही योगसिद्धि से योगी लोग भी आकाश में भ्रमण कर सकते हैं ॥१॥३
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ नः꣢ सोम꣣ स꣢हो꣣ जु꣡वो꣢ रू꣣पं꣡ न वर्च꣢꣯से भर । सु꣣ष्वाणो꣢ दे꣣व꣡वी꣢तये ॥८३४॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमात्मन् ! (देववीतये) दिव्य गुणों की प्राप्ति कराने के लिए (सुष्वाणः) आनन्द-रस को अभिषुत किये हुए आप (नः) हमारे लिए (सहः) आत्मबल और (जुवः) वेगों को (आभर) लाओ, प्रदान करो, (वर्चसे) कान्ति के लिए (रूपं न) जैसे रूप प्रदान करते हो ॥२ ॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजब परमात्मा से प्राप्त आनन्द-रस की तरङ्गें उपासक की हृदयभूमि को आप्लावित करती हैं तब उसके अन्दर सब सद्गुण स्वयं मानो ‘मैं पहले’ ‘मैं पहले’ की होड़ लगाते हुए प्रकट हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ न꣢ इन्दो शात꣣ग्वि꣢नं꣣ ग꣢वां꣣ पो꣢ष꣣ꣳ स्व꣡श्व्य꣢म् । व꣢हा꣣ भ꣡ग꣢त्तिमू꣣त꣡ये꣢ ॥८३५॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्विन् धनाधीश परमात्मन् ! (ऊतये) रक्षा के लिए (नः) हमें (शातग्विनम्) सैंकड़ों लोगों के पास जानेवाले (गवां पोषम्) गायों या वाणियों के पोषण को, (स्वश्व्यम्) उत्कृष्ट घोड़ों व प्राणबलों के समूह को और (भगत्तिम्) ऐश्वर्यों को दान को (आ वह) प्राप्त कराओ ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से पुरुषार्थ के लिए प्रेरणा प्राप्त कर सब भौतिक और आध्यात्मिक वैभव पाया जा सकता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
तं꣡ त्वा꣢ नृ꣣म्णा꣢नि꣣ बि꣡भ्र꣢तꣳ स꣣ध꣡स्थे꣢षु म꣣हो꣢ दि꣣वः꣢ । चा꣡रु꣢ꣳ सुकृ꣣त्य꣡ये꣢महे ॥८३६॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (महः दिवः) महान् आकाश के (सधस्थेषु) सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्र आदि लोकों में, अथवा (महः दिवः) महान् प्रकाशमय जीवात्मा के (लोकेषु) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदि लोकों में (नृम्णानि) धन और बल (बिभ्रतम्) स्थापित करनेवाले, (चारुम्) रमणीय (तं त्वा) उस सुप्रसिद्ध तुझको हम (सुकृत्यया) पुण्य कर्म से (ईमहे) प्राप्त करते हैं ॥१॥
भावार्थःभूगोल, खगोल, और शरीर में सर्वत्र धन और बल को उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर शुभ कर्मों से ही पाया जा सकता है, अशुभों से नहीं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सं꣡वृ꣢क्तधृष्णु꣣꣬मुक्थ्यं꣢꣯ म꣣हा꣡म꣢हिव्रतं꣣ म꣡द꣢म् । श꣣तं꣡ पुरो꣢꣯ रुरु꣣क्ष꣡णि꣢म् ॥८३७॥
पदार्थः(संवृक्तधृष्णुम्) काम, कोध्र आदि आन्तरिक अथवा बाह्य धर्षणशील शत्रुओं को नष्ट करनेवाले, (उक्थ्यम्) प्रशंसायोग्य, (महामहिव्रतम्) अतिशय पूजनीय कर्मोंवाले, (मदम्) आनन्दजनक, (शतं पुरः) सौ शत्रु-नगरियों को (रुरुक्षणिम्) तोड़-फोड़ देने के लिए कृतसंकल्प पवमान सोम को अर्थात् पवित्रकर्ता जगदीश्वर वा राजा को, हम (ईमहे) प्राप्त करते हैं। [यहाँ ‘ईमहे’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है ] ॥२॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर आन्तरिक रिपुओं को नष्ट करता, प्रशंसनीय कर्म करता और अपने उपासकों को आनन्दित करता है, वैसे ही राजा सब विघ्नकारी शत्रुओं को उच्छिन्न करके राज्य की उन्नतिवाले कर्म करके प्रजाओं को आनन्दित करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡त꣢स्त्वा र꣣यि꣢र꣣꣬भ्य꣢꣯य꣣द्रा꣡जा꣢नꣳ सुक्रतो दि꣣वः꣢ । सु꣣पर्णो꣡ अ꣢व्य꣣थी꣡ भ꣢रत् ॥८३८॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (सुक्रतो) शुभ कर्म करनेवाले मनुष्य ! (राजानं त्वा) यश से जगमगानेवाले तुझे (दिवः) देदीप्यमान (अतः) इस पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्त्ता जगदुत्पादक परमेश्वर से ही (रयिः) ऐश्वर्य (अभ्ययत्) प्राप्त हुआ है, जिस ऐश्वर्य को (सुपर्णः) शुभ पालनकर्त्ता, (अव्यथी) किसी प्रकार की व्यथा से रहित उस परमेश्वर ने तेरे लिए (भरत्) दिया है ॥ द्वितीय—चन्द्रमा के पक्ष में। हे पवमान सोम अर्थात् गति करनेवाले चन्द्रमा ! (राजानं त्वा) दीप्तिमान् तुझे (अतः दिवः) इस सूर्यलोक से ही (रयिः) प्रकाशरूप धन (अभ्ययत्) मिलता है, जिसे (सुपर्णः) सुन्दर किरणोंवाला (अव्यथी) अविचल स्थिर सूर्य (भरत्) तेरे अन्दर लाता है ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे मनुष्य जगदीश्वर से सब प्रकार का धन प्राप्त करता है, वैसे ही चन्द्रमा सूर्य से दीप्ति पाता है ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡धा꣢ हिन्वा꣣न꣡ इ꣢न्द्रि꣣यं꣡ ज्यायो꣢꣯ महि꣣त्व꣡मा꣢नशे । अ꣣भिष्टिकृ꣡द्विच꣢꣯र्षणिः ॥८३९॥
पदार्थः(अध) और यह बात भी है कि वह पवमान सोम अर्थात् पवित्रता देनेवाला जगत्स्रष्टा परमात्मा (इन्द्रियम्) आँख आदि इन्द्रिय को अथवा आत्मबल को (हिन्वानः) प्रेरित करता हुआ (ज्यायः) अत्यन्त प्रशस्त (महित्वम्) महत्त्व को (आनशे) प्राप्त करता है। वही (अभिष्टिकृत्) अभीष्ट प्रदाता और (विचर्षणिः) विशेषरूप से सबका साक्षात् द्रष्टा है ॥४॥
भावार्थःजो मन, आँख, कान आदि में मनन करने, देखने, सुनने आदि के सामर्थ्य को तथा आत्मा में बल को निहित करता है, उस कामना पूर्ण करनेवाले, विश्वद्रष्टा परमात्मा का महत्त्व सबको जानना चाहिए ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वि꣡श्व꣢स्मा꣣ इ꣡त्स्व꣢र्दृ꣣शे꣡ साधा꣢꣯रणꣳ रज꣣स्तु꣡र꣢म् । गो꣣पा꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ वि꣡र्भ꣢रत् ॥८४०॥
पदार्थः(विश्वस्मै इत्) सभी के लिए (स्वः दृशे) सुखदर्शनार्थ (साधारणम्) जो साधारण है, अर्थात् किये कर्मों के अनुसार जो सभी सत्पात्र जनों को बिना पक्षपात के सुख दर्शाता है, (रजस्तुरम्) जो रजोगुण के द्वारा क्रिया करवाता है, (ऋतस्य) सत्य का (गोपाम्) जो रक्षक है, ऐसे पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेहारे जगत्स्रष्टा परमात्मा को (विः) गतिशील जीवात्मा (भरत्) अपने अन्तःकरण में धारण करे ॥५॥
भावार्थःपरमात्मा सत्य का ही रक्षक है, असत्य का नहीं। उसके न्याय में विश्वास करके सबको सत्कर्म ही करने चाहिएँ ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣣षे꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या मृ꣣ज्य꣡मा꣢नो मनी꣣षि꣡भिः꣢ । इ꣡न्दो꣢ रु꣣चा꣡भि गा इ꣢हि꣢ ॥८४१॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी, विद्या के खजाने आचार्य ! (मनीषिभिः) चिन्तनशील शिष्यों के द्वारा (मृज्यमानः) नमस्कारों से अलङ्कृत किये जाते हुए आप (इषे) इच्छासिद्धि के लिए (धारया) विद्या की धारा से (पवस्व) शिष्यों को पवित्र कीजिए। आप (रुचा) दीप्ति के साथ (गाः अभि) स्तोता शिष्यों के प्रति (इहि) जाइए ॥१॥
भावार्थःशिष्य समर्पण भाव से गुरुओं के प्रति जाएँ और गुरु निश्छल मन से शिष्यों के पास पहुँचकर सब विद्याएँ प्रदान करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
पु꣣नानो꣡ वरि꣢꣯वस्कृ꣣ध्यू꣢र्जं꣣ ज꣡ना꣢य गिर्वणः । ह꣡रे꣢ सृजा꣣न꣢ आ꣣शि꣡र꣢म् ॥८४२॥
पदार्थःहे (गिर्वणः) वेदादि वाङ्मय के लिए सेवनीय ! (हरे) दोष, दुर्व्यसन, दुःख आदि को हरनेवाले आचार्य ! (पुनानः) आचरण को पवित्र करते हुए, तथा (आशिरम्) परिपक्व ज्ञान को (सृजानः) उत्पन्न करते हुए आप (जनाय) शिष्यजनों के लिए (वरिवः) धनः और (ऊर्जम्) शारीरिक बल तथा प्राणवत्ता (कृधि) प्रदान कीजिए ॥२॥
भावार्थःशास्त्र पढ़ाना, चरित्र को पवित्र करना, दोषों को हरना, व्यायाम, प्राणायाम आदि द्वारा बल और प्राण प्रदान करना, अर्थकरी विद्या सिखाना गुरुओं का कर्त्तव्य है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
पु꣣नानो꣢ दे꣣व꣡वी꣢तय꣣ इ꣡न्द्र꣢स्य याहि निष्कृ꣣त꣢म् । द्यु꣣तानो꣢ वा꣣जि꣡भि꣢र्हि꣣तः꣢ ॥८४३॥
पदार्थःहे विद्यार्थी ! तू (देववीतये) अहिंसा, सत्य, अस्तेय, न्याय, दया, उदारता आदि दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए (पुनानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (इन्द्रस्य) कुलपति आचार्य के (निष्कृतम्) घर अर्थात् गुरुकुल को (याहि) जा और वहाँ (हितः) प्रविष्ट किया गया तू (वाजिभिः) विज्ञानी गुरुओं के द्वारा (द्युतानः) विद्या के तेज से और सच्चरित्रता के तेज से चमकनेवाला बन ॥३॥
भावार्थःविद्यार्थी गुरुकुल में ब्रह्मचर्यपूर्वक विधि के अनुसार वेदादि शास्त्रों को पढ़कर, सदाचार की शिक्षा लेकर, योगाभ्यास से आध्यात्मिक उन्नति करके, विद्वान् होकर, समावर्तन के बाद बाहर जाकर पढ़ी हुई विद्या का सब जगह प्रचार करें ॥३॥ इस खण्ड में उपासक, योगी, परमात्मा, गुरु-शिष्य और प्रसङ्गतः राजा, चन्द्रमा आदि के विषय का प्रतिपादन होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चतुर्थ अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣢ना꣣ग्निः꣡ समि꣢꣯ध्यते क꣣वि꣢र्गृ꣣ह꣡प꣢ति꣣र्यु꣡वा꣢ । ह꣣व्यवा꣢ड्जु꣣꣬ह्वा꣢꣯स्यः ॥८४४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (अग्निना) नेता जीवात्मा द्वारा (अग्निः) नेता परमात्मा (समिध्यते) हृदय में प्रदीप्त किया जाता है, जो परमात्मा (कविः) दूरदर्शी, बुद्धिमान् (गृहपतिः) घरों का रक्षक, (युवा) सदा युवक, अर्थात् युवक के समान अपार सामर्थ्यवाला, (हव्यवाट्) आत्मसमर्पण को स्वीकार करनेवाला अथवा दातव्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाला, और (जुह्वास्यः) वेदवाणी-रूप मुखवाला है ॥ द्वितीय—यज्ञाग्नि के पक्ष में। (अग्निना) आहिताग्नि यजमान द्वारा उत्पन्न आग से (अग्निः) आहवनीय अग्नि (समिध्यते) प्रदीप्त किया जाता है, जो आहवनीय अग्नि (कविः) गतिमय ज्वालाओंवाला, (गृहपतिः) घरों का रक्षक, (युवा) होमे हुए द्रव्य को जलाकर सूक्ष्म करके स्थानान्तर में पहुँचानेवाला और (जुह्वास्यः) घृत से भरी हुई स्रुवा जिसके ज्वालारूप मुख में पड़ती है, ऐसा है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। प्रथम अर्थ में ‘जुह्वास्यः’ में रूपक है ॥१॥
भावार्थःजैसे आत्माग्नि परमात्माग्नि को प्रदीप्त करके उसके तेज द्वारा पहले से भी अधिक दीप्त होकर उत्कर्ष धारण करता है, वैसे ही मनुष्य यज्ञाग्नि को प्रदीप्त करके उसमें होम के द्वारा वायुशुद्धि करके, आरोग्य प्राप्त कर, अग्नि के समान तेजस्वी होकर स्वयं को उन्नत करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣡स्त्वाम꣢꣯ग्ने ह꣣वि꣡ष्प꣢तिर्दू꣣तं꣡ दे꣢व सप꣣र्य꣡ति꣢ । त꣡स्य꣢ स्म प्रावि꣣ता꣡ भ꣢व ॥८४५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (देव) स्वतः प्रकाशमान, सबके प्रकाशक, दानादि गुणों से युक्त, सर्वान्तर्यामी (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! (यः) जो (हविष्पतिः) हवियों का स्वामी अर्थात् अपनी हवि देकर तेरी उपासना करनेवाला मनुष्य (दूतम्) दुर्गुण, दुर्व्यसन, दुःख आदियों को दग्ध करनेवाले (त्वा) तुझ परमात्मा की (सपर्यति) उपासना करता है, (तस्य) उस उपासक का तू (प्राविता) प्रकृष्ट रक्षक (भव स्म) हो जा ॥ द्वितीय—यज्ञ के पक्ष में। हे (देव) प्रकाशमान, प्रकाशक गतिमय ज्वालाओंवाले यज्ञाग्नि ! (यः) जो (हविष्पतिः) होम के योग्य सुगन्धित, मधुर, पुष्टिप्रद तथा आरोग्यप्रद द्रव्यों का स्वामी याज्ञिक जन (दूतम्) रोग, आलस्य आदियों को दग्ध करनेवाले (त्वा) तेरी (सपर्यति) यज्ञानुष्ठान द्वारा सेवा करता है, (तस्य) उस याज्ञिक मनुष्य का तू (प्राविता) प्रकृष्ट रक्षक (भव स्म) हो जा ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे उपासना किया गया परमेश्वर उपासक के दुर्गुण आदि को दग्ध करके उसे सन्मार्ग पर चलाकर उसकी रक्षा करता है, वैसे ही आरोग्य आदि करनेवाले द्रव्यों से होम किया गया यज्ञाग्नि यजमान को आरोग्य आदि प्राप्त कराकर उसका बहुत उपकार करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
यो꣢ अ꣣ग्निं꣢ दे꣣व꣡वी꣣तये ह꣣वि꣡ष्मा꣢ꣳ आ꣣वि꣡वा꣢सति । त꣡स्मै꣢ पावक मृडय ॥८४६॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (यः) जो (हविष्मान्) आत्मसमर्पणवाला उपासक (देववीतये) दिव्य गुण-कर्मों की प्राप्ति के लिए (अग्निम्) सब सुख प्राप्त करानेवाले तुझ परमात्मा को (आ विवासति) पूजता है, (तस्मै) उस उपासक को, हे (पावक) पवित्रतादायक परमात्मन् ! आप (मृडय) सुखी कीजिए ॥ द्वितीय—यज्ञ के पक्ष में। (यः) जो (हविष्मान्) उत्तम होम के द्रव्यों से युक्त याज्ञिक मनुष्य (देववीतये) तेज की प्राप्ति के लिए अथवा दिव्य सुख के सम्पादनार्थ (अग्निम्) तुझ यज्ञाग्नि का (आ विवासति) होम से सत्कार करता है (तस्मै) उसे, हे (पावक) वायुशुद्धि तथा हृदयशुद्धि करनेवाले यज्ञाग्नि ! तू (मृडय) आरोग्य आदि प्राप्त कराने के द्वारा सुखी कर, अर्थात् यज्ञाग्नि सुखी करे ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे श्रद्धा के साथ आत्मसमर्पणपूर्वक उपासना किया गया परमेश्वर दिव्य गुण-कर्मों को प्रेरित करता है, वैसे ही उत्तमोत्तम हव्य-द्रव्यों से होम किया हुआ यज्ञाग्नि आरोग्य प्रदान से तथा हृदय में तेज, शूरता आदि दिव्य गुणों की प्रदीप्ति से सुखी करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
मि꣣त्र꣡ꣳ हु꣢वे पू꣣त꣡द꣢क्षं꣣ व꣡रु꣢णं च रि꣣शा꣡द꣢सम् । धि꣡यं꣢ घृ꣣ता꣢ची꣣ꣳ सा꣡ध꣢न्ता ॥८४७॥
पदार्थःमैं (पूतदक्षम्) पवित्र बल को देनेवाले (मित्रम्) सबके मित्र ब्राह्मण को और (रिशादसम्) हिंसक शत्रुओं को नष्ट करनेवाले (वरुणं च) शत्रुनिवारक क्षत्रिय को (हुवे) पुकारता हूँ। वे दोनों (घृताचीम्) राष्ट्र को तेज प्राप्त करानेवाली (धियम्) ज्ञानशृङ्खला एवं कर्मशृङ्खला को (साधन्तौ) सिद्ध करनेवाले होते हैं ॥१॥
भावार्थःराष्ट्र में ब्राह्मण पवित्र ज्ञान-विज्ञान के बल को बढ़ाते हैं और क्षत्रिय शत्रुओं से राष्ट्र की रक्षा करते हैं, इसलिए उन्नति चाहनेवालों को दोनों का सदा सत्कार और पोषण करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
ऋ꣣ते꣡न꣢ मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्र꣡तुं꣢ बृ꣣ह꣡न्त꣢माशाथे ॥८४८॥
पदार्थःहे (ऋतस्पृशा) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म को प्राप्त करनेवाले, (ऋतावृधा) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म को बढ़ानेवाले (मित्रावरुणौ) ब्राह्मण-क्षत्रियो ! तुम दोनों (ऋतेन) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म से (बृहन्तम्) विशाल (क्रतुम्) राष्ट्रयज्ञ को (आशाथे) व्याप्त करते हो ॥२॥
भावार्थःब्राह्मण और क्षत्रिय लोग सत्य ज्ञान और सत्य कर्म को स्वयं ग्रहण करके तथा अन्यों को उसकी शिक्षा देकर राष्ट्र की उन्नतिरूप यज्ञ को करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
क꣣वी꣡ नो꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा तुविजा꣣ता꣡ उ꣢रु꣣क्ष꣡या꣢ । द꣡क्षं꣢ दधाते अ꣣प꣡स꣢म् ॥८४९॥
पदार्थः(कवी) क्रान्तद्रष्टा, बुद्धिमान् (तुविजाता) बहुत प्रसिद्ध, (उरुक्षया) विशाल निवास को देनेवाले (मित्रावरुणा) ब्राह्मण-क्षत्रिय (नः) हमारे (दक्षम्) बल को, तथा (अपसम्) कर्म को (दधाते) पुष्ट करते हैं ॥३॥
भावार्थःराष्ट्रवासियों का बल, कर्म और सुरक्षित निवास ब्रह्म-क्षत्र के समन्वय से ही भली-भाँति सिद्ध होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मरुत इन्द्रश्च| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रे꣢ण꣣ स꣡ꣳ हि दृक्ष꣢꣯से संजग्मा꣣नो꣡ अबि꣢꣯भ्युषा । म꣣न्दू꣡ स꣢मा꣣न꣡व꣢र्च्चसा ॥८५०॥
पदार्थःहे मरुतों के गण अर्थात् प्राण-गण ! तू (अबिभ्युषा) निर्भय (इन्द्रेण) जीवात्मा के साथ (संजग्मानः) सङ्गत होता हुआ (संदृक्षसे) दिखायी देता है। तुम दोनों अर्थात् प्राण-गण और जीवात्मा (मन्दू) आनन्द देनेवाले, तथा (समानवर्चसा) तुल्य तेजवाले हो ॥१॥
भावार्थःशरीर में जीवात्मा और प्राण दोनों का समान महत्त्व है। प्राण के बिना जीवात्मा और जीवात्मा के बिना प्राण कुछ नहीं कर सकता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मरुतः| स्वर - षड्जः
आ꣡दह꣢꣯ स्व꣣धा꣢꣫मनु꣣ पु꣡न꣢र्गर्भ꣣त्व꣡मे꣢रि꣣रे꣢ । द꣡धा꣢ना꣣ ना꣡म꣢ य꣣ज्ञि꣡य꣢म् ॥८५१॥
पदार्थः(आत् अह) देहत्याग के अनन्तर सूक्ष्म शरीर में समाविष्ट ये प्राण पूर्वजन्मकृत कर्मों के संस्कारों के अनुसार (स्वधाम् अनु) भोग को लक्ष्य करके, जीवात्मासहित (यज्ञियम्) देहयज्ञ के सञ्चालन-योग्य (नाम) कर्म को (दधानाः) धारण करते हुए (पुनः) पूर्वजन्म के समान फिर भी (गर्भत्वम्) माता के गर्भ में स्थिति को (एरिरे) प्राप्त करते हैं ॥२॥
भावार्थःपाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच सूक्ष्मभूत, मन और बुद्धि यह सत्रह लिङ्गोंवाला सूक्ष्मशरीर जीवात्मा के साथ मृत्यु के बाद भी रहता है। पूर्वजन्म के कर्मों के संस्कारानुसार फल भोगने के लिए सूक्ष्मशरीर के साथ जीवात्मा पुनर्जन्म ग्रहण करने के लिए माता के गर्भ में प्रवेश करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मरुत इन्द्रश्च| स्वर - षड्जः
वी꣣डु꣡ चि꣢दारुज꣣त्नुभि꣣र्गु꣡हा꣢ चिदिन्द्र꣣ व꣡ह्नि꣢भिः । अ꣡वि꣢न्द उ꣣स्रि꣢या꣣ अ꣡नु꣢ ॥८५२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन् ! तू (वीडु चित्) दृढ़ भी व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि विघ्नों को (आरुजद्भिः) चारों ओर से तोड़ते हुए (वह्निभिः) वाहक प्राणों के सहयोग से (गुहा चित्) गुफा में भी विद्यमान अर्थात् विघ्नों से निगूढ़ हुई भी (उस्रियाः) परमात्मा के पास से आती हुई तेज की किरणों को (अनु अविन्दः) एक-एक करके प्राप्त कर लेता है ॥३॥
भावार्थःजैसे सूर्य किरणों को बादल ढक लेता है, वैसे ही परमात्मारूप सूर्य के पास से आती हुई तेज की किरणों को योगमार्ग में उपस्थित विघ्न ढक लेते हैं। प्राणायाम की सहायता से वे विघ्न परास्त किये जा सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
ता꣡ हु꣢वे꣣ य꣡यो꣢रि꣣दं꣢ प꣣प्ने꣡ विश्वं꣢꣯ पु꣣रा꣢ कृ꣣त꣢म् । इ꣣न्द्राग्नी꣡ न म꣢꣯र्धतः ॥८५३॥
पदार्थःमैं (ता) उन इन्द्र और अग्नि अर्थात् परमात्मा और जीवात्मा को (हुवे) बुलाता हूँ, (ययोः) जिनका (इदम्) यह सामने दिखाई देनेवाला (पुरा) पहले का (कृतम्) किया हुआ (विश्वम्) समस्त कार्य (पप्ने) सबके द्वारा स्तुति पाता है। (इन्द्राग्नी) उपासना किया हुआ परमात्मा और उद्बोधन दिया हुआ जीवात्मा दोनों (न मर्धतः) कभी हानि नहीं पहुँचाते, प्रत्युत सदा लाभकारी होते हैं ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा ने जो ब्रह्माण्ड रचा है और जीवात्मा देह धारण करके जिन महान् कार्यों को अपने बुद्धिकौशल से करता है, उनसे उन दोनों का महान् गौरव प्रकट होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
उ꣣ग्रा꣡ वि꣢घ꣣नि꣢ना꣣ मृ꣡ध꣢ इन्द्रा꣣ग्नी꣡ ह꣢वामहे । ता꣡ नो꣢ मृडात ई꣣दृ꣡शे꣢ ॥८५४॥
पदार्थः(मृधः) हिंसक काम, क्रोध आदि शत्रुओं के (विघनिना) विनाशक, (उग्रा) उग्र बलवाले (इन्द्राग्नी) परमात्मा और जीवात्मा को, हम (हवामहे) पुकारते हैं। (ता) वे दोनों (ईदृशे) ऐसे विकट देवासुरसंग्राम के उपस्थित होने पर (नः) हमें (मृडातः) सुखी करें ॥२॥
भावार्थःसबको चाहिए कि परमात्मा की उपासना करके और जीवात्मा को उद्बोधन देकर सब विघ्नों तथा सब शत्रुओं को पराजित करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
ह꣣थो꣢ वृ꣣त्रा꣡ण्यार्या꣢꣯ ह꣣थो꣡ दासा꣢꣯नि सत्पती । ह꣣थो꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥८५५॥
पदार्थःहे (सत्पती) श्रेष्ठों के पालनकर्ता परमात्मा और जीवात्मा ! (आर्या) श्रेष्ठ तुम दोनों (वृत्राणि) पापों को (हथः) विनष्ट करते हो, (दासानि) क्षय करनेवाले काम, क्रोध आदियों को (हथः) विनष्ट करते हो और (विश्वाः) सब (द्विषः) द्वेष-वृत्तियों को (अप हथः) मार भगाते हो ॥३॥ यहाँ ‘हथो’ की तीन बार आवृत्ति में लाटानुप्रास है। पुनः-पुनः ‘हथः’ कहने से यह द्योतित होता है कि इसी प्रकार अन्य भी दुर्गुण, दुर्व्यसन, दुःख आदियों को तुम विनष्ट करते हो ॥३॥
भावार्थःहमें चाहिए कि परमात्मा और जीवात्मा की सहायता से पाप आदियों को नष्ट करके द्वेषवृत्तियों को समाप्त करके आपस में सौहार्द से वर्तें ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा और यज्ञ, ब्रह्म और क्षत्र, जीवात्मा और प्राण, जीवात्मा के पुनर्जन्म, प्राणायाम, परमात्मा और जीवात्मा के सम्बन्ध आदि का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चतुर्थ अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
अ꣣भि꣡ सोमा꣢꣯स आ꣣य꣢वः꣣ प꣡व꣢न्ते꣣ म꣢द्यं꣣ म꣡द꣢म् । स꣣मु꣡द्रस्याधि꣢꣯ वि꣣ष्ट꣡पे꣢ मनी꣣षि꣡णो꣢ मत्स꣣रा꣡सो꣢ मद꣣च्यु꣡तः꣢ ॥८५६॥
पदार्थः(आयवः) क्रियाशील, (मनीषिणः) मननशील, (मत्सरासः) उत्साह का सञ्चार करनेवाले, (मदच्युतः) हर्ष की वर्षा करनेवाले (सोमासः) विद्यारस से परिपूर्ण गुरुजन (समुद्रस्य) ज्ञानसागर के (विष्टपे अधि) लोक में अर्थात् गुरुकुल में (मद्यम्) आनन्दजनक (मदम्) तृप्तिप्रद ज्ञानरस को (अभि पवन्ते) शिष्यों के प्रति प्रवाहित करते हैं ॥१॥
भावार्थःविद्यार्थी जन सुयोग्य गुरुओं के पास से अमृतवर्षी ज्ञानरस को पाकर, स्नातक होकर अन्यों को वह तृप्तिप्रद ज्ञानरस पिलाया करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
त꣡र꣢त्समु꣣द्रं꣡ पव꣢꣯मान ऊ꣣र्मि꣢णा꣣ रा꣡जा꣢ दे꣣व꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् । अ꣡र्षा꣢ मि꣣त्र꣢स्य꣣ व꣡रु꣢णस्य꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ प्र꣡ हि꣢न्वा꣣न꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥८५७॥
पदार्थःशिष्य (राजा) तेज से दीप्त तथा (देवः) विद्वान् होता हुआ (बृहत् ऋतम्) महान् सत्य ज्ञान, सत्य आचरण और सत्य ब्रह्मानन्द को (ऊर्मिणा) तरङ्गरूप में (पवमानः) अपने आत्मा में प्रवाहित करता हुआ (समुद्रम्) ब्रह्मचर्याश्रमरूप समुद्र को (तरत्) तैर जाता है, अर्थात् स्नातक बन जाता है। आगे प्रत्यक्षरूप से वर्णन है—हे विद्वान् स्नातक ! तू (मित्रस्य) मैत्री के निर्वाहक तथा (वरुणस्य) शिष्य रूप में तुझे वरनेवाले आचार्य के (धर्मणा) उपदिष्ट धर्म के अनुसार, जनसमाज में (बृहत्) महान् सत्यज्ञान, सत्य आचरण और सत्य ब्रह्मानन्द को (हिन्वानः) प्रेरित करता हुआ (अर्ष) गति कर, व्यवहार कर ॥२॥ अथर्ववेद में स्नातक का वर्णन इस रूप में किया गया है—“ब्रह्मचारी देदीप्यमान ज्ञान को अपने अन्दर धारण करता है। उसके अन्दर सब दिव्य गुण समाविष्ट हो जाते हैं। हे ब्रह्मचारी, तू प्राण, अपान, व्यान, वाणी, मन, हृदय, ब्रह्म, मेधा इन सबकी शक्ति को अपने अन्दर उत्पन्न करता हुआ हमें भी चक्षु, श्रोत्र, यश, अन्न, रेतस्, रक्त एवं पाचनशक्ति प्रदान कर। इन सब शक्तियों को ब्रह्मचारी ज्ञानसलिल के पृष्ठ ब्रह्मचर्याश्रमरूप समुद्र में तप करता हुआ प्राप्त करता है। वह जब स्नातक बनता है तब अन्यों का धारक-पोषक और पीतवेषधारी होकर पृथिवी पर बहुत चमकता है। (अथ० ११।५।२४-२६) ॥
भावार्थःस्नातकों को चाहिए कि गुरुओं से अध्ययन किये हुए सब लौकिक और आध्यात्मिक ज्ञान को समाज में फैलाएँ ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
नृ꣡भि꣢र्येमा꣣णो꣡ ह꣢र्य꣣तो꣡ वि꣢चक्ष꣣णो꣡ राजा꣢꣯ दे꣣वः꣡ स꣢मु꣣꣬द्र्यः꣢꣯ ॥८५८॥
पदार्थः(नृभिः) नेता गुरुजनों से (येमाणः) नियन्त्रण में रखा जाता हुआ, (हर्यतः) प्रिय, (राजा) तेज से देदीप्यमान, (समुद्र्यः) ब्रह्मचर्याश्रमरूप समुद्र में निवास करता हुआ ब्रह्मचारी (देवः) दिव्य गुणों से युक्त, और (विचक्षणः) विद्वान् हो जाता है ॥३॥
भावार्थःगुरुकुल में गुरुजनों के सान्निध्य में निवास करता हुआ ब्रह्मचारी विद्वान् और सदाचारी होकर स्नातक बनता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
ति꣣स्रो꣡ वाच꣢꣯ ईरयति꣣ प्र꣡ वह्नि꣢꣯रृ꣣त꣡स्य꣢ धी꣣तिं꣡ ब्रह्म꣢꣯णो मनी꣣षा꣢म् । गा꣡वो꣢ यन्ति꣣ गो꣡प꣢तिं पृ꣣च्छ꣡मा꣢नाः꣣ सो꣡मं꣢ यन्ति म꣣त꣡यो꣢ वावशा꣣नाः꣢ ॥८५९॥
पदार्थः(वह्निः) काव्य का वाहक महाकवि (तिस्रः) गद्य, पद्य एवं उभयात्मक अथवा अभिधात्मक, लक्षणात्मक एवं व्यञ्जनात्मक, (वाचः) वाणियों को (प्र ईरयति) प्रयुक्त करता है। वह अपने काव्य में (ऋतस्य) सत्य के (धीतिम्) धारण को और (ब्रह्मणः) परमात्मा की (मनीषाम्) स्तुति को भी प्रयुक्त करता है। (गावः) वाणियाँ (गोपतिम्) उस वागीश्वर महाकवि के विषय में (पृच्छमानाः) पूछती हुई (यन्ति) जा रही हैं—कहाँ है वह महाकवि जो अपने काव्य में प्रयुक्त करके हमें कृतार्थ करेगा, मानो यह पूछती हैं। (मतयः) स्तुतियाँ भी, मानो (सोमम्) उसी रससिद्ध कवि को (वावशानाः) चाहती हुई, खोजती हुई (यन्ति) जा रही हैं ॥१॥ यहाँ उत्तरार्ध में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःकोई विरले ही रससिद्ध कवि अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जनावाली गद्य, पद्य, उभय रूप वाणी को प्रयुक्त करते हुए सात्त्विक, शान्तरसमय ब्रह्मस्तोत्रों को रचकर अपनी वाणी को कृतकृत्य करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
सो꣢मं꣣ गा꣡वो꣢ धे꣣न꣡वो꣢ वावशा꣣नाः꣢꣫ सोमं꣣ वि꣡प्रा꣢ म꣣ति꣡भिः꣢ पृ꣣च्छ꣡मा꣢नाः । सो꣡मः꣢ सु꣣त꣡ ऋ꣢च्यते पू꣣य꣡मा꣢नः꣣ सो꣡मे꣢ अ꣣र्का꣢स्त्रि꣣ष्टु꣢भः꣣ सं꣡ न꣢वन्ते ॥८६०॥
पदार्थः(धेनवः) तृप्ति प्रदान करनेवाली (गावः) गौएँ या वाणियाँ (सोमम्) परमकवि परमात्मा की ही (वावशानाः) कामना करती हुई (यन्ति) जा रही हैं। (विप्राः) ज्ञानी लोग (मतिभिः) स्तोत्रों से (सोमम्) परमकवि परमात्मा को ही (पृच्छमानाः) पूछते हुए जा रहे हैं। (सुतः) ध्यान किया हुआ (सोमः) परमात्मा (पूयमानः) हृदय में प्रेरित होता हुआ (ऋच्यते) सहृदयों से स्तुति पाता है। (सोमे) उस परमात्मा में (त्रिष्टुभः) त्रिष्टुप् छन्दवाले अथवा तीन-तीन पादों से थमे हुए गायत्री छन्दवाले (अर्काः) मन्त्र (सं नवन्ते) सङ्गत हुए-हुए हैं, अर्थात् उसी का प्रतिपादन कर रहे हैं ॥२॥ इस मन्त्र के पूर्वार्द्ध में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजगत् में सब प्राणी और सब अचेतन पदार्थ अपने-अपने कर्म में लगे हुए मानो अपने रचयिता परमात्मा को ही खोज रहे हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
ए꣣वा꣡ नः꣢ सोम परिषि꣣च्य꣡मा꣢न꣣ आ꣡ प꣢वस्व पू꣣य꣡मा꣢नः स्व꣣स्ति꣢ । इ꣢न्द्र꣣मा꣡ वि꣢श बृह꣣ता꣡ मदे꣢꣯न व꣣र्ध꣢या꣣ वा꣡चं꣢ ज꣣न꣢या꣣ पु꣡र꣢न्धिम् ॥८६१॥
पदार्थःहे (सोम) परमकवि परमात्मा के काव्य से उत्पन्न काव्यानन्दरस ! (एव) सचमुच (परिषिच्यमानः) चारों ओर सींचा जाता हुआ, (पूयमानः) हमारे प्रति प्रेरित होता हुआ, तू (नः) हमारे लिए (स्वस्ति) कल्याण को (आ पवस्व) ला। (बृहता) महान् (मदेन) तृप्ति के साथ (इन्द्रम्) जीवात्मा में (आ विश) प्रवेश कर, (वाचम्) स्तुतिवाणी को (वर्धय) बढ़ा और स्तोता को (पुरन्धिम्) बहुत बुद्धिमान् वा बहुत कर्मवान् (जनय) कर ॥३॥ यहाँ अनेक क्रियाओं का एक कर्त्ता कारक से योग होने के कारण दीपक अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःहृदय में सींचा जाता हुआ महाकवि परमात्मा का काव्यानन्दरस सहृदय के हृदय को चमत्कृत करके उसे प्रभुगीतों का गायक, बहुत मेधावी, बहुत कर्मनिष्ठ, उत्साहवान्, सरस और दयालु बना देता है ॥३॥ इस खण्ड में गुरुजन, स्नातक, महाकविकर्म, परमकवि परमात्मा एवं उसके काव्यरस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चतुर्थ अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡द् द्याव꣢꣯ इन्द्र ते श꣣त꣢ꣳश꣣तं꣡ भूमी꣢꣯रु꣣त स्युः । न꣡ त्वा꣢ वज्रिन्त्स꣣ह꣢स्र꣣ꣳ सू꣢र्या꣣ अ꣢नु꣣ न꣢ जा꣣त꣡म꣢ष्ट꣣ रो꣡द꣢सी ॥८६२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) शूरवीर जीवात्मन् ! (यत्) यदि (ते) तेरे सम्मुख (द्यावः) द्युलोक (शतम्) संख्या में सौ (उत) और (भूमीः) भूमियाँ भी (शतम्) संख्या में सौ (स्युः) हो जाएँ और (सूर्याः) सूर्य (सहस्रम्) हजार हो जाएँ, तो भी हे (वज्रिन्) वज्रधारी के समान शत्रुओं का प्रतिरोध करने में समर्थ जीवात्मन् ! वे (त्वा) तेरी (न अनु) महिमा को नहीं पा सकते (न) न ही (रोदसी) धरती-आसमान के बीच (जातम्) उत्पन्न कोई भी वस्तु (अष्ट) तेरी महिमा को पा सकती है। [अन्यत्र जीवात्मा स्वयं अपनी महिमा उद्घोषित करता हुआ कहता है—“मैं इन्द्र हूँ, मैं कभी धन को हार नहीं सकता। मैं कभी मरता नहीं” (ऋ० १०।४८।५)] ॥१॥ यहाँ अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजो जीवात्मा अजर, अमर, और चेतन है, उसकी महिमा को सौ, हजार, लाख, करोड़ गुणा भी होकर ये जड़ सूर्य, पृथिवी आदि प्राप्त नहीं कर सकते ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ प꣢प्राथ महि꣣ना꣡ वृष्ण्या꣢꣯ वृष꣣न्वि꣡श्वा꣢ शविष्ठ꣣ श꣡व꣢सा । अ꣣स्मा꣡ꣳ अ꣢व मघव꣣न्गो꣡म꣢ति व्र꣣जे꣡ वज्रि꣢꣯ञ्चि꣣त्रा꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ ॥८६३॥
पदार्थः, (शविष्ठ) सबसे अधिक बली जगदीश्वर ! आपने (महिना) महिमा से और (शवसा) बल से (विश्वा) सब (वृष्ण्या) बलों को अर्थात् आत्मबल, विद्युद्बल, वायुबल, सूर्यबल आदि को (आ पप्राथ) फैलाया है। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् ! हे (वज्रिन्) वज्रधर के समान दण्डसामर्थ्ययुक्त ! आप (गोमति व्रजे) सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि लोक-लोकान्तरों से युक्त इस ब्रह्माण्ड में (चित्राभिः) अद्भुत (ऊतिभिः) रक्षाओं से (अस्मान्) हम उपासकों की (अव) रक्षा कीजिए ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। हे (वृषन्) शरीरस्थ मन, बुद्धि आदि में सबसे अधिक बली मेरे आत्मा ! तू (महिना) महिमा से और (शवसा) बल से (विश्वा) सब (वृष्ण्या) प्राण, मन, बुद्धि आदि के बलों को (आ पप्राथ) फैलाता है। हे (मघवन्) सद्गुणों के ऐश्वर्य से युक्त ! हे (वज्रिन्) वाणीरूप वज्रवाले ! तू (गोमति व्रजे) इन्द्रियरूप गौओं से युक्त शरीररूप गोशाला में (चित्राभिः) अद्भुत (ऊतिभिः) रक्षाओं से (अस्मान्) हमारा (अव) पालन कर ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है, ‘वृष्, वृष’ और 'शवि, शव’ में छेकानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःजैसे ब्रह्माण्ड में सब बलवान् पदार्थों में परमेश्वर से उत्पन्न किया हुआ बल है, वैसे ही शरीररूप पिण्ड में प्राण, मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदि में जीवात्मा से दिया हुआ सामर्थ्य है और जीवात्मा भी परमेश्वर से ही वैसा सामर्थ्य प्राप्त करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
व꣣यं꣡ घ꣢ त्वा सु꣣ता꣡व꣢न्त꣣ आ꣢पो꣣ न꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषः । प꣣वि꣡त्र꣢स्य प्र꣣स्र꣡व꣢णेषु वृत्रह꣣न्प꣡रि꣢ स्तो꣣ता꣡र꣢ आसते ॥८६४॥
पदार्थःपुत्रों को गुरुकुल में प्रविष्ट कराने के लिए उनके साथ आए हुए पितृजन आचार्य को कह रहे हैं—हे आचार्यप्रवर ! (वृक्तबर्हिषः) जिन्होंने अन्तरिक्ष को छोड़ दिया है, ऐसे (आपः न) बादल के जलों के समान (वृक्तबर्हिषः) घरों को छोड़कर आये हुए, (सुतवन्तः) पुत्रों सहित (वयम्) हम लोग (त्वा घ) आपको ही प्राप्त हुए हैं। हे (वृत्रहन्) दोषों को मारनेवाले श्रेष्ठ आचार्य ! (स्तोतारः) समित्पाणि होकर आपके पास आये हुए, आपके गुणों का गान करनेवाले शिष्यजन (पवित्रस्य) विशुद्ध ज्ञान और विशुद्ध आचरण के (प्रस्रवणेषु) प्रवाहों में (परि आसते) तैरा करते हैं। अतः हमारे पुत्रों का भी उपनयन संस्कार करके इन्हें विद्वान् बनाइये, यह भाव है ॥१॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है। कारणरूप उत्तरार्ध वाक्य से कार्यरूप पूर्वार्ध वाक्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास भी है ॥१॥
भावार्थःसब माता-पिताओं को चाहिए कि अपने बालकों वा बालिकाओं को आचार्य वा आचार्या के पास सौंपकर उन्हें विद्वान् और विदुषियाँ बनायें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
स्व꣡र꣢न्ति त्वा सु꣣ते꣢꣫ नरो꣣ व꣡सो꣢ निरे꣣क꣢ उ꣣क्थि꣡नः꣢ । क꣣दा꣢ सु꣣तं꣡ तृ꣢षा꣣ण꣢꣫ ओक꣣ आ꣡ ग꣢म꣣ इ꣡न्द्र꣢ स्व꣣ब्दी꣢व꣣ व꣡ꣳस꣢गः ॥८६५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (वसो) उपासकों के धनरूप तथा उनमें सद्गुणों का निवास करानेवाले परमात्मन् ! (उक्थिनः) स्तोता (नरः) मनुष्य (सुते) श्रद्धारस के (निरेके) उमड़ने पर (त्वा) आपको (स्वरन्ति) पुकार रहे हैं। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन्, दुर्गुणविदारक ! (कदा) कब (सुतम्) अभिषुत श्रद्धारस के (तृषाणः) प्यासे आप (ओकः) हृदय-सदन में (आगमः) आओगे, (इव) जैसे (वंसगः) सेवनीय गतिवाला, (स्वब्दी) उत्कृष्ट वृष्टि जलों का दाता सूर्य (तृषाणः) जल का प्यासा होता हुआ, किरणों द्वारा (ओकः) भूमिष्ठ समुद्ररूप घर पर आता है ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। गुरुकुल से बाहर गये हुए तथा आने में देर करते हुए आचार्य को शिष्यगण उत्सुकता से बुला रहे हैं—हे (वसो) शिष्यों में विद्या आदि का निवास करानेवाले आचार्य ! (उक्थिनः) वेदपाठी (नरः) ब्रह्मचारी लोग (सुते) विद्याध्ययन-सत्र के (निरेके) आ जाने पर (त्वा) आपको (स्वरन्ति) बुला रहे हैं। हे (इन्द्र) अविद्या एवं दुर्गुण आदि को विदीर्ण करनेवाले आचार्यवर ! (कदा) कब (तृषाणः) शिष्यों की कामना करनेवाले आप (ओकः) गुरुकुलरूप घर में (आगमः) आओगे, (इव) जैसे (वंसगः) संभजनीय गतिवाला (स्वब्दी) जल की वर्षा करनेवाला सूर्य [जल बरसाने के लिए] (ओकः) अन्तरिक्ष रूप घर में आता है ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे जल का प्यासा सूर्य किरणों से समुद्र के पास पहुँचता है, वैसे ही भक्तिरस का प्यासा परमेश्वर उपासकों के हृदय में जाता है और जैसे सूर्य अन्तरिक्ष में स्थित जल को भूमि पर बरसाता है, वैसे ही आचार्य विद्यारस को छात्रों पर बरसाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
क꣡ण्वे꣢भिर्धृष्ण꣣वा꣢ धृ꣣ष꣡द्वाजं꣢꣯ दर्षि सह꣣स्रि꣡ण꣢म् । पि꣣श꣡ङ्ग꣢रूपं मघवन्विचर्षणे म꣣क्षू꣡ गोम꣢꣯न्तमीमहे ॥८६६॥
पदार्थःहे (धृष्णो) अविद्या, दोष आदि को दूर करने के स्वभाववाले परमात्मन् वा आचार्य ! (कण्वेभिः) मेधावी विद्वानों के द्वारा (धृषन्) अविद्या, दीनता आदि को दूर करते हुए आप (सहस्रिणम्) संख्या में हजार (वाजम्) विद्या आदि धन को (आ दर्षि) प्रदान करते हो। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन्, (विचर्षणे) सर्वद्रष्टा परमात्मन् वा शास्त्रद्रष्टा आचार्य ! (पिशङ्गरूपम्) पीले रंगवाले वा तेजस्वी रूपवाले, (गोमन्तम) उत्तम वाणी, गाय, भूमि आदि से युक्त (वाजम्) सुवर्णरूप वा ब्रह्मचर्यरूप धन को, हम (मक्षु) शीघ्र ही (ईमहे) आपसे चाहते हैं ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा और गुरु सुयोग्य उपासकों और शिष्यों को सब सोना, मणि, मोती, गाय आदि तथा विद्या, ब्रह्मचर्य, सदाचार आदि विशाल ऐश्वर्य प्राप्त कराते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त꣣र꣢णि꣣रि꣡त्सि꣢षासति꣣ वा꣢जं꣣ पु꣡र꣢न्ध्या यु꣣जा꣢ । आ꣢ व꣣ इ꣡न्द्रं꣢ पुरुहू꣣तं꣡ न꣢मे गि꣣रा꣢ ने꣣मिं꣡ तष्टे꣢꣯व सु꣣द्रु꣡व꣢म् ॥८६७॥
पदार्थः(तरणिः इत्) आपत्ति में पड़े हुओं को दुःखों से तराने की इच्छावाला मनुष्य ही (युजा) सहायकभूत, (पुरन्ध्या) बहुतों का धारण करनेवाली सहानुभूतिपूर्ण बुद्धि से (वाजम्) धन (सिषासति) दूसरों को देना चाहता है। इसलिए मैं (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे जानेवाले (वः) तुम्हारे (इन्द्रम्) धनिक वर्ग को (गिरा) वाणी से, उपदेश के द्वारा (आनमे) झुकाता हूँ, अर्थात् गरीबों को धन देने के लिए प्रवृत्त करता हूँ, (तष्टा इव) जैसे शिल्पी (नेमिम्) रथ के पहिए की परिधि को (सुद्रुवम्) सुचारू रूप से घूमने योग्य बनाता है ॥१॥ यहाँ उपामलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि ईश्वरोपासना के साथ धनादि के दान द्वारा दीनों की सहायता भी करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
न꣡ दु꣢ष्टु꣣ति꣡र्द्र꣢विणो꣣दे꣡षु꣢ शस्यते꣣ न꣡ स्रेध꣢꣯न्तꣳ र꣣यि꣡र्न꣢शत् । सु꣣श꣢क्ति꣣रि꣡न्म꣢घव꣣न् तु꣢भ्यं꣣ मा꣡व꣢ते दे꣣ष्णं꣡ यत्पार्ये꣢꣯ दि꣣वि꣢ ॥८६८॥
पदार्थः(द्रविणोदेषु) धन का दान करनेवालों की (दुष्टुतिः) निन्दा (न शस्यते) नहीं कही जाती। (स्रेधन्तम्) धन, अन्न, वस्त्र आदि के दान द्वारा दीनों की सहायता न करके उन्हें चोट पहुँचानेवाले को (रयिः) धन (न नशत्) प्राप्त नहीं होता। हे (मघवन्) धनिक जन ! (पार्ये दिवि) पार करने योग्य जीवन-व्यवहार में (मावते) मुझ जैसे जन के लिए (यत्) जो (देष्णम्) दातव्य धन है, उसे पाने के लिए मैं (तुभ्यम्) आपके सम्मुख (सुशक्तिः इत्) सुपुरुषार्थी होता हुआ ही आता हूँ। अन्यथा पौरुषहीन मनुष्य की धनादि के दान से सदा सहायता कौन करता रहेगा? ॥२॥
भावार्थःदानवीरों का सर्वत्र कीर्तिगान होता है। निर्धनों को भी अपने पुरुषार्थ से धन कमाना चाहिए। सदा मांगते रहने से मनुष्य का स्वाभिमान नष्ट होता है ॥२॥ इस खण्ड में जीवात्मा, परमात्मा और आचार्य का विषय वर्णित होने से तथा धन के दानी की प्रशंसा होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ चतुर्थ अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ति꣣स्रो꣢꣫ वाच꣣ उ꣡दी꣢रते꣣ गा꣡वो꣢ मिमन्ति धे꣣न꣡वः꣢ । ह꣡रि꣢रेति꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥८६९॥
पदार्थःविद्यार्थी लोग (तिस्रः वाचः) ऋग्, यजुः, साम रूप तीन वेदवाणियों का (उदीरते) उच्चारण कर रहे हैं। (धेनवः) दूध, मक्खन आदि से तृप्ति देनेवाली (गावः) गाएँ (मिमन्ति) रंभा रही हैं। (हरिः) दोषों को हरनेवाले आचार्य (कनिक्रदत्) शास्त्रों का उपदेश करते हुए (एति) सञ्चार कर रहे हैं ॥१॥ इस मन्त्र में स्वभावोक्ति अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःसस्वर वेदपाठ, वेदार्थों के व्याख्यान, यज्ञार्थ घी देने के लिए तथा गोदुग्ध, दही, मक्खन आदि प्रदान करने के लिए गायें, और गुरुओं का उपदेश, यह गुरुकुलों का दृश्य अत्यन्त मनोहर होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ ब्रह्मी꣢꣯रनूषत य꣣ह्वी꣢रृ꣣त꣡स्य꣢ मा꣣त꣡रः꣢ । म꣣र्ज꣡य꣢न्ती꣣र्दिवः꣡ शिशु꣢꣯म् ॥८७०॥
पदार्थःप्रथम—वेदवाणी के पक्ष में। (यह्वीः) महत्त्वशालिनी, (ऋतस्य मातरः) सत्यज्ञान का निर्माण करनेवाली, (दिवः शिशुम्) तेजस्वी परमात्मा के पुत्र मानव को (मर्जयन्तीः) शुद्ध-पवित्र करती हुई (ब्रह्मीः) ब्रह्मा से प्रोक्त वेदवाणियाँ (अभि अनूषत) गुण-वर्णन द्वारा सब पदार्थों की स्तुति करती हैं ॥ द्वितीय—चन्द्र के पक्ष में। (यह्वीः) महान् (ऋतस्य मातरः) वृष्टि-जल का निर्माण करनेवाली, (मर्जयन्तीः) अपने प्रकाश द्वारा सबका शोधन करनेवाली या सबको अलङ्कृत करनेवाली (ब्रह्मीः) महान् सूर्य की कान्तियाँ (दिवः शिशुम्) आकाश के शिशु के समान विद्यमान चन्द्रमा को (अभि) लक्ष्य करके अर्थात् उसे प्रकाशित करने के लिए (अनूषत) जाती हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। द्वितीय व्याख्या में चन्द्रमा को ‘आकाश का शिशु’ कहने में लुप्तोपमा है ॥२॥
भावार्थःजैसे माताएँ शिशु को प्राप्त होती हैं, वैसे ही वेदवाणियाँ गुणवर्णन द्वारा सब पदार्थों को प्राप्त होती हैं और सूर्यकिरणें चन्द्रमा को प्रकाशित करने के लिए उसे प्राप्त होती हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
रा꣣यः꣡ स꣢मु꣣द्रा꣢ꣳश्च꣣तु꣢रो꣣ऽस्म꣡भ्य꣢ꣳ सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡णः꣢ ॥८७१॥
पदार्थःहे (सोम) विद्या आदि की हमारे अन्दर प्रेरणा करनेवाले, पवित्रकर्त्ता परमात्मन् वा आचार्य आप (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (विश्वतः) सब ओर से (रायः) ऐश्वर्य के (सहस्रिणः) सहस्र फल प्रदान करनेवाले (चतुरः) चार (समुद्रान्) समुद्रों को अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को (आ पवस्व) प्रवाहित कर दीजिए ॥३॥ यहाँ धर्म-अर्थ-कम-मोक्ष को धन के समुद्र कहने से उनका समुद्र के समान अगाध तथा परोपकारी होना द्योतित होता है ॥३॥
भावार्थःदयानिधि ईश्वर की और गुरु की कृपा से अध्ययन-अध्यापन, यम-नियम, प्राणायाम, ब्रह्मचर्य, जप, उपासना आदि कर्म से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की शीघ्र ही सिद्धि हमें प्राप्त होवे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
सु꣣ता꣢सो꣣ म꣡धु꣢मत्तमाः꣣ सो꣢मा꣣ इ꣡न्द्रा꣢य म꣣न्दि꣡नः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢वन्तो अक्षरं दे꣣वा꣡न्ग꣢च्छन्तु वो꣣ म꣡दाः꣢ ॥८७२॥
पदार्थः(मधुमत्तमाः) अतिशय मधुर, (मन्दिनः) आनन्दजनक (सोमाः) ज्ञान-रस (इन्द्राय) शिष्य के जीवात्मा के लिए (सुतासः) आचार्य द्वारा अभिषुत किये गये हैं। (पवित्रवन्तः) पवित्र मन से सम्बद्ध वे (अक्षरन्) आत्मा में क्षरित हो रहे हैं। हे शिष्यो ! (वः मदाः) तुम्हें आनन्दित करनेवाले वे ज्ञान-रस (देवान्) दिव्य गुणोंवाले दूसरे लोगों को भी (गच्छन्तु) प्राप्त हों ॥१॥
भावार्थःसुयोग्य गुरुओं से मधुर पद्धति द्वारा पढ़ाये गये शिष्य ज्ञानी स्नातक होकर, बाहर जाकर अन्य जनों को भी विद्यादान करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
इ꣢न्दु꣣रि꣡न्द्रा꣢य पवत꣣ इ꣡ति꣢ दे꣣वा꣡सो꣢ अब्रुवन् । वा꣣च꣡स्पति꣢꣯र्मखस्यते꣣ वि꣢श्व꣣स्ये꣡शा꣢न꣣ ओ꣡ज꣢सः ॥८७३॥
पदार्थः(इन्दुः) ज्ञानरस वा ब्रह्मानन्द-रस (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (पवते) क्षरित होता है (इति) यह (देवाः) विद्वान लोग (अब्रुवन्) कहते हैं। (वाचः पतिः) वाणी का स्वामी परमेश्वर वा आचार्य (मखस्यते) आनन्दप्रदान-यज्ञ वा अध्यापन-यज्ञ करता है, जो (विश्वस्य ओजसः) सब ब्रह्मबल वा ज्ञानबल का (ईशानः) अधीश्वर है। अतः उसके पास से सबको ब्रह्मबल और ज्ञानबल प्राप्त करना योग्य है, यह आशय है ॥२॥
भावार्थःआत्मा ही ज्ञान को ग्रहण करनेवाला और सुख को भोगनेवाला है, यह विद्वानों का अनुभव है। परमेश्वर के पास से ब्रह्मानन्द को और आचार्यों के पास से ज्ञान को जो ग्रहण करते हैं, उनका जीवन सफल होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
स꣣ह꣡स्र꣢धारः पवते समु꣣द्रो꣡ वा꣢चमीङ्ख꣣यः꣢ । सो꣢म꣣स्प꣡ती꣢ रयी꣣णा꣡ꣳ सखेन्द्र꣢꣯स्य दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥८७४॥
पदार्थः(समुद्रः) आनन्द वा ज्ञान का समुद्र, (वाचमीङ्खयः) वाणी को प्रेरित करनेवाला, (रयीणां पतिः) श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाव रूप धनों का स्वामी, (इन्द्रस्य सखा) जीवात्मा का सखा (सोमः) परमात्मा वा आचार्य (दिवे दिवे) प्रतिदिन (सहस्रधारः) हजारों धाराओं से उमड़ता हुआ (पवते) उपासकों वा शिष्यों के प्रति आनन्दरस वा ज्ञानरस को प्रवाहित करता है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर श्रेष्ठ उपासकों को प्राप्त होकर उनके प्रति मधुर आनन्दरस को और आचार्य श्रेष्ठ शिष्यों को प्राप्त होकर उनके प्रति मधुर ज्ञानरस को प्रवाहित करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
प꣣वि꣡त्रं꣢ ते꣣ वि꣡त꣢तं ब्रह्मणस्पते प्र꣣भु꣡र्गात्रा꣢꣯णि꣣ प꣡र्ये꣢षि वि꣣श्व꣡तः꣢ । अ꣡त꣢प्ततनू꣣र्न꣢꣫ तदा꣣मो꣡ अ꣢श्नुते शृ꣣ता꣢स꣣ इ꣡द्वह꣢꣯न्तः꣣ सं꣡ तदा꣢꣯शत ॥८७५॥
पदार्थःहे (ब्रह्मणः पते) ब्रह्माण्ड के अधिपति परमात्मन् अथवा ज्ञान के अधिपति आचार्य ! (ते) आपका (पवित्रम्) पवित्र आनन्दतत्त्व या ज्ञानतत्त्व (विततम्) आप में फैला हुआ है। (प्रभुः) आनन्द के देने वा ज्ञान के देने में समर्थ आप (विश्वतः) सब ओर से (गात्राणि) शरीरों अर्थात् शरीरधारियों को उसे देने के लिए (पर्येषि) प्राप्त होते हो। किन्तु (अतप्ततनूः) जिसने शरीर को तपाया नहीं है, अर्थात् जिसने तपस्या नहीं की, ऐसा (आमः) कच्चा मनुष्य (तत्) उस आनन्दतत्त्व या ज्ञानतत्त्व को (न अश्नुते) नहीं प्राप्त करता है। (शृतासः इत्) पके हुए लोग ही (वहन्तः) उद्योगी होते हुए (तत्) उस आनन्दतत्त्व या ज्ञानतत्त्व को (सम् आशत) भली-भाँति प्राप्त करने में समर्थ होते हैं ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के पास से आनन्दरस को और आचार्य के पास से ज्ञानरस को तपस्वी मनुष्य ही प्राप्त करने योग्य होते हैं, विलासी लोग नहीं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
त꣡पो꣢ष्प꣣वि꣢त्रं꣣ वि꣡त꣢तं दि꣣व꣢स्प꣣दे꣡ऽर्च꣢न्तो अस्य꣣ त꣡न्त꣢वो꣣꣬ व्य꣢꣯स्थिरन् । अ꣡व꣢न्त्यस्य पवि꣣ता꣡र꣢मा꣣श꣡वो꣢ दि꣣वः꣢ पृ꣣ष्ठ꣡मधि꣢꣯ रोहन्ति꣣ ते꣡ज꣢सा ॥८७६॥
पदार्थः(तपोः) तेजस्वी सोम परमात्मा की कृति (पवित्रम्) पवित्रता का साधन सूर्य (दिवः पदे) द्युलोक में (विततम्) फैला हुआ है। (अस्य) इस सूर्य की (अर्चन्तः) दीप्त होती हुई (तन्तवः) किरणें (व्यस्थिरन्) विविध स्थानों में स्थित होती हैं। (अस्य) इस सूर्य की (आशवः) शीघ्रगामी किरणें (पवितारम्) शुद्धिकर्ता वायु की (अवन्ति) रक्षा करती हैं। इसी सूर्य के (तेजसा) ताप से, समुद्र के जल भाप बनकर (दिवः पृष्ठम्) आकाश के पृष्ठ पर (अधि रोहन्ति) चढ़ते हैं और मेघ के आकार को प्राप्त करते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा ने ही तेजोमय सूर्य रचा है, जिसकी किरणें पदार्थों का शोधन, समुद्रजलों को भाप बनाना, भाप को ऊपर ले जाना, बादल बनाना इत्यादि विविध कार्य करती हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣡रू꣢रुचदु꣣ष꣢सः꣣ पृ꣡श्नि꣢र꣣ग्रि꣢य उ꣣क्षा꣡ मि꣢मेति꣣ भु꣡व꣢नेषु वाज꣣युः꣢ । मा꣣यावि꣡नो꣢ ममिरे अस्य मा꣣य꣡या꣢ नृ꣣च꣡क्ष꣢सः पि꣣त꣢रो꣣ ग꣢र्भ꣣मा꣡ द꣢धुः ॥८७७॥
पदार्थःयह (अग्रियः) आगे जानेवाला (पृश्निः) सूर्यरूप पवमान सोम (उषसः) उषाओं को (अरूरुचत्) चमकाता है। यह (उक्षा) वर्षाजल से सींचनेवाला सूर्य (भुवनेषु) भूमण्डलों में (वाजयुः) दूसरों को अन्न देना चाहता हुआ (मिमेति) बादल के जल को नीचे फेंकता है। (अस्य) इस सूर्य के ही (मायया) कर्म से (मायाविनः) कर्मयुक्त होते हुए वायु, जल, बिजली आदि (ममिरे) पदार्थों का निर्माण करते हैं और इस सूर्य के ही कर्म से (नृचक्षसः) मनुष्यों को प्रकाश देनेवाली (पितरः) पालक किरणें (गर्भम् आदधुः) ओषधी आदियों में गर्भ स्थापित करती हैं ॥३॥
भावार्थःसौरमण्डल में उषा का प्रादुर्भाव, जल की वर्षा, बिजली चमकना, वायु का चलना, बीजों का अङ्कुरित होना आदि जो कुछ भी कर्म है, वह सब सूर्य के द्वारा ही किया जाता है। इस रूप में उसका महत्त्व जानकर उसका उपयोग शिल्प आदि में करना चाहिए। सूर्य में भी सब शक्ति परमात्मा की ही दी हुई है, इस कारण सूर्य का भी सूर्य परमात्मा है, यह भी जानना चाहिए ॥३॥ चतुर्थ अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
प्र꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठाय गायत ऋ꣣ता꣡व्ने꣢ बृह꣣ते꣢ शु꣣क्र꣡शो꣢चिषे । उ꣣पस्तुता꣡सो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥८७८॥
पदार्थःहे (उपस्तुतासः) प्रशंसित लोगो ! तुम (मंहिष्ठाय) अतिशय दानी, (ऋताव्ने) सत्यपरायण, (बृहते) महान्, (शुक्रशोचिषे) दीप्त तेजवाले (अग्नये) अग्रनायक आचार्य, राजा वा यज्ञाग्नि के लिए (प्र गायत) प्रकृष्ट रूप से महिमागान करो ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि धन, विद्या आदि के दाता, सत्यनिष्ठ, तेजस्वी महान् जन को ही आचार्यरूप में और राजारूप में चुनें और उन्हें उचित है कि वे बहुत लाभ देनेवाले, सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, प्रदीप्त ज्वालावाले यज्ञाग्नि में मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम किया करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ व꣢ꣳसते म꣣घ꣡वा꣢ वी꣣र꣢व꣣द्य꣢शः꣣ स꣡मि꣢द्धो द्यु꣣म्न्या꣡हु꣢तः । कु꣣वि꣡न्नो꣢ अस्य सुम꣣ति꣡र्भवी꣢꣯य꣣स्य꣢च्छा꣣ वा꣡जे꣢भिरा꣣ग꣡म꣢त् ॥८७९॥
पदार्थः(मघवा) ऐश्वर्यवान्, (समिद्धः) तेजस्वी (द्युम्नी) यशस्वी, (आहुतः) आत्मसमर्पण से, राजकर आदि के प्रदान से एवं हवि-प्रदान से आहुति दिया हुआ परमेश्वर, आचार्य, राजा वा यज्ञाग्नि (वीरवद् यशः) वीरपुत्रों या वीरभावों से युक्त कीर्ति को (आ वंसते) उपासकों, शिष्यों, प्रजाजनों वा यजमानों को प्रदान करता है। (अस्य) इस परमेश्वर, आचार्य, राजा वा यज्ञाग्नि की (भवीयसी) अतिशय होने योग्य (सुमतिः) अनुग्रहबुद्धि या अनुकूलता (नः अच्छ) हमारे प्रति (वाजेभिः) अन्नों, धनों, बलों वा विज्ञानों के साथ (कुवित्) बहुत अधिक (आगमत्) आये ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर की उपासना से, गुरु के प्रति श्रद्धा से, राजनियमों के पालन में और यज्ञाग्नि में हवि देने से यथायोग्य वीर सन्तान, वीरभाव, धन, अन्न, बल, आरोग्य, कीर्ति आदि की प्राप्ति करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
तं꣢ ते꣣ म꣡दं꣢ गृणीमसि꣣ वृ꣡ष꣢णं पृ꣣क्षु꣡ सा꣢स꣣हि꣢म् । उ꣣ लोककृत्नु꣡म꣢द्रिवो हरि꣣श्रि꣡य꣢म् ॥८८०॥
पदार्थःहे (अद्रिवः) किसी से विदारण न किये जा सकनेवाले तथा स्वयं दोषों और शुत्रओं का विदारण करनेवाले परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (ते) आपके (तम्) उस प्रसिद्ध (मदम्) आनन्दप्रद ज्ञान वा बल की हम (गृणीमसि) स्तुति करते हैं, जो ज्ञान वा बल (वृषणम्) सुख आदि की वर्षा करनेवाला, (पृक्षु) देवासुरसंग्रामों में (सासहिम्) अतिशय रूप से असुरों का पराभव करनेवाला, (उ) और (हरिश्रियम्) मनोहर शोभावाला है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के समान आचार्य और राजा का भी ज्ञान वा बल अत्यधिक विशाल, प्रजाओं और शिष्यों को सुख देनेवाला, विपत्तियों का विदारण करनेवाला, कीर्ति देनेवाला और उज्ज्वल होवे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
ये꣢न꣣ ज्यो꣡ती꣢ꣳष्या꣣य꣢वे꣣ म꣡न꣢वे च वि꣣वे꣡दि꣢थ । म꣣न्दानो꣢ अ꣣स्य꣢ ब꣣र्हि꣢षो꣣ वि꣡ रा꣢जसि ॥८८१॥
पदार्थःहे इन्द्र अर्थात् परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (येन) जिस आनन्द, ज्ञान वा बल से, आप (आयवे) कर्मयोगी, पुरुषार्थी (मनवे च) और मननशील जन के लिए (ज्योतींषि) अन्तःप्रकाशों एवं बाह्य प्रकाशों को (विवेदिथ) प्राप्त कराते हो, उस आनन्द, ज्ञान वा बल से (मन्दानः) आनन्दित होते हुए आप (अस्य (बर्हिषः) इस हृदयासन पर, कुशासन पर वा राजसिंहासन पर (वि राजसि) विशेष रूप से शोभित होते हो ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर आचार्य और राजा से आनन्द, ज्ञान वा बल प्राप्त करके सब लोग सुखी, विज्ञानवान्, बलवान्, पुरुषार्थी और मननशील होते हुए जीवन में सफल हों ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त꣢द꣢द्या꣡ चि꣢त्त उ꣣क्थि꣡नोऽनु꣢꣯ ष्टुवन्ति पू꣣र्व꣡था꣢ । वृ꣡ष꣢पत्नी꣣रपो꣡ ज꣢या दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥८८२॥
पदार्थःहे इन्द्र अर्थात् परमात्मन् आचार्य वा राजन् ! (पूर्वथा) पूर्वकाल के समान (अद्य) आज भी (उक्थिनः) स्तोताजन, शास्त्रों का अध्ययन करनेवाले शिष्यजन वा प्रशंसक प्रजाजन (ते) आपके (तत्) उस आनन्द-ज्ञान-बल-धन-प्रदान आदि के कर्म की (अनु स्तुवन्ति) अनुक्रम से स्तुति करते हैं। आप (दिवे दिवे) प्रतिदिन (वृषपत्नीः) वृष अर्थात् धर्म जिनका रक्षक है, ऐसे (अपः) कर्मों को (जय) वश में कीजिए व हमें प्राप्त कराइये, जैसे सूर्यरूप इन्द्र (वृषपत्नीः) बादल जिनका पति है, ऐसे (अपः) जलों को वश करता तथा बरसाता है ॥३॥ इस मन्त्र में श्लिष्ट व्यङ्ग्योपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर सबके हृदय में धर्म की प्ररेणा करता है, वैसे ही गुरुजनों को शिष्यों में और राजा को प्रजाजनों में धर्म की प्रेरणा सदा करनी चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
श्रु꣣धी꣡ हवं꣢꣯ तिर꣣श्च्या꣢꣫ इन्द्र꣣ य꣡स्त्वा꣢ सप꣣र्य꣡ति꣣ । सु꣣वी꣡र्य꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तो रा꣣य꣡स्पू꣢र्धि म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि ॥८८३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) दोष दूर करनेवाले परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (यः) जो मनुष्य (त्वा) आपको (सपर्यति) पूजता वा सत्कृत करता है, उस (तिरश्च्याः) पुरुषार्थी की (हवम्) पुकार को (श्रुधि) सुनो। (सुवीर्यस्य) उत्कृष्ट बल से युक्त (गोमतः) प्रशस्त गाय, वाणी आदि से युक्त (रायः) विद्या, धन-धान्य आदि ऐश्वर्य की (पूर्धि) पूर्ति करो। आप (महान्) महान् (असि) हो ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर अपने पूजक पुरुषार्थी जनों को सब ऐश्वर्यों से पूर्ण करता है, वैसे ही राजा प्रजाओं से पुरुषार्थ करवाकर उन्हें धन-धान्य आदि से पूर्ण करे और आचार्य पुरुषार्थी शिष्यों को अपरा विद्या, परा विद्या, आरोग्य, सदाचार आदियों से परिपूर्ण करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣡स्त꣢ इन्द्र꣣ न꣡वी꣢यसीं꣣ गि꣡रं꣢ म꣣न्द्रा꣡मजी꣢꣯जनत् । चि꣣कित्वि꣡न्म꣢नसं꣣ धि꣡यं꣢ प्र꣣त्ना꣢मृ꣣त꣡स्य꣢ पि꣣प्यु꣡षी꣢म् ॥८८४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (यः) जिस उपासक, शिष्य वा प्रजाजन ने (ते) आपके लिए (नवीयसीम्) अतिशय नवीन, (मन्द्राम्) आनन्दजनक (गिरम्) प्रार्थना की वाणी (अजीजनत्) उच्चारण की है और (चिकित्विन्मनसम्) मन को जागरूक करनेवाली, (प्रत्नाम्) श्रेष्ठ, (ऋतस्य पिप्युषीम्) सत्य को बढ़ानेवाली (धियम्) ध्यान-धारा वा बुद्धि को (अजीजनत्) तेरे प्रति प्रेरित किया है, उसके लिए (रायः) श्रेष्ठ गुण, श्रेष्ठ धन, श्रेष्ठ विद्या, श्रेष्ठ आचरण आदि ऐश्वर्य की (पूर्धि) पूर्ति कीजिए। [यहाँ ‘रायः पूर्धि’ यह वाक्य-पूर्ति के लिए पूर्व मन्त्र से यहां लाया गया है] ॥२॥
भावार्थःजो निश्छल मन, समर्पण-भावना और हृदयस्पर्शी शब्दों से परमात्मा, आचार्य वा राजा से याचना करता है, उसकी उत्तम गुण, उत्तम धर्म, उत्तम धन, उत्तम विद्या आदि की वृद्धि वे सदा करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
त꣡मु꣢ ष्टवाम꣣ यं꣢꣫ गिर꣣ इ꣡न्द्र꣢मु꣣क्था꣡नि꣢ वावृ꣣धुः꣢ । पु꣣रू꣡ण्य꣢स्य꣣ पौꣳस्या꣣ सि꣡षा꣢सन्तो वनामहे ॥८८५॥
पदार्थः(तम् उ) उसी (इन्द्रम्) परमात्मा, आचार्य वा राजा की, हम (स्तवाम) स्तुति करें, प्रशंसा करें, (यम्) जिसे (गिरः) वेदवाणियाँ और (उक्थ्यानि) स्तोत्र, स्वागत-वचन वा अभिनन्दन-वचन (वावृधुः) कीर्तिगान द्वारा बढ़ाते हैं। हम (अस्य) इस परमात्मा, आचार्य वा राजा के (पुरूणि) बहुत से (पौंस्या) बल, धन, विद्या, सद्गुण आदियों को (सिषासन्तः) अन्यों को देने की इच्छावाले होकर (वनामहे) माँगते हैं ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा, आचार्य वा राजा से जो धन, बल, विद्या आदि प्राप्त होता है, उसे स्वयं अकेले ही उपभोग नहीं करना चाहिए, किन्तु अन्यों को भी देना चाहिए, क्योंकि किसी को केवल अपनी उन्नति से ही सन्तोष करना उचित नहीं है, प्रत्युत सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए ॥३॥ इस खण्ड में अध्ययन, अध्यापन, ज्ञानरस, ब्रह्मानन्दरस, परमेश्वर, आचार्य, राजा आदि विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चतुर्थ अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ द्वितीय प्रपाठक में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
प्र꣢ त꣣ आ꣡श्वि꣢नीः पवमान धे꣣न꣡वो꣢ दि꣣व्या꣡ अ꣢सृग्र꣣न्प꣡य꣢सा꣣ ध꣡री꣢मणि । प्रा꣡न्तरि꣢꣯क्षा꣣त्स्था꣡वि꣢रीस्ते असृक्षत꣣ ये꣡ त्वा꣢ मृ꣣ज꣡न्त्यृ꣢षिषाण वे꣣ध꣡सः꣢ ॥८८६॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रकर्ता परमात्मन् ! (ते) आपकी (आश्विनीः) व्याप्त, (दिव्याः) आकाश में स्थित, (धेनवः) तृप्ति प्रदान करनेवाली मेघरूप गौएँ (पयसा) वर्षाजलरूप दूध से (धरीमणि) भूमि पर (प्र असृग्रन्) छूटकर आती हैं। वैसे ही, हे (ऋषिषाण) ऋषियों से सेवनीय परमेश ! (ये) जो (वेधसः) स्तुतियों के विधाता आपके उपासक (त्वा) आपको (मृजन्ति) स्तुतियों से अलङ्कृत करते हैं (ते) वे (अन्तरिक्षात्) हृदयाकाश से (स्थाविरीः) समृद्ध भक्तिधाराओं को (प्र असृक्षत) आपके प्रति प्रकृष्ट रूप से छोड़ते हैं ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर वर्षा-धाराओं को हमारे प्रति छोड़ता है, वैसे ही उसके प्रति हमें भक्ति-धाराएँ छोड़नी चाहिएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
उ꣣भय꣢तः꣣ प꣡व꣢मानस्य र꣣श्म꣡यो꣢ ध्रु꣣व꣡स्य꣢ स꣣तः꣡ परि꣢꣯ यन्ति के꣣त꣡वः꣢ । य꣡दी꣢ प꣣वि꣢त्रे꣣ अ꣡धि꣢ मृ꣣ज्य꣢ते꣣ ह꣡रिः꣢ स꣢त्ता꣣ नि꣡ योनौ꣢꣯ क꣣ल꣡शे꣢षु सीदति ॥८८७॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य के पक्ष में। (ध्रुवस्य सतः) आकाश में स्थिर रूप से विद्यमान (पवमानस्य) पवित्रकर्ता सूर्य की (केतवः) प्रकाशक (रश्मयः) किरणें (उभयतः) भूगोल के दोनों गोलार्धों में परियन्ति) पहुँचती हैं। (यदि) जब (हरिः) रसों को हरनेवाला किरण-समूह (पवित्रे अधि) अन्तरिक्ष में (मृज्यते) भेजा जाता है, तब (योनौ सत्ता) अन्तरिक्ष में स्थित वह (कलशेषु) मङ्गल, बुध, चन्द्रमा आदि ग्रहोपग्रह-रूप कलशों में (नि षीदति) पहुँचता है और पहुँचकर उन्हें प्रकाशित करता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (ध्रुवस्य सतः) स्थिर, अजर, अमर, सनातन (पवमानस्य) पवित्रकर्ता परमात्मा की (केतवः) प्रज्ञापक (रश्मयः) दिव्य प्रकाश-किरणें (उभयतः) प्रातः-सायं दोनों कालों में, संध्या-वन्दन के समय (परि यन्ति) उपासक को प्राप्त होती हैं। (यदि) जब (हरिः) दोषों का हर्ता परमात्मा (पवित्रे अधि) पवित्र हृदय के अन्दर (मृज्यते) भक्तिभावरूप अलङ्कारों से अलङ्कृत होता है, तब (योनौ सत्ता) हृदयरूप घर में स्थित वह (कलशेषु) अन्नमय, प्राणमय, मनोमय आदि कोशों में (निषीदति) स्थिति-लाभ करता है, और वहाँ स्थित होता हुआ आत्मा, मन, बुद्धि आदि सबको प्रभावित करता है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे सोमरस दशापवित्र नामक छन्नी के मार्ग से होता हुआ द्रोणकलशों में स्थित होता है और जैसे सूर्य-रश्मि अन्तरिक्ष-मार्ग से ग्रहोपग्रहों में स्थित होती है, वैसे ही परमेश्वर हृदय-मार्ग से देहस्थ पञ्च कोशों में स्थित होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
वि꣢श्वा꣣ धा꣡मा꣢नि विश्वचक्ष꣣ ऋ꣡भ्व꣢सः प्र꣣भो꣡ष्टे꣢ स꣣तः꣡ परि꣢꣯ यन्ति के꣣त꣡वः꣢ । व्या꣣नशी꣡ प꣢वसे सोम꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ प꣢ति꣣र्वि꣡श्व꣢स्य꣣ भु꣡व꣢नस्य राजसि ॥८८८॥
पदार्थःहे (विश्वचक्षः) विश्वद्रष्टा परमेश ! (ऋभ्वसः) सूर्यकिरणों को ग्रहोपग्रहों में फेंकनेवाले अथवा बुद्धिमान् उपासकों को अपनी शरण में लेनेवाले (प्रभोः सतः) समर्थ होते हुए (ते) आपकी (केतवः) प्रज्ञाएँ (विश्वा धामानि) सब लोकों में (परि यन्ति) पहुँचती हैं, अर्थात् सब लोकों में आपका बुद्धिकौशल दिखायी देता है। हे (सोम) पवित्रकर्ता परमात्मन् ! (व्यानशी) सर्वान्तर्यामी आप (धर्मणा) अपने धर्म अर्थात् गुण-कर्म-स्वभाव से (पवसे) सबको पवित्र करते हो। (विश्वस्य) सम्पूर्ण (भूमनः) ब्रह्माण्ड के (पतिः) अधीश्वर आप (राजसि) अत्यधिक शोभा पाते हो ॥३॥ श्लेष से इस मन्त्र की सूर्य के पक्ष में भी योजना करनी चाहिए ॥३॥
भावार्थःजैसे सूर्य की किरणें ग्रह-उपग्रह आदियों में दिखायी देती हैं, वैसे ही परमात्मा के बुद्धि-कौशल सर्वत्र दिखायी देते हैं। जैसे सूर्य सबको पवित्र करता है, वैसे ही परमेश्वर भी करता है। जैसे सूर्य सौर-लोक का अधिपति है, वैसे ही परमेश्वर समस्त ब्रह्माण्ड का अधिपति है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानो अजीजनद्दि꣣व꣢श्चि꣣त्रं꣡ न त꣢꣯न्य꣣तु꣢म् । ज्यो꣡ति꣢र्वैश्वान꣣रं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥८८९॥
पदार्थः(पवमानः) चरित्र को पवित्र करनेवाले परमात्मा वा आचार्य ने (दिवः) आकाशः की (चित्रम्) अद्भुत (तन्यतुं न) बिजली के समान (वैश्वानरम्) सबका नेतृत्व करनेवाली (बृहत्) महान् (ज्योतिः) विज्ञान-ज्योति को अथवा ज्योतिष्मती प्रज्ञा को (अजीजनत्) उत्पन्न कर दिया है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा और योगप्रशिक्षक आचार्य की कृपा से मनुष्यों के अन्तःकरणों में तमोवृत्ति का विनाश और दिव्य ज्योति, विज्ञान-प्रकाश तथा ज्योतिष्मती प्रज्ञा का उदय होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मान꣣ र꣢स꣣स्त꣢व꣣ म꣡दो꣢ राजन्नदुच्छु꣣नः꣢ । वि꣢꣫ वार꣣म꣡व्य꣢मर्षति ॥८९०॥
पदार्थःहे (पवमान) जीवन को पवित्र करनेवाले (राजन्) तेजस्वी परमात्मन् वा आचार्य ! जो (तव) आपका (अदुच्छुनः) दुर्गति तथा दुःख न उत्पन्न करनेवाला, (मदः) उत्साहकारी (रसः) आनन्दरस वा ज्ञानरस है, वह (अव्यम्) अविनश्वर, (वारम्) दोषनिवारक आत्मा को (वि अर्षति) विविध रूप में प्राप्त होता है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर वा आचार्य से प्रस्रुत आनन्दरस वा विज्ञानरस को प्राप्त करके मनुष्य का आत्मा कृतार्थ हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानस्य ते꣣ र꣢सो꣣ द꣢क्षो꣣ वि꣡ रा꣢जति द्यु꣣मा꣢न् । ज्यो꣢ति꣣र्वि꣢श्व꣣꣬ꣳ स्व꣢꣯र्दृ꣣शे꣢ ॥८९१॥
पदार्थःहे परमात्मन् वा आचार्य ! (पवमानस्य) चित्त की शुद्धि करनेवाले (ते) आपका (द्युमान्) दीप्तिमान् (रसः) आनन्दरस वा ज्ञानरस और (दक्षः) ब्रह्मबल (वि राजति) विशेष रूप से शोभित है। वह (स्वः दृशे) मोक्ष-सुख के दर्शनार्थ (विश्वं ज्योतिः) सम्पूर्ण अन्तर्दृष्टि को देता है ॥३॥
भावार्थःआचार्य की सेवा और परमात्मा की उपासना करके लोकविद्या, ब्रह्मविद्या, परम आह्लाद, ब्रह्मवर्चस और दिव्य दृष्टि प्राप्त करके मनुष्य मोक्ष पाने योग्य हो जाते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢꣫ यद्गावो꣣ न꣡ भूर्ण꣢꣯यस्त्वे꣣षा꣢ अ꣣या꣢सो꣣ अ꣡क्र꣢मुः । घ्न꣡न्तः꣢ कृ꣣ष्णा꣢꣫मप꣣ त्व꣡च꣢म् ॥८९२॥
पदार्थः(यत्) जब (गावः न) गायों से समान (भूर्णयः) भरण-पोषण करनेवाले, (त्वेषाः) उज्ज्वल, (अयासः) शिष्यों के प्रति जानेवाले ज्ञानरस (प्र अक्रमुः) प्रदान किये जाने आरम्भ होते हैं, तब वे (त्वचम्) ढकनेवाली (कृष्णाम्) अविद्या-रात्रि को (घ्नन्तः) नष्ट कर देते हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजब शिष्य विविध लौकिक विद्याओं और ब्रह्मविद्याओं को प्राप्त कर लेते हैं, तब सारी अविद्यारूप निशाएँ दूर हो जाती हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सु꣣वित꣡स्य꣢ वनाम꣣हे꣢ऽति꣣ से꣡तुं꣢ दुरा꣣꣬य्य꣢꣯म् । सा꣣ह्या꣢म꣣ द꣡स्यु꣢मव्र꣣तम् ॥८९३॥
पदार्थःहम (सेतुम्) रुकावट को (अति) अतिक्रान्त अर्थात् पार करके (सुवितस्य) सुप्राप्त आनन्द—रसागार परमात्मा के एवं विद्यारसागार आचार्य के (दुराय्यम्) दुष्प्राप्य आनन्दरस वा विद्यारस को (वनामहे) सेवन करते हैं। उससे हम (अव्रतम्) व्रतविरोधी वा सत्कर्मविरोधी (दस्युम्) उपक्षयकारी काम, क्रोध, आदि छहों रिपुओं को (साह्याम) पराजित कर देवें ॥२॥
भावार्थःगुरुओं के सत्कार से और परमात्मा की उपासना से विद्या और आनन्द को प्राप्त करके, बाह्य तथा आन्तरिक शत्रुओं को पराजित करके सत्कर्मों का आचरण करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
शृ꣣ण्वे꣢ वृ꣣ष्टे꣡रि꣢व स्व꣣नः꣡ पव꣢꣯मानस्य शु꣣ष्मि꣡णः꣢ । च꣡र꣢न्ति वि꣣द्यु꣡तो꣢ दि꣣वि꣢ ॥८९४॥
पदार्थः(शुष्मिणः) बलवान् (पवमानस्य) चित्तशुद्धिकर्ता परमात्मा वा आचार्य का (स्वनः) आनन्दप्रवाह वा ज्ञानप्रवाह का शब्द (वृष्टेः स्वनः इव) वर्षा के शब्द के समान है, उसे मैं (शृण्वे) सुन रहा हूँ। (दिवि) आकाश के समान मेरे आत्मा में (विद्युतः चरन्ति) बिजलियों के सदृश अध्यात्म-ज्योतियाँ विचर रही हैं ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे वर्षाकाल में शब्द के साथ बादल से जल-धाराएँ गिरती हैं और बिजलियाँ चमकती हैं, वैसे ही आचार्य के पास से ज्ञान का प्रवाह होने पर शब्द आचार्य के मुख से निकलते हैं और ज्ञान को ग्रहण करनेवाले जीवात्मा में ज्ञान की ज्योतियाँ चमकती हैं। उसी प्रकार परमात्मा के पास से आनन्दरस का प्रवाह होने पर भी कोई दिव्य वर्षा की रिमझिम सी सुनाई देती है और अलौकिक ज्योतियों का भी अनुभव होता है ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ प꣢वस्व म꣣ही꣢꣫मिषं꣣ गो꣡म꣢दिन्दो꣣ हि꣡र꣢ण्यवत् । अ꣡श्व꣢वत्सोम वी꣣र꣡व꣢त् ॥८९५॥
पदार्थःहे (इन्दो) दीप्तिमान्, ज्ञानरस से भिगोनेवाले (सोम) प्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! आप हमारे लिए (गोमत्) श्रेष्ठ गाय से युक्त वा श्रेष्ठ वाणी से युक्त, (हिरण्यवत्) सुर्वण से युक्त, ज्योति से युक्त वा यश से युक्त, (अश्ववत्) घोड़ों से युक्त वा प्राणों से युक्त, (वीरवत्) वीर पुत्रों से युक्त वा वीरभावों से युक्त, (महीम्) बड़ी (इषम्) इच्छासिद्धि को (आ पवस्व) प्राप्त कराइये ॥४॥
भावार्थःपरमात्मा और आचार्य की कृपा से विद्यावान् होकर हम सब प्रकार की लौकिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति प्राप्त करके सुखी होवें ॥४॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व विश्वचर्षण꣣ आ꣢ म꣣ही꣡ रोद꣢꣯सी पृण । उ꣣षाः꣢꣫ सूर्यो꣣ न꣢ र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥८९६॥
पदार्थःहे (विश्वचर्षणे) विश्व ब्रह्माण्ड के द्रष्टा परमात्मन् वा सब विद्याओं के द्रष्टा आचार्य ! आप पवस्व अन्तःप्रकाश एवं ज्ञानरस को प्रवाहित करो। उससे (मही रोदसी) महिमामय आत्मा और मन को (आपृण) पूर्ण कर दो, (न) जैसे (उषाः) उषा और (सूर्यः) सूर्य (रश्मिभिः) किरणों से (मही रोदसी) महान् द्यावापृथिवी को पूर्ण करते हैं ॥५॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे उषा और सूर्य के प्रकाश से द्यावापृथिवी भर जाते हैं, वैसी ही परमात्मा और आचार्य द्वारा दी गयी दिव्य अन्तर्ज्योति तथा ज्ञानज्योति से मनुष्य के आत्मा और मन परिपूर्ण होते हैं ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ णः शर्म꣣य꣢न्त्या꣣ धा꣡र꣢या सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । स꣡रा꣢ र꣣से꣡व꣢ वि꣣ष्ट꣡प꣢म् ॥८९७॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमात्मन् वा आचार्य ! आप (शर्मयन्त्या) सुख देनेवाली (धारया) अध्यात्मप्रकाश की धारा वा ज्ञान की धारा के साथ (विश्वतः) सब ओर से (नः) हमें (परि सर) प्राप्त हों। (रसा इव) जैसे रसीली वर्षा (विष्टपम्) भूलोक को प्राप्त होती है ॥६॥ यहाँ उपमालङ्कार है। ‘सरा, रसे’ में वृत्त्यनुप्रास है ॥६॥
भावार्थःजैसे बादल में से पर्वतों पर हुई वर्षा नदीरूप में भूमि के प्रदेशों को सींचती हुई समुद्र को प्राप्त होती है, वैसे ही परमात्मा वा आचार्य से निकली हुई अन्तःप्रकाश की धारा मन, बुद्धि आदियों को सींचती हुई जीवात्मा को प्राप्त होती है ॥६॥ इस खण्ड में परमेश्वर और उपासक, परमेश्वर और उसके रचे हुए सूर्य एवं परमात्मा और आचार्य का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पञ्चम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣣शु꣡र꣢र्ष बृहन्मते꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣ये꣢ण꣣ धा꣡म्ना꣢ । य꣡त्र꣢ दे꣣वा꣢꣫ इति꣣ ब्रु꣡व꣢न् ॥८९८॥
पदार्थःहे (बृहन्मते) महामति से युक्त एवं महामति को देनेवाले परमेश ! (यत्र देवाः) जहाँ दिव्यगुण रहते हैं, वहां मेरा निवास है (इति ब्रुवन्) यह कहते हुए आप (प्रियेण धाम्ना) अपने मधुर तेज के साथ (आशुः) शीघ्रकारी होते हुए (परि अर्ष) हमारे जीवन में चारों ओर व्याप्त हो जाएँ ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा प्राप्त करने के लिए अपने आत्मा में दिव्य गुणों को धारण करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣣रिष्कृण्व꣡न्ननि꣢꣯ष्कृतं꣣ ज꣡ना꣢य या꣣त꣢य꣣न्नि꣡षः꣢ । वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣वः꣡ परि꣢꣯ स्रव ॥८९९॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक रसागार परमेश्वर ! आप (अनिष्कृतम्) अपरिष्कृत हृदय को (परिष्कृण्वन्) परिष्कृत करते हुए और (जनाय) उपासक मनुष्य के लिए (इषः) आक्रमणकारी विघ्नों की (यातयन्) हिंसा करते हुए (दिवः) आनन्दमय कोश से (वृष्टिम्) आनन्दरस की वर्षा (परि स्रव) प्रवाहित कीजिए ॥२॥
भावार्थःजैसे बादल से वर्षा होने पर सूखी भूमि सरस हो जाती है, वैसे ही सबके आत्मा में स्थित परमात्मा के पास से आनन्दरस की वर्षा होने पर आत्मा, मन, बुद्धि आदि सब सरस और सप्राण हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣य꣢꣫ꣳ स यो दि꣣व꣡स्परि꣢꣯ रघु꣣या꣡मा प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣢ । सि꣡न्धो꣢रू꣣र्मा꣡ व्यक्ष꣢꣯रत् ॥९००॥
पदार्थः(अयम्) यह हमसे अनुभव किया जाता हुआ (सः) वह प्रसिद्ध ब्रह्मानन्दरस है, (यः) जो (रघुयामा) शीघ्र गतिवाला होता हुआ (दिवः परि) आनन्दमय परमेश्वर के पास से (पवित्रे आ) पवित्र हृदय में आकर (सिन्धोः ऊर्मौ) आत्मारूप समुद्र की तरङ्ग में (व्यक्षरत्) क्षरित हो रहा है ॥३॥
भावार्थःजैसे सोमौषधि का रस दशापवित्र नामक छन्नी से क्षरित होकर द्रोणकलश में गिरता है, अथवा जैसे चाँदनी का रस पवित्र अन्तरिक्ष से क्षरित होकर समुद्र में गिरता है, वैसे ही परमात्मा के पास से आया हुआ आनन्दरस पवित्र हृदय से क्षरित होकर अन्तरात्मा में आता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सु꣣त꣡ ए꣢ति प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣢꣫ त्विषिं꣣ द꣡धा꣢न꣣ ओ꣡ज꣢सा । वि꣣च꣡क्षा꣢णो विरो꣣च꣡य꣢न् ॥९०१॥
पदार्थः(सुतः) जिसने अपने में से आनन्दरस को प्रवाहित किया है, ऐसा यह सोमनामक परमात्मा (त्विषिम्) दीप्ति को (दधानः) धारण करता हुआ (ओजसा) बलपूर्वक (पवित्रे) पवित्र हृदय वा आत्मा में (आ एति) आ रहा है और (विचक्षाणः) विशेष रूप से अन्तर्दृष्टि को दे रहा है तथा (विरोचयन्) विशेष कान्ति को प्रदान कर रहा है ॥४॥
भावार्थःपरमात्मा के साथ मैत्री स्थापित करता हुआ उपासक अन्तर्दृष्टि तथा ब्रह्मतेज से युक्त होकर परमानन्दमय हो जाता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣣वि꣡वा꣢सन्परा꣣व꣢तो꣣ अ꣡थो꣢ अर्वा꣣व꣡तः꣢ सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢य सिच्यते꣣ म꣡धु꣢ ॥९०२॥
पदार्थःपवमान सोम अर्थात् चित्तशोधक परमेश्वर (सुतः) हृदय में प्रकट होकर (परावतः) पराविद्या के ज्ञानी (अथ उ) और (अर्वावतः) अपरा विद्या के ज्ञानी उपासकों को (आ विवासन्) सम्मानित करता है। उस परमेश्वर से झरा हुआ (मधु) मधुर आनन्दरस (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (सिच्यते) सींचा जाता है ॥५॥
भावार्थःजो अपने आपको मधुर ब्रह्मानन्द-रस से स्नान कराते हैं, वे निर्मल अन्तःकरणवाले उपासक सर्वथा क्लेशों से छूटकर परमगति मोक्ष को प्राप्त करते हैं ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣣मीचीना꣡ अ꣢नूषत꣣ ह꣡रि꣢ꣳ हिन्व꣣न्त्य꣡द्रि꣢भिः । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य पी꣣त꣡ये꣢ ॥९०३॥
पदार्थःजो उपासक लोग (समीचीनाः) परस्पर मिलकर (अनूषत) पवित्रकर्ता परमात्मा की स्तुति करते हैं और (हरिम्) अज्ञान, दुःख आदि को हरनेवाले उसे (अद्रिभिः) अखण्डित ध्यानों से (हिन्वन्ति) अपने अन्दर बढ़ाते हैं, वे (इन्दुम्) सराबोर करनेवाले ब्रह्मानन्द-रस को (इन्द्राय) अपने जीवात्मा को (पातवे) पिलाने में समर्थ होते हैं ॥६॥
भावार्थःमनुष्यों को योग्य है कि ध्यानयोग द्वारा परमात्मा की आराधना करके ब्रह्मानन्द को प्राप्त करें ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
हि꣣न्व꣢न्ति꣣ सू꣢र꣣मु꣡स्र꣢यः꣣ स्व꣡सारो जा꣣म꣢य꣣स्प꣡ति꣢म् । म꣣हा꣡मिन्दुं꣢꣯ मही꣣यु꣡वः꣢ ॥९०४॥
पदार्थः(सूरम्) सूर्य को (उस्रयः) किरणें (हिन्वन्ति) प्राप्त होती हैं, (स्वसारः) विवाहित (जामयः) बहिनें (पतिम्) अपने पति को (हिन्वन्ति) प्राप्त होती हैं। इसी प्रकार (महीयुवः) पूजा के इच्छुक उपासक (महाम्) महान्, (इन्दुम्) रस से सराबोर करनेवाले उपास्य परमात्मा को (हिन्वन्ति) प्राप्त होते हैं ॥१॥ यहाँ अप्रस्तुत किरणों (उस्रा) और बहिनों (जामयः) का तथा प्रस्तुत पूजेच्छुक उपासकों (महीयुवः) का ‘हिन्वन्ति’ रूप एक क्रिया से योग होने के कारण दीपक अलङ्कार है। साथ ही ‘स्वसारः’ और जामयः’ दोनों पदों के बहिन वाचक होने के कारण पुनरुक्ति प्रतीत होने से तथा व्याख्यात प्रकार से उसका परिहार हो जाने से पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार भी है। ‘सूर, सारो’ तथा ‘महा, मही’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःजो लोग परमात्मा को पाने के लिए सर्वभाव से तत्पर होते हैं, वे अन्त में उसे पा ही लेते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मान रु꣣चा꣡रु꣢चा꣣ दे꣡व꣢ दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सु꣣तः꣢ । वि꣢श्वा꣣ व꣢सू꣣न्या꣡ वि꣢श ॥९०५॥
पदार्थःहे (पवमान) चित्त को शुद्ध करनेवाले (देव) आनन्ददायक सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! (देवेभ्यः)प्रकाशक, ज्ञान के साधन मन, बुद्धि, आँख, कान, नासिका, त्वचा और जिह्वा के लिए अर्थात् उन्हें प्रकाशनशक्ति देने के लिए (सुतः) प्रवृत्त आप (रुचारुचा) अधिकाधिकप्रकाशन-शक्ति से (विश्वा वसूनि) उन सब निवासक मन, बुद्धि आदियों में (आ विश) प्रविष्ट होवो। भाव यह है कि आपके द्वारा दी गयी ज्ञान-प्रदान-शक्ति से पुनः-पुनः अनुप्राणित ये मन, बुद्धि आदि सदा ही ज्ञान अर्जन करने में जीवात्मा के साधन बने रहें ॥२॥
भावार्थःजैसे सूर्य के प्रकाश से सब ग्रहोपग्रह प्रकाशित होते हैं, वैसे ही परमेश्वर के द्वारा प्रकाशित मन, बुद्धि, चक्षु आदि ज्ञान के ग्राहक होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ प꣢वमान सुष्टु꣣तिं꣢ वृ꣣ष्टिं꣢ दे꣣वे꣢भ्यो꣣ दु꣡वः꣢ । इ꣣षे꣡ प꣢वस्व सं꣣य꣡त꣢म् ॥९०६॥
पदार्थःहे (पवमान) चित्तशोधक परमेश्वर ! आप (देवेभ्यः) हम प्रकाशयुक्त उपासकों के लिए (इषे) अभीष्टसिद्धि के अर्थ (सुष्टुतिम्) शुभ स्तुतियुक्त अर्थात् सुप्रशंसित (वृष्टिम्) आनन्दवर्षा को, (दुवः) सेवा की भावना को और (संयतम्) संयम की भावना को (आ पवस्व) प्राप्त कराइये ॥३॥
भावार्थःउपासकों को परमेश्वर की उपासना से परम आनन्द, दीनों की सेवा में रस और विषयों से मन तथा इन्द्रियों का निग्रह प्राप्त होता है ॥३॥ इस खण्ड में परमेश्वर का तथा उससे प्राप्त होनेवाले ब्रह्मानन्द का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पञ्चम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
ज꣡न꣢स्य गो꣣पा꣡ अ꣢जनिष्ट꣣ जा꣡गृ꣢विर꣣ग्निः꣢ सु꣣द꣡क्षः꣢ सुवि꣣ता꣢य꣣ न꣡व्य꣢से । घृ꣣त꣡प्र꣢तीको बृह꣣ता꣡ दि꣢वि꣣स्पृ꣡शा꣢ द्यु꣣म꣡द्वि भा꣢꣯ति भर꣣ते꣢भ्यः꣣ शु꣡चिः꣢ ॥९०७॥
पदार्थः(जागृविः) जागरूक परमेश्वर (जनस्य) सब मनुष्यों का (गोपाः) रक्षक (अजनिष्ट) बना हुआ है।(सुदक्षः) उत्तम बलवाला वह (अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (नव्यसे) अतिशय नवीन (सुविताय) भद्र-प्राप्ति के लिए सहायक होता है। (घृतप्रतीकः)तेजःस्वरूप, (शुचिः) पवित्र वह (भरतेभ्यः) धारणा, ध्यान, समाधि में स्थित जनों के लिए (दिविस्पृशा) आत्मा को छूनेवाले (बृहता) महान् तेज से (द्युमत्) दीप्यमान होता हुआ (वि भाति) शोभित होता है ॥१॥
भावार्थःतेजःस्वरूप परमेश्वर उपासकों का रक्षक होता हुआ उन्हें दिव्य तेज प्रदान करके कृतार्थ करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
त्वा꣡म꣢ग्ने꣣ अ꣡ङ्गि꣢रसो꣣ गु꣡हा꣢ हि꣣त꣡मन्व꣢꣯विन्दञ्छिश्रिया꣣णं꣡ वने꣢꣯वने । स꣡ जा꣢यसे म꣣थ्य꣡मा꣢नः꣣ स꣡हो꣢ म꣣ह꣡त्त्वामा꣢꣯हुः꣣ स꣡ह꣢सस्पु꣣त्र꣡म꣢ङ्गिरः ॥९०८॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमेश्वर ! (गुहा हितम्) गुहा में निहित अर्थात् गुह्य, (वने वने) प्रत्येक किरण में वा प्रत्येक जीव में (शिश्रियाणम्) विद्यमान (त्वाम्) आपको (अङ्गिरसः) तपस्वी प्राणायामाभ्यासी जन(अन्वविन्दन्) प्राप्त कर लेते हैं। (सः) वह आप (मथ्यमानः) ध्यान किये जाते हुए (महत् सहः) उपासक के महान् बल (जायसे) हो जाते हो। हे (अङ्गिरः) प्राणों के समान प्रिय ! (त्वाम्) आपको (सहसः) बल का (पुत्रम्) पुतला (आहुः) कहते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान होता हुआ भी चर्मचक्षु से दिखायी न देने के कारण गुह्य है। तप और ध्यान से ही वह प्राप्त होने योग्य है। ध्यानी लोग उसके महान् बल और तेज का साक्षात्कार करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ के꣣तुं꣡ प्र꣢थ꣣मं꣢ पु꣣रो꣡हि꣢तम꣣ग्निं꣡ न꣢꣯रस्त्रिषध꣣स्थे꣡ समि꣢꣯न्धते । इ꣡न्द्रे꣢ण दे꣣वैः꣢ स꣣र꣢थ꣣ꣳस꣢ ब꣣र्हि꣢षि꣣ सी꣢द꣣न्नि꣡ होता꣢꣯ य꣣ज꣡था꣢य सु꣣क्र꣡तुः꣢ ॥९०९॥
पदार्थः(यज्ञस्य) अध्यात्म यज्ञ के (केतुम्) ध्वज के समान स्थित अथवा प्रज्ञापक, (प्रथमम्) मुख्य, (पुरोहितम्) सम्मुख निहित (अग्निम्) तेजस्वी परमेश्वर को (नरः) उपासक मनुष्य (त्रिषधस्थे) ज्ञान, कर्म और उपासना ये तीनों जहाँ एक साथ स्थित होते हैं, उस जीवात्मा में (समिन्धते) भली-भाँति प्रदीप्त करते हैं। (इन्द्रेण) जीवात्मा तथा (देवैः) मन, बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रिय रूप देवों के साथ (सरथम्) शरीररूप समान रथ में स्थित, अथवा (इन्द्रेण) सूर्य तथा (देवैः) वायु, जल, पृथिवी,मङ्गल, बुध, चन्द्र नक्षत्र आदि देवों के साथ (सरथम्) ब्रह्माण्डरूप समान रथ में स्थित (सः) वह (होता) सुख आदि का दाता, (सुक्रतुः) शुभ प्रज्ञावाला तथा शुभ कर्मोंवाला अग्नि नामक परमेश्वर (यजथाय) देह में सब इन्द्रिय आदि में और बाहर सब सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि में सामञ्जस्य करने के लिए (बर्हिषि) शरीर-यज्ञ वा ब्रह्माण्ड-यज्ञ में (निषीदत्) बैठा हुआ है ॥३॥
भावार्थःअपने अन्तरात्मा में महान् परमात्मा-रूप अग्नि को भली-भाँति प्रदीप्त करके उपासना-यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
अ꣣यं꣡ वां꣢ मित्रावरुणा सु꣣तः꣡ सोम꣢꣯ ऋतावृधा । म꣢꣫मेदि꣣ह꣡ श्रु꣢त꣣ꣳ ह꣡व꣢म् ॥९१०॥
पदार्थःप्रथम—आत्मा और मन के पक्ष में। हे (ऋतावृधा) सत्य को बढ़ानेवाले (मित्रावरुणा) आत्मा और मन ! (वाम्) तुम दोनों के लिए (अयम्) यह (सोमः) ज्ञान एवं कर्म का रस (सुतः) अभिषुत है। तुम दोनों (इह) यहाँ (मम) मेरे (हवम्) उद्बोधन को (श्रुतम्) सुनो ॥ द्वितीय—राजा और प्रधानमन्त्री के पक्ष में। हे (ऋतावृधा) न्याय को बढ़ानेवाले (मित्रावरुणा) राजा और प्रधानमन्त्री ! (वाम्) तुम दोनों के लिए (अयम्) यह (सोमः) राजकर (सुतः) अर्पित है। तुम दोनों (इह) इस राष्ट्र में (मम) मेरे (हवम्) राष्ट्रोन्नति के आह्वान को (श्रुतम्) सुनो ॥१॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि अपने आत्मा और मन को उद्बोधन देकर सब प्रकार का उत्कर्ष सिद्ध करें। इसीप्रकार राजा और प्रधानमन्त्री का कर्तव्य है कि वे प्रजाओं से राजकर लेकर प्रजा के हित के लिए उसे व्यय करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
रा꣡जा꣢ना꣣व꣡न꣢भिद्रुहा ध्रु꣣वे꣡ सद꣢꣯स्युत्त꣣मे꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢स्थूण आशाते ॥९११॥
पदार्थःप्रथम—आत्मा और मन के पक्ष में। (अनभिद्रुहा) द्रोह न करनेवाले, (राजानौ) राजाओं के समान विद्यमान आत्मा और मन (ध्रुवे) दृढ़ अङ्गोंवाले, (उत्तमे) सर्वोत्कृष्ट, (सहस्रस्थूणे) हड्डीरूप बहुत सारे खम्भोंवाले (सदसि) देहरूप घर में (आशाते) निवास करते हैं ॥ द्वितीय—राजा और प्रधानमन्त्री के पक्ष में। (अनभिद्रुहा) प्रजा से द्रोह न करनेवाले, (राजानौ) राष्ट्र के उच्चपदों पर विराजमान राजा और प्रधानमन्त्री (धुवे) स्थिर, (उत्तमे) सर्वोत्कृष्ट, (सहस्रस्थूणे) हजार खम्भोंवाले (सदसि) सभागृह में (आशाते) आकर बैठते हैं ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे आत्मा और मन मनुष्य के जीवन को उन्नत करते हैं, वैसे ही राजा और प्रधानमन्त्री राष्ट्र के जीवन को उन्नत करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
ता꣢ स꣣म्रा꣡जा꣢ घृ꣣ता꣡सु꣢ती आदि꣣त्या꣡ दानु꣢꣯न꣣स्प꣡ती꣢ । स꣡चे꣢ते꣣ अ꣡न꣢वह्वरम् ॥९१२॥
पदार्थःप्रथम—आत्मा और मन के पक्ष में। (ता) वे दोनों (घृतासुती) तेज को प्रेरित करनेवाले, (आदित्या) ज्ञान से प्रकाशमान, (दानुनः पती) दान के अधीश्वर, (सम्राजा) देह के सम्राट् आत्मा और मन (अनवह्वरम्) अकुटिल अर्थात् सरल मार्ग का (सचेते) सेवन करें ॥ द्वितीय—राजा और प्रधानमन्त्री के पक्ष में। (ता) वे दोनों (घृतासुती) राष्ट्र में घी-दूध आदि को सींचनेवाले, (आदित्या) ज्ञान-प्रकाश से भासमान, (दानुनः पती) दान के स्वामी अर्थात् दान के देनेवाले (सम्राजा) तेजस्वी राजा और प्रधानमन्त्री (अनवह्वरम्) अकुटिल व्यवहार का (सचेते) सेवन करें ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःआत्मा और मन में अगाध शक्ति निहित है। किन्तु उन्हें चाहिए कि वे सरल मार्ग का ही आश्रय लें, कुटिल का नहीं। इसी प्रकार राजा और प्रधानमन्त्री भी सरल मार्ग से ही व्यवहार करते हुए राष्ट्र को उन्नत कर सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रो꣢ दधी꣣चो꣢ अ꣣स्थ꣡भि꣢र्वृ꣣त्रा꣡ण्यप्र꣢꣯तिष्कुतः । ज꣣घा꣡न꣢ नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥९१३॥
पदार्थः(अप्रतिष्कुतः) कोई भी शत्रु जिसका मुकाबला नहीं कर सकता, ऐसा (इन्द्रः) शत्रुविदारक जगदीश्वर (दधीचः) लोकों के धारणकर्ता तथा अपनी धुरी पर घूमनेवाले सूर्य की (अस्थभिः) अस्थियों के तुल्य किरणों से (नव नवतीः) निन्यानवे प्रतिशत (वृत्राणि) रोग, मलिनता आदियों को (जघान) नष्ट कर देता है ॥१॥
भावार्थःअहो, कैसा है जगदीश्वर का महान् कर्म कि वह विशाल सूर्यरूप साधन से प्रायः सभी रोग, मल आदि को नष्ट करके हमारे जीवनों को सुरक्षित कर देता है। यदि वह मलों को हरनेवाले सूर्य को न रचता तो भूमण्डल अनेक व्याधियों से और सारे मलों से परिपूर्ण होकर निवासयोग्य भी न रहता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣣च्छ꣡न्नश्व꣢꣯स्य꣣ य꣢꣫च्छिरः꣣ प꣡र्व꣢ते꣣ष्व꣡प꣢श्रितम् । त꣡द्वि꣢दच्छर्य꣣णा꣡व꣢ति ॥९१४॥
पदार्थःइन्द्र जगदीश्वर (अश्वस्य) अन्तरिक्ष में व्याप्त बादल के (पर्वतेषु) पहाड़ों पर (अपश्रितम्) गिरे हुए (यत्) जिस (शिरः) जीर्ण-शीर्ण जल को (इच्छन्) फिर से भाप बनाना चाहता है (तत्) उस जल को वह (शर्यणावति)नदियों से युक्त समुद्र में (विदत्) पा लेता है। अभिप्राय यह है कि जो बादल का जल भूमि पर बरस कर नदियों द्वारा समुद्र में चला जाता है, उसे फिर वह सूर्य द्वारा भाप बनाकर अन्तरिक्ष में ले जाकर बादल के रूप में परिणत कर देता है ॥२॥
भावार्थःबादल से वर्षा और बरसे हुए जल से फिर बादल का निर्माण इस चक्र को जगदीश्वर ही चला रहा है। यदि ऐसी उसकी की हुई सुव्यवस्था न होती तो यह भूमण्डल शुष्क एवं वृक्ष-ओषधि-लता आदि से विहीन हो जाता ॥२॥ इस मन्त्र पर सायणाचार्य द्वारा प्रोक्त इतिहास एवं उसका प्रत्याख्यान पूर्वार्चिक मन्त्र क्रमाङ्क १७९ के भाष्य में देखना चाहिए ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣢꣫त्राह꣣ गो꣡र꣢मन्वत꣣ ना꣢म꣣ त्व꣡ष्टु꣢रपी꣣꣬च्य꣢꣯म् । इ꣣त्था꣢ च꣣न्द्र꣡म꣢सो गृ꣣हे꣢ ॥९१५॥
पदार्थः(अत्र ह) यहाँ (त्वष्टुः) प्रदीप्त सूर्य से (अपीच्यम्) बाहर गये हुए प्रकाश को, लोग (गोः नाम) पृथिवी पर नत हुआ (अमन्वत) जानते हैं। (इत्था) इस प्रकार, पृथिवी को मध्य में करके वह प्रकाश (चन्द्रमसः गृहे) चन्द्रमण्डल में गिरता है, उसी से चन्द्रमा प्रकाशित होता है। यह इन्द्र परमेश्वर की ही महिमा है ॥३॥
भावार्थःपृथिवी अण्डाकृति मार्ग से सूर्य की परिक्रमा करती है और चन्द्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता हुआ पृथिवी के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करता है। सूर्य और चन्द्रमा के बीच में पृथिवी के आ जाने से प्रतिदिन चन्द्रमा के सम्पूर्ण गोलार्ध पर सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ता। चन्द्रमा का जितना अंश पृथिवी की ओट में आ जाता है, उतने अंश में सूर्य का प्रकाश न पड़ने से वह अंश अन्धकार से आच्छन्न ही रहता है। चन्द्रमा की कलाओं की ह्रास-वृद्धि का यही रहस्य है। अमावस्या को सम्पूर्ण चन्द्र के पृथिवी से ढक जाने के कारण पूरा ही चन्द्रमा अन्धकार से आवृत रहता है और पूर्णिमा को सम्पूर्ण चन्द्रमा के पृथिवी से छूटे रहने के कारण सम्पूर्ण ही चन्द्रमा प्रकाशित रहता है। यही परमेश्वर द्वारा की हुई व्यवस्था इस मन्त्र में वर्णित हुई है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣣यं꣡ वा꣢म꣣स्य꣡ मन्म꣢꣯न꣣ इ꣡न्द्रा꣢ग्नी पू꣣र्व्य꣡स्तु꣢तिः । अ꣣भ्रा꣢द्वृ꣣ष्टि꣡रि꣢वाजनि ॥९१६॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (मन्मनः) ज्ञानी (अस्य) इस परमेश्वर की (इयम्) यह (वाम्) तुम्हारे द्वारा की गयी (पूर्व्यस्तुतिः) श्रेष्ठ स्तुति (अभ्रात्) बादल से (वृष्टिः इव) वर्षा के समान (अजनि) हुई है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे बादल से बरसी हुई जलधारा भूमि को आर्द्र करती है, वैसे ही आत्मा और मन से की गयी स्तुति परमेश्वर को आर्द्र (स्नेहयुक्त) करती है। आर्द्र भूमि जैसे वृक्ष, वनस्पति आदियों को उत्पन्न करती है, वैसे ही आर्द्र किया गया परमेश्वर स्तोता के हृदय में सद्गुणों को उत्पन्न करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
शृ꣣णुतं꣡ ज꣢रि꣣तु꣢꣫र्हव꣣मि꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ व꣡न꣢तं꣣ गिरः꣢ । ई꣢शाना꣡ पि꣢प्यतं꣣ धि꣡यः꣢ ॥९१७॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! तुम दोनों (जरितुः) प्रशंसक के (हवम्) उद्बोधन को (शृणुतम्) सुनो। (गिरः) स्तुतिवाणियों को (वनतम्) उच्चारित करो। (ईशाना) देह के अधिष्ठाता तुम दोनों (धियः) ज्ञानों और कर्मों को (पिप्यतम्) बढ़ाओ ॥२॥ यहाँ एक कर्त्ता-कारक से अनेक क्रियाओं का योग होने से दीपक अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःमनुष्य को चाहिए कि आत्मा और मन का उपयोग करके परमेश्वर की उपासना, ज्ञान का संग्रह तथा सत्कर्म करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
मा꣡ पा꣢प꣣त्वा꣡य꣢ नो न꣣रे꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ मा꣡भिश꣢꣯स्तये । मा꣡ नो꣢ रीरधतं नि꣣दे꣢ ॥९१८॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (नरा) नेतृत्व करनेवाले तुम दोनों (मा) न तो (पापत्वाय) पाप कर्म के, (मा) न (अभिशस्तये) हिंसा के और (मा) न ही (नः) हमें (निदे) निन्दक के (रीरधतम्) वश में करो ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि आत्मा और मन को उद्बोधन देकर पाप, हिंसा, निन्दा आदि से मुक्ति पायें ॥३॥ इस खण्ड में परमेश्वर के स्वरूप, परमेश्वर-स्तुति, परमात्म-प्राप्ति, आत्मा-मन तथा प्रसङ्गतः राजा और प्रधानमन्त्री का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ पञ्चम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व दक्ष꣣सा꣡ध꣢नो दे꣣वे꣡भ्यः꣢ पी꣣त꣡ये꣢ हरे । म꣣रु꣡द्भ्यो꣢ वा꣣य꣢वे꣣ म꣡दः꣢ ॥९१९॥
पदार्थःहे (हरे) दोषों को हरनेवाले आचार्य ! (दक्षसाधनः) विद्या, सच्चरित्रता, ब्रह्मचर्य आदि बलों को सिद्ध करनेवाले आप (देवेभ्यः पीतये) दिव्यगुणी शिष्यों के पान के लिए (पवस्व) ज्ञानरस प्रवाहित करो और (मरुद्भ्यः) उन प्राणायाम के साधक शिष्यों की (वायवे) प्रगति के लिए (मदः) उत्साहकारी होवो ॥१॥
भावार्थःआचार्य को चाहिए कि शिष्यों के लिए जो-जो आवश्यक हो, वह-वह सब करे, जिससे वे विद्या में पारङ्गत, सच्चरित्र, ब्रह्मचारी, प्रगतिशील और कर्मयोगी होवें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सं꣢ दे꣣वैः꣡ शो꣢भते꣣ वृ꣡षा꣢ क꣣वि꣢꣫र्यो꣣नाव꣡धि꣢ प्रि꣣यः꣢ । प꣡व꣢मानो꣣ अ꣡दा꣢भ्यः ॥९२०॥
पदार्थः(वृषा) ज्ञान की वर्षा करनेवाला, (कविः) मेधावी, (प्रियः) शिष्यों से प्रीति रखनेवाला, (अदाभ्यः) ठगा न जा सकनेवाला (पवमानः) पवित्रतादायक आचार्य (योनौ अधि) गुरुकुलरूप घर में (देवैः) दिव्यगुणी शिष्यों के साथ (सं शोभते) भली-भाँति शोभा पाता है ॥२॥
भावार्थःसुयोग्य गुरु और सुयोग्य शिष्य आपस में मिलकर बहुत अधिक शोभा पाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मान धि꣣या꣢ हि꣣तो꣡३ऽभि꣢꣫ योनिं꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । ध꣡र्म꣢णा वा꣣यु꣢मारु꣢꣯हः ॥९२१॥
पदार्थःहे (पवमान) चित्तशोधक आचार्य ! (धिया) प्रज्ञा और कर्म से (हितः) शिष्यों के हितकारी आप (योनिम् अभि) यम-नियम आदियों के आश्रय शिष्यवर्ग के प्रति (कनिक्रदत्) शास्त्रों का उपदेश करते हुए (धर्मणा)धर्म से (वायुम्) प्रगतिशील शिष्यवर्ग को (आरुहः) परम उन्नति की सीढ़ी पर चढ़ा देते हो ॥३॥
भावार्थःआचार्य विद्या आदि के दान से शिष्यों का बहुत उपकार करते हैं, अतः शिष्यों को चाहिए कि मन, वचन, कर्म से उनका सम्मान करें और दूसरों को विद्या आदि देकर उनका ऋण चुकायें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
त꣢वा꣣ह꣡ꣳ सो꣢म रारण स꣣ख्य꣡ इ꣢न्दो दि꣣वे꣡दि꣢वे । पु꣣रूणि꣢ बभ्रो꣣ नि꣡ च꣢रन्ति꣣ मा꣡मव꣢꣯ प꣣रिधी꣢꣫ꣳरति꣣ ता꣡ꣳइ꣢हि ॥९२२॥
पदार्थःहे (इन्दो) विद्यारस से सराबोर करनेवाले, तेजस्वी (सोम) विद्यारस के भण्डार आचार्य ! (अहम्) मैं शिष्य (तव सख्ये) आपकी मैत्री में (दिवे दिवे) प्रतिदिन (रारण) वेदादि शास्त्रों का उच्चारण करता हूँ। हे (बभ्रो) सब शिष्यों का भरण-पोषण करनेवाले आचार्य! (पुरूणि) बहुत से दोष (माम्)मुझ शिष्य को (नि अव चरन्ति) कष्ट दे रहे हैं, (परिधीन् तान्) चारों ओर से घेरनेवाले उन दोषों को (अति इहि) दूर कर दीजिए ॥१॥
भावार्थःगुरुओं का यह कतर्व्य है कि वे शिष्यों में उत्पन्न हुए दोषों को दूर करके उन्हें निर्मल चरित्रवाला और विद्वान् बनायें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
त꣢वा꣣हं꣡ नक्त꣢꣯मु꣣त꣡ सो꣢म ते꣣ दि꣡वा꣢ दुहा꣣नो꣡ ब꣢भ्र꣣ ऊ꣡ध꣢नि । घृ꣣णा꣡ तप꣢꣯न्त꣣म꣢ति꣣ सू꣡र्यं꣢ प꣣रः꣡ श꣢कु꣣ना꣡ इ꣢व पप्तिम ॥९२३॥
पदार्थःहे (बभ्रो) भरण-पोषण करनेवाले (सोम) आनन्दरसागार परमेश्वर ! (तव) तेरा (अहम्) मैं उपासक (ते) तेरे (ऊधनि) आनन्दरस के कोश में से (नक्तम्) रात्रि को (उत) और (दिवा) दिन में भी (दुहानः) आनन्दरस को दुह रहा हूँ और (घृणा) तेज से (तपन्तम्) तपते हुए (सूर्यम्) सूर्य को भी (अति) अतिक्रान्त करके अर्थात् सूर्य से भी अधिक तेजस्वी होते हुए हम (शकुनाः इव) पक्षियों के समान (परः) भौतिक जगत् से परे विद्यमान तुझ परमात्मा की ओर (पप्तिम) उड़ रहे हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःमनुष्य को चाहिए कि वह तेजस्वी और तपस्वी होकर परमात्मा का साक्षात्कार करके उसके आनन्द-रस का आस्वाद लेकर मोक्ष पद को पाये ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
पु꣣नानो꣡ अ꣢क्रमीद꣣भि꣢꣫ विश्वा꣣ मृ꣢धो꣣ वि꣡च꣢र्षणिः । शु꣣म्भ꣢न्ति꣣ वि꣡प्रं꣢ धी꣣ति꣡भिः꣢ ॥९२४॥
पदार्थः(पुनानः) मनों को शुद्ध करता हुआ (विचर्षणिः)सब शास्त्रों का पार-द्रष्टा सोम आचार्य, शिष्यों की (विश्वाः मृधः) सब हिंसावृत्तियों को (अभि अक्रमीत्) विनष्ट कर देता है। उस (विप्रम्) मेधावी ब्राह्मण आचार्य को, शिष्यगण (धीतिभिः) शिष्यों के योग्य कर्मों द्वारा (शुम्भन्ति) शोभित करते हैं, अर्थात् उससे बताये हुए कर्मों को करते हुए उसके गौरव को बढ़ाते हैं ॥१॥
भावार्थःजैसे आचार्य शिष्यों के दोषों का परिमार्जन करके उन्हें निष्पाप करता है, वैसे ही शिष्यों को भी चाहिए कि वे आचार्य के आदेश को शिरोधार्य करके उसे प्रसन्न करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ योनि꣢꣯मरु꣣णो꣡ रु꣢ह꣣द्ग꣢म꣣दि꣢न्द्रो꣣ वृ꣡षा꣢ सु꣣त꣢म् । ध्रु꣣वे꣡ सद꣢꣯सि सीदतु ॥९२५॥
पदार्थःप्रथम—ब्रह्मानन्द के पक्ष में। (अरुणः) ज्योतिर्मय ब्रह्मानन्दरूप सोम (योनिम्) हृदयरूप गृह में (आ रुहत्) आरूढ़ होता है। (वृषा) बलवान् (इन्द्रः) अन्तरात्मा (सुतम्) अभिषुत ब्रह्मानन्दरूप सोमरस को (गमत्) प्राप्त करता है। हम चाहते हैं कि वह ब्रह्मानन्द (ध्रुवे सदसि) अविचल आत्मारूप सदन में (सीदतु) स्थित हो जाए, अर्थात् उसका अङ्ग बन जाए ॥२॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य के विषय में। (अरुणः) तेज से चमकता हुआ विद्यार्थी (योनिम्) गुरुकुल में (आ रुहत्) प्रविष्ट होता है। (वृषा) विद्या की वर्षा करनेवाला (इन्द्रः) आचार्य (सुतम्) पुत्रतुल्य उस विद्यार्थी के पास (गमत्) उसका अभिनन्दन करने के लिए जाता है। वह विद्यार्थी (धुवे) स्थिर (सदसि) विद्यागृह में (सीदतु) निवास करे, अर्थात् जब तक विद्या पूर्ण न हो जाए तब तक निश्चिन्त होकर वहाँ रहे ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥
भावार्थःजैसे मनुष्य का आत्मा ब्रह्मानन्द-रस के पाने से कृतार्थ हो, वैसे ही गुरुकुल में प्रविष्ट विद्यार्थी विद्याओं में पारङ्गत होकर कृतकृत्य हो ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
नू꣡ नो꣢ र꣣यिं꣢ म꣣हा꣡मि꣢न्दो꣣ऽस्म꣡भ्य꣢ꣳ सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥९२६॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी तथा आनन्दरस वा विद्यारस से आर्द्र करनेवाले (सोम) शुभगुणप्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! आप (नु) निश्चय से (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (विश्वतः)सब ओर से (महाम्) महान्, (सहस्रिणम्) हजार की संख्यावाले (रयिम्) धन, धान्य, विद्या, आरोग्य, सच्चरित्रता, न्याय, दया आदि ऐश्वर्य को (आ पवस्व) प्राप्त कराओ ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से और आचार्य के प्रयत्न से मनुष्य सभी आध्यामिक और भौतिक सम्पत्ति को प्राप्त कर सकते हैं ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य के विषय तथा परमात्मा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पञ्चम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
पि꣢बा꣣ सो꣡म꣢मिन्द्र꣣ म꣡द꣢तु त्वा꣣ यं꣡ ते꣢ सु꣣षा꣡व꣢ हर्य꣣श्वा꣡द्रिः꣢ । सो꣣तु꣢र्बा꣣हु꣢भ्या꣣ꣳ सु꣡य꣢तो꣣ ना꣡र्वा꣢ ॥९२७॥
पदार्थःहे (हर्यश्व) आकर्षणशक्तियुक्त हैं व्याप्त सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि लोक जिसके ऐसे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! आप (सोमम्) मेरे भक्तिरस को (पिब) पान कीजिए, स्वीकार कीजिए। वह मेरा भक्तिरस (त्वा) आपको (मन्दतु) आनन्दित करे, जिस भक्तिरस को (सोतुः) रथ प्रेरक सारथि की (बाहुभ्याम्) भुजाओं से (सुयतः) सुनियन्त्रित (अर्वा न) घोड़े के समान (सुयतः) यम-नियम आदियों से सुनियन्त्रित (अद्रिः) अविनश्वर मेरे अन्तरात्मा ने (ते) आपके लिए (सुषाव) अभिषुत किया है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा तप और श्रद्धा के साथ वेदमन्त्रों को गा-गाकर जब परमात्मा के लिए भक्तिरस प्रवाहित करता है तब परमात्मा उसके अन्दर सद्गुणों और सत्कर्मों को प्रेरित कर उसे महान् बना देता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣢स्ते꣣ म꣢दो꣣ यु꣢ज्य꣣श्चा꣢रु꣣र꣢स्ति꣣ ये꣡न꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ हर्यश्व꣣ ह꣡ꣳसि꣢ । स꣡ त्वामि꣢꣯न्द्र प्रभूवसो ममत्तु ॥९२८॥
पदार्थः(हर्यश्व) ज्ञान कर्म के आहर्ता हैं ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़े जिसके ऐसे हे जीवात्मन् ! (यः) जो (तव) तेरा (मदः) उत्साह (युज्यः) तेरा सहयोगी और (चारुः) श्रेष्ठ (अस्ति) है, (येन) जिस उत्साह से तू (वृत्राणि) बाह्य और आन्तरिक रिपुओं को (हंसि) विनष्ट करता है, (सः) वह उत्साह, हे (प्रभूवसो) बहुत गुणोंवाले (इन्द्र) जीवात्मन् ! (त्वा) तुझे (ममत्तु) आनन्दित करे ॥२॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा अपनी शक्ति को पहचानकर जब जीवन-संग्राम में उतरता है तब उसकी विजय सुनिश्चित है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
बो꣢धा꣣ सु꣡ मे꣢ मघव꣣न्वा꣢च꣣मे꣢꣫मां यां ते꣣ व꣡सि꣢ष्ठो꣣ अ꣡र्च꣢ति꣣ प्र꣡श꣢स्तिम् । इ꣣मा꣡ ब्रह्म꣢꣯ सध꣣मा꣡दे꣢ जुषस्व ॥९२९॥
पदार्थःहे (मघवन्) ऐश्वर्यवान् वा दानवान् परमात्मन् ! आप (मे) मेरी (इमाम्) इस (प्रशस्तिं वाचम्) आपके गुण-गान की वाणी को (सु आ बोध) भली-भाँति जानिए, (याम्) जिस वाणी को (ते) आपके लिए (वसिष्ठः अर्चति) अपने अन्दर सद्गुणों को अतिशयरूप से बसानेवाला मनुष्य उच्चारण कर रहा है—अर्थात् मैं उच्चारण कर रहा हूँ। आप (सधमादे) सामूहिक उपासना-यज्ञ में (इमा ब्रह्म) इन स्तोत्रों को (जुषस्व) स्वीकार कीजिए ॥३॥
भावार्थःजो लोग श्रद्धा से परमात्मा की गुणावलि की प्रशंसा करते हैं, वे स्वयं भी गुणी होकर उत्कर्ष प्राप्त करते हैं ॥३॥
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छन्द -अतिजगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
वि꣢श्वाः꣣ पृ꣡त꣢ना अभि꣣भू꣡त꣢रं꣣ न꣡रः꣢ स꣣जू꣡स्त꣢तक्षु꣣रि꣡न्द्रं꣢ जज꣣नु꣡श्च꣢ रा꣣ज꣡से꣢ । क्र꣢त्वे꣣ व꣡रे꣢ स्थे꣣म꣢न्या꣣मु꣡री꣢मु꣣तो꣡ग्रमोजि꣢꣯ष्ठं त꣣र꣡सं꣢ तर꣣स्वि꣡न꣢म् ॥९३०॥
पदार्थः(विश्वाः) सब (पृतनाः) बाह्य और आन्तरिक शत्रुओं की सेनाओं के (अभिभूतरम्) अतिशय पराजेता, (वरे) उत्कृष्ट (स्थेमनि) स्थिरता या दृढ़ता में विद्यमान, (आ मुरीम्) सब ओर विघ्नों और विपत्तियों को मारनेवाले, (उत) और (उग्रम्) अन्याय तथा अन्यायी के प्रति प्रचण्ड, (ओजिष्ठम्) सबसे बढ़कर ओजस्वी, (तरसम्) दुःखों से तराने में समर्थ, (तरस्विनम्) अतिशय वेगवान् (इन्द्रम्) जीवात्मा को (नरः) नेता मनुष्य (ततक्षुः) उद्बोधन देते हैं (च) और (राजसे) साम्राज्य के लिए, तथा (क्रत्वे) महान् कर्म के लिए, (जजनुः) नियुक्त करते हैं ॥१॥
भावार्थःमनुष्य अपने आत्मा को उद्बोधन देकर बड़े-बड़े कर्म करने में, यहाँ तक कि चक्रवर्ती साम्राज्य एवं मोक्ष का साम्राज्य पाने में भी, समर्थ हो सकता है ॥१॥
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छन्द -उपरिष्टाद्बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
ने꣣मिं꣡ न꣢मन्ति꣣ च꣡क्ष꣢सा मे꣣षं꣡ विप्रा꣢꣯ अभिस्व꣣रे꣢ । सु꣣दीत꣡यो꣢ वो अ꣣द्रु꣢꣫होऽपि꣣ क꣡र्णे꣢ तर꣣स्वि꣢नः꣣ स꣡मृक्व꣢꣯भिः ॥९३१॥
पदार्थः(विप्राः) मेधावी ब्राह्मण लोग (अभिस्वरे) वेद-स्तोत्र में (नेमिम्) रथचक्र में परिधि के समान व्याप्त, (मेषम्) सुख से सींचनेवाले इन्द्र परमेश्वर को (चक्षसा) साक्षात्कार से (नमन्ति) अपनी ओर झुका लेते हैं। आगे मनुष्यों को सम्बोधन है—हे (सुदीतयः) भली-भाँति अविद्या का क्षय करनेवाले जनो ! (वः) तुम (अद्रुहः) द्रोह न करनेवाले होवो। (अपि) साथ ही (कर्णे) अपनी और दूसरों की जीवननौका के कर्णधार होने में (तरस्विनः) वेगवान् बनो। (ऋक्वभिः) प्रशस्त स्तुतिवाले स्तोता जनों के साथ (सम्) सङ्गति करो ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि परमेश्वर का साक्षात्कार करके द्रोहरहित, सबके मित्र, कर्णधार,क्रियाशील, सत्सङ्गतिपरायण और परोपकारी होकर विचरें ॥२॥
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छन्द -उपरिष्टाद्बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
स꣡मु꣢ रे꣣भा꣡सो꣢ अस्वर꣣न्नि꣢न्द्र꣣ꣳ सो꣡म꣢स्य पी꣣त꣡ये꣢ । स्वः꣢꣯ पति꣣र्य꣡दी꣢ वृ꣣धे꣢ धृ꣣त꣡व्र꣢तो꣣ ह्यो꣡ज꣢सा꣣ स꣢मू꣣ति꣡भिः꣢ ॥९३२॥
पदार्थः(रेभासः) स्तोता लोग (इन्द्रम्) विघ्नविनाशक परमात्मा को (सोमस्य पीतये) भक्तिरस के पान के लिए (सम् उ अस्वरन्) भली-भाँति पुकारते हैं। (स्वः पति) दिव्य प्रकाश, आनन्द वा मोक्ष का अधिपति वह (यदि) यदि (वृधे) वृद्धि करने के लिए (धृतव्रतः)संकल्प कर लेता है, तो उपासक को (ओजसा) आत्मबल से और (ऊतिभिः) रक्षाओं से (सम्) संयुक्त कर देता है ॥३॥
भावार्थःउपासक की दृढ़ श्रद्धा को देखकर परमेश्वर उसमें ओज और पुरुषार्थ की प्रेरणा करके उसकी निरन्तर रक्षा करता है ॥३॥
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छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
यो꣡ राजा꣢꣯ चर्षणी꣣नां꣢꣫ याता꣣ र꣡थे꣢भि꣣र꣡ध्रि꣢गुः । वि꣡श्वा꣢सां तरु꣣ता꣡ पृत꣢꣯नानां꣣ ज्ये꣢ष्ठं꣣ यो꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣢ गृ꣣णे꣢ ॥९३३॥
पदार्थः(यः) जो मेरा आत्मा (चर्षणीनाम्) मनुष्यों में (राजा) सम्राट् है और (अध्रिगुः) किसी से न रोकी जा सकने योग्य क्रियावाला जो (रथेभिः) देहरूप रथों से (याता) यात्रा करता है और जो (विश्वासाम्) सब (पृतनानाम्) आन्तरिक वा बाह्य शुत्र-सेनाओं का (तरुता) अतिक्रमण करनेवाला है और (यः) जो वृत्रहा पाप,विघ्न आदि का विनाशक है, उस (ज्येष्ठम्) श्रेष्ठ आत्मा का मैं (गृणे) गुण-वर्णन करता हूँ ॥१॥
भावार्थःमनुष्य के आत्मा में महान् शक्ति निहित है। उद्बोधन मिलने पर वह बड़े से बड़े कार्य कर सकता है ॥१॥
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छन्द -प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
इ꣢न्द्रं꣣ त꣡ꣳ शु꣢म्भ पुरुहन्म꣣न्न꣡व꣢से꣣ य꣡स्य꣢ द्वि꣣ता꣡ वि꣢ध꣣र्त्त꣡रि꣢ । ह꣡स्ते꣢न꣣ व꣢ज्रः꣣ प्र꣡ति꣢ धायि दर्श꣣तो꣢ म꣣हा꣢न् दे꣣वो꣡ न सूर्यः꣢꣯ ॥९३४॥
पदार्थःहे (पुरुहन्मन्) बहुत से शत्रुओं के विनाशक मानव ! तू (अवसे) प्रगति के लिए (तम्) उस प्रसिद्ध (इन्द्रम्) परमवीर परमेश्वर को (शुम्भ) अपने अन्तरात्मा में शोभित कर, (यस्य विधर्तरि) जिसे धारण करनेवाले मनुष्य के अन्दर (द्विता) दो प्रकार की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। परमेश्वर को अपने अन्दर धारण करनेवाले उस मनुष्य द्वारा एक ओर तो (हस्तेन) हाथ से (दर्शतः) दर्शनीय (वज्रः) शस्त्रास्त्र (प्रति धायि) पकड़ा जाता है और दूसरी ओर वह (देवः सूर्यः न) प्रकाशक सूर्य के समान (महान्) महिमाशाली हो जाता है ॥२॥
भावार्थःअपने अन्तरात्मा में परमात्मा को धारण करने से मनुष्य के अन्दर महान् बल, साहस, तेज, धैर्य और शत्रुपराजय-सामर्थ्य उत्पन्न हो जाता है ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा-जीवात्मा, उपास्य-उपासक एवं मानव-प्रेरणा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पञ्चम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ क꣣वि꣡र्वया꣢꣯ꣳसि न꣣꣬प्त्यो꣢꣯र्हि꣣तः꣢ । स्वा꣣नै꣡र्या꣢ति क꣣वि꣡क्र꣢तुः ॥९३५॥
पदार्थःशिष्यों के (नप्त्योः) आत्मा और मन का (हितः) हित करनेवाला, (कविक्रतुः) मेधावान् और सदाचारी आचार्य (दिवः) यश से प्रकाशित गुरुकुल के (प्रिया वयांसि) प्रिय शिष्यों को (स्वानैः) शास्त्रोपदेश के शब्दों के साथ (परियाति) प्राप्त होता है ॥१॥
भावार्थःजो स्वयं विद्वान् सदाचारी और पढ़ाने में चतुर है, वही आचार्य शिष्यों को सुयोग्य बना सकता है ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ सू꣣नु꣢र्मा꣣त꣢रा꣣ शु꣡चि꣢र्जा꣣तो꣢ जा꣣ते꣡ अ꣢रोचयत् । म꣣हा꣢न्म꣣ही꣡ ऋ꣢ता꣣वृ꣡धा꣢ ॥९३६॥
पदार्थः(सः) वह सुयोग्य आचार्य से शिक्षा दिया हुआ, (शुचिः)पवित्र हृदयवाला, (जातः) स्नातक बना हुआ (महान्) गुणों में महान् (सूनुः) पुत्र (जाते) विद्याओं से प्रसिद्ध, (मही) महागुणविशिष्ट, (ऋतावृधा) सत्य को बढ़ानेवाले (मातरा) माता-पिता को (अरोचयत्) यश से प्रदीप्त करता है ॥२॥
भावार्थःसुयोग्य गुरुओं से पढ़ाया हुआ सुयोग्य पुत्र सुयोग्य माता-पिताओं और सुयोग्य गुरुओं की कीर्ति फैलाता है ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢प्र꣣ क्ष꣡या꣢य꣣ प꣡न्य꣢से꣣ ज꣡ना꣢य꣣ जु꣡ष्टो꣢ अ꣣द्रु꣡हः꣢ । वी꣣꣬त्य꣢꣯र्ष꣣ प꣡नि꣢ष्टये ॥९३७॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् विद्यारस से स्नान किये हुए नवस्नातक ! (जुष्टः) लोगों का प्रिय, (अद्रुहः) द्रोह न करनेवाला तू (क्षयाय) प्रजाओं में सद्गुण आदि के निवास के लिए, (पन्यसे जनाय) अतिशय स्तोता जन उत्पन्न करने के लिए और (पनिष्टये) शुद्ध व्यवहार के लिए (वीती) तीव्रगति से (प्र प्र अर्ष) विचरण कर ॥३॥
भावार्थःनवस्नातकों का यह कर्त्तव्य है कि वे गुरुकुल से बाहर आकर वेदार्थ का उपदेश करते हुए लोगों को श्रेष्ठ गुण कर्मों से युक्त, परमेश्वर के स्तोता और शुद्ध व्यवहारवाला बनायें ॥३॥
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छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
त्व꣢ꣳ ह्या꣣꣬३꣱ङ्ग꣡ दै꣢व्य꣣ प꣡व꣢मान꣣ ज꣡नि꣢मानि द्यु꣣म꣡त्त꣢मः । अ꣣मृतत्वा꣡य꣢ घो꣣ष꣡य꣢न् ॥९३८॥
पदार्थःहे (अङ्ग) भद्र, (दैव्य) विद्वान् गुरु के शिष्य, (पवमान) चित्तशुद्धिप्रदाता आचार्य ! (द्युमत्तमः) अतिशय ज्ञानप्रकाश से युक्त (त्वं हि) आप (अमृतत्वाय) सुख के प्रदानार्थ (जनिमानि) शिष्यों के ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य रूप द्वितीय जन्मों की (घोषयन्) घोषणा किया करो ॥१॥
भावार्थःमाता-पिता से एक जन्म मिलता है, दूसरा जन्म आचार्य से प्राप्त होता है। जब शिष्य विद्याव्रतस्नातक होते हैं उस समय आचार्य गुणकर्मानुसार यह ब्राह्मण है, यह क्षत्रिय है, यह वैश्य है इस प्रकार स्नातकों को वर्ण देते हैं। उस काल में प्रथम जन्म का कोई ब्राह्मण भी गुण कर्म की कसौटी से क्षत्रिय या वैश्य बन सकता है,क्षत्रिय भी ब्राह्मण या वैश्य बन सकता है और वैश्य या शूद्र भी ब्राह्मण या क्षत्रिय बन सकता है ॥१॥
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छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
ये꣢ना꣣ न꣡व꣢ग्वा द꣣ध्य꣡ङ्ङ꣢पोर्णु꣣ते꣢꣫ येन꣣ वि꣡प्रा꣢स आपि꣣रे꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢ꣳ सु꣣म्ने꣢ अ꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ चा꣡रु꣢णो꣣ ये꣢न꣣ श्र꣢वा꣣ꣳस्या꣡श꣢त ॥९३९॥
पदार्थः(येन) जिस पवमान सोम से अर्थात् पवित्रकर्ता, विद्यारस के भण्डार आचार्य से (नवग्वा) नवीन शिक्षा प्राप्त नवस्नातक (दध्यङ्) धारक गुणों को प्राप्त होकर (अपोर्णुते) अविद्या के आवरण को दूर करता है, (येन) जिस आचार्य से उपदेश किये हुए (विप्रासः) मेधावी ब्राह्मण (आपिरे) सच्चरित्र की शिक्षा को प्राप्त करते हैं, (येन) जिस आचार्य से विद्या पाये हुए शिष्य (श्रवांसि) यशों को (आशत) प्राप्त करते हैं, वह आचार्य स्वयम् (देवानाम्) दिव्य गुणों के और (चारुणः) रमणीय (अमृतस्य) मोक्ष के (सुम्ने) सुख में निवास करता है ॥२॥
भावार्थःसुयोग्य आचार्य से शिक्षा दिये हुए छात्र विद्वान्, सच्चरित्र, दिव्यगुणोंवाले और जीवन्मुक्त होकर सब जगह विद्या, सच्चरित्रता आदि गुणों को फैलाते हुए यशस्वी होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
सो꣡मः꣢ पुना꣣न꣢ ऊ꣣र्मि꣢꣫णाव्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति । अ꣡ग्रे꣢ वा꣣चः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥९४०॥
पदार्थः(सोमः) रसनिधि परमेश्वर (ऊर्मिणा) आनन्दरस की तरङ्ग से (पुनानः) पवित्र करता हुआ (अव्यम्) अविनश्वर (वारम्) वरणीय आत्मा के प्रति (वि धावति) वेग से जाता है। वह (वाचः) स्तुतिवाणी से (अग्रे) पूर्व ही (पवमानः) बहता हुआ (कनिक्रदत्) कल-कल शब्द करता है ॥१॥ यहाँ ब्रह्मानन्दरस प्रवाह में कारणभूत स्तुतिवाणी के प्रयोग से पहले ही ब्रह्मानन्द का प्रवाह वर्णित होने से ‘कारण से पूर्व कार्योदय होना रूप’ अतिशयोक्ति अलङ्कार है। साथ ही वस्तुतः ब्रह्मानन्द-प्रवाह में लहर और कलकल शब्द न होने पर भी उसमें लहर और कलकल शब्द का सम्बन्ध कथित होने से असम्बन्ध में सम्बन्धरूप अतिशयोक्ति भी है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के ध्यान में मग्न स्तोता परमात्मा के पास से झरती हुई आनन्द की तरङ्गिणी को अपने अन्दर प्रविष्ट होते हुए अनुभव करके कृतार्थ हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
धी꣣भि꣡र्मृ꣢जन्ति वा꣣जि꣢नं꣣ व꣢ने꣣ क्री꣡ड꣢न्त꣣म꣡त्य꣢विम् । अ꣣भि꣡ त्रि꣢पृ꣣ष्ठं꣢ म꣣त꣢यः꣣ स꣡म꣢स्वरन् ॥९४१॥
पदार्थःउपासक लोग (वाजिनम्) बलवान्, (वने क्रीडन्तम्) ब्रह्माण्डरूप वन में क्रीडा करते हुए, (अत्यविम्) अबुद्धिगम्य उस पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता परमात्मा को (धीभिः) ध्यानवृत्तियों से (मृजन्ति) अपने अन्तरात्मा में अलङ्कृत करते हैं। वे (मतयः)मननशील उपासक (त्रिपृष्ठम्) पृथिवी-अन्तरिक्ष-द्यौरूप अथवा आत्मा-मन-प्राणरूप तीन स्तरों में निवास करनेवाले उस परमात्मा को (अभि) लक्ष्य करके (समस्वरन्) मिलकर स्तुतिगीत गाते हैं ॥२॥
भावार्थःजो परमेश्वर जड़-चेतन से परिपूर्ण ब्रह्माण्डरूप वन को रचकर उसमें क्रीडा करता हुआ जगत् का सञ्चालन कर रहा है, उस सर्वान्तर्यामी को अपने आत्मा का अलङ्कार बनाकर योगी जन जब उसका ध्यान करते हैं तब वे सब सिद्धियाँ पा लेते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
अ꣡स꣢र्जि क꣣ल꣡शा꣢ꣳ अ꣣भि꣢ मी꣣ढ्वा꣢꣫न्त्सप्ति꣣र्न꣡ वा꣢ज꣣युः꣢ । पु꣣नानो꣡ वाचं꣢꣯ ज꣣न꣡य꣢न्नसिष्यदत् ॥९४२॥
पदार्थः(मीढ्वान्) आनन्दरस को सींचनेवाला, (वाजयुः) स्तोताओं को आत्मबल देने का इच्छुक पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता रसनिधि परमेश्वर (कलशान् अभि) अन्नमय-प्राणमय-मनोमय आदि कोशों को लक्ष्य करके (असर्जि) छोड़ा गया है, (सप्तिः न) जैसे घोड़ा संग्राम को लक्ष्य करके छोड़ा जाता है। (पुनानः) पवित्रता देता हुआ वह (वाचं जनयन्) उपदेश-वाणी को उत्पन्न करता हुआ (असिष्यदत्) अन्तरात्मा में प्रवाहित हो रहा है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से आनन्दरस, आत्मबल, अन्तःकरण की पवित्रता और आत्मोत्थान का सन्देश प्राप्त होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
सो꣡मः꣢ पवते जनि꣣ता꣡ म꣢ती꣣नां꣡ ज꣢नि꣣ता꣢ दि꣣वो꣡ ज꣢नि꣣ता꣡ पृ꣢थि꣣व्याः꣢ । ज꣣निता꣡ग्नेर्ज꣢꣯नि꣣ता꣡ सूर्य꣢꣯स्य जनि꣣ते꣡न्द्र꣢स्य जनि꣣तो꣡त विष्णोः꣢꣯ ॥९४३॥
पदार्थः(सोमः) सकल जगत् का उत्पत्तिकर्ता परमेश्वर (पवते) सर्वगत है, सर्वान्तर्यामी है, जो (मतीनाम्) बुद्धियों का (जनिता) उत्पादक, (दिवः) द्युलोक का (जनिता) उत्पादक, (पृथिव्याः) पृथ्वीलोक का (जनिता) उत्पादक, (अग्नेः) आग का (जनिता)उत्पादक, (सूर्यस्य) सूर्य का (जनिता) उत्पादक, (इन्द्रस्य) बिजली का (जनिता) उत्पादक, (उत) और (विष्णोः) व्यापक सूत्रात्मा प्राण का (जनिता) उत्पादक है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा ने ही इन लोकलोकान्तरों को और उनमें स्थित सब अद्भुत पदार्थों को रचा है, क्योंकि जो भी उत्पन्न होता है, उसका कर्ता अवश्य होता है, यह नियम है और हम जैसे लोगों में जगत् के रचने का सामर्थ्य नहीं है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
ब्र꣣ह्मा꣢ दे꣣वा꣡नां꣢ पद꣣वीः꣡ क꣢वी꣣नां꣢꣫ ऋषि꣣र्वि꣡प्रा꣢णां महि꣣षो꣢ मृ꣣गा꣡णा꣢म् । श्ये꣣नो꣡ गृध्रा꣢꣯णा꣣ꣳ स्व꣡धि꣢ति꣣र्व꣡ना꣢ना꣣ꣳ सो꣡मः꣢ प꣣वि꣢त्र꣣म꣡त्ये꣢ति꣣ रे꣡भ꣢न् ॥९४४॥
पदार्थः(देवानाम्) विद्वान् ऋत्विजों के मध्य में (ब्रह्मा) ब्रह्मा के समान मुख्य, (कवीनाम्) मेधावी काव्यकारों के मध्य में (पदवीः) पदप्रयोग के ज्ञाता के समान प्रवीण, (विप्राणाम्) ज्ञानी ब्राह्मणों के मध्य में (ऋषिः) ऋषि कोटि के मनुष्य के समान द्रष्टा, (मृगाणाम्) पशुओं के मध्य में (महिषः) भारी बोझ को ढोने में समर्थ भैंसे के समान जगत् के भार को वहन करनेवाला, (गृध्राणाम्) गिद्ध पक्षियों के मध्य में (श्येनः) बाज के समान शीघ्र गति से शत्रुओं का उच्छेद करनेवाला, (वनानाम्) मेघ-जलों के मध्य में (स्वधितिः) विद्युद्वज्र के समान ज्योतिष्मान् (सोमः) सर्वोत्पादक परमेश्वर (रेभन्) उपदेश देता हुआ (पवित्रम्) पवित्र मन को (अति) लाँघकर (एति) जीवात्मा को प्राप्त होता है ॥२॥ इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःसंसार में जिस गुण या कर्म में जो सबसे अधिक उत्कृष्ट वस्तुएँ हैं, वे उस गुण या कर्म में कथंचित् परमात्मा का उपमान कह दी जाती हैं। वास्तव में तो क्योंकि परमात्मा सबसे बड़ा है, अतः उसका उपमान लोक में मिलना सम्भव नहीं है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्रा꣡वी꣢विपद्वा꣣च꣢ ऊ꣣र्मिं꣢꣫ न सिन्धु꣣र्गि꣢र꣣ स्तो꣢मा꣣न्प꣡व꣢मानो मनी꣣षाः꣢ । अ꣣न्तः꣡ पश्य꣢꣯न्वृ꣣ज꣢ने꣣मा꣡व꣢रा꣣ण्या꣡ ति꣢ष्ठति वृष꣣भो꣡ गोषु꣢꣯ जा꣡न꣢न् ॥९४५॥
पदार्थः(सिन्धुः) समुद्र (ऊर्मिं न) जैसे लहर को प्रेरित करता है, वैसे ही उपासक परमात्मा के प्रति (वाचः) स्तुतिवाणियों को (प्रावीविपत्) प्रेरित करता है। परमात्मा उसकी (गिरः) स्तुति-वाणी के (स्तोमान्) समूहों को और (मनीषाः) बुद्धियों को (पवमानः) पवित्र करता है। तब (वृषभः) स्तुतियों की वर्षा करनेवाला उपासक (गोषु जानन्) इन्द्रियों के विषय में जानता हुआ अर्थात् इन्द्रियाँ बाहर की ओर जानेवाली होती हैं, यह जानता हुआ (अन्तः पश्यन्) अन्तर्दृष्टि करता हुआ (इमा) इन (अवराणि) बाह्य (वृजना) विषय भोगों के बलों को (आतिष्ठति) दबा देता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि विषय-विलासों से मन लौटाकर अन्तर्दृष्टि करके परमात्मा की उपासना कर आनन्दयुक्त हों ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य, परमात्मा और ब्रह्मानन्द का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पञ्चम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्निं꣡ वो꣢ वृ꣣ध꣡न्त꣢मध्व꣣रा꣡णां꣢ पुरू꣣त꣡म꣢म् । अ꣢च्छा꣣ न꣢प्त्रे꣣ स꣡ह꣢स्वते ॥९४६॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (वः) तुम्हें (वृधन्तम्) बढ़ानेवाले, (अध्वराणाम्) यज्ञों के अर्थात् परोपकारार्थ किये जानेवाले कर्मों के (पुरुतमम्) अतिशय पूरक, (अग्निम्)ज्ञानप्रकाशक परमेश्वर की उपासना करो। (नप्त्रे) पतित न होने देनेवाले, अपितु उठानेवाले, (सहस्वते) बलवान् उस परमेश्वर के (अच्छ) अभिमुख होवो ॥१॥
भावार्थःसबको चाहिए कि शुभ कर्मों में उत्साहित करनेवाले, दुष्कर्मों से निवारण करनेवाले, बलवान्, उत्कर्षकारी, बलप्रदाता परमेश्वर की नित्य उपासना करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣यं꣡ यथा꣢꣯ न आ꣣भु꣢व꣣त्त्व꣡ष्टा꣢ रू꣣पे꣢व꣣ त꣡क्ष्या꣢ । अ꣣स्य꣢꣫ क्रत्वा꣣ य꣡श꣢स्वतः ॥९४७॥
पदार्थःहम परमेश्वर के अभिमुख होवें (यथा) जिससे, वह (नः) हममें, हमारे जीवनों में (आभुवत्) रम जाए, (त्वष्टा) बढ़ई (तक्ष्या रूपा इव) जैसे घड़े जानेवाले रूपों में रम जाता है। हम (यशस्वतः) यशस्वी (अस्य) इस परमेश्वर के (क्रत्वा) ज्ञान एवं कर्म से, संयुक्त होवें ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर यदि हमारे जीवनों में व्याप्त हो जाता है तो सदा ही अच्छे-बुरे के विवेक से युक्त हम पुण्य कर्मों को ही करते हुए कीर्तिशाली होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣यं꣡ विश्वा꣢꣯ अ꣣भि꣢꣫ श्रियो꣣ऽग्नि꣢र्दे꣣वे꣡षु꣢ पत्यते । आ꣢꣫ वाजै꣣रु꣡प꣢ नो गमत् ॥९४८॥
पदार्थः(अयम्) यह (अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (देवेषु) उपासक सदाचारी विद्वानों में (विश्वाः श्रियः) सब आध्यात्मिक और बाह्य सम्पदाओं को (अभि पत्यते)प्राप्त कराता है। वह (वाजैः) दिव्य ऐश्वर्यों तथा बलों के साथ (नः) हमें (उप गमत्) प्राप्त होवे ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर का उपासक सब प्रकार के भौतिक एवं आध्यात्मिक बल और ऐश्वर्य अपने पुरुषार्थ से पाने योग्य हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣣म꣡मि꣢न्द्र सु꣣तं꣡ पि꣢ब꣣ ज्ये꣢ष्ठ꣣म꣡म꣢र्त्यं꣣ म꣡द꣢म् । शु꣣क्र꣡स्य꣢ त्वा꣣꣬भ्य꣢꣯क्षर꣣न्धा꣡रा꣢ ऋ꣣त꣢स्य꣣ सा꣡द꣢ने ॥९४९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्नों के विदारण करने में समर्थ जीवात्मन् ! तू (इमम्) इस (सुतम्) उत्पन्न हुए, (ज्येष्ठम्) अतिशय प्रशंसनीय, (अमर्त्यम्) अमर (मदम्) उत्साहप्रद वीररस और भक्तिरस का (पिब) पान कर। (ऋतस्य सादने) सत्य के सदन तेरे हृदय में (शुक्रस्य) प्रदीप्त वीर रस की और पवित्र भक्तिरस की (धाराः) धाराएँ (त्वा अभि) तेरे प्रति (अक्षरन्) क्षरित हो रही हैं ॥१॥
भावार्थःअपने आत्मा को वीरता की और भक्तिरस की तरङ्गों से आप्लावित करके, सब दुर्दान्त दुर्गुण, दुर्व्यसन आदियों को और दुष्टजनों को भगा कर देवासुरसंग्राम में विजय सबको प्राप्त करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
न꣢ कि꣣ष्ट्व꣢द्र꣣थी꣡त꣢रो꣣ ह꣢री꣣ य꣡दि꣢न्द्र꣣ य꣡च्छ꣢से । न꣢ कि꣣ष्ट्वा꣡नु꣢ म꣣ज्म꣢ना꣣ न꣢ किः꣣ स्व꣡श्व꣢ आनशे ॥९५०॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्नों को विदीर्ण करनेवाले जीवात्मन् ! (न किः) कोई भी नहीं (त्वत्) तेरी अपेक्षा (रथीतरः) अधिक प्रशस्त रथारोही है, (यत्) क्योंकि, तू (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-रूप घोड़ों को (यच्छसे)शरीररूप रथ में नियन्त्रित किये रखता है। (न किः) कोई भी नहीं (त्वा) तेरी (मज्मना) बल में (अनु) बराबरी करता है। (न किः) कोई भी नहीं (स्वश्वः) उत्कृष्ट घोड़ोंवाला भी (आनशे) तेरे बराबर हो सकता है ॥२॥
भावार्थःप्रोद्बोधन दिया हुआ जीवात्मा जब वीररस को अपने अन्दर सञ्चारित करता है तब कोई भी अन्य उसकी बराबरी नहीं कर सकता ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣡न्द्रा꣢य नू꣣न꣡म꣢र्चतो꣣क्था꣡नि꣢ च ब्रवीतन । सु꣣ता꣡ अ꣢मत्सु꣣रि꣡न्द꣢वो꣣ ज्ये꣡ष्ठं꣢ नमस्यता꣣ स꣡हः꣢ ॥९५१॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (इन्द्राय) अपने अन्तरात्मा की (नूनम्) अवश्य (अर्चत) स्तुति करो, (उक्थानि च) और उद्बोधनगीतों को (ब्रवीतन) उच्चारण करो। (सुताः) प्रेरित (इन्दवः) वीररस और भक्तिरस तुम्हारे अन्तरात्मा को (अमत्सुः) हर्षित और उत्साहित करें। इस आत्मा के (ज्येष्ठम्) ज्येष्ठ (सहः) बल की, तुम (नमस्यत) प्रशंसा करो ॥३॥
भावार्थःमनुष्य के अपने अन्तरात्मा में महान् बल निहित है। उसे उद्बोधन देकर और प्रभुभक्ति से माँजकर सब कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣡न्द्र꣢ जु꣣ष꣢स्व꣣ प्र꣢ व꣣हा꣡ या꣢हि शूर꣣ ह꣡रि꣢ह । पि꣡बा꣢ सु꣣त꣡स्य꣢ म꣣ति꣡र्न मधो꣢꣯श्चका꣣न꣢꣫श्चारु꣣र्म꣡दा꣢य ॥९५२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन् ! तू (जुषस्व) प्रसन्न हो, (प्र वह) शरीरयात्रा को भली-भाँति वहन कर। हे (शूर) वीर, हे (हरिह) ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों से व्यवहार करनेवाले ! (तू आ याहि) आ। तू (सुतस्य) तैयार हुए वीररस का (पिब) पान कर। (मतिः न) मेधावी पुरुष के समान (चारुः) श्रेष्ठ तू (मदाय) उत्साह के लिए (मधोः) मधुर भक्ति-रस का (चकानः) प्रेमी बन ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा वीररस का पान कर, उत्साहवान् होकर, भक्तिरस की तरङ्गों से तरङ्गित होकर कठिन से कठिन कार्यों को कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣡न्द्र꣢ ज꣣ठ꣢रं꣣ न꣢व्यं꣣ न꣢ पृ꣣ण꣢स्व꣣ म꣡धो꣢र्दि꣣वो꣢ न । अ꣣स्य꣢ सु꣣त꣢स्य꣣ स्वा꣢꣫३र्नो꣡प꣢ त्वा꣣ म꣡दाः꣢ सु꣣वा꣡चो꣢ अस्थुः ॥९५३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (दिवः न मधोः) अन्तरिक्ष से प्राप्त मधुर वृष्टिजल के समान मधुर ब्रह्मानन्दरस के अंश से, तू (नव्यं न) नवीनसदृश (जठरम्) अपने उदर को अर्थात् स्वयं को (पृणस्व) तृप्त कर। (स्वः न) सूर्य के सदृश जगदीश्वर के पास से (सुतस्य) अभिषुत (अस्य) इस ब्रह्मानन्दरस की (सुवाचः) शुभ स्तुति-वाणियों को प्रेरित करनेवाली (मदाः) तृप्तियाँ (त्वा उप अस्थुः) तेरे सम्मुख उपस्थित हों ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है। ‘नव्यं न’ में उत्प्रेक्षा है, नित्य पुरातन भी आत्मा नवीन शरीर को धारण कर मानो नवीन हो जाता है ॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा ब्रह्मानन्द-रस से तृप्त होकर स्वयं सुख-शान्ति प्राप्त करके दूसरों को भी प्रदान करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣡न्द्र꣢स्तुरा꣣षा꣢ण्मि꣣त्रो꣢꣫ न ज꣣घा꣡न꣢ वृ꣣त्रं꣢꣫ यति꣣र्न꣢ । बि꣣भे꣡द꣢ ब꣣लं꣢꣫ भृगु꣣र्न꣡ स꣢सा꣣हे꣢꣫ शत्रू꣣न्म꣢दे꣣ सो꣡म꣢स्य ॥९५४॥
पदार्थः(इन्द्रः) मनुष्य का आत्मा (मित्रः न) सूर्य के समान (तुराषाट्) शीघ्रता के साथ विघ्नों को पराजित करता है, (यतिः न) संन्यासी के समान (वृत्रम्) पाप, दुर्व्यसन आदि को (जघान) नष्ट करता है, (भृगुः न) तपस्वी के समान (बलम्) आच्छादक अज्ञान को (बि भेद) छिन्न-भिन्न करता है और (सोमस्य) वीररस के (मदे) उत्साह में (शत्रून्) आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को (ससहे) परास्त करता है ॥३॥ यहाँ मालोपमा अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःवीररस के मद में मनुष्य का आत्मा सब अज्ञान, विघ्न, पाप आदियों को पराजित करने में समर्थ हो जाता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा और जीवात्मा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ पञ्चम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ तृतीय प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
गो꣣वि꣡त्प꣢वस्व वसु꣣वि꣡द्धि꣢रण्य꣣वि꣡द्रे꣢तो꣣धा꣡ इ꣢न्दो꣣ भु꣡व꣢ने꣣ष्व꣡र्पि꣢तः । त्व꣢ꣳ सु꣣वी꣡रो꣢ असि सोम विश्व꣣वि꣢꣫त्तं त्वा꣣ न꣢र꣣ उ꣡प꣢ गि꣣रे꣡म आ꣢꣯सते ॥९५५॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी तथा ऐश्वर्य की वर्षा करनेवाले परमात्मन् ! (गोवित्) गौएँ प्राप्त करानेवाले, (वसुवित्) धन प्राप्त करानेवाले और (हिरण्यवित्) सुवर्ण प्राप्त करानेवाले आप (पवस्व) हमें पवित्र करो। (रेतोधाः) वीर्यप्रदाता आप (भुवनेषु) लोकों में (अर्पितः) व्याप्त हो। हे (सोम) सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (त्वम्) आप (सुवीरः) श्रेष्ठ वीर प्राप्त करानेवाले और (विश्ववित्) सर्वज्ञाता (असि) हो। (तं त्वा) ऐसे आपकी (इमे) ये (नरः) उपासक जन (गिरा) स्तुतिवाणी से (उप आसते) उपासना कर रहे हैं ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर ने ही हमारे उपयोग के लिए बहुमूल्य सब पदार्थ निःशुल्क दिये हुए हैं। ऐसे उपकारक उसको हम कृतज्ञता के साथ स्मरण क्यों न करें ? ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
त्वं꣢ नृ꣣च꣡क्षा꣢ असि सोम वि꣣श्व꣢तः꣣ प꣡व꣢मान वृषभ꣣ ता꣡ वि धा꣢꣯वसि । स꣡ नः꣢ पवस्व꣣ व꣡सु꣢म꣣द्धि꣡र꣢ण्यवद्व꣣य꣡ꣳ स्या꣢म꣣ भु꣡व꣢नेषु जी꣣व꣡से꣢ ॥९५६॥
पदार्थःहे (सोम) सब जगत् को उत्पन्न करनेवाले, शुभ गुणों के प्रेरक परमात्मन् ! (त्वम्) आप (विश्वतः) सब ओर (नृचक्षाः) सब मनुष्यों के द्रष्टा (असि) हो। हे (पवमान) पवित्रकर्ता ! हे (वृषभ) सुखों की वर्षा करनेवाले ! आप (ता) उन दृश्यमान सब वस्तुओं में (विधावसि) व्याप्त हो। (सः) वह आप (वसुमत्) निवासक धन से युक्त, (हिरण्यवत्) सुवर्ण से युक्त, ज्योति से युक्त, वर्चस् से युक्त और यश से युक्त ऐश्वर्य को (नः) हमारे लिए (पवस्व) प्राप्त कराओ। (वयम्) हम (भुवनेषु) भूलोकों में (जीवसे) जीने के लिए (स्याम) समर्थ हों ॥२॥
भावार्थःजो परमेश्वर सर्वद्रष्टा, सर्वान्तर्यामी, धन-धान्य,चाँदी-सोना, राज्य आदि देनेवाला, ज्योतिप्रदाता, कीर्तिप्रदाता, आरोग्यप्रदाता और दीर्घायुप्रदाता है, उसकी उपासना करके उसके रक्षण तथा मार्ग-प्रदर्शन में हम सदा ही रहें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
ई꣣शान꣢ इ꣣मा꣡ भुव꣢꣯नानि꣣ ई꣡य꣢से युजा꣣न꣡ इ꣢न्दो ह꣣रि꣡तः꣢ सुप꣣꣬र्ण्यः꣢꣯ । ता꣡स्ते꣢ क्षरन्तु꣣ म꣡धु꣢मद्घृ꣣तं꣢꣫ पय꣣स्त꣡व꣢ व्र꣣ते꣡ सो꣢म तिष्ठन्तु कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ ॥९५७॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्विन्, चन्द्रमा के समान आह्लाददायक परमात्मन् ! आप (इमा भुवनानि) इन लोकों के (ईशानः) अधिष्ठाता होते हुए (ईयसे) व्याप्त हो। आप (सुपर्ण्यः हरितः) तीव्र गतिवाली सूर्यकिरणों को (युजानः) भूमि, चन्द्रमा आदि ग्रहोपग्रहों में जोड़ते हुए (ईयसे) व्याप्त होते हो। (ते) आपकी (ताः) वे सूर्य-किरणें (मधुमत्) मधुर, (घृतम्) प्रवाहशील(पयः) वर्षाजल को (क्षरन्तु) बरसायें। हे (सोम)शुभगुणप्रेरक परमात्मन् ! (तव व्रते) आपके उपदेश किये हुए कर्म में (कृष्टयः) प्रजाएँ (तिष्ठन्तु) स्थित रहें ॥३॥
भावार्थःजो परमेश्वर सब जगत् को उत्पन्न करके उसकी भली-भाँति व्यवस्था करता है, जो मेघों में जल निहित करता तथा बरसाता है, उसके बताये व्रतों का पालन करते हुए सब लोग सुखी हों ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानस्य विश्ववि꣣त्प्र꣢ ते꣣ स꣡र्गा꣢ असृक्षत । सू꣡र्य꣢स्येव꣣ न꣢ र꣣श्म꣡यः꣢ ॥९५८॥
पदार्थःहे (विश्ववित्) सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामिन् जगदीश्वर ! (पवमानस्य) पवित्रता देनेवाले (ते) आपकी (सर्गाः) पावन आनन्दधाराएँ (न) इस समय (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मयः इव) किरणों के समान (प्र असृक्षत) छूट रही हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की सर्वज्ञता और सर्वव्यापकता का विचार करके मनुष्यों को पाप-विचारों तथा पाप-कर्मों से स्वयं को हटाकर सदा पवित्र अन्तःकरणवाला होना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
के꣣तुं꣢ कृ꣣ण्व꣢न् दि꣣व꣢꣫स्परि꣣ वि꣡श्वा꣢ रू꣣पा꣡भ्य꣢र्षसि । स꣣मुद्रः꣡ सो꣢म पिन्वसे ॥९५९॥
पदार्थःहे (सोम) जगत् को उत्पन्न करनेवाले परमात्मन् ! आप (दिवः परि) चमकीले सूर्य से (केतुम्) प्रकाश को (कृण्वन्) करते हुए (विश्वा रूपा) सब रूपों में (अभ्यर्षसि) व्याप्त हो। वह आप (समुद्रः) मेघ के समान (पिन्वसे) रस की वर्षा करते हो ॥२॥ यहाँ लुप्तोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर जैसे सूर्य से प्रकाश को और बादल से वर्षा को बिखेरता है, वैसे ही ज्ञान का प्रकाश और आनन्द की वर्षा भी करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ज꣣ज्ञानो꣡ वाच꣢꣯मिष्यसि꣣ प꣡व꣢मान꣣ वि꣡ध꣢र्मणि । क्र꣡न्दन् दे꣣वो꣡ न सूर्यः꣢꣯ ॥९६०॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रताप्रदायक, परमकारुणिक परमेश्वर ! (विधर्मणि) ज्ञान, इच्छा, सुख आदि के धारणकर्ता जीवात्मा में (जज्ञानः) प्रकट होते हुए, (क्रन्दन्) उपदेश करते हुए आप (वाचम्) दिव्य सन्देश को (इष्यसि) प्रेरित करते हो और आप (देवः सूर्यः न) प्रकाशक सूर्य के समान हो ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःसबके अन्तरात्मा में पहले ही विद्यमान परमेश्वर प्राणायाम, धारणा, ध्यान आदि साधनों से जब प्रकट कर लिया जाता है, तब वह दिव्य सन्देश को सुनाता हुआ, सूर्य के समान प्रकाश देता हुआ, मार्गदर्शक होता है ॥३॥ षष्ठ अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ सोमा꣢꣯सो अधन्विषुः꣣ प꣡व꣢मानास꣣ इ꣡न्द꣢वः । श्री꣣णाना꣢ अ꣣प्सु꣡ वृ꣢ञ्जते ॥९६१॥
पदार्थः(पवमानासः) पवित्रता देनेवाले, (इन्दवः) दीप्त तथा रस से सराबोर करनेवाले (सोमासः) ब्रह्मानन्दरस (अधन्विषुः) जीवात्मा को प्राप्त हुए हैं। वे (श्रीणानाः)उस आत्मा को परिपक्व करते हुए (अप्सु) उसके द्वारा किये जाते हुए कर्मों में (वृञ्जते) अपने आपको छोड़ते हैं अर्थात् व्याप्त होते हैं ॥१॥
भावार्थःब्रह्म के पास से प्राप्त आनन्दरसों से परिपक्व और पूर्णता को प्राप्त मनुष्य शुभकर्मों का ही आचरण करता है, अशुभों का नहीं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ गावो꣢꣯ अधन्विषु꣣रा꣢पो꣣ न꣢ प्र꣣व꣡ता꣢ य꣣तीः꣢ । पु꣣नाना꣡ इन्द्र꣢꣯माशत ॥९६२॥
पदार्थः(प्रवता) ढालू प्रदेश पर (यतीः) बहते हुए (आपः न) जलों के समान (गावः) गतिमय अर्थात् सक्रिय ब्रह्मानन्दरूप सोमरस की धाराएँ (अभि अधन्विषुः) जीवात्मा की ओर दौड़ रही हैं। (पुनानाः) पवित्रता करती हुई वे (इन्द्रम्) जीवात्मा को (आशत) व्याप्त कर रही हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजल जैसे निचले प्रदेश की ओर दौड़ते हुए उस प्रदेश को पवित्र करते हैं, वैसे ही ब्रह्मानन्द नम्र जीवात्मा के प्रति दौड़ते हुए उसे पवित्र करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ प꣢वमान धन्वसि꣣ सो꣡मेन्द्रा꣢꣯य꣣ मा꣡द꣢नः । नृ꣡भि꣢र्य꣣तो꣡ वि नी꣢꣯यसे ॥९६३॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रता करनेवाले (सोम) आनन्दरस के भण्डार परमात्मन् ! (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (मादनः) आनन्ददायक आप (प्र धन्वसि) उसे प्राप्त होते हो। (नृभिः) उपासक नरों से (यतः) ध्यान किये हुए आप (वि नीयसे) विशेष रूप से हृदयप्रदेश में ले जाये जाते हो ॥३॥
भावार्थःअरणियों में व्याप्त भी अग्नि प्रकट होने के लिए मन्थन की अपेक्षा रखता है, वैसे ही हृदय और जीवात्मा में पहले से ही विद्यमान भी परमेश्वर प्रकट होने के लिए ध्यान की अपेक्षा करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्दो꣣ य꣡दद्रि꣢꣯भिः सु꣣तः꣢ प꣣वि꣡त्रं꣢ परि꣣दी꣡य꣢से । अ꣢र꣣मि꣡न्द्र꣢स्य꣣ धा꣡म्ने꣢ ॥९६४॥
पदार्थःहे (इन्दो) रस के भण्डार, चन्द्रमा के समान आह्लाददायक परमेश्वर ! (यत्) जब (अद्रिभिः) सिल-बट्टों के तुल्य ध्यानों से (सुतः) अभिषुत आप (पवित्रम्) पवित्र हृदय-देश में (परि दीयसे) व्याप्त होते हो, तब (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (धाम्ने) तेज के लिए, अर्थात् जीवात्मा को तेज से प्रदीप्त करने के लिए (अरम्) पर्याप्त होते हो ॥४॥
भावार्थःध्यान से प्रकट किया गया परमेश्वर जीवात्मा को तेज से और ब्रह्मवर्चस से अनुप्राणित कर देता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्व꣡ꣳ सो꣢म नृ꣣मा꣡द꣢नः꣣ प꣡व꣢स्व चर्षणी꣣धृ꣡तिः꣢ । स꣢स्नि꣣र्यो꣡ अ꣢नु꣣मा꣡द्यः꣢ ॥९६५॥
पदार्थःहे (सोम) रस के भण्डार, शुभकर्मों में प्रेरक, चन्द्रमा के समान आह्लाददायक, सर्वान्तर्यामी,परमपिता जगदीश्वर ! (नृमादनः) मनुष्यों को आनन्दित करनेवाले, (चर्षणीधृतिः) मनुष्यों को धारण करनेवाले (त्वम्) आप (पवस्व) हमें पवित्र कीजिए, (यः) जो आप (सस्निः) सर्वथा शुद्ध और (अनुमाद्यः) अनुनय द्वारा प्रसन्न करने योग्य हो ॥५॥
भावार्थःजिस विशुद्ध परमात्मा में पाप की कणिका भी नहीं है, वह उपासकों को निर्मल करके पवित्र आनन्दरस से तृप्त करता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व वृत्र꣣ह꣡न्त꣢म उ꣣क्थे꣡भि꣢रनु꣣मा꣡द्यः꣢ । शु꣡चिः꣢ पाव꣣को꣡ अद्भु꣢꣯तः ॥९६६॥
पदार्थःहे सोम ! हे रसागार, परमाह्लादक, जगदाधार परमेश्वर ! (वृत्रहन्तमः) पापों को अतिशय नष्ट करनेवाले, (उक्थेभिः) स्तोत्रों से (अनुमाद्यः) प्रसन्न करने योग्य, (शुचिः) पवित्र, (पावकः) पवित्र करनेवाले, (अद्भुतः) आश्चर्यकारी गुण-कर्म-स्वभाववाले आप, हम उपासकों को (पवस्व) पवित्र कीजिए ॥६॥
भावार्थःजो स्वयं पापों का सबसे बढ़कर विनाशक, पवित्र और अद्भुत है, वह अन्यों को भी निष्पाप, पवित्र अन्तःकरणवाला और अद्भुत क्यों न करे ? ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
शु꣡चिः꣢ पाव꣣क꣡ उ꣢च्यते꣣ सो꣡मः꣢ सु꣣तः꣡ स मधु꣢꣯मान् । दे꣣वावी꣡र꣢घशꣳस꣣हा꣢ ॥९६७॥
पदार्थः(सुतः) अभिषुत किया गया (स सोमः) वह रसों का भण्डार परमेश्वर (शुचिः) पवित्र, (पावकः) पवित्र करनेवाला, (मधुमान्) मधुर, (देवावीः) दिव्यगुणी विद्वानों की रक्षा करनेवाला और (अघशंसहा) पापप्रशंसकों का विनाशक (उच्यते) कहा जाता है ॥७॥
भावार्थःस्तुति और उपासना से प्रसन्न किया गया परमेश्वर परम आनन्द के समूह को प्रवाहित करता हुआ उपासकों द्वारा अत्यन्त मधुर और पापों का उन्मूलन करनेवाला अनुभव किया जाता है ॥७॥ इस खण्ड में परमात्मा के स्वरूपवर्णनपूर्वक उसकी स्तुति-प्रार्थना-उपासना का और ब्रह्मानन्द का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ षष्ठ अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ क꣣वि꣢र्दे꣣व꣡वी꣢त꣣ये꣢ऽव्या꣣ वा꣡रे꣢भिरव्यत । सा꣣ह्वा꣡न्विश्वा꣢꣯ अ꣣भि꣡ स्पृधः꣢꣯ ॥९६८॥
पदार्थः(कविः) क्रान्तद्रष्टा और मेधावी यह सोम अर्थात् रस का भण्डार परमात्मा (देववीतये) दिव्यगुणों को उत्पन्न करने के लिए (अव्याः) शुद्ध चित्तवृत्ति के (वारेभिः) विघ्ननिवारक उपाय प्रणव-जप आदियों से (प्र अव्यत) प्राप्त होता है। (साह्वान्) विपत्तियों को दूर करनेवाला वह (विश्वाः स्पृधः) सब स्पर्धा करनेवाले आन्तरिक एवं बाह्य शत्रुओं को (अभि) पराजित कर देता है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से सब दिव्यगुण स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं और विघ्नकारी शत्रु परास्त हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ हि ष्मा꣢꣯ जरि꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣢꣫ वाजं꣣ गो꣡म꣢न्त꣣मि꣡न्व꣢ति । प꣡व꣢मानः सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥९६९॥
पदार्थः(पवमानः) चित्त और आत्मा की शुद्धि करनेवाला (स हि) वह सोम अर्थात् जगत् को उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर(जरितृभ्यः) स्तोताओं के लिए (सहस्रिणम्) हजार संख्यावाले, (गोमन्तम्) प्रशस्त गाय, प्रशस्त वाणी आदि से युक्त (वाजम्) धन को, अथवा (गोमन्तम्) अन्तःप्रकाशयुक्त (वाजम्) आत्मबल को (आ इन्वति स्म) प्राप्त कराता है ॥२॥
भावार्थःप्रेय मार्ग का और श्रेय मार्ग का अवलम्बन करनेवाले लोगों से ध्यान किया हुआ परमेश्वर उन्हें मनोवाञ्छित सब श्रेय और प्रेय प्रदान कर देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣢रि꣣ वि꣡श्वा꣢नि꣣ चे꣡त꣢सा मृ꣣ज्य꣢से꣣ प꣡व꣢से म꣣ती꣡ । स꣡ नः꣢ सोम꣣ श्र꣡वो꣢ विदः ॥९७०॥
पदार्थःहे परमात्मन् ! (विश्वानि) सब सांसारिक भोगविलास आदि को (परि) छोड़कर, आप ही हमारे द्वारा(चेतसा) चित्त से और (मती) मति से (मृज्यसे)अलंकृत किये जा रहे हो, क्योंकि आप हमें (पवसे) पवित्र करते हो। हे (सोम) परमैश्वर्यशालिन् ! (सः) वह आप (नः) हमें (श्रवः) यश (विदः) प्राप्त कराओ ॥३॥
भावार्थःजब मनुष्य बाह्य विषयों से मन को हटाकर और परमात्मा में ही केन्द्रित करके परमात्मा का ध्यान करता है, तब वह उसे अत्यधिक पवित्रता और अविनश्वर यश प्रदान करता है ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष बृ꣣ह꣡द्यशो꣢꣯ म꣣घ꣡व꣢द्भ्यो ध्रु꣣व꣢ꣳ र꣣यि꣢म् । इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥९७१॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता परमैश्वर्यशाली परमेश्वर ! आप (मघवद्भ्यः) दानी धनियों को (ध्रुवम्) स्थिर (रयिम्) धन और (बृहत्) महान् (यशः) कीर्ति (अभ्यर्ष) प्राप्त कराओ और (स्तोतृभ्यः) उपासकों के लिए (इषम्) विज्ञान तथा इष्ट सुख (आ भर) लाओ ॥४॥
भावार्थःदानशील लोग ही धनप्राप्ति के अधिकारी होते हैं और जो परमात्मा की उपासना करते हैं, वे विवेकी तथा सुखी होते हैं ॥४॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्व꣡ꣳ राजे꣢꣯व सुव्र꣣तो꣡ गिरः꣢꣯ सो꣣मा꣡वि꣢वेशिथ । पु꣣नानो꣡ व꣢ह्ने अद्भुत ॥९७२॥
पदार्थःहे (वह्ने) जगत् के भार के ढोनेवाले, (अद्भुत) आश्चर्यकारी गुण-कर्म-स्वभाववाले, (सोम) सबको उत्पन्न करनेवाले, सद्भावों को प्रेरित करनेवाले, ऐश्वर्यशालिन् जगदीश्वर ! (पुनानः) हदयों को पवित्र करते हुए (त्वम्) आप (राजा इव) सम्राट् के समान (सुव्रतः) सुकर्म करनेवाले हो। आप (गिरः) वेदवाणियों में (आविवेशिथ) प्रविष्ट हो, अर्थात् वेदवाणियाँ आपका ही वर्णन कर रही हैं, [क्योंकि ऋग्वेद कहता है कि ‘जिसने ऋचा पढ़कर परमेश्वर को नहीं जाना, उसे ऋचा से क्या लाभ’] (ऋ० १।१६४।३९) ॥५॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे कोई राजा राष्ट्र को उन्नत करनेवाले ही कार्य करता है, वैसे ही विश्वब्रह्माण्ड के अधीश्वर परमात्मा के जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि सब कर्म शुभ, निःस्वार्थ तथा परोपकार करनेवाले ही होते हैं ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ वह्नि꣢꣯र꣣प्सु꣢ दु꣣ष्ट꣡रो꣢ मृ꣣ज्य꣡मा꣢नो꣣ ग꣡भ꣢स्त्योः । सो꣡म꣢श्च꣣मू꣡षु꣢ सीदति ॥९७३॥
पदार्थः(वह्निः) जगत् के भार को ढोनेवाला, (दुष्टरः) दुस्तर, (मृज्यमानः) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभावों से अलंकृत होनेवाला (स सोमः) वह जगत्पति परमेश्वर (अप्सु) नद, नदी, समुद्र, बादल आदि के जलों में (गभस्त्योः) सौम्य एवं तैजस रूप वाली चन्द्र-सूर्य की किरणों में, (चमूषु) द्यावापृथिवी के मध्य विद्यमान विभिन्न लोकों में (सीदति) बैठा हुआ है ॥६॥
भावार्थःअगणित ग्रह, उपग्रह, सूर्य, नक्षत्र आदियों से युक्त इस अति विस्तीर्ण विश्वब्रह्माण्ड में कोई कण भर भी स्थान नहीं है, जहाँ परमेश्वर विद्यमान न हो ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
क्री꣣डु꣡र्म꣢खो꣡ न म꣢꣯ꣳह꣣युः꣢ प꣣वि꣡त्र꣢ꣳ सोम गच्छसि । द꣡ध꣢त्स्तो꣣त्रे꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥९७४॥
पदार्थःहे (सोम) जगत् के सर्जन करने हारे परमात्मन् ! (क्रीडुः) खेल-खेल में विश्व को चलानेवाले तथा (मखः न) यज्ञ के समान (मंहयुः) दूसरों को लाभ पहुँचाने की इच्छावाले आप (स्तोत्रे) स्तुतिपरायण मनुष्य के लिए (सुवीर्यम्) सुवीर्य से युक्त आत्म-बल (दधत्) प्रदान करते हुए, उसके (पवित्रम्) निर्मल अन्तःकरण में (गच्छसि) व्याप्त होते हो ॥७॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःजैसे यज्ञ सबके उपकार के लिए होता है, वैसे ही परमेश्वर भी दूसरों के उपकार में लगा हुआ स्तोता के अन्तरात्मा में बल, उत्साह, पुरुषार्थ और कर्मयोग की प्रेरणा देता है ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
य꣡वं꣢यवं नो꣣ अ꣡न्ध꣢सा पु꣣ष्टं꣡पु꣢ष्टं꣣ प꣡रि꣢ स्रव । वि꣡श्वा꣢ च सोम꣣ सौ꣡भ꣢गा ॥९७५॥
पदार्थःहे (सोम) जगदाधार, सर्वैश्वर्यवान्, ब्रह्माण्ड के अधिपति परमात्मन् ! आप (अन्धसा) रस से (पुष्टंपुष्टम्) अत्यधिक परिपुष्ट (यवंयवम्) जौ आदि सब भोग्य पदार्थों को (विश्वा सौभगा च) और सब सौभाग्यों को (नः) हमारे लिए (परिस्रव) चारों और प्रवाहित करो ॥१॥
भावार्थःजिस जगत्पति ने सब बहुमूल्य पदार्थ रचे हैं, उसी की कृपा से मनुष्य अपने पुरुषार्थ द्वारा उन्हें पा सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्दो꣣ य꣢था꣣ त꣢व꣣ स्त꣢वो꣣ य꣡था꣢ ते जा꣣त꣡मन्ध꣢꣯सः । नि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ प्रि꣣ये꣡ स꣢दः ॥९७६॥
पदार्थःहे (इन्दो) चन्द्रमा के समान आह्लादक प्रेममय प्रभो ! (यथा) जैसी महान् (तव) आपकी (स्तवः) स्तुति एवं महिमा है और (यथा) जितना महान् (ते) आपके (अन्धसः) आनन्दरस का (जातम्) समूह है, वैसे ही महान् आप हमारे (प्रिये बर्हिषि) प्रिय हृदयासन पर (नि सदः) बैठिए ॥२॥
भावार्थःअपनी महिमा के अनुरूप महान् रसमय जगदीश्वर हमें प्राप्त होकर आनन्दरस से सराबोर कर दे ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣡ नो꣢ गो꣣वि꣡द꣢श्व꣣वि꣡त्पव꣢꣯स्व सो꣣मा꣡न्ध꣢सा । म꣣क्षू꣡त꣢मेभि꣣र꣡ह꣢भिः ॥९७७॥
पदार्थःहे (सोम) सर्वैश्वर्यसम्पन्न राजाधिराज परमात्मन् ! (उत) और, आप (अन्धसा) आनन्दरस के साथ (गोवित्) गौएँ प्राप्त करानेवाले वा दिव्य प्रकाश प्राप्त करानेवाले, (अश्ववित्) घोड़े प्राप्त करानेवाले वा प्राण-बल प्राप्त करानेवाले होकर (मक्षूतमेभिः अहभिः) शीघ्रतम दिनों में अर्थात् जल्दी ही (नः) हमें (पवस्व) प्राप्त होओ ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर हमें पुरुषार्थी बनाकर दिव्य संपत्ति वा भौतिक संपत्ति से परिपूर्ण करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
यो꣢ जि꣣ना꣢ति꣣ न꣡ जीय꣢꣯ते꣣ ह꣢न्ति꣣ श꣡त्रु꣢म꣣भी꣡त्य꣢ । स꣡ प꣢वस्व सहस्रजित् ॥९७८॥
पदार्थः(यः) जो आप (जिनाति) विघ्नों वा विपत्तियों को विनष्ट करते हो, (न जीयते) किसी से पराजित नहीं होते हो, प्रत्युत (अभीत्य) आक्रमण करके (शत्रुम्) शत्रु काम, क्रोध आदि को (हन्ति) मारते हो, (सः) वह आप (सहस्रजित्) हजारों आन्तरिक एवं बाह्य सम्पदाओं के विजेता होते हुए (पवस्व) हे पवमान सोम अर्थात् क्रियाशील जीवात्मन् ! प्रगति करो ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर का उपासक उसकी मित्रता प्राप्त करके प्रचण्ड से प्रचण्ड बाह्य तथा आन्तरिक शत्रुओं को जीत सकता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
या꣢स्ते꣣ धा꣡रा꣢ मधु꣣श्चु꣡तोऽसृ꣢꣯ग्रमिन्द ऊ꣣त꣡ये꣢ । ता꣡भिः꣢ प꣣वि꣢त्र꣣मा꣡स꣢दः ॥९७९॥
पदार्थःहे (इन्दो) आह्लाद देनेवाले, चन्द्रतुल्य, रस के भण्डार जगदीश्वर ! (याः ते) जो आपकी (मधुश्चुतः) मधुस्राविणी (धाराः) आनन्द की धाराएँ (ऊतये) हमारी रक्षा के लिए (असृग्रम्) आपके पास से छूटती हैं (ताभिः) उन धाराओं के साथ, आप (पवित्रम्) हमारे पवित्र अन्तरात्मा में (आसदः) विराजो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर के ध्यानी योगी लोग अपने अन्तरात्मा में झरते हुए आनन्द के झरने का अनुभव करते हुए परम तृप्ति प्राप्त करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सो꣢ अ꣣र्षे꣡न्द्रा꣢य पी꣣त꣡ये꣢ ति꣣रो꣡ वारा꣢꣯ण्य꣣व्य꣡या꣢ । सी꣡द꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ यो꣢नि꣣मा꣢ ॥९८०॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् प्रवाहशील ब्रह्मानन्दरस ! (ऋतस्य योनिम्) सत्य के आश्रय परमात्मा के (आसीदन्) पास स्थित हुआ (सः) वह प्रशंसनीय तू (अव्यया) कठिनाई से अतिक्रमण किये जाने योग्य तथा (वाराणि) योगमार्ग से रोकनेवाले व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि विघ्नों को (तिरः) तिरस्कृत करके (इन्द्राय पीतये) जीवात्मा के पान के लिए (अर्ष) प्रवाहित हो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के पास से बहा हुआ परमानन्द का प्रवाह स्तोता की आत्मभूमि को सींचता हुआ उसे सद्गुणरूप शस्यों से श्यामल कर देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्व꣡ꣳ सो꣢म꣣ प꣡रि꣢ स्रव꣣ स्वा꣡दि꣢ष्ठो꣣ अ꣡ङ्गि꣢रोभ्यः । व꣣रिवोवि꣢द्घृ꣣तं꣡ पयः꣢꣯ ॥९८१॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमेश्वर ! (स्वादिष्ठः) सबसे अधिक मधुर और (वरिवोवित्) ऐश्वर्य को प्राप्त करानेवाले (त्वम्) आप (अङ्गिरोभ्यः) प्राणायाम के अभ्यासी योगसाधकों के लिए (घृतम्) तेज और (पयः) आनन्दरस को (परि स्रव) क्षरित कीजिए ॥३॥
भावार्थःजो लोग परमात्मा के ध्यान में मग्न हो जाते हैं, उन्हें वह सर्वाधिक रसीला, सर्वाधिक मधुर और सर्वाधिक तेजस्वी अनुभूत होता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा के स्वरूपवर्णनपूर्वक उसकी स्तुति करने, उसका आह्वान करने और उससे आनन्दरस के प्रवाह की प्रार्थना करने के कारण इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ षष्ठ अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
त꣢व꣣ श्रि꣡यो꣢ व꣣꣬र्ष्य꣢꣯स्येव वि꣣द्यु꣢तो꣣ग्ने꣡श्चि꣢कित्र उ꣣ष꣡सा꣢मि꣣वे꣡त꣢यः । य꣡दो꣢꣯षधी꣣रभि꣡सृ꣢ष्टो꣣ व꣡ना꣢नि च꣣ प꣡रि꣢ स्व꣣यं꣡ चि꣢नु꣣षे꣡ अन्न꣢꣯मा꣣स꣡नि꣢ ॥९८२॥
पदार्थःहे (अग्ने) भौतिक अग्नि ! (तव) तेरी (श्रियः) शोभाएँ (वर्ष्यस्य) बरसाऊ मेघ की (विद्युतः इव) बिजलियों के समान और (उषसाम्) उषाओं के (इतयः इव) आगमनों के समान (आ चिकित्रे) ज्ञात होती हैं, (यत्) जब (ओषधीः) ओषधियों को (वनानि च) और जंगलों को (अभि) लक्ष्य करके (सृष्टः) प्रज्वलित हुआ तू (स्वयम्) अपने आप (आसनि) अपने ज्वालारूप मुख में (अन्नम्) खाद्य को (परि चिनुषे) चारों ओर से संगृहीत करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर की ही यह प्रशस्ति है कि उसने भयंकर ज्वालाओं से जटिल उस देदीप्यमान अग्नि को उत्पन्न किया है, जो जंगलों को भस्म करके नवीन वनस्पतियों को अङ्कुरित करने में सहायक होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
वा꣡तो꣢पजूत इषि꣣तो꣢꣫ वशा꣣ꣳ अ꣡नु तृ꣣षु꣢꣫ यदन्ना꣣ वे꣡वि꣢षद्वि꣣ति꣡ष्ठ꣢से । आ꣡ ते꣢ यतन्ते र꣣थ्यो꣢३꣱य꣢था꣣ पृ꣢थ꣣क्श꣡र्धा꣢ꣳस्यग्ने अ꣣ज꣡र꣢स्य꣣ ध꣡क्ष꣢तः ॥९८३॥
पदार्थःहे (अग्ने) भौतिक अग्नि ! (वातोपजूतः) वायु से कम्पित किया हुआ, (वशान् अनु) अभीष्ट वनस्पतियों को लक्ष्य करके (इषितः) प्रेरित हुआ तू (तृषु) तुरन्त (यत्) जब (अन्ना) अन्नों अर्थात् भक्ष्य वनस्पति आदियों में (वेविषत्) व्याप्त होता हुआ (वितिष्ठसे) इधर-उधर चञ्चल होता है, तब (अजरस्य) जीर्ण न होते हुए तथा (धक्षतः) जलाते हुए (ते) तुझ अग्नि के (शर्धांसि) ज्वालारूपी तेज (रथ्यः यथा) रथारोही योद्धाओं के समान (पृथक्) पृथक्-पृथक् दिशाओं में (आयतन्ते) उठते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे रथारोही योद्धा लोग संग्राम में पृथक्-पृथक् विभिन्न दिशाओं में शत्रुओं पर प्रहार करते हैं, वैसे ही जंगलों को भस्म करने के लिए उद्यत अग्नि-ज्वालाएँ पृथक्-पृथक् विभिन्न दिशाओं में जलाने का कार्य करती हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
मे꣣धाकारं꣢ वि꣣द꣡थ꣢स्य प्र꣣सा꣡ध꣢नम꣣ग्नि꣡ꣳ होता꣢꣯रं परि꣣भू꣡त꣢रं म꣣ति꣢म् । त्वा꣡मर्भ꣢꣯स्य ह꣣वि꣡षः꣢ समा꣣न꣢꣫मित् त्वां म꣣हो꣡ वृ꣢णते꣣ ना꣢न्यं त्वत् ॥९८४॥
पदार्थः(मेधाकारम्) धारणावती बुद्धि के प्रदाता, (विदथस्य) ब्रह्माण्ड-यज्ञ के वा मनुष्यों के जीवनयज्ञ के (प्रसाधनम्) सिद्ध करनेवाले, (होतारम्) सुख आदि के दाता, (परिभूतरम्) अतिशय रूप से विघ्नों को दूर करनेवाले, (मतिम्) सर्वज्ञ (त्वाम् अग्निम्) तुझ अग्रनायक को (समानम् इत्) समानरूप से (अर्भस्य हविषः) छोटे त्याग के लिए और (त्वाम्) तुझे ही (महः) महान् त्याग के लिए, लोग (वृणते) चुनते हैं, अर्थात् आदर्शरूप से अपने सम्मुख स्थापित करते हैं, (त्वत् अन्यम्) तुझसे भिन्न को (न) नहीं ॥३॥ यहाँ विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार है। ‘तारम्’ ‘तरम्’ में छेकानुप्रास है ॥३॥
भावार्थःत्याग और परोपकार के लिए परमेश्वर को ही आदर्शरूप में सबको अपने सम्मुख रखना चाहिए और उसके पीछे चलकर स्वयं भी त्याग एवं परोपकार करना चाहिए ॥३॥
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छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
पु꣣रूरु꣡णा꣢ चि꣣द्ध्य꣡स्त्यवो꣢꣯ नू꣣नं꣡ वां꣢ वरुण । मि꣢त्र꣣ व꣡ꣳसि꣢ वाꣳ सुम꣣ति꣢म् ॥९८५॥
पदार्थःहे (मित्र वरुण) परमात्मा और जीवात्मा, राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री, अध्यापक और उपदेशक, प्राण-अपान ! (वाम्) तुम्हारी (अवः) रक्षा (नूनम्) निश्चय ही (पुरूरुणा चित् हि) अतिशय विशाल (अस्ति) है। इसलिए मैं (वाम्) तुम्हारी (सुमतिम्) अनुग्रह-बुद्धि को (वंसि) भजूँ ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा-जीवात्मा, राष्ट्रपति-प्रधानमन्त्री, अध्यापक-उपदेशक और प्राण-अपान की सुरक्षा पाकर शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक दृष्टि से हम अति उन्नत हो सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
ता꣡ वा꣢ꣳ स꣣म्य꣡ग꣢द्रुह्वा꣣णे꣡ष꣢मश्याम꣣ धा꣡म꣢ च । व꣣यं꣡ वां꣢ मित्रा स्याम ॥९८६॥
पदार्थःहे (अद्रुह्वाणा) द्रोह न करनेवाले, मित्र-वरुण अर्थात् परमात्मा-जीवात्मा, राष्ट्रपति-प्रधानमन्त्री, अध्यापक-उपदेशक और प्राण-अपानो ! (ता वाम्) उन तुम दोनों की हम स्तुति करते हैं। तुम्हारी अनुकूलता से हम (इषम्) अन्न, रस, धन, विज्ञान आदि (धाम च) और तेज (सम्यक्) समुचित प्रकार से (अश्याम) प्राप्त करें। हे (मित्रा) सबके मित्रो ! (वयम्) हम स्तोता लोग (वाम्) तुम्हारे (स्याम) हो जाएँ ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा-जीवात्मा, राष्ट्रपति-प्रधानमन्त्री, अध्यापक-उपदेशक और प्राण-अपान यथायोग्य उपयोग किये जाने पर महान् उपकार करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
पा꣣तं꣡ नो꣢ मित्रा पा꣣यु꣡भि꣢रु꣣त꣡ त्रा꣢येथाꣳ सुत्रा꣣त्रा꣢ । सा꣣ह्या꣢म꣣ द꣡स्यू꣢न् त꣣नू꣡भिः꣢ ॥९८७॥
पदार्थःहे (मित्रा) मित्रभूत परमात्मा-जीवात्मा, राष्ट्रपति-प्रधानमन्त्री, अध्यापक-उपदेशक वा प्राण-अपानो ! तुम (पायुभिः) पालन-साधनों से (नः) हमारी (पातम्) पालना करो। (उत) और (सुत्रात्रा) उत्तम त्राण करनेवाले गुण-समूह से (त्रायेथाम्) हमारा त्राण करो। तुम्हारी सहायता से हम (तनूभिः) शरीरों द्वारा (दस्यून्) क्षयकारी आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को (सासह्याम) पराजित कर देवें ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा-जीवात्मा, राष्ट्रपति-प्रधानमन्त्री, अध्यापक-उपदेशक और प्राण-अपान की सहायता पाकर पुरुषार्थ करके हम सदा ही सुरक्षित हो सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣣त्ति꣢ष्ठ꣣न्नो꣡ज꣢सा स꣣ह꣢ पी꣣त्वा꣡ शिप्रे꣢꣯ अवेपयः । सो꣡म꣢मिन्द्र च꣣मू꣢ सु꣣त꣢म् ॥९८८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्नों का विदारण करने में समर्थ जीवात्मन् ! तू (ओजसा सह) तेज के साथ (उत्तिष्ठन्) ऊँचा उठता हुआ (चमू) मन-बुद्धि रूप कटोरों में (सुतम्) निचोड़े गए (सोमम्) वीर-रस को (पीत्वा) पीकर (शिप्रे) जबड़े आदि अङ्गों को (अवेपयः) चलाता है। [जबड़े आदि को चलाना शत्रु के प्रति उग्रभाव के प्रकाशनार्थ होता है] ॥१॥
भावार्थःमनुष्य अपने आत्मा में वीरता के भावों को तरङ्गित करके, सब विघ्नों का विदारण करके आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं का उच्छेद करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡नु꣢ त्वा꣣ रो꣡द꣢सी उ꣣भे꣡ स्पर्ध꣢꣯मानमददेताम् । इ꣢न्द्र꣣ य꣡द्द꣢स्यु꣣हा꣡भ꣢वः ॥९८९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) शरीरधारी जीवात्मन् ! (स्पर्धमानम्) स्पर्धा करते हुए (त्वा) तुझे (उभे रोदसी) धरती-आकाश दोनों अथवा माता-पिता दोनों (अनु अददेताम्) अनुकूल उत्साह वा साधुवाद देते हैं, (यत्) जब तू (दस्युहा) दस्युओं का विनाशक (अभवः) होता है ॥२॥
भावार्थःजब मनुष्य उत्साहित होकर दुर्विचारों और दुष्टजनों का वध करता है, तब उस कार्य में सब उसका समर्थन करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
वा꣡च꣢म꣣ष्टा꣡प꣢दीम꣣हं꣡ नव꣢꣯स्रक्तिमृता꣣वृ꣡ध꣢म् । इ꣢न्द्रा꣣त्प꣡रि꣢त꣣꣬न्वं꣢꣯ ममे ॥९९०॥
पदार्थःशिष्य कहा रहा है—(अहम्) मैं शिष्य (इन्द्रात्) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य से (अष्टापदीम्) सात विभक्तियों तथा सम्बोधन—इन आठ पदों से युक्त अर्थात् सुबन्तरूप, (नवस्रक्तिम्) प्रथम, मध्यम,उत्तम पुरुषों के एकवचन, द्विवचन, बहुवचन रूप नौ विभागों से युक्त अर्थात् तिङन्तरूप, (ऋतावृधम्) सत्यज्ञान को बढ़ानेवाली, (तन्वम्) विस्तृत (वाचम्)वाणी को (परिममे) ग्रहण करता हूँ। अभिप्राय यह है कि सब सुबन्त और तिङन्त रूपों को जानकर सम्पूर्ण वाङ्मय में पण्डित हो जाता हूँ ॥३॥
भावार्थःसब विद्यार्थियों को चाहिए कि व्याकरणशास्त्र को भली-भाँति पढ़कर तथा अन्य वेदाङ्गों में भी प्रवीण होकर, वेदार्थों को जानकर, विद्वान् होकर अपने विद्यार्थियों को पढ़ाएँ ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी यु꣣वा꣢मि꣣मे꣢३ऽभि꣡ स्तोमा꣢꣯ अनूषत । पि꣡ब꣢तꣳ शम्भुवा सु꣣त꣢म् ॥९९१॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन तथा राजा और सेनापति ! (युवाम्) तुम्हारी (इमे स्तोमाः) ये स्तोत्र (अभि अनूषत) प्रशंसा कर रहे हैं। हे (शम्भुवा) कल्याणकारियो ! तुम (सुतम्) अभिषुत वीररस को (पिबतम्) पीओ ॥१॥
भावार्थःवीरता और उद्बोधन को प्राप्त करके ही मनुष्य के आत्मा और मन तथा राजा और सेनापति वैयक्तिक एवं सामाजिक उन्नति करने योग्य होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
या꣢ वा꣣ꣳ स꣡न्ति꣢ पुरु꣣स्पृ꣡हो꣢ नि꣣यु꣡तो꣢ दा꣣शु꣡षे꣣ नरा । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ ता꣢भि꣣रा꣡ ग꣢तम् ॥९९२॥
पदार्थःहे (नरा) नेता (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन वा राजा एवं सेनापति ! (दाशुषे) त्यागशील, परोपकारी जन के लिए (याः) जो (वाम्) तुम्हारी (नियुतः) लाख संख्यावाली (पुरुस्पृहः) बहुत महत्वाकांक्षावाली उदात्त कामनाएँ हैं, (ताभिः) उनके साथ तुम (आ गतम्) आओ ॥२॥
भावार्थःशरीर में मनुष्य का अन्तरात्मा और मन तथा राष्ट्र में राजा और सेनाध्यक्ष दूसरों का हित करनेवाले मनुष्य का ही उपकार करते हैं, स्वार्थ की कीचड़ से लिप्त मनुष्य का नहीं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
ता꣢भि꣣रा꣡ ग꣢च्छतं न꣣रो꣢पे꣣द꣡ꣳ सव꣢꣯नꣳ सु꣣त꣢म् । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥९९३॥
पदार्थःहे (नरा) नेता (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन एवं राजा और सेनापति ! (इदं सवनम् उप सुतम्) तुम्हारे लिए यह उद्बोधन स्तोत्र गाया गया है। तुम (ताभिः) उन पूर्वमन्त्रोक्त लाख उदात्त कामनाओं के साथ(सोमपीतये) वीररस के पानार्थ (आगच्छतम्) आओ ॥३॥
भावार्थःमनुष्य के आत्मा में तथा राजा एवं सेनाध्यक्ष में जो बहुत सी महत्त्वाकाङ्क्षाएँ रहती हैं, वे वीरता से ही सिद्ध की जा सकती हैं। आध्यात्मिक उत्कर्ष भी वीरता से ही सम्भव है, आलसीपन से नहीं ॥३॥ इस खण्ड में अग्नि की स्तुति द्वारा परमात्मा की स्तुति का वर्णन करने से, मित्र-वरुण नाम से परमात्मा-जीवात्मा एवं प्राण-अपान का वर्णन होने से, इन्द्र नाम से जीवात्मा को उद्बोधन होने से, इन्द्राग्नी नाम से आत्मा और मन को उद्बोधन होने से तथा प्रसङ्गतः मित्र-वरुण नाम से राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री तथा अध्यापक एवं उपदेशक और इन्द्राग्नी नाम से राजा एवं सेनापति के भी कर्त्तव्य आदि कथित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ षष्ठ अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡र्षा꣢ सोम द्यु꣣म꣡त्त꣢मो꣣ऽ꣡भि द्रोणा꣢꣯नि꣣ रो꣡रु꣢वत् । सी꣢द꣣न्यो꣢नौ꣣ व꣢ने꣣ष्वा꣢ ॥९९४॥
पदार्थःहे (सोम) जगत् के स्रष्टा परमात्मन् ! (योनौ) अन्तरिक्ष में (वनेषु) जलों में (आसीदन्) रहनेवाले, (द्युमत्तमः) देदीप्यमान, (रोरुवत्) गर्जना करते हुए बिजलीरूप अग्नि के समान, (योनौ) घर में और (वनेषु) जंगलों में, सब जगह (आसीदन्) स्थित हुए, (द्युमत्तमः) सब से बढ़कर तेजस्वी (रोरुवत्) कर्तव्य का उपदेश करनेवाले आप (द्रोणानि अभि) आत्मा, मन, बुद्धि आदि द्रोणकलशों के प्रति (अर्ष) आइए ॥१॥ यहाँ श्लेषमूलक वाचकलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःघर हो या जंगल हो, पहाड़ हो या गुफा हो, नदियाँ हों या समुद्र हो, भूमि हो या आकाश हो, बिजली हो या अन्तरिक्ष हो, शरीर हो या आत्मा हो, सभी जगह विराजमान भी जगदीश्वर जब तक ध्यान से प्रकाशित न हो जाए, तब तक प्रत्यक्ष नहीं होता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣प्सा꣡ इन्द्रा꣢꣯य वा꣣य꣢वे꣣ व꣡रु꣢णाय म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । सो꣡मा꣢ अर्षन्तु꣣ वि꣡ष्ण꣢वे ॥९९५॥
पदार्थःहे (सोम) जगत् के स्रष्टा परमात्मन् ! (योनौ) अन्तरिक्ष में (वनेषु) जलों में (आसीदन्) रहनेवाले, (द्युमत्तमः) देदीप्यमान, (रोरुवत्) गर्जना करते हुए बिजलीरूप अग्नि के समान, (योनौ) घर में और (वनेषु) जंगलों में, सब जगह (आसीदन्) स्थित हुए, (द्युमत्तमः) सब से बढ़कर तेजस्वी (रोरुवत्) कर्तव्य का उपदेश करनेवाले आप (द्रोणानि अभि) आत्मा, मन, बुद्धि आदि द्रोणकलशों के प्रति (अर्ष) आइए ॥१॥ यहाँ श्लेषमूलक वाचकलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःघर हो या जंगल हो, पहाड़ हो या गुफा हो, नदियाँ हों या समुद्र हो, भूमि हो या आकाश हो, बिजली हो या अन्तरिक्ष हो, शरीर हो या आत्मा हो, सभी जगह विराजमान भी जगदीश्वर जब तक ध्यान से प्रकाशित न हो जाए, तब तक प्रत्यक्ष नहीं होता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣡षं꣢ तो꣣का꣡य꣢ नो꣣ द꣡ध꣢द꣣स्म꣡भ्य꣢ꣳ सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥९९६॥
पदार्थःहे (सोम) परमैश्वर्यशालिन् जगदीश्वर ! आप (नः) हमारे (तोकाय) सन्तान के लिए और (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (विश्वतः) सब ओर से (इषम्) अन्न तथा विज्ञान (दधत्) प्रदान करते हुए (सहस्रिणम्) हजार संख्यावाले आन्तरिक तथा बाह्य ऐश्वर्य को (आ पवस्व) प्राप्त कराइये ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर के ध्यान से बल पाकर मनुष्य सारे विशाल दिव्य एवं भौतिक ऐश्वर्य को पा सकता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
सो꣡म꣢ उ ष्वा꣣णः꣢ सो꣣तृ꣢भि꣣र꣢धि꣣ ष्णु꣢भि꣣र꣡वी꣢नाम् । अ꣡श्व꣢येव ह꣣रि꣡ता꣢ याति꣣ धा꣡र꣢या म꣣न्द्र꣡या꣢ याति꣣ धा꣡र꣢या ॥९९७॥
पदार्थः(सोतृभिः) गोदुग्ध को छाननेवालों द्वारा (अवीनां स्नुभिः) भेड़ के बालों से निर्मित, पर्वतशिखर के समान फैले हुए वस्त्रों से (अधिष्वाणः) छाना जाता हुआ (सोमः) गोदुग्ध (अश्वया इव) शीघ्रगामिनी नदी के समान (हरिता) तेज (धारया) धारा से (याति) कड़ाहों में छनता है, (मन्द्रया) आनन्ददायिनी (धारया) धारा के साथ (याति) कड़ाहों में छनता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है। ‘याति धारया’ की पुनरुक्ति में लाटानुप्रास है ॥१॥
भावार्थःजिस देश में गोदुग्ध की धाराएँ बहती हैं, वहाँ के लोग हृष्ट, पुष्ट, अधिक बलवान् होते हुए, दीर्घायुष्य पाते हुए, चिरकाल तक यज्ञादि कर्म करते हुए और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करते हुए आनन्दित रहते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
अ꣣नूपे꣢꣫ गोमा꣣न्गो꣡भि꣢रक्षाः꣣ सो꣡मो꣢ दु꣣ग्धा꣡भि꣢रक्षाः । स꣣मुद्रं꣢꣫ न सं꣣व꣡र꣢णान्यग्मन्म꣣न्दी꣡ मदा꣢꣯य तोशते ॥९९८॥
पदार्थः(यदा) जब (गोमान्) गायों का स्वामी (गोभिः) गायों के साथ (अनूपे) अधिक जलवाले देश में (अक्षाः) निवास करता है, तब (दुग्धाभिः) दुही हुई भी गायों से (सोमः) दूध (अक्षाः) झरता रहता है, अर्थात् गायों में इतना अधिक दूध होता है कि दुह लेने के बाद भी पर्याप्त दूध थनों में बचा होकर चूता रहता है। (समुद्रं न) समुद्र में जैसे (संवरणानि) नदियों के जल पहुँचते हैं, वैसे ही गायों के दूध विशाल कड़ाह आदि में (अग्मन्) जाते हैं। (मन्दी) हर्षदायक गोदुग्ध-रूप सोम (मदाय) गोस्वामियों के हर्ष के लिए (तोशते) दुहने के समय शब्द करता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है। ’रक्षाः’ की आवृत्ति में यमक है ॥२॥
भावार्थःजिस घर या परिवार में बहुत दूध देनेवाली धेनुएँ हैं, वहाँ के निवासी यथेच्छ गाय के दूध, दही, मक्खन आदि का सेवन करते हुए और गाय के घी से यज्ञ करते हुए तथा परमात्मा का ध्यान करते हुए सदा खूब प्रसन्न रहते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
य꣡त्सो꣢म चि꣣त्र꣢मु꣣꣬क्थ्यं꣢꣯ दि꣣व्यं꣡ पार्थि꣢꣯वं꣣ व꣡सु꣢ । त꣡न्नः꣢ पुना꣣न꣡ आ भ꣢꣯र ॥९९९॥
पदार्थःहे (सोम) दिव्य आनन्द, विद्या आदि परम ऐश्वर्य से युक्त जगदीश्वर वा आचार्य ! (यत्) जो (चित्रम्) अद्भुत, (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय, (दिव्यम्) योगसिद्धि,मोक्ष आदि दिव्य, तथा (पार्थिवम्) सोना, हीरे, मोती, चक्रवर्त्ती राज्य आदि भौतिक (वसु) धन है, (तत्) उस धन को, आप (नः) हमें (पुनानः) पवित्र करते हुए (आ भर) प्रदान कीजिए ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा को प्राप्त हुए और आचार्य द्वारा तरह-तरह की आध्यात्मिक तथा भौतिक विद्याओं में पारङ्गत किये हुए हम सकल दिव्य एवं पार्थिव धन को एकत्र कर सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣡षा꣢ पुना꣣न꣡ आयू꣢꣯ꣳषि स्त꣣न꣢य꣣न्न꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ह꣢रिः꣣ स꣢꣫न्योनि꣣मा꣡स꣢दः ॥१०००॥
पदार्थःहे परमात्मन् वा आचार्य ! (वृषा) आनन्द, विद्या आदि की वर्षा करनेवाले आप (आयूंषि) हमारे जीवनों को (पुनानः) पवित्र करते हुए (बर्हिषि अधि) अध्यात्मयज्ञ वा विद्यायज्ञ में (स्तनयन्) उपदेश करते हुए (हरिः सन्) पाप, दुर्व्यसन, दुःख आदि को हरनेवाले होते हुए (योनिम्) आत्मारूप सदन में वा गुरुकुल-सदन में (आ असदः) विराजमान होते हो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा हमारे हृदय में स्थित होकर अपनी प्रेरणा द्वारा और गुरु गुरुकुल में स्थित होकर सब विद्याओं के पढ़ाने तथा चरित्रनिर्माण के द्वारा हमारा उपकार करते हैं, इसलिए उनका पूजन और सत्कार सबको करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
यु꣣व꣡ꣳ हि स्थः स्वः꣢꣯पती꣣ इ꣡न्द्र꣢श्च सोम꣣ गो꣡प꣢ती । ई꣣शाना꣡ पि꣢प्यतं꣣ धि꣡यः꣢ ॥१००१॥
पदार्थःहे (सोम) जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! आप (इन्द्रः च) और अज्ञान को दूर करनेवाले आचार्य (युवं हि) तुम दोनों ही (स्वःपती) ज्ञानप्रकाश के स्वामी और (गोपती) वाणी के अधिपति (स्थः) हो। (ईशाना) ज्ञान और वाणी के स्वामी आप दोनों हमारी (धियः) श्रेष्ठ प्रज्ञाओं और श्रेष्ठ क्रियाओं को (पिप्यतम्) बढ़ाओ ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से और गुरु के सत्कार से श्रेष्ठ सत्यज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य अपने जीवन को उन्नत कर सकते हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, ब्रह्मानन्द-रस, आचार्य एवं प्रसङ्गतः गौओं तथा गोदुग्ध का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ षष्ठ अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
इ꣢न्द्रो꣣ म꣡दा꣢य वावृधे꣣ श꣡व꣢से वृत्र꣣हा꣡ नृ꣢꣯भिः । त꣢꣫मिन्म꣣ह꣢त्स्वा꣣जि꣢षू꣣ति꣡मर्भे꣢꣯ हवामहे꣣ स꣡ वाजे꣢꣯षु꣣ प्र꣡ नो꣡ऽविषत् ॥१००२॥
पदार्थः(वृत्रहा) पाप-नाशक (इन्द्रः) वीर मन (नृभिः) विजय की आकाङ्क्षावाले मनुष्यों द्वारा (मदाय) हर्ष के लिए और (शवसे) बल के लिए (वावृधे) बढ़ाया अर्थात् उत्साहित किया जाता है। (ऊतिम्) रक्षक (तम् इत्) उस मन को ही, हम (महत्सु) बड़े (आजिषु) आन्तरिक और बाह्य संग्रामों में तथा (अल्पे) छोटे संग्राम में (हवामहे) पुकारते हैं। (सः) वह मन (वाजेषु) उन युद्धों में (नः) हमारी (अविषत्) रक्षा करे ॥१॥
भावार्थःमनुष्य का मन यदि मर गया तो वह जीवन में कोई भी उन्नति नहीं कर सकता और मन यदि उत्साह से भर गया तो सब विघ्नों को और शत्रुओं को तिरस्कृत करता हुआ वह सब जगह विजय प्राप्त करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢सि꣣ हि꣡ वी꣢र꣣ से꣢꣫न्योऽसि꣣ भू꣡रि꣢ पराद꣣दिः꣢ । अ꣡सि꣢ द꣣भ्र꣡स्य꣢ चिद्वृ꣣धो꣡ यज꣢꣯मानाय शिक्षसि सुन्व꣣ते꣡ भूरि꣢꣯ ते꣣ व꣡सु꣢ ॥१००३॥
पदार्थःहे (वीर) पराक्रमशील मन ! तू (सेन्यः) सेनाओं में निपुण अर्थात् सेनापति (असि) है और (भूरि) भूरि-भूरि (पराददिः) शत्रुओं को दूर फेंकनेवाला (असि) है। साथ ही (दभ्रस्य चित्) क्षुद्र का भी (वृधः) बढ़ानेवाला (असि) है। तू (यजमानाय) यजनशील, परोपकारी मनुष्य के लिए (शिक्षसि) बल प्रदान करता है। (सुन्वते) वीररस उत्पन्न करनेवाले मनुष्य को (ते) तेरा (भूरि) बहुत अधिक (वसु) ऐश्वर्य प्राप्त होता है ॥२॥
भावार्थःजब मनुष्य अपने मन को सेनापति पद पर अभिषिक्त करके आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को जीतने का यत्न करते हैं, तब विजय निश्चित मिलती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
य꣢दु꣣दी꣡र꣢त आ꣣ज꣡यो꣢ धृष्णवे धीयते धनम् । युङ्क्ष्वा मदच्युता हरी कं हनः कं वसौ दधोऽस्माँ इन्द्र वसौ दधः ॥१००४॥
पदार्थः(यत्) जब (आजयः) आन्तरिक या बाह्य देवासुरसंग्राम (उदीरते) उठते हैं, तब (धृष्णवे) जो शत्रुओं को परास्त करनेवाला है, उसी मनुष्य को (धनम्) ऐश्वर्य (धीयते) मिलता है। हे (इन्द्र) विघ्नों को विदीर्ण करनेवाले मेरे वीर मन ! तू (मदच्युता) शत्रुओं के मद को चूर करनेवाले (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-रूप घोड़ों को (युङ्क्ष्व) ज्ञान के ग्रहण और कर्म के करने के लिए नियुक्त कर। (कम्) किसी को अर्थात् शत्रु को (हनः) मार, (कम्) किसी को अर्थात् मित्र को (वसौ दधः) ऐश्वर्य में स्थापित कर। (अस्मान्) हम मित्रों को (वसौ दधः) ऐश्वर्य में स्थापित कर अर्थात् ऐश्वर्य प्रदान कर ॥३॥
भावार्थःआन्तरिक या बाह्य युद्धों के उपस्थित होने पर मन को उत्साहित करके, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को अपने-अपने विषयों में भली-भाँति नियुक्त करके, ठीक-ठीक शत्रुओं की गतिविधि जानकर, उन पर प्रहार करके सब शत्रुओं को पराजित करना और मित्रों को सत्कृत करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
स्वा꣣दो꣢रि꣣त्था꣡ वि꣢षू꣣व꣢तो꣣ मधोः पिबन्ति गौर्यः । या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभथा वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥१००५॥
पदार्थः(गौर्यः) चमकीली सूर्यकिरणें (इत्था) सचमुच (वि-सुवतः) विशेषरूप से भूमि पर बरसते हुए बादल के (स्वादोः) स्वादु (मधोः) मधुर जल का (पिबन्ति) पान करती हैं, (याः) जो सूर्यकिरणें (वृष्णा) वर्षा करनेवाले (इन्द्रेण) सूर्य की (सयावरीः) सहगामिनी होती हुई (शोभथा) शोभन प्रकार से (मदन्ति) आनन्दित करती हैं। (वस्वीः) निवासक वे किरणें (स्वराज्यम्) सूर्य के स्वराज्य के (अनु) अनुकूल चलती हैं ॥१॥
भावार्थःअहो, सूर्य का स्वराज्य कैसा दर्शनीय है ! किस प्रकार सूर्य-किरणें निर्बाध होकर मेघ से बरसाये हुए नदी, नद, समुद्र आदि में व्याप्त जल को पीकर, पुनः बादल बनाकर फिर मेघ-जल को भूमि पर बरसा देती हैं। वैसे ही हमें भी चाहिए कि हम भी आन्तरिक स्वराज्य तथा अपने राष्ट्र के स्वराज्य की अर्चना करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
ता꣡ अ꣢स्य पृशना꣣यु꣢वः꣣ सो꣡म꣢ꣳ श्रीणन्ति꣣ पृ꣡श्न꣢यः । प्रि꣣या꣡ इन्द्र꣢꣯स्य धे꣣न꣢वो꣣ व꣡ज्र꣢ꣳ हिन्वन्ति꣣ सा꣡य꣢कं꣣ व꣢स्वी꣣र꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥१००६॥
पदार्थः(अस्य) इस इन्द्र नामक सूर्य की (ताः पृश्नयः) वे रङ्ग-बिरङ्गी किरणें (पृशनायुवः) मानो चन्द्रमा के साथ स्पर्श को चाहती हुई (सोमम्) चन्द्रमा को (श्रीणन्ति) प्रकाश से परिपक्व करती हैं। (इन्द्रस्य) सूर्य की, वे (प्रियाः) प्रिय (धेनवः) किरणें (सायकम्) दुर्भिक्ष आदि का अन्त करनेवाले (वज्रम्) मेघ के विद्युत् रूप वज्र को (हिन्वन्ति) प्रेरित करती हैं। इस प्रकार (वस्वीः) वे निवासक किरणें (स्वराज्यम्) सूर्य के स्वराज्य के (अनु) अनुकूल चलती हैं ॥२॥ यहाँ ‘पृशनायुवः’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःसूर्य-किरणों का ही यह महान् कार्य है कि वे सूर्य के स्वराज्य का अनुसरण करती हुई चन्द्र आदि लोकों को प्रकाशित करती हैं, मेघों में विद्युत् रूप वज्र को गरजाती हुई वर्षा करती हैं और सबको बसाती हैं। उसी प्रकार मनुष्यों को भी अपना आन्तरिक एवं बाह्य स्वराज्य प्रकाशित करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
ता꣡ अ꣢स्य꣣ न꣡म꣢सा꣣ स꣡हः꣢ सप꣣र्य꣢न्ति꣣ प्र꣡चे꣢तसः । व्र꣣ता꣡न्य꣢स्य सश्चिरे पु꣣रू꣡णि꣢ पू꣣र्व꣡चि꣢त्तये꣣ व꣢स्वी꣣र꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥१००७॥
पदार्थःप्रथम—सूर्य-किरणों के पक्ष में। (प्रचेतसः) प्रज्ञापक (ताः) वे सूर्य-किरणें (नमसा) चन्द्र आदि लोकों के प्रति झुकने के द्वारा (अस्य) इस सूर्यरूप इन्द्र के (सहः) बल को (सपर्यन्ति) बढ़ाती हैं और (पूर्वचित्तये) सूर्य के क्षितिज में उदय होने से पूर्व ही उसका ज्ञान कराने के लिए (अस्य) इस सूर्य के (पुरूणि) बहुत से (व्रतानि) प्रकाशप्रदान आदि कर्मों को (सश्चिरे) कर देती हैं। इस प्रकार (वस्वीः) वे निवासक किरणें (स्वराज्यम्) सूर्य के अपने साम्राज्य को (अनु) अनुक्रम से बढ़ाती हैं ॥ द्वितीय—सेना के पक्ष में। (प्रचेतसः) प्रकृष्ट चित्तवाली (ताः) वे सेनाएँ (नमसा) नमस्कार के साथ (अस्य) इस सेनाध्यक्षरूप इन्द्र के (सहः) बल की (सपर्यन्ति) प्रशंसा करती हैं और (अस्य) इस सेनाध्यक्ष को (पूर्वचित्तये) पहले ही ज्ञान करा देने के लिए (पुरूणि) बहुत से (व्रतानि) शत्रुओं में भय उत्पन्न करना आदि कर्मों को (सश्चिरे) कर देती हैं। इस प्रकार (वस्वीः) अपने राष्ट्र के निवास में कारणभूत वे सेनाएँ (स्वराज्यम्) स्वराज्य के (अनु) अनुकूल आचरण करती हैं ॥३॥
भावार्थःसूर्य-किरणें जैसे सूर्य के साथ मिलकर और सेनाएँ जैसे सेनापति के साथ मिल कर स्वराज्य को बढ़ाती हैं, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि परमेश्वर के साथ मिलकर अपने आध्यात्मिक स्वराज्य को बढ़ाएँ ॥३॥ इस खण्ड में मन को प्रबुद्ध करने एवं सूर्य तथा सूर्यरश्मियों के स्वराज्य के वर्णन द्वारा प्रजाओं के आध्यात्मिक स्वराज्य की सूचना देने के कारण इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ षष्ठ अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡सा꣢व्य꣣ꣳशु꣡र्मदा꣢꣯या꣣प्सु꣡ दक्षो꣢꣯ गिरि꣣ष्ठाः꣢ । श्ये꣣नो꣢꣫ न योनि꣣मा꣡स꣢दत् ॥१००८॥
पदार्थःप्रथम—सोमौषधि के रस के विषय में। (गिरिष्ठाः) पर्वतों पर उत्पन्न, (दक्षः) बलदायक (अंशुः) सोम ओषधि का रस (मदाय) पीने पर उत्साहवर्धन के लिए (अप्सु) जलों में (असावि) निचोड़ा गया है। (श्येनः न योनिम्) बाज पक्षी जैसे अपने आवास वृक्ष पर बैठता है, वैसे ही यह सोम ओषधि का रस (योनिम्) द्रोणकलश में (आसदत्) आकर स्थित हो गया है ॥ द्वितीय—ज्ञानरस के विषय में। (गिरिष्ठाः) वेदवाणी में स्थित, (दक्षः) आत्मबल देनेवाला (अंशुः) ज्ञानरस (मदाय) आनन्द प्राप्त कराने के लिए (अप्सु) विद्यार्थियों के कर्मों में (असावि) अभिषुत किया जाता है। (श्येनः न योनिम्) बाज पक्षी जैसे अपने आवास-वृक्ष पर बैठता है, वैसे ही यह ज्ञानरस (योनिम्) जीवात्मरूप सदन में (आसदत्) आकर स्थित होता है ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार तथा श्लेष है ॥१॥
भावार्थःकर्मरहित अकेला ज्ञान नीरस और निष्फल होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
शु꣣भ्र꣡मन्धो꣢꣯ दे꣣व꣡वा꣢तम꣣प्सु꣢ धौ꣣तं꣡ नृभिः꣢꣯ सु꣣त꣢म् । स्व꣡द꣢न्ति꣣ गा꣢वः꣣ प꣡यो꣢भिः ॥१००९॥
पदार्थःप्रथम—सोम ओषधि के रस के विषय में। (देववातम्) सूर्य या मेघ द्वारा बढ़ाये हुए (अप्सु) जलों से (धौतम्) धोये हुए, (नृभिः) ऋत्विज् मनुष्यों से (सुतम्) अभिषुत किये गये (शुभ्रम् अन्धः) स्वच्छ सोमरस को (गावः) गौएँ (पयोभिः) अपने दूधों से (स्वदन्ति) स्वादु बनाती हैं ॥ द्वितीय—ज्ञानरस के विषय में। (देववातम्) विद्वान् आचार्य से प्रेरित, (अप्सु) कर्मों में, आचरणों में (धौतम्) पहुँचाये हुए, (नृभिः) अन्य मार्गदर्शक गुरुजनों से (सुतम्) उत्पन्न किये गये (शुभ्रम् अन्धः) स्वच्छ ज्ञानरस को (गावः) वेदवाणियाँ (पयोभिः) ओङ्काररूप दूध से (स्वदन्ति) मधुर कर देती हैं ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःभौतिक ज्ञान अध्यात्म ज्ञान से मिलकर महान् कल्याण करनेवाला हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣢दी꣣म꣢श्वं꣣ न꣡ हेता꣢꣯र꣣म꣡शू꣢शुभन्न꣣मृ꣡ता꣢य । म꣢धो꣣ र꣡स꣢ꣳ सध꣣मा꣡दे꣢ ॥१०१०॥
पदार्थःप्रथम—सोम ओषधि के रस के विषय में। (आत्) उसके अनन्तर अर्थात् सोमरस में गाय का दूध मिलाने के पश्चात्, (हेतारम्) बल बढ़ानेवाले (ईम् मधोः रसम्) इस मधुर सोम के रस को, योद्धा लोग (अमृताय) युद्ध में विजय की प्राप्ति के निमित्त (अशूशुभन्) पीने के लिए पात्रों में अलङ्कृत करते हैं, (हेतारम् अश्वं न) जैसे शीघ्रगामी घोड़े को अश्वपाल योग्य अलङ्कारों से अलङ्कृत करते हैं ॥ द्वितीय—ज्ञानरस के विषय में (आत्) गुरु के पास से ज्ञान की उपलब्धि के अनन्तर (हेतारम्) पुरुषार्थ को बढ़ानेवाले (ईम् मधोः रसम्) इस मधुर ज्ञानरस को, शिष्यगण (अमृताय) मोक्ष की प्राप्ति के लिए (अशूशुभन्) योगाभ्यासों से अलङ्कृत करते हैं ॥३॥ यहाँ श्लेष और श्लिष्टोपमा अलङ्कार हैं ॥३॥
भावार्थःजैसे पिया हुआ सोम ओषधि का रस बल की वृद्धि करनेवाला होता हुआ युद्ध में विजय प्राप्त कराता है, वैसे ही आचार्य से ग्रहण किया गया ज्ञान योगाभ्यास से मिलकर मोक्ष प्राप्त कराता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
अ꣣भि꣢ द्यु꣣म्नं꣡ बृ꣣ह꣢꣫द्यश꣣ इ꣡ष꣢स्पते दीदि꣣हि꣡ दे꣢व देव꣣यु꣢म् । वि꣡ कोशं꣢꣯ मध्य꣣मं꣡ यु꣢व ॥१०११॥
पदार्थःहे (इषः पते) विज्ञान के स्वामी योगिप्रवर आचार्य ! आप (द्युम्नम्) अध्यात्म तेज, (बृहद् यशः) विशाल कीर्ति, हम शिष्यों को (अभि) प्राप्त कराइये। हे (देव) योगविद्या से प्रकाशित विद्वन् ! आप (देवयुम्) परमात्मदेव के इच्छुक मुझको (दिदीहि) परमात्मा का दर्शन कराकर प्रकाशित कर दीजिए। (मध्यमं कोशम्) पञ्च कोशों में से बीच में स्थित मेरे मनोमय कोश को (वि युव) उद्घाटित कर दीजिए, जिससे मैं विज्ञानमय और आनन्दमय कोश में आरोहण कर सकूँ ॥१॥
भावार्थःयोगविद्या में निष्णात आचार्य के अनुशासन में स्थित शिष्य सारी अध्यात्म-विद्या पाकर परमात्मा के साक्षात्कार में समर्थ हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ व꣢च्यस्व सुदक्ष च꣣꣬म्वोः꣢꣯ सु꣣तो꣢ वि꣣शां꣢꣫ वह्नि꣣र्न꣢ वि꣣श्प꣡तिः꣢ । वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣वः꣡ प꣢वस्व री꣣ति꣢म꣣पो꣢꣫ जिन्व꣣न्ग꣡वि꣢ष्टये꣣ धि꣡यः꣢ ॥१०१२॥
पदार्थःहे (सुदक्ष) शुभ योगबल से युक्त आचार्यप्रवर ! (चम्वोः) द्यावापृथिवी के तुल्य परा और अपरा विद्याओं में (सुतः) निष्णात आप (विशाम्) प्रजाओं के (वह्नि) भार को उठानेवाले (विश्पतिः न) प्रजापालक राजा के समान (आ वच्यस्व) प्रशंसा प्राप्त कीजिए, (गविष्टये) दिव्य प्रकाश के इच्छुक मुझ शिष्य के लिए (धियः) प्रज्ञानों को (जिन्वन्) प्रेरित करते हुए आप (दिवः) मूर्धा-लोक से (वृष्टिम्) धर्ममेघ समाधि में होनेवाली ज्योति की वर्षा को और (अपः) आनन्द-जल की (रीतिम्) धारा को (पवस्व) प्रवाहित कीजिए ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःयोगविद्या में पारङ्गत आचार्य भौतिक विज्ञानों के पाण्डित्य के साथ-साथ योगविद्या का पाण्डित्य भी शिष्यों में उत्पन्न करता हुआ उनके सम्मुख मानो दिव्य ज्योति एवं ब्रह्मानन्द की धारा को प्रवाहित कर देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प्रा꣣णा꣡ शिशु꣢꣫र्म꣣ही꣡ना꣢ꣳ हि꣣न्व꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ दी꣡धि꣢तिम् । वि꣢श्वा꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣या꣡ भु꣢व꣣द꣡ध꣢ द्वि꣣ता꣢ ॥१०१३॥
पदार्थः(प्राणा) सबको प्राण देनेवाला, (शिशुः) शिशु के समान प्रेम करने योग्य, (महीनाम्) मङ्गल, बुध, बृहस्पति, चन्द्रमा आदि की भूमियों के पृष्ठ पर (ऋतस्य) सूर्य की (दीधितिम्) किरणावलि को (हिन्वन्) भेजता हुआ, पवमान सोम अर्थात् सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (विश्वा) सब (प्रिया) प्रिय वस्तुओं में (परि भुवत्) चारों ओर से व्याप्त है। (अध) और (द्विता) दो प्रकार के इसके कार्य हैं—बर्फ, नद, नदी, समुद्र, चन्द्रमा, बादल आदि सौम्य कार्य तथा आग, बिजली, सूर्य, आदि तैजस कार्य ॥१॥
भावार्थःजो जगदीश्वर सब प्राणियों को प्राण देता है, सूर्य के प्रकाश को सब जगह बिखेरता है, सर्वान्तर्यामी होता हुआ सब जगत् की व्यवस्था करता है, उसकी सब मनुष्य आराधना क्यों न करें? ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
उ꣡प꣢ त्रि꣣त꣡स्य꣢ पा꣣ष्यो꣢३꣱र꣡भ꣢क्त꣣ य꣡द्गुहा꣢꣯ प꣣द꣢म् । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ स꣣प्त꣡ धाम꣢꣯भि꣣र꣡ध꣢ प्रि꣣य꣢म् ॥१०१४॥
पदार्थः(यत्) क्योंकि, वह पवमान सोम अर्थात् सर्वान्तर्यामी जगत्स्रष्टा परमेश्वर (पाष्योः) द्यावापृथिवी की (गुहा) गुफाओं में भी (त्रितस्य) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ रूप तीन स्थानों में स्थित सूर्य के (पदम्) किरण-समूह को (उप अभक्त) पहुँचाता है, (अध) इस कारण (यज्ञस्य) शरीर में सङ्गत जीवात्मा के (सप्त धामभिः) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इन सात धामों से (प्रियम्) उस प्रिय परमेश्वर की पूजा करो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की कैसी अद्भुत व्यवस्था है कि सूर्य की किरणें विभिन्न लोकों के भूगर्भ में भी पहुँचकर वहाँ अपने ताप से सुवर्ण आदि धातुओं को उत्पन्न कर देती हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
त्री꣡णि꣢ त्रि꣣त꣢स्य꣣ धा꣡र꣢या पृ꣣ष्ठे꣡ष्वै꣢꣯रयद्र꣣यि꣢म् । मि꣡मी꣢ते अस्य꣣ यो꣡ज꣢ना꣣ वि꣢ सु꣣क्र꣡तुः꣢ ॥१०१५॥
पदार्थः(त्रितस्य) सूर्य के (त्रीणि) तीन—पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक रूप पृष्ठ हैं। उन (पृष्ठेषु) तीनों पृष्ठों में, उस पवमान सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमेश्वर ने (रयिम्) ऐश्वर्य को (ऐरयत्) प्रेरित किया हुआ है। साथ ही (सुक्रतुः) उस सुकर्मा परमेश्वर ने (अस्य) इस सूर्य के (योजना) योजनों को, अर्थात् सूर्य कितने योजन विस्तारवाला है, इस माप को भी (वि मिमीते) मापा हुआ है ॥३॥
भावार्थःभूमि, अन्तरिक्ष और द्युलोक में सब जगह ही जगदीश्वर ने विशिष्ट ऐश्वर्य रखे हुए हैं। सब ग्रह, उपग्रह, सूर्य, नक्षत्र, नीहारिका आदियों का बनानेवाला वह उनके परिमाण को भी ठीक-ठाक जानता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प꣡व꣢स्व꣣ वा꣡ज꣢सातये प꣣वि꣢त्रे꣣ धा꣡र꣢या सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ वि꣡ष्ण꣢वे दे꣣वे꣢भ्यो꣣ म꣡धु꣢मत्तरः ॥१०१६॥
पदार्थःहे (सोम) रस के भण्डार जगत्पति परमात्मन् ! (सुतः) आत्मा में प्रकट हुए, (मधुमत्तरः) अत्यन्त मधुर आप (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए, (विष्णवे) शरीर में व्यापक प्राण के लिए और (देवेभ्यः) इन्द्रियों के लिए (वाजसातये) बलप्रदानार्थ (पवित्रे) पवित्र हृदय में (धारया) आनन्द की धारा के साथ (पवस्व) प्रवाहित होओ ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के पास से आनन्द का झरना झरने पर जीवात्मा, मन, बुद्धि आदि सभी रस से सिक्त और कृतकृत्य हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
त्वा꣡ꣳ रि꣢꣯हन्ति धी꣣त꣢यो꣣ ह꣡रिं꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अ꣣द्रु꣡हः꣢ । व꣣त्सं꣢ जा꣣तं꣢꣫ न मा꣣त꣢रः꣣ प꣡व꣢मा꣣न वि꣡ध꣢र्मणि ॥१०१७॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रतादायक रस के भण्डार जगदीश्वर (हरिम्) पाप के हरनेवाले आपको (विधर्मणि) विशेषरूप से सद्गुणों के धारक (पवित्रे) पवित्र अन्तरात्मा में (अद्रुहः) द्रोहरहित (धीतयः) धी-वृत्तियाँ (रिहन्ति) चाटती हैं, ध्याती हैं, (जातम्) नवजात (वत्सम्) बछड़े को (मातरः न) जैसे गौ माताएँ चाटती हैं ॥२॥
भावार्थःजैसे धेनुएँ अपने बछड़े को जीभ से चाटती हुई आनन्द अनुभव करती हैं, वैसे ही मनुष्य परमात्मा को ध्याते हुए आनन्द से तरङ्गित होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
त्वं꣡ द्यां च꣢꣯ महिव्रत पृथि꣣वीं꣡ चाति꣢꣯ जभ्रिषे । प्र꣡ति꣢ द्रा꣣पि꣡म꣢मुञ्चथाः प꣡व꣢मान महित्व꣣ना꣢ ॥१०१८॥
पदार्थःहे (महिव्रत) महान् कर्मों के कर्ता सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (त्वम्) आप (द्यां च) द्यौ लोक को (पृथिवीं च) और भूलोक को भी (अति) लाँघकर (जभ्रिषे) सबको धारण किये हुए हो। हे (पवमान) सर्वान्तर्यामिन् आपने (महित्वना) अपनी महिमा से (द्रापिम्) रक्षा-कवच को (प्रति अमुञ्चथाः) धारण किया हुआ है, अर्थात् आपकी महिमा ही आपका रक्षा-कवच है, क्योंकि अलौकिक आपको कवच आदि भौतिक साधनों की अपेक्षा नहीं होती। अथवा, (द्रापिम्) निद्रा को (प्रति अमुञ्चथाः) छोड़ा हुआ है, अर्थात् सदैव जागरूक होने से आप निद्रा-रहित हो ॥३॥
भावार्थःन केवल द्युलोक तथा भूलोक को, किन्तु उनसे परे भी जो कुछ है, उस सबको भी जगदीश्वर ही धारण करता है। वह भौतिक कवच के बिना भी रक्षित रहता है और नींद के बिना भी विश्राम को प्राप्त रहता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
इ꣡न्दु꣢र्वा꣣जी꣡ प꣢वते꣣ गो꣡न्यो꣢घा꣣ इ꣢न्द्रे꣣ सो꣢मः꣣ स꣢ह꣣ इ꣢न्व꣣न्म꣡दा꣢य । ह꣢न्ति꣣ र꣢क्षो꣣ बा꣡ध꣢ते꣣ प꣡र्यरा꣢꣯तिं꣣ व꣡रि꣢वस्कृ꣣ण्व꣢न्वृ꣣ज꣡न꣢स्य꣣ रा꣡जा꣢ ॥१०१९॥
पदार्थः(गोन्योधाः) मन, बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों में प्रवाहित होनेवाला, (वाजी) वेगवान्, (इन्दुः) सराबोर करनेवाला ब्रह्मानन्दरस (पवते) प्रवाहित हो रहा है। (सोमः) अभिषुत वह ब्रह्मानन्दरस (इन्द्रे) जीवात्मा में (मदाय) उत्साह के लिए (सहः) बल (इन्वन्) प्रेरित करता है। वह रस (रक्षः) पाप को (हन्ति) विनष्ट करता है, (अरातिम्) आदानवृत्ति को (परिबाधते) दूर करता है। (वृजनस्य) आत्मिक बल का (राजा) राजा वह (वरिवः) आध्यात्मिक धन को (कृण्वन्) उत्पन्न करता है ॥१॥
भावार्थःयोगाभ्यास द्वारा आनन्दरस की नदी जीवात्मप्रदेश में जब बहती है, तब सब दोष दूर हो जाते हैं और चित्त निर्मल हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣢ध꣣ धा꣡र꣢या꣣ म꣡ध्वा꣢ पृचा꣣न꣢स्ति꣣रो꣡ रोम꣢꣯ पवते꣣ अ꣡द्रि꣢दुग्धः । इ꣢न्दु꣣रि꣡न्द्र꣢स्य स꣣ख्यं꣡ जु꣢षा꣣णो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ मत्स꣣रो꣡ मदा꣢꣯य ॥१०२०॥
पदार्थः(अध) और, (अद्रिदुग्धः) मन-बुद्धि रूप सिलबट्टों से अभिषुत वह ब्रह्मानन्द-रूप सोम (मध्वा धारया) मधुर धारा से (पृचानः) संपृक्त करता हुआ (तिरः रोम) रोमाञ्च उत्पन्न करता हुआ (पवते) प्रवाहित होता है। (देवः) प्रकाश का दाता, (मत्सरः) मद-जनक (इन्दुः) सराबोर करनेवाला वह ब्रह्मानन्दरस (देवस्य) दिव्यगुणयुक्त (इन्द्रस्य) जीवात्मा की (सख्यम्) मैत्री को (जुषाणः) सेवन करता हुआ, उसके (मदाय) उत्साह के लिए होता है ॥२॥ यहाँ ध-र-द-म आदियों की अनेक बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास है। ‘देवो, देव’ में छेकानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःब्रह्म के पास से बही हुई आनन्दधाराएँ जब जीवात्मा को नहला देती हैं, तब अत्यन्त निर्मल अन्तःकरणवाला जीवन्मुक्त वह बड़े से बड़े दुःख को भी तिनके के बराबर भी नहीं समझता ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣भि꣢ व्र꣣ता꣡नि꣢ पवते पुना꣣नो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣वा꣢꣫न्त्स्वेन꣣ र꣡से꣢न पृ꣣ञ्च꣢न् । इ꣢न्दु꣣र्ध꣡र्मा꣢ण्यृतु꣣था꣡ वसा꣢꣯नो꣣ द꣢श꣣ क्षि꣡पो꣢ अव्यत꣣ सा꣢नौ꣣ अ꣡व्ये꣢ ॥१०२१॥
पदार्थः(देवः) दिव्यगुणमय ब्रह्मानन्दरूप सोमरस (देवान्) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदि को (पुनानः) पवित्र करता हुआ (स्वेन रसेन) अपने रस से (पृञ्चन्) स्नान कराता हुआ (व्रतानि अभि) कर्मों में (पवते) प्रवाहित होता है। (इन्दुः) आर्द्र करनेवाला आनन्दरस (ऋतुथा) समय-समय पर (धर्माणि) सत्य, न्याय, दया आदि धर्मों को (वसानः) धारण करता हुआ (दश क्षिपः) दस इन्द्रियों या दस प्राणों को (अव्ये सानौ) पहुँचने योग्य उन्नति-शिखर पर (अव्यत) पहुँचा देता है ॥३॥
भावार्थःब्रह्मानन्द-रस जब जीवन में व्याप्त हो जाता है, तब मनुष्य के सब अङ्गों को, सब प्राणों को, सब मन-बुद्धि आदियों को अपने प्रभाव से नचाता हुआ सा चमत्कृत करता है ॥३॥ इस खण्ड में आचार्य, ज्ञानरस परमात्मा और ब्रह्मानन्दरस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ षष्ठ अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ ते꣢ अग्न इधीमहि द्यु꣣म꣡न्तं꣢ देवा꣣ज꣡र꣢म् । यु꣢द्ध꣣ स्या꣢ ते꣣ प꣡नी꣢यसी स꣣मि꣢द्दी꣣द꣡य꣢ति꣣ द्य꣡वीष꣢꣯ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१०२२॥
पदार्थःहे (देव) ज्ञान-प्रकाश के प्रदाता (अग्ने) विद्वन् आचार्य ! हम (ते) आपके (द्युमन्तम्) तेजस्वी, (अजरम्) पुराना न होनेवाले ज्ञान-समूह को (इधीमहि) अपने अन्दर प्रदीप्त करते हैं। (यत् ह) जो (स्या) वह (ते) आपकी (पनीयसी) अतिशय स्तुति-योग्य (समित्) ज्ञान-दीप्ति (द्यवि) प्रकाशित आपके आत्मा में (दीदयति) प्रदीप्त हो रही है, उस (इषम्) व्याप्त ज्ञानदीप्ति को (स्तोतृभ्यः) ईश्वर-स्तोता हम शिष्यों को (आ भर) प्रदान कीजिए ॥१॥
भावार्थःजो कोई भी विद्याएँ आचार्य जानता है, उन सभी को शिष्यों के लिए भलीभाँति देवे, जिससे शिष्य विद्वान् होकर अपने शिष्यों को पढ़ायें। इस प्रकार विद्या के पढ़ने-पढ़ाने का क्रम आगे-आगे बिना विघ्न के चलता रहे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
आ꣡ ते꣢ अग्न ऋ꣣चा꣢ ह꣣विः꣢ शु꣣क्र꣡स्य꣢ ज्योतिषस्पते । सु꣡श्च꣢न्द्र꣣ द꣢स्म꣣ वि꣡श्प꣢ते꣣ ह꣡व्य꣢वा꣣ट्तु꣡भ्य꣢ꣳ हूयत꣣ इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१०२३॥
पदार्थःहे (शुक्रस्य) दीप्त (ज्योतिषः) तेज के (पते) स्वामिन् ! यह (ते) तेरे लिए (ऋचा) वेदमन्त्र के उच्चारण के साथ (हविः) हवि है। हे (सुश्चन्द्र) उत्तम आह्लाद देनेवाले, (दस्म) रोगों को नष्ट करनेवाले, (विश्पते) प्रजापालक, (हव्यवाट्) होमी हुई हवि को जलाकर सूक्ष्म करके वायु के माध्यम से स्थानान्तर में पहुँचानेवाले (अग्ने) यज्ञाग्नि ! (तुभ्यम्) तेरे लिए, यह हवि (हूयते) होमी जा रही है। तू (स्तोतृभ्यः) मन्त्रपाठ द्वारा तेरे गुणवर्णन में तत्पर हम लोगों के लिए (इषम्) अभीष्ट आरोग्य आदि (आ भर) प्रदान कर ॥२॥
भावार्थःगुरुकुल में विद्या पढ़ने के लिए निवास करते हुए सब छात्र नियम से प्रातः-सायम् अग्निहोत्र करते हुए वायुशुद्धि द्वारा आरोग्य आदि को और तेजस्विता को प्राप्त कर सुखी होवें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
ओ꣡भे सु꣢꣯श्चन्द्र विश्पते꣣ द꣡र्वी꣢ श्रीणीष आ꣣स꣡नि꣢ । उ꣣तो꣢ न꣣ उ꣡त्पु꣢पूर्या उ꣣क्थे꣡षु꣢ शवसस्पत꣣ इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१०२४॥
पदार्थःहे (सुश्चन्द्र) शुभ आह्लाद देनेवाले, (विश्पते) प्रजापालक अग्रनायक परमात्मन् ! आप (आसनि) खोले हुए मुख के तुल्य खाली स्थान में (उभे दर्वी) द्युलोक-पृथिवीलोक दोनों को (आश्रीणीषे) चारों ओर से परिपक्व करते हो। (उत उ) और, हे (शवसः पते) बल के अधीश्वर ! (उक्थेषु) प्रशंसित धर्म-कर्मों में (नः) हमें (उत्पुपूर्याः) पूर्ण करो। (स्तोतृभ्यः) हम स्तोताओं के लिए (इषम्) अभीष्ट गुण-कर्म-स्वभाव आदि (आभर) लाओ ॥३॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर द्यावापृथिवी को परिपक्व और परिपूर्ण करता है, वैसे ही वह स्तोताओं को परिपक्व मतिवाला तथा धर्म-कर्म में पूर्ण करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ सा꣡म꣢ गायत꣣ वि꣡प्रा꣢य बृह꣣ते꣢ बृ꣣ह꣢त् । ब्र꣣ह्मकृ꣡ते꣢ विप꣣श्चि꣡ते꣢ पन꣣स्य꣡वे꣢ ॥१०२५॥
पदार्थःहे शिष्यो ! तुम (विप्राय) मेधावी, (बृहते) महान्, (ब्रह्मकृते) जल, अन्न, धन, वेद, विद्युत्, प्राण, मन, वाणी, श्रोत्र, हृदय आदियों के रचयिता, (विपश्चिते) विद्वान् सर्वज्ञ (पनस्यवे) दूसरों को स्तुतिमान् अर्थात् कीर्तिमान् बनाना चाहनेवाले, (इन्द्राय) विघ्नों के विदारक परमेश्वर के लिए (बृहत् साम) ‘त्वामिद्धि हवामहे’ साम०, २३४, ८०९ इस ऋचा पर गाये जानेवाले बृहत् नामक साम को (गायत) गाओ ॥१॥
भावार्थःआचार्य के अधीन गुरुकुल में निवास करनेवाले शिष्यों को चाहिए कि वे अनेक गुणोंवाले जगदीश्वर को लक्ष्य करके बृहत् आदि सामों को गायें और स्वयं भी उसके गुणों का अनुकरण करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त्व꣡मि꣢न्द्राभि꣣भू꣡र꣢सि꣣ त्व꣡ꣳ सूर्य꣢꣯मरोचयः । वि꣣श्व꣡क꣢र्मा वि꣣श्व꣡दे꣢वो म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि ॥१०२६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (अभिभूः) सब काम, क्रोध आदि शत्रुओं को परास्त करनेवाले (असि) हो, (त्वम्) आपने (सूर्यम्) सूर्य को (अरोचयः) चमकाया है। आप (विश्वकर्मा) सब कर्मों को करनेवाले, (विश्वदेवः) सबको आनन्द देनेवाले तथा (महान्) महान् (असि) हो ॥२॥
भावार्थःजो संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रकाशप्रदान आदि कर्मों से तथा आनन्द देने के द्वारा हमारा उपकार करता है, उस अनन्त महिमावाले परमेश्वर के स्तुतिगीत सबको गाने चाहिएँ ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
वि꣣भ्रा꣢ज꣣न् ज्यो꣡ति꣢षा꣣ स्व꣢३꣱र꣡ग꣢च्छो रोच꣣नं꣢ दि꣣वः꣢ । दे꣣वा꣡स्त꣢ इन्द्र स꣣ख्या꣡य꣢ येमिरे ॥१०२७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) महान् महिमावाले जगत्पति ! (ज्योतिषा) तेज से (विभ्राजन्) देदीप्यमान, आप (दिवः) द्युलोक के (रोचनम्) दीप्तिमान् (स्वः) सूर्य में (अगच्छः) पहुँचे हुए हो। (देवाः) विद्वान् लोग (ते) आपकी (सख्याय) मैत्री के लिए (येमिरे) स्वयं को केन्द्रित करते हैं, लालायित रहते हैं ॥३॥
भावार्थःज्योतिष्मान् परमेश्वर से ही ज्योति पाकर आग, बिजली, सूर्य, तारे, चाँदी, सोना, हीरे आदि सब चमकते हैं। इसलिए मनुष्यों को भी ज्योति पाने के लिए उसकी मित्रता का आश्रय लेना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
अ꣡सा꣢वि꣣ सो꣡म꣢ इन्द्र ते꣣ श꣡वि꣢ष्ठ धृष्ण꣣वा꣡ ग꣢हि । आ꣡ त्वा꣢ पृणक्त्विन्द्रि꣣य꣢꣫ꣳ रजः꣣ सू꣢र्यो꣣ न꣢ र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०२८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) सखा जीवात्मा ! मैंने (ते) तेरे लिए (सोमः) आनन्दरस (असावि) उत्पन्न किया है। (हे शविष्ठ) बलिष्ठ ! हे (धृष्णो) कामादि शत्रुओं के पराजेता ! (आगहि) आ। (इन्द्रियम्) आत्मबल (त्वा) तुझे (आ पृणक्तु) परिपूर्ण करे, (सूर्यः न) जैसे सूर्य (रश्मिभिः) किरणों से (रजः) पृथिवी, चन्द्रमा आदि लोकों को परिपूर्ण करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के साथ मैत्री करके जीवात्मा अविच्छिन्न आनन्द–रस की धारा को और अनन्त आत्मबल को पा लेता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣡ ति꣢ष्ठ वृत्रह꣣न्र꣡थं꣢ यु꣣क्ता꣢ ते꣣ ब्र꣡ह्म꣢णा꣣ ह꣡री꣢ । अ꣡र्वाची꣢न꣣ꣳ सु꣢ ते꣣ म꣢नो꣣ ग्रा꣡वा꣢ कृणोतु व꣣ग्नु꣡ना꣢ ॥१०२९॥
पदार्थःहे (वृत्रहन्) पाप, विघ्न आदि के विनाशक जीवात्मन् ! तू (रथम्) नवीन शरीर-रूप रथ पर (आ तिष्ठ) आकर बैठ। (ब्रह्मणा) मुझ परमेश्वर ने (ते) तेरे लिए (हरी) प्राण-अपान वा ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय (युक्ता) तुझमें नियुक्त किये हैं। कुमारावस्था में गुरुकुल में प्रविष्ट होने के पश्चात् (ग्रावा) विद्वान् उपदेष्टा गुरु (वग्नुना) उपदेश-रूप शब्द से (ते मनः) तेरे मन को (अर्वाचीनम्) धर्म के अभिमुख (सु कृणोतु) भली-भाँति करे ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा माता के गर्भ में प्रवेश करके जन्म लेकर माता और पिता जी की गोद में खेलता हुआ उनके सान्निध्य से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर कुमार अवस्था में यथोचित समय पर गुरुकुल में जाकर गुरुओं से शास्त्राध्ययन करता हुआ मन को धर्म में लगाए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣢न्द्र꣣मि꣡द्धरी꣢꣯ वह꣣तो꣡ऽप्र꣢तिधृष्टशवसम् । ऋ꣡षी꣢णाꣳ सुष्टु꣣ती꣡रुप꣢꣯ य꣣ज्ञं꣢ च꣣ मा꣡नु꣢षाणाम् ॥१०३०॥
पदार्थः(अप्रतिधृष्टशवसम्) जिसके बल को कोई दबा नहीं सकता ऐसे, (इन्द्रम्) आचार्यों से विद्या ग्रहण किये हुए विद्वान् स्नातक को (इत्) ही (हरी) रथ में नियुक्त उत्तम घोड़े एवं जलयान तथा विमान में नियुक्त विद्युत् और वायु (ऋषीणाम्) मन्त्रार्थद्रष्टा ऋषियों के (सुष्टुतीः) शुभ मन्त्रार्थोपदेशों में (मानुषाणां यज्ञं च) और मनुष्यों के यज्ञ-समारोह में (उपवहतः) ले जाएँ ॥३॥
भावार्थःआचार्य के गर्भ से द्वितीय जन्म प्राप्त करके विद्वान् द्विज सामाजिक उत्थान के कार्यों में भाग लेता हुआ धर्मपूर्ण यज्ञादि समारोहों में जाए ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य और परमात्मा-जीवात्मा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ षष्ठ अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ तृतीय प्रपाठ्क में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
ज्यो꣡ति꣢र्य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ पवते꣣ म꣡धु꣢ प्रि꣣यं꣢ पि꣣ता꣢ दे꣣वा꣡नां꣢ जनि꣣ता꣢ वि꣣भू꣡व꣢सुः । द꣡धा꣢ति꣣ र꣡त्न꣢ꣳ स्व꣣ध꣡यो꣢रपी꣣꣬च्यं꣢꣯ म꣣दि꣡न्त꣢मो मत्स꣣र꣡ इ꣢न्द्रि꣣यो꣡ रसः꣢꣯ ॥१०३१॥
पदार्थः(यज्ञस्य ज्योतिः) देवपूजा, सङ्गतिकरण, दान आदि रूप यज्ञ का प्रकाश करनेवाला, (देवानाम्) प्रकाशक सूर्य, चन्द्रमा आदियों का और विद्वानों का (पिता) पालनकर्ता, (जनिता) सबको जन्मदेनेवाला, (विभूवसुः) प्रचुर वा व्यापक धनवाला पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता जगत्पति परमेश्वर (प्रियं मधु) प्रिय मधुर वर्षाजल को, ज्ञानरस को वा आनन्दरस को (पवते) भूमि पर वा उपासक के अन्तरात्मा में प्रवाहित करता है और (स्वधयोः) द्यावापृथिवी में (अपीच्यम्) छिपे हुए (रत्नम्) चाँदी, सोना, मणि, मोती आदि रत्नों को (दधाति) परिपुष्ट करता है। इसका (इन्द्रियः रसः) जीवात्मा से सेवित ज्ञानरस वा आनन्दरस (मत्सरः) स्फूर्तिदायक तथा (मदिन्तमः) अत्यन्त उत्साहप्रद होता है ॥१॥
भावार्थःजो सब भौतिक रसों को तथा आध्यात्मिक रस को प्रवाहित करता है, वह जगदीश्वर किसका वन्दनीय नहीं है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣣भि꣡क्रन्द꣢न्क꣣ल꣡शं꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯र्षति꣣ प꣡ति꣢र्दि꣣वः꣢ श꣣त꣡धा꣢रो विचक्ष꣣णः꣢ । ह꣡रि꣢र्मि꣣त्र꣢स्य꣣ स꣡द꣢नेषु सीदति मर्मृजा꣣नो꣡ऽवि꣢भिः꣣ सि꣡न्धु꣢भि꣣र्वृ꣡षा꣢ ॥१०३२॥
पदार्थःप्रथम—बादल के पक्ष में। (वाजी) बलवान् सोम अर्थात् वर्षा करनेवाला बादल (अभिक्रन्दन्) गर्जता हुआ, वर्षाजल द्वारा (कलशम्) भूमण्डलरूप कलश में (अर्षति) जाता है। वह (दिवः पतिः) अन्तरिक्ष का अधिपति, (शतधारः) बहुत धारोंवाला और (विचक्षणः) कार्यकुशल है। (हरिः) जलों को जहाँ-तहाँ ले जानेवाला वह (मित्रस्य) सूर्य के (सदनेषु) स्थिति-स्थान पर्वत आदियों में (सीदति) जाता है। साथ ही (वृषा) वर्षा करनेवाला वह (अविभिः) वेगगामिनी (सिन्धुभिः) नदियों के द्वारा (मर्मृजानः) भूमि के भागों को अतिशय शुद्ध करता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (वाजी) बलवान् सोम अर्थात् आनन्दवर्षक परमात्मा (अभिक्रन्दन्) उपदेश देता हुआ, (कलशम्) आत्मा रूप कलश में (अर्षति) जाता है। वह (दिवः पतिः) जीवात्मा का पालनकर्ता, (शतधारः) आनन्द की सैकड़ों धाराओं को बहानेवाला और (विचक्षणः) विशेष द्रष्टा है। (हरिः) पापों का हर्ता वह (मित्रस्य) अपने सखा जीवात्मा के (सदनेषु) अन्नमय-प्राणमय-मनोमय आदि कोशों में (सीदति) स्थित होता है। साथ ही, (वृषा) सुख बरसानेवाला वह (अविभिः) रक्षा करनेवाली (सिन्धुभिः) आनन्दरस की नदियों से (मर्मृजानः) उपासक के अन्तःकरण को शुद्ध करता है ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःबादल की जल-वर्षा से पृथिवी के समान परमात्मा की आनन्दवर्षा से योगसाधक की मनोभूमि सरस और निर्मल हो जाती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣢ग्रे꣣ सि꣡न्धू꣢नां꣣ प꣡व꣢मानो अर्ष꣣त्य꣡ग्रे꣢ वा꣣चो꣡ अ꣢ग्रि꣣यो꣡ गोषु꣢꣯ गच्छसि । अ꣢ग्रे꣣ वा꣡ज꣢स्य भजसे म꣣ह꣡द्धन꣢꣯ꣳ स्वायु꣣धः꣢ सो꣣तृ꣡भिः꣢ सोम सूयसे ॥१०३३॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (पवमानः) पवित्रकर्ता आप (सिन्धूनाम्) नदियों के (अग्रे) आगे-आगे (अर्षसि) चलते हो, अर्थात् उन्हें आप ही प्रवाहित करते हो। (वाचः) मनुष्यों से उच्चारण की जाती हुई वाणी के (अग्रे) आगे (गच्छसि) चलते हो, अर्थात् आपकी दी हुई वाक्शक्ति से ही मनुष्य व्यक्त वाणी का उच्चारण करते हैं। (अग्रियः) आगे स्थित आप (गोषु) सूर्य-किरणों में (गच्छसि) पहुँचते हो, अर्थात् सूर्य-किरणों को भी आप ही प्रकाशित एवं प्रेरित करते हो और (वाजस्य) अन्न तथा संग्राम के भी (अग्रे) आगे, आप ही जाते हो, अर्थात् अन्न आदि की उत्पत्ति और संग्राम में विजय भी आप ही कराते हो। आप (महत् धनम्) महान् ऐश्वर्य को (भजसे) प्राप्त किये हुए हो। हे (सोम) परमात्मन् ! (स्वायुधाः) उत्तम शस्त्रास्त्र जिसके पास हैं, ऐसे सेनापति के समान रक्षा करने में समर्थ आप (सोतृभिः) ध्यानयज्ञ करनेवाले उपासकों के द्वारा (सूयसे) अभिषुत किये जाते हो, अर्थात् वे आपसे अपने लिए आनन्द-रस को क्षरित करते हैं ॥३॥
भावार्थःबाहरी जगत् में और शरीर के अन्दर होनेवाली सारी व्यवस्था को सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ही कराता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡सृ꣢क्षत꣣ प्र꣢ वा꣣जि꣡नो꣢ ग꣣व्या꣡ सोमा꣢꣯सो अश्व꣣या꣢ । शु꣣क्रा꣡सो꣢ वीर꣣या꣡शवः꣢꣯ ॥१०३४॥
पदार्थः(वाजिनः) बलवान्, (शुक्रासः) पवित्र, (आशवः) शीघ्रगामी (सोमासः) ब्रह्मानन्द-रस (गव्या) इन्द्रियबलों की प्राप्ति की इच्छा से, (अश्वया) प्राण-बलों की प्राप्ति की इच्छा से और (वीरया) वीर-भावों की प्राप्ति की इच्छा से (प्र असृक्षत) परमेश्वर के पास से अभिषुत किये जा रहे हैं ॥१॥
भावार्थःउपासक के आत्मा में जब ब्रह्मानन्द-रस की धाराएँ बहती हैं, तब मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियों आदि का सात्त्विक बल स्वयं ही उपस्थित हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
शु꣣म्भ꣡मा꣢ना ऋता꣣यु꣡भि꣢र्मृ꣣ज्य꣡मा꣢ना꣣ ग꣡भ꣢स्त्योः । प꣡व꣢न्ते꣣ वा꣡रे꣢ अ꣣व्य꣡ये꣢ ॥१०३५॥
पदार्थः(शुम्भमानाः) शोभित होते हुए, (ऋतायुभिः) अध्यात्म-यज्ञ के अभिलाषियों द्वारा (गभस्त्योः) मन, बुद्धि-रूप द्यावापृथिवियों में (मृज्यमानाः) अलङ्कृत किये जाते हुए ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस (अव्यये) अविनाशी (वारे) दोषों के निवारक अन्तरात्मा में (पवन्ते) प्रवाहित हो रहे हैं ॥२॥
भावार्थःधर्ममेघ-समाधि में जब योगी के अन्तरात्मा में ब्रह्मानन्द के झरने झरते हैं, तब उसके मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदि सभी रस से सिंचे हुए के सदृश हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ते꣡ विश्वा꣢꣯ दा꣣शु꣢षे꣣ व꣢सु꣣ सो꣡मा꣢ दि꣣व्या꣢नि꣣ पा꣡र्थि꣢वा । प꣡व꣢न्ता꣣मा꣡न्तरि꣢꣯क्ष्या ॥१०३६॥
पदार्थः(ते सोमाः) उपासक के अन्तरात्मा में बहते हुए वे ब्रह्मानन्द-रस (दाशुषे) परमात्मा को आत्मसमर्पण करनेवाले उस उपासक के लिए (दिव्यानि) आनन्दमय और विज्ञानमय लोकों से सम्बद्ध, (पार्थिवा) अन्नमय और प्राणमय लोकों से सम्बद्ध तथा (आन्तरिक्ष्या) मनोमय लोक से सम्बद्ध (विश्वा वसु) सब ऐश्वर्यों को (पवन्ताम्) प्रवाहित करें ॥३॥
भावार्थःब्रह्मानन्द अधिगत हो जाने पर देह, प्राण, मन, बुद्धि एवं आत्मा से सम्बद्ध सभी सम्पदाएँ वा सिद्धियाँ योगियों को प्राप्त हो जाती हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व देव꣣वी꣡रति꣢꣯ प꣣वि꣡त्र꣢ꣳ सोम꣣ र꣡ꣳह्या꣢ । इ꣡न्द्र꣢मिन्दो꣣ वृ꣡षा वि꣢꣯श ॥१०३७॥
पदार्थःहे (सोम) रस के भण्डार जगदीश्वर ! (देववीः) सदाचारी विद्वानों को प्राप्त होनेवाले आप (रंह्या) वेग से (पवित्रम् अति) पवित्र हृदय-रूप छन्नी को पार करके (पवस्व) अन्तरात्मा में परिस्रुत होओ। हे (इन्दो) रस से आर्द्र करनेवाले जगत्पति ! (वृषा) आनन्द की वर्षा करनेवाले आप (इन्द्रम्) जीवात्मा में (विश) प्रवेश करो ॥१॥
भावार्थःजैसे सोमौषधि का रस दशापवित्र नामक छन्नी के माध्यम से द्रोणकलश में पहुँचता है, वैसे ही परमेश्वर से आता हुआ आनन्दरस हृदय के माध्यम से अन्तरात्मा में पहुँचता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ व꣢च्यस्व꣣ म꣢हि꣣ प्स꣢रो꣣ वृ꣡षे꣢न्दो द्यु꣣म्न꣡व꣢त्तमः । आ꣡ योनिं꣢꣯ धर्ण꣣सिः꣡ स꣢दः ॥१०३८॥
पदार्थःहे परमात्मन् ! आप हमारे द्वारा (आ वच्यस्व) स्तुति किये जाओ। आप हमारे लिए (महि प्सरः) सत्य, न्याय, शूरता, दया, उदारता आदि के महान् रूप को प्रदान करो। हे (इन्दो) रसागार, रस से आर्द्र करनेवाले भगवन् ! आप (वृषा) आनन्दवर्षी और (द्युम्नवत्तमः) सबसे अधिक तेजस्वी हो। (धर्णसिः) जगत् के धारणकर्ता आप (योनिम्) हमारे आत्म-गृह में (आ सदः) आकर बैठो ॥२॥ यहाँ जगत् का धारक विराट् परमेश्वर छोटे से जीवात्मरूप घर में कैसे समा सकता है, अतः विरूपसंघटनारूप विषमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःआराधना किया गया परमेश्वर उपासक के अन्तरात्मा में आनन्द बरसा-बरसा कर उसका महान् उपकार करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡धु꣢क्षत प्रि꣣यं꣢꣫ मधु꣣ धा꣡रा꣢ सु꣣त꣡स्य꣢ वे꣣ध꣡सः꣢ । अ꣣पो꣡ व꣢सिष्ट सु꣣क्र꣡तुः꣢ ॥१०३९॥
पदार्थः(सुतस्य) अन्तरात्मा में प्रकट किये गए, (वेधसः) सब जगत् के विधाता सोम नामक परमात्मा की (धारा) वेदवाणी की धारा (प्रियम्) प्रिय, (मधु) मधुर आनन्दरस को (अधुक्षत) उपासक के अन्तरात्मा में दुहती है। (सुक्रतुः) शुभकर्मों का कर्ता वह परमात्मा (अपः) उपासक के कर्मों को (वसिष्ट) व्याप्त कर लेता है अर्थात् उपासक के द्वारा शुभ लोकहितकारी कर्म ही कराता है, अशुभ नहीं ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को योग्य है कि वे परमेश्वर के ध्यान से आनन्द की प्राप्ति और शुभकर्मों में प्रवृत्ति करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
म꣣हा꣡न्तं꣢ त्वा म꣣ही꣡रन्वापो꣢꣯ अर्षन्ति꣣ सि꣡न्ध꣢वः । य꣡द्गोभि꣢꣯र्वासयि꣣ष्य꣡से꣢ ॥१०४०॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (महान्तम्) अतिशय महान् (त्वा अनु) आपके आदेशानुसार (महीः) विशाल, (सिन्धवः) प्रवाहमयी (आपः) नदियाँ (अर्षन्ति) गति करती हैं, (यत्) क्योंकि, आप (गोभिः) सूर्यकिरणों से (वासयिष्यसे) वर्षा द्वारा उन्हें बसाये रखोगे ॥४॥
भावार्थःनदी आदि सब पदार्थ परमात्मा के निर्धारित नियमों के अनुसार ही चलते हैं, क्योंकि वह जगत् का सम्राट् है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣣मुद्रो꣢ अ꣣प्सु꣡ मा꣢मृजे विष्ट꣣म्भो꣢ ध꣣रु꣡णो꣢ दि꣣वः꣢ । सो꣡मः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अस्म꣣युः꣢ ॥१०४१॥
पदार्थः(समुद्रः) आनन्द-रसों को उमड़ानेवाला, (विष्टम्भः) सबको सहारा देनेवाला, (दिवः) सूर्य को (धरुणः) थामनेवाला, (अस्मयुः) हमसे प्रीति करनेवाला (सोमः) जगत्स्रष्टा परमेश्वर (पवित्रे) वायु में और (अप्सु) जलों में (मामृजे) नित्य शुद्धि करता रहता है ॥५॥
भावार्थःयदि जल, वायु आदि प्राकृतिक पदार्थों को सूर्य द्वारा प्रतिदिन जगदीश्वर शुद्ध न करता रहता तो मलों के पुञ्ज होकर वे किसी के उपयोग के योग्य भी न रहते ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡चि꣢क्रद꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रि꣢र्म꣣हा꣢न्मि꣣त्रो꣡ न द꣢꣯र्श꣣तः꣢ । स꣡ꣳ सूर्ये꣢꣯ण दिद्युते ॥१०४२॥
पदार्थःपरमेश्वर की ही यह महिमा है कि (हरिः) वायु से इधर-उधर ले जाया जाता हुआ, (वृषा) वर्षा करनेवाला बादल (अचिक्रदत्) स्वयं को गरजाता है। (महान्) विशाल वह बादल (मित्रः न) मित्र के समान (दर्शतः) दर्शनीय होता है और वह बादल (सूर्येण) सूर्य द्वारा (सं दिद्युते) भलीभाँति दीप्त होता है, बिजली की छटाओं से भासित होता है ॥६॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःबादल जब गरजता है, बिजली चमकाता है और बरसता है तब गरमी की धूप से तप्त लोग उसका मित्र के समान स्वागत करते हैं। बादल के जो उपकार हैं, वे वास्तव में परेश्वर के ही उपकार समझने चाहिएँ, क्योंकि वह उसी से सञ्चालित होता है ॥६॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
गि꣡र꣢स्त इन्द꣣ ओ꣡ज꣢सा मर्मृ꣣ज्य꣡न्ते꣢ अप꣣स्यु꣡वः꣢ । या꣢भि꣣र्म꣡दा꣢य꣣ शु꣡म्भ꣢से ॥१०४३॥
पदार्थःहे (इन्दो) परमेश्वर के उपासक मानव ! (ते) तेरी (अपस्युवः) कर्म की कामनावाली (गिरः) वाणियाँ तुझे (ओजसा) तेज से (मर्मृज्यन्ते) अधिकाधिक बार-बार अलङ्कृत करती हैं, (याभिः) जिनसे तू (मदाय) आनन्द-प्राप्ति के लिए (शुम्भसे) शोभित होता है ॥४॥
भावार्थःवाणी कर्म के साथ ही मनुष्य का भूषण होती है, कर्म के बिना नहीं ॥७॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
तं꣢ त्वा꣣ म꣡दा꣢य꣣ घृ꣡ष्व꣢य उ लोककृ꣣त्नु꣡मी꣢महे । त꣢व꣣ प्र꣡श꣢स्तये म꣣हे꣢ ॥१०४४॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता रसागार परमात्मन् ! (तम् उ) उस (लोककृत्नुम्) लोकों के रचयिता (त्वा) तुझे हम (घृष्वये) बुराईयों से संघर्ष करने में समर्थ (मदाय) उत्साह के लिए (ईमहे) प्राप्त करते हैं। हम (महे) महती (प्रशस्तये) प्रशस्ति पाने के लिए (तव) तेरे हो जाएँ ॥८॥
भावार्थःपरमात्मा के साथ मित्रता संस्थापित करके ही मनुष्य जीवन में सफलता, विजय और यश पा सकता है ॥८॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
गो꣣षा꣡ इ꣢न्दो नृ꣣षा꣡ अ꣢स्यश्व꣣सा꣡ वा꣢ज꣣सा꣢ उ꣣त꣢ । आ꣣त्मा꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ पू꣣र्व्यः꣢ ॥१०४५॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी, आनन्द-रस से आर्द्र करनेवाले परमात्मदेव ! आप (गोषाः) गायों, वेदवाणियों, भूमियों वा इन्द्रियों को देनेवाले, (नृषाः) पुरुषार्थी वीर सन्तानों को देनेवाले, (अश्वसाः) घोड़ों और प्राणों को देनेवाले, (उत) और (वाजसाः) बल, अन्न, धन और विज्ञान को देनेवाले (असि) हो। आप (यज्ञस्य) परोपकार-रूप यज्ञ के (पूर्व्यः) सनातनकाल से चले आये (आत्मा) प्राण हो ॥९॥
भावार्थःअहो, महान् हैं जगदीश्वर के उपकार, जो हमें अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ उत्पन्न करके देता ह और ऐसा करता हुआ वह सबको परोपकार का उपदेश करता है ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣स्म꣡भ्य꣢मिन्दविन्द्रि꣣यं꣡ मधोः꣢꣯ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या । प꣣र्ज꣡न्यो꣢ वृष्टि꣣मा꣡ꣳ इ꣢व ॥१०४६॥
पदार्थःहे (इन्दो) रस के भण्डार, करुणासागर परमेश ! (वृष्टिमान्) वर्षा करनेवाले (पर्जन्यः इव) बादल के समान, आप (मधोः) मधुर आनन्द-रस की (धारया) धारा के साथ (अस्मभ्यम्) हम उपासकों के लिए (इन्द्रियम्) जीवात्मा से सेवित आत्मबल (पवस्व) प्रवाहित कीजिए ॥१०॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१०॥
भावार्थःबादल की रस-वर्षा से पृथिवी के समान परमेश्वर की आनन्द-वर्षा से मनुष्य की आत्मभूमि सरस, सद्गुणों से अङ्कुरित और हरी-भरी हो जाती है ॥१०॥ इस खण्ड में परमात्मा के गुण-कर्मों का, उपास्य-उपासक सम्बन्ध का, ब्रह्मानन्द-रस का और प्रसङ्गतः पर्जन्य का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ सप्तम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ना꣢ च सोम꣣ जे꣡षि꣢ च꣣ प꣡व꣢मान꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०४७॥
पदार्थःहे (पवमान) गतिशील, कर्मशूर, पवित्रतादायक (सोम) ऐश्वर्यवान्, शुभगुणकर्मों के प्रेरक जीवात्मन् ! तू (महि श्रवः) महान् यश व महान् शास्त्रश्रवण को (सन) प्राप्त कर, (जेषि च) और संसार के समराङ्गण में विजयलाभ कर। (अथ) और उसके अनन्तर (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥१॥
भावार्थःजो स्वयं परमात्मा का उपासक, पुरुषार्थी, शास्त्र की मर्यादा को सीखा हुआ और विजयशील है, वही दूसरों को प्रशस्त गुण-कर्मोंवाला परमैश्वर्यशाली बना सकता है ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ना꣣ ज्यो꣢तिः꣣ स꣢ना꣣ स्वा꣢३꣱र्वि꣡श्वा꣢ च सोम꣣ सौ꣡भ꣢गा । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०४८॥
पदार्थःहे (सोम) अग्रेगामी जीवात्मन् ! तू (ज्योतिः) दिव्य प्रकाश को (सन) प्राप्त कर, (स्वः) ब्रह्मानन्द को (सन) प्राप्त कर, (विश्वा च) और सब (सौभगा) सौभाग्यों को (सन) प्राप्त कर। (अथ) और उसके अनन्तर (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा ने सबसे उत्कृष्ट मानव-शरीर सब प्रकार की उन्नति करने के लिए प्राप्त किया है। इसलिए उसे चाहिए कि आध्यात्मिक और भौतिक सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष प्राप्त करे ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ना꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣢꣫ क्रतु꣣म꣡प꣢ सोम꣣ मृ꣡धो꣢ जहि । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०४९॥
पदार्थःहे (सोम) ऐश्वर्य उत्पन्न करने में समर्थ जीवात्मन् ! तू (दक्षम्) बल को (उत) और (क्रतुम्) कर्म तथा प्रज्ञान को (सन) प्राप्त कर। (मृधः) संग्रामकारी हिंसक काम-क्रोध आदि आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को (अप जहि) विनष्ट कर। (अथ) इस प्रकार अपना उत्कर्ष करने के अनन्तर (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥३॥
भावार्थःमनुष्य को चाहिए कि स्वयं बल, कर्म, प्रज्ञान, सारे ही ऐश्वर्य को सञ्चित करके तथा विघ्नकारियों को पराजित करके, सबका अगुआ बनकर दूसरों का भी उपकार करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡वी꣢तारः पुनी꣣त꣢न꣣ सो꣢म꣣मि꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५०॥
पदार्थःहे (पवीतारः) पवित्रता के कार्य में संलग्न मनुष्यो ! तुम (इन्द्राय पातवे) जीवात्मा के पान के लिए (सोमम्) ज्ञान, कर्म, उपासना के रस को (पुनीतन) पवित्र करो। (अथ) और उसके अनन्तर, हे पवित्र ज्ञान, कर्म, उपासनावाले मानव। तू (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥४॥
भावार्थःजिनके ज्ञान, कर्म और उपासना पवित्र होते हैं, उनकी सङ्गति से दूसरे लोग भी पवित्र अन्तःकरणवाले तथा ऐश्वर्यवान् हो जाते हैं ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्व꣡ꣳ सूर्ये꣢꣯ न꣣ आ꣡ भ꣢ज꣣ त꣢व꣣ क्र꣢त्वा꣣ त꣢वो꣣ति꣡भिः꣢ । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५१॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् वा राष्ट्र के स्रष्टा राजन् ! (त्वम्) आप (तव क्रत्वा) अपने कर्म वा प्रकृष्ट ज्ञान से, (तव ऊतिभिः) और अपनी रक्षाओं से (सूर्ये) सूर्यलोक के समान प्रकाशमय एवं सब उन्नतियों से युक्त राष्ट्र में (नः) हमें (आ भज) भागी बनाओ। (अथ) और उसके अनन्तर (नः) हमें (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) करो ॥५॥
भावार्थःयदि परमात्मा की कृपा, राजा का उद्योग, और प्रजाजनों का पुरुषार्थ हो, तो राष्ट्र में सूर्य के समान उन्नति का प्रकाश सर्वत्र फैल जाए ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त꣢व꣣ क्र꣢त्वा꣣ त꣢वो꣣ति꣢भि꣣र्ज्यो꣡क्प꣢श्येम꣣ सू꣡र्य꣢म् । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५२॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रताकारक शुभ गुणकर्मों के प्रेरक परमात्मन् वा राजन् ! (तव क्रत्वा) आपके कर्म वा प्रकृष्ट ज्ञान से, (तव ऊतिभिः) और आपकी रक्षाओं से, हम (ज्योक्) चिरकाल तक (सूर्यम्) सूर्य को (पश्येम) देखते रहें, अर्थात् दीर्घजीवी होवें। (अथ) और (नः) हमें, आप (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) करो ॥६॥
भावार्थःपरमात्मा और राजा की रक्षा तथा प्रेरणा प्राप्त करके विज्ञानयुक्त एवं कर्मण्य होकर प्रजाजन पुरुष की पूर्ण आयु जीनेवाले हो जाते हैं ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष स्वायुध꣣ सो꣡म꣢ द्वि꣣ब꣡र्ह꣢सꣳ र꣣यि꣢म् । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५३॥
पदार्थःहे (स्वायुध सोम) शस्त्रधारी के समान शासन करने में समर्थ परमात्मन् और उत्कृष्ट शस्त्रास्त्रों से युक्त राजन् ! आप (द्विबर्हसम्) व्यवहार और परमार्थ दोनों को बढ़ानेवाले (रयिम्) ऐश्वर्य को (अभ्यर्ष) प्राप्त कराइये। (अथ) इस प्रकार (नः) हमें (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर दीजिए ॥७॥
भावार्थःभौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों प्रकार का धन मनुष्य के अभ्युदय और निःश्रेयस के लिए समर्थ होता है ॥७॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भ्य꣢३र्षा꣡न꣢पच्युतो꣣ वा꣡जि꣢न्त्स꣣म꣡त्सु꣢ सा꣣स꣢हिः । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५४॥
पदार्थःहे (वाजिन्) बलवान् सोम अर्थात् वीर परमात्मन् वा राजन् ! (अनपच्युतः) विचलित न होनेवाले, (समत्सु सासहिः) देवासुरसंग्रामों में शत्रुओं का पराजय करनेवाले आप (अभ्यर्ष) क्रियाशील होवो। (अथ) और इस प्रकार (नः) हमें (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) करो ॥८॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना करके और राजा को उद्बोधन देकर सब आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं का उच्छेद करके लोग विजयी, ऐश्वर्यवान् तथा सुखी होवें ॥८॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्वां꣢ य꣣ज्ञै꣡र꣢वीवृध꣣न्प꣡व꣢मान꣣ वि꣡ध꣢र्मणि । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५५॥
पदार्थःहे (पवमान) जन-मानस को पवित्रता देनेवाले, क्रियाशील परमात्मन् वा राजन् ! (विधर्मणि) विशेष-धर्म-युक्त अन्तरात्मा में वा राष्ट्र में (त्वाम्) आप परमात्मा वा राजा को (यज्ञैः) उपासनायज्ञों वा राष्ट्रयज्ञों से प्रजाएँ (अवीवृधन्) बढ़ाती हैं। (अथ) अतः, आप (नः) हमें (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर दीजिए ॥९॥
भावार्थःपरमेश्वर को उपासना द्वारा अन्तरात्मा में बढ़ाकर और राजा को राष्ट्रसेवा रूप यज्ञों से राष्ट्र में बढ़ाकर उनकी सहायता से प्राप्त कीर्तियों तथा ऐश्वर्यों से प्रजाजन यशस्वी और ऐश्वर्यवान् होवें ॥९॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
र꣣यिं꣡ न꣢श्चि꣣त्र꣢म꣣श्वि꣢न꣣मि꣡न्दो꣢ वि꣣श्वा꣢यु꣣मा꣡ भ꣢र । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५६॥
पदार्थःहे (इन्दो) चन्द्रमा के समान आह्लाददायक परमैश्वर्यशालिन् जगदीश्वर वा राजन् ! आप (नः) हमारे लिए (चित्रम्) अद्भुत, चित्र-विचित्र (अश्विनम्) शीघ्रगामी, (विश्वायुम्) पूर्ण आयु देनेवाला अथवा सब मनुष्यों का हित करनेवाला (रयिम्) धन (आ भर) प्राप्त कराओ। (अथ) इस प्रकार (नः) हमें (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) करो ॥१०॥
भावार्थःवही धन वास्तव में धन होता है, जिससे पूर्ण आयु और सब मनुष्यों का हित सिद्ध हो। जो विलास में लिप्त करके आयु को क्षय करनेवाला तथा दीनजनों से द्वेष करनेवाला धन होता है वह धन नहीं, किन्तु मौत होती है ॥१०॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति꣣ धा꣡रा꣢ सु꣣त꣡स्यान्ध꣢꣯सः । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०५७॥
पदार्थः(सः) वह (मन्दी) स्तुतिकर्ता मनुष्य (सुतस्य) परमेश्वर के पास से परिस्रुत होकर आये हुए (अन्धसः) ब्रह्मानन्दरूप सोमरस की (धारा) धारा से (धावति) अन्तरात्मा को धो लेता है और (तरत्) दुःखसागर को तर जाता है। सचमुच, (मन्दी सः) मुदित हुआ वह (धावति) लक्ष्य के प्रति दौड़ लगाता है और (तरत्) ब्रह्मानन्द-सागर में तैरता रहता है ॥१॥ यहाँ प्रथम चरण की तृतीय चरण में आवृत्ति होने पर पादावृत्ति यमक अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर के ध्यान में जो लोग मग्न हो जाते हैं, वे उसके पास से बहती हुई आनन्द की तरङ्गिणी से धोये जाकर निर्मलात्मा होते हुए त्रिविध दुःखों से छूटकर मुक्त हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣣स्रा꣡ वे꣢द꣣ व꣡सू꣢नां꣣ म꣡र्त꣢स्य दे꣣व्य꣡व꣢सः । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०५८॥
पदार्थः(देवी) सत्य, न्याय, दया आदि दिव्य गुणों से युक्त, (उस्रा) ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस की परमेश्वररूप स्रोत से निकलती हुई धारा (मर्तस्य) मरणधर्मा मानव के (वसूनाम्) ऐश्वर्यों को (अवसः च) और रक्षा को (वेद) देना जानती है। उस धारा से (सः मन्दी) वह स्तोता (धावति) अपने अन्तरात्मा को धो लेता है और (तरत्) जन्म-मरण के बन्धन से तथा दुःखसमूह से तर जाता है ॥२॥
भावार्थःब्रह्मानन्द-रस की धारा से लोग आध्यात्मिक ऐश्वर्य तथा संकटों से रक्षा पाकर सांसारिक दुःख-सागर को तर जाते हैं ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ध्व꣣स्र꣡योः꣢ पुरु꣣ष꣢न्त्यो꣣रा꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢णि दद्महे । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०५९॥
पदार्थःब्रह्मानन्दरूप सोम की धारा से नहाए हुए हम (ध्वस्रयोः) दोषों का ध्वंस करनेवाले, (पुरुषन्त्योः) बहुत से लाभों को देनेवाले आत्मा और मन के (सहस्राणि) हजारों ऐश्वर्यों को (आदद्महे) ग्रहण करते हैं, क्योंकि (मन्दी) परमेश्वर का स्तोता (सः) वह आनन्द-मग्न मनुष्य (धावति) स्वयं को धो लेता है और (तरत्) दुःख-जाल को तर लेता है ॥३॥
भावार्थःआत्मा और मन को उद्बोधन देकर लोग हजारों से भी अधिक लाभों को प्राप्त कर सकते हैं और अन्त में वे परमात्मा में मग्न होकर मोक्षपद पा लेते हैं ॥३॥ यहाँ सायणाचार्य ‘ध्वस्र’ और ‘पुरुषन्ति’ को किन्हीं विशेष राजाओं के नाम मानते हैं। तदनुसार उन्होंने इस मन्त्र का अर्थ करते हुए लिखा है कि ‘ध्वस्र कोई एक राजा था, पुरुषन्ति कोई दूसरा। उन दोनों राजाओं के सहस्रों धन हम ले लें। वह हमारे द्वारा लिया हुआ धन उत्तम हो। इस प्रकार ऋषि सोम से प्रार्थना कर रहा है।’ सायण का यह लिखना सङ्गत नहीं है, क्योंकि सृष्टि के आदि में प्रोक्त वेदों में परवर्ती इतिहास नहीं हो सकता ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ ययो꣢꣯स्त्रि꣣ꣳश꣢तं꣣ त꣡ना꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢णि च꣣ द꣡द्म꣢हे । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०६०॥
पदार्थः(ययोः) दोषों का ध्वंस करनेवाले और बहुत से लाभों को देनेवाले जिन आत्मा और मन के (त्रिंशतम्) तीस (च) और (सहस्राणि) हजारों (तना) विस्तीर्ण ऐश्वर्य, हम (आदद्महे) ग्रहण कर लेते हैं, उन ऐश्वर्यों से (सः मन्दी) वह स्तोता (धावति) स्वयं को धो लेता है और (तरत्) शोक को तर जाता है, अर्थात् मुक्ति पा लेता है ॥ आत्मा और मन के तीस ऐश्वर्य इस प्रकार हैं—८ योगाङ्ग, २ अभ्यास-वैराग्य, १ प्रणवजप, १ वशीकार, १ अध्यात्मप्रसाद, ३ तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान, ४ वृत्तियाँ—मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा, ८ अणिमा आदि सिद्धियाँ, १ विवेकख्याति, १ कैवल्य। अनेक सहस्र ऐश्वर्य उन्हीं के महिमारूप हैं। आत्मा और मन को शुद्ध करके तथा उनका यथोचित उपयोग करके उपासक अगणित ऐश्वर्य प्राप्त कर सकता है, यह तात्पर्य है ॥४॥
भावार्थःकेवल भौतिक धन ही धन नहीं है, प्रत्युत उसकी अपेक्षा अधिक महान् धन आध्यात्मिक धन है, जिसे पाने के लिए मनुष्यों को यत्न करना चाहिए ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ते꣡ सोमा꣢꣯ असृक्षत गृणा꣣नाः꣡ शव꣢꣯से म꣣हे꣢ । म꣣दि꣡न्त꣢मस्य꣣ धा꣡र꣢या ॥१०६१॥
पदार्थः(एते) ये (गृणानाः) शास्त्रों का उपदेश करते हुए (सोमाः) विद्यारस के भण्डार गुरुजन ! (महे शवसे) महान् बल के लिए (मदिन्तमस्य) अत्यधिक आनन्ददायक ज्ञान की (धारया) धारा के साथ (असृक्षत) विद्यादान कर रहे हैं ॥१॥
भावार्थःयोग्य गुरुओं से ग्रहण की गयी विद्या शिष्यों की कीर्त्ति करनेवाली होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ गव्या꣢꣯नि वी꣣त꣡ये꣢ नृ꣣म्णा꣡ पु꣢ना꣣नो꣡ अ꣢र्षसि । स꣣न꣡द्वा꣢जः꣣ प꣡रि꣢ स्रव ॥१०६२॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् विद्यारस के भण्डार आचार्य ! (वीतये) हम शिष्यों की प्रगति के लिए (गव्यानि) इन्द्रियों के (नृम्णा) बलों को (पुनानः) पवित्र करते हुए, आप (अभि अर्षसि) हमारे प्रति आते हो। वे आप (सनद्वाजः) अन्न, धन आदि देते हुए (परि स्रव) बहो, अर्थात् हमें विद्या पढ़ाओ ॥२॥
भावार्थःकुलपति आचार्य छात्रों के चरित्रों को पवित्र करते हुए, उन्हें अन्न-वस्त्र-बल आदि प्रदान करते हुए अगाध विद्या पढ़ाएँ ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣢ नो꣣ गो꣡म꣢ती꣣रि꣢षो꣣ वि꣡श्वा꣢ अर्ष परि꣣ष्टु꣡भः꣢ । गृ꣣णानो꣢ ज꣣म꣡द꣢ग्निना ॥१०६३॥
पदार्थः(उत) और हे सोम अर्थात् विद्वान् आचार्य ! (जमदग्निना) समित्पाणि अग्निहोत्री शिष्यवर्ग से (गृणानः) स्तुति किये जाते हुए आप (नः) हम शिष्यों को (गोमतीः) वेदवाणी से युक्त, (परिष्टुभः) सहारा देनेवाली (विश्वाः) सब (इषः) अभीष्ट अपरा तथा परा नामक विद्याएँ (अर्ष) प्रदान करो, पढ़ाओ ॥३॥
भावार्थःआचार्य का भली-भाँति सत्कार करके, उसके पास से अध्यात्म विज्ञान और भौतिक विज्ञान सम्पूर्ण निष्ठा के साथ ग्रहण करके, विद्वान् होकर शिष्य समाज में ज्ञान का विस्तार करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
इ꣣म꣢꣫ꣳ स्तोम꣣म꣡र्ह꣢ते जा꣣त꣡वे꣢दसे꣣ र꣡थ꣢मिव꣣ सं꣡ म꣢हेमा मनी꣣ष꣡या꣢ । भ꣣द्रा꣢꣫ हि नः꣣ प्र꣡म꣢तिरस्य स꣣ꣳस꣡द्यग्ने꣢꣯ स꣣ख्ये꣡ मा रि꣢꣯षामा व꣣यं꣡ तव꣢꣯ ॥१०६४॥
पदार्थःहम (अर्हते) सुयोग्य (जातवेदसे) विद्वान् आचार्य के लिए (मनीषया) मनोयोग के साथ (इमं स्तोमम्) इस श्रद्धा-स्तोत्र को (सं महेम) भली-भाँति पहुँचाएँ, (रथम् इव) जैसे रथ को अन्यत्र पहुँचाते हैं। अभिप्राय यह है कि जैसे किसी पूज्य जन को अपने घर लाने के निमित्त उसके लिए सुन्दर रथ भेजते हैं, ऐसे ही आचार्य को अपने प्रति अनुकूल करने के लिए उसके प्रति श्रद्धा-वचन प्रेरित करें। (अस्य) इस विद्वान् आचार्य की (संसदि) सङ्गति में (नः) हमें (भद्रा हि) कल्याणकारी ही (प्रमतिः) श्रेष्ठ विद्या प्राप्त होती है। हे (अग्ने) विद्या, विनय आदि के प्रकाशक आचार्य ! (तव सख्ये) आपके साहचर्य में (वयम्) हम शिष्य (मा रिषाम) अज्ञान, दुराचार आदि से उत्पन्न होनेवाली क्षति को न प्राप्त करें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःविद्वान्, सदाचारी शिक्षणकला में कुशल आचार्य को वर कर उसकी सङ्गति में गुरुकुल में निवास करते हुए विनीत छात्र सुयोग्य और निर्दोष बनते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
भ꣡रा꣢मे꣣ध्मं꣢ कृ꣣ण꣡वा꣢मा ह꣣वी꣡ꣳषि꣢ ते चि꣣त꣡य꣢न्तः꣣ प꣡र्व꣢णापर्वणा व꣣य꣢म् । जी꣣वा꣡त꣢वे प्रत꣣रा꣡ꣳ सा꣢ध꣣या धि꣡योऽग्ने꣢꣯ स꣣ख्ये꣡ म रि꣢꣯षामा व꣣यं꣡ तव꣢꣯ ॥१०६५॥
पदार्थःहे आचार्यप्रवर ! (वयम्) आपके शिष्य हम (इध्मम्) समिधा (भराम) लायें अर्थात् समित्पाणि होकर आपके समीप आएँ। (ते) आपके लिए (हवींषि) समर्पण (कृणवाम) करें और फिर (पर्वणा पर्वणा) एक-एक खण्ड करके (चितयन्तः) पूर्ण ज्ञानी हो जाएँ। आप (जीवातवे) जीवन के लिए (प्रतराम्) अत्यन्त रूप से (धियः) हमारी बुद्धियों को (साधय) परिष्कृत कीजिए। हे (अग्ने) ज्ञानी आचार्य ! (वयम्) हम शिष्य (तव सख्ये) आपके साहचर्य में रहकर (मा रिषाम) निन्दा आदि से होनेवाली हिंसा को न प्राप्त हों ॥२॥
भावार्थःआचार्य के प्रति जो सर्वथा समर्पित हो जाते हैं, वे ही विद्वान् और सदाचारी होते हैं। एक-एक बूँद से जैसे घड़ा भरता है, वैसे ही कण-कण करके विद्या ग्रहण कर पण्डित बन जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
श꣣के꣡म꣢ त्वा स꣣मि꣡ध꣢ꣳ सा꣣ध꣢या꣣ धि꣢य꣣स्त्वे꣢ दे꣣वा꣢ ह꣣वि꣡र꣢द꣣न्त्या꣡हु꣢तम् । त्व꣡मा꣢दि꣣त्या꣡ꣳआ व꣢꣯ह꣣ तान्ह्यु꣢३꣱श्म꣡स्यग्ने꣢꣯ स꣣ख्ये꣡ मा रि꣢꣯षामा व꣣यं꣡ तव꣢꣯ ॥१०६६॥
पदार्थःहे आचार्यप्रवर ! हम शिष्य (त्वा) आपको (समिधं शकेम) ज्ञान-दानार्थ प्रदीप्त कर सकें। आप (धियः) हमारी बुद्धियों को (साधय) परिष्कृत करो। (त्वे) आपसे (आहुतम्) दिये गये (हविः) ग्राह्य ज्ञान को (देवाः) प्रमुदित शिष्य (अदन्ति) ग्रहण करते हैं। आप (आदित्यान्) आदित्य ब्रह्मचारी (आवह) समाज को प्राप्त कराओ, (तान् हि) उन्हें हम (अश्मसि) चाह रहे हैं। हे (अग्ने) विद्वन्, शिक्षणकला के ज्ञाता आचार्य ! (वयम्) हम शिष्य (तव सख्ये) आपके साहचर्य में (मा रिषाम) कभी दोषयुक्त वा क्षतिग्रस्त न हों ॥३॥
भावार्थःशिष्यों की समर्पण-रूप समिधा से जब आचार्य प्रदीप्त हो जाता है, तभी वह शिष्यों के साथ अन्तरङ्गता स्थापित करके अपनी कमायी हुई सब विद्या उन्हें दे देता है और उनका चारित्रिक विकास भी करता है ॥३॥ इस खण्ड में जीवात्मा के उद्बोधनपूर्वक परमात्मा, जीवात्मा, ब्रह्मानन्द एवं मोक्षप्राप्ति का वर्णन, आचार्य-शिष्य विषय का वर्णन और प्रसङ्गतः राजा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ सप्तम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आदित्याः| स्वर - षड्जः
प्र꣡ति꣢ वा꣣ꣳसू꣢र꣣ उ꣡दि꣢ते मि꣣त्रं꣡ गृ꣢णीषे꣣ व꣡रु꣢णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢ꣳ रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥
पदार्थः(सूरे उदिते) सूर्य के उदय होने पर मैं (वाम्) तुम दोनों (मित्रम्) मित्र जगदीश्वर और (वरुणम्) वरणीय जीवात्मा को, तथा (रिशादसम्) हिंसक दोषों के नाशक (अर्यमणम्) प्राण को (प्रति गृणीषे) एक-एक करके गुणवर्णनरूप स्तुति का विषय बनाता हूँ ॥१॥
भावार्थःप्रभातकाल में मनुष्यों को चाहिए कि अपने आत्मा को उद्बोधन देते हुए प्राणायामपूर्वक प्रतिदिन परमेश्वर की उपासना करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आदित्याः| स्वर - षड्जः
रा꣣या꣡ हि꣢रण्य꣣या꣢ म꣣ति꣢रि꣣य꣡म꣢वृ꣣का꣢य꣣ श꣡व꣢से । इ꣣यं꣡ विप्रा꣢꣯ मे꣣ध꣡सा꣢तये ॥१०६८॥
पदार्थःहे सर्वमित्र जगदीश्वर ! (इयं मतिः) यह हमारी बुद्धि वा स्तुति (हिरण्यया राया) सुवर्णरूप धन के साथ (अवृकाय) अखण्डित (शवसे) आत्मबल के लिए होवे और (विप्रा इयम्) विशेष रूप से पूर्ण करनेवाली यह बुद्धि वा स्तुति (मेधसातये) आपके साथ सङ्गम की प्राप्ति के लिए हो ॥२॥
भावार्थःअपने बुद्धि के बल से और परमेश्वर की स्तुति से हम चाँदी, सोना, मणि, मोती आदि धन को, पराजित न होनेवाले बल को और परमात्मा के साथ मिलाप को प्राप्त कर लें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आदित्याः| स्वर - षड्जः
ते꣡ स्या꣢म देव वरुण꣣ ते꣡ मि꣢त्र सू꣣रि꣡भिः꣢ स꣣ह꣢ । इ꣢ष꣣꣬ꣳ स्व꣢꣯श्च धीमहि ॥१०६९॥
पदार्थःहे (देव) प्रकाशक, ज्ञानी (वरुण) वरणीय जीवात्मन् ! हम (ते) तेरे (स्याम) होवें। हे (मित्र) मित्र परमात्मन् ! (सूरिभिः सह) विद्वानों सहित, हम (ते) तेरे (स्याम) होवें। (इषम्) अभीष्ट ऐश्वर्य को (स्वः च) और आनन्द को (धीमहि) धारण करें ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा और जीवात्मा की मित्रता प्राप्त करके सब मनुष्य ज्ञानवान्, प्रकाशवान्, आनन्दवान् और ऐश्वर्यवान् हों तथा मुक्ति को प्राप्त करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
भि꣣न्धि꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣢षः꣣ प꣢रि꣣ बा꣡धो꣢ ज꣣ही꣡ मृधः꣢꣯ । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१०७०॥
पदार्थःहे इन्द्र अर्थात् मेरे वीर अन्तरात्मन् ! तू (विश्वाः द्विषः) सब द्वेष करनेवाली शत्रु-सेनाओं को (अपभिन्धि) चीर दे, (बाधः) बाधा डालनेवाले (मृधः) हिंसकों को (परि जहि) चारों ओर नष्ट कर दे। जो (स्पाहर्म्) चाहने योग्य (वसु) दिव्य तथा भौतिक धन है, (तत्) उसका (आ भर) उपार्जन कर ॥१॥ यहाँ एक कर्ता कारक के साथ अनेक क्रियाओं का योग होने से दीपक अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य का अन्तरात्मा यदि प्रबुद्ध है, तो वह सब कुछ सिद्ध कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡स्य꣢ ते꣣ वि꣡श्व꣢मानु꣣ष꣡ग्भूरे꣢꣯र्द꣣त्त꣢स्य꣣ वे꣡द꣢ति । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१०७१॥
पदार्थःहे इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्यशाली परमात्मन् ! (यस्य ते) जिस तेरे (भूरेः) बहुत अधिक (दत्तस्य) दिये हुए धन के विषय में (विश्वम्) सारा संसार (आनुषक्) निरन्तर (वेदति) जानता है, (तत्) उस (स्पार्हम्) चाहने योग्य (वसु) आध्यात्मिक तथा भौतिक धन को (आ भर) हमें भी प्रदान कर ॥३॥
भावार्थःब्रह्माण्ड में जो कुछ भी धन बिखरा पड़ा है, वह सब परमात्मा का दिया हुआ ही है। हम भी अपने पुरुषार्थ से उस धन के भागी बनें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣢द्वी꣣डा꣡वि꣢न्द्र꣣ य꣢त्स्थि꣣रे꣡ यत्पर्शा꣢꣯ने꣣ प꣡रा꣢भृतम् । व꣡सु꣢ स्पा꣢र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१०७२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) मेरे वीर अन्तरात्मन् ! (यत्) जो धन (वीडौ) दृढ़ मनुष्य में, (यत्) जो धन (स्थिरे) अविचल मनुष्य में, (यत्) जो धन (पर्शाने) बादल के समान सींचनेवाले दानशील मनुष्य में (पराभृतम्) दूर देश से भी ले आया जाता है, (तत्) वह (स्पार्हम्) चाहने योग्य (वसु) आध्यात्मिक तथा भौतिक धन (आ भर) तू अपने पास ला, प्राप्त कर ॥३॥
भावार्थःसंसार में दृढ़ स्वभाववाले, सैकड़ों विघ्नों से भी विचलित न किये जानेवाले परोपकारी जन अपने पराक्रम से जिस ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेते हैं, उसे मैं क्यों नहीं पा सकता। हे मेरे अन्तरात्मन् ! तू भी दृढ़, अविचल और बरसानेवाला होकर सब प्रकार का धन सञ्चित कर ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
य꣣ज्ञ꣢स्य꣣ हि꣢꣫ स्थ ऋ꣣त्वि꣢जा꣣ स꣢स्नी꣣ वा꣡जे꣢षु꣣ क꣡र्म꣢सु । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ त꣡स्य꣢ बोधतम् ॥१०७३॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) जीवात्मा और प्राण एवं राजा और सेनापति ! तुम दोनों (यज्ञस्य) शरीर-यज्ञ एवं राष्ट्र-यज्ञ के (हि) निश्चय ही (ऋत्विजा) ऋत्विज्, संचालक (स्थः) हो, (वाजेषु) विज्ञानों में तथा (कर्मसु) कर्मों में (सस्नी) निष्णात हो। तुम दोनों (तस्य) उसे देहयज्ञ एवं राष्ट्रयज्ञ को (बोधतम्) करना वा कराना जानो ॥१॥
भावार्थःजीवात्मा और प्राण के आधिपत्य में वैयक्तिक शरीर-यज्ञ को भली-भाँति सञ्चालित करके राजा और सेनापति के सहयोग से राष्ट्र को उन्नत करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
तो꣣शा꣡सा꣢ रथ꣣या꣡वा꣢ना वृत्र꣣ह꣡णाप꣢꣯राजिता । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ त꣡स्य꣢ बोधतम् ॥१०७४॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) जीवात्मा और प्राण एवं राजा और सेनापति ! (तोशासा) सन्तुष्टि करनेवाले, (रथयावाना) देहरूप रथ से वा विमान आदि यान से गमन करनेवाले, (वृत्रहणा) शत्रु, विघ्न, पाप आदि को नष्ट करनेवाले, (अपराजिता) पराजित न होनेवाले तुम दोनों (तस्य) उस-उस कर्म को (बोधतम्) करना वा कराना जानो ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा और प्राण एवं राजा और सेनापति को नेता बनाकर वैयक्तिक, सामाजिक और राष्ट्रिय उन्नति सबको सिद्ध करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣣दं꣡ वां꣢ मदि꣣रं꣡ मध्वधु꣢꣯क्ष꣣न्न꣡द्रि꣢भि꣣र्न꣡रः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ त꣡स्य꣢ बोधतम् ॥१०७५॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) जीवात्मा और प्राण एवं राजा और सेनापति ! (वाम्) आप दोनों को लक्ष्य करके (नरः) पुरुषार्थी मनुष्यों ने (अद्रिभिः) वाणीरूपी सिलबट्टों से (इदम्) इस (मदिरम्) आनन्दजनक एवं उत्साहजनक (मधु) मधुर वीर रस को (अधुक्षन्) दुहा है। आप दोनों (तस्य) उस वीररस को (बोधतम्) पीना जानो ॥३॥
भावार्थःशरीर के अधिष्ठाता जीवात्मा, मन, प्राण आदि तथा राष्ट्र के अधिकारी राजा, सेनापति आदि में वीररस का संचार करके उनकी सहायता से सबको उत्कर्ष सिद्ध करना चाहिए ॥३॥ इस खण्ड में मित्र-वरुण-अर्यमा नामों से परमेश्वर-जीवात्मा-प्राण के विषय का, अन्तरात्मा के उद्बोधन का, परमात्मा से प्रार्थना का और इन्द्राग्नी नाम से जीवात्मा और प्राण एवं राजा और सेनापति के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सप्तम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢येन्दो म꣣रु꣡त्व꣢ते꣣ प꣡व꣢स्व꣣ म꣡धु꣢मत्तमः । अ꣣र्क꣢स्य꣣ यो꣡नि꣢मा꣣स꣡द꣢म् ॥१०७६॥
पदार्थःहे (इन्दो) ज्ञानरस के भण्डार आचार्य ! (मधुमत्तमः) अतिशय मधुर आप (मरुत्वते) उत्कृष्ट प्राणवाले (इन्द्राय) मुझ शिष्य के लिए (पवस्व) ज्ञानरस प्रवाहित कीजिए। मैं (अर्कस्य) पूजनीय आपके (योनिम्) विद्यागृह अर्थात् गुरुकुल में (आसदम्) आया हूँ ॥१॥
भावार्थःगुरुकुल में प्रविष्ट छात्रों को विद्वान्, मधुर स्वभाववाले गुरुजन प्रेम से सब विद्याएँ प्रदान करें और शिष्य श्रद्धा से उनका सत्कार करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
तं꣢ त्वा꣣ वि꣡प्रा꣢ वचो꣣वि꣢दः꣣ प꣡रि꣢ष्कृण्वन्ति धर्ण꣣सि꣢म् । सं꣡ त्वा꣢ मृजन्त्या꣣य꣡वः꣢ ॥१०७७॥
पदार्थःहे शिष्य ! (धर्णसिम्) विद्या का ग्रहण करनेवाले, (तं त्वा) गुरुकुल में प्रविष्ट हुए उस तुझको (वचोविदः) सम्पूर्ण वाङ्ग्मय के ज्ञानी (विप्राः) ब्राह्मण गुरुजन (परिष्कृण्वन्ति) परिष्कृत करते हैं, (आयवः) क्रियाशील आचार्य लोग (त्वा) तुझे (सं मृजन्ति) भली-भाँति शुद्ध करते एवं सद्गुणों से अलङ्कृत करते हैं ॥२॥
भावार्थःगुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे विद्या और सदाचार के दान से शिष्यों के हृदयों को परिष्कृत, शुद्ध और अलङ्कृत करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
र꣡सं꣢ ते मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣡ पिब꣢꣯न्तु꣣ व꣡रु꣢णः कवे । प꣡व꣢मानस्य म꣣रु꣡तः꣢ ॥१०७८॥
पदार्थःहे (कवे) मेधावी विद्वद्वर आचार्य ! (पवमानस्य ते) शिष्यों के जीवनों को पवित्र करनेवाले आपके (रसम्) विद्यारस को (मित्रः) सबके साथ मित्रवत् व्यवहार करनेवाला शिष्य, (वरुणः) अपने दोषों का निवारण करने के लिए प्रयत्नशील शिष्य, (अर्यमा) शत्रुओं का निग्रह करनेवाला शिष्य, (मरुतः) और अन्य सभी शिष्य (पिबन्तु) पान करें ॥३॥
भावार्थःशिष्यों की विभिन्न योग्यताएँ और विभिन्न गुण होते हैं। उनकी योग्यता के अनुसार उनका विकास गुरुओं को करना चाहिए। जिस-जिसमें ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व, वैश्यत्व आदि के गुण हों, उस-उसको उसके अनुरूप विद्यादान से उस-उस वर्ण का अधिकारी बनाना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
मृ꣣ज्य꣡मा꣢नः सुहस्त्या समु꣣द्रे꣡ वाच꣢꣯मिन्वसि । र꣣यिं꣢ पि꣣श꣡ङ्गं꣢ बहु꣣लं꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣢हं꣣ प꣡व꣢माना꣣꣬भ्य꣢꣯र्षसि ॥१०७९॥
पदार्थःहे (सुहस्त्य) उत्कृष्ट हस्तकला में कुशल जगदीश्वर ! (मृज्यमानः) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभावों से अलङ्कृत होते हुए आप (समुद्रे) अन्तरिक्ष में (वाचम्) विद्युद्गर्जना के शब्द को (इन्वसि) प्रेरित करते हो और हे (पवमान) सर्वान्तर्यामिन् ! आप (बहुलम्) प्रचुर, (पुरुस्पृह्म्) बहुत चाहने योग्य (पिशङ्गं रयिम्) पीले वर्ण के धन सुवर्ण आदि को (अभि) हमारी ओर (अर्षसि) भेजते हो ॥१॥
भावार्थःअन्तरिक्ष में बादलों का निर्माण, वर्षाकर्म आदि और विना ही शुल्क लिये बहूमूल्य धन आदि को उत्पन्न करना परमेश्वर का ही कर्म है ॥१॥
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छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
पु꣣नानो꣢꣫ वारे꣣ प꣡व꣢मानो अ꣣व्य꣢ये꣣ वृ꣡षो꣢ अचिक्रद꣣द्व꣡ने꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢ꣳ सोम पवमान निष्कृ꣣तं꣡ गोभि꣢꣯रञ्जा꣣नो꣡ अ꣢र्षसि ॥१०८०
पदार्थः(वारे) वरणीय (अव्यये) पार्थिवलोक में (पवमानः) पहुँचता हुआ और (पुनानः) पवित्रता करता हुआ (वृषा उ) सुख आदि की वर्षा करनेवाला परमात्मा (वने) मेघजल में (अचिक्रदत्) विघुद्गर्जना कराता है। हे (पवमान) पवित्रतादायक (सोम) जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! आप (देवानाम्) दिव्य अग्नि, जल, वायु आदि के (निष्कृतम्) घर अर्थात् भूलोक को (गोभिः) सूर्यकिरणों से (अञ्जानः) प्रकाशित करते हुए (अर्षसि) कर्मण्य बने हुए हो ॥२॥
भावार्थःअन्तरिक्ष में बादल गर्जाना, वर्षा द्वारा भूलोक को पवित्र करना, सूर्यकिरणों द्वारा भूमण्डल को प्रकाशित करना इत्यादि सब कर्म जगत्पति परमेश्वर ही करता है, अन्य कोई नहीं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣त꣢मु꣣ त्यं꣢꣫ दश꣣ क्षि꣡पो꣢ मृ꣣ज꣢न्ति꣣ सि꣡न्धु꣢मातरम् । स꣡मा꣢दि꣣त्ये꣡भि꣢रख्यत ॥१०८१॥
पदार्थः(सिन्धुमातरम्) आनन्द-रस बहानेवाली जगदम्बा जिसकी माता है, ऐसे (एतम् उ त्यम्) इस उस सोम नामक जीवात्मा को (दश क्षिपः) इन्द्रियदोषों को दूर फेंकनेवाले दस प्राण (मृजन्ति) अलङ्कृत करते हैं। यह सोम जीवात्मा (आदित्येभिः) सूर्य के समान ज्ञानप्रकाश से प्रकाशित गुरुजनों से (सम् अख्यत) विद्याप्रकाश को प्राप्त करता है ॥१॥
भावार्थःप्राणों से युक्त ही मनुष्य का आत्मा शरीर को जीवित किये रखता है और शरीर का अधिष्ठातृत्व करता है। गुरुओं के उपदेश के विना वह स्वयं ज्ञानी नहीं होता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡मिन्द्रे꣢꣯णो꣣त꣢ वा꣣यु꣡ना꣢ सु꣣त꣡ ए꣢ति प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣢ । स꣡ꣳ सूर्य꣢꣯स्य र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०८२॥
पदार्थः(इन्द्रेण) मन से (उत) और (वायुना) प्राण से (सुतः) अभिषुत ज्ञानरस (पवित्रे) पवित्र जीवात्मा में (सम् आ एति) समागत होता है और (सूर्यस्य रश्मिभिः) सूर्य की किरणों से अथवा चक्षु की वृत्तियों से (सम्) समागत होता है ॥२॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा जिस ज्ञान को सञ्चित करता है,उसमें मन, प्राण, नेत्र की वृत्तियाँ, अग्नि, वायु, सूर्यकिरणें, गुरुजन सभी कारण बनते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ नो꣣ भ꣡गा꣢य वा꣣य꣡वे꣢ पू꣣ष्णे꣡ प꣢वस्व꣣ म꣡धु꣢मान् । चा꣡रु꣢र्मि꣣त्रे꣡ वरु꣢꣯णे च ॥१०८३॥
पदार्थःहे ज्ञानरस ! (सः) वह (मधुमान्) मधुर तू (नः) हमारे (भगाय) सूर्य तुल्य राजा के लिए, (वायवे) गतिमान् सेनाध्यक्ष के लिए और (पूष्णे) पशुपालन, कृषि, व्यापार आदि से समाज का पोषण करनेवाले वैश्य के लिए (पवस्व) क्षरित हो और (चारुः) रमणीय तू (मित्रे) राष्ट्र के मित्र ब्राह्मण में (वरुणे च) और शत्रु-निवारक क्षत्रिय में (पवस्व) क्षरित हो ॥३॥
भावार्थःराष्ट्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, राजा, सेनापति, न्यायाध्यक्ष आदि और सामान्य प्रजाजन भी सभी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार ज्ञान का सञ्चय करनेवाले होवें, जिससे राष्ट्र प्रगतिपथ पर अग्रसर हो ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य, परमात्मा-जीवात्मा और ज्ञानरस का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ सप्तम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
रे꣣व꣡ती꣢र्नः सध꣣मा꣢द꣣ इ꣡न्द्रे꣢ सन्तु तु꣣वि꣡वा꣢जाः । क्षु꣣म꣢न्तो꣣ या꣢भि꣣र्म꣡दे꣢म ॥१०८४॥
पदार्थः(सधमादे) जहाँ मन, बुद्धि इन्द्रियाँ आदि सब मिलकर प्रहृष्ट होती हैं, उस योगयज्ञ में (नः) हम उपासकों की (रेवतीः) ऐश्वर्यवती मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदि वृत्तियाँ (तुविवाजाः) बहुत बलवती होती हुई (इन्द्रे) जीवात्मा में (सन्तु) विद्यमान होवें (याभिः) जिन वृत्तियों से (क्षुमन्तः) निवासयुक्त होकर हम (मदेम) आनन्दलाभ करें ॥१॥
भावार्थःप्राणियों के सुखभोगयुक्त होने पर उनके प्रति मैत्री की भावना रखे, दुःखियों के प्रति करुणा की, पुण्यात्माओं के प्रति मुदिता की और अपुण्यशीलों के प्रति उपेक्षा की। इस प्रकार भावना करनेवालों के अन्दर शुक्ल धर्म उत्पन्न हो जाता है। उससे चित्त प्रसादयुक्त होता है और प्रसन्न तथा एकाग्र होकर स्थितिपद को पा लेता है। ये चित्तवृत्तियाँ जब मनुष्य के आत्मा में उद्भूत होती हैं, तब चित्तप्रसाद से वह निवासयुक्त और आनन्दवान् हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣢ घ꣣ त्वा꣢वान्꣣ त्म꣡ना꣢ यु꣣क्तः꣢ स्तो꣣तृ꣡भ्यो꣢ धृष्णवीया꣣नः꣢ । ऋ꣣णो꣢꣫रक्षं꣣ न꣢ च꣣꣬क्र्योः꣢꣯ ॥१०८५॥
पदार्थःहे (धृष्णो) शत्रु को धर्षण करने के स्वभाववाले परमात्मन् ! (ईयानः) उपासकों से याचना किये हुए, (त्मना युक्तः) आत्मबल से युक्त (त्वावान्) स्वसदृश स्वयमेव आप (घ) निश्चय ही (स्तोतृभ्यः) उपासक योगियों को योगसिद्धि (ऋणोः) प्राप्त कराते हो, (चक्र्योः) दो रथचक्रों के मध्य में (अक्षं न) जैसे धुरी को रथकार प्राप्त कराता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे दोनों रथ के पहियों को धुरी की कीली से जोड़ने पर ही पहियों का घूमना और रथ का आगे जाना सम्भव होता है वैसे ही योगी को योगसिद्धि होने पर ही उसका लक्ष्य के प्रति आरोहण और मोक्षलाभ सिद्ध होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ यद्दुवः꣢꣯ शतक्रत꣣वा꣡ कामं꣢꣯ जरितॄ꣣णा꣢म् । ऋ꣣णो꣢꣫रक्षं꣣ न꣡ शची꣢꣯भिः ॥१०८६॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) सैकड़ों कर्मों को करनेवाले इन्द्र अर्थात् जगत्पति परमात्मन् ! उपासकों द्वारा आपके प्रति (यत् दुवः) जो पूजन (आ) किया जाता है, उससे प्रेरित आप (जरीतॄणाम्) स्तोताओं के (कामम्) मनोरथ को (आ ऋणोः) पूर्ण करो, रथ बनानेवाला कारीगर (शचीभिः) बुद्धिकौशलों वा कर्मों से (अक्षं न) जैसे रथचक्रों के मध्य में धुरी की कीली की पूर्ति करता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे रथ के पहियों के मध्य में धुरी की कीली जोड़े बिना रथ की गति नहीं हो सकती, वैसे ही परमात्मा के कृपायोग के बिना स्तोताओं की मनोरथपूर्ति सम्भव नहीं होती ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
सु꣣रूपकृत्नु꣢मू꣣त꣡ये꣢ सु꣣दु꣡घा꣢मिव गो꣣दु꣡हे꣢ । जु꣣हू꣢मसि꣣ द्य꣡वि꣢द्यवि ॥१०८७॥
पदार्थःहम (ऊतये) योगमार्ग में प्रवेश के लिए और सुरूपवान् पदार्थों की प्राप्ति के लिए (सुरूपकृत्नुम्) शुभ रूपों को अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधियों को करानेवाले गुरु को और सुन्दर रूपवान् पदार्थों के रचयिता शिल्पकार को (द्यविद्यवि) प्रतिदिन (जुहूमसि) बुलाते हैं, (गोदुहे) गोदुग्ध के इच्छुक गाय दुहनेवाले के लिए (सुदुघाम् इव) जैसे दुधारू गाय को बुलाते हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे गोदुग्ध पाने के लिए गाय बुलायी जाती है, वैसे ही योगाभ्यास के लिए योगी गुरु और शिल्प की उन्नति के लिए शिल्पकार को बुलाना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ नः꣣ स꣢व꣣ना꣡ ग꣢हि꣣ सो꣡म꣢स्य सोमपाः पिब । गो꣣दा꣢꣫ इद्रे꣣व꣢तो꣣ म꣡दः꣢ ॥१०८८॥
पदार्थःहे इन्द्र अर्थात् परमात्मा, राजा, आचार्य, योगी वा शिल्पकार ! आप (नः) हमारे (सवना) उपासना-यज्ञों में, प्रजाओं से किये गये उत्सवों में, शिक्षा-सत्रों में, योग-शिविरों में वा शिल्प-यज्ञों में (आगहि) आओ (सोमपाः) रस का पान करनेवाले आप (सोमस्य) भक्ति-रस, वीर-रस, विद्या-रस, ध्यान-रस वा कला-रस को (पिब) पान करो। (रेवतः) ऐश्वर्यवान् आपका (मदः) उत्साह (इत्) सचमुच (गोदाः) अध्यात्म प्रकाशों का, गायों का, वेदवाणियों का, योगशास्त्र के वचनों का वा शिल्पशास्त्र के वचनों का देनेवाला है ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना करके और राजा, आचार्य, योगी तथा शिल्पकार का सत्कार करके उनसे यथायोग्य लाभ सबको पाना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡था꣢ ते꣣ अ꣡न्त꣢मानां वि꣣द्या꣡म꣢ सुमती꣣ना꣢म् । मा꣢ नो꣣ अ꣡ति꣢ ख्य꣣ आ꣡ ग꣢हि ॥१०८९॥
पदार्थःहे इन्द्र अर्थात् परमात्मा, राजा, आचार्य, योग के गुरु वा शिल्पकार ! (अथ) और हम (ते) आपकी (अन्तमानाम्) समीपतम (सुमतीनाम्) सुमतियों को (विद्याम) जानें। आप (नः अति) हमें लाँघकर (मा ख्यः) अपना उपदेश मत करो, प्रत्युत (आगहि) हमारे पास आओ और आकर अपनी देनों का पात्र हमें बनाओ ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा, राजा, आचार्य, योगी और शिल्पी के जो ज्ञान और कर्म हैं, उनसे उपकार लेकर अपने आपको उन्नत करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -महापङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
उ꣣भे꣡ यदि꣢꣯न्द्र꣣ रो꣡द꣢सी आप꣣प्रा꣢थो꣣षा꣡ इ꣢व । म꣣हा꣡न्तं꣢ त्वा म꣣ही꣡ना꣢ꣳ स꣣म्रा꣡जं꣢ चर्षणी꣣ना꣢म् । दे꣣वी꣡ जनि꣢꣯त्र्यजीजनद्भ꣣द्रा꣡ जनि꣢꣯त्र्यजीजनत् ॥१०९०॥
पदार्थःहे (इन्द्र) वीर मानव ! (यत्) जो तूने (उषाः इव) उषा के समान (उभे रोदसी) आकाश-पृथिवी दोनों को (आ पप्राथ) अपने यश से पूर्ण किया हुआ है, ऐसे (महीनां महान्तम्) महानों में महान् (चर्षणीनां सम्राजम्) मनुष्यों के सम्राट् (त्वा) तुझे (देवी जनित्री) दिव्यगुणमयी माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है, (भद्रा जनित्री) श्रेष्ठ माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार और वीररस है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य अपनी महिमा को पहचानकर बड़े-बड़े कार्य कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -महापङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
दी꣣र्घ꣡ꣳ ह्य꣢ङ्कु꣣शं꣡ य꣢था꣣ श꣢क्तिं꣣ बि꣡भ꣢र्षि मन्तुमः । पू꣡र्वे꣢ण मघवन्प꣣दा꣢ व꣣या꣢म꣣जो꣡ यथा꣢꣯ यमः । दे꣣वी꣡ जनि꣢꣯त्र्यजीजनद्भ꣣द्रा꣡ जनि꣢꣯त्र्यजीजनत् ॥१०९१॥
पदार्थःहे (मन्तुमः) ज्ञानी वीर मानव ! तू (दीर्घं हि अंकुशं यथा) लम्बे अंकुश के समान (शक्तिम्) शक्ति को (बिभर्षि) धारण किये हुए है। हे (मघवन्) धन के धनी ! (पूर्वेण पदा) अगले पैर से (अजः) बकरा (वयां यथा) जैसे शाखा को पकड़ता है, वैसे तू शत्रुओं को (यमः) पकड़। तुझे (देवी जनित्री) दिव्यगुणमयी जगन्माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है, (भद्रा जनित्री) श्रेष्ठ मानवी माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है। दो उपमाओं की संसृष्टि है ॥२॥
भावार्थःहे मानव ! तू अपनी माता का नाम कलङ्कित मत करना। तू अपनी अद्वितीय शक्ति को पहचान। मित्रों से सौहार्द और शत्रुओं से संघर्ष करके समराङ्गण में विजय पा ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -महापङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣡व꣢ स्म दुर्हृणाय꣣तो꣡ मर्त्त꣢꣯स्य तनुहि स्थि꣣र꣢म् । अ꣣धस्पदं꣡ तमीं꣢꣯ कृधि꣣ यो꣢ अस्मा꣡ꣳ अ꣢भि꣣दा꣡स꣢ति । दे꣣वी꣡ जनि꣢꣯त्र्यजीजनद्भ꣣द्रा꣡ जनि꣢꣯त्र्यजीजनत् ॥१०९२॥
पदार्थःहे वीर मानव ! तू (दुर्हृणायतः मर्तस्य) दुःखप्रद मार करनेवाले दुष्ट मनुष्य के (स्थिरम्) दृढ़ बल को (अव तनुहि स्म) नीचा कर दे। (तम् ईम्) उसे (अधस्पदं कृधि) पादाक्रान्त कर दे (यः) जो शत्रु (अस्मान्) हम वीरों को (अभिदासति) दास बनाने का यत्न करता है। तुझे (देवी जनित्री) दिव्यगुणमयी जगन्माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है, (भद्रा जनित्री) श्रेष्ठ मानवी माता ने (अजीजनत्) जन्म दिया है ॥३॥
भावार्थःहे मानव ! गहरी नींद छोड़कर जाग उठ। तू दिव्य जननी का पुत्र है, भद्र जननी का पुत्र है। जो तुझे दास बनाना चाहता है, उसके मनसूबे को अपनी वीरता से विफल कर दे। संसार में सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त कर ॥३॥ इस खण्ड में योग, परमात्मा, वीरोद्बोधन तथा राजा, आचार्य, योगी एवं शिल्पकार का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सप्तम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ स्वा꣣नो꣡ गि꣢रि꣣ष्ठाः꣢ प꣣वि꣢त्रे꣣ सो꣡मो꣢ अक्षरत् । म꣡दे꣢षु सर्व꣣धा꣡ अ꣢सि ॥१०९३॥
पदार्थः(गिरिष्ठाः) पर्वत के समीपस्थ गुरुकुल में स्थित, (सोमः) ज्ञानरस का भण्डार आचार्य (स्वानः) ज्ञानरस को प्रेरित करता हुआ (पवित्रे) शिष्यों के पवित्र आत्मा में (परि अक्षरत्) ज्ञानरस को सींचता है। हे आचार्यवर ! (त्वम्) आप (मदेषु) प्रदान किये हुए आनन्दों में (सर्वधाः) सब शिष्यों को धारण करनेवाले (असि) होते हो ॥१॥
भावार्थःआचार्य शिष्य को जो ज्ञान और ब्रह्मानन्द प्रदान करता है, उसकी तुलना संसार में नहीं है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्वं꣢꣫ विप्र꣣स्त्वं꣢ क꣣वि꣢꣫र्मधु꣣ प्र꣢ जा꣣त꣡मन्ध꣢꣯सः । म꣡दे꣢षु सर्व꣣धा꣡ अ꣢सि ॥१०९४॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् ज्ञानरस के भण्डार आचार्य ! (त्वं विप्रः) आप ब्राह्मण-स्वभाववाले हो, (त्वं कविः) आप मेधावी और विद्वान् हो। आपके (अन्धसः) ज्ञानरस से (मधु प्रजातम्) मधुर ब्रह्मानन्द प्राप्त होता है। आप (मदेषु) प्रदत्त विद्यानन्दों में (सर्वधाः) सब शिष्यों के धारणकर्ता (असि) होते हो ॥२॥
भावार्थःज्ञान के अगाध समुद्र, ब्राह्मणवृत्ति, मेधावी, विद्वान् आचार्य से जो भौतिक और दिव्य ज्ञान तथा उस ज्ञान से उत्पन्न आनन्द प्राप्त होता है, उसके कारण वह सबका पूज्य होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्वे꣡ विश्वे꣢꣯ स꣣जो꣡ष꣢सो दे꣣वा꣡सः꣢ पी꣣ति꣡मा꣢शत । म꣡दे꣢षु सर्व꣣धा꣡ अ꣢सि ॥१०९५॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् ज्ञानरसागार आचार्य ! (विश्वे) सब (सजोषसः) परस्पर समान प्रीतिवाले (देवासः) दिव्यगुणयुक्त ब्रह्मचारी शिष्य (त्वे) आपसे (प्रतिम्) ज्ञानरस के पान को (आशत) प्राप्त करते हैं। आप (मदेषु) ज्ञानजनित आनन्दों में (सर्वधाः) सब शिष्यों को धारण करनेवाले (असि) होते हो ॥३॥
भावार्थःजो शिष्य तपस्वी, ज्ञानानुरागी, गुरुओं का सत्कार करनेवाले और अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि दिव्य गुणों से युक्त होते हैं, वे ही आचार्य के पास से ज्ञान ग्रहण करने के अधिकारी और उसके प्रीतिपात्र बनते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -यवमध्या गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ सु꣢न्वे꣣ यो꣡ वसू꣢꣯नां꣣ यो꣢ रा꣣या꣡मा꣢ने꣣ता꣡ य इडा꣢꣯नाम् । सो꣢मो꣣ यः꣡ सु꣢क्षिती꣣ना꣢म् ॥१०९६॥
पदार्थः(सः सोमः) वह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (सुन्वे) सब जगत् को उत्पन्न करता है, (यः) जो (रायाम्) विद्या, आरोग्य, सत्य, अहिंसा, न्याय, वैराग्य आदि धनों का, (यः) जो (इडानाम्) गायों और भूमियों का, (यः) और जो (सुक्षितीनाम्) जिनमें उत्कृष्ट मनुष्य निवास करते हैं, उन राष्ट्रों का (आनेता) लानेवाला है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कौन चाँदी, सोना, भूमि, अन्तरिक्ष, नदी, समुद्र, अग्नि, वायु, जल, विद्युत्, सूर्य, वृक्ष, वनस्पति, मनुष्य, गाय, घोड़े आदि जड़-चेतन पदार्थों का, वेदविद्या, सत्य, अहिंसा आदि गुणों का और धार्मिक जनों का उत्पन्न करनेवाला हो सकता है ? इस कारण उसकी हमें कृतज्ञतापूर्वक प्रशंसा, वन्दना और पूजा करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -सतोबृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
य꣡स्य꣢ त꣣ इ꣢न्द्रः꣣ पि꣢बा꣣द्य꣡स्य꣢ म꣣रु꣢तो꣣ य꣡स्य꣢ वार्य꣣म꣢णा꣣ भ꣡गः꣢ । आ꣡ येन꣢꣯ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा꣣ क꣡रा꣢मह꣣ ए꣢न्द्र꣣म꣡व꣢से म꣣हे꣢ ॥१०९७॥
पदार्थः(यस्य ते) जिस जगत्स्रष्टा तुझ जगदीश्वर के उत्पन्न किये रस को (इन्द्रः) सूर्य (पिबात्) पीता है, (यस्य) जिस तेरे उत्पन्न किये रस को (मरुतः) पवन पीते हैं, (यस्य वा) और जिस तेरे उत्पन्न किये रस को (अर्यमणा) शत्रु का नियमन करनेवाले बुद्धितत्त्व के साथ (भगः) मन पीता है, (येन) जिस तुझ सर्वान्तर्यामी और सर्वप्रेरक परमेश्वर की सहायता से, हम (मित्रावरुणा) प्राण-अपान को (आ करामहे) अपने अनुकूल करते हैं और जिस तेरी सहायता से (महे अवसे) महान् रक्षा के लिए (इन्द्रम्) जीवात्मा को (आ करामहे) अनुकूल करते हैं। (सः) वह तू सोम परमेश्वर (सुनुषे) सब भौतिक रसों को वा दिव्य आनन्दरस को अभिषुत करता है। [यहाँ ‘स सुन्वे’ इसका परिवर्तित रूप ‘स सुनुषे’ पूर्वमन्त्र से लाया गया है।] ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर के ही रस और शक्ति से सब शरीरस्थ मन, बुद्धि, प्राण आदि और बाह्य सूर्य, चाँद, तारे, बादल, पहाड़, समुद्र, धरती-आकाश आदि रसवान् और शक्तिमान् दिखायी देते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
तं꣡ वः꣢ सखायो꣣ म꣡दा꣢य पुना꣣न꣢म꣣भि꣡ गा꣢यत । शि꣢शुं꣣ न꣢ ह꣣व्यैः꣡ स्व꣢दयन्त गू꣣र्ति꣡भिः꣢ ॥१०९८॥
पदार्थःहे (सखायः) साथियो ! (वः मदाय) अपनी आनन्दप्राप्ति एवं उत्साहप्राप्ति के लिए, तुम (तम्) उस प्रसिद्ध (पुनानम्) पवित्र करनेवाले जगत्पति सोम परमेश्वर को (अभि) लक्ष्य करके (गायत) स्तुतिगीत गाओ। अन्य लोग भी उसे (गूर्तिभिः) अपने पुरुषार्थों से (स्वदयन्त) प्रसन्न किया करें, (शिशुं न) जैसे शिशुरूप यज्ञाग्नि को (हव्यैः) हवियों से तृप्त किया जाता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे यज्ञाग्नि हवियों से जागता है, वैसे परमात्मा मनुष्य के पुरुषार्थों से प्रसन्न होता है। सबको चाहिए कि उसके स्तुतिगीत गाते हुए अपने जीवन को उन्नत करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
सं꣢ व꣣त्स꣡ इ꣢व मा꣣तृ꣢भि꣣रि꣡न्दु꣢र्हिन्वा꣣नो꣡ अ꣢ज्यते । दे꣣वावी꣡र्मदो꣢꣯ म꣣ति꣢भिः꣣ प꣡रि꣢ष्कृतः ॥१०९९॥
पदार्थः(देवावीः) सदाचारी विद्वानों का रक्षक, (मदः) उत्साह देनेवाला, (इन्दुः) रस से सराबोर करनेवाला, रस का भण्डार परमेश्वर (हिन्वानः) स्तोताओं को शुभ गुण-कर्मों में प्रेरित करता हुआ, (मातृभिः) गौओं द्वारा (परिष्कृतः) जीभ से चाट कर स्वच्छ किये गए (वत्सः इव) बछड़े के समान (मतिभिः) स्तुतियों से (परिष्कृतः) अलङ्कृत होकर (समज्यते) अन्तरात्मा में प्रकट हो जाता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःगौओं द्वारा जीभ से चाटकर बछड़ा जैसे अलङ्कृत किया जाता है, वैसे ही स्तोताओं द्वारा स्तुतियों से परमेश्वर अलङ्कृत किया जाता है। तभी छिपा बैठा हुआ वह उपासक के अन्तरात्मा में प्रकट होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
अ꣣यं꣡ दक्षा꣢꣯य꣣ सा꣡ध꣢नो꣣ऽय꣡ꣳ शर्धा꣢꣯य वी꣣त꣡ये꣢ । अ꣣यं꣢ दे꣣वे꣢भ्यो꣣ म꣡धु꣢मत्तरः सु꣣तः꣢ ॥११००॥
पदार्थः(साधनः) सिद्धिप्रदाता (अयम्) यह पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता परमेश्वर (दक्षाय) आत्मबल के लिए होता है। (अयम्) यह परमेश्वर (शर्धाय) उत्साह देने के लिए और (वीतये) लोगों की प्रगति के लिए होता है। (सुतः) ध्यान किया गया (अयम्) यह (देवेभ्यः) विद्वान् सदाचारी उपासकों के लिए (मधुमत्तरः) अतिशय मधुर होता है ॥३॥
भावार्थःश्रद्धा से उपासना किया गया परमेश्वर उपासक को आत्मबल, उत्साह, प्रगति तथा वाणी, कर्म एवं व्यवहार में मधुरता प्रदान करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
सो꣡माः꣢ पवन्त꣣ इ꣡न्द꣢वो꣣ऽस्म꣡भ्यं꣢ गातु꣣वि꣡त्त꣢माः । मि꣣त्राः꣢ स्वा꣣ना꣡ अ꣢रे꣣प꣡सः꣢ स्वा꣣꣬ध्यः꣢꣯ स्व꣣र्वि꣡दः꣢ ॥११०१॥
पदार्थः(इन्दवः) मधुर व्यवहार से वा ज्ञानरस से आर्द्र करनेवाले, (अस्मभ्यं गातुवित्तमाः) हमारे लिए अतिशय मार्ग दिखानेवाले, (मित्राः) मित्रभूत, (स्वानाः) सद्गुणों को उत्पन्न करनेवाले, (अरेपसः) निष्पाप, (स्वाध्यः) उत्तम ध्यानवाले, (स्वविर्दः) दिव्य प्रकाश वा आनन्द को प्राप्त करानेवाले (सोमाः) ज्ञानरस के भण्डार गुरुजन वा सत्कर्मों में प्रेरित करनेवाले राजपुरुष (पवन्ते) शिष्यों वा प्रजाजनों के जीवनों को पवित्र करते हैं ॥१॥
भावार्थःगुरुजन और राजपुरुष यदि विद्वान्, मधुर, मार्गदर्शक, मित्र के समान व्यवहार करनेवाले, शिक्षा द्वारा सद्गुण उत्पन्न करनेवाले, निरपराध, निर्दोष,अपने कार्य में दत्तावधान और पवित्रकर्ता होते हैं, तभी वे शिष्यों और प्रजाओं की उन्नति करने में समर्थ हो पाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
ते꣢ पू꣣ता꣡सो꣢ विप꣣श्चि꣢तः꣣ सो꣡मा꣢सो꣣ द꣡ध्या꣢शिरः । सू꣡रा꣢सो꣣ न꣡ द꣢र्श꣣ता꣡सो꣢ जिग꣣त्न꣡वो꣢ ध्रु꣣वा꣢ घृ꣣ते꣢ ॥११०२॥
पदार्थः(पूतासः) पवित्र, (विपश्चितः) विद्वान्, (दध्याशिरः) ज्ञान के धारणकर्त्ता और परिपक्व, (सूरासः न) सूर्यों के समान (दर्शतासः) दर्शनीय तथा दृष्टि देनेवाले, (जिगत्नवः) गतिमान् एवं कर्मण्य और (घृते) विवेक के प्रकाश में (ध्रुवाः) स्थिर रहनेवाले जो हों, (ते) वे ही (सोमासः) विद्या, धर्म, आदि की प्रेरणा करनेवाले गुरु और राजपुरुष होवें ॥२॥
भावार्थःजो पवित्र आचरणवाले, विविध विद्याओं को पढ़े हुए, दूसरों की सहायता करनेवाले, परिपक्वमति, सूर्य के समान प्रकाशक, कर्मशूर स्थिर प्रकाशवाले, विघ्नों से बार-बार प्रहार किये जाते हुए भी ग्रहण किये कार्य को न छोड़नेवाले गुरु और राजपुरुष होते हैं, वे ही सफल होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
सु꣣ष्वाणा꣢सो꣣ व्य꣡द्रि꣢भि꣣श्चि꣡ता꣢ना꣣ गो꣡रधि꣢꣯ त्व꣣चि꣢ । इ꣡ष꣢म꣣स्म꣡भ्य꣢म꣣भि꣢तः꣣ स꣡म꣢स्वरन्वसु꣣वि꣡दः꣢ ॥११०३॥
पदार्थः(अद्रिभिः) मेघों के समान सरस मनों से (सुष्वाणासः) उपदेश देनेवाले, (गोः) राष्ट्रभूमि के (त्वचि अधि) पृष्ठ पर (चितानाः)शिक्षण कला वा राजनीति को जाननेवाले, (वसुविदः) विद्याधन वा सुवर्ण आदि धन को प्राप्त करानेवाले गुरु वा राजपुरुष(इषम्) अभीष्ट ज्ञान वा धन (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (अभितः)सब ओर से (समस्वरन्) घोषित करें अर्थात् प्रदान करें ॥३॥
भावार्थःगुरुओं वा राजपुरुषों को विद्वान् कीर्त्तिमान्, विद्योपदेशक तथा अभीष्ट धन आदि प्राप्त करानेवाला होना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣या꣢ प꣣वा꣡ प꣢वस्वै꣣ना꣡ वसू꣢꣯नि माꣳश्च꣣त्व꣡ इ꣢न्दो꣣ स꣡र꣢सि꣣ प्र꣡ ध꣢न्व । ब्र꣣ध्न꣢श्चि꣣द्य꣢स्य꣣ वा꣢तो꣣ न꣢ जू꣣तिं꣡ पु꣢रु꣣मे꣡धा꣢श्चि꣣त्त꣡क꣢वे꣣ न꣡रं꣢ धात् ॥११०४॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी, आनन्दरस से सराबोर करनेवाले परमात्मन्, आप (अया) इस (पवा) धारा के साथ (एना) इन (वसूनी) दिव्य और भौतिक धनों को (पवस्व) प्रवाहित करो, (मांश्चत्वे) अभिमानी काम-क्रोध आदि शत्रुओं को नष्ट करनेवाले (सरसि) गतिशील जीवात्मा में (प्र धन्व) पहुँचो, (पुरुमेधाः चित्) बहुत मेधावी मनुष्य भी (तकवे) प्रगति के लिए (यस्य) जिन आपके (नरम्) नेतृत्व के गुण को (धात्) धारण करता है, (ब्रध्नः चित्) महान् (वातः) वायु (न) जैसे (जूतिम्) वेग को (धात्) धारण करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःवायु आदि सभी प्राकृतिक पदार्थ और सभी मनुष्य परमात्मा के ही पास से अपनी-अपनी शक्ति पाते हैं, उसके सरंक्षण के बिना वे कुछ भी नहीं कर सकते ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
उ꣣त꣡ न꣢ ए꣣ना꣡ प꣢व꣣या꣡ प꣢व꣣स्वा꣡धि꣢ श्रु꣣ते꣢ श्र꣣वा꣡य्य꣢स्य ती꣣र्थे꣢ । ष꣣ष्टि꣢ꣳ स꣣ह꣡स्रा꣢ नैगु꣣तो꣡ वसू꣢꣯नि वृ꣣क्षं꣢꣫ न प꣣क्वं꣡ धू꣢नव꣣द्र꣡णा꣢य ॥११०५॥
पदार्थः(पूतासः) पवित्र, (विपश्चितः) विद्वान्, (दध्याशिरः) ज्ञान के धारणकर्त्ता और परिपक्व, (सूरासः न) सूर्यों के समान (दर्शतासः) दर्शनीय तथा दृष्टि देनेवाले, (जिगत्नवः) गतिमान् एवं कर्मण्य और (घृते) विवेक के प्रकाश में (ध्रुवाः) स्थिर रहनेवाले जो हों, (ते) वे ही (सोमासः) विद्या, धर्म, आदि की प्रेरणा करनेवाले गुरु और राजपुरुष होवें ॥२॥
भावार्थःजो पवित्र आचरणवाले, विविध विद्याओं को पढ़े हुए, दूसरों की सहायता करनेवाले, परिपक्वमति, सूर्य के समान प्रकाशक, कर्मशूर स्थिर प्रकाशवाले, विघ्नों से बार-बार प्रहार किये जाते हुए भी ग्रहण किये कार्य को न छोड़नेवाले गुरु और राजपुरुष होते हैं, वे ही सफल होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
म꣢ही꣣मे꣡ अ꣢स्य꣣ वृ꣢ष꣣ ना꣡म꣢ शू꣣षे꣡ माꣳश्च꣢꣯त्वे वा꣣ पृ꣡श꣢ने वा꣣ व꣡ध꣢त्रे । अ꣡स्वा꣢पयन्नि꣣गु꣡तः꣢ स्ने꣣ह꣢य꣣च्चा꣢पा꣣मि꣢त्रा꣣ꣳ अ꣢पा꣣चि꣡तो꣢ अचे꣣तः꣢ ॥११०६॥
पदार्थः(अस्य) इस सोम अर्थात् वीररस के भण्डार राजा की (इमे) ये (वृष नाम) वर्षक गुणवाली, (शूषे)बलवान् (मही) विशाल भुजाएँ हैं, जो (मांश्चत्वे वा) घोड़ों से होनेवाले संग्राम में (पृशने वा) अथवा परस्पर स्पर्श जिसमें होता है, ऐसे मल्लयुद्ध में (वधत्रे) शत्रुओं का वध करनेवाली हैं। वह वीर राजा (निगुतः) किले, खाई आदि में छिपे हुए शत्रुओं को (अस्वापयत्) सुला देता है, अर्थात् धराशायी कर देता है, (स्नेहयत् च) और मित्रों पर स्नेह करता है। आगे प्रत्यक्षरूप से वर्णन है—हे सोम, शान्तिप्रिय प्रजाध्यक्ष ! आप (इतः) इस राष्ट्र से (अमित्रान्) द्रोहकारी रिपुओं को (अप अच) दूर कर दो, (अचितः) अविवेकी, अधार्मिक नास्तिकों को (अप अच) दूर कर दो। इस प्रकार राष्ट्र में परमेश्वर के प्रचार के लिए और वेदप्रचार के लिए कटिबद्ध होवो ॥३॥
भावार्थःसभी वीर राष्ट्रवासी शत्रुओं को नष्ट करनेवाले तथा परमात्मा की पूजा करनेवाले तभी होते हैं, जब राष्ट्र का अध्यक्ष उसमें रुचि ले ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य, उपास्य-उपासक और आस्तिक राजा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सप्तम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢ग्ने꣣ त्वं꣢ नो꣣ अ꣡न्त꣢म उ꣣त꣢ त्रा꣣ता꣢ शि꣣वो꣡ भु꣢वो वरू꣣꣬थ्यः꣢꣯ ॥११०७॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन्, राजन् वा विद्वन् आचार्य ! आप (नः) हमारे (अन्तमः) निकटतम (उत) और (त्राता) अपराधों से रक्षा करनेवा्ले, तथा (शिवः) मङ्गलकारी, (वरूथ्यः) और वरणीय (भुवः) होओ ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा, राजा और आचार्य का संरक्षण पाकर लोग दोषों से मुक्त, निरपराध, निश्छल, निष्पाप,विद्वान्, ब्रह्मज्ञ और सदाचारी हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
व꣡सु꣢र꣣ग्नि꣡र्वसु꣢꣯श्रवा꣣ अ꣡च्छा꣢ नक्षि द्यु꣣म꣡त्त꣢मो र꣣यिं꣡ दाः꣢ ॥११०८॥
पदार्थः(अग्निः) अग्रनायक परमात्मा, राजा वा विद्वान् आचार्य (वसुः) सद्गुणों का निवासक और (वसुश्रवाः) विद्यादि धनों से कीर्तिमान् है। हे परमात्मन् राजन् वा आचार्य ! आप (अच्छ) हमारे अभिमुख (नक्षि) प्राप्त होओ। (द्युमत्तमः) अत्यधिक तेजस्वी आप (रयिम्) विविध दिव्य और भौतिक धन (दाः) दो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा, राजा और आचार्य के गुण-कर्मों को देखकर उनसे लोगों को लाभ प्राप्त करना योग्य है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
तं꣡ त्वा꣢ शोचिष्ठ दीदिवः सु꣣म्ना꣡य꣢ नू꣣न꣡मी꣢महे꣣ स꣡खि꣢भ्यः ॥११०९॥
पदार्थःहे (शोचिष्ठ) अत्यधिक पवित्र और अतिशय पवित्रकर्ता, (दीदिवः) सत्य के प्रकाशक परमात्मन्, राजन् वा आचार्य। (तं त्वा) उन आपसे हम (नूनम्) निश्चय ही (सखिभ्यः) साथियों के (सुम्नाय) सुख के लिए (ईमहे) याचना करते हैं ॥३॥
भावार्थःजो स्वयं पवित्र ह्रदयवाला और सत्य का समर्थक है, वही दूसरों को वैसा बना सकता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
इ꣣मा꣢꣫ नु कं꣣ भु꣡व꣢ना सीषधे꣣मे꣡न्द्र꣢श्च꣣ वि꣡श्वे꣢ च दे꣣वाः꣢ ॥१११०
पदार्थःहम (इन्द्रः च) हमारा जीवात्मा (विश्वे च देवाः) और मन, बुद्धि, प्राण, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय रूप अन्य देव मिलकर (नु कम्) शीघ्र ही (इमा भुवना) इन सब सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, भूमि आदि भुवनों को (सीषधेम) सिद्ध् करें, अर्थात् उनके विषय में ज्ञान प्राप्त कर तथा साधनों का प्रयोग करके उन्हें अपने अनुकूल करें ॥१॥
भावार्थःविद्वानों को चाहिए कि सब भूगोल और खगोल की विद्याएँ जानकर अन्य लोकों से होनेवाले सब लाभों को प्राप्त करें तथा उनसे सम्भावित हानियों को दूर करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
य꣣ज्ञं꣡ च꣢ नस्त꣣꣬न्वं꣢꣯ च प्र꣣जां꣡ चा꣢दि꣣त्यै꣡रिन्द्रः꣢꣯ स꣣ह꣡ सी꣢षधातु ॥११११॥
पदार्थः(इन्द्रः) हमारा जीवात्मा (आदित्यैः सह) सूर्य के समान ज्ञानसाधक मन-बुद्धि सहित ज्ञानेन्द्रियों के साथ मिलकर, अथवा (इन्द्रः) राष्ट्र का राजा (आदित्यैः सह) विद्वानों के साथ मिलकर (नः) हमारे (यज्ञं च) यज्ञ को, (तन्वं च) शरीर को (प्रजां च) और सन्तति वा राष्ट्र की प्रजा को (सीषधातु) सिद्ध करे ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा मन, बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करके सब कुछ सिद्ध कर सकता है। उसी प्रकार विद्वान् प्रजाजन, राजा और राज्याधिकारी मिलकर पुरुषार्थ से सब यज्ञ-सुख, देह-सुख, सन्तति-सुख और प्रजा-सुख सिद्ध कर सकते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
आ꣣दित्यै꣢꣫रिन्द्रः꣣ स꣡ग꣢णो म꣣रु꣡द्भि꣢र꣣स्म꣡भ्यं꣢ भेष꣣जा꣡ क꣢रत् ॥१११२॥
पदार्थः(इन्द्रः) जीवात्मा (आदित्यैः) मन-बुद्धिसहित ज्ञानेन्द्रियों और (मरुद्भिः) प्राणों के (सगणः) गण से युक्त होकर, अथवा (इन्द्रः) राजा (आदित्यैः) सूर्यसम प्रकाशक ब्राह्मणों और (मरुद्भिः) योद्धा सैनिकों के (सगणः) गण से युक्त होकर (अस्मभ्यम्) हम मनुष्यों के लिए (भेषजा) औषध (करत्) करे ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्य के शरीर वा राष्ट्र में जो कुछ भी कष्ट होता है,उसका शरीर में स्थित जीवात्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदि वा राष्ट्र में स्थित राज्याधिकारी ब्राह्मण और वीर सैनिक युक्ति से प्रतीकार करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
प्र꣡ व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषते ॥१११३॥
पदार्थःहे शिष्यो वा हे प्रजाजनो ! (वः) तुम (वृत्रहन्तमाय) दोषों वा शत्रुओं के अतिशय विनाशक, (विप्राय) विद्वान् (इन्द्राय) आचार्य वा राजा के लिए (गाथम्) गुणवर्णनपरक स्तोत्र (प्र गायत) भली-भाँति गाओ, (यम्) जिस स्तोत्र को, वह (जुजोषते) प्रीति के साथ सेवन करे ॥१॥
भावार्थःशिष्यों को गुरुओं के और प्रजाजनों को राजा के गुणों का कीर्तन करके उनसे यथायोग्य विद्या, विनय, राष्ट्र का उत्थान आदि लाभ प्राप्त करने चाहिएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अर्च꣢꣯न्त्यर्कं मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः ॥१११४॥
पदार्थःप्रथम—गुरु और शिष्य के पक्ष में। (स्वर्काः) शुभ वेदमन्त्रों का पाठ करनेवा्ले (मरुतः) प्राणायाम के अभ्यासी शिष्य (अर्कम्) पूजनीय आचार्यदेव का (अर्चन्ति) सत्कार करते हैं। (श्रुतः) प्रसिद्ध, (युवा) युवा के तुल्य सक्रिय (सः इन्द्रः) वह आचार्य, उन्हें (आ स्तोभति) विद्या आदि के प्रदान द्वारा सहारा देता है ॥ द्वितीय—राजा और प्रजा के पक्ष में। (स्वर्काः) सूर्यसम अतितेजस्वी (मरुतः) राष्ट्रवासी मनुष्य (अर्कम्) तेजस्वी राजा का (अर्चन्ति) सत्कार करते हैं। (श्रुतः) सबके द्वारा जिसके गुण सुने गये हैं, ऐसा (युवा) युवक (सः इन्द्रः) वह वीर राजा, उनकी (आ स्तोभति) शरण देकर रक्षा करता है ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःशिष्यों से सत्कार किया गया आचार्य और प्रजाजनों से सत्कार किया गया राजा पूर्णरूप से उनका हित करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र ॥१११५॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विद्वन् आचार्य वा परमैश्वर्यशाली वीर श्रेष्ठ राजन् ! हम (ते) आपको (धीमहे) आचार्य के पद वा राजा के पद पर प्रतिष्ठित करते हैं। (तव) आपके (मधुमति) मधुर (प्रक्षे) ज्ञान के झरने में वा ऐश्वर्य के झरने में (उप क्षियन्तः) निवास करते हुए, हम (रयिम्) विद्याधन को वा सुवर्ण, वस्त्र, आभूषण आदि धन को (पुष्येम) पुष्ट रूप से प्राप्त करें ॥३॥
भावार्थःआचार्य के पद पर वा राजा के पद पर यदि सुयोग्य विद्वान् पुरुष प्रतिष्ठापित किया जाए, तो वह सब शिष्यों वा प्रजाजनों को विद्वान् वा धनपति कर सकता है ॥३॥ इस खण्ड में अध्यात्म और अधिराष्ट्र तथा गुरु-शिष्य और राजा-प्रजा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सप्तम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥ सप्तम अध्याय समाप्त ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ काव्य꣢꣯मु꣣श꣡ने꣢व ब्रुवा꣣णो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ ज꣡नि꣢मा विवक्ति । म꣡हि꣢व्रतः꣣ शु꣡चि꣢बन्धुः पाव꣣कः꣢ प꣣दा꣡ व꣢रा꣣हो꣢ अ꣣꣬भ्ये꣢꣯ति꣣ रे꣡भ꣢न् ॥१११६॥
पदार्थः(उशना इव) मनुष्यों के हितकाङ्क्षी परमेश्वर के समान अर्थात् जैसे परमेश्वर ने सृष्टि के आदि में वेदकाव्य का उपदेश किया था, वैसे ही (काव्यम्) वेदकाव्य को (प्र ब्रुवाणः) छात्रों के लिए उपदेश करता हुआ (देवः) दिव्य गुणों से युक्त सोम अर्थात् विद्यारस का भण्डार आचार्य (देवानाम्) जगत् के दिव्य पदार्थ सूर्य, चन्द्र, विद्युत्, नक्षत्र, जल, वायु, अग्नि, पर्वत, नदी, समुद्र आदियों के (जनिम्) जन्म की (विवत्ति) व्याख्या करता है अर्थात् कैसे उन पदार्थों की उत्पत्ति हुई, उन पदार्थों में क्या गुण हैं, क्या उनका उपयोग है, आदि बातें शिष्यों को बतलाता है। (महिव्रतः) महान् व्रतों और महान् कर्मोंवाला, (शुचिबन्धुः) पवित्र परमेश्वर जिसका बन्धु है, ऐसा (पावकः) पवित्रता देनेवाला (वराहः) जलवर्षी बादल के समान विद्यावर्षी आचार्य (पदा) शास्त्रों के सुबन्त एवं तिङन्त पदों का (रेभन्) उच्चारण करता हुआ (अभ्येति) पढ़ाने के लिए आता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःसब शास्त्रों में पारंगत, सुयोग्य आचार्य शास्त्र के गूढ़ तत्त्व का भी इस प्रकार उपदेश करता है, जिससे विद्यार्थियों की बुद्धि में वह विषय हस्तामलकवत् स्पष्ट हो जाता है। स्वयं पवित्र, दूसरों को पवित्र करनेवाला, परमेश्वर का सखा वह आचार्य छात्रों का वन्दनीय होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
प्र꣢ ह꣣ꣳसा꣡स꣢स्तृ꣣प꣡ला꣢ व꣣ग्नु꣢꣫मच्छा꣣मा꣢꣫दस्तं꣣ वृ꣡ष꣢गणा अयासुः । अ꣣ङ्गोषि꣢णं꣣ प꣡व꣢मान꣣ꣳ स꣡खा꣢यो दु꣣र्म꣡र्षं꣢ वा꣣णं꣡ प्र व꣢꣯दन्ति सा꣣क꣢म् ॥१११७॥
पदार्थः(तृपला) शीघ्रकारी, (वृषगणाः) धार्मिक गणवाले, (हंसासः) हंसों के समान नीरक्षीर विवेकी, निर्मल हृदयवाले छात्र (अमात्) विद्याबल प्राप्त करने के हेतु से (वग्नुम् अच्छ) वाचस्पति आचार्य के प्रति (अस्तम्) गुरुकुलरूप घर में (अयासुः) जाते हैं। (सखाय) सहाध्यायी वे (साकम्) एक साथ मिलकर (अङ्गोषिणम्) वेदों का आघोष करनेवाले, (पवमानम्) ह्रदयों को पवित्र करनेवाले, (दुर्मर्षम्) दुर्धर्ष, (वाणम्) सेवनीय आचार्य को (प्रवदन्ति) पढ़ाने के लिए निवेदन करते हैं ॥२॥ यहाँ ‘हंसासः’ में लुप्तोपमा है। वाणीवाचक ‘वग्नु’ शब्द लक्षणावृत्ति से ‘वाचस्पति’ अर्थ को लक्षित करता है, जिसमें वाणी पर अधिकार का अतिशय व्यङ्ग्य है ॥२॥
भावार्थःसुयोग्य गुरुजन सुयोग्य शिष्यों को जब पा लेते हैं,तभी दोनों यशस्वी होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
स꣡ यो꣢जत उरुगा꣣य꣡स्य꣢ जू꣣तिं꣢ वृथा꣣ क्री꣡ड꣣न्तं मिमते꣣ न꣡ गावः꣢꣯ । प꣣रीणसं꣡ कृ꣢णुते ति꣣ग्म꣡शृ꣢ङ्गो꣣ दि꣢वा꣣ ह꣢रि꣣र्द꣡दृ꣢शे꣣ न꣡क्त꣢मृ꣣ज्रः꣢ ॥१११८॥
पदार्थः(सः) वह सोम चन्द्रमा (उरुगायस्य) विस्तीर्ण ग्रहोपग्रहों में जिसका प्रकाश पहुँचता है, ऐसे सूर्य के (जूतिम्) वेगवान् किरणसमूह को (योजते) अपने साथ जोड़ता है। (वृथा) अनायास (क्रीडन्तम्) भूमि और सूर्य के चारों ओर क्रीड़ा करनेवाले उस चन्द्रमा को (गावः) सूर्यकिरणें (न मिमते) सम्पूर्ण रूप में व्याप्त नहीं करतीं, किन्तु जितने भाग में सूर्यकिरणें पहुँचती हैं, चन्द्रमा का उतना ही भाग प्रकाशित होता है। तो भी कभी-कभी (तिग्मशृङ्गः) तीक्ष्ण किरणोंवाला सूर्य चन्द्रमा को (परीणसम्) परि व्याप्त (कृणुते) कर लेता है, तब पूर्णिमा में चन्द्रमा पूर्णतः प्रकाशित हो जाता है। वह चन्द्रमा (दिवा) दिन में (हरिः) हरा-काला सा (ददृशे) दिखाई देता है, (नक्तम्) रात्रि में (ऋज्रः) शुभ्र ॥३॥
भावार्थःपृथिवी सूर्य के चारों ओर घूमती है और चन्द्रमा पृथिवी के चारों ओर घूमता-घूमता पृथिवी के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करता है। चन्द्रमा सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है। चन्द्रमा की जितनी कलाओं पर सूर्य-किरणें पहुँचती हैं, उतनी ही कलाएँ प्रकाशित दिखती हैं। प्रतिपदा को एक कला, द्वितीया को दो कलाएँ, तृतीया को तीन कलाएँ, अष्टमी को आठ कलाएँ, और पूर्णमासी को सब कलाएँ प्रकाशित होती हैं। अमावस्या को चन्द्रमा पर कहीं भी सूर्य-किरणों के न पहुँचने से सारा ही चन्द्र-मण्डल अन्धकार से ढका रहता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सूर्य-किरणें हमेशा चन्द्रमा के एक गोलार्ध पर ही पड़ती हैं, अतः दूसरे गोलार्ध में सदा अन्धेरा ही रहता है। गुरुओं को चाहिए कि चन्द्रमा के प्रकाशित होने का यह नियम तथा भूगोल और खगोल सम्बन्धी अन्य भी नियम शिष्यों को उपदेश करते रहें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ स्वा꣣ना꣢सो꣣ र꣡था꣢ इ꣣वा꣡र्व꣢न्तो꣣ न꣡ श्र꣢व꣣स्य꣡वः꣢ । सो꣡मा꣢सो रा꣣ये꣡ अ꣢क्रमुः ॥१११९॥
पदार्थः(सोमासः) विद्वान् गुरु लोग (रथाः इव) रथों के समान (स्वानासः) शब्द करनेवाले और (अर्वन्तः इव) आक्रमणकारी योद्धाओं के समान (श्रवस्यवः) कीर्ति के इच्छुक होते हुए (राये) विद्यारूप ऐश्वर्य के लिए अर्थात् राष्ट्र में विद्यारूप ऐश्वर्य उत्पन्न करने के लिए (प्र अक्रमुः) उद्योग करते हैं ॥४॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःजैसे सड़क पर चलते हुए रथ शब्द करते हैं, वैसे ही गुरुजन पढ़ाते समय भाषण करते हैं। जैसे युद्ध करने में उद्भट योद्धागण विजय की कीर्ति चाहते हैं, वैसे ही गुरु लोग राष्ट्र में सुयोग्य विद्वानों को उत्पन्न करके उनसे प्राप्त होनेवाली कीर्ति की कामना करते हैं ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
हि꣣न्वाना꣢सो꣣ र꣡था꣢ इव दधन्वि꣣रे꣡ गभ꣢꣯स्त्योः । भ꣡रा꣢सः का꣣रि꣡णा꣢मिव ॥११२०॥
पदार्थः(इव) जैसे (हिन्वानासः) चलते हुए (रथाः) रथ और (इव) जैसे (कारिणाम्) भारवाहक कर्मचारियों के (भरासः) भार (गभस्त्योः) बाहुओं से (दधन्विरे) धारण किये जाते हैं, वैसे ही (सोमासः) विद्वान् गुरुजन राजा द्वारा और गृहस्थ प्रजाजनों द्वारा धन आदि के दान से (दधन्विरे) धारण किये जाते हैं। यहाँ ‘सोमासः’ पद पूर्वमन्त्र से लाया गया है ॥५॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे मार्ग पर चलते हुए रथ घोड़ों की लगाम के नियन्त्रण द्वारा बाहुओं से धारण किये जाते हैं और जैसे सिर पर भार ढोते हुए श्रमिक उस भार को बाहुओं से धारण किये रखते हैं, वैसे ही विद्वान् गुरुजन राजकीय सहायता द्वारा धारण किये जाने चाहिएँ ॥५॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
रा꣡जा꣢नो꣣ न꣡ प्रश꣢꣯स्तिभिः꣣ सो꣡मा꣢सो꣣ गो꣡भि꣢रञ्जते । य꣣ज्ञो꣢꣫ न स꣣प्त꣢ धा꣣तृ꣡भिः꣢ ॥११२१॥
पदार्थः(राजानः न) राजा लोग जैसे (प्रशस्तिभिः) विजय-प्रशस्तियों से भासित होते हैं, (यज्ञः न) मानसयज्ञ जैसे (सप्त धातृभिः) मन, बुद्धि, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय इन सात होताओं से भासित होता है अथवा (यज्ञः न) अग्निष्टोम यज्ञ जैसे (सप्त धातृभिः) सप्त होताओं से शोभित होता है, वैसे ही (सोमासः) विद्वान् गुरुलोग (गोभिः) ज्ञान-रश्मियों से वा वेद-वाणियों से (अञ्जते) भासित होते हैं ॥६॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥६॥
भावार्थःराजा लोग जैसे प्रशस्ति-गीतों से शोभित होते हैं, यज्ञ जैसे ऋत्विजों से शोभित होता है। वैसे ही गुरुलोग विद्या, ब्रह्मसाक्षात्कार, तेज, तप, प्रेम, क्षमा और मधुर व्यवहार से शोभा पाते हैं ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ स्वा꣣ना꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वो꣣ म꣡दा꣢य ब꣣र्ह꣡णा꣢ गि꣣रा꣢ । म꣡धो꣢ अर्षन्ति꣣ धा꣡र꣢या ॥११२२॥
पदार्थः(स्वानासः) पढ़ाने के समय शुद्धोच्चारण या भाषण करनेवाले (इन्दवः) तेजस्वी, विद्यारस से भिगोनेवाले गुरुलोग (मदाय) शिष्यों के आनन्द के लिए (बर्हणा) विरोधियों के सिद्धान्तों का खण्डन करनेवाली (गिरा) वाणी से (मधो) मधुर ज्ञानरस की (धारया) धारा के साथ (परि अर्षन्ति) शिष्यों को चारों ओर प्राप्त होते हैं ॥७॥
भावार्थःशिष्यों के प्रति आगाध प्रेम से परिप्लुत विद्वान् गुरु लोग उनके हित के लिए उन्हें ज्ञानधारा से सींचते हैं ॥७॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣣पाना꣡सो꣢ वि꣣व꣡स्व꣢तो꣣ जि꣡न्व꣢न्त उ꣣ष꣢सो꣣ भ꣡ग꣢म् । सू꣢रा꣣ अ꣢ण्वं꣣ वि꣡ त꣢न्वते ॥११२३॥
पदार्थः(आपानासः) ज्ञानरस के कुएँ के समान, (सूराः) सूर्य के समान तेजस्वी गुरु लोग (विवस्वतः) अन्धकार को दूर करनेवाले सूर्य की, तथा (उषसः) उषा की (भगम्) शोभा को (जिन्वन्तः) शिष्यों के हृदयों में प्रेरित करते हुए (अण्वम्) सूक्ष्म से सूक्ष्म भी विज्ञान को (वितन्वते) शिष्य की बुद्धि में फैला देते हैं ॥८॥
भावार्थःजैसे उषा और सूर्य रात्रि के अन्धेरे को चीरकर भूमि पर प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही गुरुजन शिष्यों के अज्ञानरूप अन्धकार को दूर करके सूक्ष्म से सूक्ष्म विज्ञान को उनके सम्मुख हस्तामलकवत् कर देते हैं और विद्या की ज्योति से उनके आत्मा को चमका देते हैं ॥८॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣢प꣣ द्वा꣡रा꣢ मती꣣नां꣢ प्र꣣त्ना꣡ ऋ꣢ण्वन्ति का꣣र꣡वः꣢ । वृ꣢ष्णो꣣ ह꣡र꣢स आ꣣य꣡वः꣢ ॥११२४॥
पदार्थः(प्रत्नाः) पुरातन अर्थात् ज्ञान एवं आयु में वृद्ध, (कारवः) मौखिक एवं व्यावहारिक विद्याओं के शिल्पकार, (आयवः) कर्मयोगी गुरुलोग (वृष्णः) सुखवर्षी ज्ञान को (हरसे) शिष्यों के अन्तरात्मा में लाने के लिए (मतीनाम्) शिष्यों की बुद्धियों के (द्वारा) द्वारों को (अप ऋण्वन्ति) खोल देते हैं ॥९॥
भावार्थःगुरुओं को चाहिए कि वे शिष्यों की बुद्धियों के बन्द द्वारों को खोलकर उन्हें गम्भीर ज्ञान के ग्रहण करने योग्य करके पण्डित बना दें ॥९॥
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छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣣मीचीना꣡स꣢ आशत꣣ हो꣡ता꣢रः स꣣प्त꣡जा꣢नयः । प꣣द꣡मे꣢꣯कस्य꣣ पि꣡प्र꣢तः ॥११२५॥
पदार्थः(समीचीनासः) भली-भाँति पढ़ाने आदि कर्म में तत्पर, (सप्तजानयः) अग्नि की सात ज्वालाएँ, जिन्हें पत्नी के समान प्रिय हैं अर्थात् जो अग्निहोत्री हैं, ऐसे (होतारः) विद्यायज्ञ के होता के समान विद्वान् गुरु लोग (एकस्य) एक परमेश्वर के (पदम्) स्वरूप को (पिप्रतः) छात्रों के अन्तःकरण में भरते हुए (आशत) विद्यागृह में कार्यरत रहते हैं ॥१०॥ अग्नि की सात ज्वालाएँ मु० उप० १।२।४ में प्रोक्त ‘काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची’ समझनी चाहिएँ ॥१०॥
भावार्थःगुरु-शिष्य आपस में मिलकर विद्या-यज्ञ को सिद्ध करेंऔर विविध विद्याओं के पढ़ने-पढ़ाने के साथ ब्रह्म के स्वरूप को भी साक्षात् करें तथा कराएँ ॥१०॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ना꣢भा꣣ ना꣡भिं꣢ न꣣ आ꣡ द꣢दे꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ सू꣡र्यं꣢ दृ꣣शे꣢ । क꣣वे꣡रप꣢꣯त्य꣣मा꣡ दु꣢हे ॥११२६॥
पदार्थःमैं गुरु द्वारा निर्दिष्ट उपाय से (नाभा) केन्द्रभूत अन्तरात्मा में (नः) अपने (नाभिम्) केन्द्रभूत परमात्मा को (आ ददे) ग्रहण करता हूँ, (चक्षुषा) अन्दर की आँख से ((सूर्यम्) सूर्यसम प्रभावान् उस परमात्मा को (दृशे) देखने के लिए समर्थ होता हूँ। (कवेः) कवि सोम परमात्मा की (अपत्यम्) सन्तान वेदकाव्य को (आ दुहे) दुहता हूँ ॥११॥
भावार्थःआचार्य द्वारा वेद दुहने की कला को सीखकर जो वेदार्थों को दुहते हैं और वेदप्रतिपाद्य परमेश्वर की आराधना करते हैं, उनका जीवन सफल हो जाता है ॥११॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣢ प्रि꣣यं꣢ दि꣣व꣢स्प꣣द꣡म꣢ध्व꣣र्यु꣢भि꣣र्गु꣡हा꣢ हि꣣त꣢म् । सू꣡रः꣢ पश्यति꣣ च꣡क्ष꣢सा ॥११२७॥
पदार्थः(प्रियम्) प्रिय, (दिवः) द्युलोक के (पदम्) प्रतिष्ठापक, (गुहा हितम्) गुफा में निहित अर्थात् गुह्य सोम नामक परमात्मा को (अध्वर्युभिः) योग-यज्ञ के अध्वर्यु-रूप योगप्रशिक्षक गुरुओं के द्वारा शिक्षा दिया हुआ (सूरः) विद्वान् उपासक (चक्षसा) अन्तर्दृष्टि से (अभि पश्यति) साक्षात्कार कर लेता है ॥१२॥
भावार्थःसुयोग्य योगप्रशिक्षक गुरुओं से योग का अभ्यास करके उपासक जन चर्म-चक्षुओं से अदृश्य, सर्वान्तर्यामी परमात्मा की अनुभूति पाने में समर्थ हो जाते हैं ॥१२॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य के विषय का तथा गुरु द्वारा प्रदर्शित मार्ग से परमात्मा के साक्षात्कार का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ अष्टम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡सृ꣢ग्र꣣मि꣡न्द꣢वः प꣣था꣡ धर्म꣢꣯न्नृ꣣त꣡स्य꣢ सु꣣श्रि꣡यः꣢ । वि꣣दाना꣡ अ꣢स्य꣣ यो꣡ज꣢ना ॥११२८॥
पदार्थः(सुश्रियः) उत्तम श्रीवाले, (इन्दवः) तेजस्वी, ज्ञानरस से भिगोनेवाले विद्वान् गुरु लोग (ऋतस्य पथा) सत्य के मार्ग से (धर्मन्) धर्म में (असृग्रम्) तत्पर होते हैं, क्योंकि वे (अस्य) इस धर्ममार्ग की (योजना)क्रियान्वयन-पद्धतियों को (विदानाः) जानते हैं ॥१॥
भावार्थःविद्वान् लोग स्वयं भी सत्य और धर्म के मार्ग में चलें तथा योजनाएँ बनाकर दूसरों को भी उस मार्ग पर चलाएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢꣫ धारा꣣ म꣡धो꣢ अग्रि꣣यो꣢ म꣣ही꣢र꣣पो꣡ वि गा꣢꣯हते । ह꣣वि꣢र्ह꣣विः꣢षु꣣ व꣡न्द्यः꣢ ॥११२९॥
पदार्थः(अग्रियः) अगुआ श्रेष्ठ, (हविःषु) हवि देनेवालों में (हविः) उत्कृष्ट हवि देनेवाला, (वन्द्यः) वन्दनीय सोम अर्थात् ज्ञान के उत्पादक विद्वान् (महीः अपः) महान् कर्मों को (विगाहते) आलोडित करता है अर्थात् ज्ञान के अनुकूल कर्मों का आचरण करता है। उसके पास से (मधोः) मधुर ज्ञानरस की (धारा) धारा (प्र) प्रवाहित होती है ॥२॥
भावार्थःवही विद्वान् प्रशंसनीय है, जो ज्ञान के अनुकूल कर्म भी करता है और सबके लिए ज्ञान की मधुर धाराएँ बहाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ यु꣣जा꣢ वा꣣चो꣡ अ꣢ग्रि꣣यो꣡ वृषो꣢꣯ अचिक्रद꣣द्व꣡ने꣢ । स꣢द्मा꣣भि꣢ स꣣त्यो꣡ अ꣢ध्व꣣रः꣢ ॥११३०॥
पदार्थः(अग्रियः) श्रेष्ठ, (वृषा) ज्ञान की वर्षा करनेवाला, (सत्यः) सत्यनिष्ठ, (अध्वरः) यज्ञमय जीवनवाला विद्वान् गुरु (वने) जंगल में (सद्म अभि) गुरुकुलरूप घर में (वाचः युजा) वाणी के योग से (उ) निश्चय ही (प्र अचिक्रदत्) शिष्यों को कर्त्तव्यों का उपदेश करता है ॥३॥
भावार्थःपर्वतों के एकान्त में नदियों के सङ्गम पर गुरुकुलों का संचालन करते हुए सत्यनिष्ठ गुरु शिष्यों को पढ़ाकर विद्वान्, कर्तव्यपरायण और सदाचारी करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣢रि꣣ य꣡त्काव्या꣢꣯ क꣣वि꣢र्नृ꣣म्णा꣡ पु꣢ना꣣नो꣡ अर्ष꣢꣯ति । स्व꣢꣯र्वा꣣जी꣡ सि꣢षासति ॥११३१॥
पदार्थः(कविः) क्रान्तद्रष्टा, बुद्धिमान्, कविहृदय, विद्वान् आचार्य (नृम्णा) बलों को (पुनानः) पवित्र करता हुआ (यत्) जब (काव्या) वेदादि काव्यों की (परि अर्षति) व्याख्या करता है, तब (वाजी) बलवान् और विज्ञानवान् वह शिष्यों को (स्वः) आनन्द (सिषासति)प्रदान करना चाहता है ॥४॥
भावार्थःविद्वान् आचार्य की वेदादिशास्त्रों की व्याख्या शिष्यों को परमानन्द देनेवाली और उनकी ज्ञानवृद्धि करनेवाली होती है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानो अ꣣भि꣢꣫ स्पृधो꣣ वि꣢शो꣣ रा꣡जे꣢व सीदति । य꣡दी꣢मृ꣣ण्व꣡न्ति꣢ वे꣣ध꣡सः꣢ ॥११३२॥
पदार्थः(यत्) जब (ईम्) इस आचार्य को (वेधसः) अन्य विद्वान् गुरु (ऋण्वन्ति) प्राप्त होते हैं, तब यह (विशः) प्रजाओं को (राजा इव) जैसे राजा वैसे (पवमानः) पवित्र आचरणवाला करता हुआ (स्पृधः) विद्यायज्ञ में विघ्न डालनेवाले स्पर्धालुओं को (अभि सीदति) दूर कर देता है ॥५॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःआचार्य दूसरे सुयोग्य गुरुजनों की सहायता से ही छात्रों को विद्वान् और पवित्र हृदयवाला करने में समर्थ होता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣢व्या꣣ वा꣢रे꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣यो꣢꣫ हरि꣣र्व꣡ने꣢षु सीदति । रे꣣भो꣡ व꣢नुष्यते म꣣ती꣢ ॥११३३॥
पदार्थः(प्रियः), प्रिय (हरिः) चित्त को हरनेवाला वा दोषों को दूर करनेवाला आचार्य (अव्याः वारे) पृथिवी के चुने हुए स्थान पर (वनेषु) एकान्त जंगलों में (परि सीदति) स्थित होता है। (रेभः) विद्या का उपदेष्टा वह (मती) मति से (वनुष्यते) विद्या के विघ्नों को नष्ट करता है ॥६॥
भावार्थःविद्यारूप यज्ञ के लिए वन का एकान्त प्रदेश ही चुनना चाहिए, जहाँ विद्या में विघ्न डालनेवाले नगरों के प्रलोभन न हों ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ वा꣣यु꣡मिन्द्र꣢꣯म꣣श्वि꣡ना꣢ सा꣣कं꣡ मदे꣢꣯न गच्छति । र꣢णा꣣ यो꣡ अ꣢स्य꣣ ध꣡र्म꣢णा ॥११३४॥
पदार्थः(यः) जो शिष्य (अस्य) इस सोम के अर्थात् विद्याप्रेरक आचार्य के (धर्मणा) नियम से (रण) चलता है, (सः) वह शिष्य (मदेन साकम्) उत्साह के साथ (वायुम्) प्राणविद्या वा पवनविद्या को (इन्द्रम्) आत्मविद्या वा विद्युद्-विद्या को और (अश्विना) मन-बुद्धि की विद्या वा सूर्य-चन्द्र की विद्या को (गच्छति) प्राप्त कर लेता है ॥७॥
भावार्थःशिष्यों को चाहिए कि समर्पणभाव से गुरुओं के संरक्षण में रहते हुए सब विद्याएँ पढ़कर वायु, बिजली आदि के प्रयोग से यान, यन्त्र आदि चलाएँ, सब भूगोल-खगोल का ज्ञान प्राप्त करें और आध्यात्मिक सिद्धियाँ पाएँ ॥७॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣢ मि꣣त्रे꣡ वरु꣢꣯णे꣣ भ꣢गे꣣ म꣡धोः꣢ पवन्त ऊ꣣र्म꣡यः꣢ । वि꣣दाना꣡ अ꣢स्य꣣ श꣡क्म꣢भिः ॥११३५॥
पदार्थः(मधोः) मधुर ज्ञान-रस वा ब्रह्मानन्द-रस की (ऊर्मयः) तरङ्गें (मित्रे) मित्रभूत जीवात्मा में, (वरुणे) दोषनिवारक मन में और (भगे) सेवनीय प्राण में (आ पवन्ते) आती हैं। (विदानाः) उन तरङ्गों को प्राप्त करनेवाले लोग (अस्य) इस मधुर ज्ञान वा ब्रह्मानन्द की (शक्मभिः) शक्तियों से युक्त हो जाते हैं ॥८॥
भावार्थःज्ञान व ब्रह्मानन्द की तरङ्गों से शरीर में स्थित सब कुछ मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियाँ आदि और रोम-रोम तरङ्गित हो जाता है ॥८॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣स्म꣡भ्य꣢ꣳ रोदसी र꣣यिं꣢꣫ मध्वो꣣ वा꣡ज꣢स्य सा꣣त꣡ये꣢ । श्र꣢वो꣣ व꣡सू꣢नि꣣ स꣡ञ्जि꣢तम् ॥११३६॥
पदार्थःहे (रोदसी) आत्मा और मन ! तुम दोनों (मध्वः) मधुर सोम की अर्थात् ज्ञानरस और आनन्दरस की (सातये) प्राप्ति के लिए (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (रयिम्) भौतिक चाँदी, सोना आदि धन, (श्रवः) यश वा शास्त्रश्रवण और (वसूनि) आध्यात्मिक धारणा, ध्यान, समाधि, योगसिद्धि, विवेकख्याति आदि धन (सञ्जितम्) जीतो ॥९॥
भावार्थःज्ञान वा ब्रह्मानन्द में मन लगाने के लिए पहले धन, धर्म आदि का उपार्जन अपेक्षित होता है ॥९॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣢ ते꣣ द꣡क्षं꣢ मयो꣣भु꣢वं꣣ व꣡ह्नि꣢म꣣द्या꣡ वृ꣢णीमहे । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥११३७॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक, विद्या-सद्गुणों आदि के प्रेरक जगदीश्वर वा आचार्य ! हम (ते) आपके (मयोभुवम्) सुखजनक, (वह्निम्) जीवनरथ को आगे ले जानेवाले, (पान्तम्) रक्षक, (पुरुस्पृहम्) बहुत चाहने योग्य (दक्षम्) विद्याबल, धर्मबल और सच्चरित्रता के बल को (अद्य) आज (आ वृणीमहे) पाना चाहते हैं ॥१०॥
भावार्थःपरमात्मा और आचार्य से ग्रहण किये गए विद्या, धर्म, तप, तेज, ब्रह्मवर्चस, सच्चरित्रता आदि के बल शिष्यों का कल्याण करनेवाले होते हैं ॥१०॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣢ म꣣न्द्र꣡मा वरे꣢꣯ण्य꣣मा꣢꣫ विप्र꣣मा꣡ म꣢नी꣣षि꣡ण꣢म् । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥११३८॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् ज्ञान-रस वा ब्रह्मानन्द-रस के प्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! हम (मन्द्रम्) आनन्दप्रदायक आपको (आ) वरते हैं, (वरेण्यम्) वरणीय आपको (आ) वरते हैं, (विप्रम्) विशेष रूप से धन-धान्य-विद्या-आरोग्य आदियों से पूर्ण करनेवाले आपको (आ) वरते हैं, (मनीषिणाम्) मनीषी आपको (आ) वरते हैं, (पान्तम्) विघ्न, विपत्ति, अविद्या आदि से रक्षा करनेवाले और (पुरुस्पृहम्) बहुत स्पृहणीय आपको (आ) वरते हैं। [यहाँ आ की बार-बार आवृत्ति की गयी है। उसके साथ ‘वृणीमहे’ पद पूर्वमन्त्र से आ जाता है] ॥११॥
भावार्थःअसंख्य गुणों से विभूषित, शुभ गुण-कर्म-स्वभाववाले, विपत्तियों को दूर करनेवाले, सम्पत्तिप्रदाता, विद्या-आनन्द आदि प्राप्त करानेवाले, सरस सोम-नामक परमात्मा और आचार्य को वर कर, उपासना और सत्कार करके अपरिमित लाभ सबको प्राप्त करने चाहिएँ ॥११॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣢ र꣣यि꣡मा सु꣢꣯चे꣣तु꣢न꣣मा꣡ सु꣢क्रतो त꣣नू꣢ष्वा । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥११३९॥
पदार्थःहे (सुक्रतो) शुभ ज्ञानवाले वा शुभकर्मोंवाले परमात्मन् और आचार्य ! आप (आ) हमारे पास आओ। हम आपसे (रयिम्) धन (आ) पाना चाहते हैं, (सुचेतुनम्) उत्कृष्ट ज्ञान (आ) पाना चाहते हैं। (तनूषु) शरीरों के हित के लिए, हम आपको (आ) पाना चाहते हैं। (पान्तम्) रक्षा करनेवाले तथा (पुरुस्पृहम्) बहुत स्पृहणीय आपको (आ) पाना चाहते हैं ॥१२॥
भावार्थःपरमात्मा और आचार्य का सेवन करके सबको धन, ज्ञान, जागरूकता, स्वास्थ्य आदि की सम्पत्ति प्राप्त करनी चाहिए ॥१२॥ इस खण्ड में विद्वान् आचार्य, परमात्मा और ब्रह्मानन्द का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अष्टम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
मू꣣र्धा꣡नं꣢ दि꣣वो꣡ अ꣢र꣣तिं꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ वै꣢श्वान꣣र꣢मृ꣣त꣢꣯ आ जा꣣त꣢म꣣ग्नि꣢म् । क꣣वि꣢ꣳ स꣣म्रा꣢ज꣣म꣡ति꣢थिं꣣ ज꣡ना꣢नामा꣣स꣢न्नः꣣ पा꣡त्रं꣢ जनयन्त दे꣣वाः꣢ ॥११४०॥
पदार्थः(मूर्धानम्) मूर्धा के समान सर्वोपरि विराजमान (दिवः) सूर्य के और (पृथिव्याः) पृथिवी के (अरतिम्) स्वामी, (वैश्वानरम्) सबके नेता, (ऋते) यज्ञ में (आ जातम्) सर्वत्र प्रसिद्ध, (कविम्) वेदकाव्य के कवि, (सम्राजम्) ब्रह्माण्ड के राजराजेश्वर, (जनानाम्) मनुष्यों के (अतिथिम्)अतिथि के समान पूज्य, (नः) हमारे (पात्रम्) पालनकर्ता (अग्निम्) अग्रनायक परमेश्वर को (देवाः) विद्वान् उपासक जन (आसन्) मुख से प्रणव-जप आदि करके (जनयन्त) अन्तरात्मा में प्रकट करते हैं ॥१॥
भावार्थःसबके वन्दनीय, सब शुभ गुण-कर्म-स्वभावों से युक्त, विश्व के सम्राट् परमात्मा को जानकर, उसकी स्तुति और उपासना करके मनुष्यों को अपनी और दूसरों की उन्नति सिद्ध करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
त्वां꣡ विश्वे꣢꣯ अमृत꣣ जा꣡य꣢मान꣣ꣳ शि꣢शुं꣣ न꣢ दे꣣वा꣢ अ꣣भि꣡ सं न꣢꣯वन्ते । त꣢व꣣ क्र꣡तु꣢भिरमृत꣣त्व꣡मा꣢य꣣न्वै꣡श्वा꣢नर꣣ य꣢त्पि꣣त्रो꣡रदी꣢꣯देः ॥११४१॥
पदार्थःहे (अमृत) अमर परमात्मन् ! (जायमानम् त्वाम्) अन्तरात्मा में प्रकट होते हुए आपकी (जायमानं शिशुं न) पैदा होते हुए शिशु के समान (विश्वे देवाः) सब विद्वान् उपासक लोग (अभि सं नवन्ते) स्तुति करते हैं। (तव क्रतुभिः) आपके कर्तृत्वों से, उपासक जन (अमृतत्वम्) मोक्ष को (आयन्) प्राप्त कर लेते हैं, (यत्) क्योंकि हे (वैश्वानर) सब मनुष्यों को धर्मकार्यों में प्रवृत्त करनेवाले परमात्मन् ! आप (पित्रोः) माता-पिता के समान विद्यमान द्यावापृथिवी में (अदीदेः) दीप्त हो, प्रख्यात हो ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे घर में शिशु उत्पन्न होने पर सब गृहवासी हर्ष मनाते हैं, वैसे ही गुह्य परमात्मा के हृदय में प्रकट होने पर साधक जन प्रसन्न होते हैं। मोक्ष के लिए प्रयत्न करते हुए लोग परमात्मा की ही व्यवस्था से मोक्ष पाते हैं। विद्वान् भक्तजन आकाश में और भूमि पर सब जगह परमेश्वर की ही विभूति देखते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
ना꣡भिं꣢ य꣣ज्ञा꣢ना꣣ꣳ स꣡द꣢नꣳ रयी꣣णां꣢ म꣣हा꣡मा꣢हा꣣व꣢म꣣भि꣡ सं न꣢꣯वन्त । वै꣣श्वानर꣢ꣳ र꣣꣬थ्य꣢꣯मध्व꣣रा꣡णां꣡ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ के꣣तुं꣡ ज꣢नयन्त दे꣣वाः꣢ ॥११४२॥
पदार्थः(यज्ञानाम्) पूजा-कर्मों के (नाभिम्) केन्द्र, (रयीणाम्) धनों के (सदनम्) सदन, (महाम्) महान् तेजों के (आहावम्) कूप परमात्मा की, लोग (अभि सं नवन्त) चारों ओर भली-भाँति स्तुति करते हैं। (अध्वराणाम्) हिंसारहित व्यवहारों के (रथ्यम्) रथी, (यज्ञस्य) परोपकाररूप यज्ञ के (केतुम्) ध्वज के समान स्थित, (वैश्वानरम्) सबके नेता परमात्मा को (देवाः) विद्वान् उपासक (जनयन्त) अपने अन्तरात्मा में प्रकट करते हैं ॥३॥
भावार्थःविविध गुणों के भण्डार जगदीश्वर की पूजा करके योगाभ्यास द्वारा उसका साक्षात्कार अपने अन्तरात्मा में सबको करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
प्र꣡ वो꣢ मि꣣त्रा꣡य꣢ गायत꣣ व꣡रु꣢णाय वि꣣पा꣢ गि꣣रा꣢ । म꣡हि꣢क्षत्रावृ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥११४३॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (वः) तुम (विपा) बुद्धिपूर्ण (गिरा) वाणी से (मित्राय) विपत्ति से त्राण करनेवाले परमात्मा के लिए और (वरुणाय) वरण करने योग्य जीवात्मा के लिए (गायत) गाओ, अर्थात् उनका गुणगान करो। हे (महिक्षत्रौ) महान् बलवाले परमात्मा और जीवात्मा ! तुम दोनों का (ऋतम्) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म (बृहत्) महान् है ॥१॥
भावार्थःजीवात्मा परमात्मा के साथ मित्रता स्थापित करके महान् सत्यज्ञानों को पा सकता है और महान् सत्यकर्मों को कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
स꣣म्रा꣢जा꣣ या꣢ घृ꣣त꣡यो꣢नी मि꣣त्र꣢श्चो꣣भा꣡ वरु꣢꣯णश्च । दे꣣वा꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ प्रश꣣स्ता꣢ ॥११४४॥
पदार्थः(या) जो (सम्राजा) सम्राट् और (घृतयोनी) तेज के घर (मित्रः च वरुणः च) परमात्मा और जीवात्मा (उभा) दोनों (देवा) प्रकाशक और (देवेषु) प्रकाश करनेवाले अग्नि, सूर्य, बिजली आदि के बीच (प्रशस्ता) प्रशस्त हैं, उनके लिए (गायत) गुण-गान करो। [‘गायत’ पद पूर्व मन्त्र से यहाँ लाया गया है] ॥२॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर विश्वब्रह्माण्ड का सम्राट् है, वैसे ही जीवात्मा शरीर का सम्राट् है। दोनों के प्रकाश को पाकर मनुष्य को महान् बनना योग्य है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
ता꣡ नः꣢ शक्तं꣣ पा꣡र्थि꣢वस्य म꣣हो꣡ रा꣣यो꣢ दि꣣व्य꣡स्य꣢ । म꣡हि꣢ वां क्ष꣣त्रं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ ॥११४५॥
पदार्थः(ता) वे तुम दोनों मित्र-वरुण अर्थात् परमात्मा और जीवात्मा (पार्थिवस्य) सांसारिक (दिव्यस्य) तथा आध्यात्मिक (महः) महान् (रायः) धन को (नः) हमारे लिए (शक्त्तम्) देने में समर्थ होओ। (देवेषु) सूर्य, चन्द्रमा, बिजली आदियों में तथा प्रकाशक मन, बुद्धि, प्राण आदियों में (वाम्) तुम्हारा (महि) महान् (क्षत्रम्) बल निहित है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा और जीवात्मा की सहायता से न केवल लौकिक, किन्तु पारमार्थिक दिव्य धन भी प्राप्त किया जा सकता है। शरीर में स्थित मन, बुद्धि आदि आत्मा और परमात्मा दोनों के बल से और सूर्य, ग्रह, नक्षत्र आदि परमात्मा के ही बल से बलवान् बने हुए हैं। अतः हम भी उन दोनों के बल को क्यों न प्राप्त करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा या꣢꣯हि चित्रभानो सु꣣ता꣢ इ꣣मे꣢ त्वा꣣य꣡वः꣢ । अ꣡ण्वी꣢भि꣣स्त꣡ना꣢ पू꣣ता꣡सः꣢ ॥११४६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) ऐश्वर्यशाली परमात्मन् ! हे (चित्रभानो) अद्भुत दीप्तिवाले ! आप (आयाहि) आओ, (इमे)ये (सुताः) हमारे पुत्र (त्वायवः) आपकी कामना कर रहे हैं और (अण्वीभिः) सूक्ष्म धार्मिक वृत्तियों के कारण, (तना) धन से (पूतासः) पवित्र हैं ॥१॥
भावार्थःहमें और हमारी सन्तानों को परमेश्वर का उपासक और पवित्र लक्ष्मीवाला होना चाहिए। पाप से कमाया गया धन धन नहीं, किन्तु साक्षात् पाप ही होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा या꣢꣯हि धि꣣ये꣢षि꣣तो꣡ विप्र꣢꣯जूतः सु꣣ता꣡व꣢तः । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि वा꣣घ꣡तः꣢ ॥११४७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! (धिया इषितः) ध्यान द्वारा प्रेरित, (विप्रजूतः) मेधावी जीवात्मा से स्तुति किये गये आप (सुतावतः) पुत्रवान्, (वाघतः) अध्यात्मयज्ञ के वाहक मेरे (ब्रह्माणि) स्तोत्रों के (उप आ गहि) समीप आओ ॥२॥
भावार्थःपरिवार में पत्नी, पुत्र, पौत्र आदि सहित सबको प्रातः-सायम् ध्यानपूर्वक परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा या꣢꣯हि꣣ तू꣡तु꣢जान꣣ उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि हरिवः । सु꣣ते꣡ द꣢धिष्व न꣣श्च꣡नः꣢ ॥११४८॥
पदार्थःहे (हरिवः) परस्पर आकर्षणवाले सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि लोकों के स्वामी (इन्द्र) जगदीश्वर ! आप (तूतुजानः) शीघ्रता करते हुए, हमारे (ब्रह्माणि) स्तोत्रों के (उप आ याहि) समीप आओ। (नः) हमारे (सुते) पुत्र आदि सन्तान में (चनः) उपासना से मिलनेवाला आनन्द-रस (दधिष्व) धारण कराओ ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि सपरिवार परमेश्वरोपासना का आनन्द-रस प्रतिदिन प्राप्त करके दैनिक कार्यों में प्रवृत्त हों ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
त꣡मी꣢डिष्व꣣ यो꣢ अ꣣र्चि꣢षा꣣ व꣢ना꣣ वि꣡श्वा꣢ परि꣣ष्व꣡ज꣢त् । कृ꣣ष्णा꣢ कृ꣣णो꣡ति꣢ जि꣣ह्व꣡या꣢ ॥११४९॥
पदार्थःहे मनुष्य ! तू (तम्) उस अग्नि के (ईडिष्व) गुणों का वर्णन कर, (यः) जो (अर्चिषा) दीप्ति से (विश्वा वना) सब वनों का (परिष्वजत्) आलिङ्गन करता है और (जिह्वया) ज्वाला से उन वनों को (कृष्णा) काले (करोति) करता है ॥१॥
भावार्थःजो यह भौतिक अग्नि विशाल वनों को जलाता हुआ उन्हें कृष्ण वर्णवाला तथा घास, वनस्पति आदि के अङ्कुरित होने योग्य करता है, वह सब महिमा परमेश्वर की ही है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
य꣢ इ꣣द्ध꣢ आ꣣वि꣡वा꣢सति सु꣣म्न꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ म꣡र्त्यः꣢ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ सु꣣त꣡रा꣢ अ꣣पः꣢ ॥११५०॥
पदार्थः(यः मर्त्यः) जो मनुष्य (इद्धे) अग्नि के प्रदीप्त होने पर (इन्द्रस्य) परमात्मा के (सुम्नम्) सुखदायक दान की (आ विवासति) प्रशंसा करता है, वह (द्युम्नाय) तेज और यश के लिए (अपः) विकट भी कर्मों को (सुतराः) आसानी से सिद्ध होनेवाला कर लेता है ॥२॥
भावार्थःप्रज्वलित अग्नि में उसकी अपनी ज्योति नहीं है, प्रत्युत परमात्मा की ही है, ऐसा जो मानता है, वह परमात्मा का आराधक होता हुआ तेजस्वी और यशस्वी बनता है। पर जो भौतिकवादी होता है, वह भौतिक पदार्थों में ही रमता हुआ भोगों से ही भोगा जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
ता꣢ नो꣣ वा꣡ज꣢वती꣣रि꣡ष꣢ आ꣣शू꣡न्पि꣢पृत꣣म꣡र्व꣢तः । ए꣡न्द्र꣢म꣣ग्निं꣢ च꣣ वो꣡ढ꣢वे ॥११५१॥
पदार्थःहे इन्द्र-अग्नि अर्थात् वायु और बिजली ! (ता) वे तुम दोनों (वाजवतीः) बलसहित (इषः) अभीष्ट अन्न-धनादि को और (आशून्) शीघ्रगामी (अर्वतः) भूमि, जल एवं अन्तरिक्ष में चलनेवाले यानों तथा यन्त्रों को (पिपृतम्) प्रदान करो। (इन्द्रम्) वायु को (अग्निं च) और बिजली को, हम (वोढवे) पदार्थों को ढोने के लिए यान आदियों में (आ) प्रयुक्त करें ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर का ही यह महत्त्व है कि उसने ऐसे वायु और बिजली रचे हैं, जिनसे बहुत से कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा-जीवात्मा, मोक्ष एवं परमात्मा से रचित भौतिक अग्नि, वायु तथा विद्युत् का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ अष्टम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
प्रो꣡ अ꣢यासी꣣दि꣢न्दु꣣रि꣡न्द्र꣢स्य निष्कृ꣣त꣢꣫ꣳ सखा꣣ स꣢ख्यु꣣र्न꣡ प्र मि꣢꣯नाति स꣣ङ्गि꣡र꣢म् । म꣡र्य꣢ इव युव꣣ति꣢भिः꣣ स꣡म꣢र्षति꣣ सो꣡मः꣢ क꣣ल꣡शे꣢ श꣣त꣡या꣢म्ना प꣣था꣢ ॥११५२॥
पदार्थः(इन्दुः) सोम ओषधि का रस (इन्द्रस्य) यजमान के (निष्कृतम्) घर में (प्र उ अयासीत्) पहुँचता है। (सखा) मित्रतुल्य सोमरस (सख्युः) अपने मित्र यजमान के (संगिरम्) यज्ञ को (न प्रमिनाति) भङ्ग नहीं करता, प्रत्युत सिद्ध करता है। (सोमः) सोमरस (शतयामना पथा) दशापवित्र नामक छन्नी के सौ छिद्रोंवाले मार्ग से छनकर (कलशे) द्रोणकलश में (समर्षति) जल की लहरियों के साथ मिलता है, (मर्यः इव युवतिभिः) जैसे मनुष्य घर की युवतियों के साथ (समर्षति) मिलता अर्थात् यथायोग्य व्यवहार करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे सोम ओषधि का रस सोमयाग को सिद्ध करता है, वैसे ही मनुष्यों को व्यवहार-यज्ञ और उपासना-यज्ञ सिद्ध करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
प्र꣢ वो꣣ धि꣡यो꣢ मन्द्र꣣यु꣡वो꣢ विप꣣न्यु꣡वः꣢ पन꣣स्यु꣡वः꣢ सं꣣व꣡र꣢णेष्वक्रमुः । ह꣢रिं꣣ क्री꣡ड꣢न्तम꣣꣬भ्य꣢꣯नूषत꣣ स्तु꣢भो꣣ऽभि꣢ धे꣣न꣢वः꣣ प꣢य꣣से꣡द꣢शिश्रयुः ॥११५३॥
पदार्थःहे मनुष्यो (वः) तुम्हारी (मन्द्रयुवः) आनन्दप्रद परमेश्वर की कामना करनेवाली, (पनस्युवः) दूसरों के प्रति उत्कृष्ट व्यवहार करने की इच्छुक, (विपन्युवः) विशेष स्तुतिशील (धियः) बुद्धियाँ (संवरणेषु) उपासना-यज्ञों में (प्र अक्रमुः) उपासना आरम्भ करें। (क्रीडन्तम्) जगत् की खेलें खेलते हुए, (हरिम्) हृदयहारी परमात्मा की (स्तुभः) अर्चना करनेवाले जन (अभ्यनूषत) पूजा करें। परमात्मा की दी हुई (धेनवः) गौएँ (पयसा इत्) दूध से (अशिश्रयुः) सबकी सेवा करती रहें, अथवा (धेनवः) वेदवाणियाँ (पयसा इत्) प्रतिपाद्य अर्थ रूप दूध से (अशिश्रयुः) सबकी सेवा करती रहें ॥२॥
भावार्थःखगोल में बहुत से सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह आदि लोक जो इधर-उधर घूम रहे हैं, वह मानो जगदीश्वर गेंदों से क्रीडा कर रहा है। वही खिलाड़ी अपने खेल से सब जड़-चेतन-रूप जगत् का संचालन कर रहा है। इस कारण हम क्यों न उसकी अर्चना और वन्दना करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
आ꣡ नः꣢ सोम सं꣣य꣡तं꣢ पि꣣प्यु꣢षी꣣मि꣢ष꣣मि꣢न्दो꣣ प꣡व꣢स्व꣣ प꣡व꣢मान ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । या꣢ नो꣣ दो꣡ह꣢ते꣣ त्रि꣢꣫रह꣣न्न꣡स꣢श्चुषी क्षु꣣म꣡द्वाज꣢꣯व꣣न्म꣡धु꣢मत्सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११५४॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी, आनन्द-रस से भिगोनेवाले, (पवमान) पवित्रतादायक, (सोम) रस के भण्डार, जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! आप (नः) हमारे लिए (संयतम्) सुबद्ध, (पिप्युषीम्) अतिशय समृद्ध (इषम्) अभीष्ट सम्पत्ति को (ऊर्मिणा) तरङ्गरूप में (पवस्व) प्रवाहित कीजिए, (या) जो सम्पत्ति (असश्चुषी) बिना प्रतिबन्ध के (नः) हमारे लिए (अहन्) दिन में (त्रिः) तीन बार अर्थात् सोमयाग के तीनों सवनों में (क्षुमत्) निवासगृह से युक्त, (वाजवत्) अन्न, धन, विज्ञान से युक्त, (मधुमत्) मधुर (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीरता से युक्त फल को (दोहते) दुहे, प्रदान करे ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से हम पुरुषार्थी लोग अधिकाधिक भौतिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति प्राप्त करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
न꣢ कि꣣ष्टं꣡ कर्म꣢꣯णा नश꣣द्य꣢श्च꣣का꣡र꣢ स꣣दा꣡वृ꣢धम् । इ꣢न्द्रं꣣ न꣢ य꣣ज्ञै꣢र्वि꣣श्व꣡गू꣢र्त꣣मृ꣡भ्व꣢स꣣म꣡धृ꣢ष्टं धृ꣣ष्णु꣡मोज꣢꣯सा ॥११५५॥
पदार्थः(तम्) उस प्रसिद्ध (इन्द्रम्) जगदीश्वर को (कर्मणा) कर्म से (न किः) कोई नहीं (नशन्) प्राप्त कर सकता है, अर्थात् कोई भी उसकी कर्म में बराबरी नहीं कर सकता है, (यः) जिस जगदीश्वर ने (सदावृधम्) सदा बढ़ते रहनेवाले इस ब्रह्माण्ड को (चकार) उत्पन्न किया है। (न) न ही (विश्वगूर्तम्) सर्वोन्नत, (ऋभ्वसम्) अत्यधिक भासमान, (अधृष्टम्) अपराजित, (ओजसा) प्रताप से (धृष्णुम्) दूसरों को पराजित करनेवाले उस जगदीश्वर की (यज्ञैः) जगत् के उत्पादन, धारण, पालन आदि यज्ञों में (नशत्) कोई बराबरी कर सकता है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के तुल्य कर्म करनेवाला और परमात्मा के तुल्य यज्ञ करनेवाला संसार में न कोई हुआ है, न है, न भविष्य में होगा ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣡षा꣢ढमु꣣ग्रं꣡ पृत꣢꣯नासु सास꣣हिं꣡ यस्मि꣢꣯न्म꣣ही꣡रु꣢रु꣣ज्र꣡यः꣢ । सं꣢ धे꣣न꣢वो꣣ जा꣡य꣢माने अनोनवु꣣र्द्या꣢वः꣣ क्षा꣡मी꣢रनोनवुः ॥११५६॥
पदार्थः(अषाढम्) किसी से भी परास्त न होनेवाले, (उग्रम्) पापियों के लिए प्रचण्ड, (पृतनासु) काम, क्रोध आदि की सेनाओं को (सासहिम्) पुनः-पुनः पराजय देनेवाले, उस परमेश्वर की [कर्मणा न किः नशत् न यज्ञैः] कर्म और यज्ञ में कोई बराबरी नहीं कर सकता, (यस्मिन्) जिसकी अधीनता में (उरुज्रयः) बहुत वेगवाली (महीः) पृथिवी, चन्द्र आदि लोकों में स्थित भूमियाँ हैं, जिसकी(जायमाने) जगत् की उत्पत्ति के अनन्तर प्रसिद्धि प्राप्त करने पर (धेनवः) वेदवाणियों ने (सम् अनोनुवः) प्रशंसा की, (द्यावः) सूर्यों ने और (क्षामीः) भूमिवासिनी प्रजाओं ने (सम् अनोनवुः) प्रशंसा की। [इस पदार्थ में ‘कर्मणा न किः नशत् न यज्ञैः’ ये शब्द पूर्व मन्त्र से लाये गए हैं।] ॥२॥
भावार्थःब्रह्माण्ड में अनेक सौरमण्डल हैं, जिनके पृथक्-पृथक् सूर्य हैं। वे सब लोक और मानवी प्रजाएँ सर्वविजेता परमात्मा की ही महिमा को गाते हैं ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ अष्टम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
स꣡खा꣢य꣣ आ꣡ नि षी꣢꣯दत पुना꣣ना꣢य꣣ प्र꣡गा꣢यत । शि꣢शुं꣣ न꣢ य꣣ज्ञैः꣡ परि꣢꣯ भूषत श्रि꣣ये꣢ ॥११५७॥
पदार्थःहे (सखायः) साथियो ! तुम (आ निषीदत) आकर बैठो, (पुनानाय) मन, बुद्धि आदि को पवित्र करनेवाले अपने अन्तरात्मा के लिए (प्र गायत) उद्बोधन-गीत गाओ और (श्रिये) शोभा के लिए उस सोम नामक अन्तरात्मा को (यज्ञैः) देवपूजा, सङ्गतिकरण, दान आदियों से (परि भूषत) अलंकृत करो, (शिशुं न) जैसे शिशु को सुरम्य वस्त्र, आभूषण आदियों से अलंकृत करते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजीवात्मा में महान् शक्ति निहित है। उद्बोधन-गीतों से उस की शक्ति को जगाना चाहिए और नवीन-नवीन गुणों से तथा यज्ञ-भावनाओं से जीवात्मा को अलंकृत करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
स꣡मी꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न मा꣣तृ꣡भिः꣢ सृ꣢ज꣡ता꣢ गय꣣सा꣡ध꣢नम् । दे꣣वाव्यां꣣꣬३꣱म꣡द꣢म꣣भि꣡ द्विश꣢꣯वसम् ॥११५८॥
पदार्थःहे साथियो ! तुम (गयसाधनम्) शरीर-रूप घर के परिष्कर्ता, (देवाव्यम्) प्रकाशक मन, बुद्धि व ज्ञानेन्द्रियों के रक्षक, (मदम्) ब्रह्मानन्द का अनुभव करनेवाले, (द्विशवसम्) आत्मिक और शारीरिक दो प्रकार के बल से युक्त (ई) इस सोम नामक जीवात्मा को (मातृभिः) माताओं के समान हितकारिणी श्रद्धाओं से (अभि सं सृजत) चारों ओर से संयुक्त करो, (वत्सं न) जैसे बछड़े को (मातृभिः) गायों से संयुक्त करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःविविध गुणों से विभूषित भी आत्मा में माता के समान हित करनेवाली श्रद्धा यदि नहीं है, तो वह कुछ नहीं कर सकता। गाय से संयुक्त किया हुआ बछड़ा जैसे उसका दूध पीकर पुष्ट हो जाता है, वैसे ही श्रद्धा से संयुक्त जीवात्मा ब्रह्मानन्द के पान से परिपुष्ट होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
पु꣣ना꣡ता꣢ दक्ष꣣सा꣡ध꣢नं꣣ य꣢था꣣ श꣡र्धा꣢य वी꣣त꣡ये꣢ । य꣡था꣢ मि꣣त्रा꣢य꣣ व꣡रु꣢णाय꣣ श꣡न्त꣢मम् ॥११५९॥
पदार्थःहे साथियो ! तुम (दक्षसाधनम्) दक्षता के साधक सोम नामक जीवात्मा को (पुनात) पवित्र करो, (यथा) जिससे वह (शर्धाय) उत्साह के लिए और (वीतये) प्रगति के लिए हो अर्थात् उत्साहित होकर प्रगति कर सके और (यथा) जिससे (मित्राय) मित्र मन के लिए और (वरुणाय) दोषनिवारक प्राण के लिए (शन्तमम्) शान्तिकारक हो ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा के पवित्र हो जाने पर शरीरस्थ मन, बुद्धि, प्राण आदि सब पवित्र हो जाते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प्र꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्षाः स꣣ह꣡स्र꣢धारस्ति꣣रः꣢ प꣣वि꣢त्रं꣣ वि꣢꣫ वार꣣म꣡व्य꣢म् ॥११६०॥
पदार्थः(वाजी) बलवान् (सहस्रधारः) अनन्त धाराओंवाला पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेवाला ज्ञानरस(पवित्रम्) पवित्र मन को (तिरः) पार करके (अव्यम्) अविनश्वर (वारम्) दोषनिवारक जीवात्मा के प्रति (प्र वि अक्षाः) उत्तम प्रकार से विविधरूप में क्षरित हो रहा है ॥१॥
भावार्थःआचार्य से प्रवाहित होता हुआ विज्ञानरस मन के माध्यम से जीवात्मा में प्रविष्ट होकर उसे पवित्र और विद्वान् बना देता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
स꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्षाः स꣣ह꣡स्र꣢रेता अ꣣द्भि꣡र्मृ꣢जा꣣नो꣡ गोभिः꣢꣯ श्रीणा꣣नः꣢ ॥११६१॥
पदार्थः(वाजी) वेगवान्, (सहस्ररेताः) सहस्र वीर्यवाला, (अद्भिः) शुभकर्मों से (मृजानः) जीवात्मा को अलंकृत करता हुआ, (गोभिः) विवेक के प्रकाशों से (श्रीणानः) जीवात्मा को परिपक्व करता हुआ (सः) वह सोम अर्थात् ज्ञान-रस (अक्षाः) आचार्य के पास से क्षरित होता है ॥२॥
भावार्थःआचार्य के पास से जो ज्ञान-रस शिष्य द्वारा प्राप्त किया जाता है, वह उसके कर्मों को शुद्ध करता है और उसके अन्तरात्मा को परिपक्व करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प्र꣡ सो꣢म या꣣ही꣡न्द्र꣢स्य कु꣣क्षा꣡ नृभि꣢꣯र्येमा꣣नो꣡ अद्रि꣢꣯भिः सु꣣तः꣢ ॥११६२॥
पदार्थःहे (सोम) ज्ञानरस ! (नृभिः) नेता गुरुओं से (येमानः) नियन्त्रित किया जाता हुआ, (अद्रिभिः) अखण्डित पाण्डित्यों से (सुतः) प्रेरित किया गया तू (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (कुक्षा) गर्भ में (प्र याहि) उत्तम प्रकार से पहुँच ॥३॥
भावार्थःविद्वान्, नियमपरायण गुरु लोग जब छात्रों को पढ़ाते हैं, तब उन छात्रों के अन्तरात्मा में विशुद्ध ज्ञान-रस का प्रवाह सुगमता से प्रकट हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ये꣡ सोमा꣢꣯सः परा꣣व꣢ति꣣ ये꣡ अ꣢र्वा꣣व꣡ति꣢ सुन्वि꣣रे꣢ । ये꣢ वा꣣दः꣡ श꣢र्य꣣णा꣡व꣢ति ॥११६३॥
पदार्थः(ये सोमासः) जो ज्ञान-प्रेरक विद्वान् लोग (परावति) परा विद्या के विषय में और (ये) जो (अर्वावति) अपरा विद्या के विषय में, (ये वा) और जो (अदः) इस (शर्यणावति) शरीर-विद्या के विषय में (सुन्विरे) ज्ञान देते हैं, (ये) जो विद्वान् लोग (पस्त्यानाम्) प्रजाओं के (मध्ये) अन्दर, (ये वा) और जो (पञ्चसु जनेषु) यजमान, ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता इन पाँच जनों में (सुन्विरे) ज्ञान देते हैं, (ते) वे (स्वानाः) पढ़ानेवाले (इन्दवः) ज्ञान-रस से भिगोनेवाले (देवासः) विद्वान् लोग (नः) हमारे लिए (दिवः परि) द्युतिमय परमात्मा के पास से (वृष्टिम्) आनन्दरस की वर्षा को और (सुवीर्यम्) सुवीर्य से युक्त आध्यात्मिक धन को (आ पवन्ताम्) प्रवाहित करें ॥१-३॥
भावार्थःआप्त विद्वान् लोग भिन्न-भिन्न लोगों को उन-उन से सम्बद्ध विद्याओं में निष्णात करके और ब्रह्मानन्द प्रदान करके सुयोग्य बनाते हैं, इसलिए उनका सबको सत्कार करना चाहिए ॥१-३॥ इस खण्ड में परमात्मा का और विद्वान् गुरुओं के पास से प्राप्त होनेवाले ज्ञान-रस तथा ब्रह्मानन्द-रस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अष्टम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
य꣡ आ꣢र्जी꣣के꣢षु꣣ कृ꣡त्व꣢सु꣣ ये꣡ मध्ये꣢꣯ प꣣꣬स्त्या꣢꣯नाम् । ये꣢ वा꣣ ज꣡ने꣢षु प꣣ञ्च꣡सु꣢ ॥११६४॥
पदार्थः(ये सोमासः) जो ज्ञान-प्रेरक विद्वान् लोग (परावति) परा विद्या के विषय में और (ये) जो (अर्वावति) अपरा विद्या के विषय में, (ये वा) और जो (अदः) इस (शर्यणावति) शरीर-विद्या के विषय में (सुन्विरे) ज्ञान देते हैं, (ये) जो विद्वान् लोग (पस्त्यानाम्) प्रजाओं के (मध्ये) अन्दर, (ये वा) और जो (पञ्चसु जनेषु) यजमान, ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता इन पाँच जनों में (सुन्विरे) ज्ञान देते हैं, (ते) वे (स्वानाः) पढ़ानेवाले (इन्दवः) ज्ञान-रस से भिगोनेवाले (देवासः) विद्वान् लोग (नः) हमारे लिए (दिवः परि) द्युतिमय परमात्मा के पास से (वृष्टिम्) आनन्दरस की वर्षा को और (सुवीर्यम्) सुवीर्य से युक्त आध्यात्मिक धन को (आ पवन्ताम्) प्रवाहित करें ॥१-३॥
भावार्थःआप्त विद्वान् लोग भिन्न-भिन्न लोगों को उन-उन से सम्बद्ध विद्याओं में निष्णात करके और ब्रह्मानन्द प्रदान करके सुयोग्य बनाते हैं, इसलिए उनका सबको सत्कार करना चाहिए ॥१-३॥ इस खण्ड में परमात्मा का और विद्वान् गुरुओं के पास से प्राप्त होनेवाले ज्ञान-रस तथा ब्रह्मानन्द-रस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अष्टम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ते꣡ नो꣢ वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣व꣢꣫स्परि꣣ प꣡व꣢न्ता꣣मा꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म् । स्वा꣣ना꣢ दे꣣वा꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥११६५॥
पदार्थः(ये सोमासः) जो ज्ञान-प्रेरक विद्वान् लोग (परावति) परा विद्या के विषय में और (ये) जो (अर्वावति) अपरा विद्या के विषय में, (ये वा) और जो (अदः) इस (शर्यणावति) शरीर-विद्या के विषय में (सुन्विरे) ज्ञान देते हैं, (ये) जो विद्वान् लोग (पस्त्यानाम्) प्रजाओं के (मध्ये) अन्दर, (ये वा) और जो (पञ्चसु जनेषु) यजमान, ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता इन पाँच जनों में (सुन्विरे) ज्ञान देते हैं, (ते) वे (स्वानाः) पढ़ानेवाले (इन्दवः) ज्ञान-रस से भिगोनेवाले (देवासः) विद्वान् लोग (नः) हमारे लिए (दिवः परि) द्युतिमय परमात्मा के पास से (वृष्टिम्) आनन्दरस की वर्षा को और (सुवीर्यम्) सुवीर्य से युक्त आध्यात्मिक धन को (आ पवन्ताम्) प्रवाहित करें ॥१-३॥
भावार्थःआप्त विद्वान् लोग भिन्न-भिन्न लोगों को उन-उन से सम्बद्ध विद्याओं में निष्णात करके और ब्रह्मानन्द प्रदान करके सुयोग्य बनाते हैं, इसलिए उनका सबको सत्कार करना चाहिए ॥१-३॥ इस खण्ड में परमात्मा का और विद्वान् गुरुओं के पास से प्राप्त होनेवाले ज्ञान-रस तथा ब्रह्मानन्द-रस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अष्टम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
आ꣡ ते꣢ व꣣त्सो꣡ मनो꣢꣯ यमत्पर꣣मा꣡च्चि꣢त्स꣣ध꣡स्था꣢त् । अ꣢ग्ने꣣ त्वां꣡ का꣢मये गि꣣रा꣢ ॥११६६॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक, सर्वज्ञ, तेजस्वी परमात्मन् ! मैं (गिरा) स्तुति-वाणी से (त्वाम् कामये) तुझे चाहता हूँ। (ते वत्सः) तेरा पुत्र तुझे पाने के लिए (परमात् चित्) सुदूर भी (सधस्थात्) लोक से (मनः) अपने मन को (आयमत्) लौटा लाया है ॥१॥
भावार्थःसमीप वा दूर जहाँ-कहीं भी मेरा मन चला गया है, वहाँ से उसे लौटाकर परमात्मा में ही केन्द्रित करता हूँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
पु꣣रुत्रा꣢꣫ हि स꣣दृङ्ङ꣢꣫सि꣣ दि꣢शो꣣ वि꣢श्वा꣣ अ꣡नु꣢ प्र꣣भुः꣢ । स꣣म꣡त्सु꣢ त्वा हवामहे ॥११६७॥
पदार्थःहे अग्नि अर्थात् सर्वान्तर्यामी परमात्मन् ! आप (पुरुत्रा) सभी के प्रति (सदृङ्) समदर्शी (असि) हो। (विश्वाः दिशः अनु) सब दिशाओं में अर्थात् सब क्षेत्रों में (प्रभुः) समर्थ हो। हम (समत्सु) आन्तरिक तथा बाह्य देवासुर-संग्रामों में (त्वा) आपको (हवामहे) पुकारते हैं ॥२॥
भावार्थःजो पक्षपात से रहित, सब बातों में समर्थ परमेश्वर विपत्ति के समय शक्ति-प्रदान द्वारा रक्षा करता है, उसमें सबको ध्यान लगाना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣣म꣢त्स्व꣣ग्नि꣡मव꣢꣯से वाज꣣य꣡न्तो꣢ हवामहे । वा꣡जे꣣षु चि꣣त्र꣢रा꣣धसम् ॥११६८॥
पदार्थः(समत्सु) देवासुरसंग्रामों में (वाजयन्तः) बल की कामना करते हुए, हम (अवसे) रक्षा के लिए (अग्निम्) अग्रनायक जगदीश्वर को (हवामहे) पुकारते हैं। (चित्रराधसम्) अद्भुत धनवाले उसे (वाजेषु) धनप्राप्ति के निमित्त (हवामहे) हम पुकारते हैं ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर बल देकर ही लोगों की रक्षा करता है। अद्भुत दिव्य एवं भौतिक धनों का स्वामी वह पुरुषार्थियों को ही धन देता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त्वं꣡ न꣢ इ꣣न्द्रा꣡ भ꣢र꣣ ओ꣡जो꣢ नृ꣣म्ण꣡ꣳ श꣢तक्रतो विचर्षणे । आ꣢ वी꣣रं꣡ पृ꣢तना꣣स꣡ह꣢म् ॥११६९॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) बहुत बुद्धिमान्, (विचर्षणे) शिष्यों पर दृष्टि रखनेवाले, (इन्द्र) क्षात्रधर्म के शिक्षक आचार्य ! (त्वम्) आप (नः) हमें (ओजः) उत्साह और (नृम्णम्) बल (आ भर) प्रदान कीजिए। साथ ही (पृतनासहम्) शत्रु सेनाओं को हरानेवाला (वीरम्) वीर क्षत्रिय योद्धा (आ) प्रदान कीजिए ॥१॥
भावार्थःउस-उस विद्या में निष्णात गुरु ही ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य राष्ट्र के लिए उत्पन्न करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -ककुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त्व꣡ꣳ हि नः꣢꣯ पि꣣ता꣡ व꣢सो꣣ त्वं꣢ मा꣣ता꣡ श꣢तक्रतो ब꣣भू꣡वि꣢थ । अ꣡था꣢ ते सु꣣म्न꣡मी꣢महे ॥११७०॥
पदार्थःहे (वसो) निवासप्रदाता, (शतक्रतो) सैकड़ों कर्मों को करनेवाले परमेश ! (त्वं हि) आप ही (नः) हमारे (पिता) पिता और (त्वम्) आप ही (माता) माता (बभूविथ) हो। (अथ) इसलिए हम (ते) आपसे (सुम्नम्) सुख (ईमहे) माँगते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर एक ही होता हुआ सबका पिता के समान पालनकर्ता और माता के समान स्नेह देनेवाला वा चरित्र-निर्माता है। वह माता-पिता के तुल्य सबको सुख देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पुर उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त्वा꣡ꣳ शु꣢ष्मिन्पुरुहूत वाज꣣य꣢न्त꣣मु꣡प꣢ ब्रुवे सहस्कृत । स꣡ नो꣢ रास्व सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११७१॥
पदार्थःहे (शुष्मिन्) बलवान् (पुरुहूत) बहुतों से पुकारे गये, (सहस्कृत) बलप्रदाता जगदीश्वर ! (वाजयन्तं त्वाम्) दूसरों को बल देना चाहनेवाले आपसे, मैं (उपब्रुवे) प्रार्थना करताहूँ। (सः) वह आप (नः) हमें (सुवीर्यम्) उत्कृष्ट वीरता से युक्त सन्तान (रास्व) दीजिए ॥३॥
भावार्थःहम और हमारी सन्तानें बलवान् होकर, शत्रुओं को हराकर, अपना चक्रवर्ती राज्य संस्थापित करके धर्म से प्रजाओं का पालन करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣡दि꣢न्द्र चित्र म इ꣣ह꣢꣫ नास्ति꣣ त्वा꣡दा꣢तमद्रिवः । रा꣢ध꣣स्त꣡न्नो꣢ विदद्वस उभयाह꣣स्त्या꣡ भ꣢र ॥११७२॥
पदार्थःहे (चित्र) अद्भुत, (अद्रिवः) अविनष्ट गुणोंवाले (विदद्वसो) प्राप्त ऐश्वर्यवाले (इन्द्र) जगदीश्वर वा आचार्य ! (त्वादातम्) आपसे शोधित (यत् राधः) जो आत्मबल, धर्म, विद्या आदि का धन (मे) मेरे पास (इह) यहाँ (न अस्ति) नहीं है, (तत्) वह धन, आप (उभयाहस्ति) जैसे दोनों हाथों से किसी को दिया जाता है, वैसे (नः) हमें (आ भर) दीजिए ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर और आचार्य की कृपा से शुद्ध दिव्य और भौतिक धन के हम अधिपति हो जाएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣡न्मन्य꣢꣯से꣣ व꣡रे꣢ण्य꣣मि꣡न्द्र꣢ द्यु꣣क्षं꣡ तदा भ꣢꣯र । वि꣣द्या꣢म꣣ त꣡स्य꣢ ते व꣣य꣡मकू꣢꣯पारस्य दा꣣व꣡नः꣢ ॥११७३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर वा आचार्य ! (यत्) जिसे, आप (वरेण्यम्) ग्रहण करने योग्य (मन्यसे) मानते हो, (तत्) उस (द्युक्षम्) धर्म और विद्या के प्रकाश के निवासक अपने दान को (आ भर) हमें प्राप्त कराओ। (ते) आपके (अकूपारस्य) जिसका भरना या संग्रह करना बुरा नहीं है, ऐसे (तस्य) उस (दावनः) दान को (वयम्) हम (विद्याम) पा लेवें ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर और आचार्य का जो सद्गुण, विद्या, धर्म, सदाचार आदि का दान है, उसे पाकर हम अपने आपको उन्नत करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣡त्ते꣢ दि꣣क्षु꣢ प्र꣣रा꣢ध्यं꣣ म꣢नो꣣ अ꣡स्ति꣢ श्रु꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् । ते꣡न꣢ दृ꣣ढा꣡ चि꣢दद्रिव꣣ आ꣡ वाजं꣢꣯ दर्षि सा꣣त꣡ये꣢ ॥११७४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमात्मन् वा आचार्य ! (यत् ते) जोआपका (प्र राध्यम्) प्रसन्न करने योग्य (बृहत् मनः) विशाल शक्तिवाला मन (दिक्षु) दिशाओं में (श्रुतम्) प्रसिद्ध (अस्ति) है, (तेन) उस मन से, हे (अद्रिवः) अविनष्ट बलवाले ! आप (दृढा चित्) कठिन और दुष्प्राप्य भी (वाजम्) धर्म, विद्या आदि के धन को (सातये) हमें प्राप्त कराने के लिए (आदर्षि) लाओ ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर और आचार्य सत्पात्र जनों को धर्ममार्ग की सुशिक्षा देकर, विद्या आदि का दान करके, पुरुषार्थ की प्रेरणा कर परमैश्वर्यवान् बनाते हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा और आचार्य के गुण वर्णित होने से, उनका आह्वान होने से और उनसे प्रार्थना की जाने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अष्टम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ अष्टम अध्याय समाप्त ॥ चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
शि꣡शुं꣢ जज्ञा꣣न꣡ꣳ ह꣢र्य꣣तं꣡ मृ꣢जन्ति शु꣣म्भ꣢न्ति꣣ वि꣡प्रं꣢ म꣣रु꣡तो꣢ ग꣣णे꣡न꣢ । क꣣वि꣢र्गी꣣र्भिः꣡ काव्ये꣢꣯ना क꣣विः꣡ सन्त्सोमः꣢꣯ प꣣वि꣢त्र꣣म꣡त्ये꣢ति꣣ रे꣡भ꣢न् ॥११७५॥
पदार्थः(शिशुं जज्ञानम्) पैदा होते हुए शिशु के समान अन्तरात्मा में प्रकट होते हुए (हर्यतम्) उस प्रिय सोम परमात्मा को उपासक जन (मृजन्ति) स्तोत्रों से अलंकृत करते हैं। (विप्रम्) विशेषरूप से पूर्णता प्रदान करनेवाले उस मेधावी परमात्मा को (मरुतः) प्राण (गणेन) अपने तरङ्गसमूह से (शुम्भन्ति) शोभित करते हैं, (गीर्भिः) प्रेरक वाणियों से (कविः) दिव्य सन्देश देनेवाला और (काव्येन) वेदकाव्य से (कविः) काव्यकार (सन्) होता हुआ (सोमः) सन्मार्गप्रेरक परमेश्वर (रेभन्) उपदेश देता हुआ (पवित्रम् अत्येति) पवित्र हृदय को लाँघकर अन्तरात्मा में पहुँचता है ॥१॥ यहाँ ‘शिशुं जज्ञानम्’ में लुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःअपने अन्तरात्मा में परमेश्वर को प्रकट करके भक्तिभाव से परिपूर्ण स्तोत्रों द्वारा उसे अधिकाधिक अलंकृत और प्रसादित करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
ऋ꣣षि꣢मना꣣ य꣡ ऋ꣢षि꣣कृ꣢त्स्व꣣र्षाः꣢ स꣣ह꣡स्र꣢नीथः पद꣣वीः꣡ क꣢वी꣣ना꣢म् । तृ꣣ती꣢यं꣣ धा꣡म꣢ महि꣣षः꣡ सिषा꣢꣯स꣣न्त्सो꣡मो꣢ वि꣣रा꣢ज꣣म꣡नु꣢ राजति꣣ ष्टु꣢प् ॥११७६॥
पदार्थः(यः) जो (ऋषिमनाः) ऋषि स्वभाववाला, (ऋषिकृत्) उपासकों को ऋषि बनानेवाला, (स्वर्षाः) आनन्दप्रदाता, (सहस्रनीथः) सहस्र नीतियोंवाला, (कवीनाम्) क्रान्तदर्शियों को (पदवीः) उच्च पद प्राप्त करानेवाला है, वह (महिषः) महान्, (स्तुप्) सबका आधारस्तम्भरूप (सोमः) जगदीश्वर (तृतीयं धाम) मुक्ति पद को (सिषासन्) देना चाहता हुआ (विराजम्) विशेष तेज से युक्त मनुष्य को (अनुराजति) अनुरञ्जित करता है ॥२॥ यहाँ ऋषि की आवृत्ति में लाटानुप्रास तथा राज की आवृत्ति में यमक अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजो परमेश्वर ऋषिपद प्राप्त कराकर मोक्ष देता है, उसकी उपासना करके सब सौभाग्यवान् होवें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
च꣣मूष꣢च्छ्ये꣣नः꣡ श꣢कु꣣नो꣢ वि꣣भृ꣡त्वा꣢ गोवि꣣न्दु꣢र्द्र꣣प्स꣡ आयु꣢꣯धानि बि꣡भ्र꣢त् । अ꣣पा꣢मू꣣र्मि꣡ꣳ सच꣢꣯मानः समु꣣द्रं꣢ तु꣣री꣢यं꣣ धा꣡म꣢ महि꣣षो꣡ वि꣢वक्ति ॥११७७॥
पदार्थः(चमूषत्) द्यावापृथिवी में स्थित, (श्येनः) प्रशंसनीय कर्मोंवाला, (शकुनः) शक्तिशाली (विभृत्वा) विशेषरूप से भरण-पोषण करनेवाला, (गोविन्दुः) गायों और भूमियों को प्राप्त करानेवाला, (द्रप्सः) आनन्दरस से भरपूर, (आयुधानि बिभ्रत्) शस्त्रास्त्रों को धारण करनेवाले सेनापति के समान दण्ड देने की शक्ति से युक्त, (अपाम् ऊर्मिम्) जलों के धारणकर्ता (समुद्रम्) समुद्र वा अन्तरिक्ष को (सचमानः) आश्रयस्थान बनाता हुआ अर्थात् उनमें विद्यमान रहता हुआ, (महिषः) महान् वह सोम नामक जगत्पति परमेश्वर (तुरीयं धाम) पुरुषार्थचतुष्टय में चौथे मोक्ष का (विवक्ति) उपदेश करता है ॥ यहाँ यह शङ्का होती है कि पूर्वमन्त्र में मोक्ष को तृतीय धाम कहा गया है और इस मन्त्र में चतुर्थ धाम, यह कैसे सङ्गत है? इसका उत्तर है कि ‘प्रकृतिलोक, जीवात्मलोक, मोक्षलोक’ इस वर्गीकरण के अनुसार मोक्ष तृतीय धाम है और ‘धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष’ इस वर्गीकरण में चतुर्थ धाम। अतः दोनों सङ्गत हैं ॥३॥
भावार्थःसर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान् सज्जनों की उन्नति करनेवाले, दुष्टों को दण्ड देनेवाले जगदीश्वर का अनुभव करके सब दुःखों से मुक्ति पानी चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ते꣡ सोमा꣢꣯ अ꣣भि꣢ प्रि꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ का꣡म꣢मक्षरन् । व꣡र्ध꣢न्तो अस्य वी꣣꣬र्य꣢꣯म् ॥११७८॥
पदार्थः(एते) ये (सोमाः) ब्रह्मानन्दरस (अस्य) इस (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (वीर्यम्) बल को (वर्धन्तः) बढ़ाते हुए (प्रियम्) प्रिय (कामम्) अभ्युदय एवं निःश्रेयस की प्राप्ति रूप मनोरथ को (अभि अक्षरन्) पूर्ण करते हैं ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को योग्य है कि वे उपासना से ब्रह्मानन्द पाकर अभ्युदय एवं निःश्रेयस की सिद्धि प्राप्त करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
पु꣣नाना꣡स꣢श्चमू꣣ष꣢दो꣣ ग꣡च्छ꣢न्तो वा꣣यु꣢म꣣श्वि꣡ना꣢ । ते꣡ नो꣢ धत्त सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११७९॥
पदार्थः(पुनानासः) पवित्रता देते हुए, (चमूषदः) आत्मा एवं बुद्धिरूप कटोरों में स्थित और (वायुम्) गतिशील मन में तथा (अश्विना) प्राण-अपान में (गच्छन्तः) जाते हुए (ते) वे तुम सोम अर्थात् ब्रह्मानन्द-रस (नः) हमें (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीर्ययुक्त दिव्यधन (धत्त) प्रदान करो ॥२॥
भावार्थःब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाने पर मन तथा बुद्धि की पवित्रता, प्राण-अपान की कार्यक्षमता और आध्यात्मिक धन स्वयं ही उपासक के पास दौड़े चले आते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्र꣢स्य सोम꣣ रा꣡ध꣢से पुना꣣नो꣡ हार्दि꣢꣯ चोदय । दे꣣वा꣢नां꣣ यो꣡नि꣢मा꣣स꣡द꣢म् ॥११८०॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमात्मन् ! (इन्द्रस्य) जीवात्मा की (राधसे) ऐश्वर्यप्राप्ति और सिद्धिप्राप्ति के लिए (पुनानः) पवित्रता देते हुए आप (देवानाम् योनिम्) दिव्य मुक्तजनों के घर अर्थात् मोक्षलोक को (आसदम्) प्राप्त कराने के लिए (हार्दि) सबके प्रति सौहार्द को (चोदय) हमारे अन्तर प्रेरित करो ॥३॥
भावार्थःजनसाधारण से विद्वेष करनेवाले लोग मोक्ष पाने में समर्थ नहीं होते ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
मृ꣣ज꣡न्ति꣢ त्वा꣣ द꣢श꣣ क्षि꣡पो꣢ हि꣣न्व꣡न्ति꣢ स꣣प्त꣢ धी꣣त꣡यः꣢ । अ꣢नु꣣ वि꣡प्रा꣢ अमादिषुः ॥११८१॥
पदार्थःहे (सोम) कर्मानुसार मानव-शरीर में भेजे गए जीवात्मन् ! (दश क्षिपः) दस प्राण (त्वा) तुझे (मृजन्ति) अलंकृत करते हैं। (सप्त धीतयः) मन, बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ये सात ज्ञान-साधन तुझे(हिन्वन्ति) तृप्त करते हैं। (विप्राः) मेधावी विद्वज्जन तुझे (अनु अमादिषुः) साथ-साथ उत्साहित करते हैं ॥४॥
भावार्थःजीवात्मा को परमेश्वर ने सब परमोत्कृष्ट साधनों के साथ शरीर में प्रविष्ट किया है, अतः वहाँ निवास करते हुए उसे पूर्ण उन्नति करनी चाहिए ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
दे꣣वे꣡भ्य꣢स्त्वा꣣ म꣡दा꣢य꣣ क꣡ꣳ सृ꣢जा꣣न꣡मति꣢꣯ मे꣣꣬ष्यः꣢꣯ । सं꣡ गोभि꣢꣯र्वासयामसि ॥११८२॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमेश्वर ! (मेष्यः) सींचनेवाली आनन्द-धाराएँ (अति सृजानम्) छोड़ते हुए, (कम्) सुखस्वरूप (त्वा) तुझे (देवेभ्यः) आत्मा, मन बुद्धि आदि के (मदाय) हर्ष के लिए हम (गोभिः) स्तुति-वाणियों से (संवासयामसि) संछादित करते हैं ॥५॥
भावार्थःजगत्पति परमेश्वर उपासकों को आनन्द की धाराओं से सींचता हुआ और उनके आत्मा, मन, बुद्धि आदियों को तृप्त करता हुआ उनका उपकार करता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
पु꣣नानः꣢ क꣣ल꣢शे꣣ष्वा꣡ वस्त्रा꣢꣯ण्यरु꣣षो꣡ हरिः꣢꣯ । प꣢रि꣣ ग꣡व्या꣢न्यव्यत ॥११८३॥
पदार्थः(अरुषः) आरोचमान अर्थात् तेजस्वी (हरिः) जीवात्मा (कलशेषु) देहरूप कलशों में (आ) आकर (पुनानः) मन आदि को पवित्र करता हुआ (गव्यानि) सूर्य के समान उज्ज्वल (वस्त्राणि) गुण-कर्म-स्वभाव रूप वस्त्रों को (परि अव्यत) धारण करता है ॥६॥
भावार्थःतभी देहधारी का जन्म सफल होता है, जब वह व्यवहार में अत्यन्त उज्ज्वल गुण, कर्म और स्वभाव को प्रकट करता है ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
म꣣घो꣢न꣣ आ꣡ प꣢वस्व नो ज꣣हि꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षः꣢ । इ꣢न्दो꣣ स꣡खा꣢य꣣मा꣡ वि꣡श ॥११८४॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी वा आनन्दरस से भिगोनेवाले परमात्मन् ! आप (मघोनः) दानी (नः) हम लोगों के पास (आ पवस्व) आओ, (विश्वाः) सब (द्विषः) द्वेष-वृत्तियों को (अप जहि) मार भगाओ। (सखायम्) अपने सखा जीवात्मा में (आ विश) प्रविष्ट होवो ॥७॥
भावार्थःतभी परमेश्वर की पूजा सफल है, जब उपासक सब द्वेषभावों को अपने अन्दर से निकालकर सबके साथ मित्र के समान व्यवहार करे ॥७॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
नृ꣣च꣡क्ष꣢सं त्वा व꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯पीतꣳ स्व꣣र्वि꣡द꣢म् । भ꣣क्षीम꣡हि꣢ प्र꣣जा꣡मिष꣢꣯म् ॥११८५॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् जगत् को पैदा करनेवाले, रस के भण्डार परमात्मन् ! (नृचक्षसम्) मनुष्यों के द्रष्टा, (इन्द्रपीतम्) उपासक जीवात्माओं से तन्मय होकर पिये गये, (स्वर्विदम्) दिव्य प्रकाश वा मोक्षसुख प्राप्त करानेवाले (त्वा) आपको (वयम्) हम आपके उपासक पुकार रहे हैं। हम आपसे (प्रजाम्) सद्गुणरूप सन्तान और (इषम्) अभीष्ट आनन्द-रस की धारा (भक्षीमहि) प्राप्त करें ॥८॥
भावार्थःपरमेश्वर का बार-बार ध्यान करके उपासक दिव्य आनन्द-रस को और मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है ॥८॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣वः꣡ परि꣢꣯ स्रव द्यु꣣म्नं꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ अधि꣢꣯ । स꣡हो꣢ नः सोम पृ꣣त्सु꣡ धाः꣢ ॥११८६॥
पदार्थःहे (सोम) सब सुखों के प्रेरक परमात्मन् ! आप (दिवः) दिव्य आनन्दमय कोश से (वृष्टिम्) आनन्द की वर्षा (परिस्रव) बरसाओ, (पृथिव्याः अधि) पृथिवी पर (द्युम्नम्) यश और तेज (परिस्रव) बहाओ। (नः) हमारी (पृत्सु) सेनाओं में (सहः) साहस और बल (धाः) धारण कराओ ॥९॥
भावार्थःजगदीश्वर जैसे अन्तरिक्ष से जलधाराएँ बरसाता है, वैसे ही अपने आनन्द के कोश से आनन्द की धाराएँ बरसाए। जैसे वह पृथिवी में स्वर्ण आदि धन स्थापित करता है, वैसे ही राष्ट्र में कीर्ति और तेजस्विता स्थापित करे। जैसे वह राष्ट्र की सेनाओं में साहस प्रेरित करता है, वैसे ही हमारी सत्य, अहिंसा आदि की दिव्य सेनाओं में बल और वेग धारण कराये ॥९॥ इस खण्ड में परमात्मा के आविर्भाव, उसके गुण-कर्मों, ब्रह्मानन्द-रस तथा जीवात्मा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सो꣡मः꣢ पुना꣣नो꣡ अ꣢र्षति स꣣ह꣡स्र꣢धारो꣣ अ꣡त्य꣢विः । वा꣣यो꣡रिन्द्र꣢꣯स्य निष्कृ꣣त꣢म् ॥११८७॥
पदार्थः(पुनानः) पवित्र करता हुआ, (सहस्रधारः) अनन्त आनन्द-धाराओंवाला, (सोमः) रस का भण्डार परमेश्वर (अत्यविः) पृथिवी को अर्थात् पार्थिवतत्त्वप्रधान अन्नमयकोश को अतिक्रान्त करके (वायोः) प्राण के या गतिशील मन के और (इन्द्रस्य) बुद्धि वा जीवात्मा के (निष्कृतम्) घर में, अर्थात् प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश एवं आनन्दमयकोश में (अर्षति) पहुँचता है ॥१॥
भावार्थःउपासक जब स्थूल शरीर से मन को हटाकर प्राण, मन बुद्धि और जीवात्मा में परमात्मा को प्रतिष्ठापित कर लेता है, तब उसके आनन्दरस की धार में मग्न हुआ वह परमानन्द का अनुभव करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानमवस्यवो꣣ वि꣡प्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । सु꣣ष्वाणं꣢ दे꣣व꣡वी꣢तये ॥११८८॥
पदार्थःहे (अवस्यवः) रक्षा चाहनेवाले मनुष्यो ! तुम (देववीतये) दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए (पवमानम्) पवित्र करनेवाले, (विप्रम्) विशेषरूप से तृप्ति देनेवाले व पूर्ण करनेवाले, (सुष्वाणम्) आनन्द-रस को अभिषुत करनेवाले परमात्मा को (अभि) लक्ष्य करके (प्र गायत) उत्कृष्ट गान गाओ ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा का गुणगान करने और ध्यान करने से उपासक लोग रक्षा, पवित्रता, तृप्ति, पूर्णता और आनन्द प्राप्त करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢न्ते꣣ वा꣡ज꣢सातये꣣ सो꣡माः꣢ स꣣ह꣡स्र꣢पाजसः । गृ꣣णाना꣢ दे꣣व꣡वी꣢तये ॥११८९॥
पदार्थः(सहस्रपाजसः) सहस्रों बलोंवाले (सोमाः) परमानन्द-रस (गृणानाः) स्तुति किये जाते हुए (वाजसातये) बल देने के लिए और (देववीतये) दिव्यगुण उत्पन्न करने के लिए (पवन्ते) प्रवाहित हो रहे हैं ॥३॥
भावार्थःपरब्रह्म के पास से परमानन्द प्राप्त करके उपासक जन ब्रह्मबल से युक्त और दिव्य गुणोंवाले हो जाते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣢ नो꣣ वा꣡ज꣢सातये꣣ प꣡व꣢स्व बृह꣣ती꣡रिषः꣢꣯ । द्यु꣣म꣡दि꣢न्दो सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥११९०॥
पदार्थः(उत) अब, हे (इन्दो) रस से भिगोनेवाले परमेश्वर ! आप (वाजसातये) आत्मबल तथा मनोबल के प्रदानार्थ (नः) हमारे लिए (बृहतीः) महान् (इषः) अभीष्ट आनन्दरस की धाराओं को, तथा (द्युमत्) तेज से युक्त और (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीर्य से युक्त ऐश्वर्य को (पवस्व) प्रवाहित करो ॥४॥
भावार्थःजगदीश्वर ही आत्मबल, आनन्द, तेज और शक्ति का दिव्य स्रोत है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡त्या꣢ हिया꣣ना꣢꣫ न हे꣣तृ꣢भि꣣र꣡सृ꣢ग्रं꣣ वा꣡ज꣢सातये । वि꣢꣫ वार꣣म꣡व्य꣢मा꣣श꣡वः꣢ ॥११९१॥
पदार्थः(वाजसातये) संग्राम के लिए (हेतृभिः) प्रेरक योद्धाओं से (हियानाः) प्रेरित किये जाते हुए (अत्याः न) घोड़ों के समान (हेतृभिः) प्रेरक योगाभ्यासों से (हियानाः) प्रेरित किये जाते हुए (आशवः) वेगगामी सोम अर्थात् परमानन्दरस (वाजसातये) बल देने के लिए (वारम्) दोषनिवारक, (अव्यम्) अविनश्वर जीवात्मा के प्रति (वि असृग्रम्) छोड़े जा रहे हैं ॥५॥ यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥५॥
भावार्थःशीघ्रगामी बलवान् घोड़े जैसे युद्ध में विजय के साधन बनते हैं, वैसे ही योगाभ्यास से उत्पन्न किये गए परम आनन्द बल-प्रदान में कारण बनते हैं ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ते꣡ नः꣢ सह꣣स्रि꣡ण꣢ꣳ र꣣यिं꣡ पव꣢꣯न्ता꣣मा꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म् । स्वा꣣ना꣢ दे꣣वा꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥११९२॥
पदार्थः(ते) वे पूर्वोक्त (स्वानाः) अभिषुत किये जाते हुए, (देवासः) स्वयं तेजस्वी तथा दूसरों को तेजस्वी बनानेवाले, (इन्दवः) रस से भिगोनेवाले सोम अर्थात् परमानन्द-रस (नः) हमारे लिए (सहस्रिणम्) सहस्रसंख्यक, (सुवीर्यम्) सुवीर्ययुक्त (रयिम्) अहिंसा, सत्य, भूतदया, माधुर्य, न्याय, उदारता आदि धन को (आ पवन्ताम्) लायें ॥६॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से मिले हुए परमानन्द अनन्त दिव्यगुणसम्पदा को प्राप्त कराते हैं ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
वा꣣श्रा꣡ अ꣢र्ष꣣न्ती꣡न्द꣢वो꣣ऽभि꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न मा꣣त꣡रः꣢ । द꣣धन्विरे꣡ गभ꣢꣯स्त्योः ॥११९३॥
पदार्थः(वाश्राः) रँभाती हुई (मातरः) गायें (वत्सं न) जैसे बछड़े की ओर जाती हैं, वैसे ही (वाश्राः) उपदेश देते हुए (इन्दवः) रस से भिगोनेवाले ब्रह्मानन्द-रस (वत्सम् अभि) प्रिय उपासक की ओर (अर्षन्ति) जाते हैं और (गभस्त्योः) बाहुओं में (दधन्विरे) धारण किये जाते हैं अर्थात् ब्रह्मानन्द-रसों की प्राप्ति होने पर उपासक भुजाओं से कर्म करने में संलग्न हो जाता है ॥७॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥७॥
भावार्थःब्रह्मानन्द भी सत्कर्मों के बिना शोभा नहीं पाते ॥७॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
जु꣢ष्ट꣣ इ꣡न्द्रा꣢य मत्स꣣रः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । वि꣢श्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षो꣢ जहि ॥११९४॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् प्रेरक परमात्मन् ! (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (जुष्टः) प्रिय, (मत्सरः) आनन्दजनक, (पवमानः) पवित्रता देते हुए, (कनिक्रदत्) उपदेश करते हुए आप (विश्वाः द्विषः) सब द्वेषवृत्तियों को वा द्वेष करनेवाली काम, क्रोध आदि की सेनाओं को (अप जहि) विनष्ट कर दो ॥८॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से अन्तरात्मा में पवित्रता और आनन्द उत्पन्न होते हैं तथा द्वेषवृत्तियाँ अपने आप नष्ट हो जाती हैं ॥८॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣पघ्न꣢न्तो꣣ अ꣡रा꣢व्णः꣣ प꣡व꣢मानाः स्व꣣र्दृ꣡शः꣢ । यो꣡ना꣢वृ꣣त꣡स्य꣢ सीदत ॥११९५॥
पदार्थःहे परमानन्द-रसो ! (अराव्णः) अदान के भावों को (अपघ्नन्तः) विनष्ट करते हुए, (पवमानाः) पवित्रता देते हुए, (स्वर्दृशः) अन्तःप्रकाश को दिखानेवाले तुम (ऋतस्य योनौ) सत्य के मन्दिर जीवात्मा में (सीदत) बैठो ॥९॥
भावार्थःब्रह्मानन्द जब अन्तरात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब सब स्वार्थवृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं, परार्थ-भावना उत्पन्न होती है और पवित्रता तथा अन्तःप्रकाश चारों ओर स्फुरित होने लगते हैं ॥९॥ इस खण्ड में परमात्मा और ब्रह्मानन्द का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सो꣡मा꣢ असृग्र꣣मि꣡न्द꣢वः सु꣣ता꣢ ऋ꣣त꣢स्य꣣ धा꣡र꣢या । इ꣡न्द्रा꣢य꣣ म꣡धु꣢मत्तमाः ॥११९६॥
पदार्थः(सुताः) रिसाये हुए, (इन्दवः) भिगोनेवाले, (मधुमत्तमाः) अतिशय मधुर (सोमाः) परमानन्द-रस (ऋतस्य) सत्य की (धारया) धारा के साथ (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (असृग्रम्) छोड़े जा रहे हैं ॥१॥
भावार्थःब्रह्मानन्द में डूबा हुआ ही मनुष्य उसकी मधुरता का अनुभव कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ विप्रा꣢꣯ अनूषत꣣ गा꣡वो꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ । इ꣢न्द्र꣣ꣳ सो꣡म꣢स्य पी꣣त꣡ये꣢ ॥११९७॥
पदार्थः(विप्राः) बुद्धिमान् स्तोताजन (सोमस्य) ब्रह्मानन्द-रस के (पीतये) पान के लिए (इन्द्रम्) जीवात्मा को (अभि अनूषत) बुलाते हैं, (धेनवः) तृप्ति प्रदान करनेवाली (गावः) गौएँ अपना दूध पिलाने के लिए (वत्सं न) जैसे बछड़े को बुलाती हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे बछड़ा अपनी माता गाय का दूध पीकर तृप्त हो जाता है, वैसे ही उपासक लोग परमात्मा के आनन्द-रस को पीकर परम तृप्ति पाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
म꣣दच्यु꣡त्क्षे꣢ति꣣ सा꣡द꣢ने꣣ सि꣡न्धो꣢रू꣣र्मा꣡ वि꣢प꣣श्चि꣢त् । सो꣡मो꣢ गौ꣣री꣡ अधि꣢꣯ श्रि꣣तः꣢ ॥११९८॥
पदार्थः(मदच्युत्) आनन्द को परिस्रुत करनेवाला परमेश्वर (सादने) जीवात्मा-रूप सदन में (क्षेति) निवास करता है। (विपश्चित्) और बुद्धिमान् जीवात्मा (सिन्धोः) रसागार परमेश्वररूप सिन्धु की (ऊर्मौ) आनन्द की लहर में (क्षेति) निवास करता है अर्थात् उसमें झूला झूलने का आनन्द लेता है। (सोमः) वह रसागार परमात्मा (गौरी) शुभ्र वेदवाणी में (अधि श्रितः) स्थित है, वर्णित है ॥३॥
भावार्थःवेद जिसकी महिमा को गाते-गाते नहीं थकते, उस आनन्द-सागर परमेश्वर की तरङ्गों में झूला झूलता हुआ जीव कृतकृत्य हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
दि꣣वो꣡ नाभा꣢꣯ विचक्ष꣣णो꣢ऽव्या꣣ वा꣡रे꣢ महीयते । सो꣢मो꣣ यः꣢ सु꣣क्र꣡तुः꣢ क꣣विः꣢ ॥११९९॥
पदार्थः(विचक्षणः) सर्वद्रष्टा (सोमः) परमेश्वर, (यः) जो (सुक्रतुः) शुभकर्म करनेवाला और (कविः) जगद्रूप दृश्य काव्य का तथा वेदरूप श्रव्य काव्य का कवि है, वह (दिवः) तेजस्वी जीवात्मा के (नाभा) केन्द्रभूत प्राण में और (अव्याः वारे) प्रकृति के बाल के समान विद्यमान अर्थात् प्रकृति से निकले हुए व्यक्त जगत् में (महीयते) महिमा प्राप्त करता है ॥ अथर्व० १०।८।३१ में कहा गया है कि “अवि नाम की एक देवता है, जो ऋत से परिवृत है, उसी के रूप से ये वृक्ष हरे और हरित माला को धारण करनेवाले बने हुए हैं।” इस प्रमाण से अवि शब्द प्रकृतिवाचक होता है ॥४॥
भावार्थःजड़-चेतनरूप सब जगत् में अन्तर्यामी रूप से विद्यमान, सर्वज्ञ सब कर्मों को करनेवाला जगदीश्वर सर्वत्र कीर्ति प्राप्त किये हुए है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
यः꣡ सोमः꣢꣯ क꣣ल꣢शे꣣ष्वा꣢ अ꣣न्तः꣢ प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣡हि꣢तः । त꣢꣫मिन्दुः꣣ प꣡रि꣢ षस्वजे ॥१२००॥
पदार्थः(यः सोमः) जो जगत् को रचनेवाला, सर्वान्तर्यामी, रस का भण्डार, परम आह्लादक परमेश्वर (कलशेषु) बहुत सी कलाओं से युक्त शरीरों में (आ) निहित है और (अन्तः पवित्रे) पवित्र हृदय के अन्दर भी (आहितः) विद्यमान है, (तम्) उस परमेश्वर को (इन्दुः) तेजस्वी जीवात्मा (परिषस्वजे) आलिङ्गन करता है ॥५॥
भावार्थःपरमात्मा की शरण का सहारा लेना जीवात्मा को परमानन्दायक होता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢꣫ वाच꣣मि꣡न्दु꣢रिष्यति समु꣣द्र꣡स्याधि꣢꣯ वि꣣ष्ट꣡पि꣢ । जि꣢न्व꣣न्को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣡त꣢म् ॥१२०१॥
पदार्थः(इन्दुः) रस का भण्डार परमात्मा अपने (मधुश्चुतम्) मधुस्रावी (कोशम्) आनन्द-रस के कोश को (समुद्रस्य) जीवात्मरूप समुद्र के (विष्टपि अधि) धरातल पर (जिन्वन्) प्रेरित करता हुआ (वाचम्) उपदेशरूप वाणी को (प्र इष्यति) देता है ॥६॥ यहाँ शब्दशक्तिमूलक ध्वनि से यह ध्वनित होता है कि जैसे चन्द्रमा (इन्दु) समुद्र के धरातल पर अपने चाँदनीरूप मधुस्रावी कोश को प्रेरित करता है ॥६॥
भावार्थःउपासकों को जगदीश्वर निरन्तर आनन्द-रस की धाराओं से सींचता रहता है और उन्हें दिव्य सन्देश देता रहता है ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
नि꣡त्य꣢स्तोत्रो꣣ व꣢न꣣स्प꣡ति꣢र्धे꣣ना꣢म꣣न्तः꣡ स꣢ब꣣र्दु꣡घा꣢म् । हि꣣न्वानो꣡ मानु꣢꣯षा यु꣣जा꣢ ॥१२०२॥
पदार्थः(नित्यस्तोत्रः) सन्ध्योपासनारूप नित्यकर्म द्वारा स्तुति करने योग्य, (वनस्पतिः) तेजों का अधिपति सोम परमात्मा, (मानुषा युजा) मनुष्य स्त्री-पुरुषों के (अन्तः) अन्तःकरण में (सबर्दुघाम्) आनन्द-रस को दुहनेवाली (धेनाम्) दिव्यवाणी को (हिन्वानः) प्रेरित करता रहता है ॥७॥ यहाँ ‘दुघाम्’ कहने से धेना (वाणी) में गोत्व का आरोप व्यङ्ग्य है ॥७॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना का यही लाभ है कि दिव्य आनन्द और शुभकर्मों में उत्साह प्राप्त होता है ॥७॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ प꣢वमान धारया र꣣यि꣢ꣳ स꣣ह꣡स्र꣢वर्चसम् । अ꣣स्मे꣡ इ꣢न्दो स्वा꣣भु꣡व꣢म् ॥१२०३॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रता देनेवाले (इन्दो) रस से भिगोनेवाले परमात्मन् ! आप (अस्मे) हम में (सहस्र-वर्चसम्) अनन्त ब्रह्मवर्चस से युक्त, (स्वाभुवम्) अतिशय व्यापक (रयिम्) दिव्य आनन्द रूप धन को (धारय) स्थापित करो ॥८॥
भावार्थःपरमेश्वर के उपासक आयुष्मान् तेजस्वी, ब्रह्मवर्चस्वी, दिव्य आनन्द से युक्त, विद्वान् और श्रीमान् बनते हैं ॥८॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣢ प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ क꣣वि꣢꣫र्विप्रः꣣ स꣡ धार꣢꣯या सु꣣तः꣢ । सो꣡मो꣢ हिन्वे परा꣣व꣡ति꣢ ॥१२०४॥
पदार्थः(दिवः) तेजस्वी जीवात्मा के (प्रिया) प्रिय धाम अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों को (अभि) अभिलक्षित करके (धारया) धारारूप से (सुतः) अभिषुत किया गया (कविः) क्रान्तद्रष्टा, (विप्रः) विशेषरूप से पूर्णता देनेवाला (स सोमः) वह रसागार परमेश्वर क्रमशः (परावति) सबसे परे स्थित आनन्दमयकोश में (हिन्वे) पहुँचता है ॥९॥
भावार्थःरस के भण्डार परमेश्वर में से अभिषुत की गयी आनन्द-रस की धाराएँ जीवात्मा को पूर्णरूप से आप्लावित कर देती हैं ॥९॥ इस खण्ड में परमात्मा की महिमा, परमात्मा और जीवात्मा के मिलन तथा ब्रह्मानन्द-रस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣢त्ते꣣ शु꣡ष्मा꣢स ईरते꣣ सि꣡न्धो꣢रू꣣र्मे꣡रि꣢व स्व꣣नः꣢ । वा꣣ण꣡स्य꣢ चोदया प꣣वि꣢म् ॥१२०५॥
पदार्थःहे भक्ति को सिद्ध करनेवाले उपासक ! (ते) तेरे (शुष्मासः) बलवान् स्तोत्रसमूह (उदीरते) उठ रहे हैं। उनकी (सिन्धोः ऊर्मेः इव) समुद्र की लहर जैसी (स्वनः) गीत की ध्वनि है। तू (वाणस्य) वीणादण्ड की (पवित्रम्) तन्त्री को (चोदय) प्रेरित कर, अर्थात् वीणा-वादन के साथ प्रभु-भक्ति के स्तोत्र तरङ्गित कर ॥१॥
भावार्थःमधुर गीतों के साथ जब सितार, मञ्जीरे आदि बाजे ताल-मेल पूर्वक बजाये जाते हैं, तब अपूर्व भक्ति का प्रवाह उत्तरङ्गित होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣣सवे꣢ त꣣ उ꣡दी꣢रते ति꣣स्रो꣡ वाचो꣢꣯ मख꣣स्यु꣡वः꣢ । य꣢꣫दव्य꣣ ए꣢षि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१२०६॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् रस के भण्डार परमात्मन् ! (ते प्रसवे) ध्यान द्वारा आपका आविर्भाव होने पर (मखस्युवः) उपासना-यज्ञ की पूर्ति चाहनेवाले उपासक लोग (तिस्रः वाचः) ऋग्, यजुः, साम रूप तीनों वाणियों को (उदीरते) उच्चारित करते हैं, (यत्) जबकि, आप (अव्ये सानवि) जीवात्मा के उन्नत धाम में (एषि) पहुँचते हो ॥२॥
भावार्थःसबके अन्तरात्मा में पहले से ही विद्यमान परमात्मा को ध्यान द्वारा और वेदमन्त्रों के गान द्वारा प्रकट करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣢व्या꣣ वा꣢रैः꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣य꣡ꣳ ह꣢꣯रिꣳ हिन्व꣣न्त्य꣡द्रि꣢भिः । प꣡व꣢मानं मधु꣣श्चु꣡त꣢म् ॥१२०७॥
पदार्थः(प्रियम्) उपासकों के प्यारे, (हरिम्) दुःखों को हरनेवाले, (पवमानम्) हृदय को पवित्र करनेवाले, (मधुश्चुतम्) आनन्द को परिस्रुत करनेवाले सोम परमात्मा को, उपासक जन (अव्याः वारैः) चित्तभूमि के विक्षेप का निवारण करनेवाले उपायों से और (अद्रिभिः) ध्यानरूप सिल-बट्टों से (परिहिन्वन्ति) अपने आत्मा में प्रेषित करते हैं अर्थात् उसका साक्षात्कार करते हैं ॥३॥
भावार्थःयोग के विघ्नरूप व्याधि, स्त्यान, संशय आदि तथा दुःख, दौर्मनस्य आदि का निवारण करके ध्यान द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करके सबको आनन्द-रस की धारा में स्नान करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
आ꣡ प꣢वस्व मदिन्तम प꣣वि꣢त्रं꣣ धा꣡र꣢या कवे । अ꣣र्क꣢स्य꣣ यो꣡नि꣢मा꣣स꣡द꣢म् ॥१२०८॥
पदार्थःहे (मदिन्तम) सबसे अधिक आनन्ददायक, (कवे) क्रान्तद्रष्टा सोम अर्थात् रसागार परमात्मन् ! आप (अर्कस्य) अर्चना करनेवाले जीवात्मा के (योनिम्) घर अर्थात् आनन्दमयकोश में (आसदम्) आसन जमाने के लिए (पवित्रम्) पवित्ररूप में (धारया) आनन्द-धारा के साथ (पवस्व) प्रवाहित होओ ॥४॥
भावार्थःपरमात्मा से निकलकर बहती हुई आनन्द-धारा को प्राप्त करके जीवात्मा कृतार्थ हो जाता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ प꣢वस्व मदिन्तम꣣ गो꣡भि꣢रञ्जा꣣नो꣢ अ꣣क्तु꣡भिः꣢ । ए꣡न्द्र꣢स्य ज꣣ठ꣡रं꣢ विश ॥१२०९॥
पदार्थःहे (मदिन्तम) सबसे बढ़कर आनन्ददाता जगदीश्वर ! आप (अक्तुभिः) प्रकाशक (गोभिः) अध्यात्मप्रकाश की किरणों से (अञ्जानः) प्रकाश देते हुए (आ पवस्व) आओ। (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (जठरम्) अन्दर (आ विश) प्रविष्ट हो जाओ ॥५॥
भावार्थःपरमात्मा को प्राप्त करके जीवात्मा प्रकाशमय हो जाता है ॥५॥ इस खण्ड में स्तोत्रगान के द्वारा परमेश्वर का साक्षात्कार करने तथा परमेश्वर से प्रार्थना का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣या꣢ वी꣣ती꣡ परि꣢꣯ स्रव꣣ य꣡स्त꣢ इन्दो꣣ म꣢दे꣣ष्वा꣢ । अ꣣वा꣡ह꣢न्नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥१२१०॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेज से प्रदीप्त वीर ! तू (अया वीती) इस रीति से (परि स्रव) व्यवहार कर कि (यः) जो मनुष्य (ते मदेषु आ) तेरे वीरताजनित उत्साहों के सम्पर्क में आए, वह (नवनवतीः) नब्बे-नब्बे शत्रु-योद्धाओं के नौ व्यूहों को (अवाहन्) मार गिराए ॥१॥
भावार्थःवीर सेनापति अपनी सेना के योद्धाओं को इस प्रकार उत्साहित करे कि वे शत्रु योद्धाओं के सैकड़ों भी व्यूहों को क्षण भर में छिन्न-भिन्न कर दें। आन्तरिक देवासुरसङ्ग्राम का सेनापति जीवात्मा भी आन्तरिक शत्रुओं को नष्ट करने के लिए ऐसा ही करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
पु꣡रः꣢ स꣣द्य꣢ इ꣣त्था꣡धि꣢ये꣣ दि꣡वो꣢दासाय꣣ श꣡म्ब꣢रम् । अ꣢ध꣣ त्यं꣢ तु꣣र्व꣢शं꣣ य꣡दु꣢म् ॥१२११॥
पदार्थःहे इन्दु अर्थात् तेज से प्रदीप्त परमात्मन् वा वीरजन ! तुम (इत्थाधिये) सत्यकर्मोंवाले, (दिवोदासाय) विद्या और धर्म के प्रकाश के दाता मनुष्य के हितार्थ (सद्यः) शीघ्र ही (शम्बरम्) शान्ति में विघ्न डालनेवाले शत्रु को, (अध) और (त्यम्) उस (तुर्वशम्) हिंसा करने के इच्छुक शत्रु को तथा (यदुम्) धर्म के फैलने में रुकावट डालनेवाले शत्रु को और (पुरः) उनकी नगरियों को (अवाहन्) नष्ट-भ्रष्ट कर दो [यहाँ ‘अवाहन्’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है।] ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से और वीरों के शौर्यकर्म से सुख, शान्ति, धर्म-कर्म आदि में रुकावट डालनेवाले शत्रुओं की सदा ही पराजय और धार्मिक जनों का उत्कर्ष करना चाहिए ॥२॥ यहाँ सायणाचार्य के मत में दिवोदास नाम का कोई राजा था और यदु, तुर्वश तथा शम्बर उसके विरोधी राजा थे, जिन्हें सोमरस पीकर मस्त हुए इन्द्र ने दिवोदास के हित के लिए वश में कर लिया था। किन्तु यह सङ्गत नहीं है, क्योंकि सृष्टि के आदि में प्रकट हुए वेद में परवर्ती राजाओं आदि का इतिहास नहीं हो सकता, यह सुधी जनों को निश्चय मानना चाहिए ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡रि꣢ णो꣣ अ꣡श्व꣢मश्व꣣वि꣡द्गोम꣢꣯दिन्दो꣣ हि꣡र꣢ण्यवत् । क्ष꣡रा꣢ सह꣣स्रि꣢णी꣣रि꣡षः꣢ ॥१२१२॥
पदार्थःहे (इन्दो) सम्पत्ति की वर्षा करनेवाले परमात्मन् वा वीर मनुष्य ! (अश्ववित्) प्राणबल वा अश्व प्राप्त करानेवाले आप (नः) हमारे लिए (अश्वम्) प्राणबल वा अश्वसमूह (परिक्षर) चारों ओर से बरसाओ। (गोमद्) वाणी के बल से युक्त वा धेनुओं से युक्त तथा (हिरण्यवत्) ज्योति से युक्त वा सुवर्ण से युक्त (सहस्रिणीः) सहस्र संख्यावाली (इषः) अभीष्ट सम्पदाएँ (परिक्षर) चारों ओर से बरसाओ ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से सब दिव्य तथा भौतिक सम्पदाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। साथ ही जो वीर होते हैं, उन्हें ही सम्पदाएँ हस्तगत होती हैं और वे अन्यों को भी उन्हें प्रदान करते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣पघ्न꣡न्प꣢वते꣣ मृ꣢꣫धोऽप꣣ सो꣢मो꣣ अ꣡रा꣢व्णः । ग꣢च्छ꣣न्नि꣡न्द्र꣢स्य निष्कृ꣣त꣢म् ॥१२१३॥
पदार्थः(सोमः) जगाया हुआ वीर रस (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (निष्कृतम्) संस्कृत किये हुए मनरूप घर में (गच्छन्) जाता हुआ, (मृधः) सङ्ग्रामकारियों को (अपघ्नन्) हिंसित करता हुआ और (अराव्णः) अदानशील कृपण शत्रुओं को (अप) विनष्ट करता हुआ (पवते) प्रवाहित होता है ॥१॥
भावार्थःवीर रस में डूबा हुआ मानव सब आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को विनष्ट कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
म꣣हो꣡ नो꣢ रा꣣य꣡ आ भ꣢꣯र꣣ प꣡व꣢मान ज꣣ही꣡ मृधः꣢꣯ । रा꣡स्वे꣢न्दो वी꣣र꣢व꣣द्य꣡शः꣢ ॥१२१४॥
पदार्थःहे (पवमान) क्रियाशील परमात्मन् वा वीर मनुष्य ! आप (नः) हमारे लिए (महः रायः) महान् धनों को (आ भर) लाओ, (मृधः) हिंसक शत्रुओं को (जहि) विनष्ट करो। हे (इन्दो) तेज से प्रदीप्त परमात्मन् वा वीर मनुष्य ! आप (वीरवत् यशः) वीरों जैसा यश (रास्व) हमें प्रदान करो ॥२॥
भावार्थःसंसार में परमात्मा की कृपा को प्राप्त वीर मनुष्य ही धन, धान्य और कीर्ति के सुखों को भोगने तथा भुगाने में और शत्रुओं को जीतने में समर्थ होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
न꣡ त्वा꣢ श꣣तं꣢ च꣣ न꣢꣫ ह्रुतो꣣ रा꣢धो꣣ दि꣡त्स꣢न्त꣣मा꣡ मि꣢नन् । य꣡त्पु꣢ना꣣नो꣡ म꣢ख꣣स्य꣡से꣢ ॥१२१५॥
पदार्थःहे दानवीर परमात्मन् वा दानी मनुष्य ! (यत्) जब (पुनानः) हमें पवित्र करते हुए आप (मखस्यसे) दानयज्ञ करने का संकल्प करते हो, तब (राधः) धन (दित्सन्तम्) दान करना चाहते हुए (त्वा) आपको (शतं च न) सौ भी (ह्रुतः) हमारे कुटिल भाव वा कुटिल जन (न आमिनन्) दान के मार्ग से विचलित नहीं कर सकते ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर उन्हीं को अपने दान का पात्र बनाता है, जो कुटिल नहीं हैं। दानवीर लोगों को चाहिए कि वे बाधक विघ्नों के बार-बार प्रहार होने पर भी अपने दान के व्रत को न छोड़ें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣या꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या꣣ य꣢या꣣ सू꣢र्य꣣म꣡रो꣢चयः । हि꣣न्वानो꣡ मानु꣢꣯षीर꣣पः꣢ ॥१२१६॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक जगद्रचयिता परमात्मन् ! आप (अया) इस (धारया) प्रकाश की धारा से, हमें (पवस्व) पवित्र कीजिए, (यया) जिस प्रकाश-धारा से, आपने (सूर्यम्) सूर्य को (अरोचयः) चमकाया है। आप ही (मानुषीः अपः) मनुष्यों से प्राप्त करने योग्य आनन्द-रसों को (हिन्वानः) प्रेरित करो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से हम सूर्य के समान तेजस्वी और पवित्र होकर ब्रह्मानन्द के भागी बनें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡यु꣢क्त꣣ सू꣢र꣣ ए꣡त꣢शं꣣ प꣡व꣢मानो म꣣ना꣡वधि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षेण꣣ या꣡त꣢वे ॥१२१७॥
पदार्थः(सूरः) प्रेरक (पवमानः) क्रियाशील सोम परमेश्वर ने (अन्तरिक्षेण) आकाशमार्ग से (यातवे) यात्रा करने के लिए (मनौ अधि) मनुष्य के अन्दर (एतशम्) प्राणरूप अश्व को (अयुक्त) नियुक्त किया हुआ है ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के साथ योग करके और प्राणसिद्धि प्राप्त करके मनुष्य आकाशमार्ग से जाना-आना कर सकते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣢꣫ त्या ह꣣रि꣢तो꣣ र꣢थे꣣ सू꣡रो꣢ अयुक्त꣣ या꣡त꣢वे । इ꣢न्दु꣣रि꣢न्द्र꣣ इ꣡ति꣢ ब्रु꣣व꣢न् ॥१२१८॥
पदार्थः(उत) और ‘हे मनुष्य ! तू (इन्दुः) तेज से प्रदीप्त है, (इन्द्रः) शत्रुविदारक है’ (इति ब्रुवन्) यह कहते हुए (सूरः) प्रेरक परमेश्वर ने (यातवे) व्यवहार करने के लिए (रथे) शरीररूप रथ में (त्याः) उन परम उपयोगी (हरितः) मनःशक्ति, बुद्धिशक्ति एवं प्राणशक्ति सहित ज्ञानेन्द्रियशक्ति और कर्मेन्द्रियशक्ति रूप घोड़ियों को (अयुक्त) नियुक्त किया हुआ है ॥३॥
भावार्थःमनुष्य का शरीर-रूप रथ परमेश्वर की महान् निर्माण-कला को सूचित करता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा तथा वीरों के उद्बोधन विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ नवम अध्याय का पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣣ग्निं꣡ वो꣢ दे꣣व꣢म꣣ग्नि꣡भिः꣢ स꣣जो꣢षा꣣ य꣡जि꣢ष्ठं दू꣣त꣡म꣢ध्व꣣रे꣡ कृ꣢णुध्वम् । यो꣡ मर्त्ये꣢꣯षु꣣ नि꣡ध्रु꣢विरृ꣣ता꣢वा꣣ त꣡पु꣢र्मूर्धा घृ꣣ता꣡न्नः꣢ पाव꣣कः꣢ ॥१२१९॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! जो (अग्निभिः सजोषाः) गार्हपत्य, आहवनीय आदि अग्नियों से प्रीति रखनेवाला अर्थात् उनका ज्ञानी हो, उस (यजिष्ठम्) यज्ञ के अतिशय साधक, (अग्निम्) अग्रगण्य (देवम्) विद्वान् को (वः) तुम लोग (अध्वरे) यज्ञ में (दूतम्) दूत के समान माध्यम अर्थात् पुरोहित (कृणुध्वम्) बनाओ, (यः) जो विद्वान् (मर्त्येषु) मनुष्यों में (निध्रुविः) अत्यन्त स्थिर मतिवाला, (ऋतावा) सत्यनिष्ठ, (तपुर्मूर्धा) परिपक्व मस्तिष्कवाला (घृतान्नः) घी-दूध आदि सात्त्विक पौष्टिक पदार्थ खानेवाला और (पावकः) पवित्रकर्ता हो ॥१॥
भावार्थःसुयोग्य ही किसी मनुष्य को अध्यात्म यज्ञ तथा बाह्य यज्ञ में पुरोहित रूप से वरना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
प्रो꣢थ꣣द꣢श्वो꣣ न꣡ यव꣢꣯सेऽवि꣣ष्य꣢न्य꣣दा꣢ म꣣हः꣢ सं꣣व꣡र꣢णा꣣द्व्य꣡स्था꣢त् । आ꣡द꣢स्य꣣ वा꣢तो꣣ अ꣡नु꣢ वाति शो꣣चि꣡रध꣢꣯ स्म ते꣣ व्र꣡ज꣢नं कृ꣣ष्ण꣡म꣢स्ति ॥१२२०॥
पदार्थः(अश्वः न) घोड़ा जैसे (यदा) जब (महः संवरणात्) विशाल घुड़साल से (व्यस्थात्) छूटता है, तब (अविष्यन्) खाना चाहता हुआ (यवसे) घास पाने के हेतु (प्रोथत्) हिनहिनाता है, वैसे ही जो अग्नि अर्थात् विद्वान् स्नातक (यदा) जब (संवरणात्) गुरुकुल के नियन्त्रण से (व्यस्थात्) छूटता है, तब (यवसे) मानव-समाज में (प्रोथत्) पूर्णता लाता है। (आत्) उसके अनन्तर (वातः) समाज का वातावरण (अस्य) इस विद्वान् स्नातक की (शोचिः) दीप्ति के अर्थात् प्रभाव के (अनु वाति) पीछे-पीछे चलता है। आगे प्रत्यक्षरूप में कहते हैं—(अध) उसके बाद, हे विद्वान् स्नातक ! (ते) तेरा (व्रजनम्) चलना-फिरना आदि व्यापार (कृष्णम् अस्ति) आकर्षक हो जाता है ॥२॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजिसका समावर्तन संस्कार हो चुका है, ऐसा विद्वान् स्नातक गुरुकुल से बाहर आकर समाज में विद्या और सच्चरित्र का प्रसार करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
उ꣡द्यस्य꣢꣯ ते꣣ न꣡व꣢जातस्य꣣ वृ꣢꣫ष्णोऽग्ने꣣ च꣡र꣢न्त्य꣣ज꣡रा꣢ इधा꣣नाः꣢ । अ꣢च्छा꣣ द्या꣡म꣢रु꣣षो꣢ धू꣣म꣡ ए꣢षि꣣ सं꣢ दू꣣तो꣡ अ꣢ग्न꣣ ई꣡य꣢से꣣ हि꣢ दे꣣वा꣢न् ॥१२२१॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक विद्वन् ! (यस्य) जिस (नवजातस्य) नवस्नातक, (वृष्णः) विद्या, सुख आदि की वर्षा करनेवाले (ते) आपकी (अजराः) नष्ट न होनेवाली, (इधानाः) जाज्वल्यमान दीप्तियाँ (उत् चरन्ति) उठती हैं, (सः) वह (अरुषः) तेजस्वी (धूमः) अविद्या, भ्रष्टाचार दुःख आदि को कँपा देनेवाले आप (द्याम् अच्छ) विद्या आदि के प्रकाश को लक्ष्य करके (एषि) कर्म करते हो। हे (अग्ने) विद्वन् ! (दूतः) दूत के समान आचरण करनेवाले आप (देवान्) प्रजाजनों से (सम् ईयसे हि) मिलते-जुलते हो ॥३॥
भावार्थःनवस्नातक गुरुकुल से बाहर जाकर अपने तेज के प्रभाव को फैलाकर, अज्ञान, दुराचार आदि को कँपा कर जन-समाज को उन्नत करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त꣡मिन्द्रं꣢꣯ वाजयामसि म꣣हे꣢ वृ꣣त्रा꣢य꣣ ह꣡न्त꣢वे । स꣡ वृषा꣢꣯ वृष꣣भो꣡ भु꣢वत् ॥१२२२॥
पदार्थः(महे) बड़े (वृत्राय) विघ्न, विद्रोह, उपद्रव, पाप आदि रूप शत्रु का (हन्तवे) वध करने के लिए (तम्) अपने शरीर में अधिष्ठाता रूप से विद्यमान उस (इन्द्रम्) शत्रुविदारक जीवात्मा को, हम (वाजयामसि) बलवान् करते हैं। (वृषा) बलवान् (सः) वह जीवात्मा (वृषभः) सुख-सम्पदा की वर्षा करनेवाला (भुवत्) होवे ॥१॥
भावार्थःअपने अन्तरात्मा को उत्साहित करके सभी बाह्य और आन्तरिक शत्रु जीते जा सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣢न्द्रः꣣ स꣡ दाम꣢꣯ने कृ꣣त꣡ ओजि꣢꣯ष्ठः꣣ स꣡ बले꣢꣯ हि꣣तः꣢ । द्यु꣣म्नी꣢ श्लो꣣की꣢꣫ स सो꣣म्यः꣢ ॥१२२३॥
पदार्थः(सः इन्द्रः) वह परमेश्वर, जीवात्मा वा राजा (दामने) दान के लिए (कृतः) प्रेरित हो। (ओजिष्ठः) अत्यधिक ओजस्वी (सः) वह (बले) बलप्राप्ति के निमित्त (हितः) हमारा हितकारी हो। (सः) वह (द्युम्नी) तेजस्वी, (श्लोकी) यशस्वी और (सोम्यः) शान्तिसम्पादक हो ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर से प्रार्थना करके, जीवात्मा को उत्साहित करके और राजा को उद्बोधन देकर हम प्राप्त दानवाले, बली, तेजस्वी, यशस्वी तथा शान्तिमान् होवें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
गि꣣रा꣢꣫ वज्रो꣣ न꣡ सम्भृ꣢꣯तः꣣ स꣡ब꣢लो꣣ अ꣡न꣢पच्युतः । व꣣व꣢क्ष उ꣣ग्रो꣡ अस्तृ꣢꣯तः ॥१२२४॥
पदार्थः(गिरा) निर्घोष से (वज्रः न) जैसे विद्युद्वज्र संयुक्त होता है, वैसे ही (गिरा) वेदवाणी वा प्रभावशालिनी वाणी से (सम्भृतः) संयुक्त, (सबलः) बलवान् (अनपच्युतः) अविचलित, (उग्रः) प्रचण्ड, (अस्तृतः) अहिंसित इन्द्र अर्थात् परमेश्वर, जीवात्मा वा राजा (ववक्षे) जगत् के भार को, शरीर के भार को वा राष्ट्र के भार को वहन करता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजिसकी वाणियों का प्रभाव वज्रनिर्घोष के समान होता है, वह बलियों में बली, दुष्टों के प्रति प्रचण्ड, किसी से जीता न जा सकनेवाला, शत्रुओं को जीतनेवाला जो परमेश्वर, जीवात्मा और राजा है, उसे सहायक पाकर सब लोग जीवन-सङ्ग्राम में विजयी होवें ॥३॥ इस खण्ड में पुरोहित, विद्वान् स्नातक तथा परमात्मा, जीवात्मा और राजा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡ध्व꣢र्यो꣣ अ꣡द्रि꣢भिः सु꣣त꣡ꣳ सोमं꣢꣯ प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣡ न꣢य । पु꣣नाही꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे ॥१२२५॥
पदार्थःहे (अध्वर्यो) उपासना-यज्ञ के सञ्चालक उपासक ! तू (अद्रिभिः) ध्यानरूप सिल-बट्टों से (सुतम्) अभिषुत किये गये (सोमम्) भक्तिरस को (पवित्रे) पवित्र हृदय में (आनय) ला और (इन्द्राय पातवे) परमात्मा के पान के लिए उसे (पुनीहि) पवित्र कर ॥१॥
भावार्थःछल, छिद्र, आडम्बर आदि से रहित पवित्र भक्तिरस से ही परमेश्वर तृप्त होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त꣢व꣣ त्य꣡ इ꣢न्दो꣣ अ꣡न्ध꣢सो दे꣣वा꣢꣫ मधो꣣꣬र्व्या꣢꣯शत । प꣡व꣢मानस्य म꣣रु꣡तः꣢ ॥१२२६॥
पदार्थःहे (इन्दो) आनन्द-रस से भिगोनेवाले परमात्मन् ! (तव) आपके (मधोः) मधुर, (पवमानस्य) पवित्र करनेवाले (अन्धसः) आनन्द-रस का (त्ये) वे (मरुतः) प्रशस्त प्राणवाले (देवाः) दिव्यगुणी विद्वान् लोग (व्याशत) उपभोग करते हैं ॥२॥
भावार्थःप्राणायाम आदि योगाभ्यास से जिन्होंने अपने सब दोषों को जला डाला है, ऐसे विद्वान् जन ही ब्रह्मानन्द-रस के अधिकारी होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
दि꣣वः꣢ पी꣣यू꣡ष꣢मुत्त꣣म꣢꣫ꣳ सोम꣣मि꣡न्द्रा꣢य व꣣ज्रि꣡णे꣢ । सु꣣नो꣢ता꣣ म꣡धु꣢मत्तमम् ॥१२२७॥
पदार्थःहे उपासको ! तुम (दिवः) प्रकाशमान परमात्मा के पास से (पीयूषम्) अमृतरूप, (उत्तमम्) सर्वोत्कृष्ट, (मधुमत्तमम्) अतिशय मधुर (सोमम्) आनन्द-रस को (वज्रिणे इन्द्राय) वीर जीवात्मा के लिए (सुनोत) अभिषुत करो ॥३॥
भावार्थःअमृतरूप, अत्यन्त मधुर, ब्रह्मानन्द की महिमा जानकर भला कौन उसकी आकाङ्क्षा नहीं करेगा ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
ध꣣र्ता꣢ दि꣣वः꣡ प꣢वते꣣ कृ꣢त्व्यो꣣ र꣢सो꣣ द꣡क्षो꣢ दे꣣वा꣡ना꣢मनु꣣मा꣢द्यो꣣ नृ꣡भिः꣢ । ह꣡रिः꣢ सृजा꣣नो꣢꣫ अत्यो꣣ न꣡ सत्व꣢꣯भि꣣र्वृ꣢था꣣ पा꣡जा꣢ꣳसि कृणुषे न꣣दी꣢ष्वा ॥१२२८॥
पदार्थः(दिवः) कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के प्रकाश का (धर्ता) दाता, (कृत्व्यः) कर्मपरायण, (रसः) रसीला, (देवानाम्) प्रकाशक सूर्य, चन्द्र, अग्नि, विद्युत्, नक्षत्र आदियों को (दक्षः) बल देनेवाला, (नृभिः) मनुष्यों से (अनुमाद्यः) आराधनीय सोम परमेश्वर (पवते) सब जड़-चेतनरूप जगत् को पवित्र करता है। आगे प्रत्यक्षवत् वर्णन है—(हरिः) समुद्र में स्थित जलों को सूर्यकिरणों द्वारा हरकर आकाश में ले जानेवाले आप, हे परमात्मन् ! (सत्त्वभिः) अपने बलों द्वारा (सृजानः) बादलों से वर्षा करते हुए (नदीषु) नदियों में (वृथा) अनायास ही (पाजांसि) वेगों को (कृणुषे) उत्पन्न करते हो, (सृजानः अत्यः न) जैसे जोड़ा जाता हुआ घोड़ा रथ आदि में वेगों को उत्पन्न करता है ॥१॥ यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजड़-चेतनरूप जगत् में जो कुछ भी बल, वेग, विवेक प्रकाश आदि है, वह सब परमात्मा से ही उत्पन्न हुआ है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
शू꣢रो꣣ न꣡ ध꣢त्त꣣ आ꣡यु꣢धा꣣ गभस्त्योः꣣ स्वाः꣢३ सि꣡षा꣢सन्रथि꣣रो꣡ गवि꣢꣯ष्टिषु । इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ शु꣡ष्म꣢मी꣣र꣡य꣢न्नप꣣स्यु꣢भि꣣रि꣡न्दु꣢र्हिन्वा꣣नो꣡ अ꣢ज्यते मनी꣣षि꣡भिः꣢ ॥१२२९॥
पदार्थःवह सोम परमेश्वर (गभस्त्योः) आकाश व भूमि रूप हाथों में (आयुधा) जलों को (धत्ते) धारण करता है, (शूरः न) जैसे शूरवीर मनुष्य (गभस्त्योः) हाथों में (आयुधा) शस्त्रास्त्रों को (धत्ते) धारण करता है। (रथिरः) रथारोही सेनापति के समान (गविष्टिषु) देवासुरसङ्ग्रामों में (स्वः) विजय-सुख को (सिषासन्) देना चाहता हुआ, (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (शुष्मम्) बल को (ईरयन्) उन्नत करता हुआ, (हिन्वानः) वृद्धि प्रदान करता हुआ (इन्दुः) तेजस्वी परमेश्वर (अपस्युभिः) कर्मप्रिय, (मनीषिभिः) बुद्धिमान् स्तोताओं द्वारा (अज्यते) अन्तरात्मा में प्रकट किया जाता है ॥२॥ यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है, ‘रथिरः’ में लुप्तोपमा है ॥२॥
भावार्थःप्रकाशप्रदाता, वृष्टिप्रदाता, विजयप्रदाता, बलप्रदाता और वृद्धिप्रदाता परमेश्वर भला किसका वन्दनीय नहीं है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
इ꣡न्द्र꣢स्य सोम꣣ प꣡व꣢मान ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ तवि꣣ष्य꣡मा꣢णो ज꣣ठ꣢रे꣣ष्वा꣡ वि꣢श । प्र꣡ नः꣢ पिन्व वि꣣द्यु꣢द꣣भ्रे꣢व꣣ रो꣡द꣢सी धि꣣या꣢ नो꣣ वा꣢जा꣣ꣳ उ꣡प꣢ माहि꣣ श꣡श्व꣢तः ॥१२३०॥
पदार्थःहे (सोम) रस के भण्डार परमात्मन् ! (ऊर्मिणा) आनन्द-तरङ्ग के साथ (पवमानः) प्रवाहित होते हुए, (तविष्यमाणः) वृद्धि करना चाहते हुए, आप (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (जठरेषु) अन्दर (आविश) प्रवेश करो। आप (नः) हमारे लिए (रोदसी) द्यावापृथिवी के तुल्य वाणी और बुद्धि को (प्रपिन्व) दुहो, अर्थात् उनसे होनेवाले लाभ प्राप्त कराओ (विद्युत् अभ्रा इव) बिजली जैसे बादलों को दुहती है। (धिया) बुद्धि और कर्म से (नः) हमारे लिए (शश्वतः) बहुत से (वाजान्) बल, विज्ञान, ऐश्वर्य आदि का (उपमाहि) उपहार दो ॥३॥
भावार्थःउपासनारूप कर्तव्यपालन से प्रसन्न हुआ परमेश्वर जीवात्मा को आनन्द की तरङ्गों में स्नान कराकर कृतार्थ करता है और सब प्रकार की सम्पदा उपहार में देता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡दि꣢न्द्र꣣ प्रा꣢꣫गपा꣣गु꣢दङ्न्य꣣꣬ग्वा꣢꣯ हू꣣य꣢से꣣ नृ꣡भिः꣢ । सि꣡मा꣢ पु꣣रू꣡ नृषू꣢꣯तो अ꣣स्या꣢न꣣वे꣡ऽसि꣢ प्रशर्ध तु꣣र्व꣡शे꣢ ॥१२३१॥
पदार्थः(यत्) क्योंकि, हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् शत्रुविदारक परमात्मन् वा राजन् ! आप (प्राक्) पूर्व दिशा में, (अपाक्) पश्चिम दिशा में, (उदक्) उत्तर दिशा में, (न्यक् वा) और दक्षिण दिशा में (नृभिः) पुरुषार्थी जनों से (हूयसे) भक्ति-प्रदान द्वारा वा करादि-प्रदान द्वारा सत्कार किये जाते हो, इसलिए (नृषूतः) उपासक जनों से वा प्रजाजनों से प्रेरित आप (सिमा) सर्वत्र (पुरु) बहुत अधिक (आनवे) मानव-समाज में (असि) उपकारक होते हो। हे (प्रशर्ध) प्रकृष्टरूप से शत्रुओं का धर्षण करनेवाले परमात्मन् वा राजन् ! आप (तुर्वशे) हिंसकों को वश में करनेवाले वीर मनुष्य के (असि) सहायक होते हो ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर सब धार्मिक जनों का सहायक और रक्षक होता है, वैसे ही राजा का यह कर्तव्य है कि वह सब राज्याधिकारियों का तथा प्रजाजनों का सहायक और रक्षक होवे ॥१॥ सायणाचार्य ने इस मन्त्र की व्याख्या में लिखा है कि अनु नाम का एक राजा था, जिसका राजर्षि पुत्र आनव है और तुर्वश भी एक राजा का नाम है। यह उसकी व्याख्या काल्पनिक होने से तथा योगार्थशैली के विरुद्ध होने के कारण सङ्गत नहीं है ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
य꣢द्वा꣣ रु꣢मे꣣ रु꣡श꣢मे꣣ श्या꣡व꣢के꣣ कृ꣢प꣣ इ꣡न्द्र꣢ मा꣣द꣡य꣢से꣣ स꣡चा꣢ । क꣡ण्वा꣢सस्त्वा꣣ स्तो꣡मे꣢भि꣣र्ब्र꣡ह्म꣢वाहस꣣ इ꣡न्द्रा य꣢꣯च्छ꣣न्त्या꣡ ग꣢हि ॥१२३२॥
पदार्थः(यद् वा) और हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् वा वीर राजन् ! आप (रुमे) स्तोता वा उपदेशक को, (रुशमे) हिंसकों के हिंसक को, (श्यावके) कर्मयोगी को और (कृपे) दीनों पर दयालु वा समर्थ मनुष्य को (सचा) एक साथ ही (मादयसे) तृप्ति प्रदान करते हो। हे (इन्द्र) परमात्मन् वा राजन् ! (ब्रह्मवाहसः) स्तुति करनेवाले वा ज्ञान देनेवाले (कण्वासः) मेधावी जन (स्तोमेभिः) स्तोत्रों से वा उद्बोधन-गीतों से (त्वा) आपको (आ यच्छन्ति) वश में कर लेते हैं। आप (आगहि) हमारे पास आओ ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर और राजा उन्हीं के सहायक होते हैं, जो योगाभ्यासी, दूसरों को उपदेश देनेवाले, कर्मशूर, दीनों पर दयालु और शक्तिशाली होते हैं ॥२॥ सायणाचार्य ने इस मन्त्र की व्याख्या में रुम, रुशम, श्यावक और कृप नामक चार राजा स्वीकार किये हैं और ‘कण्वासः’ से कण्वगोत्री ऋषि लिये हैं, वह असङ्गत है, क्योंकि सृष्टि के आदि में प्रकट हुए वेदों में परवर्ती ऐतिहासिक पुरुषों का उल्लेख नहीं हो सकता ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
उ꣣भ꣡य꣢ꣳ शृ꣣ण꣡व꣢च्च न꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣र्वा꣢गि꣣दं꣡ वचः꣢꣯ । स꣣त्रा꣡च्या꣢ म꣣घ꣢वा꣣न्त्सो꣡म꣢पीतये धि꣣या꣡ शवि꣢꣯ष्ठ꣣ आ꣡ गम꣢त् ॥१२३३॥
पदार्थः(इन्द्रः) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य (नः अर्वाक्) हमारे अभिमुख होकर (इदम्) इस हमसे सुनाए जाते हुए (उभयं वचः) पद्यात्मक और गद्यात्मक दोनों प्रकार के पढ़ाए हुए शास्त्र-वचनों को (शृणवत्) सुने। (मघवान्) विद्यादान देनेवाला, (शविष्ठः) विद्या और चरित्र से बलवान् वह आचार्य (सत्राच्या) सत्य का अनुसरण करनेवाली (धिया) बुद्धि वा क्रिया से (सोमपीतये) हमें ज्ञानरस वा ब्रह्मानन्दरस पिलाने के लिए (आगमत्) हमारे पास आये ॥१॥
भावार्थःगुरुओं को चाहिए कि प्रेम से छात्रों को पढ़ायें और प्रतिदिन पढ़ाये हुए पाठ को अगले दिन सुनें, जिससे इसकी परीक्षा हो सके कि छात्रों ने यह पाठ याद कर लिया या नहीं। सिखाये हुए योगाङ्गों की भी समय-समय पर परीक्षा लें, जिससे छात्र समाधि में ब्रह्मानन्द की प्राप्ति के योग्य हो सकें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
त꣢꣫ꣳ हि स्व꣣रा꣡जं꣢ वृष꣣भं꣡ तमोज꣢꣯सा धि꣣ष꣡णे꣢ निष्टत꣣क्ष꣡तुः꣢ । उ꣣तो꣢प꣣मा꣡नां꣢ प्रथ꣣मो꣡ नि षी꣢꣯दसि꣣ सो꣡म꣢काम꣣ꣳ हि꣢ ꣣ते म꣡नः꣢ ॥१२३४॥
पदार्थः(तं हि स्वराजम्) विद्या के सूर्य उस आचार्य को, (तं वृषभम्) विद्या के वर्षक उस आचार्य को (धिषणे) विद्या तथा वाणी ने (निष्टतक्षतुः) संस्कृत किया हुआ है। अब प्रत्यक्षरूप में कहते हैं—(उत) और, हे आचार्यवर ! आप (उपमानाम्) उपमानों के मध्य (प्रथमः) श्रेष्ठ होकर (निषीदसि) स्थित हो। (ते मनः) आपका मन (सोमकामं हि) ज्ञानरस के प्रदान का इच्छुक है ॥२॥
भावार्थःवही आचार्य श्रेष्ठ है, जिसका विद्या-वैभव और वाणी-वैभव दोनों ही उत्कृष्ट हों ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा, आचार्य, उपासनायज्ञ, आनन्दरस और प्रसङ्गतः राजा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ नवम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व दे꣣व꣡ आ꣢यु꣣ष꣡गिन्द्रं꣢꣯ गच्छतु ते꣣ म꣡दः꣢ । वा꣣यु꣡मा रो꣢꣯ह꣣ ध꣡र्म꣢णा ॥१२३५॥
पदार्थःहे सोम ! हे रसमय परमात्मन् ! (देवः) आनन्ददायक आप (आयुषक्) आयु भर (पवस्व) आनन्द-रस को प्रवाहित करते रहो। (ते) आपका (मदः) आनन्द (इन्द्रम्) जीवात्मा को (गच्छतु) प्राप्त हो। आप (धर्मणा) अपने गुण-कर्म-स्वभाव के साथ (वायुम्) हमारे गतिशील मन पर (आरोह) सवार हो जाओ, अभिप्राय यह है कि मन को अपने प्रभाव से प्रभावित करो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर के उपासकों के आत्मा, मन, बुद्धि आदि परम आनन्द के प्रवाह से परिप्लुत हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मान꣣ नि꣡ तो꣢शसे र꣣यि꣡ꣳ सो꣢म श्र꣣वा꣡य्य꣢म् । इ꣡न्दो꣢ समु꣣द्र꣡मा वि꣢꣯श ॥१२३६॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रतादायक (सोम) रसागार परमात्मन् ! आप (श्रवाय्यम्) कीर्ति उत्पन्न करनेवाले (रयिम्) आध्यात्मिक तथा भौतिक ऐश्वर्य को (नितोशसे) देते हो। हे (इन्दो) उपासकों को चन्द्रमा के समान आह्लाद देनेवाले परमेश ! आप (समुद्रम्) जीवात्मरूप समुद्र में (आविश) प्रवेश करो ॥२॥
भावार्थःजैसे चन्द्रमा अपने आकर्षण से समुद्र के जल को ऊपर उठाता है, वैसे परमेश्वर अपने चुम्बकीय आकर्षण से जीवात्मा को उन्नत करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣प꣡घ्नन्प꣢वसे꣣ मृ꣡धः꣢ क्रतुवित्सोम मत्सरः । नुदस्वादेवयुं जनम् ॥१२३७॥
पदार्थःहे (सोम) आनन्दरस के भण्डार परमात्मन् वा विद्यारस के भण्डार आचार्य ! (क्रतुवित्) विज्ञानों और कर्मों को प्राप्त करानेवाले, (मत्सरः) आनन्ददाता आप (मृधः) हिंसावृत्तियों को (अपघ्नन्) विनष्ट करते हुए (पवसे) मनुष्यों वा विद्यार्थियों के अन्तःकरण को पवित्र करते हो। आप (अदेवयुम्) दिव्यगुणों को प्राप्त न करना चाहनेवाले (जनम्) मनुष्य को वा विद्यार्थी को (नुदस्व) उनकी प्राप्ति के लिए प्रेरित करो ॥३॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर वेद द्वारा दिव्य गुणों की प्राप्ति का सन्देश देकर योगाभ्यासियों को ब्रह्मानन्द प्रदान करके कृतार्थ करता है, वैसे ही आचार्य छात्रों को क्रियात्मक ज्ञानसहित आध्यात्मिक एवं भौतिक विविध विद्याएँ सिखाकर, उनमें दिव्य गुण उत्पन्न करके उन्हें सुयोग्य बनाए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣣भी꣡ नो꣢ वाज꣣सा꣡त꣢मं रयिमर्ष शतस्पृहम् । इन्दो सहस्रभर्णसं तुविद्युम्नं विभासहम् ॥१२३८॥
पदार्थःहे (इन्दो) आनन्दरस तथा विद्यारस से भिगोनेवाले तेजस्वी परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! आप (वाजसातमम्) अतिशय बल के प्रदाता, (शतस्पृहम्) सैकड़ों मनुष्यों से चाहने योग्य, (सहस्रभर्णसम्) सहस्रों गुणों को धारण करानेवाले अथवा सहस्रों जनों के पोषक, (तुविद्युम्नम्) बहुत यश देनेवाले, (विभासहम्) शत्रुओं के तेज को अभिभूत करनेवाले (रयिम्) आध्यात्मिक धन को, सुवर्ण आदि धन को वा विद्याधन को (नः) हम उपासकों, प्रजाजनों वा छात्रों को (अभि अर्ष) प्राप्त कराओ ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर से ब्रह्मानन्द का धन, राजा से सुवर्ण आदि धन और आचार्य से विद्याधन प्राप्त करके ही उपासक, प्रजाजन और विद्यार्थी कृतकृत्य होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
व꣣यं꣡ ते꣢ अ꣣स्य꣡ राध꣢꣯सो꣣ व꣡सो꣢र्वसो पुरु꣣स्पृ꣡हः꣢ । नि꣡ नेदि꣢꣯ष्ठतमा इ꣣षः꣡ स्याम꣢꣯ सु꣣म्ने꣡ ते꣢ अध्रिगो ॥१२३९॥
पदार्थःहे (वसो) निवास देनेवाले परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! (वयम्) हम प्रार्थी लोग (ते) आपके (अस्य) इस (वसोः) निवासक, (पुरुस्पृहः) अतिशय चाहने योग्य, (इषः) अभीष्ट (राधसः) आध्यात्मिक ऐश्वर्य, सुवर्ण आदि ऐश्वर्य वा विद्याधन के (नि) अत्यधिक (नेदिष्ठतमाः) निकटतम (स्याम) होवें और, हे (अध्रिगो) बेरोक गतिवाले परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! हम (ते) आपके अर्थात् आपसे दिये हुए (सुम्ने) सुख में (स्याम) होवें ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा से आध्यात्मिक धन, राजा से भौतिक धन और आचार्य से विद्या-धन पाकर सब लोगों को सुखी होना योग्य है ॥२॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प꣢रि꣣ स्य꣢ स्वा꣣नो꣡ अ꣢क्षर꣣दि꣢न्दु꣣र꣢व्ये꣣ म꣡द꣢च्युतः । धा꣢रा꣣ य꣢ ऊ꣣र्ध्वो꣡ अ꣢ध्व꣣रे꣢ भ्रा꣣जा꣡ न याति꣢꣯ गव्य꣣युः꣢ ॥१२४०॥
पदार्थः(स्यः) वह (स्वानः) अभिषुत किया जाता हुआ, (मदच्युतः) उत्साह देने के लिए निकला हुआ (इन्दुः) भिगोनेवाला आनन्द-रस वा ज्ञानरस (अव्ये) अव्यय अर्थात् अविनश्वर जीवात्मा में (परि अक्षरत्) परमात्मा के पास से वा आचार्य के पास से क्षरित हुआ है, (यः) जो (ऊर्ध्वः) उत्कृष्ट आनन्द-रस वा ज्ञान-रस (गव्ययुः) प्रकाश देने का इच्छुक-सा होकर (अध्वरे) उपासना-यज्ञ वा विद्या-यज्ञ में (भ्राजा धारा न) मानो प्रदीप्त धारा के साथ (याति) प्रवाहित हो रहा है ॥३॥ यहाँ उत्प्रेक्षा अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वरोपासना-यज्ञ से परमानन्द-रस को और विद्या-यज्ञ से ज्ञान-रस को प्राप्त करके लोग दिव्य प्रकाश पाकर कृतार्थ होवें ॥३॥
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छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हा꣡न्त्स꣢मु꣣द्रः꣢ पि꣣ता꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ वि꣢श्वा꣣भि꣡ धाम꣢꣯ ॥१२४१॥
पदार्थःहे (सोम) आनन्दरस के भण्डार परमात्मन् ! आप (महान् समुद्रः) विशाल बादल हो, (देवानाम्) दिव्यगुणों के (पिता) उत्पादक और पालक हो। आप (विश्वा धाम अभि) सब हृदय-धामों को लक्ष्य करके (पवस्व) बरसो ॥१॥ यहाँ सोम परमात्मा में मेघत्व (समुद्रत्व) का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे बादल भूमि पर बरस कर वनस्पति आदि को उत्पन्न करता है, वैसे ही परमेश्वर आनन्दवर्षा करके दिव्यगुणों को सृजता है ॥१॥
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छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
शु꣣क्रः꣡ प꣢वस्व दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सोम दि꣣वे꣡ पृ꣢थि꣣व्यै꣡ शं च꣢꣯ प्र꣣जा꣡भ्यः꣢ ॥१२४२॥
पदार्थःहे (सोम) जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (शुक्रः) तेजस्वी और पवित्र आप (देवेभ्यः) दिव्य गुणों से युक्त जनों के लिए (पवस्व) तेज और पवित्रता को प्रवाहित करो। (दिवे) सूर्य के लिए, (पृथिव्यै) भूलोक के लिए और (प्रजाभ्यः) प्रजाननों के लिए (शम्) कल्याणकारी होवो ॥२॥
भावार्थःयथाशक्ति परमात्मा के गुणों को अपने आत्मा में धारण करके हम तेज, पवित्रता और शान्ति प्राप्त कर सकते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
दि꣣वो꣢ ध꣣र्त्ता꣡सि꣢ शु꣣क्रः꣢ पी꣣यू꣡षः꣢ स꣣त्ये꣡ विध꣢꣯र्मन्वा꣣जी꣡ प꣢वस्व ॥१२४३॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् जगत् के स्रष्टा परमात्मन् ! आप (दिवः) खगोल में विद्यमान लोकलोकान्तरों के (धर्ता) धारण करनेवाले, (शुक्रः) तेजस्वी एवं पवित्र और (पीयूषः) आनन्दरसमय (असि) हो। (वाजी) बलवान् आप (विधर्मन्) विशेष धर्मों से युक्त (सत्ये) मुझे सत्य चरित्रवाले उपासक के अन्दर (पवस्व) बहो ॥३॥
भावार्थःतेजस्वी, पवित्र और आनन्दवान् परमेश्वर अपने उपासकों को भी तेजस्वी, पवित्र और आनन्दयुक्त कर देता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, राजा, आचार्य, ज्ञानरस और आनन्दरस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
प्रे꣡ष्ठं꣢ वो꣣ अ꣡ति꣢थिꣳ स्तु꣣षे꣢ मि꣣त्र꣡मि꣢व प्रि꣣य꣢म् । अ꣢ग्ने꣣ र꣢थं꣣ न꣡ वेद्य꣢꣯म् ॥१२४४॥
पदार्थःहे (अग्ने) जग के नेता परमात्मन् वा राष्ट्र के नेता राजन् ! (प्रेष्ठम्) अतिशय प्रिय, (अतिथिम्) अतिथि के समान सत्कार-योग्य, (मित्रम् इव) मित्र के समान (प्रियम्) तृप्तिप्रदाता और (रथं न) रथ के समान (वेद्यम्) प्राप्तव्य (वः) आपकी मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ अर्थात् आपके गुणों का वर्णन करता हूँ ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे लोग परमात्मा की पूजा करें, वैसे ही राजा का भी सत्कार करें और जैसे परमात्मा लोगों को तृप्ति देता है, वैसे ही राजा भी प्रजाओं को तृप्त करे ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
क꣣वि꣡मि꣢व प्र꣣श꣢ꣳस्यं꣣ यं꣢ दे꣣वा꣢स꣣ इ꣡ति꣢ द्वि꣣ता꣢ । नि꣡ मर्त्ये꣢꣯ष्वाद꣣धुः꣢ ॥१२४५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (कविम् इव) कवि के समान (प्रशंस्यम्) प्रशंसनीय (यम्) जिस अग्नि अर्थात् अग्रनायक परमात्मा को (देवासः इति) दिव्य गुणोंवाले योग-प्रशिक्षक वा योगी लोग (द्विता) पालनार्थ तथा शत्रुओं से रक्षार्थ इन दो प्रयोजनों के लिए (मर्त्येषु) योगाभ्यासी मनुष्यों में (नि आदधुः) योगविधि से अनुभव कराते हैं, उसकी मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ। [यहाँ ‘स्तुषे’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है ॥] द्वितीय—राजा के पक्ष में। (कविम् इव) कवि के समान (प्रशंस्यम्) प्रशंसनीय (यम्) जिस अग्नि अर्थात् अग्रनायक राजा को (देवासः इति) दिव्य गुणोंवाले पुरोहित लोग (द्विता) प्रजा के पालनार्थ तथा शत्रुओं से रक्षार्थ दोनों कर्मों के लिए (मर्त्येषु) प्रजाजनों के बीच (नि आदधुः) राजगद्दी पर स्थित करते हैं, उसकी मैं (स्तुषे) गुण-वर्णन-रूप स्तुति करता हूँ ॥२॥
भावार्थःजैसे ब्रह्माण्ड का सम्राट् परमेश्वर लोगों को पालता और उनके शत्रुओं को पराजित करता है, वैसे ही वही राष्ट्र में राजा होने योग्य है, जो प्रजाओं की पालना तथा शत्रुओं का पराजय कर सकता हो ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
त्वं꣡ य꣢विष्ठ दा꣣शु꣢षो꣣ नॄ꣡ꣳपा꣢हि शृणु꣣ही꣡ गिरः꣢꣯ । र꣡क्षा꣢ तो꣣क꣢मु꣣त꣡ त्मना꣢꣯ ॥१२४६॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (यविष्ठ) सबसे अधिक युवा अर्थात् युवा के समान शक्तिसम्पन्न परमात्मन् ! (त्वम्) आप (दाशुषः) आत्मसमर्पण करनेवाले (नॄन्) उपासक जनों की (पाहि) पालना कीजिए, उनकी (गिरः) स्तुति-वाणियों को (शृणुहि) सुनिए, (उत) और (त्मना) अपने आप (तोकम्) उनकी सद्विचार-रूप सन्तान की (रक्ष) रक्षा कीजिए ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (यविष्ठ) अतिशय युवक राजन् ! (त्वम्) आप (दाशुषः) विद्या के दाता वा धन के दाता (नॄन्) पुरुषों की (पाहि) रक्षा कीजिए। (उत) और (त्मना) स्वयम् (तोकम्) युद्ध में मृत सैनिकों की सन्तान की (रक्ष) पालना कीजिए ॥३॥३
भावार्थःजगदीश्वर अपने उपासकों को पालता है और उनकी रक्षा करता है। उसी प्रकार राजा को दो कर्म अवश्य करने चाहिए—एक विद्वानों का पालन और उनका उपदेश सुनना और दूसरा युद्ध में मारे गये सैनिकों के सन्तान, पत्नी आदि का पालन ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
ए꣡न्द्र꣢ नो गधि प्रिय꣣ स꣡त्रा꣢जिदगोह्य । गि꣣रि꣢꣫र्न वि꣣श्व꣡तः꣢ पृ꣣थुः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥१२४७॥
पदार्थःहे (प्रिय) तृप्तिप्रदाता, (सत्राजित्) एक साथ सब शत्रुओं को जीत लेनेवाले, (अगोह्य) न छिपाये जा सकने योग्य अर्थात् सर्वत्र प्रकाशमान (इन्द्र) परमात्मन् ! आप (गिरिः न) बादल के समान (सर्वतः) सब ओर (पृथुः) प्रख्यात और (दिवः पतिः) तेजस्वी सूर्य के वा जीवात्मा के स्वामी हो ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःयद्यपि परमेश्वर चर्मचक्षु से दिखाई नहीं देता, तो भी वह सूर्य के समान सर्वत्र प्रकाशित, तृप्तिप्रदायक, सर्वविजेता, सुख आदि की वर्षा करने के कारण बादल के समान प्रसिद्धि-प्राप्त और सब जड़-चेतन जगत् का अधिपति है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
अ꣣भि꣡ हि स꣢꣯त्य सोमपा उ꣣भे꣢ ब꣣भू꣢थ꣣ रो꣡द꣢सी । इ꣡न्द्रासि꣢꣯ सुन्व꣣तो꣢ वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣡ ॥१२४८॥
पदार्थःहे (सत्य) सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, (सोमपाः) शान्ति के रक्षक जगदीश्वर ! आपने (हि) निश्चय ही (उभे रोदसी) द्यावापृथिवी दोनों को (अभिबभूथ) तिरस्कृत किया हुआ है। हे (इन्द्र) सर्वान्तर्यामिन् ! आप (सुन्वतः) शान्ति-स्थापना का यज्ञ करनेवाले को (वृधः) बढ़ानेवाले और (दिवः) तेजस्वी जन के (पतिः) रक्षक (असि) हो ॥२॥
भावार्थःसंसार में जो शान्ति की स्थापना के लिए यत्न करते हैं, उन्हीं का परमेश्वर सखा होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त्व꣡ꣳ हि शश्व꣢꣯तीना꣣मि꣡न्द्र꣢ ध꣣र्त्ता꣢ पु꣣रा꣡मसि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢꣫ दस्यो꣣र्म꣡नो꣢र्वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमवीर जगदीश्वर वा राजन् ! (त्वं हि) आप निश्चय ही (शश्वतीनाम्) बहुत सी (पुराम्) शत्रु-नगरियों के (धर्ता) भेदन करनेवाले, (दस्योः) हिंसक शत्रु के (हन्ता) विनाशक, (मनोः) मननशील शान्तिप्रिय मनुष्य के (वृधः) बढ़ानेवाले और (दिवः) तेजस्वी जन के (पतिः) रक्षक (असि) हो ॥३॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर दुष्टों का भञ्जक और सज्जनों का रक्षक होता है, वैसे ही राजा को भी होना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
पु꣣रां꣢ भि꣣न्दु꣡र्युवा꣢꣯ क꣣वि꣡रमि꣢꣯तौजा अजायत । इ꣢न्द्रो꣣ वि꣡श्व꣢स्य꣣ क꣡र्म꣢णो ध꣣र्त्ता꣢ व꣣ज्री꣡ पु꣢रुष्टु꣣तः꣢ ॥१२५०॥
पदार्थः(इन्द्रः) यह देहधारी जीवात्मा (पुराम्) शत्रु-नगरियों का (भिन्दुः) भेदन करनेवाला, (युवा) यौवन-सम्पन्न, (कविः) क्रान्तदर्शी, (अमितौजाः) अपरिमित बलवाला, (विश्वस्य) सब (कर्मणः) क्रियाकाण्ड का (धर्ता) धारणकर्त्ता, (वज्री) शस्त्रास्त्रों को हाथ में लेनेवाला और (पुरुष्टुतः) बहु-स्तुत (अजायत) हुआ है ॥१॥
भावार्थःजीवात्मा में अपूर्व शक्ति निहित है। अपनी शक्ति को पहचानकर वह महान् से महान् कर्मों को कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
त्वं꣢ व꣣ल꣢स्य꣣ गो꣢म꣣तो꣡ऽपा꣢वरद्रिवो꣣ बि꣡ल꣢म् । त्वां꣢ दे꣣वा꣡ अबि꣢꣯भ्युषस्तु꣣ज्य꣡मा꣢नास आविषुः ॥१२५१॥
पदार्थःहे (अद्रिवः) अविनश्वर परमेश्वर वा जीवात्मन् ! (त्वम्) तुम (गोमतः) जिसने सत्त्वगुण के प्रकाश को बन्द कर रखा है, ऐसे (वलस्य) आच्छादक तमोगुण की (बिलम्) गुफा को (अपावः) तोड़कर खोल देते हो। (तुज्यमानासः) हिंसा किये जाते हुए (देवाः) प्रकाशक मन, बुद्धि सहित ज्ञानेन्द्रियाँ वा विद्वान् लोग (अबिभ्युषः) भयभीत न होते हुए (त्वाम्) तुझ परमात्मा वा जीवात्मा की (आविषुः) शरण में जाते हैं ॥२॥
भावार्थःमन में तमोगुण की अधिकता हो जाने से जब सत्त्वगुण निर्बल हो जाता है, तब तमोगुण प्रकाश को रोक लेता है। वह आवरण परमात्मा की प्रेरणा से और जीवात्मा के पुरुषार्थ से तोड़ा जा सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣢न्द्र꣣मी꣡शा꣢न꣣मो꣡ज꣢सा꣣भि꣡ स्तोमै꣢꣯रनूषत । स꣣ह꣢स्रं꣣ य꣡स्य꣢ रा꣣त꣡य꣢ उ꣣त꣢ वा꣣ स꣢न्ति꣣ भू꣡य꣢सीः ॥१२५२॥
पदार्थः(ओजसा) बल वा प्रताप से (ईशानम्) जगत् के वा शरीर के शासक (इन्द्रम्) परमेश्वर वा जीवात्मा की सब लोग (स्तोमैः) उनके गुणवर्णन करनेवाले स्तोत्रों से (अभि अनूषत) स्तुति करते हैं, (यस्य) जिस परमेश्वर वा जीवात्मा के (सहस्रम्) हजार (उत वा) अथवा (भूयसीः) उससे भी अधिक (रातयः) दान (सन्ति) हैं ॥३॥
भावार्थःसबको योग्य है कि परमेश्वर की उपासना करके और जीवात्मा को उद्बोधन देकर उनके दानों को प्राप्त करें ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा और राजा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥ नवम अध्याय समाप्त ॥ पञ्चम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣡क्रा꣢न्त्समु꣣द्रः꣡ प्र꣢थ꣣मे꣡ वि꣢꣫धर्म꣣न् ज꣡न꣢य꣣न्प्र꣡जा भु꣢꣯वनस्य꣣ गो꣢पाः । वृ꣡षा꣢ प꣣वि꣢त्रे꣣ अ꣢धि꣣ सा꣢नो꣣ अ꣡व्ये꣢ बृ꣣ह꣡त्सोमो꣢꣯ वावृधे स्वा꣣नो꣡ अद्रिः꣢꣯ ॥१२५३॥
पदार्थःइसी सोम परमात्मा के शासन में (समुद्रः) सूर्य (परमे) उच्च, (विधर्मणि) विशेष धारणकर्ता द्युलोक में (अक्रान्) अपनी धुरी पर घूमता है, जो सूर्य (प्रजाः जनयन्) प्रजाओं को उत्पन्न करता हुआ (भुवनस्य) सौरमण्डल का (गोपाः) रक्षक है। (पवित्रे) अन्तरिक्ष में और (अव्ये सानौ अधि) पृथिवी के उन्नत प्रदेश में (वृषा) वर्षा करनेवाला, (स्वानः) भूमि आदि लोकों को उनकी अपनी-अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर प्रेरित करता हुआ (अद्रिः) अविनश्वर (सोमः) जगत्स्रष्टा (बृहत्) बहुत अधिक (वावृधे) महिमा को प्राप्त हुआ है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर ही अपनी महिमा से सूर्य को और उसके चारों ओर भूमि, चन्द्रमा आदि ग्रह-उपग्रहों को घुमा रहा है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
म꣡त्सि꣢ वा꣣यु꣢मि꣣ष्ट꣢ये꣣ रा꣡ध꣢से नो꣣ म꣡त्सि꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा पू꣣य꣡मा꣢नः । म꣢त्सि꣣ श꣢र्धो꣣ मा꣡रु꣢तं꣣ म꣡त्सि꣢ दे꣣वा꣢꣫न्मत्सि꣣ द्या꣡वा꣢पृथि꣣वी꣡ दे꣢व सोम ॥१२५४॥
पदार्थःहे (देव) आनन्ददायक, (सोम) संसार के रचयिता परमात्मन् ! आप (नः) हमारी (इष्टये) अभीष्ट-सिद्धि के लिए और (राधसे) ऐश्वर्य के लिए (वायुम्) पवन को (मत्सि) हर्षित करते हो, (पूयमानः) प्राप्त किये जाते हुए आप (मित्रावरुणा) प्राण-अपान को (मत्सि) हर्षित करते हो, (मारुतं शर्धः) सैनिकों के बल को (मत्सि) हर्षित करते हो, (देवान्) विद्वान् जनों को (मत्सि) हर्षित करते हो, (द्यावापृथिवी) आकाश और भूमि को (मत्सि) हर्षित करते हो ॥२॥
भावार्थःजो यह प्रकृति में सूर्य, चन्द्र, पवन, भूमि आदियों में, समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदियों में और शरीर में जीवात्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदियों में हर्ष, स्फूर्ति और कर्मनिष्ठा दिखायी देती है, वह सब परमात्मा द्वारा ही की हुई है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
म꣣ह꣡त्तत्सोमो꣢꣯ महि꣣ष꣡श्च꣢कारा꣣पां꣡ यद्गर्भोऽवृ꣢꣯णीत दे꣣वा꣢न् । अ꣡द꣢धा꣣दि꣢न्द्रे꣣ प꣡व꣢मान꣣ ओ꣡जोऽज꣢꣯नय꣣त्सू꣢र्ये꣣ ज्यो꣢ति꣣रि꣡न्दुः꣢ ॥१२५५॥
पदार्थः(महिषः) महान् (सोमः) जगत् का रचयिता परमेश्वर (तत्) उस आगे वर्णित किये गये (महत्) महत्त्वपूर्ण कर्म को (चकार) करता है (यत्) कि (अपाम्) जल आदि पदार्थों में भी (गर्भः) गर्भरूप से विद्यमान वह (देवान्) सूर्य, चन्द्र, वायु, विद्युत् आदियों को वा प्राण, मन, चक्षु, श्रोत्र आदियों को (अवृणीत) रक्षणीय रूप में वरता है। (पवमानः) उस कर्मशूर ने (इन्द्रे) प्राण, पवन वा मन में (ओजः) बल (अदधात्) स्थापित किया है, (इन्दुः) उस ज्योतिष्मान् ने (सूर्ये) सूर्य में (ज्योतिः) ज्योति को (अजनयत्) उत्पन्न किया है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा के महान् कर्म बड़े ही आश्चर्यजनक हैं। प्राण में साँस की शक्ति, पवन में गति, मन में संकल्प, सूर्य में दीप्ति, चाँद में चाँदनी, नदियों में प्रवाह, पहाड़ों में दृढ़ता वही स्थापित करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣡ अम꣢꣯र्त्यः पर्ण꣣वी꣡रि꣢व दीयते । अ꣣भि꣡ द्रोणा꣢꣯न्या꣣स꣡द꣢म् ॥१२५६॥
पदार्थः(एषः) यह (अमर्त्यः) अमर, (देवः) कर्मफलों को भोगनेवाला जीवात्मा रूप सोम, कर्मों के अनुसार (द्रोणानि) देहरूप द्रोण कलशों में (अभि आसदम्) बैठने के लिए (पर्णवीः इव) पक्षी के समान (दीयते) उड़कर जाता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपक्षी जैसे उड़ता हुआ एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाता है, वैसे ही यह जीवात्मा पहले शरीर को छोड़कर कर्मफल भोगने के लिए माता के गर्भ में दूसरे शरीर को प्राप्त करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣡ विप्रै꣢꣯र꣣भि꣡ष्टु꣢तो꣣ऽपो꣢ दे꣣वो꣡ वि गा꣢हते । द꣢ध꣣द्र꣡त्ना꣢नि दा꣣शु꣡षे꣢ ॥१२५७॥
पदार्थः(विप्रैः) विद्वान् उपासकों से (अभिष्टुतः) अभिमुख होकर स्तुति किया गया (एषः) यह (देवः) कर्मफलप्रदाता परमेश्वर (अपः) मनुष्यों से किये गये कर्मों का (विगाहते) आलोडन अर्थात् निरीक्षण करता है और (दाशुषे) आत्मसमर्पणकर्ता शुभकर्मकारी मनुष्य को (रत्नानि) रमणीय फल (दधत्) प्रदान करता है ॥२॥
भावार्थःन्यायकारी परमेश्वर शुभकर्मों का शुभ फल और अशुभ कर्मों का अशुभ फल कर्म करनेवाले को देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ वा꣢र्या꣣ शू꣢रो꣣ य꣡न्नि꣢व꣣ स꣡त्व꣢भिः । प꣡व꣢मानः सिषासति ॥१२५८॥
पदार्थः(पवमानः) अपने को पवित्र करता हुआ (एषः) यह जीवात्मा (सत्त्वभिः) अपने पुरुषार्थों से (विश्वानि) सब (वार्या) वरणीय वस्तुओं को (सिषासति) प्राप्त करना चाहता है, (यन् इव) जैसे चलता हुआ (शूरः) कोई शूरवीर (विश्वानि वार्या) सब प्राप्तव्य स्थानों को प्राप्त कर लेता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्य अपने पुरुषार्थ से सब अभीष्टों को पा सकता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣡ र꣢थर्यति꣣ प꣡व꣢मानो दिशस्यति । आ꣣वि꣡ष्कृ꣢णोति वग्व꣣नु꣢म् ॥१२५९॥
पदार्थः(एषः) यह (देवः) कर्मफलों का भोक्ता जीव, कर्मफल भोगने के लिए (रथर्यति) शरीररूप रथ की इच्छा करता है। (पवमानः) शरीररूप रथ में जाता हुआ यह (दिशस्यति) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदियों को दिशा-निर्देश करता है और (वग्वनुम्) व्यक्त वाणी को (आविष्कृणोति) प्रकट करता अर्थात् उच्चारण करता है ॥४॥
भावार्थःजीवात्मा मानव-देह पाकर ज्ञान का सञ्चय, सत्कर्मों का आचरण और व्यक्त वाणी से दूसरों को उपदेश यदि करता है तो उसका मनुष्य-जन्म पाना सफल हो जाता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣡ वि꣢प꣣न्यु꣢भिः꣣ प꣡व꣢मान ऋता꣣यु꣡भिः꣢ । ह꣢रि꣣र्वा꣡जा꣢य मृज्यते ॥१२६०॥
पदार्थः(एषः) यह (देवः) विजय की इच्छावाला, (पवमानः) पुरुषार्थी, (हरिः) कर्मफलभोग के लिए एक शरीर से दूसरे शरीर में ले जाया गया जीवात्मा (ऋतायुभिः) सत्य आचरणवाले (विपन्युभिः) परमात्म-स्तोता विद्वानों द्वारा (वाजाय) बल देने के लिए (मृज्यते) शुद्ध किया जाता है ॥५॥
भावार्थःमानव-शरीर को प्राप्त जीवात्मा सत्याचारी परमात्म-स्तोताओं की सङ्गति करके स्वयं को उन्नत करे ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ दे꣣वो꣢ वि꣣पा꣢ कृ꣣तो꣢ऽति꣣ ह्व꣡रा꣢ꣳसि धावति । प꣡व꣢मानो꣣ अ꣡दा꣢भ्यः ॥१२६१॥
पदार्थः(एषः) यह (विपा) मेधावी विद्वान् के द्वारा (कृतः) संस्कृत किया हुआ (पवमानः) पुरुषार्थी, अतएव (अदाभ्यः) किसी से पराजित न किया जा सकनेवाला (देवः) तेजस्वी जीवात्मा (ह्वरांसि) कुटिल कर्मों को वा कुटिल शत्रुओं को (अति) दूर करके (धावति) आगे बढ़ता है ॥६॥
भावार्थःविद्वान् आचार्य के द्वारा जब मनुष्य का आत्मा संस्कृत किया जाता है, तब मनुष्य बलवान् होकर, सभी बाधाओं को पराजित करके समाज में अग्रगण्य हो जाता है ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢꣫ दिवं꣣ वि꣡ धा꣢वति ति꣣रो꣡ रजा꣢꣯ꣳसि꣣ धा꣡र꣢या । प꣡व꣢मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥१२६२॥
पदार्थः(एषः) यह (पवमानः) पुरुषार्थी जीवात्मा (कनिक्रदत्) स्तोत्रगान को ध्वनित करता हुआ (रजांसि) रजोगुणों को (तिरः) लाँघकर (धारया) सत्त्वगुण की धारा से (दिवम्) तेजस्वी परमात्मा के प्रति (वि धावति) वेग से जाता है ॥७॥
भावार्थःरजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण को प्रबल करके ही जीवात्मा परमात्मा को पाता है ॥७॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢꣫ दिवं꣣ व्या꣡स꣢रत्ति꣣रो꣢꣫ रजा꣣ꣳस्य꣡स्तृ꣢तः । प꣡व꣢मानः स्वध्व꣣रः꣢ ॥१२६३॥
पदार्थः(एषः) यह (स्वध्वरः) शुभ उपासना-रूप यज्ञ का कर्ता, (अस्तृतः) विघ्नों से अहिंसित (पवमानः) पुरुषार्थी जीवात्मा (रजांसि) रजोगुणों और तमोगुणों को (तिरः) तिरस्कृत करके (दिवम्) तेजस्वी परमात्मा को (व्यासरत्) वेग से प्राप्त कर लेता है ॥८॥
भावार्थःमनुष्य को विघ्न तभी मार्ग से डिगाते हैं, जब वह रजोगुण, तमोगुण से दबा रहता है ॥८॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना दे꣣वो꣢ दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सु꣣तः꣢ । ह꣡रिः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अर्षति ॥१२६४॥
पदार्थः(प्रत्नेन जन्मना) आचार्य से प्राप्त श्रेष्ठ जन्म से (देवेभ्यः) दिव्य गुणों के प्रसारार्थ (सुतः) उत्पन्न किया हुआ (एषः) यह (हरिः) दीनों का दुःख हरनेवाला मनुष्य (पवित्रे) पवित्र कर्म में (अर्षति) संलग्न होता है ॥ आचार्य जब बालक का उपनयन संस्कार करता है, तब उसे अपने गर्भ में धारण करता है। तीन रात्रियों तक उसे गर्भ में रखे रहता है। जब वह जन्म लेता है अर्थात् स्नातक बनता है, तब उसे देखने के लिए चारों ओर से विद्वान् लोग एकत्र होते हैं (अथ० ११।५।३)। आचार्य विद्या से विद्यार्थी को दूसरा जन्म देता है, वही श्रेष्ठ जन्म है, माता-पिता तो शरीर को ही जन्म देते हैं। (आप० १।१।१।१४-१८)। इस द्वितीय जन्म में सावित्री (गायत्री) माता होती है और आचार्य पिता (मनु० २।१७०)। इत्यादि प्रमाणों के आधार पर आचार्य और सावित्री के द्वारा जो द्वितीय जन्म प्राप्त होता है, वही श्रेष्ठ है ॥९॥
भावार्थःप्रथम जन्म माता-पिता से प्राप्त होता है, वह मुख्य रूप से शरीर का जन्म होता है। दूसरा विद्या और सदाचार का जन्म आचार्य तथा सावित्री से होता है। द्वितीय जन्म प्राप्त करके मनुष्य पवित्र आचरणवाला हो जाता है। द्वितीय जन्म से ही वह द्विज और उस जन्म की प्राप्ति के बिना शूद्र कहलाता है ॥९॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ उ꣣ स्य꣡ पु꣢रुव्र꣣तो꣡ ज꣢ज्ञा꣣नो꣢ ज꣣न꣢य꣣न्नि꣡षः꣢ । धा꣡र꣢या पवते सु꣣तः꣢ ॥१२६५॥
पदार्थः(एषः उ) यह (स्यः) वह (पुरुव्रतः) ब्रह्मचर्याश्रम में बहुत व्रत पालन करनेवाला, (जज्ञानः) आचार्य से नवीन जन्म ग्रहण करता हुआ छात्र (सुतः) उत्पन्न होकर अर्थात् स्नातक बनकर (इषः) प्राप्त विद्याएँ (जनयन्) दूसरों को पढ़ाता हुआ (धारया) वाणी से (पवते) उन्हें पवित्र करे ॥१०॥
भावार्थःआचार्य के मुख से सब विद्याएँ पढ़कर छात्र पवित्र आचरणवाला द्विज होकर स्नातक बना हुआ दूसरों को भी सब विद्याएँ पढ़ाता हुआ उन्हें पवित्र आचरणवाला करे ॥१०॥ इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा तथा आचार्य से प्राप्त होनेवाले द्वितीय जन्म के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ दशम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ धि꣣या꣢ या꣣त्य꣢ण्व्या꣣ शू꣢रो꣣ र꣡थे꣢भिरा꣣शु꣡भिः꣢ । ग꣢च्छ꣣न्नि꣡न्द्र꣢स्य निष्कृ꣣त꣢म् ॥१२६६॥
पदार्थः(इन्द्रस्य) परमेश्वर के (निष्कृतम्) परम धाम को (गच्छन्) जाता हुआ (एषः) यह सोम जीवात्मा (अण्व्या) सूक्ष्म (धिया) ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा (याति) लक्ष्य को पा लेता है, जैसे (शूरः) कोई शूर मनुष्य (आशुभिः) वेगवान् (रथैः) रथों द्वारा लक्ष्य को पाता है ॥१॥ यहाँ लुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमुक्ति की प्राप्ति में ऋतम्भरा प्रज्ञा परम सहायक होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ पु꣣रु꣡ धि꣢यायते बृह꣣ते꣢ दे꣣व꣡ता꣢तये । य꣢त्रा꣣मृ꣡ता꣢स꣣ आ꣡श꣢त ॥१२६७॥
पदार्थः(एषः) यह सोम जीवात्मा (बृहते) महान् (देवतातये) मोक्ष पद के लाभार्थ (पुरु) बहुत अधिक (धियायते) ऋतम्भरा प्रज्ञा को पाना चाहता है, (यत्र) जिस मोक्षपद में (अमृतासः) पूर्व अमर जीवात्माएँ (आशते) विद्यमान हैं ॥२॥
भावार्थःमोक्ष की प्राप्ति के लिए मोक्ष की अभिलाषा, योगाभ्यास तथा सदाचार की अपेक्षा होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣तं꣡ मृ꣢जन्ति꣣ म꣢र्ज्य꣣मु꣢प꣣ द्रो꣡णे꣢ष्वा꣣य꣡वः꣢ । प्र꣣चक्राणं꣢ म꣣ही꣡रिषः꣢꣯ ॥१२६८॥
पदार्थः(महीः) महान्, (इषः) ज्ञान और कर्म की सम्पत्तियों को (प्रचक्राणम्) अधिकाधिक सञ्चित किये हुए (मर्ज्यम्) शुद्ध करने योग्य (एतम्) इस जीवात्मा को (आयवः) मनुष्य (द्रोणेषु) उपासना-रस के कुण्डों में (उपमृजन्ति) शोधते हैं ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा जब अविद्या, पाप आदियों से लिप्त हो जाता है, तब उसकी शुद्धि के लिए परमेश्वर की उपासना अपेक्षित होती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ हि꣣तो꣡ वि नी꣢꣯यते꣣ऽन्तः꣢ शु꣣न्ध्या꣡व꣢ता प꣣था꣢ । य꣡दी꣢ तु꣣ञ्ज꣢न्ति꣣ भू꣡र्ण꣢यः ॥१२६९॥
पदार्थः(यदि) यदि (भूर्णयः) ज्ञान आदि से भरे हुए मनुष्य (तुञ्जन्ति) स्वयं को परमेश्वर के लिए समर्पित करते हैं, तो इस (शुन्ध्यावता पथा) शुद्धियुक्त मार्ग से (अन्तः हितः) अन्तर्मुख किया हुआ (एषः) यह सोम जीवात्मा (वि नीयते) विशेषरूप से मोक्ष की ओर ले जाया जाता है ॥४॥
भावार्थःअहङ्कार का परित्याग करके परमात्मा के प्रति आत्मसमर्पण से मोक्ष का मार्ग सरल हो जाता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ रु꣣क्मि꣡भि꣢रीयते वा꣣जी꣢ शु꣣भ्रे꣡भि꣢र꣣ꣳशु꣡भिः꣢ । प꣢तिः꣣ सि꣡न्धू꣢नां꣣ भ꣡व꣢न् ॥१२७०॥
पदार्थःवाजी बलवान् (एषः) यह सोम जीवात्मा (सिन्धूनाम्) शरीरस्थ रक्तवाहिनी नाड़ियों का (पतिः) स्वामी (भवन्) होता हुआ (रुक्मिभिः) तेजस्वी (शुभ्रेभिः) स्वच्छ (अंशुभिः) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदियों से (ईयते) कार्य करता है ॥५॥
भावार्थःशरीर के अधिष्ठाता जीवात्मा को शरीरथ मन, बुद्धि, आदि तथा बाह्य साधनों को प्रयुक्त करके सदा ही उन्नति करनी चाहिए ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣡ शृङ्गा꣢꣯णि꣣ दो꣡धु꣢व꣣च्छि꣡शी꣢ते यू꣣थ्यो꣣꣬३꣱वृ꣡षा꣢ । नृ꣣म्णा꣡ दधा꣢꣯न꣣ ओ꣡ज꣢सा ॥१२७१॥
पदार्थःप्रथम—साँड के पक्ष में। (ओजसा) प्रबलता के साथ (नृम्णा) बलों को (दधानः) धारण करता हुआ (एषः) यह (यूथ्यः) गौओं के समूह में रहनेवाला (वृषा) साँड (शृङ्गाणि) सींगों को (दोधुवत्) कँपाता हुआ (शिशीते) पर्वत, खम्भे आदि पर तेज कर रहा है ॥ द्वितीय—मनुष्य के पक्ष में। (ओजसा) बल से (नृम्णा) धन को (दधानः) कमाता हुआ (एषः) यह (यूथ्यः) सामाजिक तथा (वृषा) अन्यों पर सुख की वर्षा करनेवाला मानव (दोधुवत्) दोषों को कँपाता हुआ (शृङ्गाणि) धर्म, अर्थ, काम मोक्ष इन चार पुरुषार्थों का (शिशीते) अभ्यास करता है ॥६॥ यहाँ श्लेष है, प्रथम अर्थ में स्वभावोक्ति अलङ्कार है ॥६॥
भावार्थःजैसे बलवान् साँड स्वभाव के अनुसार सिर को कँपाता हुआ अपने सींगों को पर्वत आदि पर तीक्ष्ण करता है, वैसे ही बलवान् मनुष्य, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को तीक्ष्ण करे ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣡ वसू꣢꣯नि पिब्द꣣नः꣡ परु꣢꣯षा꣣ ययि꣣वा꣡ꣳ अति꣢꣯ । अ꣢व꣣ शा꣡दे꣢षु गच्छति ॥१२७२॥
पदार्थः(पिब्दनः) जो स्वयं उपासना रस का स्वाद लेता हुआ उसे दूसरों को भी देता है, ऐसा (एषः) यह जीवात्मा (परुषा) कठोर परिणामवाले (वसूनि) भौतिक धनों को (अति ययिवान्) छोड़कर (शादेषु) शाद्वलस्थलों में (अवगच्छति) परमात्मा का अनुभव करता है ॥७॥
भावार्थःघास आदि से हरे-भरे रमणीक प्रदेशों में परमात्मा की विभूति का दर्शन सुगम होता है। कहा भी है—पर्वतों के एकान्त में, नदियों के सङ्गम पर ध्यान द्वारा सर्वज्ञ परमेश्वर प्रकट होता है (साम० १४३) ॥७॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣त꣢मु꣣ त्यं꣢꣫ दश꣣ क्षि꣢पो꣣ ह꣡रि꣢ꣳ हिन्वन्ति꣣ या꣡त꣢वे । स्वा꣣युधं꣢ म꣣दि꣡न्त꣢मम् ॥१२७३॥
पदार्थः(एतम् उ) इस (त्यम्) उस (स्वायुधम्) उत्तम शस्त्रास्त्रों से युक्त (मदिन्तमम्) अतिशय उत्साहयुक्त (हरिम्) मनुष्य को (दश क्षिपः) दस प्रेरक प्राण वा दस प्रेरक इन्द्रियाँ (यातवे) गति करने के लिए अर्थात् ज्ञानसम्पादन तथा पुरुषार्थ करने के लिए (हिन्वन्ति) प्रेरित करती हैं ॥८॥
भावार्थःजैसे चाबुकें घोड़े को चलने के लिए प्रेरित करती हैं, वैसे ही दस प्राण वा दस इन्द्रियाँ देहधारी जीवात्मा को कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं ॥८॥ इस खण्ड में आत्मशुद्धि, परमात्मानुभव और मोक्ष के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ दशम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ उ꣣ स्य꣢꣫ वृषा꣣ र꣢꣫थोऽव्या꣣ वारे꣡भि꣢रव्यत । ग꣢च्छ꣣न्वा꣡ज꣢ꣳ सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥१२७४॥
पदार्थः(सहस्रिणम्) सहस्र ऐश्वर्यों से युक्त (वाजम्) बल को (गच्छन्) प्राप्त करता हुआ (एषः उ) यह (स्यः) वह (वृषा) सुखवर्षी (रथः) गतिशील सोम जीवात्मा (अव्याः वारेभिः) रक्षा करनेवाली जगन्माता के दोष-निवारक उपायों से (अव्यत) रक्षा किया जाता है ॥१॥
भावार्थःजगन्माता की उपासना से मनुष्य के दोष दूर होते हैं और उसमें सद्गुण समा जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣तं꣢ त्रि꣣त꣢स्य꣣ यो꣡ष꣢णो꣣ ह꣡रि꣢ꣳ हिन्व꣣न्त्य꣡द्रि꣢भिः । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य पी꣣त꣡ये꣢ ॥१२७५॥
पदार्थः(त्रितस्य) धारणावती बुद्धि में बहुत अधिक बढ़े हुए उपासक की (योषणः) ध्यानवृत्तियाँ (एतम्) इस (हरिम्) दोषहर्ता (इन्दुम्) रसनिधि परमेश्वर को (इन्द्राय पीतये) जीवात्मा द्वारा पिये जाने के लिए (अद्रिभिः) प्रणव-जप आदि रूप सिल-बट्टों से (हिन्वन्ति) प्रेरित करती हैं ॥२॥
भावार्थःयोगाभ्यास द्वारा मनुष्य परमात्मा का साक्षात्कार करने में समर्थ हो सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣡ स्य मानु꣢꣯षी꣣ष्वा꣢ श्ये꣣नो꣢꣫ न वि꣣क्षु꣡ सी꣢दति । ग꣡च्छ꣢ञ्जा꣣रो꣢꣫ न यो꣣षि꣡त꣢म् ॥१२७६॥
पदार्थः(योषितम्) पत्नी के पास (गच्छन्) प्रेम से जाते हुए (जारः न) पति के समान (गच्छन्) धार्मिक प्रजा के पास प्रेम से जाता हुआ (एषः स्यः) यह वह सोम अर्थात् रसागार परमेश्वर (श्येनः न) सूर्य के समान (मानुषीषु विक्षु) मानवी प्रजाओं में (आसीदति) स्थित है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपति जैसे पत्नी से स्नेह करता है, वैसे ही परमेश्वर धार्मिक प्रजा से स्नेह करता है। जैसे आकाश में स्थित सूर्य सब प्रजाओं को भौतिक प्रकाश देकर अनुगृहीत करता है, वैसे ही परमेश्वर दिव्य प्रकाश देकर ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢꣫ स्य मद्यो꣣ र꣡सोऽव꣢꣯ चष्टे दि꣣वः꣡ शिशुः꣢꣯ । य꣢꣫ इन्दु꣣र्वा꣢र꣣मा꣡वि꣢शत् ॥१२७७॥
पदार्थःप्रथम—चन्द्र के पक्ष में। ग्रहण से मोक्ष के बाद के चन्द्रमा का वर्णन करते हैं— (एषः स्यः) यह वह (मद्यः) मोददायी, (रसः) चाँदनी का रस बरसानेवाला, (दिवः शिशुः) आकाश के शिशु के समान विद्यमान चन्द्रमा (अव चष्टे) पूर्णतः प्रकाशित हो गया है, (यः इन्दुः) जो चन्द्रमा पहले (वारम्) सूर्य और चन्द्रमा के मध्य पृथिवी के आ जाने से आवरण में (आविशत्) प्रविष्ट हो गया था ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (एषः स्यः) यह वह (मद्यः) आनन्दित करने योग्य, (रसः) रस पीनेवाला (दिवः शिशुः) तेजस्वी परमात्मा को पुत्र के समान प्रिय जीवात्मा (अवचष्टे) परमात्मा का दर्शन कर रहा है, (यः इन्दुः) जो जीवात्मा, पहले (वारम्) परमात्मा के दर्शन को रोकनेवाले भोग्य जगत् के प्रति (आविशत्) आकृष्ट था ॥४॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है। ‘दिवः शिशुः’ में लुप्तोपमा है। ‘रसः’ की रसवर्षक व रसपायी में लक्षणा है ॥४॥
भावार्थःचन्द्रग्रहण पूर्णमासी को ही होता है। ग्रहणकाल में चन्द्रमा अंशतः या पूर्णतः अन्धकार से ढक जाता है। धीरे-धीरे उसका मोक्ष होता है। पूर्ण मोक्ष के पश्चात् वह पहले के समान पूर्ण चन्द्रमा के रूप में भासित होने लगता है। यह विज्ञानसम्मत प्राकृतिक घटना है, पौराणिक राहु-केतु का वृत्तान्त काल्पनिक ही है। वैसे ही जीवात्मा भी भोग्य जगत् के प्रति आकृष्ट होकर उससे ग्रसा जाता है। उससे मोक्ष के अनन्तर ही वह परमात्मा का साक्षात् कर पाता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢꣫ स्य पी꣣त꣡ये꣢ सु꣣तो꣡ हरि꣢꣯रर्षति धर्ण꣣सिः꣢ । क्र꣢न्द꣣न्यो꣡नि꣢म꣣भि꣢ प्रि꣣य꣢म् ॥१२७८॥
पदार्थः(एषः स्यः) यह वह (धर्णसिः) देह को धारण करनेवाला (हरिः) जीवात्मा (पीतये) कर्मफलों का स्वाद लेने के लिए (सुतः) उत्पन्न किया हुआ (क्रन्दन्) क्रन्दन करता हुआ (प्रियं योनिम् अभि) जन्म में कारणभूत प्रिय माता-पिता की ओर (अर्षति) जाता है ॥५॥
भावार्थःमाता के गर्भ में दस महीने तक लेटा रहा शिशु बाहर निकल कर कर्मफलों का भोग करता हुआ और श्रेष्ठ नवीन कर्म करता हुआ उन्नति करे ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣तं꣢꣫ त्यꣳ ह꣣रि꣢तो꣣ द꣡श꣢ मर्मृ꣣ज्य꣡न्ते꣢ अप꣣स्यु꣡वः꣢ । या꣢भि꣣र्म꣡दा꣢य꣣ शु꣡म्भ꣢ते ॥१२७९॥
पदार्थः(एतं त्यम्) इस उस देहधारी जीवात्मा को (अपस्युवः) ज्ञान और कर्म के उपार्जन की इच्छुक (दश हरितः) दस इन्द्रियाँ (मर्मृज्यन्ते) अतिशय अलङ्कृत करती हैं, (याभिः) जिन दस इन्द्रियों से वह (मदाय) सुखभोगार्थ (शुम्भते) शोभित होता है ॥६॥
भावार्थःयदि शरीर में ज्ञान प्राप्त करनेवाला और कर्म करनेवाला जीवात्मा मन, बुद्धि एवं प्राणों सहित ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय रूप साधनों को न प्राप्त करे तो, कैसे सफल हो सकता है ॥६॥ इस खण्ड में जीवात्मा और परमारत्मा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ दशम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ वा꣣जी꣢ हि꣣तो꣡ नृभि꣢꣯र्विश्व꣣वि꣡न्मन꣢꣯स꣣स्प꣡तिः꣢ । अ꣢व्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति ॥१२८०॥
पदार्थः(वाजी) बलवान् और (नृभिः हितः) मनुष्यों द्वारा अन्तःकरण में धारण किया गया (विश्ववित्) सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, (मनसः पतिः) मन का अधीश्वर (एषः) यह सोम परमेश्वर (अव्यम्) अविनश्वर, (वारम्) वरणीय जीवात्मा के पास (वि धावति) शीघ्रता से पहुँचता है ॥१॥
भावार्थःजैसे पिता प्यारे पुत्र के पास पहुँचता है, वैसे ही परमात्मा जीवात्मा के पास प्रेम से पहुँचता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अक्षर꣣त्सो꣡मो꣢ दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सु꣣तः꣢ । वि꣢श्वा꣣ धा꣡मा꣢न्यावि꣣श꣢न् ॥१२८१॥
पदार्थः(देवभ्यः) शरीर में स्थित आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदियों के लिए (सुतः) अभिषुत किया गया (एषः सोमः) यह ब्रह्मानन्द-रस (पवित्रे) पवित्र अन्तरात्मा में (अक्षरत्) टपका है और (विश्वा धामानि) सब अन्नमय, प्राणमय, मनोमय आदि कोशों में (आविशन्) व्याप्त हो रहा है ॥२॥
भावार्थःअन्तरात्मा के पवित्र होने पर ही ब्रह्मानन्दरस का अनुभव होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ दे꣣वः꣡ शु꣢भाय꣣ते꣢ऽधि꣣ यो꣢ना꣣व꣡म꣢र्त्यः । वृ꣣त्रहा꣡ दे꣢व꣣वी꣡त꣢मः ॥१२८२॥
पदार्थः(अमर्त्यः) अमरणशील, (वृत्रहा) विघ्नों का विनाशक, (देववीतमः) दिव्यगुणों को अत्यधिक प्राप्त करनेवाला (एष देवः) यह स्तोता जीव (योनौ अधि) परमात्मारूप घर में (शुभायते) शोभित होता है ॥३॥
भावार्थःजैसे गृहस्वामी की घर से शोभा होती है, वैसे ही जीवात्मा की परमात्मा को प्राप्त करने से शोभा होती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢꣫ वृषा꣣ क꣡नि꣢क्रदद्द꣣श꣡भि꣢र्जा꣣मि꣡भि꣢र्य꣣तः꣢ । अ꣣भि꣡ द्रोणा꣢꣯नि धावति ॥१२८३॥
पदार्थः(वृषा) बलवान् और (दशभिः जामिभिः) दस अंगुलियों से अर्थात् अंगुलियों के समान आपस में सम्बद्ध दस यम-नियमों से (यतः) नियन्त्रित हुआ (एषः) यह सोम जीवात्मा (द्रोणानि अभि) सांसारिक भोगों के प्रति (धावति) दौड़े ॥४॥
भावार्थःसांसारिक भोगों में अति आसक्ति उचित नहीं है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣡ सूर्य꣢꣯मरोचय꣣त्प꣡व꣢मानो꣣ अ꣢धि꣣ द्य꣡वि꣢ । प꣣वि꣡त्रे꣢ मत्स꣣रो꣡ मदः꣢꣯ ॥१२८४
पदार्थः(एषः) इस (पवमानः) क्रियाशील सोम परमात्मा ने (द्यवि अधि) द्युलोक में (सूर्यम्) सूर्य को (अरोचयत्) चमकाया है और (मदः) आनन्दमय यह परमात्मा (पवित्रे) पवित्र अन्तरात्मा में (मत्सरः) आनन्दजनक होता है ॥५॥
भावार्थःबाहरी जगत् में सूर्य, चाँद, तारावली आदि में और अन्दर के जगत् मन, मस्तिष्क आदि में जो कर्तृत्व और महत्त्व दिखायी देता है, वह सब परमात्मा का ही है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣡ सूर्ये꣢꣯ण हासते सं꣣व꣡सा꣢नो वि꣣व꣡स्व꣢ता । प꣡ति꣢र्वा꣣चो꣡ अदा꣢꣯भ्यः ॥१२८५
पदार्थः(संवसानः) सबको अपने तेज से आच्छादित करता हुआ (एषः) यह सोम परमेश्वर (विवस्वता) अन्धकार को दूर करनेवाले (सूर्येण) सूर्य के साथ (हासते) स्पर्धा करता है और (अदाभ्यः) जिसे दबाया या पराजित नहीं किया जा सकता, ऐसा यह (वाचः पतिः) वाणी का भी स्वामी है ॥६॥
भावार्थःपरमेश्वर सूर्य, बिजली आदि से भी अधिक तेजस्वी और वाचस्पतियों का भी मूर्धन्य है ॥६॥ इस खण्ड में परमात्मा और जीवात्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ दशम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ क꣣वि꣢र꣣भि꣡ष्टु꣢तः प꣣वि꣢त्रे꣣ अ꣡धि꣢ तोशते । पु꣣ना꣢꣫नो घ्नन्नप꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥१२८६॥
पदार्थः(अभिष्टुतः) स्तुति किया हुआ (कविः) मेधावी, क्रान्तद्रष्टा (एषः) यह सोम परमेश्वर (पुनानः) अन्तःकरण को पवित्र करता हुआ (द्विषः) द्वेषवृत्तियों को (अपघ्नन्) मार भगाता हुआ (पवित्रे अधि) पवित्र अन्तरात्मा में (तोशते) प्रदीप्त होता है ॥१॥
भावार्थःमलिन दर्पण में जैसे प्रतिबिम्ब भासित नहीं होता, वैसे ही मलिन अन्तरात्मा में परमेश्वर प्रकाशित नहीं होता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣡ इन्द्रा꣢꣯य वा꣣य꣡वे꣢ स्व꣣र्जि꣡त्परि꣢꣯ षिच्यते । प꣣वि꣡त्रे꣢ दक्ष꣣सा꣡ध꣢नः ॥१२८७॥
पदार्थः(स्वर्जित्) परमानन्द का विजेता, (दक्षसाधनः) बलदायक (एषः) यह सोम परमेश्वर (इन्द्राय) मन के हितार्थ और (वायवे) प्राण के हितार्थ (पवित्रे) पवित्र अन्तरात्मा में (परि षिच्यते) चारों ओर से सींचा जा रहा है ॥२॥
भावार्थःउपासक के अन्तरात्मा में परमात्मा के प्रकट हो जाने पर मन, बुद्धि, प्राण आदि सभी बलवान् हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢꣫ नृभि꣣र्वि꣡ नी꣢यते दि꣣वो꣢ मू꣣र्धा꣡ वृषा꣢꣯ सु꣣तः꣢ । सो꣢मो꣣ व꣡ने꣢षु विश्व꣣वि꣢त् ॥१२८८॥
पदार्थः(दिवः मूर्धा) तेज का शिरोमणि, (वृषा) सुख की वर्षा करनेवाला, (विश्ववित्) सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, (वनेषु) एकान्त जंगलों में (नृभिः) उपासक मनुष्यों से (सुतः) ध्यान द्वारा प्रकट किया गया (एषः) यह (सोमः) रसमय परमेश्वर, उनके द्वारा (वि नीयते) विशेष रूप से जीवन में लाया जाता है ॥३॥
भावार्थःउपासक लोग परमात्मा का साक्षात्कार करके उसे अपने जीवन का अङ्ग बना लें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ ग꣣व्यु꣡र꣢चिक्रद꣣त्प꣡व꣢मानो हिरण्य꣣युः꣢ । इ꣡न्दुः꣢ सत्रा꣣जि꣡दस्तृ꣢꣯तः ॥१२८९॥
पदार्थः(एषः) यह (गव्युः) उपासकों को वेद-वाणियाँ प्राप्त कराना चाहता हुआ, (हिरण्ययुः) यश और ज्योति प्राप्त कराना चाहता हुआ, (सत्राजित्) एक साथ सब काम, क्रोध आदि शत्रुओं को जीत लेनेवाला (पवमानः) पवित्रताकारक, (इन्दुः) आनन्दरस से भिगोनेवाला तेजस्वी परमेश्वर (अचिक्रदत्) हमें अपने समीप बुला रहा है ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर सदा ही उपासकों के साथ मित्रता स्थापित करने के लिए उद्यत रहता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ शु꣣꣬ष्म्य꣢꣯सिष्यदद꣣न्त꣡रि꣢क्षे꣣ वृ꣢षा꣣ ह꣡रिः꣢ । पु꣣ना꣢꣫न इन्दु꣣रि꣢न्द्र꣣मा꣡ ॥१२९०॥
पदार्थः(एषः) यह (शुष्मी) बलवान्, (वृषा) आनन्दवर्षक, (हरिः) पापों को हरनेवाला (इन्दुः) रसमय परमेश्वर (इन्द्रम्) जीवात्मा को (आ पुनानः) चारों ओर से पवित्र करता हुआ (अन्तरिक्षे) मनोमय कोश में (असिष्यदत्) प्रवाहित हो रहा है ॥५॥
भावार्थःजैसे अन्तरिक्ष में स्थित चन्द्रमा चाँदनी के रस को प्रसारित करता है, वैसे ही हृदय-प्रदेश में स्थित परमेश्वर आनन्द-रस को प्रवाहित करता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ शु꣣ष्म्य꣡दा꣢भ्यः꣣ सो꣡मः꣢ पुना꣣नो꣡ अ꣢र्षति । दे꣣वावी꣡र꣢घशꣳस꣣हा꣢ ॥१२९१॥
पदार्थः(एषः) यह (शुष्मी) बलवान् (अदाभ्यः) दबाया या हराया न जा सकनेवाला, (देवावीः) दिव्यगुणों का रक्षक, (अघशंसहा) पापप्रशंसक भावों को नष्ट करनेवाला (सोमः) प्रेरक परमेश्वर (पुनानः) पवित्रता देता हुआ (अर्षति) सक्रिय है ॥६॥
भावार्थःपरमेश्वर से प्रेरणा प्राप्त करके सभी मनुष्य पवित्र हृदयवाले हों ॥६॥ इस खण्ड में परमात्मा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ दशम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ सु꣣तः꣢ पी꣣त꣢ये꣣ वृ꣢षा꣣ सो꣡मः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अर्षति । वि꣣घ्न꣡न्रक्षा꣢꣯ꣳसि देव꣣युः꣢ ॥१२९२॥
पदार्थः(पीतये) रसास्वादन करने के लिए (सुतः) उपासना किया गया (सः) वह (वृषा) आनन्द की वर्षा करनेवाला (सोमः) रसमय परमेश्वर (पवित्रे) पवित्र अन्तरात्मा में (अर्षति) पहुँच रहा है। (देवयुः) दिव्यगुण प्रदान करना चाहता हुआ वह (रक्षांसि) पापों को (विघ्नन्) विशेष रूप से नष्ट कर रहा है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से अन्तरात्मा में दिव्यगुण आते हैं और दोष नष्ट होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ विचक्ष꣣णो꣡ हरि꣢꣯रर्षति धर्ण꣣सिः꣢ । अ꣣भि꣢꣫ योनिं꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥१२९३॥
पदार्थः(सः) वह (विचक्षणः) विशेष द्रष्टा, (धर्णसिः) दिव्य गुण-कर्म-स्वभावों का धारण करनेवाला, (हरिः) पाप हरनेवाला परमेश्वर (कनिक्रदत्) उपदेश देता हुआ (योनिम् अभि) अपने निवासगृहभूत जीवात्मा को लक्ष्य करके (पवित्रे) पवित्र हृदय में (अर्षति) पहुँचता है ॥२॥
भावार्थःपवित्रात्मा लोग ही परमेश्वर की प्राप्ति के अधिकारी होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ वा꣣जी꣡ रो꣢च꣣नं꣢ दि꣣वः꣡ पव꣢꣯मानो꣣ वि꣡ धा꣢वति । र꣣क्षोहा꣡ वार꣢꣯म꣣व्य꣡य꣢म् ॥१२९४॥
पदार्थः(सः) वह (वाजी) बलवान्, (रक्षोहा) पापनाशक (पवमानः) पवित्रता देनेवाला सोम परमेश्वर (दिवः) द्युलोक के (रोचनम्) दीप्त पिण्ड सूर्य को और (अव्ययम्) अविनश्वर (वारम्) दोषनिवारक जीवात्मा को (विधावति) विविध रूप से शुद्ध करता है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर यदि शुद्धिकर्ता न हो तो सब जगह मलिनता का साम्राज्य छा जाए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ त्रि꣣त꣢꣫स्याधि꣣ सा꣡न꣢वि꣣ प꣡व꣢मानो अरोचयत् । जा꣣मि꣢भिः꣣ सू꣡र्य꣢ꣳ स꣣ह꣢ ॥१२९५॥
पदार्थः(सः) उस (पवमानः) क्रियाशील और पवित्रकर्ता परमेश्वर ने (त्रितस्य) तृतीय लोक द्यौ के (सानवि अधि) शिखर पर (जामिभिः सह) बन्धुभूत नक्षत्रों के साथ (सूर्यम्) सूर्य को (अरोचयत्) चमकाया है ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर द्युलोक में सूर्य और तारावलि को चमकाता है और बिना ही आधार के धारण करता है, यह उसका उपकार कौन नहीं मानेगा? ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ वृषा꣢꣯ सु꣣तो꣡ व꣢रिवो꣣वि꣡ददा꣢꣯भ्यः । सो꣢मो꣣ वा꣡ज꣢मिवासरत् ॥१२९६॥
पदार्थः(सः) वह (वृत्रहा) विघ्ननाशक, (वृषा) सुखवर्षी, (वरिवोवित्) ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाला, (अदाभ्यः) अपराजेय, (सुतः) उपासना किया गया (सोमः) रस का खजाना परमेश्वर (असरत्) उपासकों को प्राप्त होता है, (वाजम् इव) जैसे कोई वीर युद्ध क्षेत्र को प्राप्त होता है ॥५॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःजैसे कोई वीर सेनापति युद्धभूमि में पहुँच कर अपने पक्ष के योद्धाओं को विजय दिलाता है, वैसे ही परमेश्वर उपासकों के पास पहुँचकर उन्हें विजयोपहार देता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ दे꣣वः꣢ क꣣वि꣡ने꣢षि꣣तो꣢३꣱ऽभि꣡ द्रोणा꣢꣯नि धावति । इ꣢न्दु꣣रि꣡न्द्रा꣢य म꣣ꣳह꣡य꣢न् ॥१२९७॥
पदार्थः(कविना) मेधावी गुरु से (इषितः) प्रेरित (सः) वह (देवः) स्तुतिकर्ता (इन्दुः) तेजस्वी जीवात्मा (इन्द्राय) परमात्मा को (मंहयन्) आत्मसमर्पण करता हुआ (द्रोणानि अभि) लक्ष्यों की ओर (विधावति) वेग से दौड़ता है ॥६॥
भावार्थःपरमात्मा के प्रति आत्मसमर्पण करने से जीवात्मा में कोई विलक्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है, जिससे वह सब विघ्नों को दूर फेंकता हुआ लक्ष्य तक जा पहुँचता है ॥६॥ इस खण्ड में परमात्मा और जीवात्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ दशम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानाध्येता| स्वर - गान्धारः
यः꣡ पा꣢वमा꣣नी꣢र꣣ध्ये꣡त्यृषि꣢꣯भिः꣣ स꣡म्भृ꣢त꣣ꣳ र꣡स꣢म् । स꣢र्व꣣ꣳ स꣢ पू꣣त꣡म꣢श्नाति स्वदि꣣तं꣡ मा꣢त꣣रि꣡श्व꣢ना ॥१२९८॥
पदार्थः(यः) जो मनुष्य (ऋषिभिः संभृतं रसम्) वेद के रहस्य को जाननेवाले ऋषियों ने जिनके रस का आस्वादन किया है, ऐसी (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाओं का (अध्येति) अर्थज्ञानपूर्वक अध्ययन करता है, (सः) वह (मातरिश्वना) वायु से (स्वदितम्) स्वादु बनाये गये (सर्वम्) सब (पूतम्) पवित्र भोज्य पदार्थ को (अश्नाति) खाता है ॥१॥ यहाँ पावमानी ऋचाओं का अध्ययन सब पवित्र भोज्य पदार्थों के आस्वादन के समान तृप्तिकारी होता है, इस प्रकार उपमा में पर्यवसान होने के कारण निदर्शना अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःवैदिक ऋचाओं के अर्थज्ञानपूर्वक अध्ययन से और उसके अनुकूल आचरण से अध्ययन करनेवालों का महान् कल्याण होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानाध्येता| स्वर - गान्धारः
पा꣣वमानी꣢꣫र्यो अ꣣ध्ये꣡त्यृषि꣢꣯भिः꣣ स꣡म्भृ꣢त꣣ꣳ र꣡स꣢म् । त꣢स्मै꣣ स꣡र꣢स्वती दुहे क्षी꣣र꣢ꣳ स꣣र्पि꣡र्म꣢꣯धूद꣣क꣢म् ॥१२९९॥
पदार्थः(यः) जो मनुष्य (ऋषिभिः संभृतं रसम्) वेद के रहस्य जाननेवाले ऋषियों ने जिनके रस का आस्वादन किया है, ऐसी (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाओं का (अध्येति) अर्थज्ञानपूर्वक अध्ययन करता है, (तस्मै) उस मनुष्य के लिए (सरस्वती) वेदमाता (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी, (मधु) शहद और (उदकम्) स्वच्छ जल (दुहे) स्वयं दुह देती है ॥ वेद में अन्यत्र भी कहा गया है—मैंने वरदात्री वेदमाता की स्तुति की है, आप लोग भी उसका अध्ययन-स्तवन करो, क्योंकि वह द्विजों को पवित्र करनेवाली है। वह मुझ वेदाध्येता को आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मवचर्स् देकर मेरे आत्मलोक ब्रह्मलोक में निवास करने लगी है। (अथ० १९।७१।१) ॥२॥
भावार्थःवेद का अध्ययन करके और उसके अनुकूल आचरण करके जो पुरुषार्थी होता है, वह सब सम्पदाओं को प्राप्त कर सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानाध्येता| स्वर - गान्धारः
पा꣣वमानीः꣢ स्व꣣स्त्य꣡य꣢नीः सु꣣दु꣢घा꣣ हि꣡ घृ꣢त꣣श्चु꣡तः꣢ । ऋ꣡षि꣢भिः꣣ सं꣡भृ꣢तो꣣ र꣡सो꣢ ब्राह्म꣣णे꣢ष्व꣣मृ꣡त꣢ꣳ हि꣣त꣢म् ॥१३००
पदार्थः(पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाएँ (हि) निश्चय ही (स्वस्त्ययनीः) कल्याण प्राप्त करानेवाली, (सुदुघाः) मधुर दूध देनेवाली और (घृतश्चुतः) घी चुआनेवाली होती हैं। इनके अध्ययन से (ऋषिभिः) वेदरहस्यवेत्ता ऋषिजन (रसः) आनन्द-रस को (संभृतः) आस्वादन करते हैं और (ब्राह्मणेषु) वेदपाठी ब्राह्मणों को (अमृतम्) दुःखमोक्षरूप अमृतत्व (हितम्) प्राप्त होता है ॥३॥ यहाँ ‘सुदुघाः’ और ‘घृतश्चुतः’ इन शब्दों के अर्थ से पावमानी ऋचाएँ दुधारू गायें हैं, यह व्यङ्ग्यार्थ निकलता है ॥३॥
भावार्थःवेदों के अध्ययन से कर्मयोगी होकर लोग सब लौकिक और आध्यात्मिक सम्पदा प्राप्त कर लेते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानाध्येता| स्वर - गान्धारः
पा꣣वमानी꣡र्द꣢धन्तु न इ꣣मं꣢ लो꣣क꣡मथो꣢꣯ अ꣣मु꣢म् । का꣢मा꣣न्त्स꣡म꣢र्धयन्तु नो दे꣣वी꣢र्दे꣣वैः꣢ स꣣मा꣡हृ꣢ताः ॥१३०१
पदार्थः(पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाएँ (नः) हमारे (इमं लोकम्) इहलोक को (अथ उ) और (अमुम्) परलोक को (दधन्तु) सहारा लगाएँ। (देवैः) वेदवेत्ता विद्वानों द्वारा (समाहृताः) पढ़ायी गयी वे (देवीः) अर्थप्रकाशक ऋचाएँ (नः) हमारे (कामान्) मनोरथों को (समर्द्धयन्तु) पूर्ण करें ॥४॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि वे वेदों के अध्ययन से स्फूर्ति और सत्प्रेरणा प्राप्त कर इस लोक को, परलोक को और सब मनोरथों को समृद्ध करें ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानाध्येता| स्वर - गान्धारः
ये꣡न꣢ दे꣣वाः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢णा꣣त्मा꣡नं꣢ पु꣣न꣢ते꣣ स꣡दा꣢ । ते꣡न꣢ स꣣ह꣡स्र꣢धारेण पावमा꣣नीः꣡ पु꣢नन्तु नः ॥१३०२
पदार्थः(देवाः) दिव्यगुणों से युक्त विद्वान् लोग (येन पवित्रेण) जिस पवित्र ब्रह्मानन्द से (आत्मानम्) अपने आत्मा को (सदा) हमेशा (पुनते) पवित्र करते हैं, (तेन सहस्रधारेण) उस हजार धाराओं से बहनेवाले दिव्य आनन्द से (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाएँ (नः) हमें (पुनन्तु) पवित्र करें ॥५॥
भावार्थःपावमानी ऋचाओं के गान से और उनमें वर्णित रसमय परमात्मा में ध्यान लगाने से कोई अद्वितीय दिव्य आनन्दरस का प्रवाह बहता हुआ उपासकों के चित्तों को पवित्र कर जाता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानाध्येता| स्वर - गान्धारः
पा꣣वमानीः꣡ स्व꣣स्त्य꣡य꣢नी꣣स्ता꣡भि꣢र्गच्छति नान्द꣣न꣢म् । पु꣡ण्या꣢ꣳश्च भ꣣क्षा꣡न्भ꣢क्षयत्यमृत꣣त्वं꣡ च꣢ गच्छति ॥१३०३
पदार्थः(पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाएँ (स्वस्त्ययनीः) कल्याण करनेवाली हैं। (ताभिः) उन ऋचाओं से वेदों का अध्ययन करनेवाला (नान्दनम्) आनन्द के धाम मोक्ष को (गच्छति) पा लेता है, (पुण्यान् च) और पुण्यों से प्राप्त (भक्षान्) भोगों को (भक्षयति) भोगता है, (अमृतत्वं च) और अमृतस्वरूप को (गच्छति) प्राप्त कर लेता है। मोक्षधाम का वर्णन वेद में इस प्रकार से किया गया है—‘जहाँ आनन्द हैं, मोद हैं, तृप्तियाँ हैं, प्रमोद हैं, जहाँ मनोरथ करनेवाले के मनोरथ पूर्ण होते हैं, उस मोक्षधाम में ले जाकर मुझे अमर कर दो। हे इन्दु ! हे रसागार सोम परमात्मन् ! मुझ आत्मा के लिए तुम आनन्द को चुआओ’ (ऋ० ९।११३।११) ॥६॥
भावार्थःपावमानी ऋचाओं के अर्थज्ञानपूर्वक गान से और तदनुकूल आचरण करने से अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति होती है ॥६॥ इस खण्ड में पावमानी ऋचाओं के अध्ययन का फल अमृतत्व आदि वर्णित होने से और पूर्व खण्ड में परमात्मा-जीवात्मा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ दशम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣡ग꣢न्म म꣣हा꣡ नम꣢꣯सा꣣ य꣡वि꣢ष्ठं꣣ यो꣢ दी꣣दा꣢य꣣ स꣡मि꣢द्धः꣣ स्वे꣡ दु꣢रो꣣णे꣢ । चि꣣त्र꣡भा꣢नु꣣ꣳ रो꣡द꣢सी अ꣣न्त꣢रु꣣र्वी꣡ स्वा꣢हुतं वि꣣श्व꣡तः꣢ प्र꣣त्य꣡ञ्च꣢म् ॥१३०४॥
पदार्थः(यः) जो अग्रनेता परमेश्वर (स्वे) अपने (दुरोणे) ब्रह्माण्डरूप और जीवात्मारूप घर में (समिद्धः) प्रदीप्त हुआ (दीदाय) भासित होता है, उस (यविष्ठम्) सर्वाधिक युवा, (चित्रभानुम्) अद्भुत प्रकाशवाले, (उर्वी रोदसी) विस्तीर्ण द्यावापृथिवी के (अन्तः) अन्दर (स्वाहुतम्) जिसने अपनी आहुति दी हुई है, ऐसे (विश्वतः प्रत्यञ्चम्) सब जगह व्याप्त परमेश्वर को (महा नमसा) महान् नमस्कार के साथ, हम (अगन्म) प्राप्त होते हैं ॥१॥
भावार्थःजो सूक्ष्मदर्शी लोग हैं, वे आकाश-पृथिवी में सर्वत्र परमात्मा की ही विभूति को देखते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
स꣢ म꣣ह्ना꣡ विश्वा꣢꣯ दुरि꣣ता꣡नि꣢ सा꣣ह्वा꣢न꣣ग्नि꣡ ष्ट꣢वे꣣ द꣢म꣣ आ꣢ जा꣣त꣡वे꣢दाः । स꣡ नो꣢ रक्षिषद्दुरि꣣ता꣡द꣢व꣣द्या꣢द꣣स्मा꣡न्गृ꣢ण꣣त꣢ उ꣣त꣡ नो꣢ म꣣घो꣡नः꣢ ॥१३०५॥
पदार्थः(मह्ना) महिमा से (विश्वा) सब (दुरितानि) पाप, दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदियों को (साह्वान्) नष्ट कर देनेवाला, (जातवेदाः) सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी (अग्निः) अग्रणायक परमेश्वर (दमे) अन्तरात्मा-रूप घर में (आ स्तवे) प्रतिष्ठा पाता है। (सः) वह परमेश्वर (नः) हमें (अवद्यात्) निन्दनीय (दुरितात्) पाप से (रक्षिषत्) बचाये। (गृणतः) अर्चना करनेवाले (अस्मान्) हम स्तोताओं को (उत्) और (नः) हमारे (मघोनः) धनिक पुत्र, पौत्र, पत्नी आदि की (रक्षिषत्) रक्षा करे ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा को ध्याकर, उससे शुभ प्रेरणा पाकर हम और हमारे सम्बन्धी जन सब दुर्गुण, दुर्व्यसन, दुःख आदि को दूर कर देवें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
त्वं꣡ वरु꣢꣯ण उ꣣त꣢ मि꣣त्रो꣡ अ꣢ग्ने꣣ त्वां꣡ व꣢र्धन्ति म꣣ति꣢भि꣣र्व꣡सि꣢ष्ठाः । त्वे꣡ वसु꣢꣯ सुषण꣣ना꣡नि꣢ सन्तु यू꣣यं꣡ पा꣢त स्व꣣स्ति꣢भिः꣣ स꣡दा꣢ नः ॥१३०६॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन् ! (त्वम्) आप (वरुणः) पापों के निवारक (उत) और (मित्रः) विपत्ति से बचानेवाले मित्र हो। (वसिष्ठाः) अतिशय विद्या के ऐश्वर्य से युक्त विद्वान् उपासक लोग (मतिभिः) स्तुतियों से (त्वाम्) आपको (वर्धन्ति) बढ़ाते हैं, अर्थात् जन-जन में प्रसारित करते हैं। (त्वे) आपमें विद्यमान (वसु) ऐश्वर्य (सुषणनानि) सुप्राप्य (सन्तु) होवें। (यूयम्) आप (स्वस्तिभिः) योग-क्षेमों द्वारा (सदा) हमेशा (नः) हमारी (पात) रक्षा करते रहो ॥३॥
भावार्थःजो कुछ भी ऐश्वर्य हमारे हाथ में है, वह सब परमात्मा द्वारा प्रदत्त ही है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
म꣣हा꣢꣫ꣳ इन्द्रो꣣ य꣡ ओज꣢꣯सा प꣣र्ज꣡न्यो꣢ वृष्टि꣣मा꣡ꣳ इ꣢व । स्तो꣡मै꣢र्व꣣त्स꣡स्य꣢ वावृधे ॥१३०७॥
पदार्थः(यः इन्द्रः) जो परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर (वृष्टिमान् पर्यन्यः इव) वृष्टिजल से परिपूर्ण मेघ के समान (ओजसा) बल से (महान्) महान् है, वह (वत्सस्य) अपने पुत्र मानव की (स्तोमैः) प्रशस्तियों से (वावृधे) बढ़ता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे पुत्र की प्रशस्तियों से पिता प्रशस्त होता है, वैसे ही पहले से ही बादल के समान महान् परमेश्वर भी मानव की प्रशस्तियों से और अधिक महान् हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क꣢ण्वा꣣ इ꣢न्द्रं꣣ य꣡दक्र꣢꣯त꣣ स्तो꣡मै꣢र्य꣣ज्ञ꣢स्य꣣ सा꣡ध꣢नम् । जा꣣मि꣡ ब्रु꣢व꣣त आ꣡यु꣢धा ॥१३०८॥
पदार्थः(यत्) जब (कण्वाः) मेधावी स्तोता लोग (इन्द्रम्) विघ्ननाशक, परमैश्वर्यवान् परमात्मा को (स्तोमैः) स्तोत्रों से (यज्ञस्य) अपने १०० वर्ष चलनेवाले जीवन-यज्ञ का (साधनम्) साधक (अक्रत) बना लेते हैं, तब वे (आयुधा) रक्षा के साधनभूत शस्त्रास्त्रों को (जामि) अनावश्यक (ब्रुवते) कहने लगते हैं अर्थात् जीवन-यज्ञ को तो परमात्मा ने ही सिद्ध कर दिया, इन संगृहीत किये हुए शस्त्रास्त्रों से क्या लाभ? इस प्रकार हथियारों को व्यर्थ बताने लगते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के प्रति आत्म-समर्पण करके उसका रक्षण सबको प्राप्त करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
प्र꣣जा꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ पि꣡प्र꣢तः꣣ प्र꣡ यद्भर꣢꣯न्त꣣ व꣡ह्न꣢यः । वि꣡प्रा꣢ ऋ꣣त꣢स्य꣣ वा꣡ह꣢सा ॥१३०९॥
पदार्थः(यत्) जब (वह्नयः) ब्रह्मयज्ञ को वहन करनेवाले उपासक लोग (पिप्रतः) पालनकर्ता, (ऋतस्य) सत्य के (प्रजाम्) उत्पादक परमेश्वर को (प्रभरन्त) अन्तरात्मा में धारण कर लेते हैं, तब वे (विप्राः) विद्वान् जन (ऋतस्य) सत्य के (वाहसा) प्रचारक हो जाते हैं ॥३॥
भावार्थःसत्यज्ञान और सत्यकर्म के आदर्शरूप परमात्मा का अनुभव करके और अपने जीवन में सत्य को लाकर ही सत्य का प्रचार आसानी से हो सकता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ दशम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानस्य꣣ जि꣡घ्न꣢तो꣣ ह꣡रे꣢श्च꣣न्द्रा꣡ अ꣢सृक्षत । जी꣣रा꣡ अ꣢जि꣣र꣡शो꣢चिषः ॥१३१०॥
पदार्थः(पवमानस्य) अन्तरात्मा को पवित्र करनेवाले, (जिघ्नतः) दोषों को विनष्ट करनेवाले, (हरेः) चित्ताकर्षक परमात्मा की (चन्द्राः) आनन्ददायिनी (अजिरशोचिषः) अक्षय प्रकाशवाली (जीराः) शीघ्रगामिनी आनन्द-धाराएँ (असृक्षत) छूट रही हैं ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की आनन्द-धाराओं में डुबकी लगाकर स्तोता जन निर्मल अन्तःकरणवाले होकर कृतकृत्य हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣣व꣢मानो र꣣थी꣡त꣢मः शु꣣भ्रे꣡भिः꣢ शु꣣भ्र꣡श꣢स्तमः । ह꣡रि꣢श्चन्द्रो म꣣रु꣡द्ग꣢णः ॥१३११॥
पदार्थः(पवमानः) पवित्रकर्ता जगत्स्रष्टा परमेश्वर (रथीतमः) रथियों में श्रेष्ठ, (शुभ्रेभिः) शुभ्र गुण-कर्मों से (शुभ्रशस्तमः) अतिशय निर्मल यशवाला, (हरिश्चन्द्रः) मनोहर आह्लाद देनेवाला और (मरुद्गणः) प्राण-रूप या पवन-रूप गणोंवाला है ॥२॥
भावार्थःसूर्य, चाँद, पवन, बिजली आदि और मानव-शरीर जिसके बनाये हुए रथ हैं, ऐसे अत्यन्त यशस्वी, परमानन्ददायक, प्राण आदि को चलानेवाले परमेश्वर का ज्ञान सबको पाना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मान꣣꣬ व्य꣢꣯श्नुहि र꣣श्मि꣡भि꣢र्वाज꣣सा꣡त꣢मः । द꣡ध꣢त्स्तो꣣त्रे꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म् ॥१३१२
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रकर्ता सोम परमात्मन् ! (वाजसातमः) अत्यधिक बल को देनेवाले आप (स्तोत्रे) मुझ उपासक को (सुवीर्यम्) सुवीर्य से युक्त गुण-समूह (दधत्) प्रदान करते हुए (रश्मिभिः) तेज की किरणों के साथ (व्यश्नुहि) प्राप्त होओ ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर का स्तोता उससे तेज, बल, वीर्य, सत्य, अहिंसा, न्याय, दया, उदारता आदि प्राप्त करके अतिशय कीर्तिशाली हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
प꣢री꣣तो꣡ षि꣢ञ्चता सु꣣त꣢꣫ꣳ सोमो꣣ य꣡ उ꣢त्त꣣म꣢ꣳ ह꣣विः꣢ । द꣣धन्वा꣡ꣳ यो नर्यो꣢꣯ अ꣣प्स्वा꣢३꣱न्त꣢꣫रा सु꣣षा꣢व꣣ सो꣢म꣣म꣡द्रि꣢भिः ॥१३१३
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (इतः) इस रसमय परमात्मा-रूप सोम में से (सुतम्) निकले हुए आनन्द-रस को (परि सिञ्चत) चारों ओर बरसाओ, (यः सोमः) जो रस का भण्डार परमात्मा (उत्तमं हविः) सबसे अधिक उत्कृष्ट ग्राह्य वस्तु है, (नर्यः) मनुष्यों का हित करनेवाला (यः) जो सोम परमात्मा (दधन्वान्) उपासकों को सहारा देनेवाला होता है और जिस (सोमम्) रसनिधि परमात्मा को, उपासक (अद्रिभिः) ध्यानरूप सिलबट्टों से (अप्सु अन्तः) प्राणों के अन्दर (आ सुषाव) अभिषुत करता है ॥१॥
भावार्थःउपासकों को चाहिए कि परब्रह्म के पास से परमानन्द प्राप्त करके उसे दूसरों के लिए भी बरसाएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
नू꣣नं꣡ पु꣢ना꣣नो꣡ऽवि꣢भिः꣣ प꣡रि꣢ स्र꣣वा꣡द꣢ब्धः सुर꣣भि꣡न्त꣢रः । सु꣣ते꣡ चि꣢त्वा꣣प्सु꣡ म꣢दामो꣣ अ꣡न्ध꣢सा श्री꣣ण꣢न्तो꣣ गो꣢भि꣣रु꣡त्त꣢रम् ॥१३१४॥
पदार्थःहे सोम ! हे रसनिधि परमात्मन् ! (नूनम्) निश्चय ही (अविभिः) अपनी रक्षाओं से (पुनानः) हमें पवित्र करते हुए, (अदब्धः) किसी से न हराये जा सकनेवाले, (सुरभिन्तरः) अतिशय सौरभमय आप (परि स्रव) आनन्द-रस को प्रवाहित करो। (अन्धसा) आनन्द-रस के साथ (अप्सु) हमारे कर्मों में (सुते चित्) आपके परिस्रुत होने पर (उत्तरम्) अत्यन्त उत्कृष्ट (त्वा) आपको (गोभिः) आत्मा, मन, एवं बुद्धि से (श्रीणन्तः) पकाते हुए अर्थात् ध्याते हुए, हम (मदामः) मुदित होते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा में ध्यान से रक्षा, पवित्रता, सद्गुणों की सुगन्ध और परमानन्द प्राप्त होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प꣡रि꣢ स्वा꣣न꣡श्चक्ष꣢꣯से देव꣣मा꣡द꣢नः꣣ क्र꣢तु꣣रि꣡न्दु꣢र्विचक्ष꣣णः꣢ ॥१३१५
पदार्थः(देवमादनः) विद्वानों को आनन्दित करनेवाला, (क्रतुः) कर्ममय अर्थात् जगद्धारण के कर्मों का कर्ता, (विचक्षणः) विशेषरूप से सबका द्रष्टा, (इन्दुः) तेजस्वी और रस से भिगोनेवाला परमेश्वर (चक्षसे) दर्शनार्थ, अर्थात् साक्षात्कार के लिए (परि स्वानः) हमसे ध्यान किया जाता है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा का साक्षात्कार करके हम भी उसके समान दूसरों को आनन्दित करनेवाले, कर्मयोगी, विवेकदृष्टि से सम्पन्न, तेजस्वी और परोपकारी बनें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣡सा꣢वि꣣ सो꣡मो꣢ अरु꣣षो꣢꣫ वृषा꣣ ह꣢री꣣ रा꣡जे꣢व द꣣स्मो꣢ अ꣣भि꣡ गा अ꣢꣯चिक्रदत् । पु꣢नानो꣢꣫ वार꣣म꣡त्ये꣢ष्य꣣व्य꣡य꣢ꣳ श्ये꣣नो꣡ न योनिं꣢꣯ घृ꣣त꣡व꣢न्त꣣मा꣡स꣢दत् ॥१३१६॥
पदार्थःप्रथम—सोमौषधि के पक्ष में। (अरुषः) चमकीले, (वृषा) रसवर्षक, (हरिः) हरे रंग के (सोमः) ओषधिराज सोम में से (असावि) मैंने रस निकाला है। (दस्मः) दर्शनीय यह, मानो (गाः अभि) गाय के दूध में मिलने के लिए (अचिक्रदत्) बोल रहा है, (राजा इव) जैसे कोई राजा (दस्मः) शत्रुओं का विनाशक होता हुआ (गाः अभि) शत्रुओं की भूमियों पर आक्रमण करके (अचिक्रदत्) जयघोष करता है। हे ओषधिराज सोम ! (पुनानः) शुद्ध किये जाते हुए तुम (अव्ययं वारम् अत्येषि) भेड़ के बालों से बनी हुई दशापवित्र नामक छन्नी में से छनकर पार होते हो। देखो, यह ओषधिराज सोम (घृतवन्तम्) घृतयुक्त (योनिम्) यज्ञगृह में (आसदत्) आया है, (श्येनः न) जैसे वायु (घृतवन्तम्) जल-कणों से युक्त (योनिम्) अन्तरिक्ष में (आसदत्) आता है ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (सोम) प्रेरक जीवात्मा (असावि) ऐश्वर्यवान् किया गया है। (अरुषः) ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशमान, (वृषा) ज्ञानवर्षक, (हरिः) देहरूप रथ को चलानेवाला, (दस्मः) शत्रुओं का विनाशक यह आत्मा (गाः अभि) इन्द्रियों को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) कर्तव्य-अकर्तव्य का उपदेश करे, (राजा इव) जैसे कोई राजा (गाः अभि) प्रजाओं को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) राजनियमों की घोषणा करता है। हे जीवात्मन् ! तू (पुनानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (वारम् अति) रुकावट डालनेवाले विघ्नों को पार करके (अव्ययम्) अविनश्वर परमात्मा को (एषि) प्राप्त कर। (श्येनः न योनिम्) बाज पक्षी जैसे उड़ान भरने के लिए अन्तरिक्ष को प्राप्त करता है, वैसे ही यह आत्मा (घृतवन्तम्) तेजस्वी (योनिम्) जगत् के कारण परमात्मा को (आसदत्) प्राप्त करे ॥१॥ यहाँ श्लेष और श्लिष्टोपमा अलङ्कार हैं। प्रथम व्याख्या में ‘अभि गा अचिक्रदत्’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥१॥
भावार्थःजैसे पक्षी उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँच जाते हैं, वैसे ही मनुष्य उन्नति करके परमात्मा को प्राप्त करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
प꣣र्ज꣡न्यः꣢ पि꣣ता꣡ म꣢हि꣣ष꣡स्य꣢ प꣣र्णि꣢नो꣣ ना꣡भा꣢ पृथि꣣व्या꣢ गि꣣रि꣢षु꣣ क्ष꣡यं꣢ दधे । स्व꣡सा꣢र꣣ आ꣡पो꣢ अ꣣भि꣢꣫ गा उ꣣दा꣡स꣢र꣣न्त्सं꣡ ग्राव꣢꣯भिर्वसते वी꣣ते꣡ अ꣢ध्व꣣रे꣢ ॥१३१७॥
पदार्थःप्रथम—सोम ओषधि के पक्ष में। (महिषस्य) महान्, (पर्णिनः) पत्तों या डंठलोंवाले इस ओषधिराज सोम का (पर्जन्यः) बादल (पिता) पिता है। यह सोम (पृथिव्याः नाभा) भूमि के केन्द्रस्थलों में और (गिरिषु) पर्वतों पर (क्षयम्) निवास को (दधे) धारण करता है। बादल से (स्वसारः आपः) बहिनों के समान साथ-साथ चलनेवाली जल-धाराएँ (गाः अभि) भूमि-प्रदेशों की ओर (उद् आ सरन्) ऊपर से आती हैं। इस प्रकार (अध्वरे) वर्षारूप यज्ञ के (वीते) प्रवृत्त होने पर वे जल (गाः) भूमियों को (ग्रावभिः) प्राणों से (सं वसत) आच्छादित कर देते हैं ॥ अथर्ववेद में भी कहा गया है कि वर्षा के साथ भूमि पर प्राण बरसता है— प्रा॒णो अ॒भ्यव॑र्षीद् व॒र्षेण॑ पृथि॒वीं म॒हीम् (अथ० ११।४।५) ॥२॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (महिषस्य) महत्त्वशाली, (पर्णिनः) ज्ञान-कर्म रूप पङ्खोंवाले इस सोम नामक जीवात्मा का (पिता) देह में जन्मदाता और पालनकर्ता (पर्जन्यः) मेघवत् सुखवर्षक परमात्मा है। यह आत्मा (पृथिव्याः) पार्थिव शरीर के (नाभा) केन्द्रभूत हृदय में और (गिरिषु) पर्वत के समान उन्नत मस्तिष्क-प्रकोष्ठों में (क्षयं) निवास को (दधे) धारण करता है। (स्वसारः) शरीर में रखी हुई (आपः) ज्ञानवाहक तन्तु-नाड़ियाँ (गाः अभि) ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की ओर (उदासरन्) ऊपर से आती हैं और (अध्वरे) ज्ञान-यज्ञ तथा कर्म-यज्ञ के (वीते) प्रवृत्त होने पर (ग्रावभिः) ग्राह्य विषयों के साथ (संवसते) मिलती हैं, जिससे मनसहित ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान का ग्रहण और मनसहित कर्मेन्द्रियों से कर्म संपन्न होता है ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःवर्षा से जो भूमि पर सोम आदि ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं और प्राण बरसता है तथा शरीर में जो जीवात्मा मनसहित ज्ञानेन्द्रियों वा कर्मेन्द्रियों से ज्ञान ग्रहण करता वा कर्म करता है, वह सब जगदीश्वर के ही कर्तृत्व को प्रकट करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
क꣣वि꣡र्वे꣢ध꣣स्या꣡ पर्ये꣢꣯षि꣣ मा꣡हि꣢न꣣म꣢त्यो꣣ न꣢ मृ꣣ष्टो꣢ अ꣣भि꣡ वाज꣢꣯मर्षसि । अ꣣पसे꣡ध꣢न्दुरि꣣ता꣡ सो꣢म नो मृड घृ꣣ता꣡ वसा꣢꣯नः꣣ प꣡रि꣢ यासि नि꣣र्णि꣡ज꣢म् ॥१३१८॥
पदार्थःहे सोम ! हे शान्तिप्रिय जीवात्मन् ! (कविः) मेधावी तू (वेधस्या) महान् कार्य को करने की इच्छा से (माहिनम्) महान् परमात्मा की (पर्येषि) उपासना कर। (मृष्टः) ब्रुश से रगड़कर साफ़ किये गये (अत्यः न) घोड़े के समान (मृष्टः) यम, नियम आदि से शोधित तू, विजयप्राप्ति के लिए (वाजम् अभि) देवासुरसङ्ग्राम में (अर्षसि) जा। हे (सोम) जीवात्मन् ! (दुरिता) दुर्गुण, दुर्व्यसन आदियों को (अपसेधन्) दूर करता हुआ तू (नः) हमें (मृड) सुखी करऔर (घृता) तेजों को (वसानः) धारण करता हुआ तू (निर्णिजम्) शुद्ध रूप को (परियासि) प्राप्त कर ॥ सोम ओषधि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए। सोम ओषधि का रस (माहिनम्) महान् द्रोणकलश में जाता है, शुद्ध किया जाकर (वाजम्) यज्ञ में ले जाया जाता है, पान करने पर (दुरितानि) दुर्विचारों को दूर करके सद्विचारों को उत्तेजित करता है और (घृता) जलों के साथ मिलता है ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा की उपासना, देवासुरसङ्ग्राम में विजय, दुरितों के ध्वंस, पुण्यकर्मों की समृद्धि और तेज को धारण करके योग-क्षेम को सिद्ध करें ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा के ध्यान से ब्रह्मानन्द की प्राप्ति का, जीवात्मा के उद्बोधन का और प्रसङ्गतः सोम ओषधि के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ दशम अध्याय में नवम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
श्रा꣡य꣢न्त इव꣣ सू꣢र्यं꣣ वि꣡श्वेदिन्द्र꣢꣯स्य भक्षत । व꣡सू꣢नि जा꣣तो꣡ जनि꣢꣯मा꣣न्यो꣡ज꣢सा꣣ प्र꣡ति꣢ भा꣣गं꣡ न दी꣢꣯धिमः ॥१३१९॥
पदार्थः(श्रायन्तः इव) भोजन आदि को पकाते हुए मनुष्य जैसे (सूर्यम्) सूर्य का उपयोग करते हैं, अर्थात् सौर चूल्हा बनाकर उस पर भोजन पकाते हैं, वैसे ही तुम (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यशाली परमात्मा के, अर्थात् परमात्मा से उत्पन्न किये हुए (विश्वा इत् वसूनि) जल, अग्नि, बिजली, वायु, ओषधि आदि सभी धनों को (भक्षत) यथायोग्य सेवन करो। (जातः) वह प्रसिद्ध परमात्मा (ओजसा) अपने प्रताप से (जनिमानि) सभी उत्पन्न वस्तुओं को धारण करताहै। हम उसका (प्रति दीधिमः) ध्यान करते हैं, (भागं न) जैसे कोई अपने प्राप्तव्य दायभाग का ध्यान करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे सूर्य हमारे लिए प्राणों का स्रोत है, वैसे ही परमेश्वर से रचे हुए सभी पदार्थ अत्यधिक हितकर हैं। उनका यथायोग्य उपयोग सबको करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣡ल꣢र्षिरातिं वसु꣣दा꣡मुप꣢꣯ स्तुहि भ꣣द्रा꣡ इन्द्र꣢꣯स्य रा꣣त꣡यः꣢ । यो꣡ अ꣢स्य꣣ का꣡मं꣢ विध꣣तो꣡ न रोष꣢꣯ति꣣ म꣡नो꣢ दा꣣ना꣡य꣢ चो꣣द꣡य꣢न् ॥१३२०॥
पदार्थःहे मानव ! तू (अलर्षिरातिम्) शोभास्पद दानवाले, (वसुदाम्) धन के दाता इन्द्रनामक परमैश्वर्यवान् परमात्मा की (उप स्तुहि) समीपता से स्तुति कर। (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यशाली परमात्मा की (रातयः) दान-परम्पराएँ (भद्राः) कल्याण करनेवाली होती हैं। (मनः) अपने मन को (दानाय) देने के लिए (चोदयन्) प्रेरित करता हुआ (सः) वह इन्द्र परमात्मा (विधतः) पूजा करनेवाले (अस्य) इस उपासक के (कामम्) मनोरथ को (न रोषति) असफल नहीं करता अर्थात् उसका अभीष्ट उसे देता ही है ॥२॥
भावार्थःजो जिसके हित के लिए होता है, वह उसे जगदीश्वर देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡त꣢ इन्द्र꣣ भ꣡या꣢महे꣣ त꣡तो꣢ नो꣣ अ꣡भ꣢यं कृधि । म꣡घ꣢वञ्छ꣣ग्धि꣢꣫ तव꣣ त꣡न्न꣢ ऊ꣣त꣢ये꣣ वि꣢꣫ द्विषो꣣ वि꣡ मृधो꣢꣯ जहि ॥१३२१॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर वा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्यवर ! हम (यतः) जिस अज्ञान, पाप, दुर्व्यसन, चोर, बाघ आदि से (भयामहे) डरते हैं, (ततः) उससे (नः) हमें (अभयम्) निर्भयता (कृधि) प्रदान करो। हे (मघवन्) निर्भयतारूप धन के धनी ! (शग्धि) हमें शक्ति दो। (तव) आपका (तत्) वह अभयदान (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिए होवे। आप (द्विषः) द्वेषवृत्तियों को (वि) विनष्ट कर दो, (मृधः) हिंसावृत्तियों को वा काम, क्रोध आदियों को (वि जहि) विनष्ट कर दो ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर अपने उपासकों को निर्भय करता है, वैसे ही आचार्य को भी चाहिए कि वह विद्या पढ़ाने के साथ-साथ निर्भयता आदि गुण भी विद्यार्थियों के अन्दर उत्पन्न करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
त्व꣡ꣳ हि रा꣢꣯धसस्पते꣣ रा꣡ध꣢सो म꣣हः꣢꣫ क्षय꣣स्या꣡सि꣢ विध꣣र्त्ता꣢ । तं꣡ त्वा꣢ व꣣यं꣡ म꣢घवन्निन्द्र गिर्वणः सु꣣ता꣡व꣢न्तो हवामहे ॥१३२२॥
पदार्थःहे (राधसः पते) सकल ऋद्धि-सिद्धियों के अधीश्वर जगदीश वा आचार्यवर ! (त्वं हि) आप (महतः) महान् (क्षयस्य) निवासक, (राधसः) विद्या, तप, तेजस्विता आदि रूप धन के (विधर्ता) विशेष रूप से धारण करनेवाले (असि) हो। हे (मघवन्) विद्या आदि के दानी, (गिर्वणः) वाचस्पति (इन्द्र) अविद्या आदि के विदारक जगदीश्वर वा आचार्य ! (सुतावन्तः) श्रद्धारस का उपहार लिये हुए (वयम्) हम उपासक वा विद्यार्थी (त्वा) आपको (हवामहे) पुकार रहे हैं ॥२॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर सब गुणों का अधिपति है, वैसे ही आचार्य वही हो सकता है जो विद्वान्, वाणी पर अधिकार रखनेवाला, तपस्वी, जितेन्द्रिय और शिक्षणकला में कुशल हो ॥२॥ इस खण्ड में जगदीश्वर और आचार्य के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ दशम अध्याय में दशम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्व꣡ꣳ सो꣢मासि धार꣣यु꣢र्म꣣न्द्र꣡ ओजि꣢꣯ष्ठो अध्व꣣रे꣢ । प꣡व꣢स्व मꣳह꣣य꣡द्र꣢यिः ॥१३२३॥
पदार्थःहे (सोम) जगत् के रचयिता रसनिधि परमात्मन् ! (त्वम्) आप (धारयुः) आनन्द-धाराओं को देने के इच्छुक, (मन्द्रः) तृप्त करनेवाले और (ओजिष्ठः) सबसे अधिक ओजस्वी (असि) हो। (मंहयद्रयिः) जिनका धन वृद्धि प्रदान करनेवाला वा कीर्ति देनेवाला है, ऐसे आप (अध्वरे) जीवन-यज्ञ में (पवस्व) हमें पवित्र करते हो ॥१॥
भावार्थःसब मनुष्य परमात्मा की आराधना करके पुण्य, धन, आनन्द और सन्तुष्टि को अपने जीवन में प्राप्त करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्व꣢ꣳ सु꣣तो꣢ म꣣दि꣡न्त꣢मो दध꣣न्वा꣡न्म꣢त्स꣣रि꣡न्त꣢मः । इ꣡न्दुः꣢ सत्रा꣣जि꣡दस्तृ꣢꣯तः ॥१३२४॥
पदार्थःहे परमात्मन् ! (इन्दुः) तेजस्वी (त्वम्) आप (सुतः) आराधना किये हुए (मदिन्तमः) अतिशय प्रसन्न, (दधन्वान्) धारणकर्ता, (मत्सरिन्तमः) अत्यन्त आनन्द देनेवाले, (सत्राजित्) एक साथ उपासक के सब काम, क्रोध आदि रिपुओं को जीत लेनेवाले और (अस्तृतः) स्वयं सदा अहिंसित होते हो ॥२॥
भावार्थःसच्चे हृदय से की गयी परमेश्वर की उपासना बहुत से फलों को देनेवाली होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त्व꣡ꣳ सु꣢ष्वा꣣णो꣡ अद्रि꣢꣯भिर꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । द्यु꣣म꣢न्त꣣ꣳ शु꣢ष्म꣣मा꣡ भ꣢र ॥१३२५॥
पदार्थःहे पवित्र करनेवाले, रस के भण्डार परमेश्वर ! (अद्रिभिः) प्रणव-जप रूप सिलबट्टों से (सुष्वाणः) अभिषुत किये जाते हुए (त्वम्) आप (कनिक्रदत्) पुनः-पुनः उपदेश करते हुए (अभ्यर्ष) हमें प्राप्त होवो और (द्युमन्तम्) तेज से युक्त (शुष्मम्) आत्म-बल (आ भर) प्रदान करो ॥३॥
भावार्थःउपासक यदि परमात्मा के पास से कर्तव्य-अकर्तव्य का उपदेश, तेजस्विता और आत्मबल नहीं प्राप्त कर पाता तो उसकी उपासना में कोई त्रुटि है, ऐसा समझना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
प꣡व꣢स्व दे꣣व꣡वी꣢तय꣣ इ꣢न्दो꣣ धा꣡रा꣢भि꣣रो꣡ज꣢सा । आ꣢ क꣣ल꣢शं꣣ म꣡धु꣢मान्त्सोम नः सदः ॥१३२६॥
पदार्थःहे (इन्दो) रस से भिगोनेवाले परमेश्वर ! (देववीतये) दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए (धाराभिः) आनन्द की धाराओं के साथ (ओजसा) वेगपूर्वक (पवस्व) हमारे अन्तःकरण में बहो। हे (सोम) रस के भण्डार ! (मधुमान्) मधुर आप (नः) हमारे (कलशम्) जीवात्मारूप कलश में (आ सदः) आकर स्थित होवो ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के ध्यान में मग्न योगी लोग परमात्मा के पास से अपनी मनोभूमि में झरते हुए आनन्द-रस के झरने का साक्षात् अनुभव करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
त꣡व꣢ द्र꣣प्सा꣡ उ꣢द꣣प्रु꣢त꣣ इ꣢न्द्रं꣣ म꣡दा꣢य वावृधुः । त्वां꣢ दे꣣वा꣡सो꣢ अ꣣मृ꣡ता꣢य꣣ कं꣡ प꣢पुः ॥१३२७॥
पदार्थःहे सोम ! हे रसागार परमेश्वर ! (तव) आपके (द्रप्साः) वेग से बहनेवाले आनन्द-रस (उदप्रुतः) अन्तःकरण में तरङ्गें उठानेवाले होते हैं। वे (इन्द्रम्) जीवात्मा को (मदाय) तृप्तिलाभ के लिए (वावृधुः) बढ़ाते हैं। (देवासः) विद्वान् लोग (कम्) सुन्दर, सर्वोपरि विराजमान, सुखस्वरूप (त्वाम्) आपको (अमृताय) अमर पद की प्राप्ति के लिए (पपुः) पान करते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वररूप हिमालय से निकली हुई आनन्द-रस की नदी में ही स्नान करके योगी लोग मोक्ष-पद के अधिकारी होते हैं, भौतिक गङ्गा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों में स्नान करके नहीं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
आ꣡ नः꣢ सुतास इन्दवः पुना꣣ना꣡ धा꣢वता र꣣यि꣢म् । वृ꣣ष्टि꣡द्या꣢वो रीत्यापः स्व꣣र्वि꣡दः꣢ ॥१३२८॥
पदार्थःहे (सुतासः) अभिषुत किये हुए (इन्दवः) ब्रह्मानन्द-रसो ! (पुनानाः) पवित्र करते हुए तुम (नः) हमें (रयिम्) सद्गुणों का ऐश्वर्य (आ धावत) प्राप्त कराओ। हे (रीत्यापः) वेग से प्रवाहित होनेवाले ब्रह्मानन्दो ! तुम (वृष्टिद्यावः) मस्तिष्क से विज्ञान की वृष्टि करनेवाले और (स्वर्विदः) दिव्य प्रकाश प्राप्त करानेवाले हो ॥३॥
भावार्थःब्रह्मानन्द द्वारा अन्तरात्मा के प्रकाशित और पवित्र हो जाने पर मस्तिष्क-भूमि भी उपजाऊ होकर विविध ज्ञान-विज्ञान आदि को उत्पन्न करती हुई योगी को उपकृत करती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प꣢रि꣣ त्य꣡ꣳ ह꣢र्य꣣त꣡ꣳ हरिं꣢꣯ ब꣣भ्रुं꣡ पु꣢नन्ति꣣ वा꣡रे꣢ण । यो꣢ दे꣣वा꣢꣫न्विश्वा꣣ꣳ इ꣢꣫त्परि꣣ म꣡दे꣢न स꣣ह꣡ गच्छ꣢꣯ति ॥१३२९॥
पदार्थः(हर्यतम्) प्रिय, (हरिम्) विद्या ग्रहण करने के शीलवाले, (बभ्रुम्) अज्ञान आदि दोषों से धूसर आत्मावाले (त्यम्) उस विद्यार्थी को, गुरुजन (वारेण) दोष-निवारक यम, नियम आदि से (परि पुनन्ति) परिशुद्ध करते हैं, (यः) जो विद्यार्थी (मदेन सह) उत्साह के साथ (विश्वान् इत् देवान्) सभी विद्वान् गुरुजनों के पास (परिगच्छति) पहुँचता है ॥१॥
भावार्थःगुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे प्यारे विद्यार्थियों का दोषों को निवारण करके उन्हें विद्वान् और प्रशस्त चरित्रवाला बनाएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
द्वि꣢꣫र्यं पञ्च꣣ स्व꣡य꣢शस꣣ꣳ स꣡खा꣢यो꣣ अ꣡द्रि꣢सꣳहतम् । प्रि꣣य꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ का꣡म्यं꣢ प्रस्ना꣣प꣡य꣢न्त ऊ꣣र्म꣡यः꣢ ॥१३३०॥
पदार्थः(स्वयशसम्) अपनी कीर्ति से युक्त, (अद्रिसंहतम्) पर्वत के समान दृढ अङ्गोंवाले, (इन्द्रस्य प्रियम्) कुलपति आचार्य के प्रिय, (काम्यम्) अन्यों से भी चाहे जानेवाले (यम्) जिस विद्यार्थी को (द्विः पञ्च) दो पंजे अर्थात् दस (सखायः) सहयोगी विद्वान् गुरु लोग (ऊर्मयः) जल की तरङ्गों के समान होकर (प्र स्नापयन्ते) ज्ञान-नदी में स्नान कराते हैं, वह प्रशस्त होता है ॥२॥ यहाँ ‘ऊर्मयः’ में लुप्तोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःचार वेद और छह वेदाङ्ग ये दस विद्याएँ हैं। प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक गुरु हो तो दस गुरु हो जाते हैं। वेदाङ्गों में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये छह विद्याएँ ग्रहण करनी चाहिएँ, उनके प्रतिपादक वर्तमान ग्रन्थ नहीं, क्योंकि मनुष्यप्रणीत उन उत्तरवर्ती ग्रन्थों का सङ्केत वेदों में नहीं हो सकता ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ सोम꣣ पा꣡त꣢वे वृत्र꣣घ्ने꣡ परि꣢꣯ षिच्यसे । न꣡रे꣢ च꣣ द꣡क्षि꣢णावते वी꣣रा꣡य꣢ सदना꣣स꣡दे꣢ ॥१३३१॥
पदार्थःहे (सोम) ज्ञानरस ! तू (वृत्रघ्ने) व्रतपालन द्वारा दोषों को विनष्ट करनेवाले, (नरे) पुरुषार्थी, (दक्षिणावते) गुरुदक्षिणा देनेवाले, (वीराय) शूरवीर, (सदनासदे) गुरुकुलरूप सदन में निवास करनेवाले (इन्द्राय) बिजली के समान तीव्र बुद्धिवाले विद्यार्थी के (पातवे) पान के लिए (परिषिच्यसे) प्रवाहित किया जा रहा है ॥३॥
भावार्थःविद्यार्थियों को चाहिए कि वे स्वेच्छा से व्रतपालक, तपस्वी, शूर, आश्रम-पद्धति से गुरुकुल में ही निवास करनेवाले और समावर्तन के समय गुरुदक्षिणा देनेवाले हों ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हे꣢꣫ दक्षा꣣या꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ वा꣣जी꣡ धना꣢꣯य ॥१३३२॥
पदार्थःहे (सोम) विद्यारस के भण्डार आचार्य ! आप शिष्य के (महे दक्षाय) महान् उत्साह के लिए (पवस्व) ज्ञानधारा को प्रवाहित करो, जिससे वह आपका शिष्य (अश्वः न) सूर्य के समान (निक्तः) शुद्ध और (वाजी) विद्यावान्, वेगवान् तथा कर्मनिष्ठ होकर (धनाय) धन उपार्जन करने के योग्य हो सके ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःशिक्षा का एक यह भी प्रयोजन है कि शिष्य विद्वान्, बलवान् वर्चस्वी और शुद्ध हृदयवाला होकर धन कमाने में समर्थ हो सके ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प्र꣡ ते꣢ सो꣣ता꣢रो꣣ र꣢सं꣣ म꣡दा꣢य पु꣣न꣢न्ति꣣ सो꣡मं꣢ म꣣हे꣢ द्यु꣣म्ना꣡य꣢ ॥१३३३॥
पदार्थःहे विद्यार्थी ! (सोतारः) द्वितीय जन्म देनेवाले गुरु लोग (सोमं रसम्) ज्ञान-रस को (ते) तेरे (मदाय) आनन्द के लिए और (महे द्युम्नाय) महान् यश के लिए (प्र पुनन्ति) भली-भाँति पवित्र कर रहे हैं ॥२॥
भावार्थःपरोपकारक, पवित्र, निर्दोष विद्या से ही मनुष्य आनन्दवान् और यशस्वी होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
शि꣡शुं꣢ जज्ञा꣣न꣡ꣳ हरिं꣢꣯ मृजन्ति प꣣वि꣢त्रे꣣ सो꣡मं꣢ दे꣣वे꣢भ्य꣣ इ꣡न्दु꣢म् ॥१३३४॥
पदार्थः(शिशुं जज्ञानम्) नवस्नातक के रूप में आचार्य के गर्भ से द्वितीय जन्म प्राप्त करते हुए, (हरिम्) जिसके दोष हर लिये गये हैं, ऐसे (इन्दुम्) तेजस्वी (सोमम्) समावर्तन संस्कार के लिए स्नान किये हुए, विद्या पढ़े हुए ब्रह्मचारी को (पवित्रे) कुशों के आसन पर बैठाकर (देवेभ्यः) माता, पिता आदि को सौंपने के लिए (मृजन्ति) अलङ्कार धारण कराते हैं ॥ समावर्तन संस्कार के समय ब्रह्मचारी के अलङ्कार-धारण के विषय में पारस्करगृह्यसूत्र २।६।२४-२६ और महर्षिदयानन्दप्रणीत संस्कारविधि ग्रन्थ देखना चाहिए। उनके अनुसार उस समय ब्रह्मचारी नये वस्त्र, उपवस्त्र, फूलमाला, आभूषण आदि धारण करता है ॥३॥
भावार्थःव्रताचारी, विद्यालङ्कार, वेदालङ्कार, आयुर्वेदालङ्कार आदि बने हुए ब्रह्मचारी को आचार्य फूलमाला, आभूषण आदि से अलङ्कृत करके समावर्तन संस्कार करके द्विज बनाकर माता-पिता को लौटा देवे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣢पो꣣ षु꣢ जा꣣त꣢म꣣प्तु꣢रं꣣ गो꣡भि꣢र्भ꣣ङ्गं꣡ परि꣢꣯ष्कृतम् । इ꣡न्दुं꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢यासिषुः ॥१३३५॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (सुजातम्) सुप्रसिद्ध, (अप्तुरम्) व्यापक चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र आदि लोकों को वेग से चलानेवाले, (गोभिः) वेद-वाणियों से (भङ्गम्) काम, क्रोध आदि रिपुओं के भञ्जक, (परिष्कृतम्) गुणों से अलङ्कृत, (इन्दुम्) तेज से दीप्त वा आनन्द-रसों से भिगोनेवाले परमात्मा को (देवाः) विद्वान् लोग वा आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदि बल की प्राप्ति के लिए (उप उ अयासिषुः) प्राप्त करते हैं ॥ द्वितीय—चन्द्रमा के पक्ष में (सुजातम्) पृथिवी के सुपुत्र, (अप्तुरम्) अन्तरिक्ष में पृथिवी और सूर्य के चारों ओर दौड़नेवाले, (गोभिः भङ्गम्) कहीं भूमियों में दरार पड़े हुए और कहीं (परिष्कृतम्) परिष्कृत अर्थात् समतल (इन्दुम्) चन्द्रमा को (देवाः) सूर्य-किरणें (अयासिषुः) प्रकाशित करने के लिए प्राप्त करती हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे सब जड़ पदार्थ और चेतन प्राणी जगदीश्वर के आश्रय से रहते हैं, वैसे ही हमारे सौर लोक के मङ्गल, बुध, पृथिवी, चन्द्रमा आदि ग्रह-उपग्रह सूर्य के आश्रय से रहते हैं और सूर्य भी जगदीश्वर के अधीन है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त꣡मिद्व꣢꣯र्धन्तु नो꣣ गि꣡रो꣢ व꣣त्स꣢ꣳ स꣣ꣳशि꣡श्व꣢रीरिव । य꣡ इन्द्र꣢꣯स्य हृद꣣ꣳस꣡निः꣢ ॥१३३६॥
पदार्थः(तम् इत्) उस सोम अर्थात् शान्तिदायक परमात्मा को (नः गिरः) हमारी वाणियाँ (सं वर्धन्तु) बढ़ाएँ, प्रचारित करें। (शिश्वरीः) समृद्ध दूधवाली दुधारू गाएँ (वत्सम् इव) जैसे अपने बछड़े को दूध से बढ़ाती हैं। कैसे परमात्मा को? (यः) जो सोम परमात्मा (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (हृदंसनिः) हृदय में रहनेवाला है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःविद्वान् धार्मिक जनों को चाहिए कि वे अपने उपदेशों से जनता में परमेश्वर के प्रति विश्वास उत्पन्न करें, जिससे सर्वत्र आस्तिकता और धार्मिकता का वातावरण उत्पन्न हो ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡र्षा꣢ नः सोम꣣ शं꣡ गवे꣢꣯ धु꣣क्ष꣡स्व꣢ पि꣣प्यु꣢षी꣣मि꣡ष꣢म् । व꣡र्धा꣢ स꣣मु꣡द्र꣢मुक्थ्य ॥१३३७॥
पदार्थःहे (सोम) जगत् के रचयिता शान्तिप्रिय परमात्मन् ! आप (नः) हमारी (गवे) सारी धरती को (शम्) सुख-शान्ति (अर्ष) प्राप्त कराओ, हमें (पिप्युषीम्) समृद्ध (इषम्) अभीष्ट सम्पदा (धुक्ष्व) प्रदान करो। हे (उक्थ्य) स्तुतियोग्य ! (समुद्रम्) सद्गुणों के समुद्र जीवात्मा को अथवा उसमें विद्यमान आनन्द के समुद्र को (वर्ध) बढ़ाओ। जैसे सोम चन्द्रमा जलों के पारावार समुद्र को बढ़ाता है, यह यहाँ ध्वनित होता है ॥३॥
भावार्थःरमात्मा की कृपा से और मनुष्यों के प्रयत्न से सारी धरती सुख, शान्ति तथा प्रचुर सम्पदा प्राप्त करे और उसके निवासी आपस में प्रेम का व्यवहार करें ॥३॥ इस खण्ड में परत्मात्मा, ब्रह्मानन्द और गुरु-शिष्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ दशम अध्याय में एकादश खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣢ घा꣣ ये꣢ अ꣣ग्नि꣢मि꣣न्ध꣡ते꣢ स्तृ꣣ण꣡न्ति꣢ ब꣣र्हि꣡रा꣢नु꣣ष꣢क् । ये꣢षा꣣मि꣢न्द्रो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१३३८॥
पदार्थः(येषाम्) जिन उपासकों का वा प्रजाजनों का (युवा) युवक (इन्द्रः) वीर परमेश्वर वा वीर राजा (सखा) सहायक हो जाता है और (ये घ) जो (अग्निम्) ईश्वर-भक्ति वा राष्ट्र-भक्ति की अग्नि को (आ इन्धते) अपने अन्तःकरण में प्रदीप्त कर लेते हैं, वे (आनुषक्) निरन्तर (बर्हिः) ब्रह्मयज्ञ वा राष्ट्रयज्ञ को (स्तृणन्ति) फैलाते हैं ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि परमेश्वर को ही उपास्यरूप में वरण करें। प्रजाजनों को चाहिए कि युवा तथा राष्ट्र की रक्षा में समर्थ मनुष्य को ही राजा रूप में स्वीकार करें और स्वयं राष्ट्रभक्त हों ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
बृ꣣ह꣢꣫न्निदि꣣ध्म꣡ ए꣢षां꣣ भू꣡रि꣢ श꣣स्त्रं꣢ पृ꣣थुः꣡ स्वरुः꣢꣯ । ये꣢षा꣣मि꣢न्द्रो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१३३९॥
पदार्थः(येषाम्) जिन मनुष्यों का (युवा) युवा (इन्द्रः) वीर परमेश्वर वा वीर राजा (सखा) सहायक हो जाता है, (एषाम्) उनका (बृहन् इत्) महान् ही (इध्मः) प्रताप, (भूरि) बहुत (शस्त्रम्) स्तोत्र वा शस्त्रास्त्र और (पृथुः) विशाल (स्वरुः) यज्ञ होता है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर के उपासक तथा श्रेष्ठ राजा को राजसिंहासन पर बैठानेवाले लोग यशस्वी, विजयी यज्ञपरायण बन जाते हैं ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡यु꣢द्ध꣣ इ꣢द्यु꣣धा꣢꣫ वृत꣣ꣳ शू꣢र꣣ आ꣡ज꣢ति꣣ स꣡त्व꣢भिः । ये꣢षा꣣मि꣢न्द्रो꣣ यु꣢वा꣣ स꣡खा꣢ ॥१३४०॥
पदार्थः(येषाम्) जिन लोगों का (युवा) युवा (इन्द्रः) वीर परमेश्वर वा वीर राजा (सखा) सहायक हो जाता है, उनका (शूरः) शूर जीवात्मा वा शूर सेनापति (अयुद्धः इत्) स्वयं दूसरों से युद्ध न किये जा सकनेवाला होकर (युधा) देवासुरसङ्ग्राम से (वृतम्) घिरे हुए काम-क्रोध आदि षड् रिपुवर्ग को वा मानव-शत्रुदल को (सत्वभिः) अपने पराक्रमों से (आ अजति) मार कर दूर फेंक देता है ॥३॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर को सखा वरण करके योगसाधक लोग योगमार्ग में आये हुए सब विघ्नों का निवारण कर देते हैं, वैसे ही वीर मनुष्य को राजा वा सेनापति के पद पर अभिषिक्त करके प्रजाजन सब शत्रुओं को विनष्ट कर देते हैं ॥३॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
य꣢꣫ एक꣣ इ꣢द्वि꣣द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ म꣡र्ता꣢य दा꣣शु꣡षे꣢ । ई꣡शा꣢नो꣣ अ꣡प्र꣢तिष्कुत꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ ॥१३४१॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (यः एक इत्) जो एक ही है और (दाशुषे) आत्मसमर्पण करनेवाले (मर्ताय) मनुष्य को (वसु) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाव रूप ऐश्वर्य (विदयते) विशेषरूप से देता है। (अङ्ग) हे भाई ! वह (ईशानः) सबका शासक (अप्रतिष्कुतः) किसी से प्रतीकार न किया गया (इन्द्रः) इन्द्र नामक परमेश्वर है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (यः एकः इत्) जो अकेला ही, सब शत्रुओं को (विदयते) विनष्ट कर सके और (दाशुषे) कर देनेवाले (मर्ताय) प्रजाजन को (वसु) ऐश्वर्य (विदयते) प्रदान करे और जो (ईशानः) शासन में समर्थ तथा (अप्रतिष्कुतः) न लड़खड़ानेवाला हो, अङ्ग हे भाई ! वही (इन्द्रः) राजा बनाया जाना चाहिए ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपाषाण आदि की मूर्ति परमेश्वर नहीं है, प्रत्युत जो एक, निराकार, स्तोताओं को ऐश्वर्य देनेवाला सर्वाधीश्वर है, वही परमेश्वर नाम से कहा जाता है। इसी प्रकार प्रजाओं द्वारा वही नर राजा रूप में चुना चाहिए जो अकेला भी अनेकों शत्रुओं को हरा सके और अपनी प्रजाओं का रञ्जन करे ॥१॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
य꣢श्चि꣣द्धि꣡ त्वा꣢ ब꣣हु꣢भ्य꣣ आ꣢ सु꣣ता꣡वा꣢ꣳ आ꣣वि꣡वा꣢सति । उ꣣ग्रं꣡ तत्प꣢꣯त्यते꣣ श꣢व꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ ॥१३४२॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे परमात्मन् ! (बहुभ्यः आ) बहुतों में से (यः चित् हि) जो (सुतावान्) श्रद्धारस को बहानेवाला होकर (त्वा) आपकी (आ विवासति) पूजा करता है, वह (तत्) अद्वितीय (उग्रं शवः) प्रचण्ड आत्मबल (पत्यते) प्राप्त कर लेता है। (अङ्ग) हे परमात्मन् ! वह आप (इन्द्रः) इन्द्र नामवाले हो ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे राजन् ! (यः चित् हि) जो प्रजाजन (बहुभ्यः) बहुतों में से (आ) लाकर, चुनकर (सुतावान्) आपका अभिषेक करके (त्वा) आपको (आ विवासति) सत्कृत करता है, वह (तत्) अद्वितीय, (उग्रं शवः) प्रचण्ड बल (पत्यते) प्राप्त कर लेता है। (अङ्ग) हे राजन् ! वह आप (इन्द्रः) इन्द्र नाम से कहे जाते हो ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर अपने स्तोताओं को आत्मबल देता है, वैसे ही राष्ट्र में राजा भी प्रजाजनों में आत्मविश्वास उत्पन्न करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
क꣣दा꣡ मर्त꣢꣯मरा꣣ध꣡सं꣢ प꣣दा꣡ क्षुम्प꣢꣯मिव स्फुरत् । क꣣दा꣡ नः꣢꣯ शुश्रव꣣द्गि꣢र꣣ इ꣡न्द्रो꣢ अ꣣ङ्ग꣢ ॥१३४३॥
पदार्थः(अङ्ग) हे भद्र ! (इन्द्रः) वीर परमेश्वर वा वीर राजा आप (कदा) कब (अराधसम्) समाज-सेवा न करनेवाले स्वार्थपरायण (मर्तम्) मनुष्य को (पदा) पैर से (क्षुम्पम् इव) खुम्भ के समान (स्फुरत्) विचलित कर दोगे, (कदा) कब (नः) हमें (गिरः) अपनी सन्देश-वाणियाँ (शुश्रवत्) सुनाओगे ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा के समान राजा भी दुष्टों को दण्डित करे और सज्जनों की वाणियाँ सुने तथा अपनी रमणीय, उपदेशप्रद वाणियाँ उन्हें सुनाये ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
गा꣡य꣢न्ति त्वा गाय꣣त्रि꣡णोऽर्च꣢꣯न्त्य꣣र्क꣢म꣣र्कि꣡णः꣢ । ब्र꣣ह्मा꣡ण꣢स्त्वा शतक्रत꣣ उ꣢द्व꣣ꣳश꣡मि꣢व येमिरे ॥१३४४॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) असंख्यात कर्मों वा प्रज्ञाओंवाले जगदीश्वर ! (त्वा) गाये जाने योग्य आपकी (गायत्रिणः) जिन्होंने वेदों के गायत्री आदि प्रशस्त छन्दों का अध्ययन किया हुआ है, ऐसे धार्मिक ईश्वरोपासक लोग (गायन्ति) सामवेद आदि के गान द्वारा प्रशंसा करते हैं। (अर्किणः) वेदमन्त्र जिनके ज्ञान के साधन हैं, ऐसे लोग (अर्कम्) सब जनों के पूजनीय आपकी (अर्चन्ति) नित्य पूजा करते हैं। (ब्रह्माणः) वेदार्थों को जानकर तदनुसार कर्म करनेवाले विद्वान् लोग (त्वा) जगत् के रचयिता आपको (उद्येमिरे) अपने प्रति उद्यमवान् करते हैं, (वंशम् इव) जैसे उत्कृष्ट गुणों और शिक्षाओं से लोग अपने कुल को (उद् येमिरे) उद्यमी बनाते हैं ॥१॥३ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि वे परमेश्वर का ही गान और पूजन करें, क्योंकि उसके तुल्य या उससे अधिक अन्य कोई नहीं हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣢꣫त्सानोः꣣ सा꣡न्वारु꣢꣯हो꣣ भू꣡र्यस्प꣢꣯ष्ट꣣ क꣡र्त्व꣢म् । त꣢꣫दिन्द्रो꣣ अ꣡र्थं꣢ चेतति यू꣣थे꣡न꣢ वृ꣣ष्णि꣡रे꣢जति ॥१३४५॥
पदार्थःमनुष्य (यत्) जब (सानोः सानु) एक शिखर से दूसरे उच्चतर शिखर पर, अर्थात् एक लक्ष्य को पार करके उससे ऊँचे दूसरे लक्ष्य पर (आरुहः) चढ़कर पहुँच जाता हैऔर (भूरि) बहुत से (कर्त्वम्) करने योग्य कार्य को (अस्पष्ट) करता है, (तत्) तब (इन्द्रः) विघ्नविनाशक परमेश्वर, उसके (अर्थम्) उदेश्य को (चेतति) जान लेता है और (वृष्णिः) बल, सुख, आदि को बरसानेवाला होता हुआ (यूथेन) गुणसमूह के साथ (एजति) उसे प्राप्त होता है ॥२॥
भावार्थःप्रगति के पथ पर जाते हुए मनुष्य का जगदीश्वर परम सहायक हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
यु꣣ङ्क्ष्वा꣢꣫ हि के꣣शि꣢ना꣣ ह꣢री꣣ वृ꣡ष꣢णा कक्ष्य꣣प्रा꣢ । अ꣡था꣢ न इन्द्र सोमपा गि꣣रा꣡मुप꣢꣯श्रुतिं चर ॥१३४६॥
पदार्थःहे (सोमपाः) सौम्य गुणों के रक्षक (इन्द्र) परमात्मन् ! जैसे आप (केशिना) सूर्य-किरणों से युक्त, (वृषणा) बलवान् (कक्ष्यप्रा) अपनी-अपनी भ्रमण-कक्षा में वेग से गति करते हुए (हरी) परस्पर आकर्षण से युक्त चन्द्रमा और भूमण्डल को आपस में जोड़ते हो, वैसे ही (केशिना) जीवात्मा के प्रकाश से युक्त, (कक्ष्यप्रा) अपने-अपने विषय की कक्षा में चलते हुए (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़ों को (युङ्क्ष्व) परस्पर सहयोगवाला करो। (अथ) इस प्रकार (नः) हमारी (गिराम्) सब प्रार्थना-वाणियों की (उपश्रुतिम्) सुनवाई (चर) करो ॥३॥ यहाँ श्लिष्ट वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे भूलोक और चन्द्रलोक एक-दूसरे के साथ सामञ्जस्य से वर्तमान हुए सूर्य का परिभ्रमण करते हैं, वैसे ही ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ आपस के सहयोग से मनुष्य का जीवन सञ्चालित करती हैं ॥३॥ इस खण्ड में अध्यात्म और राष्ट्र का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ दशम अध्याय में द्वादश खण्ड समाप्त ॥ दशम अध्याय समाप्त॥ पञ्चम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इध्मः समिद्धो वाग्निः| स्वर - षड्जः
सु꣡ष꣢मिद्धो न꣣ आ꣡ व꣢ह दे꣣वा꣡ꣳ अ꣢ग्ने ह꣣वि꣡ष्म꣢ते । हो꣡तः꣢ पावक꣣ य꣡क्षि꣢ च ॥१३४७॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रणायक तेजस्वी परमेश्वर ! (सुसमिद्धः) अन्तरात्मा में भली भाँति प्रदीप्त किये हुए आप (नः) हम उपासकों के लिए और (हविष्मते) दूसरे आत्मसमर्पणकर्ता के लिए (देवान्) दिव्यगुणों को (आ वह) प्राप्त कराओ। (होतः) हे सुख-प्रदाता ! (पावक) हे पवित्रकर्ता, आप (यक्षि च) हमारे साथ सङ्गम भी करो ॥१॥
भावार्थःअपने अन्तरात्मा में परमात्माग्नि को प्रदीप्त करके सब लोग दिव्यगुणी होवें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -तनूनपात्| स्वर - षड्जः
म꣡धु꣢मन्तं तनूनपाद्य꣣ज्ञं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ नः कवे । अ꣣द्या꣡ कृ꣢णुह्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१३४८॥
पदार्थःहे (तनूनपात्) देहधारियों को उठानेवाले, (कवे) दूरदर्शी प्रज्ञावाले परमात्मन् ! आप (अद्य) आज (ऊतये) रक्षा के लिए (नः) हमारे (देवेषु) विद्वानों में (यज्ञम्) त्याग-भावना को (कृणुहि) उत्पन्न करो ॥२॥
भावार्थःराष्ट्रवासियों का जीवन यदि यज्ञमय वा त्यागपूर्ण हो तो राष्ट्र उन्नति की सबसे ऊँची पैढ़ी पर पहुँच सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -नराशंसः| स्वर - षड्जः
न꣢रा꣣श꣡ꣳस꣢मि꣣ह꣢ प्रि꣣य꣢म꣣स्मि꣢न्य꣣ज्ञ꣡ उप꣢꣯ ह्वये । म꣡धु꣢जिह्वꣳ हवि꣣ष्कृ꣡त꣢म् ॥१३४९॥
पदार्थः(मधुजिह्वम्) जिसकी जिह्वा में मधु है, ऐसे अर्थात् मधुरभाषी, (हविष्कृतम्) आत्मसमर्पण करनेवाले, (इह) यहाँ (प्रियम्) मेरे प्रिय, (नराशंसम्) मनुष्यों से प्रशंसनीय जीवात्मा को (अस्मिन् यज्ञे) इस पारस्परिक मिलनरूप यज्ञ में, मैं (उपह्वये) अपने समीप बुलाता हूँ ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा जब आत्मसमर्पण कर देता है तब परमात्मा स्वयं ही उसे अपने समीप ले आता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡ग्ने꣢ सु꣣ख꣡त꣢मे꣣ र꣡थे꣢ दे꣣वा꣡ꣳ ई꣢डि꣣त꣡ आ व꣢꣯ह । अ꣢सि꣣ हो꣢ता꣣ म꣡नु꣢र्हितः ॥१३५०॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन् ! (ईडितः) पूजा किये हुए, आप (देवान्) दिव्यगुणयुक्त हम विद्वान् उपासकों को, आगामी जन्म में (सुखतमे) सबसे अधिक सुखदायी (रथे) मानवदेह-रूप रथ में (आ वह) जीवनयात्रा कराओ। आप (होता) कर्मफलों के दाता और (मनुर्हितः) मनुष्यों के लिए हितकारी (असि) हो ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित हुआ मनुष्य आगामी जन्म में भी कर्मों के अनुसार मानव-योनि प्राप्त करता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आदित्यः| स्वर - षड्जः
य꣢द꣣द्य꣢꣫ सू꣣र उ꣢दि꣣ते꣡ऽना꣢गा मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣢ । सु꣣वा꣡ति꣢ सवि꣣ता꣡ भगः꣢꣯ ॥१३५१॥
पदार्थः(यत्) यदि (अद्य) आज (सूरे उदिते) सूर्य के उदय होने पर, मनुष्य (अनागाः) निष्पाप होता है तो (मित्रः) सबका मित्र, (अर्यमा) न्यायकारी, न्यायानुसार कर्मफलों का दाता, (भगः) भजनीय (सविता) प्रेरक परमेश्वर उसे दिनभर (सुवाति) सत्कर्मों में प्रेरित करता रहता है ॥१॥
भावार्थःदिन के आरम्भ में यदि श्रेष्ठ विचार रहते हैं, तो ऐसी आशा होती है कि परमेश्वर की कृपा से सारा दिन निर्मल व्यतीत होगा ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आदित्यः| स्वर - षड्जः
सु꣣प्रावी꣡र꣢स्तु꣣ स꣢꣫ क्षयः꣣ प्र꣡ नु याम꣢꣯न्त्सुदानवः । ये꣡ नो꣢ अ꣡ꣳहो꣢ऽति꣣पि꣡प्र꣢ति ॥१३५२॥
पदार्थःहे (सुदानवः) शुभ दानवाले उपासक विद्वान् जनो ! (ये) जो आप लोग (नः) हमारे (अंहः) पाप वा अपराध को (अतिपिप्रति) दूर करते हो, उन आप लोगों के (यामन्) आगमन होने पर (सः) वह (क्षयः) हमारा निवासगृह (सुप्रावीः) भली- भाँति प्रकृष्टरूप से रक्षित (नु) शीघ्र ही (प्र अस्तु) प्रबलरूप से होवे ॥२॥
भावार्थःकर्तव्य और अकर्तव्य के उपदेशक उपासक विद्वान् जनों के समागम से लोग किसी भी पापकर्म में प्रवृत्त न होते हुए पुण्यशाली होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आदित्यः| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣢ स्व꣣रा꣢जो꣣ अ꣡दि꣢ति꣣र꣡द꣢ब्धस्य व्र꣣त꣢स्य꣣ ये꣢ । म꣣हो꣡ राजा꣢꣯न ईशते ॥१३५३॥
पदार्थः(उत) और (स्वराजः) स्वराज्यसम्पन्न उपासक विद्वान् जन तथा (अदितिः) अखण्डनीय जगन्माता, (ये) जो (अदब्धस्य) अटूट (व्रतस्य) संकल्प तथा कर्म के (राजानः) राजा हैं, वे (महः) महान् ऐश्वर्य के (ईशते) स्वामी होते हैं अर्थात् महान् ऐश्वर्य देने की क्षमता रखते हैं ॥३॥
भावार्थःजो लोग परमात्मा की तथा चरित्रवान् विद्वानों की सङ्गति करते, हैं वे परमैश्वर्यवान् हो जाते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣡ त्वा꣢ मन्दन्तु꣣ सो꣡माः꣢ कृणु꣣ष्व꣡ राधो꣢꣯ अद्रिवः । अ꣡व꣢ ब्रह्म꣣द्वि꣡षो꣢ जहि ॥१३५४॥
पदार्थःहे (अद्रिवः) अविदारणीय बलवाले इन्द्र जीवात्मन् ! (त्वा) तुझे (सोमाः) वीर रस (मदन्तु उ) उत्साहित करें। तू (राधः) दिव्य ऐश्वर्य तथा सफलता को (कृणुष्व) उत्पन्न कर। (ब्रह्मद्विषः) ब्रह्मद्वेषी भावों को (अवजहि) विनष्ट कर दे ॥१॥
भावार्थःअपने आत्म-बल को पहचान कर मनुष्य को महान् कर्म करने चाहिएँ और विघ्नों को पराजित करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
प꣣दा꣢ प꣣णी꣡न꣢रा꣣ध꣢सो꣣ नि꣡ बा꣢धस्व म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि । न꣢꣫ हि त्वा꣣ क꣢श्च꣣ न꣡ प्रति꣢꣯ ॥१३५५॥
पदार्थःहे इन्द्र जीवात्मन् ! तू (अराधसः) दूसरों के कार्यों को सिद्ध न करनेवाले (पणीन्) स्वार्थभावों को (पदा) जैसे पैर की ठोकर मार कर किसी को दूर फेंक देते हैं, वैसे (नि बाधस्व) दूर फेंक दे, तू (महान्) महान् (असि) है, (त्वा) तुझे (कश्च न) कोई भी (प्रति नहि) प्रतिरुद्ध नहीं कर सकता है, अर्थात् तेरे मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकता है ॥२॥ यहाँ ‘पदा’ में लुप्तोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे कोई पैर की ठोकर मार कर मार्ग की रुकावट को दूर फेंक देता है, वैसे ही जीवात्मा को चाहिए कि विघ्नरूप आन्तरिक शत्रुओं को दूर कर दे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्व꣡मी꣢शिषे सु꣣ता꣢ना꣣मि꣢न्द्र꣣ त्व꣡मसु꣢꣯तानाम् । त्व꣢꣫ꣳ राजा꣣ ज꣡ना꣢नाम् ॥१३५६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगत् के रचयिता परमात्मन् ! (त्वम्) आप (सुतानाम्) उत्पन्न प्राणियों और पदार्थों के (ईशिषे) स्वमी हो, (त्वम्) आप ही (असुतानाम्) जो अभी उत्पन्न नहीं हुए, किन्तु भविष्य में उत्पन्न होनेवाले हैं, उन प्राणियों और पदार्थों के भी स्वामी हो। (त्वम्) आप ही (जनानाम्) मनुष्यों के (राजा) राजा हो ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा के अन्दर जो महान् शक्ति निहित है, वह परमात्मा की ही दी हुई है, इस कारण परमात्मा की स्तुति से यहाँ जीव अपने अभिमान को दूर कर रहा है ॥३॥ यहाँ उपास्य-उपासक का सम्बन्ध वर्णित होने से, जीवात्मा को उद्बोधन होने से और विद्वान् उपासकों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ ग्यारहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
आ꣡ जागृ꣢꣯वि꣣र्वि꣡प्र꣢ ऋ꣣तं꣢ म꣢ती꣣ना꣡ꣳ सोमः꣢꣯ पुना꣣नो꣡ अ꣢सदच्च꣣मू꣡षु꣢ । स꣡प꣢न्ति꣣ यं꣡ मि꣢थु꣣ना꣢सो꣣ नि꣡का꣢मा अध्व꣣र्य꣡वो꣢ रथि꣣रा꣡सः꣢ सु꣣ह꣡स्ताः꣢ ॥१३५७॥
पदार्थः(जागृविः) जागरूक, (विप्रः) विशेषरूप से पूर्णता प्रदान करनेवाला, (मतीनाम्) बुद्धियों के (ऋतम्) व्यापार को (पुनानः) पवित्र करनेवाला, (सोमः) सत्कर्मों की प्रेरणा देनेवाला परमेश्वर (चमूषु) आत्मा, मन, प्राण आदि में वा सूर्य, चन्द्र, भूमण्डल आदि लोकों में (आ असदत्) नियामकरूप से स्थित है, (यम्) जिस परमेश्वर को (निकामाः) निरन्तर पाने की लौ लगाये हुए, (रथिरासः) उत्कृष्ट शरीर-रथवाले, (सुहस्ताः) सिद्धहस्त (अध्वर्यवः) उपासना-यज्ञ के इच्छुक (मिथुनासः) स्त्री-पुरुष (सपन्ति) प्राप्त कर लेते हैं ॥१॥
भावार्थःशरीर और बाह्य जगत् का जो सञ्चालन करता है, उस जगदीश्वर की सबको भली-भाँति उपासना करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
स꣡ पु꣢ना꣣न꣢꣫ उप꣣ सू꣢रे꣣ द꣡धा꣢न꣣ ओ꣡भे अ꣢꣯प्रा꣣ रो꣡द꣢सी꣣ वी꣡ ष आ꣢꣯वः । प्रि꣣या꣢ चि꣣द्य꣡स्य꣢ प्रिय꣣सा꣡स꣢ ऊ꣣ती꣢ स꣣तो꣡ धनं꣢꣯ का꣣रि꣢णे꣣ न꣡ प्र य꣢꣯ꣳसत् ॥१३५८॥
पदार्थः(सः) वह सोम अर्थात् जगत् का रचयिता परमेश्वर (उभे रोदसी) द्यावापृथिवी दोनों को अर्थात् पृथिवी को और द्युलोकवर्ती अन्य ग्रहोपग्रहों को (पुनानः) पवित्र करता हुआ, तथा (सुरे उप) सूर्य की नियन्त्रण-कक्षा में (दधानः) धारण करता हुआ (आ पप्राः) सूर्य के प्रकाश से आपूर्ण करता है। (सः) वह उन द्यावापृथिवियों को (वि आवः च) विस्पष्ट भी करता है। (सतः) विद्यमान (यस्य) जिस सोम परमेश्वर के रचे हुए (प्रिया) प्रिय लगनेवाले, (प्रियसासः) प्रिय अभीष्ट को देनेवाले पदार्थ (ऊती) सबकी रक्षार्थ होते हैं, वह हमें (धनम्) धन (प्र यंसत्) प्रदान करे, (कारिणे न) जैसे कर्म करनेवाले सेवक को वेतन दिया जाता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है। ‘प्रिया, प्रिय’ में छेकानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःइस ब्रह्माण्ड में द्युलोक-पृथिवीलोक के धारण आदि की जो भी व्यवस्था दिखाई देती है, वह सब परमात्मा द्वारा ही की गयी है। जैसे सेवक को वेतन दिया जाता है, वैसे ही स्तोता को परमात्मा पुरुषार्थ और ऐश्वर्य देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
स꣡ व꣢र्धि꣣ता꣡ वर्ध꣢꣯नः पू꣣य꣡मा꣢नः꣣ सो꣡मो꣢ मी꣣ढ्वा꣢ꣳ अ꣣भि꣢ नो꣣ ज्यो꣡ति꣢षावीत् । य꣡त्र꣢ नः꣣ पू꣡र्वे꣢ पि꣣त꣡रः꣢ पद꣣ज्ञाः꣢ स्व꣣र्वि꣡दो꣢ अ꣣भि꣡ गा अद्रि꣢꣯मि꣣ष्ण꣢न् ॥१३५९॥
पदार्थः(वर्धिता) बढ़ानेवाला, (वर्धनः) स्वयं बढ़ा हुआ अर्थात् महिमा को प्राप्त, (पूयमानः) उपासकों से प्राप्त किया जाता हुआ, (मीढ़्वान्) सुख सींचनेवाला, (सोमः) जगत् का रचयिता परमेश्वर (ज्योतिषा) ज्योति के द्वारा (नः) हमारी (अभि आवीत्) रक्षा करे, (यत्र) जिसके आश्रय में विद्यमान (पदज्ञाः) मोक्षपद के ज्ञाता, (नः) हमारे (पूर्वे पितरः) श्रेष्ठ पितृजन (गाः अभि) दिव्य प्रकाश की किरणों को प्राप्त करने के लिए (अद्रिम्) पर्वत के समान रुकावट डालनेवाले तमोजाल को (इष्णन्) दूर कर देते हैं, तथा (स्वर्विदः) मोक्ष के आनन्द को प्राप्त करनेवाले हो जाते हैं ॥३॥
भावार्थःज्योतिर्मय परमात्मा की उपासना से मनुष्य भी ज्योतिष्मान् होकर मोक्ष पा लेते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
मा꣡ चि꣢द꣣न्य꣡द्वि श꣢꣯ꣳसत꣣ स꣡खा꣢यो꣣ मा꣡ रि꣢षण्यत । इ꣢न्द्र꣣मि꣡त्स्तो꣢ता꣣ वृ꣡ष꣢ण꣣ꣳ स꣡चा꣢ सु꣣ते꣡ मुहु꣢꣯रु꣣क्था꣡ च꣢ शꣳसत ॥१३६०॥
पदार्थःहे (सखायः) साथियो ! तुम (अन्यत्) परमेश्वर के अतिरिक्त सूर्य, चाँद, वृक्ष, स्थाणु, प्रतिमा आदि को (मा चित्) कभी मत (विशंसत) पूजो, (मा रिषण्यत) अपूज्यों की पूजा से हानिग्रस्त मत होओ। (सुते) श्रद्धारस के अभिषुत होने पर (सचा) साथ मिलकर (वृषणम्) आनन्द की वर्षा करनेवाले (इन्द्रम् इत्) परमैश्वर्यशाली परमेश्वर की ही (स्तोत) स्तुति करो और (मुहुः मुहुः) बार-बार (उक्था च) स्तोत्रों का (शंसत) कीर्तन करो ॥१॥
भावार्थःएक सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, न्यायकारी परमेश्वर की ही पूजा सबको करनी चाहिए। वेदों में इन्द्र, मित्र, वरुण, आदि बहुत से नामों से एक ही परमेश्वर का प्रतिपादन हुआ है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣣वक्रक्षि꣡णं꣢ वृष꣣भं꣡ य꣢था꣣ जु꣢वं꣣ गां꣡ न च꣢꣯र्षणी꣣स꣡ह꣢म् । वि꣣द्वे꣡ष꣢णꣳ सं꣣व꣡न꣢नमुभयङ्क꣣रं꣡ मꣳहि꣢꣯ष्ठमुभया꣣वि꣡न꣢म् ॥१३६१॥
पदार्थः(अवक्रक्षिणम्) सूर्य आदि लोकों को आकर्षण द्वारा धारण करनेवाले, (वृषभं यथा) वर्षा करनेवाले बादल के समान (जुवम्) उपासकों के पास पहुँचनेवाले, अर्थात् बादल जैसे वर्षाजल के द्वारा भूमि पर पहुँचता है, वैसे ही आनन्द के उपहारों के साथ उपासक के पास पहुँचनेवाले, (गां न) बिजली के समान (चर्षणीसहम्) दुर्जनों को तिरस्कृत करनेवाले, (विद्वेषणम्) द्वेष से रहित, (संवननम्) स्तोताओं से संभजनीय, (उभयङ्करम्) द्युलोक-भूलोक दोनों के रचयिता, (मंहिष्ठम्) सबसे बड़े दानी, (उभयाविनम्) निग्रह और अनुग्रह दोनों गुणों से युक्त इन्द्र परमात्मा की (स्तोत) स्तुति करो। [यहाँ ‘स्तोत’ यह पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है] ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःआकाश में बिना ही आधार के आकर्षणरूप डोर से लोक-लोकान्तरों को धारण करनेवाले, सज्जनों को उत्साहित करनेवाले, दुर्जनों को दण्डित करनेवाले, जगत् के रचयिता, परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर की सबको भली-भाँति उपासना करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
उ꣢दु꣣ त्ये꣡ मधु꣢꣯मत्तमा꣣ गि꣢रः꣣ स्तो꣡मा꣢स ईरते । स꣣त्राजि꣡तो꣢ धन꣣सा꣡ अक्षि꣢꣯तोतयो वाज꣣य꣢न्तो꣣ र꣡था꣢ इव ॥१३६२॥
पदार्थः(सत्राजितः) सत्य को जीतनेवाले, (धनसाः) भौतिक और आध्यात्मिक धन की प्राप्ति तथा दान करनेवाले (त्ये) वे (मधुमत्तमाः) अतिशय मधुर व्यवहारवाले, (स्तोमासः) स्तोता (गिरः) विद्वान् लोग (रथाः इव) विमान यानों के समान (उदीरते उ) उपर जाते हैं अर्थात् उद्यमी होते हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के उपासक मन, वाणी और कर्म से सच्चे, परोपकारी, मधुर, बलवान् और पुरुषार्थी होकर अपनी और दूसरों की उन्नति करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
क꣡ण्वा꣢ इव꣣ भृ꣡ग꣢वः꣣ सू꣡र्या꣢ इव꣣ वि꣢श्व꣣मि꣢द्धी꣣त꣡मा꣢शत । इ꣢न्द्र꣣ꣳ स्तो꣡मे꣢भिर्म꣣ह꣡य꣢न्त आ꣣य꣡वः꣢ प्रि꣣य꣡मे꣢धासो अस्वरन् ॥१३६३॥
पदार्थः(प्रियमेधासः) जिन्हें मेधा प्रिय है, ऐसे (आयवः) मनुष्य (इन्द्रम्) परमेश्वर की (महयन्तः) पूजा करते हुए (स्तोमेभिः) साम के स्तोत्रों से (अस्वरन्) उसकी स्तुति करते हैं। उसके अनन्तर वे (कण्वाः इव) मेधावी ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मणों के समान और (सूर्याः इव) सूर्यों के समान (भृगवः) तेजस्वी होते हुए (विश्वम् इत्) सभी (धीतम्) सोचे हुए अभीष्ट को (आशत्) प्राप्त कर लेते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के उपासक लोग तेजस्विता और आत्मविश्वास प्राप्त करके पुरुषार्थ करते हुए सब अभीष्ट को पा लेते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पिपीलिकामध्या अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प꣢र्यू꣣ षु꣡ प्र ध꣢꣯न्व꣣ वा꣡ज꣢सातये꣣ प꣡रि꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ स꣣क्ष꣡णिः꣢ । द्वि꣣ष꣢स्त꣣र꣢ध्या꣢ ऋण꣣या꣡ न꣢ ईरसे ॥१३६४॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेवाले जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! आप (वाजसातये) बल देने के लिए, हमें (सु) भली-भाँति (परि प्र धन्व) चारों ओर से प्राप्त होओ। (सक्षणिः) विघ्नों के विनाशक आप (वृत्राणि) जीवनमार्ग वा योगमार्ग में आये हुए विघ्नों पर (परि प्र धन्व) चारों ओर से आक्रमण कर दो। (ऋणयाः) हमारे ऋषिऋण-देवऋण-पितृऋण को तथा अन्य ऋणों को चुकवानेवाले आप (द्विषः) द्वेषवृत्तियों को (तरध्यै) परास्त करने के लिए (नः ईरसे) हमें प्राप्त होवो। तैत्तिरीयसंहिता में तीन ऋण गिनाते हुए कहा गया है कि उत्पन्न होता हुआ ब्राह्मण तीन ऋणों से ऋणी होता है। ऋषियों के प्रति ब्रह्मचर्य से, देवों के प्रति यज्ञ से और पितृजनों के प्रति प्रजा से। जब वह आचार्याधीन ब्रह्मचर्यवास करता है, यज्ञ करता है और पुत्रवान् हो जाता है तब क्रमशः इन ऋणों से छूट जाता है (तै० सं० ६।३।१०।५) ॥१॥
भावार्थःमनुष्य दूसरों की सहायता का उपयोग करके उनके प्रति ऋणी हो जाता है। माता-पिता, गुरुजन, समाज, राष्ट्र तथा अन्यों के प्रति उसके जो ऋण होते हैं, उन्हें परमेश्वर की प्रेरणा से वह उपकारस्मरणपूर्वक सधन्यवाद चुका देता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पिपीलिकामध्या अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣡जी꣢जनो꣣ हि꣡ प꣢वमान꣣ सू꣡र्यं꣢ वि꣣धा꣢रे꣣ श꣡क्म꣢ना꣣ प꣡यः꣢ । गो꣡जी꣢रया꣣ र꣡ꣳह꣢माणः꣣ पु꣡र꣢न्ध्या ॥१३६५
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रकर्ता, सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ! आपने (सूर्यम्) सूर्य को (अजीजनः हि) उत्पन्न किया है और (शक्मना) अपनी शक्ति से (विधारे) विधारक अन्तरिक्ष में (पयः) मेघ-जल को (अजीजनः) उत्पन्न किया है। आप (गोजीरया) भूमण्डल के जीवन की इच्छा से (पुरन्ध्या) बहुत अधिक प्रज्ञा तथा क्रिया द्वारा (रंहमाणः) शीघ्रकारी होते हो ॥२॥
भावार्थःब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, विद्युत्, नक्षत्र, बादल आदि सब विलक्षण वस्तुएँ परमात्मा ने ही रची हैं, इनके निर्माण में किसी मनुष्य का सामर्थ्य नहीं है। वह सबकी हितकामना से बुद्धिपूर्वक चेष्टा करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -पिपीलिकामध्या अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣢नु꣣ हि꣡ त्वा꣢ सु꣣त꣡ꣳ सो꣢म꣣ म꣡दा꣢मसि महे समर्यराज्ये । वाजाँ अभि पवमान प्र गाहसे ॥१३६६॥
पदार्थःहे (सोम) ब्रह्माण्ड के सम्राट् जगदीश्वर ! (महे) महान् (समर्यराज्ये) देवासुरसङ्ग्राम से प्राप्त आन्तरिक साम्राज्य में, हम (सुतं त्वा) हृदय में प्रकट हुए आपको (अनु) लक्ष्य करके (मदामसि हि) मुदित होते हैं। हे (पवमान) पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (वाजान्) बलों में (अभि प्र गाहसे) अवगाहन करते हो, अतः हमें बल दो, यह भाव है ॥३॥
भावार्थःअपने अन्तरात्मा में छिपे हुए परमात्मा को प्रकट करके आत्मबल और परम आनन्द प्राप्त किया जा सकता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
प꣢रि꣣ प्र꣡ ध꣢न्वे꣡न्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय ॥१३६७॥
पदार्थःहे (सोम) ब्रह्मानन्दरस ! (स्वादुः) मधुर स्वादवाला तू (मित्राय) मित्र, (पूष्णे) पोषणकर्ता, (भगाय) सेवनीय (इन्द्राय) जीवात्मा के लिये(परि प्र धन्व) प्रवाहित हो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर के पास से प्रवाहित हुए परमानन्दरस का पान करके जीवात्मा में एक विलक्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
ए꣣वा꣡मृता꣢꣯य म꣣हे꣡ क्षया꣢꣯य꣣ स꣢ शु꣣क्रो꣡ अ꣢र्ष दि꣣व्यः꣢ पी꣣यू꣡षः꣢ ॥१३६८॥
पदार्थःहे सोम ! हे ब्रह्मानन्द ! (सः) वह (शुक्रः) पवित्र, (दिव्यः) अलौकिक, (पीयूषः) पान करने योग्य तू (एव) सचमुच (अमृताय) हमारी अमरपद की प्राप्ति के लिए और (महे) महान् (क्षयाय) निवासक धर्म, अर्थ तथा काम की प्राप्ति के लिए (अर्ष) प्रवाहित हो ॥२॥
भावार्थःब्रह्मानन्द रस के पान से मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध कर सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -द्विपदा विराट् पङ्क्तिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
इ꣡न्द्र꣢स्ते सोम सु꣣त꣡स्य꣢ पेया꣣त्क्र꣢त्वे꣣ द꣡क्षा꣢य꣣ वि꣡श्वे꣢ च दे꣣वाः꣢ ॥१३६९॥
पदार्थःहे (सोम) ब्रह्मानन्द रस ! (सुतस्य) परमात्मा के पास से प्रवाहित हुए (ते) तुझे (क्रत्वे) कर्म करने के लिए और (बलाय) बल की प्राप्ति के लिए (इन्द्रः) जीवात्मा (पेयात्) पान करे, (विश्वे च देवाः) और अन्य सब प्रकाशक मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ आदि भी पान करें ॥३॥
भावार्थःब्रह्मानन्द-रस के पान से मनुष्य आत्मबली और कर्मयोगी होता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा और ब्रह्मानन्द का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ ग्यारहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
सू꣡र्य꣢स्येव र꣣श्म꣡यो꣢ द्रावयि꣣त्न꣡वो꣢ मत्स꣣रा꣡सः꣢ प्र꣣सु꣡तः꣢ सा꣣क꣡मी꣢रते । त꣡न्तुं꣢ त꣣तं꣢꣫ परि꣣ स꣡र्गा꣢स आ꣣श꣢वो꣣ ने꣡न्द्रा꣢दृ꣣ते꣡ प꣢वते꣣ धा꣢म꣣ किं꣢ च꣣न꣢ ॥१३७०॥
पदार्थः(सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मयः इव) किरणों के समान (द्रावयित्नवः) द्रवित करनेवाले, (मत्सरासः) तृप्ति देनेवाले, (आशवः) वेगगामी, (प्रसुतः) प्रेरित (सर्गासः) हमारे भक्तिरस-प्रवाह (साकम्) एक साथ (ततम्) सर्वत्र फैले हुए, (तन्तुम्) मणियों में सूत्र के समान व्याप्त इन्द्र परमात्मा को (परि ईरते) चारों ओर से प्राप्त हो रहे हैं, क्योंकि (इन्द्रात् ऋते) परमात्मा के अतिरिक्त (किं चन धाम) कोई भी ज्योति (न पवते) पवित्रता नहीं देती है ॥१॥ यहाँ उपमा तथा काव्यलिङ्ग अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की ही उपासना और कृपा से मनुष्य का अन्तःकरण पवित्र होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
उ꣡पो꣢ म꣣तिः꣢ पृ꣣च्य꣡ते꣢ सि꣣च्य꣢ते꣣ म꣡धु꣢ म꣣न्द्रा꣡ज꣢नी चोदते अ꣣न्त꣢रा꣣स꣡नि꣢ । प꣡व꣢मानः सन्त꣣निः꣡ सु꣢न्व꣣ता꣡मि꣢व꣣ म꣡धु꣢मान्द्र꣣प्सः꣢꣫ परि꣣ वा꣡र꣢मर्षति ॥१३७१॥
पदार्थः(मतिः) बुद्धि (उपपृच्यते उ) प्राप्त हो रही है, (मधु) माधुर्य (सिच्यते) सींचा जा रहा है, (आसनि अन्तः) मुख के अन्दर (मन्द्राजनी) आनन्दजनक शब्दों ओंकार, व्याहृति, गायत्री आदि को प्रेरित करनेवाली जिह्वा (चोदते) स्तुति-मन्त्रों को प्रेरित कर रही है। (पवमानः) बहता हुआ अथवा अन्तःकरण को पवित्र करता हुआ (सन्तनिः) भली-भाँति फैलनेवाला, (मधुमान्) मधुर (द्रप्सः) ब्रह्मानन्द-रस (वारम्) दोष-निवारक अन्तरात्मा को (परि अर्षति) प्राप्त हो रहा है, (सुन्वताम् इव) जैसे यजमानों की (पवमानः) गुरुकुल-निवास से स्वयं को पवित्र करती हुई, (मधुमान्) मधुर ज्ञान से वा मधुर व्यवहार से युक्त (सन्तनिः) सन्तान स्नातक होकर (वारम्) जन-समाज को (परि अर्षति) प्राप्त करती है ॥२॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है। उत्तरार्धगत कारण से पूर्वार्धगत कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास है। प्, म्, न्, त्, स् की अलग-अलग आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है। ‘च्यते’ की आवृत्ति में यमक है। शान्त-रस है ॥२॥
भावार्थःउपासक के अन्तरात्मा में ब्रह्मानन्द-रस का धाराप्रवाह होने पर विलक्षण मति और विलक्षण माधुर्य अनुभूत होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
उ꣣क्षा꣡ मि꣢मेति꣣ प्र꣡ति꣢ यन्ति धे꣣न꣡वो꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ दे꣣वी꣡रुप꣢꣯ यन्ति निष्कृ꣣त꣢म् । अ꣡त्य꣢क्रमी꣣द꣡र्जु꣢नं꣣ वा꣡र꣢म꣣व्य꣢य꣣म꣢त्कं꣣ न꣢ नि꣣क्तं꣢꣫ परि꣣ सो꣡मो꣢ अव्यत ॥१३७२॥
पदार्थः(उक्षा) प्राणरूप बैल (मिमेति) डकरा रहा है, (धेनवः) इन्द्रियरूप गाएँ (प्रति यन्ति) बाह्य विषयों से लौट रही हैं। (देवीः) दिव्यगुणोंवाली मनोवृत्तियाँ (देवस्य) प्रकाशक जीवात्मा के (निष्कृतम्) आश्रय को (उप यन्ति) प्राप्त कर रही हैं। यह सब क्यों हो रहा है? क्योंकि (सोमः) जीवात्मा ने (अति) विघ्नों का अतिक्रमण करके (अर्जुनम्) श्वेत, निर्मल, (अव्ययम्) अविनश्वर (वारम्) वरणीय परमात्मा की ओर (अक्रमीत्) पग बढ़ाये हैं और (निक्तम्) शुद्ध (अत्कं न) कवच के समान, उसे (परि अव्यत) चारों और धारण कर लिया है ॥३॥ चतुर्थ चरण में उपमालङ्कार है, उत्तरार्धगत कारण से पूर्वार्धगत कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास भी है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा के प्राप्त हो जाने पर जीव कवचधारी के समान रक्षित हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
अ꣣ग्निं꣢꣫ नरो꣣ दी꣡धि꣢तिभिर꣣र꣢ण्यो꣣र्ह꣡स्त꣢च्युतं जनयत प्रश꣣स्त꣢म् । दू꣣रेदृ꣡शं꣢ गृ꣣ह꣡प꣢तिमथ꣣व्यु꣢म् ॥१३७३॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। हे मनुष्यो ! (नरः) पौरुषवान् तुम (अरण्योः) क्रियाशील मन और बुद्धि की (दीधितिभिः) क्रियाओं से अर्थात् मन द्वारा कृत संकल्पों से और बुद्धि द्वारा कृत निश्चयों से (अग्निम्) शरीर के नेता जीवात्मा को (हस्तच्युतम्) हाथों से शत्रुओं को पराजित करनेवाला, (प्रशस्तम्) प्रशंसा का पात्र, (दूरेदृशम्) दूरदर्शी, (गृहपतिम्) देह-सदन का पालनकर्ता और (अथव्युम्) विचलित न होनेवाला (जनयत) करो ॥ द्वितीय—बिजली के पक्ष में। हे मनुष्यो ! (नरः) विद्युत्-विद्या की उन्नति करनेवाले तुम (दीधितिभिः) सूर्य-किरणों के द्वारा (अरण्योः) बिजली उत्पन्न करनेवाले यन्त्रों के (हस्तच्युतम्) संघर्षण-पूर्वक (प्रशस्तम्) उत्कृष्ट, (दूरेदृशम्) दूर तक प्रकाश करनेवाले, (गृहपतिम्) घरों के रक्षक, (अथव्युम्) गतिशील (अग्निम्) बिजली रूप अग्नि को (जनयत) उत्पन्न करो ॥१॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि संकल्प के साधन मन को और निश्चय के साधन बुद्धि को प्रयुक्त कर अपने आत्मा को जगाएँ और विद्युत्-विद्या के विशेषज्ञ शिल्पियों को चाहिए कि सूर्य-किरणों द्वारा यन्त्रों को चलाकर, बिजली उत्पन्न करके घर आदि में प्रकाश करें, बिजली के तारों द्वारा दूर समाचार भेजें तथा विमान आदि यानों को चलाएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
त꣢म꣣ग्नि꣢꣫मस्ते꣣ व꣡स꣢वो꣣꣬ न्यृ꣢꣯ण्वन्त्सुप्रति꣣च꣢क्ष꣣म꣡व꣢से꣣ कु꣡त꣢श्चित् । द꣣क्षा꣢य्यो꣣ यो꣢꣫ दम꣣ आ꣢स꣣ नि꣡त्यः꣢ ॥१३७४॥
पदार्थःप्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। (वसवः) अपने अन्दर श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभावों को निवास करानेवाले मोक्ष पथ के पथिक लोग (कुतश्चित्) जहाँ कहीं से भी (अवसे) शत्रु से अपनी रक्षा के लिए (तम्) उस (सुप्रतिचक्षम्) श्रेष्ठ द्रष्टा (अग्निम्) जीवात्मा को (अस्ते) मोक्ष-धाम में (न्यृण्वन्) भेजते हैं, (यः) जो (दक्षाय्यः) बल बढ़ानेवाला, (नित्यः) नित्य, अविनाशी जीवात्मा, मुक्ति से पूर्व (दमे) शरीररूप घर में (आस) था ॥ द्वितीय—बिजली के पक्ष में। (वसवः) विद्युत्-विद्या में निवास किये हुए शिल्पी लोग (कुतश्चित्) किसी भी भय से (अवसे) रक्षा के लिए (तम्) उस (सुप्रतिचक्षम्) शुभ प्रकाश करनेवाले (अग्निम्) बिजलीरूप अग्नि को (अस्ते) प्रत्येक निवासगृह में (न्यृण्वन्) पहुँचाते हैं, (यः) जो (दक्षाय्यः) बलवान्, (नित्यः) नित्य, बिजली रूप अग्नि (दमे) कारखाने में (आस) था ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःराष्ट्र में जैसे प्रजाजनों को अभ्युदय और निःश्रेयस का पथिक होना चाहिए, वैसे ही शिल्पियों को चाहिए कि बिजली पैदा करके प्रकाश के लिए और यन्त्र आदि को चलाने के लिए तारों द्वारा उसे घर-घर में लगा दें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
प्रे꣡द्धो꣢ अग्ने दीदिहि पु꣣रो꣡ नोऽज꣢꣯स्रया सू꣣꣬र्म्या꣢꣯ यविष्ठ । त्वा꣡ꣳ शश्व꣢꣯न्त꣣ उ꣡प꣢ यन्ति꣣ वा꣡जाः꣢ ॥१३७५॥
पदार्थःहे (यविष्ठ) अतिशय यौवनयुक्त (अग्ने) जीवात्मन् वा विद्युत् ! (प्रेद्धः) प्रदीप्त किया गया तू (अजस्रया) अक्षीण (सूर्म्या) तेजस्विता के साथ (नः पुरः) हमारे आगे (दीदिहि) चमक, (त्वाम्) तुझे (शश्वन्तः) बहुत से (वाजाः) बल (उप यन्ति) प्राप्त हैं ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा में बिजली के समान बड़ी भारी शक्ति निहित है। उसका उपयोग करके मनुष्य को तेजस्वी, प्रतापी, अग्रगन्ता और महान् होना उचित है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आत्मा सूर्यो वा| स्वर - षड्जः
आ꣡यं गौः पृश्नि꣢꣯रक्रमी꣣द꣡स꣢दन्मा꣣त꣡रं꣢ पु꣣रः꣢ । पि꣣त꣡रं꣢ च प्र꣣य꣡न्त्स्वः꣢ ॥१३७६॥
पदार्थः(अयम्) यह (पृश्निः) रंगीला (गौः) गतिमय चन्द्रलोक (आ अक्रमीत्) उदित हुआ है, जो (पुरः) पश्चिम से पूर्व की ओर (मातरम्) माता पृथिवी के चारों ओर (असदत्) गति करता है और (पितरम्) पितृस्थानीय (स्वः च) सूर्य की भी (प्रयन्) परिक्रमा करता है ॥१॥
भावार्थःचन्द्रमा पृथिवी से अलग हुआ पिण्ड है, ऐसा वैज्ञानिक लोग मानते हैं। इसलिए पृथिवी चन्द्रमा की माता है। सूर्य के प्रभाव से ही वह पिण्ड पृथिवी से अलग हुआ, इस दृष्टि से सूर्य चन्द्रमा का पिता है। चन्द्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता-करता पृथिवी के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करता है, ऐसा खगोल शास्त्रवेत्ताओं का निरीक्षण है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आत्मा सूर्यो वा| स्वर - षड्जः
अ꣣न्त꣡श्च꣢रति रोच꣣ना꣢꣫स्य प्रा꣣णा꣡द꣢पान꣣ती꣢ । व्य꣢꣯ख्यन्महि꣣षो꣡ दिव꣢꣯म् ॥१३७७
पदार्थः(अस्य) इस प्राणरूप सूर्य की (रोचना) दीप्ति अर्थात् प्रभावशक्ति (प्राणाद् अपानती) प्राणन-क्रिया के पश्चात् अपान की क्रिया करती हुई (अन्तः) शरीर के अन्दर (चरति) विचरण करती है। (महिषः) महान् प्राण (दिवम्) शरीर के मूर्धा को भी (व्यख्यत्) प्रकाशित करता है ॥२॥
भावार्थःजैसे बाह्य सौर जगत् में सूर्य ग्रह-उपग्रहों को धारण करता है,वैसे ही मानव- शरीर में जीवात्मासहित प्राण, मन, बुद्धि,मस्तिष्क, इन्द्रियों आदि को धारण करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -दशरात्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आत्मा सूर्यो वा| स्वर - षड्जः
त्रि꣣ꣳश꣢꣫द्धाम꣣ वि꣡ रा꣢जति꣣ वा꣡क्प꣢त꣣ङ्गा꣡य꣢ धीयते । प्र꣢ति꣣ व꣢स्तो꣣र꣢ह꣣ द्यु꣡भिः꣢ ॥१३७८॥
पदार्थःयह प्राण (त्रिंशद् धाम) दिन-रात के तीसों मुहूर्तों में (वि राजति) शरीर में विराजमान रहता है अर्थात् जाग्रत् अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्त अवस्था तीनों में सक्रिय रहता है, जैसा कि श्रुति है-‘प्राण अन्य सबके सो जाने पर भी खड़ा जागता रहता है’ (अथ० ११।४।२५)। इस (पतङ्गाय) श्वास-उच्छ्वास की गति से पक्षी के समान चेष्टा करनेवाले प्राण के लिए, अर्थात् प्राणयाम के काल में (वाक्) वाणी (धीयते) रोक ली जाती है, क्योंकि प्राणायाम करते हुए भाषण सम्भव नहीं है। (प्रति वस्तोः) प्रतिदिन (अह) निश्चय ही (द्युभिः) दीप्त-सूर्य-किरणों से यह प्राण बलवान् होता है ॥३॥
भावार्थःदिन-रात शरीर को धारण करता हुआ यह प्राण प्राणियों का महान् उपकार करता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मोपासना, जीवात्मा, प्राण और प्रसङ्गतः विद्युत् का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ ग्यारहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त॥ षष्ठ प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣣पप्रय꣡न्तो꣢ अध्व꣣रं꣡ मन्त्रं꣢꣯ वोचेमा꣣ग्न꣡ये꣢ । आ꣣रे꣢ अ꣣स्मे꣡ च꣢ शृण्व꣣ते꣢ ॥१३७९॥
पदार्थः(अध्वरम्) हिंसारहित ब्रह्मयज्ञ वा देवयज्ञ में (उपप्रयन्तः) जाते हुए हम (आरे) दूर (अस्मे च) और हमारे समीप (शृण्वते) प्रार्थना-वचनों को सुननेवाले (अग्नये) अग्रनायक जगदीश्वर के लिए (मन्त्रम्) वेदमन्त्र को (वोचेम) उच्चारण करें ॥१॥
भावार्थःब्रह्मयज्ञ वा देवयज्ञ करते हुए मनुष्य मन्त्रोच्चारणपूर्वक परमेश्वर के गुण-कर्म-स्वभावों का ध्यान किया करें और उससे शिक्षा-ग्रहण किया करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
यः꣡ स्नीहि꣢꣯तीषु पू꣣र्व्यः꣡ सं꣢जग्मा꣣ना꣡सु꣢ कृ꣣ष्टि꣡षु꣢ । अ꣡र꣢क्षद्दा꣣शु꣢षे꣣ ग꣡य꣢म् ॥१३८०॥
पदार्थः(पूर्व्यः) पूर्वजों से साक्षात्कार किया गया (यः) जो अग्रनायक परमेश्वर (स्नीहितीषु) वध करनेवाली (कृष्टिषु) शत्रु-प्रजाओं के (संजग्मानासु) मुठभेड़ करने पर (दाशुषे) आत्मसमर्पण करनेवाले उपासक के लिए (गयम्) आश्रय को (अरक्षत्) सुरक्षित करता है, उस [(अग्नये) अग्रनायक परमेश्वर के लिए, हम (मन्त्रं वोचेम) वेदमन्त्रों का उच्चारण करें]४ ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वरोपासक के मार्ग से सब विघ्न नष्ट हो जाते हैं, परमेश्वर उसे अपना सुरक्षित आश्रय और दिव्य सम्पदाएँ प्रदान करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣢ नो꣣ वे꣡दो꣢ अ꣣मा꣡त्य꣢म꣣ग्नी꣡ र꣢क्षतु꣣ श꣡न्त꣢मः । उ꣣ता꣢꣫स्मान्पा꣣त्व꣡ꣳह꣢सः ॥१३८१॥
पदार्थः(सः) वह (शन्तमः) अतिशय शान्तिदायक (अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (नः) हमारे (अमात्यम्) साथ रहनेवाले (वेदः) ज्ञान की वा दिव्य धन की (रक्षतु) रक्षा करे (उत) और (अहंसः) पाप से (नः) हमें (पातु) बचाये ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा में विश्वास से दिव्य गुण रक्षित होते हैं और पाप नष्ट हो जाते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣡ ब्रु꣢वन्तु ज꣣न्त꣢व꣣ उ꣢द꣣ग्नि꣡र्वृ꣢त्र꣣हा꣡ज꣢नि । ध꣣नञ्जयो꣡ रणे꣢꣯रणे ॥१३८२॥
पदार्थः(उत) और (जन्तवः) द्वितीय जन्म ग्रहण किये हुए द्विज उपासक (ब्रुवन्तु) हर्ष के साथ कहें कि यह (वृत्रहा) विघ्नविनाशक (अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (उद् अजनि) हमारे हृदय में प्रादुभूर्त हो गया है, जो (रणे-रणे) प्रत्येक देवासुरसङ्ग्राम में (धनञ्जयः) दिव्य धन प्राप्त करानेवाला है ॥४॥
भावार्थःआन्तरिक और बाह्य देवासुरसङ्ग्राम में परमेश्वर-विश्वासियों की विजय होती है और विजय से उन्हें दिव्य तथा भौतिक धन प्राप्त होते हैं ॥४॥ इस खण्ड में परमेश्वरोपासना का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ बारहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡ग्ने꣢ यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि ये तवाश्वा꣢꣯सो देव सा꣣ध꣡वः꣢ । अ꣢रं꣣ व꣡ह꣢न्त्या꣣श꣡वः꣢ ॥१३८३॥
पदार्थःहे (देव) ज्ञान से प्रकाशमान, (अग्ने) देह के अधिष्ठाता मेरे अन्तरात्मन् ! (ये तव) जो तुम्हारे (साधवः) भले (आशवः) शीघ्रगामी (अश्वासः) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय रूप घोड़े (अरम्) पर्याप्तरूप से (वहन्ति) देह-रथ को चलाते हैं, उन्हें (युङ्क्ष्व हि) कार्य में तत्पर करो ॥१॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा यदि सावधान नहीं है, तो उसके मन, इन्द्रिय आदि घोड़े कुमार्गगामी हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡च्छा꣢ नो या꣣ह्या꣡ व꣢हा꣣भि꣡ प्रया꣢꣯ꣳसि वी꣣त꣡ये꣢ । आ꣢ दे꣣वा꣡न्त्सोम꣢꣯पीतये ॥१३८४॥
पदार्थःहे अग्ने ! हे परमात्मन् ! आप (नः अच्छ) हमारी ओर (आयाहि) आओ, (वीतये) प्रगति के लिए (प्रयांसि) शान्तरसों को (अभि वह) प्राप्त कराओ, (देवान्) विद्वानों को (सोमपीतये) वीर रस के पान के लिए (आ) प्रेरित करो ॥२॥
भावार्थःसंसार में सब लोग वीर होकर शान्ति का प्रसार करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡द꣢ग्ने भारत द्यु꣣म꣡दज꣢꣯स्रेण꣣ द꣡वि꣢द्युतत् । शो꣢चा꣣ वि꣡ भा꣣ह्यजर ॥१३८५॥
पदार्थःहे (भारत) शरीर का भरण-पोषण करनेवाले, (अजर) अविनाशी (अग्ने) जीवात्मन् ! तुम (द्युमत्) शोभनीय रूप से (अजस्रेण) अविच्छिन्न तेज से (दविद्युतत्) अतिशय चमकते हुए (उत् शोच) उत्साहित होओ, (वि भाहि) विशेष यशस्वी होओ ॥३॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा जागरूक होकर मन, बुद्धि आदि का अधिष्ठातृत्व करता हुआ तेजस्वी, ब्रह्मवर्चस्वी होता हुआ अपनी कीर्ति फैलाये ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡ सु꣢न्वा꣣ना꣡यान्ध꣢꣯सो꣣ म꣢र्तो꣣ न꣡ व꣢ष्ट꣣ त꣡द्वचः꣢꣯ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢मरा꣣ध꣡स꣢ꣳ ह꣣ता꣢ म꣣खं꣡ न भृग꣢꣯वः ॥१३८६॥
पदार्थः(अन्धसः) ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस को (सुन्वानाय) अपने आत्मा के अन्दर प्रस्रुत करनेवाले मनुष्य के लिए (प्र) प्रशंसात्मक वचन कहो, (मर्तः) उससे भिन्न साधारण मनुष्य (तत् वचः) उस प्रशंसात्मक वचन का (न वष्ट) अधिकारी नहीं है। हे राज्याधिकारियो ! तुम (अराधसम्) परमेश्वर की आराधना न करनेवाले, (श्वानम्) श्वान के समान लोभ आदि में आसक्त, केवल पेट भरने में लगे हुए मनुष्य को (अपहत) विनष्ट कर दो, (भृगवः) सूर्य-किरणें (मखं न) जैसे व्याप्त अन्धकार को विनष्ट करती हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःराज्याधिकारियों को चाहिए कि जो न परमेश्वर की आराधना करता है, न दीन जनों की सेवा करता है, केवल स्वार्थ-साधन में लगा हुआ पशुओं से भी अधिक निकृष्ट जीवन बिताता है, उसे यथायोग्य दण्डित करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
आ꣢ जा꣣मि꣡रत्के꣢꣯ अव्यत भु꣣जे꣢꣫ न पु꣣त्र꣢ ओ꣣꣬ण्योः꣢꣯ । स꣡र꣢ज्जा꣣रो꣡ न योष꣢꣯णां व꣣रो꣢ न योनि꣢꣯मा꣣स꣡द꣢म् ॥१३८७॥
पदार्थः(जामिः) हमारा बन्धु परमेश्वर, हमारे द्वारा (अत्के) अन्तरात्मा में (अव्यत) लाया जा रहा है, (न) जैसे (पुत्रः) पुत्र (ओण्योः) माता-पिता की (भुजे) भुजा में लाया जाता है। वह (सरत्) हमारी ओर आ रहा है, (जारः न) जैसे सूर्य (योषणाम्) रात्रि के प्रति (सरत्) आता है और (वरः न) जैसे वर, कन्या से विवाह करके (योनिम्) घर में (आसदम्) रहने के लिए (सरत्) आता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःपुत्र के समान, पत्नी के समान और घर के समान प्रिय परमेश्वर का प्रेम और श्रद्धा से ध्यान करके स्तोता-जन परम तृप्ति तथा आनन्द पाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
स꣢ वी꣣रो꣡ द꣢क्ष꣣सा꣡ध꣢नो꣣ वि꣢꣫ यस्त꣣स्त꣢म्भ꣣ रो꣡द꣢सी । ह꣡रिः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अव्यत वे꣣धा꣡ न योनि꣢꣯मा꣣स꣡द꣢म् ॥१३८८॥
पदार्थः(सः) वह (वीरः) काम, क्रोध आदि शत्रुओं को कम्पायमान करनेवाला वीर सोम परमेश्वर (दक्षसाधनः) बल का साधक है, (यः) जो (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (तस्तम्भ) थामे हुए है। (वेधाः न) सूर्य के समान वह (हरिः) पापहर्ता परमेश्वर (योनिम्) आत्मा-रूप घर में (आसदम्) बैठने के लिए (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में (अव्यत) आता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजो बलवान् जगदीश्वर सब संसार को धारण करता है, उसकी उपासना से सीमित शक्तिवाला भी मनुष्य महान् शक्तिवाला और शत्रुओं को हराने में समर्थ हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
अ꣣भ्रातृव्यो꣢ अ꣣ना꣡ त्वमना꣢꣯पिरिन्द्र ज꣣नु꣡षा꣢ स꣣ना꣡द꣢सि । यु꣣धे꣡दा꣢पि꣣त्व꣡मि꣢च्छसे ॥१३८९॥
पदार्थःहे जीवात्मन् ! (सनात्) सदा (जनुषा) शरीरधारणरूप जन्म से तू (अभ्रातृव्यः) न शत्रुओंवाला, (अना) न नेतावाला और (अनापिः) न किसी का बन्धु (असि) है, (युधा इत्) युद्ध से ही (आपित्वम्) किसी को बन्धु वा किसी को शत्रु (इच्छसे) मानने लगता है ॥१॥
भावार्थःजब शिशु माता के गर्भ से जन्म लेता है, तब न उसका कोई शत्रु, न नेता, न ही बन्धु होता है। बड़ा होकर सांसारिक वासनाओं से वासित वह युद्ध आदि से किसी को शत्रु, किसी को नेता और किसी को बन्धु बना लेता है। युद्ध, विद्वेष आदि छोड़कर उसे सबके साथ मित्रता करके आपस में शान्ति के साथ रहना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
न꣡ की꣢ रे꣣व꣡न्त꣢ꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ विन्दसे꣣ पी꣡य꣢न्ति ते सुरा꣣꣬श्वः꣢꣯ । य꣣दा꣢ कृ꣣णो꣡षि꣢ नद꣣नु꣡ꣳ समू꣢꣯ह꣣स्या꣢꣫दित्पि꣣ते꣡व꣢ हूयसे ॥१३९०॥
पदार्थःहे इन्द्र ! हे सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! आप (रेवन्तम्) जिसके पास केवल धन है, दान, परोपकार आदि नहीं है, ऐसे मनुष्य को (सख्याय) मित्रता के लिए (न किः) कभी नहीं (विन्दसे) पाते हो। (ते) वे केवल धनवाले लोग (सुराश्वः) मदिरा-पान द्वारा प्रमत्त हुओं के समान धन के मद से प्रमत्त हुए (पीयन्ति) हिंसा करते हैं, सताते हैं। (यदा) जब, आप धनवान् को (नदनुम्) स्तोत्र नाद गुँजानेवाला स्तोता (कृणोषि) बनाते हो, तब (समूहसि) उसे उत्तम स्थिति प्राप्त करा देते हो, (आत् इत्) उसके अनन्तर उससे आप (पिता इव) पिता के समान (हूयसे) बुलाये जाते हो ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःधन पाकर जो लोग ऐश्वर्य के मद में मस्त नास्तिक होकर न सत्पात्रों में धन का दान करते हैं, न धर्माचार का सेवन करते हैं, न परमेश्वर को उपासते हैं, उनका धन धन नहीं, किन्तु उनके लिए मौत ही सिद्ध होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
आ꣡ त्वा꣢ स꣣ह꣢स्र꣣मा꣢ श꣣तं꣢ यु꣣क्ता꣡ रथे꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्म꣢युजो꣣ ह꣡र꣢य इन्द्र के꣣शि꣢नो꣣ व꣡ह꣢न्तु꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥१३९१॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (हिरण्यये) ज्योतिर्मय (रथे) वेगवान् सूर्यमण्डल में (युक्ताः) नियुक्त, (ब्रह्मयुजः) बड़े-बड़े ग्रह-उपग्रहों से जुड़नेवाली, (केशिनः) प्रकाशमान और प्रकाशक (सहस्रम्) हजार (हरयः) किरणें (सोमपीतये) परमानन्द-रस के पानके लिए (त्वा) तुझ जगदीश्वर को (आवहन्तु) हमारे समीप लाएँ, (शतं सहस्रम्) सौ हजार किरणें तुझे हमारे समीप लाएँ। सूर्य और सूर्य की किरणें दर्शकों के सामने परमात्मा की ही महिमा को प्रकाशित करती हैं, इस अभिप्राय से यह कहा गया है ॥१॥
भावार्थःअग्नि, वायु, सूर्य, तारे, बादल, नदी, समुद्र आदियों में विद्यमान विभूति को देखकर उनके निर्माता जगदीश्वर में श्रद्धा करके विद्वान् लोग उसकी उपासना से परम आनन्द का अनुभव करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
आ꣢ त्वा꣣ र꣡थे꣢ हिर꣣ण्य꣢ये꣣ ह꣡री꣢ म꣣यू꣡र꣢शेप्या । शि꣣तिपृष्ठा꣡ व꣢हतां꣣ म꣢ध्वो꣣ अ꣡न्ध꣢सो वि꣣व꣡क्ष꣢णस्य पी꣣त꣡ये꣢ ॥१३९२॥
पदार्थःहे उपासक ! (हिरण्यये) सुनहरे (रथे) रथ में (मयूरशेप्या) मोर के रंग के अर्थात् हरे-काले रंग के और (शितिपृष्ठाः) श्वेत पीठवाले (हरी) उत्कृष्ट घोड़े (त्वा) तुझे (विवक्षणस्य) जगत् के भार को वहन करनेवाले जगदीश्वर के (मध्वः) मधुर (अन्धसः) आनन्द-रस के (पीतये) पान के लिए (आ वहताम्) सार्वजनिक उपासना-गृह में पहुँचाएँ ॥२॥
भावार्थःउपासक लोग रथ में श्रेष्ठ घोड़ों को जोतकर उपासना-भवन में जाकर परमेश्वर की उपासना करके आनन्द प्राप्त करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
पि꣢बा꣣ त्व꣢३꣱स्य꣡ गि꣢र्वणः सु꣣त꣡स्य꣢ पूर्व꣣पा꣡ इ꣢व । प꣡रि꣢ष्कृतस्य र꣣सि꣡न꣢ इ꣣य꣡मा꣢सु꣣ति꣢꣫श्चारु꣣र्म꣡दा꣢य पत्यते ॥१३९३॥
पदार्थःहे (गिर्वणः) वाणियों से परमात्मा का भजन करनेवाले उपासक ! तू (परिष्कृतस्य) स्वभावतः संस्कृत, (रसिनः) रसीले (अस्य) इस (सुतस्य) अभिषुत किये गए ब्रह्मानन्द-रस का (पिब) पान कर। किस प्रकार? (पूर्वपाः इव) सूर्य से पहले भूमिष्ठ जल को पीनेवाले वायु के समान। अर्थात् जैसे वायु नदी, समुद्र आदि के जल को पीता है, वैसे ही तू ब्रह्मानन्द-रस को पी। (इयम्) यह (चारुः) रमणीय (आसुतिः) ब्रह्मानन्द-रस की धारा (मदाय) उत्साह-प्रदान के लिए (पत्यते) समर्थ है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि उपासना में मग्न होकर ब्रह्मानन्द-रस का पान करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
आ꣡ सो꣢ता꣣ प꣡रि꣢ षिञ्च꣣ता꣢श्वं꣣ न꣡ स्तोम꣢꣯म꣣प्तु꣡र꣢ꣳ रज꣣स्तु꣡र꣢म् । व꣣नप्रक्ष꣡मु꣢द꣣प्रु꣡त꣢म् ॥१३९४॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (स्तोमम्) स्तुति करने योग्य, (अप्तुरम्) प्राणों में गति देनेवाले, (रजस्तुरम्) पृथिवी, सूर्य आदि लोकों को गति देनेवाले, (वनप्रक्षम्) जंगलों को वर्षा-जल से सींचनेवाले, (उदप्रुतम्) जलों को बहानेवाले सोम-नामक परमात्मा को (आ सोत) दुहो अर्थात् उससे आनन्द-रस प्राप्त करो और उसे (अश्वं न) बादल के समान (परि सिञ्चत) चारों ओर बरसाओ ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे बादल भूमि को जल से सींचता है, वैसे ही उपासकों को चाहिए कि ब्रह्मानन्द से अपने तथा दूसरों के आत्मा को पुनः-पुनः सींचें ॥१॥
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छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
स꣣ह꣡स्र꣢धारं वृष꣣भं꣡ प꣢यो꣣दु꣡हं꣢ प्रि꣣यं꣢ दे꣣वा꣢य꣣ ज꣡न्म꣢ने । ऋ꣣ते꣢न꣣ य꣢ ऋ꣣त꣡जा꣢तो विवावृ꣣धे꣡ राजा꣢꣯ दे꣣व꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥१३९५॥
पदार्थः(ऋतजातः) सत्य में प्रसिद्ध (यः) जो सोम जगदीश्वर (ऋतेन) सत्य द्वारा (वि वावृधे) विशेषरूप से महिमा में बढ़ रहा है और जो (राजा) विश्व का सम्राट्, (देवः) प्रकाशक, (ऋतम्) सत्यस्वरूप तथा (बृहत्) महान् है, उस (सहस्रधारम्) सहस्र धाराओंवाले, (वृषभम्) मनोरथ पूर्ण करनेवाले, (पयोदुहम्) आनन्दरूप दूध को दुहनेवाले (प्रियम्) तृप्तिप्रदाता जगदीश्वर को (देवाय जन्मने) दिव्य जन्म पाने के लिए (आसोत) दुहो अर्थात् उससे आनन्दरस प्राप्त करो और उसे (परिसिञ्चत) चारों ओर सींचो। यहाँ ‘आसोत, परिसिञ्चित’ पद पूर्वमन्त्र से लाये गये हैं ॥२॥
भावार्थःआनन्दरस के भण्डार परमात्मा से आनन्द-रस परिस्रुत करके मनुष्यों को अपना आत्मा पवित्र करना चाहिए ॥२॥ इस खण्ड में जीवात्मा, परमात्मा और ब्रह्मानन्द-रस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बारहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣢र्वृ꣣त्रा꣡णि꣢ जङ्घनद्द्रविण꣣स्यु꣡र्वि꣢प꣣न्य꣡या꣢ । स꣡मि꣢द्धः शु꣣क्र꣡ आहु꣢꣯तः ॥१३९६॥
पदार्थः(विपन्यया) शिष्यों के विनय-व्यवहार से (समिद्धः) प्रोत्साहित, (शुक्रः) पवित्र हृदयवाला, (आहुतः) शिष्यों से आत्मसमर्पण किया हुआ (अग्निः) विद्या से प्रकाशित आचार्य (द्रविणस्युः) शिष्यों को विद्याधन देने का इच्छुक होता हुआ, उनके (वृत्राणि) दोषों को (जङ्घनत्) अतिशयरूप से नष्ट करे ॥१॥
भावार्थःगुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे विद्या देने के साथ-साथ शिष्यों को भी दूर करें ॥१॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ग꣡र्भे꣢ मा꣣तुः꣢ पि꣣तु꣢ष्पि꣣ता꣡ वि꣢दिद्युता꣣नो꣢ अ꣣क्ष꣡रे꣢ । सी꣡द꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ यो꣢नि꣣मा꣢ ॥१३९७॥
पदार्थःजो (मातुः) माता सावित्री के (गर्भे) गर्भ में स्थित हो चुका है, जो (पितुः) मेरे पिता का भी (पिता) द्वितीय जन्म देनेवाला है, जो (अक्षरे) अक्षर परब्रह्म में (विदिद्युतानः) विशेषरूप से प्रकाशमान है और जो (ऋतस्य) सत्य ज्ञान के (योनिम्) कारणभूत वेद के (आसीदन्) निकट स्थित है, वह (अग्निः) विद्या से प्रकाशित आचार्य, मेरे (वृत्राणि) दोषों को (जङ्घनत्) अतिशयरूप से नष्ट करे। [यहाँ अग्निः वृत्राणि, जङ्घनत् पद पूर्वमन्त्र से लाये गए हैं] ॥२॥
भावार्थःजो स्वयं सावित्री और आचार्य के गर्भ में रहकर द्विज हो चुका है, वही विद्वान् सच्चरित्र आचार्य शिष्यों को विद्वान् बनाने तथा उनके दोषों को दूर करने में समर्थ होता है ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ब्र꣡ह्म꣢ प्र꣣जा꣢व꣣दा꣡ भ꣢र꣣ जा꣡त꣢वेदो꣣ वि꣡च꣢र्षणे । अ꣢ग्ने꣣ य꣢द्दी꣣द꣡य꣢द्दि꣣वि꣢ ॥१३९८॥
पदार्थःहे (विचर्षणे) शिष्यों का हित-अहित देखनेवाले, (जातवेदः) उत्पन्न पदार्थों वा विद्याओं के ज्ञाता (अग्ने) आचार्यवर ! आप, (प्रजावत्) उत्पन्न सृष्टि के विज्ञान से युक्त (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञान को (आभर) हमें प्रदान करो, (यत्) जो (दिवि) हमारे तेजस्वी आत्मा में (दीदयत्) चमके ॥३॥
भावार्थःगुरु लोग विद्यार्थियों को सृष्टिविज्ञान, पदार्थविज्ञान, भूगोल-खगोल आदि के विज्ञान और शिल्पविज्ञान के साथ ब्रह्मविज्ञान भी सिखाएँ ॥३॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣स्य꣢ प्रे꣣षा꣢ हे꣣म꣡ना꣢ पू꣣य꣡मा꣢नो दे꣣वो꣢ दे꣣वे꣢भिः꣢ स꣡म꣢पृक्त꣣ र꣡स꣢म् । सु꣣तः꣢ प꣣वि꣢त्रं꣣ प꣡र्ये꣢ति꣣ रे꣡भ꣢न्मि꣣ते꣢व꣣ स꣡द्म꣢ पशु꣣म꣢न्ति꣣ हो꣡ता꣢ ॥१३९९॥
पदार्थः(अस्य) इस पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक अन्तर्यामी जगदीश्वर की (प्रेषा) प्रेरणा से और (हेमना) ज्योति से (पूयमानः) पवित्र किया जाता हुआ (देवः) प्रकाशक वा तापमय सूर्य (देवेभिः) प्रकाशक वा सन्तापक किरणों द्वारा (रसम्) भूमि के जल से (समपृक्त) सम्पर्क करता है। (सुतः) भाप बनाकर ऊपर प्रेरित किया हुआ तथा मेघ के आकार को प्राप्त हुआ वह जल (रेभन्) विद्युद्गर्जना करता हुआ (पवित्रम्) अन्तरिक्ष में (पर्येति) परिभ्रमण करता है, (इव) जैसे (होता) होता नामक ऋत्विज् (मिता) निर्माण किये हुए (पशुमन्ति) धेनुओं से युक्त (सद्म) गो-सदनों में, गोदुग्ध पाने के लिए (पर्येति) चक्कर काटा करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजो यह सूर्य अपने ताप से भूमि पर स्थित जल को भाप बनाकर अन्तरिक्ष में बादलों को रचता और बरसाता है, वह सब परमेश्वर की ही महिमा है ॥१॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
भ꣣द्रा꣡ वस्त्रा꣢꣯ सम꣣न्या꣢३꣱व꣡सा꣢नो म꣣हा꣢न्क꣣वि꣢र्नि꣣व꣡च꣢नानि꣣ श꣡ꣳस꣢न् । आ꣡ व꣢च्यस्व च꣣꣬म्वोः꣢꣯ पू꣣य꣡मा꣢नो विचक्ष꣣णो꣡ जागृ꣢꣯विर्दे꣣व꣡वी꣢तौ ॥१४००॥
पदार्थःहे मानव ! (समन्या) सङ्ग्राम के योग्य, (भद्रा) उत्तम (वस्त्रा) वस्त्रों को (वसानः) पहनता हुआ, (महान्) महान् (कविः) विद्वान्, (निवचनानि) स्तोत्रों का (शंसन्) कीर्तन करता हुआ, (चम्वोः) आत्मा और मन में (पूयमानः) पवित्र किया जाता हुआ, (विचक्षणः) दूरद्रष्टा, (देववीतौ) परमात्मा की पूजा में (जागृविः) जागरूक तू (आवच्यस्व) चारों ओर प्रशंसा प्राप्त कर ॥२॥
भावार्थःविघ्नों और विपदाओं से भरे होने के कारण सङ्ग्राम-तुल्य जीवन में मनुष्य हृदय में वीर-भाव रखकर, वीरोचित वेशभूषा आदि धारण कर, वीरोचित कार्यों को करता हुआ, जागरूक, पवित्र मनवाला परमेश्वर का पूजक होता हुआ यशस्वी बने ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
स꣡मु꣢ प्रि꣣यो꣡ मृ꣢ज्यते꣣ सा꣢नौ꣣ अ꣡व्ये꣢ य꣣श꣡स्त꣢रो य꣣श꣢सां꣣ क्षै꣡तो꣢ अ꣣स्मे꣢ । अ꣣भि꣡ स्व꣢र꣣ ध꣡न्वा꣢ पू꣣य꣡मा꣢नो यू꣣यं꣡ पा꣢त स्व꣣स्ति꣢भिः꣣ स꣡दा꣢ नः ॥१४०१॥
पदार्थःहे विद्वन् ! (क्षैतः) भूमि के निवासी, (यशसाम्) यशस्वियों के मध्य (यशस्तरः) अत्यधिक यशस्वी, (प्रियः) सबके प्रिय आप (अस्मे) हमारे लिए (अव्ये सानौ) राष्ट्र भूमि के उच्चपद पर (संमृज्यते उ) अलङ्कृत वा अभिषिक्त किये जा रहे हो। (पूयमानः) पवित्र किये जाते हुए आप (धन्व) अन्तरिक्ष को (अभि स्वर) जयघोषों से गुँजा दो। हे विद्वानो ! (यूयम्) आप लोग (स्वस्तिभिः) कल्याणों से (नः) हम राष्ट्रवासियों की (सदा) हमेशा (पात) रक्षा करते रहो ॥३॥
भावार्थःराष्ट्र में पवित्र आचरणवाले विद्वानों को ही उच्च पदों पर प्रतिष्ठित करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ए꣢तो꣣ न्वि꣢न्द्र꣣ꣳ स्त꣡वा꣢म शु꣣द्ध꣢ꣳ शु꣣द्धे꣢न꣣ सा꣡म्ना꣢ । शु꣣द्धै꣢रु꣣क्थै꣡र्वा꣢वृ꣣ध्वा꣡ꣳस꣢ꣳ शु꣣द्धै꣢रा꣣शी꣡र्वा꣢न्ममत्तु ॥१४०२॥
पदार्थःहे साथियो ! (एत उ) आओ, (नु) शीघ्र ही, तुम और हम मिलकर (शुद्धेन साम्ना) शुद्ध स्तोत्र से (शुद्धम्) शुद्ध (इन्द्रम्)परमात्मा, आचार्य वा राजा के (स्तवाम) गुणों का वर्णन करें। (शुद्धैः उक्थैः) शुद्ध स्तोत्रों वा वेदपाठों से (वावृध्वांसम्) वृद्धि को प्राप्त प्रत्येक स्तोता, शिष्य वा प्रजाजन को (अशीर्वान्) आशीर्वादों वा गोदुग्धों का अधिपति वह परमात्मा, आचार्य वा राजा (शुद्धैः) शुद्ध आशीर्वादों वा शुद्ध गोदुग्धों से (ममत्तु) आनन्दित करे ॥१॥
भावार्थःस्तुति किये गये परमेश्वर, आचार्य और राजा स्तोताओं को आशीर्वाद देकर और दूध, घी आदि ऐश्वर्य देकर बढ़ाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣡न्द्र꣢ शु꣣द्धो꣢ न꣣ आ꣡ ग꣢हि शु꣣द्धः꣢ शु꣣द्धा꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ । शु꣣द्धो꣢ र꣣यिं꣡ नि धा꣢꣯रय शु꣣द्धो꣡ म꣢मद्धि सोम्य ॥१४०३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमेश्वर, आचार्य वा राजन् ! (शुद्धः) शुद्ध आप (नः) हमारे पास (आ गहि) आओ, (शुद्धः) शुद्ध आप(शुद्धाभिः) शुद्ध (ऊतिभिः) रक्षाओं के साथ आओ। (शुद्धः) शुद्ध आप, हमें (रयिम्) आध्यात्मिक वा भौतिक ऐश्वर्य (नि धारय) प्राप्त कराओ। (शुद्धः) शुद्ध आप, हे (सोम्य) सौम्य परमेश्वर, आचार्य वा राजन् ! (अस्मान्) हमें (ममद्धि)आनन्दित करो ॥२॥
भावार्थःजो स्वयं ज्ञान, शरीर, मन, वचन और कर्म से शुद्ध है, वही दूसरों को शुद्ध कर सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣡न्द्र꣢ शु꣣द्धो꣡ हि नो꣢꣯ र꣣यि꣢ꣳ शु꣣द्धो꣡ रत्ना꣢꣯नि दा꣣शु꣡षे꣢ । शु꣣द्धो꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ जिघ्नसे शु꣣द्धो꣡ वाज꣢꣯ꣳ सिषाससि ॥१४०४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर, आचार्य वा राजन् ! (शुद्धः हि) शुद्ध आप (नः) हमें (रयिम्) विद्या, धन, धान्य, आरोग्य आदि का ऐश्वर्य देते हो। (शुद्धः) पवित्र आप (दाशुषे) आत्मसमर्पण करनेवाले वा परोपकार करनेवाले को (रत्नानि) अहिंसा, सत्य आदि रत्नों को वा भौतिक रत्नों को देते हो। (शुद्धः) शुद्ध आप (वृत्राणि) विघ्न, दोष वा शत्रुओं को (जिघ्नसे) नष्ट करते हो। (शुद्धः) शुद्ध आप (वाजम्) बल (सिषाससि) देना चाहते हो ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर, आचार्य और राजा ज्ञान, कर्म और चरित्र से शुद्ध होते हुए ही विद्या, सत्य, अहिंसा, आरोग्य, धन, बल आदि देने और विघ्न, दोष, शत्रु आदि का विनाश करने में समर्थ होते हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा की महिमा तथा आचार्य और राजा के गुण-कर्मों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बारहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्ने꣡ स्तोमं꣢꣯ मनामहे सि꣣ध्र꣢म꣣द्य꣡ दि꣢वि꣣स्पृ꣡शः꣢ । दे꣣व꣡स्य꣢ द्रविण꣣स्य꣡वः꣢ ॥१४०५॥
पदार्थः(द्रविणस्यवः) धन और बल की कामनावाले हम (अद्य) आज (दिविस्पृशः) तेज में प्रवेश करानेवाले, (देवस्य) तेजस्वी (अग्नेः)अग्रनायक परमात्मा के (सिध्रम्) स्वभाव-सिद्ध (स्तोमम्) गुण-समूह का (मनामहे) बार-बार गान करते हैं ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से और उसके गुणगान से मनुष्य आध्यात्मिक ऐश्वर्य तथा आत्मबल प्राप्त कर लेता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣡र्जु꣢षत नो꣣ गि꣢रो꣣ हो꣢ता꣣ यो꣡ मानु꣢꣯षे꣣ष्वा꣢ । स꣡ य꣢क्ष꣣द्दै꣢व्यं꣣ ज꣡न꣢म् ॥१४०६॥
पदार्थः(अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (नः) हमारी (गिरः) स्तुति वा प्रार्थना की वाणियों को (जुषत) स्वीकार करे, (यः) जो परमेश्वर (मानुषेषु) मनुष्यों में (होता) उनके जीवन-यज्ञ का होता बनकर (आ) निवास कर रहा है। (सः) वह (दैव्यम्) दिव्यगुणों में निष्णात (जनम्) विद्वान् जन को (यक्षत्) हमें प्रदान करे ॥२॥
भावार्थःजिस राष्ट्र में दिव्य गुणों से युक्त विद्वान् मनुष्य होते हैं, वह राष्ट्र अत्यन्त उन्नत होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
त्व꣡म꣢ग्ने स꣣प्र꣡था꣢ असि꣣ जु꣢ष्टो꣣ हो꣢ता꣣ व꣡रे꣢ण्यः । त्व꣡या꣢ य꣣ज्ञं꣡ वि त꣢꣯न्वते ॥१४०७॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक तेजस्वी परमात्मन् ! आप (सप्रथाः) यशस्वी, (जुष्टः) प्रिय, (होता) सुखप्रदाता और (वरेण्यः) सबसे वरण करने योग्य (असि) हो। उपासक लोग (त्वया) आपकी सहायता से (यज्ञम्) जीवन-यज्ञ को (वितन्वते) फैलाते हैं ॥३॥
भावार्थःमनुष्य अपने जीवनरूप यज्ञ को परम यशस्वी परमेश्वर के सहयोग से ही पूर्ण कर सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣भि꣡ त्रि꣢पृ꣣ष्ठं꣡ वृष꣢꣯णं वयो꣣धा꣡म꣢ङ्गो꣣षि꣡ण꣢मवावशन्त꣣ वा꣡णीः꣢ । व꣢ना꣣ व꣡सा꣢नो꣣ व꣡रु꣢णो꣣ न꣢꣫ सिन्धु꣣र्वि꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ द꣢यते꣣ वा꣡र्या꣢णि ॥१४०८॥
पदार्थःप्रथम—राजा के पक्ष में। (वाणीः) प्रजाओं की वाणियाँ (त्रिपृष्ठम्) प्रजा, सभा-समिति और सेना इन तीन पृष्ठोंवाले, (वृषभम्) बलवान् वा सुखवर्षीं, (वयोधाम्) अन्न प्रदान करनेवाले, (अङ्गोषिणम्) राज्य के सब अङ्गों में व्याप्त होनेवाले राजा को (अभि अवावशन्त) प्रशंसित करती हैं। (वना) जंगलों को (वसानः) आच्छादित करते हुए (वरुणः न) अग्नि के समान (वना) तेजों को (वसानः) धारण करता हुआ वह राजा (सिन्धुः) समुद्र के समान (रत्नधाः) रत्नों को धारण करनेवाला होता हुआ (वार्याणि) वरणीय रत्नों अर्थात् रमणीय ऐश्वर्यों को (वि दयते) विशेषरूप से प्रजाओं को प्रदान करता है ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (वाणीः) वेदवाणियाँ (त्रिपृष्ठम्) ज्ञान, कर्म, उपासना रूप तीन पृष्ठोंवाले, (वृषणम्) बलवान् वा बल बरसानेवाले, (वयोधाम्) आयु को धारण करनेवाले, (अङ्गोषिणम्) ईश-स्तुति करनेवाले जीवात्मा की (अभि अवावशन्त) स्तुति करती हैं अर्थात् महत्ता वर्णन करती हैं, ‘तू विद्वान् है, वर्चस्वी है, शरीर-रक्षक है। श्रेष्ठों से मिल, बराबरवालों से आगे बढ़ (अथ० २।११।४)’ । आदि मन्त्रों से आत्मा को उद्बोधन देती हैं। (वरुणः न) सूर्य के समान (वना) तेजों को (वसानः) धारण करता हुआ, (सिन्धुः) रत्नों के खजाने समुद्र के समान (रत्नधाः) रमणीय सद्गुणरूप रत्नों को धारण करनेवाला वह सोम जीवात्मा (वार्याणि) निवारण करने योग्य विघ्न आदियों को (विदयते) विशेषरूप से विनष्ट कर देता है ॥१॥ यहाँ श्लेष, श्लिष्टोपमा और लुप्तोपमा अलङ्कार हैं ॥१॥
भावार्थःजो राजा प्रजाओं का अनुरञ्जन करता है, प्रजा भी उसके गुणगान करती है। वैसे ही जो देहधारी जीवात्मा अपनी शक्ति को पहचानकर अपने तेजों से सब आन्तरिक और बाह्य विघ्नों का उन्मूलन करता है, वह सर्वत्र विजयलाभ करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
शू꣡र꣢ग्रामः꣣ स꣡र्व꣢वीरः꣣ स꣡हा꣢वा꣣ञ्जे꣡ता पवस्व꣣ स꣡नि꣢ता꣣ ध꣡ना꣢नि । ति꣣ग्मा꣡यु꣢धः क्षि꣣प्र꣡ध꣢न्वा स꣣म꣡त्स्वषा꣢꣯ढः सा꣣ह्वा꣡न्पृत꣢꣯नासु꣣ श꣡त्रू꣢न् ॥१४०९॥
पदार्थःप्रथम—राजा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् वीर राजन् ! (शूरग्रामः) शूर योद्धा-गणवाले, (सर्ववीराः) सब वीर प्रजाओंवाले, (सहावान्) सहनशील, (जेता) विजयशील, (धनानि) ऐश्वर्यों के (सनिता) दाता, (तिग्मायुधः) तीक्ष्ण शस्त्रास्त्रोंवाले, (क्षिप्रधन्वा) शीघ्र धनुषवाले, (समत्सु) युद्धों में (अषाढः) परास्त न होनेवाले, (पृतनासु) शत्रु-सेनाओं में (शत्रून्) शत्रुओं को (साह्वान्) पराजित करनेवाले आप (पवस्व) पराक्रम दिखाओ ॥ द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। हे सोम जीवात्मन् ! (शूरग्रामः) शूर प्राण-गणवाला, (सर्ववीरः) जिसके मन, बुद्धि आदि सब वीर हैं ऐसा, (सहावान्) उत्साही, (जेता) विजयशील, (धनानि) सद्गुणरूप ऐश्वर्यों को (सनिता) प्राप्त करनेवाला, (तिग्मायुधः) तीक्ष्ण शत्रुदाहक तेजोंवाला, (क्षिप्रधन्वा) वेग से चलनेवाले प्रणव-जपरूप धनुषवाला, (समत्सु) आन्तरिक देवासुर संग्रामों में (अषाढः) पराजित न होनेवाला, (पृतनासु) काम, क्रोध आदि की सेनाओं में (शत्रून्) शत्रुओं को (साह्वान्) पराजित करनेवाला तू (पवस्व) क्रियाशील हो अथवा स्वयं को पवित्र रख ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है। विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार भी है। ऐसे विलक्षण गुणों से सुशोभित भी तू यदि विक्रम नहीं दिखाता, क्रियाशील नहीं होता अथवा पवित्र आचरण नहीं रखता, तो ये गुण भारस्वरूप ही होंगे, यह आशय है ॥२॥
भावार्थःदेह में मनुष्य का आत्मा और राष्ट्र में राजा यदि शत्रुओं को पराजित करके योगक्षेम करते हैं, तो देह और राष्ट्र का स्वराज्य अक्षुण्ण रहता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
उ꣣रु꣡ग꣢व्यूति꣣र꣡भ꣢यानि कृ꣣ण्व꣡न्त्स꣢मीची꣣ने꣡ आ प꣢꣯वस्वा꣣ पु꣡र꣢न्धी । अ꣣पः꣡ सिषा꣢꣯सन्नु꣣ष꣢सः꣣ स्व꣢ऽ३र्गाः꣡ सं चि꣢꣯क्रदो म꣣हो꣢ अ꣣स्म꣢भ्यं꣣ वा꣡जा꣢न् ॥१४१०॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् सर्वान्तर्यामी परमात्मन् ! (उरुगव्यूतिः) विस्तीर्ण मार्ग या कार्यक्षेत्रवाले, सबको (अभयानि) निर्भय (कृण्वन्) करनेवाले आप (समीचीने) आपस में सङ्गति रखनेवाले (पुरन्धी) द्युलोक तथा भूलोक को और देहपुरी के धारणकर्ता प्राण-अपान को (आ पवस्व) पवित्र करो। (अपः) जलों को, (उषसः) उषाओं को (स्वः) सूर्य को और (गाः) भूमियों को (सिषासन्) देनेवाले आप (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (महः वाजान्) महान् अन्न, धन, बल आदि को (सं चिक्रदः) बुलाते हो, प्रदान करते हो ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् प्रजापालक राजन् ! (उरुगव्यूतिः) राष्ट्र में यातायात के लिए चौड़े मार्ग बनवानेवाले और उन मार्गों पर (अभयानि) निर्भयता (कृण्वन्) करनेवाले आप (समीचीने) भली-भाँति कार्य में तत्पर (पुरन्धी) स्त्री-पुरुषों को (आ पवस्व) सहायता के लिए प्राप्त होओ। आप (अपः) नदी, प्रपात आदि के जलों को, (उषसः) बिजलियों को, (स्वः) सूर्य, को और (गाः) भूमियों को (सिषासन्) उपयोग में लाने की योजनाएँ बनाते हुए (अस्मभ्यम्) हम प्रजाओं के लिए (महः वाजान्) महान्, अन्न, धन आदि (संचिक्रदः) बुलाओ, प्राप्त कराओ ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर ने हमारे लिए भूमि, जल, वायु बिजली, सूर्य-किरणें आदि पदार्थ बिना मूल्य के दिये हुए हैं। राजा का कर्तव्य है कि उनका शिल्पकार्यों में उपयोग करके राष्ट्रवासियों को सुखी करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्व꣡मि꣢न्द्र य꣣शा꣡ अ꣢स्यृजी꣣षी꣡ शव꣢꣯स꣣स्प꣡तिः꣢ । त्वं꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ हꣳस्यप्र꣣ती꣢꣫न्येक꣣ इ꣢त्पु꣣र्व꣡नु꣢त्तश्चर्षणी꣣धृ꣡तिः꣢ ॥१४११॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमात्मन्, राजन् व आचार्य ! (त्वम्) आप (यशाः) यशस्वी, (ऋजीषी) सरल नीतिवाले और (शवसः पतिः) आत्मबल, देहबल वा विद्याबल के स्वामी (असि) हो। (एकः इत्) अद्वितीय ही (त्वम्) आप (पुरु) बहुत से (अप्रतीनि) अप्रतिद्वन्द्वी अज्ञान, पाप, दुःख, दुर्व्यसन आदि को (हंसि) विनष्ट करते हो। हे परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! आप (अनुत्तः) किसी से प्रेरित किये बिना, स्वतः ही (चर्षणीधृतिः) मनुष्यों को धारण करनेवाले होते हो ॥१॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर संसार का उपकार करनेवाले अपने कार्यों से यशस्वी होता हुआ सरल नीति से सब दोष, दुःख, दुर्व्यसन आदि को नष्ट करता है, वैसे ही राजा और गुरु को करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
त꣡मु꣢ त्वा नू꣣न꣡म꣢सुर꣣ प्र꣡चे꣢तस꣣ꣳ रा꣡धो꣢ भा꣣ग꣡मि꣢वेमहे । म꣣ही꣢व꣣ कृ꣡त्तिः꣢ शर꣣णा꣡ त꣢ इन्द्र꣣ प्र꣡ ते꣢ सु꣣म्ना꣡ नो꣢ अश्नवन् ॥१४१२॥
पदार्थःहे (असुर) प्रशस्त प्राणोंवाले वा दोषों को दूर करनेवाले परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! (प्रचेतसम्) प्रकृष्ट चित्तवाले (तम् उ त्वा) उन प्रसिद्ध आपसे (नूनम्) निश्चय ही, हम (राधः) दिव्य और भौतिक ऐश्वर्य वा विद्या आदि धन (ईमहे) माँगते हैं, (भागम् इव) जैसे पुत्र पिता से दायभाग माँगता है। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! (ते) आपकी (कृत्तिः) कीर्ति और (शरणा) शरण (मही इव) महती पृथिवी के समान विशाल है। (ते) आपके (सुम्ना) सुख (नः) हमें (अश्नवन्) प्राप्त हों। यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर यशस्वी, शरणप्रदाता, सुखदाता, दोष दूर करनेवाला, प्राणदाता और धनदाता है, वैसे ही राजा और आचार्य को होना चाहिए ॥२॥
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छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुबुष्णिक्, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
य꣡जि꣢ष्ठं त्वा ववृमहे दे꣣वं꣡ दे꣢व꣣त्रा꣡ होता꣢꣯र꣣म꣡म꣢र्त्यम् । अ꣣स्य꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ सु꣣क्र꣡तु꣢म् ॥१४१३॥
पदार्थःहे अग्नि अर्थात् तेजस्वी विद्वन् ! (यजिष्ठम्) अतिशय परमेश्वरपूजक वा पञ्चमहायज्ञों को करनेवाले, (देवत्रा देवम्) ज्ञान के प्रकाशक विद्वानों में भी विशिष्ट विद्वान् (होतारम्) सुख-प्रदाता, (अमर्त्यम्) यशःशरीर से अमर, (अस्य यज्ञस्य) इस विद्या-यज्ञ के (सुक्रतुम्) सुकर्ता (त्वा) आपको, हम विद्यार्थी (ववृमहे) आचार्यरूप में वरण करते हैं ॥१॥
भावार्थःआस्तिक, याज्ञिक, चरित्रवान्, शिक्षण-कला में कुशल विद्वान् मनुष्य को ही पढ़ाने के काम में लगाना चाहिए ॥१॥
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छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुबुष्णिक्, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣣पां꣡ नपा꣢꣯तꣳ सु꣣भ꣡ग꣢ꣳ सु꣣दी꣡दि꣢तिम꣣ग्नि꣢मु꣣ श्रे꣡ष्ठ꣢शोचिषम् । स꣡ नो꣢ मि꣣त्र꣢स्य꣣ व꣡रु꣢णस्य꣣ सो꣢ अ꣣पा꣢꣫मा सु꣣म्नं꣡ य꣢क्षते दि꣣वि꣢ ॥१४१४॥
पदार्थः(अपाम्) उत्कृष्ट प्राणों वा उत्कृष्ट कर्मों को (नपातम्) अधःपतित न करनेवाले, (सुभगम्) अत्यधिक यशस्वी, (सुदीदितिम्) उत्कृष्ट तेज देनेवाले, (श्रेष्ठशोचिषम्) उत्तम तेज से युक्त (अग्निम् उ) मार्गदर्शक परमात्मा, राजा वा आचार्य को, हम (ववृमहे) वरण करते हैं। (सः) वह परमात्मा राजा वा आचार्य (मित्रस्य) सूर्य वा प्राण के, (वरुणस्य) वायु, बिजली वा अपान के (सः) वह परमात्मा राजा वा आचार्य (अपाम्) जलों के, व्याप्त लोकों के वा प्राणों के (सुम्नम्) सुख व सुखदायक ज्ञान को (नः) हमारे (दिवि) तेजोमय जीवात्मा में (आ यक्षते) प्राप्त कराये। [यहाँ ‘ववृमहे’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है] ॥२॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर सबकी उन्नति करनेवाला, यशस्वी, तेजस्वी, तेज देनेवाला, सुखदाता और ज्ञानप्रदाता है, वैसे ही राजा और आचार्य को भी होना चाहिये ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा, राजा और आचार्य के गुणों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बारहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣡म꣢ग्ने पृ꣣त्सु꣢꣫ मर्त्य꣣म꣢वा꣣ वा꣡जे꣢षु꣣ यं꣢ जु꣣नाः꣢ । स꣢꣫ यन्ता꣣ श꣡श्व꣢ती꣣रि꣡षः꣢ ॥१४१५॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक, तेजस्वी, सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! आप (यं मर्त्यम्) जिस मनुष्य की (पृत्सु) देवासुरसंग्रामों में (अवाः) रक्षा करो, (यम्) और जिसे (वाजेषु) आत्मिक,शारीरिक तथा सामाजिक बल की प्राप्ति के लिए (जुनाः) प्रेरित करो, (सः) वह (शश्वतीः) बहुत सी (इषः) अध्यात्म सम्पदाओं को (यन्ता) प्राप्त कर ले ॥१॥
भावार्थःमनुष्य को विजय के लिए और ऐहिक तथा पारलौकिक समृद्धि के लिए अपने पुरुषार्थ के अतिरिक्त परमात्मा की कृपा भी अपेक्षित होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
न꣡ कि꣢रस्य सहन्त्य पर्ये꣣ता꣡ कय꣢꣯स्य चित् । वा꣡जो꣢ अस्ति श्र꣣वा꣡य्यः꣢ ॥१४१६॥
पदार्थःहे (सहन्त्य) शत्रुओं को तिरस्कृत करनेवाले अग्रणी परमात्मन् ! (कयस्य चित्) युद्ध विद्या के ज्ञाता (अस्य) इस आपके स्तोता को (पर्येता) घेरनेवाला वा उस पर आक्रमण करनेवाला (न किः) कोई नहीं होता, प्रत्युत (वाजः) युद्ध (श्रवाय्यः) उसका यश फैलानेवाला (अस्ति) होता है ॥२॥
भावार्थःजिस पर जगदीश्वर कृपा करता है, उसे युद्ध में कोई भी हरा नहीं सकता, अपितु वह विजयश्री को प्राप्त करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣡ वाजं꣢꣯ वि꣣श्व꣡च꣢र्षणि꣣र꣡र्व꣢द्भिरस्तु꣣ त꣡रु꣢ता । वि꣡प्रे꣢भिरस्तु꣣ स꣡नि꣢ता ॥१४१७॥
पदार्थः(विश्वचर्षणिः) सब मनुष्यों पर अनुग्रह करनेवाला (सः) वह अग्रणी जगदीश्वर (अर्वद्भिः) आक्रमणकारी क्षत्रिय योद्धाओं द्वारा (वाजम्) संग्राम को (तरुता) पार करानेवाला (अस्तु) होवे और (विप्रेभिः) मेधावी ब्राह्मणों द्वारा (सनिता) ज्ञान आदि को देनेवाला (अस्तु) होवे ॥३॥
भावार्थःनिराकार परमेश्वर ब्राह्मणों के माध्यम से ज्ञान का दान, क्षत्रियों के माध्यम से रक्षा, वैश्यों के माध्यम से पोषक पदार्थों का दान करता हुआ मनुष्यों का उपकार करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
सा꣣कमु꣡क्षो꣢ मर्जयन्त꣣ स्व꣡सा꣢रो꣣ द꣢श꣣ धी꣡र꣢स्य धी꣣त꣢यो꣣ ध꣡नु꣢त्रीः । ह꣢रिः꣣ प꣡र्य꣢द्रव꣣ज्जाः꣡ सूर्य꣢꣯स्य꣣ द्रो꣡णं꣢ ननक्षे꣣ अ꣢त्यो꣣ न꣢ वा꣣जी꣢ ॥१४१८॥
पदार्थः(धीरस्य) ध्यान में संलग्न जीवात्मा को (साकमुक्षः) एक साथ ज्ञान से सींचनेवाली, (स्वसारः) बहिनों के समान प्रिय, (धनुत्र्यः) तृप्ति प्रदान करनेवाली (दश) दस (धीतयः) चार वेद और छह वेदाङ्गरूप प्रज्ञाएँ (मर्जयन्त) शुद्ध करती हैं। तब (सूर्यस्य) सूर्य के समान प्रकाशमान और प्रकाशक परमात्मा का (जाः) पुत्र (हरिः) जीवात्मा (पर्यद्रवत्) परमात्मा को पाने के लिए सक्रिय हो जाता है और (अत्यः न) घोड़े के समान (वाजी) वेगवान् वह (द्रोणम्) प्राप्तव्य उस अपने पिता परमात्मा को (ननक्षे) पा लेता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है। द्वितीय चरण में धकार का और चतुर्थ में नकार का अनुप्रास है ॥१॥
भावार्थःवेद-वेदाङ्गों को आचार्य से भलीभाँति पढ़कर ज्ञानी और अत्यन्त निर्मल अन्तःकरणवाला जीव अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
सं꣢ मा꣣तृ꣢भि꣣र्न꣡ शिशु꣢꣯र्वावशा꣣नो꣡ वृषा꣢꣯ दधन्वे पुरु꣣वा꣡रो꣢ अ꣣द्भिः꣢ । म꣢र्यो꣣ न꣡ योषा꣢꣯म꣣भि꣡ नि꣢ष्कृ꣣तं꣡ यन्त्सं ग꣢꣯च्छते क꣣ल꣡श꣢ उ꣣स्रि꣡या꣢भिः ॥१४१९॥
पदार्थः(वावशानः) माँ को चाहता हुआ (शिशुः) शिशु (मातृभिः न) जैसे माताओं से धारण किया जाता है, वैसे ही (वावशानः) परमात्मा को चाहता हुआ, (वृषा) उसे अपने प्रेम से सींचनेवाला, (पुरुवारः) बहुत-से सद्गुणों को वरनेवाला सोम जीवात्मा (अद्भिः) परमात्मा के पास से आयी हुई आनन्द-धाराओं से (सं दधन्वे) भली-भाँति धारण किया जाता है और (मर्यः न) मर्त्य पुरुष जैसे (योषाम् अभि) पत्नी के प्रति प्रेम से जाता है, वैसे ही (निष्कृतम् अभि) श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभावों से अलङ्कृत परमात्मा के प्रति (यन्) जाता हुआ वह (कलशे) आनन्द की कलाओं से परिपूर्ण मोक्षधाम में (संगच्छते) सङ्गत हो जाता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के प्रति उत्कट प्रेम और उत्कट श्रद्धा उसकी प्राप्ति में बड़े कारण बनते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
उ꣣त꣡ प्र पि꣢꣯प्य꣣ ऊ꣢ध꣣र꣡घ्न्या꣢या꣣ इ꣢न्दु꣣र्धा꣡रा꣢भिः सचते सुमे꣣धाः꣢ । मू꣣र्धा꣢नं꣣ गा꣢वः꣣ प꣡य꣢सा च꣣मू꣢ष्व꣣भि꣡ श्री꣢णन्ति꣣ व꣡सु꣢भि꣣र्न꣢ नि꣣क्तैः꣢ ॥१४२०॥
पदार्थः(उत) और, जीवात्मा-रूपी बछड़े को देखकर (अघ्न्यायाः) जगन्मातारूपिणी दुधारू गाय का (ऊधः) उधस् (प्र पिप्ये) आनन्दरूप दूध से जब बढ़ जाता है, तब (सुमेधाः) उत्कृष्ट मेधावाला (इन्दुः) जीवात्मा-रूपी बछड़ा (धाराभिः) आनन्द की धारों से (सचते) संयुक्त हो जाता है। (गावः) ज्ञानेन्द्रिय-रूप गौएँ (पयसा) ज्ञानरूप दूध से (मूर्धानम्) शरीर के प्रधान जीवात्मा को (चमूषु) प्राण-रूप पतीलों में (अभि श्रीणन्ति) परिपक्व करती हैं, (न) जैसे (निक्तैः) शुद्ध (वसुभिः) सूर्यकिरणों से फल आदि पकते हैं ॥३॥ यहाँ उपमा और निगरणरूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे बछड़ा अपनी माँ गाय का दूध पीता है, वैसे ही उपासक जगन्माता के आनन्द-रस का पान करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
पि꣡बा꣢ सु꣣त꣡स्य꣢ र꣣सि꣢नो꣣ म꣡त्स्वा꣢ न इन्द्र꣣ गो꣡म꣢तः । आ꣣पि꣡र्नो꣢ बोधि सध꣣मा꣡द्ये꣢ वृ꣣धे꣢३꣱ऽस्मा꣡ꣳ अ꣢वन्तु ते꣣ धि꣡यः꣢ ॥१४२१॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्नों के विनाशक सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! आप (रसिनः) रसीले (सुतस्य) प्रकट हुए मेरे प्रेमरस का (पिब) पान करो, (गोमतः) गाय आदि के ऐश्वर्यों से युक्त (नः) हम लोगों को (मत्स्व) आनन्दित करो। (सधमादे) सहयात्रा में (वृधे) बढ़ाने के लिए (आपिः) बन्धु बने हुए आप (नः) हमें (बोधि) बोध दो। (ते) आपके (धियः) प्रज्ञा और कर्म(अस्मान्) हम उपासकों की (अवन्तु) रक्षा करें ॥१॥
भावार्थःयदि हम परमात्मा से स्नेह करते हैं तो वह भी हमसे स्नेह करता है और सद्बुद्धि, सत्कर्म आदि देकर हमारा उपकार करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
भू꣣या꣡म꣢ ते सुम꣣तौ꣢ वा꣣जि꣡नो꣢ व꣣यं꣡ मा न꣢꣯ स्तर꣣भि꣡मा꣢तये । अ꣣स्मा꣢न् चि꣣त्रा꣡भि꣢रवताद꣣भि꣡ष्टि꣢भि꣣रा꣡ नः꣢ सु꣣म्ने꣡षु꣢ यामय ॥१४२२॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! (वयम्) आपके उपासक हम (वाजिनः) बलवान् होते हुए ( ते) आपकी (सुमतौ) सुमति में (भूयाम) होवें, अर्थात् आपसे मिलनेवाली सुमति के पात्र बनें। आप (नः) हमें (अभिमातये) अभिमान के (मा स्तः) वशीभूत मत होने दो। (अस्मान्) हम स्तोताओं की (चित्राभिः) अद्भुत (अभिष्टिभिः) अभीष्ट आध्यात्मिक और भौतिक सम्पत्तियों से (अवतात्) रक्षा करो। साथ ही (नः) हमें (सुम्नेषु) दिव्य आनन्दों में (आ यामय) रमाओ ॥२॥
भावार्थःमनुष्य सुमति को पाकर और अभिमान को दूर करके जगदीश्वर से रक्षा किया जाकर सुखी होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
त्रि꣡र꣢स्मै स꣣प्त꣢ धे꣣न꣡वो꣢ दुदुह्रिरे स꣣त्या꣢मा꣣शि꣡रं꣢ प꣣रमे꣡ व्यो꣣मनि । च꣣त्वा꣢र्य꣣न्या꣡ भुव꣢꣯नानि नि꣣र्णि꣢जे꣣ चा꣡रू꣢णि चक्रे꣣ य꣢दृ꣣तै꣡रव꣢꣯र्धत ॥१४२३॥
पदार्थः(परमे) उत्कृष्ट, (व्योमनि) विशेषरूप से रक्षक सोमयाग में (अस्मै) इस यागकर्ता के लिए (सप्त धेनवः) गायत्र्यादि सात छन्दोंवाली वेदवाणीरूप गौएँ (त्रिः) दिन में तीन बार अर्थात् प्रातः-सवन, माध्यन्दिन-सवन और सायं-सवन में (सत्याम् आशिरम्) सत्यरूप दूध (दुदुह्रिरे) दुहती हैं। वह यागकर्ता (यत्) जब (ऋतैः) सत्य के ग्रहण द्वारा (अवर्धत) वृद्धि प्राप्त करता है, तब (निर्णिजे) आत्मशोधन के लिए (चत्वारि) चार, (चारूणि) सुरम्य (अन्या भुवनानि) अन्य लोकों—ब्रह्मचर्य,गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास को (चक्रे) अपने लिए निर्धारित कर लेता है अर्थात् याग के काल में गृहस्थ होता हुआ उसके बाद वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम में भी प्रविष्ट होता है ॥१॥
भावार्थःयाग आत्मशुद्धि और सत्य के अनुष्ठानार्थ होते हैं। जीवन में सत्य को अपनाकर ब्रह्मचर्य से लेकर संन्यासपर्यन्त आश्रमों का पालन करके अपने और दूसरों के दुःख दूर करने चाहिएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
स꣡ भक्ष꣢꣯माणो अ꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ चा꣡रु꣢ण उ꣣भे꣢꣫ द्यावा꣣ का꣡व्ये꣢ना꣣ वि꣡ श꣢श्रथे । ते꣡जि꣢ष्ठा अ꣣पो꣢ म꣣ꣳह꣢ना꣣ प꣡रि꣢ व्यत꣣ य꣡दी꣢ दे꣣व꣢स्य꣣ श्र꣡व꣢सा꣣ स꣡दो꣢ वि꣣दुः꣢ ॥१४२४॥
पदार्थः(सः) वह परमेश्वर का उपासक (चारुणः) सुन्दर (अमृतस्य)उपासनाजन्य दिव्य आनन्द का (भक्षमाणः) सेवन करता हुआ (काव्येन) वेदकाव्य द्वारा (उभे द्यावा) दीप्यमान दोनों अभ्युदय और निःश्रेयस वा ज्ञान और कर्म को (विशश्रथे) विश्लेषणपूर्वक जान लेता है। साथ ही (मंहना) अपने महत्त्व से (तेजिष्ठाः अपः) अतिशय तेजस्वी कर्मों को (परि व्यत) धारण कर लेता है अर्थात् जीवन का अङ्ग बना लेता है (यदि) जिन्हें (सदः) शिष्यभाव से आचार्य के समीप पहुँचनेवाले विद्यार्थी (देवस्य) ज्ञान के प्रकाशक आचार्य के (श्रवसा) उपदेश-श्रवण से (विदुः) जाना करते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना का यह फल होता है कि उपासक कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन करके प्रशस्त कर्मों का ही आचरण करता है, निन्दित का नहीं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
ते꣡ अ꣢स्य सन्तु के꣣त꣡वोऽमृ꣢꣯त्य꣣वो꣡ऽदा꣢भ्यासो ज꣣नु꣡षी꣢ उ꣣भे꣡ अनु꣢꣯ । ये꣡भि꣢र्नृ꣣म्णा꣡ च꣢ दे꣣꣬व्या꣢꣯ च पुन꣣त꣡ आदिद्राजा꣢꣯नं म꣣न꣡ना꣢ अगृभ्णत ॥१४२५॥
पदार्थः(अस्य) इस सोम परमात्मा की (ते) वे प्रसिद्ध (अमृत्यवः)अमरणशील वा न मारनेवाली, (अदाभ्यासः) पराजित न की जा सकनेवाली (केतवः) तेज की किरणें (उभे जनुषी) दोनों जन्मों को अर्थात् इस जन्म तथा अगले जन्म को (अनु सन्तु)अनुगृहीत करें, (येभिः) जिन तेज की किरणों से (मननाः) मननशील उपासक अपने (नृम्णा च) देह-बल से किये जाने योग्य कर्मों को (दैव्या च) और आत्म-बल से किये जाने योग्य कर्मों को (पुनते) पवित्र कर लेते हैं। (आत् इत्) और उसके अनन्तर ही (राजानम्) तेजस्वी परमेश्वर को (अगृभ्णत) ग्रहण कर पाते हैं ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा के तेजों का ध्यान करने तथा उन्हें धारण करने से यह लोक, परलोक और सब कर्म शुद्ध हो जाते हैं तथा परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है ॥३॥ इस खण्ड में परमेश्वर की उपासना तथा सोमयाग के फल का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ बारहवें अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣भि꣢ वा꣣युं꣢ वी꣣꣬त्य꣢꣯र्षा गृणा꣣नो꣢३꣱ऽभि꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣡ न꣢꣯रं धी꣣ज꣡व꣢नꣳ रथे꣣ष्ठा꣢म꣣भी꣢न्द्रं꣣ वृ꣡ष꣢णं꣣ व꣡ज्र꣢बाहुम् ॥१४२६॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् शान्तिमय उपासक ! (गृणानः) परमात्मा की स्तुति करता हुआ तू (वीती) वेग से (वायुम्) गतिशील मन को (अभि अर्ष) परमात्मा के प्रति प्रेरित कर। (पूयमानः) पवित्र किया जाता हुआ तू (मित्रावरुणा) प्राण-अपान को (अभि अर्ष) परमात्मा के प्रति प्रेरित कर, (धीजवनम्) ध्यान में वेगवान्, (रथेष्ठाम्) देह-रथ में स्थित (नरम्) नेता जीवात्मा को (अभि अर्ष) परमात्मा के प्रति प्रेरित कर और (वृषणम्) सुखवर्षक, (वज्रबाहुम्) शस्त्रास्त्रधारी सेनापति के समान शत्रुओं के विनाश में समर्थ (इन्द्रम्) परमेश्वर को (अभि अर्ष) अपनी ओर प्रेरित कर ॥१॥
भावार्थःमनुष्य जब अपने मन, बुद्धि, प्राण-अपान और जीवात्मा को परमात्मा की ओर प्रेरित करता है, तब परमात्मा झट स्वयं ही उसके सम्मुख प्रकट हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣भि꣡ वस्त्रा꣢꣯ सुवस꣣ना꣡न्य꣢र्षा꣣भि꣢ धे꣣नूः꣢ सु꣣दु꣡घाः꣢ पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣢ च꣣न्द्रा꣡ भर्त꣢꣯वे नो꣣ हि꣡र꣢ण्या꣣भ्य꣡श्वा꣢न्र꣣थि꣡नो꣢ देव सोम ॥१४२७॥
पदार्थःहे (देव) दानादि गुणों से युक्त (सोम) जगत्पति परमात्मन् ! आप हमारे लिए (सुवसनानि) सुन्दरता से धारण करने योग्य (वस्त्रा) वस्त्र (अभि अर्ष) प्रदान करो, (पूयमानः) मन में विद्यमान काम, क्रोध आदि से पृथक् करके पवित्ररूप में दर्शन किये जाते हुए आप (सुदुघाः) दुधारू (धेनूः) धेनुएँ (अभि अर्ष) प्रदान करो। (नः) हमारे (भर्तवे) भरण-पोषण के लिए (चन्द्रा) चाँदी और (हिरण्या) सुवर्ण (अभि अर्ष) प्रदान करो। साथ ही (रथिनः) रथ में जुड़नेवाले (अश्वान्) घोड़े (अभि अर्ष) प्रदान करो ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों के समाज में कोई वस्त्रहीन, गोदुग्धहीन, धनहीन और वाहनहीन न रहे, प्रत्युत सभी श्रीमान् और गुणवान् होवें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣भी꣡ नो꣢ अर्ष दि꣣व्या꣡ वसू꣢꣯न्य꣣भि꣢꣫ विश्वा꣣ पा꣡र्थि꣢वा पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣢꣫ येन꣣ द्र꣡वि꣢णम꣣श्न꣡वा꣢मा꣣꣬भ्या꣢꣯र्षे꣣यं꣡ ज꣢मदग्नि꣣व꣡न्नः꣢ ॥१४२८॥
पदार्थःहे सोम जगदीश्वर ! आप (नः) हमें (दिव्या वसूनि) सत्य, अहिंसा आदि दिव्य ऐश्वर्य (अभि अर्ष) प्राप्त कराओ, (पूयमानः) मन में विद्यमान काम, क्रोध आदि से पृथक् करके विशुद्धरूप में दर्शन किये जाते हुए आप (विश्वा) सब (पार्थिवा) पार्थिव धन (अभि अर्ष) प्राप्त कराओ। हम (येन) जिसके द्वारा (द्रविणम्) दिव्यज्ञान (अभ्यश्नवाम) प्राप्त कर सकें, वह (आर्षेयम्) आर्ष चक्षु (जमदग्निवत्) जैसे प्रज्वलित अग्निवाले अग्निहोत्री को आप देते हो, वैसे ही (नः) हमें भी (अभि अर्ष) प्रदान करो ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से हम समस्त भौतिक और दिव्य धन तथा आर्ष चक्षु प्राप्त कर लें, जिससे सब सत्य ज्ञान और गूढ़ रहस्य भी हमारे सम्मुख हस्तामलकवत् स्पष्ट हो जाएँ ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣡ज्जाय꣢꣯था अपूर्व्य꣣ म꣡घ꣢वन्वृत्र꣣ह꣡त्या꣢य । त꣡त्पृ꣢थि꣣वी꣡म꣢प्रथय꣣स्त꣡द꣢स्तभ्ना उ꣣तो꣡ दिव꣢꣯म् ॥१४२९॥
पदार्थःहे (अपूर्व्य) स्वयम्भू, (मघवन्) ऐश्वर्यशाली इन्द्र जगदीश्वर ! (यत्) क्योंकि, आप (वृत्रहत्याय) विघ्नों के विनाश के लिए (जायथाः) समर्थ हो, (तत्) इसी कारण, आप (पृथिवीम्)भूमण्डल को (अप्रथयः) फैला सके हो, (उत उ) और (तत्) इसी कारण (दिवम्) सूर्य को (अस्तभ्नाः) स्थिर कर सके हो ॥१॥
भावार्थःजो विघ्नों को विनष्ट करने में समर्थ होता है, वही हाथ में लिये कार्यों में सफल होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
त꣡त्ते꣢ य꣣ज्ञो꣡ अ꣢जायत꣣ त꣢द꣣र्क꣢ उ꣣त꣡ हस्कृ꣢꣯तिः । त꣡द्विश्व꣢꣯मभि꣣भू꣡र꣢सि꣣ य꣢ज्जा꣣तं꣢꣫ यच्च꣣ ज꣡न्त्व꣢म् ॥१४३०॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! क्योंकि आप विघ्नों के विनाश में समर्थ हो (तत्) इसी कारण (ते) आपका (यज्ञः) सृष्टिरूप यज्ञ (अजायत) उत्पन्न हो सका है। (तत्) इसी कारण (अर्कः) सूर्य (उत) और (हस्कृतिः) बिजली का अट्टहास उत्पन्न हो सका है। (तत्) इसी कारण (विश्वम्) सब कुछ (यत् जातम्) जो पैदा हो चुका है। (यत् च जन्त्वम्) और जो भविष्य में पैदा होना है, उसे आप (अभिभूः असि) अपनी महिमा से तिरस्कृत किये हुए हो ॥२॥
भावार्थःविघ्नों के विनाश में समर्थ होने से ही परमेश्वर सूर्य, चन्द्र, बिजली, नक्षत्र आदि से युक्त इस सब जगत् को बनाने और धारण करने में सफल होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣣मा꣡सु꣢ प꣣क्व꣡मैर꣢꣯य꣣ आ꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । घ꣣र्मं꣡ न सामं꣢꣯ तपता सुवृ꣣क्ति꣢भि꣣र्जु꣢ष्टं꣣ गि꣡र्व꣢णसे बृ꣣ह꣢त् ॥१४३१॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! आपने (आमासु) अपरिपक्व ओषधियों में (पक्वम्) पका फल, अथवा (आमासु) अपरिपक्व गायों में (पक्वम्) पका दूध (ऐरयः) प्रेरित किया है, (दिवि) आकाश में (सूर्यम्) सूर्य को (आरोहयः) चढ़ाया है। हे मनुष्यो ! तुम (गिर्वणसे) वाणियों से संभजनीय इन्द्र जगदीश्वर के लिए (जुष्टम्) प्रिय (बृहत्) महान् (सामन्) स्तोत्र को (घर्मम् न) अग्नि के समान (तपत) परिपक्व और प्रकाशित करो ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःतपस्या से पका हुआ ही स्तोत्र परमात्मा के चित्त को आकृष्ट करता है और फलदायक होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -स्कन्धोग्रीवी बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
म꣡त्स्यपा꣢꣯यि ते꣣ म꣢हः꣣ पा꣡त्र꣢स्येव हरिवो मत्स꣣रो꣡ मदः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢ ते꣣ वृ꣢ष्ण꣣ इ꣡न्दु꣢र्वा꣣जी꣡ स꣢हस्र꣣सा꣡त꣣मः ॥१४३२॥
पदार्थःहे (हरिवः) ऋक् और सामवाले इन्द्र जगदीश्वर ! आप (मत्सि) आनन्दित करते हो ! (महः पात्रस्य इव) रस से भरे हुए बड़े घट आदि पात्र के तुल्य (ते) आपका (मदः) उत्साहित करनेवाला (मत्सरः) आनन्द-रूप सोमरस (अपायि) मैंने पी लिया है। अब अपने अन्तरात्मा को कहते हैं—हे मेरे अन्तरात्मन् ! (वृष्णे) बलवान् (ते) तेरे लिए यह (वृषा) औरों पर सुख-वर्षा करनेवाला (वाजी) बलवान् (इन्दुः) आनन्दरूप सोमरस (सहस्रसातमः) असंख्य लाभ पहुँचानेवाला है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर जल से पूर्ण कलश के समान आनन्द-रस से परिपूर्ण है। उसका आनन्द-रस पान करके स्तोता का आत्मा कृतार्थ हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣡ न꣢स्ते गन्तु मत्स꣣रो꣢꣫ वृषा꣣ म꣢दो꣣ व꣡रे꣢ण्यः । स꣣हा꣡वा꣢ꣳ इन्द्र सान꣣सिः꣡ पृ꣢तना꣣षा꣡डम꣢꣯र्त्यः ॥१४३३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर (ते) आपका (वृषा) मनोरथ पूर्ण करनेवाला, (मदः) उत्साहित करनेवाला, (वरेण्यः)वरणीय, (सहावान्) बलवान् (सानसिः) संभजनीय, (पृतनाषाट्) शत्रु-सेनाओं को पराजित करनेवाला, (अमर्त्यः) अक्षय (मत्सरः) आनन्द-रूप सोम (नः) हमें (आ गन्तु) प्राप्त होवे ॥२॥
भावार्थःरसमय परमेश्वर से परमानन्द-रस पाकर मनुष्यों को शूरतापूर्वक आन्तरिक तथा बाह्य सब शत्रुओं का उन्मूलन करके निष्कण्टक स्वराज्य स्थापित करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
त्व꣢꣫ꣳ हि शूरः꣣ स꣡नि꣢ता चो꣣द꣢यो꣣ म꣡नु꣢षो꣣ र꣡थ꣢म् । स꣣हा꣢वा꣣न्द꣡स्यु꣢मव्र꣣त꣢꣫मोषः꣣ पा꣢त्रं꣣ न꣢ शो꣣चि꣡षा꣢ ॥१४३४॥
पदार्थःहे इन्द्र ! हे शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाले जगदीश ! (त्वं हि) आप निश्चय ही (शूरः) शूरवीर तथा (सनिता) उत्साह देनेवाले हो। (मनुषः) मनुष्य के (रथम्) प्रगति के रथ को (चोदयः) आगे प्रेरित करते हो। (सहावान्) बलवान्, आप (अव्रतम्) व्रतहीन और कर्महीन को तथा (दस्युम्) हिंसक स्वभाव को और हिंसक मनुष्य को (शोचिषा) प्रदीप्त अग्निज्वाला से (पात्रं न) मिट्टी के घड़े आदि के समान (ओषः) संतप्त कर देते हो ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजो परमेश्वर सज्जनों को पुरस्कार और दुष्टों को दण्ड देता है, उससे डरकर दुर्जनों को दुष्टता छोड़ देनी चाहिए और सत्कर्मों में उत्साह दिखाना चाहिए ॥३॥ इस खण्ड में उपास्य-उपासक विषय का तथा ब्रह्मानन्द का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बारहवें अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ बारहवाँ अध्याय समाप्त॥ षष्ठ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व वृ꣣ष्टि꣢꣫मा सु नो꣣ऽपा꣢मू꣣र्मिं꣢ दि꣣व꣡स्परि꣢꣯ । अ꣣यक्ष्मा꣡ बृ꣢ह꣣ती꣡रिषः꣢꣯ ॥१४३५॥
पदार्थःहे सोम ! हे सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ! आप (दिवः परि) उच्च आत्मलोक से (नः) हमारे लिए (अपाम् ऊर्मिम्) दिव्य धाराओं की तरङ्गरूप (वृष्टिम्) वर्षा को (सु आ पवस्व) भली-भाँति चारों ओर से प्रवाहित करो, साथ ही (अयक्ष्माः) नीरोग अर्थात् वासना आदि से रहित (बृहतीः इषः) उच्च महत्त्वाकाञ्क्षाओं को (आ पवस्व) हमारे अन्दर उत्पन्न करो ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर अन्तरिक्ष से वर्षा तथा भूमि पर आरोग्यकारी अन्न उत्पन्न करता है, वैसे ही वह हमारे अन्दर आनन्द की वर्षा और उच्च महत्त्वाकाञ्क्षाओं को जन्म दे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त꣡या꣢ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या꣣ य꣢या꣣ गा꣡व꣢ इ꣣हा꣢गम꣢꣯न् । ज꣡न्या꣢स꣣ उ꣡प꣢ नो गृ꣣ह꣢म् ॥१४३६॥
पदार्थःहे तेज के धाम परमात्मन् ! आप (तया धारया) उस तेज की धारा से (पवस्व) हमें पवित्र करो, (यया) जिस धारा से (इह) यहाँ (नः गृहम्) हमारे हृदय-सदन में (जन्यासः) उत्तरोत्तर जन्म लेनेवाली (गावः) तेज की किरणें (उपागमन्) उपस्थित हो जाएँ ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के पास से प्रवाहित होते हुए तेज उसके स्तोताओं को तेजस्वी बना देते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
घृ꣣तं꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या य꣣ज्ञे꣡षु꣢ देव꣣वी꣡त꣢मः । अ꣣स्म꣡भ्यं꣢ वृ꣣ष्टि꣡मा प꣢꣯व ॥१४३७॥
पदार्थःहे जगत्पति ! (यज्ञेषु) उपासनारूप यज्ञों में (देववीतमः) अतिशय दिव्य गुणों को प्राप्त करानेवाले आप (धारया) धारा रूप में (घृतम्) स्नेह तथा दीप्ति को (पवस्व) हमारे लिए प्रेरित करो। (अस्मभ्यम्) हम उपासकों के लिए (वृष्टिम्) आनन्दवर्षा को (आ पव) रिमझिम बरसाओ ॥३॥
भावार्थःउपासना किया हुआ जगदीश्वर उपासक के लिए अपने प्रेम, आनन्द और अक्षयतेज को प्रदान करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ न꣢ ऊ꣣र्जे꣢ व्य꣣꣬३꣱व्य꣡यं꣢ प꣣वि꣡त्रं꣢ धाव꣣ धा꣡र꣢या । दे꣣वा꣡सः꣢ शृ꣣ण꣢व꣣न्हि꣡ क꣢म् ॥१४३८॥
पदार्थःहे भक्तवत्सल देव ! (सः) वह प्रसिद्ध आप (नः) हमें (ऊर्जे) बल और प्राणशक्ति देने के लिए हमारे (पवित्रम्) पवित्र (अव्ययम्) अविनाशी अन्तरात्मा को (धारया) आनन्द की धारा के साथ (वि धाव) शीघ्रता से प्राप्त होवो। (देवासः) विद्वान् उपासक लोग (हि) अवश्य (कम्) सुख से (शृणवन्)आपके सन्देशों को सुनें ॥४॥
भावार्थःजगदीश्वर की मैत्री में निवास करते हुए स्तोता जन बल, प्राणशक्ति, आनन्द और दिव्य सन्देश प्राप्त करके धार्मिक जीवन व्यतीत करते हैं ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानो असिष्यद꣣द्र꣡क्षा꣢ꣳस्यप꣣ज꣡ङ्घ꣢नत् । प्र꣣त्नव꣢द्रो꣣च꣢य꣣न्रु꣡चः꣢ ॥१४३९॥
पदार्थः(पवमानः) पवित्रतादायक आनन्दवर्षी जगदीश्वर (रक्षांसि) काम, क्रोध आदि रिपुओं को और पापों को (अपजङ्घनत्) नष्ट करता हुआ (प्रत्नवत्) पुरातन अग्नि के समान (रुचः) तेजों को (रोचयन्) प्रदीप्त करता हुआ (असिष्यदत्) बह रहा है ॥५॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥५॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से उपासक के अन्तःकरण से वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं, तेज दमकते हैं और हृदय कालिमा से रहित पवित्र हो जाता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡त्य꣢स्मै꣣ पि꣡पी꣢षते꣣ वि꣡श्वा꣢नि वि꣣दु꣡षे꣢ भर । अ꣣रङ्गमा꣢य꣣ ज꣢ग्म꣣ये꣡ऽप꣢श्चादध्वने꣣ न꣡रः꣢ ॥१४४०॥
पदार्थःहे मानव ! (नरः) पुरुषार्थी तू (पिपीषते) तेरे श्रद्धारस को पान करने के इच्छुक, (विश्वानि विदुषे) सब जानने योग्य विषयों को जाननेवाले, (अरङ्गमाय) पर्याप्त देनेवाले, (जग्मये) क्रियाशील, (अपश्चा-दध्वने) पीछे पग न रखनेवाले (अस्मै) इस इन्द्र जगदीश्वर के लिए (प्रतिभर) श्रद्धा का उपहार प्रदान कर ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा में श्रद्धा रखता हुआ मनुष्य कभी जीवन में पतन को प्राप्त नहीं करता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ए꣡मे꣢नं प्र꣣त्ये꣡त꣢न꣣ सो꣡मे꣢भिः सोम꣣पा꣡त꣢मम् । अ꣡म꣢त्रेभिरृजी꣣षि꣢ण꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ सु꣣ते꣢भि꣣रि꣡न्दु꣢भिः ॥१४४१॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (सोमपातमम्) तुम्हारे श्रद्धारस को अतिशय पान करनेवाले (एनम् प्रति) इस परमात्मा के प्रति (ईम्) सब ओर से (सोमेभिः) श्रद्धारसों के साथ (एतन) पहुँचो। (ऋजीषिणम्) सरल धार्मिक जनों के पास पहुँचने का जिसका स्वभाव है, ऐसे (इन्द्रम् प्रति)जगदीश्वर के प्रति (अमत्रेभिः) महान्, (सुतेभिः) अभिषुत किये हुए, (इन्दुभिः) भिगो देनेवाले श्रद्धारसों के साथ (एतन) पहुँचो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के प्रति हार्दिक श्रद्धारस के प्रवाह से मनुष्य का जीवन उज्ज्वल हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
य꣡दी꣢ सु꣣ते꣢भि꣣रि꣡न्दु꣢भिः꣣ सो꣡मे꣢भिः प्रति꣣भू꣡ष꣢थ । वे꣢दा꣣ वि꣡श्व꣢स्य꣣ मे꣡धि꣢रो धृ꣣ष꣢꣫त्तन्त꣣मि꣡देष꣢꣯ते ॥१४४२॥
पदार्थःहे उपासको ! (यदि) यदि (सुतेभिः) अभिषुत किये हुए, (इन्दुभिः) सराबोर कर देनेवाले (सोमेभिः) श्रद्धारसों से, तुम इन्द्र परमात्मा को (प्रतिभूषथ) अलङ्कृत करते हो, तो (मेधिरः) मेधावी वह इन्द्र (विश्वस्य) तुम्हारे सब मनोरथों को (वेद) जान जाता है और (धृषत्) विघ्नों को परास्त करता हुआ (तं तम्) उस-उस मनोरथ को (इत्) अवश्य ही (आ इषते) पूर्ण करता है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर में श्रद्धा रखनेवाला मनुष्य अभीष्ट की पूर्ति में समर्थ हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣स्मा꣡अ꣢स्मा꣣ इद꣢꣫न्ध꣣सो꣡ऽध्व꣢र्यो꣣ प्र꣡ भ꣢रा सु꣣त꣢म् । कु꣣वि꣡त्स꣢मस्य꣣ जे꣡न्य꣢स्य꣣ श꣡र्ध꣢तो꣣ऽभि꣡श꣢स्तेरव꣣स्व꣡र꣢त् ॥१४४३॥
पदार्थःहे (अध्वर्यो) उपासना-यज्ञ के इच्छुक ! (अस्मै अस्मै इत्) इसी इन्द्र जगदीश्वर के लिए (अन्धसः) श्रद्धारूप सोम के (सुतम्) रस को (प्र भर) लाओ। वह इन्द्र जगदीश्वर (कुवित्) बहुत अधिक (समस्य) सब (जेन्यस्य) जीते जाने योग्य (शर्धतः) हिंसक शत्रुओं से की जानेवाली (अभिशस्तेः) हिंसा वा निन्दा से (अवस्वरत्) उद्धार कर देवे ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर में श्रद्धा रखनेवाले मनुष्य की कोई भी हिंसा नहीं कर सकता, न ही उसे अपयश का पात्र बना सकता है ॥४॥ इस खण्ड में परमात्मा की उपासना का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ तेरहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ब꣣भ्र꣢वे꣣ नु꣡ स्वत꣢꣯वसेऽरु꣣णा꣡य꣢ दिवि꣣स्पृ꣡शे꣢ । सो꣡मा꣢य गा꣣थ꣡म꣢र्चत ॥१४४४॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (बभ्रवे) धारण-पोषण करनेवाले, (स्वतवसे)निज बलवाले, (अरुणाय) तेज से जगमगानेवाले (दिविस्पृशे) जीवात्मा में सद्गुणों का स्पर्श करानेवाले (सोमाय) रसनिधि, जगत्स्रष्टा, सर्वान्तर्यामी परमेश्वर के लिए (गाथम्) गाने योग्य स्तोत्र को (अर्चत) गाओ ॥१॥
भावार्थःजो अपने ही बल से, न कि दूसरे के द्वारा प्रदत्त बल से, बलवान् है, उस तेजस्वी परमात्मा की आराधना करके मनुष्य बलवान् और तेजस्वी बनें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ह꣡स्त꣢च्युतेभि꣣र꣡द्रि꣢भिः सु꣣त꣡ꣳ सोमं꣢꣯ पुनीतन । म꣢धा꣣वा꣡ धा꣢वता꣣ म꣡धु꣢ ॥१४४५॥
पदार्थःहे उपासको ! (हस्तच्युतेभिः) हाथ-रहित (अद्रिभिः) हृदय और मस्तिष्करूप सिल-बट्टों से (सुतम्) अभिषुत किये गये (सोमम्) श्रद्धारस को (पुनीतन) पवित्र करो। (मधौ) अपने मधुर श्रद्धारस में (मधु) परमात्मा से प्राप्त मधुर आनन्द-रस को (आधावत) मिला दो ॥२॥ यहाँ ‘मधा, मधु’ और ‘धावा, धाव’ में छेकानुप्रास अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजब योगी लोगों को ब्रह्मानन्द-रस की अनुभूति हो जाती है,तभी उनकी परब्रह्म में श्रद्धा सफल होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
न꣢म꣣से꣡दुप꣢꣯ सीदत द꣣ध्ने꣢द꣣भि꣡ श्री꣢णीतन । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रे꣢ दधातन ॥१४४६॥
पदार्थःहे साथियो ! तुम (नमसा इत्) नमस्कार के साथ ही (उप सीदत) परमात्मा की उपासना करो। उस सात्त्विक नमस्कार को (दध्ना इत्) रजोगुण से उत्पन्न कर्म के साथ मिलाकर (अभि श्रीणीतन) परिपक्व करो। (इन्दुम्) परमात्मा के पास से प्रस्रुत हुए आनन्द-रस को (इन्द्रे) जीवात्मा में (दधातन) धारण कर लो ॥३॥ यहाँ एक कर्ता कारक के साथ उपसीदत, श्रीणीतन और दधातन इन अनेक क्रियाओं का योग होने से दीपक अलङ्कार है। दकार आदि का अनुप्रास है। गोदुग्ध सात्त्विक होता है, दही खट्टा होने से राजस, अतः दधि से यहाँ कर्म सूचित होता है ॥३॥
भावार्थःकेवल उपासना से अभीष्टसिद्धि नहीं होती, उसके साथ कर्मयोग भी अपेक्षित होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣मित्रहा꣡ विच꣢꣯र्षणिः꣣ प꣡व꣢स्व सोम꣣ शं꣡ गवे꣢꣯ । दे꣣वे꣡भ्यो꣢ अनुकाम꣣कृ꣢त् ॥१४४७॥
पदार्थःहे (सोम) जगदीश्वर ! (अमित्रहा) काम, क्रोध आलस्य आदि शत्रुओं के विनाशक, (विचर्षणिः) विशेष द्रष्टा, (देवेभ्यः) विद्वानों के लिए (अनुकामकृत्) अभीष्ट सिद्ध करनेवाले आप (गवे) स्तोता के लिए (शम्) शान्तिदायक होते हुए (पवस्व) आनन्द प्रवाहित करो ॥४॥
भावार्थःअराधना किया गया परमेश्वर उपासक के दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि को विनष्ट करके उसे सद्गुण देकर उसके लिए सुख,शान्ति और दिव्य आनन्द प्रवाहित करता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ पा꣡त꣢वे꣣ म꣡दा꣢य꣣ प꣡रि꣢ षिच्यसे । म꣣नश्चि꣡न्मन꣢꣯स꣣स्प꣡तिः꣢ ॥१४४८॥
पदार्थःहे (सोम) रसागार परमेश ! (मनश्चित्) मन को चेतानेवाले, (मनसः पतिः) मन के अधीश्वर, आप (इन्द्राय) जीवात्मा के (पातवे) पान के लिए और (मदाय) उत्साह के लिए (परिषिच्यसे) जीवात्मा में सींचे जा रहे हो ॥५॥
भावार्थःपरमात्मा के ध्यान से प्राप्त हुआ आनन्दरस मन, बुद्धि, प्राण आदि को चेतनामय करता हुआ उपासक को जागरूक किये रखता है ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मान सु꣣वी꣡र्य꣢ꣳ र꣣यि꣡ꣳ सो꣢म रिरीहि णः । इ꣢न्द꣣वि꣡न्द्रे꣢ण नो यु꣣जा꣢ ॥१४४९॥
पदार्थःहे (पवमान) पवित्रतादायक, (इन्दो) रस से सराबोर करनेवाले (सोम) आनन्द-रस के भण्डार जगदीश ! आप (नः युजा) हमारे सहायक (इन्द्रेण) मन द्वारा (नः) हमारे लिए (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीरता से युक्त (रयिम्) ऐश्वर्य (रिरीहि) प्राप्त कराओ ॥६॥
भावार्थःपरमात्मा, जीवात्मा और मन की मित्रता से ही मनुष्य चरम उन्नति करने में समर्थ होता है ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣢꣯द्घेद꣣भि꣢ श्रु꣣ता꣡म꣢घं वृष꣣भं꣡ नर्या꣢꣯पसम् । अ꣡स्ता꣢रमेषि सूर्य ॥१४५०॥
पदार्थःहे (सूर्य) सूर्य के समान प्रतापी वीर ! आप (श्रुतामघम्) प्रसिद्ध धनोंवाले, (वृषभम्) बलवान् (नर्यापसम्) मनुष्यों के हितकारक कर्मों को करनेवाले, (अस्तारम्) दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि को परे फ़ेंक देनेवाले प्रजाजन को (घ इत्) ही (अभि) लक्ष्य करके (उदेषि) राजा रूप में राष्ट्रगगन में उदित होते हो ॥१॥
भावार्थःजिसके राज्य में सुयोग्य प्रजाएँ हैं, वही राजा सुयोग्य माना जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
न꣢व꣣ यो꣡ न꣢व꣣तिं꣡ पुरो꣢꣯ बि꣣भे꣡द꣢ बा꣣꣬ह्वो꣢꣯जसा । अ꣡हिं꣢ च वृत्र꣣हा꣡व꣢धीत् ॥१४५१॥
पदार्थः(यः) जो वीर (बाह्वोजसा) बाहुबल से (नव नवतिं पुरः) नव्वे-नव्वे शत्रु योद्धाओं के नौ व्यूहों को (बिभेद) तोड़ देता है और जो (वृत्रहा) शत्रुहन्ता वीर (अहिं च) मार-काट करनेवाले शत्रुदल को भी (अवधीत्) विध्वस्त कर देता है, वही राजा वा सेनापति बनने योग्य है ॥२॥
भावार्थःउसी मनुष्य को राजा के पद पर वा सेनापति के पद पर अभिषिक्त करना चाहिए, जो अकेला होता हुआ भी बहुत से शत्रुओं के छक्के छुड़ा सके ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स꣢ न꣣ इ꣡न्द्रः꣢ शि꣣वः꣡ सखाश्वा꣢꣯व꣣द्गो꣢म꣣द्य꣡व꣢मत् । उ꣣रु꣡धा꣢रेव दोहते ॥१४५२॥
पदार्थः(सः) वह (नः) हमारा (शिवः) मङ्गलकारी, (सखा) मित्र (इन्द्रः) वीर राजा (अश्वावत्) घोड़ों से युक्त, (गोमत्) गायों से युक्त (यवमत्) जौ आदि अन्नों से युक्त धन को (दोहते) हमारे लिए दुह कर दे, (उरुधारा इव) जैसे मोटी धारोंवाली दुधारु गाय दूध देती है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःवही राजा होने योग्य है, जो प्रजाजनों को धन, धान्य, गाय, घोड़े आदि सम्पदाओं से समृद्ध कर सके, क्योंकि समृद्ध लोग ही अध्यात्म-मार्ग पर चलना चाहते हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा की उपासना के तथा राजनीति के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ तेरहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -जगती| देवता -सूर्यः| स्वर - निषादः
वि꣣भ्रा꣢ड् बृ꣣ह꣡त्पि꣢बतु सो꣣म्यं꣢꣫ मध्वायु꣣र्द꣡ध꣢द्य꣣ज्ञ꣡प꣢ता꣣व꣡वि꣢ह्रुतम् । वा꣡त꣢जूतो꣣ यो꣡ अ꣢भि꣣र꣡क्ष꣢ति꣣ त्म꣡ना꣢ प्र꣣जाः꣡ पि꣢पर्ति बहु꣣धा꣡ वि रा꣢꣯जति ॥१४५३॥
पदार्थः(विभ्राट्) विशेषरूप से भ्राजमान सूर्य (यज्ञपतौ) यजमान को (अविह्रुतम्) अकुटिल (आयुः) आयु (दधत्) प्रदान करता हुआ (बृहत्) विशाल (सोम्यम्) सोम आदि ओषधियों के रस से युक्त (मधु) जल को (पिबतु) पिये, (वातजूतः) सूत्रात्मक प्राण के द्वारा प्रेरित (यः) जो सूर्य (त्मना) अपने-आप (अभि रक्षति) सम्पूर्ण सौरमण्डल की रक्षा करता है, (प्रजाः) जड़-चेतन-रूप प्रजाओं को (पिपर्ति) पालित-पूरित करता है और (बहुधा) अनेक रूपों में (वि राजति) विराजमान होता है, क्योंकि प्रत्येक मास में नवीन-नवीन रूप धारण करता है ॥१॥
भावार्थःयह जगदीश्वर की ही महिमा है कि उसने वर्षा करनेवाला, बहुत उपकार करनेवाला तेज का गोला सूर्यलोक रचा है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -जगती| देवता -सूर्यः| स्वर - निषादः
वि꣣भ्रा꣢ड् बृ꣣ह꣡त्सुभृ꣢꣯तं वाज꣣सा꣡त꣢मं꣣ ध꣡र्मं꣢ दि꣣वो꣢ ध꣣रु꣡णे꣢ स꣣त्य꣡मर्पि꣢꣯तम् । अ꣣मित्रहा꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ द꣢स्यु꣣ह꣡न्त꣢मं꣣ ज्यो꣡ति꣢र्जज्ञे असुर꣣हा꣡ स꣢पत्न꣣हा꣢ ॥१४५४॥
पदार्थःदेखो, (विभ्राट्) देदीप्यमान, (बृहत्) विशाल, (सुभृतम्) अत्यन्त पुष्ट, (वाजसातमम्) अन्न और बल की अतिशय देनेवाली, (सत्यम्) सत्य नियमोंवाली, (धर्मन्) ग्रहोपग्रहों के धारणकर्ता (दिवः धरुणे) द्युलोक के स्तम्भरूप सूर्य में (अर्पितम्) अर्पित, (अमित्रहा) रोग आदि शत्रुओं को नष्ट करनेवाली, (वृत्रहा) अन्धकार की विनाशक, (दस्युहन्तमम्) चोर आदि दस्युओं को दूर करनेवाली, (असुरहा) अप्रशस्त दुर्भिक्ष आदि को विनष्ट करनेवाली, (सपत्नहा) एक साथ आक्रमण करनेवाले रोग-कृमियों की विनाशक (ज्योतिः) सूर्य की ज्योति (जज्ञे) प्रादुर्भूत हुई है ॥२॥ यहाँ स्वभावोक्ति अलङ्कार है। ‘हा’ का चार बार प्रयोग होने के कारण वृत्त्यनुप्रास है। ‘तमं’ और ‘त्रहा’ के दो-दो बार प्रयोग में छेकानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःरात्रि के घोर अन्धकार को विध्वस्त करती हुई सूर्य की ज्योति परमात्मा की आभा की ओर संकेत करती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -जगती| देवता -सूर्यः| स्वर - निषादः
इ꣣द꣢꣫ꣳ श्रेष्ठं꣣ ज्यो꣡ति꣢षां꣣ ज्यो꣡ति꣢रुत्त꣣मं꣡ वि꣢श्व꣣जि꣡द्ध꣢न꣣जि꣡दु꣢च्यते बृ꣣ह꣢त् । वि꣣श्वभ्रा꣢ड् भ्रा꣣जो꣢꣫ महि꣣ सू꣡र्यो꣢ दृ꣣श꣢ उ꣣रु꣡ प꣢प्रथे꣣ स꣢ह꣣ ओ꣢जो꣣ अ꣡च्यु꣢तम् ॥१४५५
पदार्थः(इदम्) यह सामने दिखायी देती हुई, (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठ, (ज्योतिषां ज्योतिः) ज्योतियों की ज्योति अर्थात् प्रकाशक ग्रह-उपग्रह तथा अग्नि, विद्युत्, आदि को भी प्रकाशित करनेवाली, (उत्तमम्) उत्कृष्टतम (बृहत्) विस्तीर्ण सूर्य-ज्योति (विश्वजित्) सबको जीतनेवाली और (धनजित्) धनों को जीतनेवाली (उच्यते) कही जाती है। (विश्वभ्राट्) सम्पूर्ण सौरमण्डल का प्रकाशक, (भ्राजः) देदीप्यमान (सूर्यः) सूर्य (दृशे) देखने के लिए (महि) महान्, (उरु) विस्तीर्ण, (सहः) अन्धकार को तिरस्कृत करनेवाले, (अच्युतम्) अन्य ज्योतियों से तिरस्कृत न होनेवाले (ओजः) तेज को (पप्रथे) फैला रहा है ॥३॥ यहाँ भी स्वभावोक्ति अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःद्युलोक और भूलोक में सर्वत्र फैली हुई सूर्य की ज्योति परमेश्वर के ही यश को प्रकाशित करती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣡न्द्र꣣ क्र꣡तुं꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र पि꣣ता꣢ पु꣣त्रे꣢भ्यो꣣ य꣡था꣢ । शि꣡क्षा꣢ णो अ꣣स्मि꣡न्पु꣢रुहूत꣣ या꣡म꣢नि जी꣣वा꣡ ज्योति꣢꣯रशीमहि ॥१४५६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्नविनाशक, विश्ववेत्ता, सर्वकारी, सर्वशक्तिमन् परमात्मन् ! आप (नः) हमें (क्रतुम्) प्रज्ञा और कर्म को (आ भर) प्रदान करो, (यथा) जिस प्रकार (पिता) पिता (पुत्रेभ्यः) सन्तानों को प्रदान करता है। हे (पुरुहूत) बहुतों से पुकारे जानेवाले जगदीश्वर ! आप (अस्मिन् यामनि) इस संसार-मार्ग में (नः) हमें (शिक्ष) कर्तव्य-अकर्तव्य की शिक्षा दो। (जीवाः) जीवन से अनुप्राणित हम, आपके पास से (ज्योतिः) दिव्य ज्योति को (अशीमहि) प्राप्त करें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे माता, पिता और आचार्य मनुष्य के शिक्षक हैं, वैसे ही परमेश्वर भी है। वह अन्तरात्मा में प्रविष्ट हुआ सदा ही सत्य-असत्य का उपदेश करता रहता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
मा꣢ नो꣣ अ꣡ज्ञा꣢ता वृ꣣ज꣡ना꣢ दुरा꣣ध्यो꣢३꣱मा꣡शि꣢वा꣣सो꣡ऽव꣢ क्रमुः । त्व꣡या꣢ व꣣यं꣢ प्र꣣व꣢तः꣣ श꣡श्व꣢तीर꣣पो꣡ऽति꣢ शूर तरामसि ॥१४५७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश ! (मा) न तो (अज्ञाताः) अज्ञात (वृजनाः) बलवान् वा युद्ध करनेवाले (दुराध्यः) बुरे मनसूबे बाँधनेवाले शत्रु और (मा) न ही (अशिवासः) अभ्रद परिचित लोग (नः) हमें (अवक्रमुः) पददलित कर सकें। हे (शूर) वीर जगदीश्वर ! (त्वया) आपकी सहायता से (प्रवतः) उत्कृष्ट आचरणवाले (वयम्) हम आपके उपासक (शश्वतीः) बहुत सी (अपः) नदियों को अर्थात् नदियों के समान उमड़नेवाली बाधाओं को (अति तरामसि) पार कर लेवें ॥२॥
भावार्थःजैसे शत्रु लोग, वैसे ही सम्बन्धी जन भी कभी-कभी पाप आदि कर्मों में लिप्त करते हैं और विघ्न भी धर्ममार्ग में बाधक होते हैं। परमेश्वर से बल पाकर उन सबको हम लाँघ जाएँ ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣द्या꣢द्या꣣ श्वः꣢श्व꣣ इ꣢न्द्र꣣ त्रा꣡स्व꣢ प꣣रे꣡ च꣢ नः । वि꣡श्वा꣢ च नो जरि꣣तॄ꣡न्त्स꣢त्पते꣣ अ꣢हा꣣ दि꣣वा꣢ न꣡क्तं꣢ च रक्षिषः ॥१४५८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्ननाशक परमात्मन् ! आप (अद्य अद्य) आज-आज, (श्वः-श्वः) कल-कल, (परे च) और अगले दिनों में भी (नः) हमारी (त्रास्व) रक्षा करो। हे (सत्पते) सज्जनों के पालक ! (विश्वा च अहा) सभी दिनों में (जरितॄन् नः) हम स्तोताओं की (दिवा नक्तं च) दिन-रात (रक्षिषः) रक्षा करते हो ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों के जीवन में कुसङ्ग आदि के कारण नीचे गिरने के बहुत से अवसर आते हैं। परमेश्वर पर अटूट विश्वास उन अवसरों पर उनकी रक्षा करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
प्र꣣भङ्गी꣡ शूरो꣢꣯ म꣣घ꣡वा꣢ तु꣣वी꣡म꣢घः꣣ स꣡म्मि꣢श्लो वी꣣꣬र्या꣢꣯य꣣ क꣢म् । उ꣣भा꣡ ते꣢ बा꣣हू꣡ वृष꣢꣯णा शतक्रतो꣣ नि꣡ या वज्रं꣢꣯ मिमि꣣क्ष꣡तुः꣢ ॥१४५९॥
पदार्थःहे जगदीश्वर ! आप (प्रभङ्गी) दुष्टों और दुर्गुणों के तीव्र भञ्जक, (शूरः) वीर, (मघवा) ऐश्वर्यवान्, (तुवीमघः) बहुत दानी और (वीर्याय) हमें बल प्रदान करने के लिए (कम्) निश्चय ही (सम्मिश्लः) हमसे मिलनेवाले, हमारे साथ सखित्व स्थापित करनेवाले हो। हे (शतक्रतो) बहुत प्रज्ञा तथा बहुत कर्मोंवाले ! (उभा) दोनों (वृषणा) वर्षा करनेवाले वायु और सूर्य (ते) आपकी (बाहू) बाहुएँ हैं, (या) जो (वज्रम्) जल को (नि मिमिक्षतुः) निरन्तर सींचा करती हैं ॥२॥ यहाँ वर्षक वायु और सूर्य में बाहुओं के आरोप के कारण रूपक अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे कोई बाहुधारी मनुष्य बाहुओं में घड़ा आदि पकड़कर भूमि पर जल सींचता है, वैसे ही जगदीश्वर वायु और सूर्य रूप बाहुओं में मेघ रूप घड़े को लेकर वर्षाजल भूमि पर बरसाता है ॥२॥ इस खण्ड में सूर्य के वर्णन द्वारा तथा प्रत्यक्षतः भी परमात्मा की महिमा का वर्णन होने से और उसके प्रति प्रार्थना होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ तेरहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -सरस्वान्| स्वर - षड्जः
ज꣣नी꣢यन्तो꣣ न्व꣡ग्र꣢वः पुत्री꣣य꣡न्तः꣢ सु꣣दा꣡न꣢वः । स꣡र꣢स्वन्तꣳ हवामहे ॥१४६०॥
पदार्थः(अग्रवः) पुरुषार्थी, (जनीयन्तः) पत्नी को चाहनेवाले, (पुत्रीयन्तः) पुत्र-पुत्री को चाहनेवाले, (सुदानवः) उत्कृष्ट दान करनेवाले हम गृहस्थ लोग (सरस्वन्तम्) आनन्दरसमय परमात्मा को (नु) शीघ्र ही (हवामहे)पुकारते हैं ॥१॥
भावार्थःब्रह्मचारी लोग स्नातक होकर विदुषी, सच्चरित्र, गुणवती कन्या से विवाह करके, प्रशस्त सन्तान उत्पन्न करके, पञ्चमहायज्ञ आदि गृहस्थ के कर्तव्यों का पालन करते हुए परमात्मा की उपासना करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -सरस्वती| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣡ नः꣢ प्रि꣣या꣢ प्रि꣣या꣡सु꣢ स꣣प्त꣡स्व꣢सा꣣ सु꣡जु꣢ष्टा । स꣡र꣢स्वती꣣ स्तो꣡म्या꣢ भूत् ॥१४६१॥
पदार्थः(उत) और (प्रियासु प्रिया) प्यारी माताओं में अत्यधिक प्रिय, (सप्तस्वसा) गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप्, जगती रूप सात बहिनोंवाली, (सुजुष्टा) वेदज्ञ महर्षियों द्वारा भली-भाँति सेवित (सरस्वती) ज्ञानमयी वेदमाता (नः)हमारी (स्तोम्या) स्तुतिपात्र अर्थात् अध्ययन-अध्यापन की पात्र (भूत्) होवे ॥१॥
भावार्थःवेदों का अध्ययन करके, उनसे सब विद्याएँ तथा परमात्मा की उपासना का प्रकार जानकर अभ्युदय और निःश्रेयस सिद्ध करने चाहिएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -सविता| स्वर - षड्जः
त꣡त्स꣢वि꣣तु꣡र्व꣢꣯रेण्यं꣣ भ꣡र्गो꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ धीमहि । धि꣢यो꣣ यो꣡ नः꣢ प्रचो꣣द꣡या꣢त् ॥१४६२॥
पदार्थःऋचा में तीन पाद हैं। ‘प्रत्येक वेद से एक-एक पाद दुहा गया है।’ (मनु० २।७७) मनु के इस वचन के आधार पर प्रत्येक पाद का पृथक् अर्थ देखते हैं। १. (सवितुः) सकल जगत् की उत्पत्ति करनेवाले, सब शुभगुणों के प्रेरक परमात्मा का (तत्) वह प्रसिद्ध तेज (वरेण्यम्) वरणीय है। २. (देवस्य) दाता, प्रकाशमान और प्रकाशक उस परमात्मा के (भर्गः) तेज को, हम (धीमहि) धारण करें वा ध्यावें। ३. (यः) जो सविता प्रभु (नः) हमारे (धियः) प्रज्ञाओं और कर्मों को (प्रचोदयात्) सन्मार्ग पर प्रेरित करे ॥१॥
भावार्थःसकल जगत् के स्रष्टा, सूर्य के समान सबके अन्तः करण को प्रकाशित करनेवाले, सर्वान्तर्यामी परमेश्वर के तेजों के ध्यान और धारण करने से वह उपासक की बुद्धियों और क्रियाओं को सन्मार्ग में प्रेरित करके उसे सुखी करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -ब्रह्मणस्पतिः| स्वर - षड्जः
सो꣣मा꣢ना꣣ꣳ स्व꣡र꣢णं कृणु꣣हि꣡ ब्र꣢ह्मणस्पते । क꣣क्षी꣡व꣢न्तं꣣ य꣡ औ꣢शि꣣जः꣢ ॥१४६३॥
पदार्थःहे (ब्रह्मणः पते) वेदों के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य ! (यः) जो मैं (औशिजः) बहुत अधिक वेदाध्ययन का इच्छुक हूँ, उस मुझको, आप (सोमानाम्) ज्ञानों का (स्वरणम्) प्राप्तकर्ता और (कक्षीवन्तम्) कटिबद्ध (कृणुहि) कर दो ॥२॥
भावार्थःगुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे शिष्यों को विद्वान् और कर्मयोगी बनायें। पुरुषार्थहीन विद्वत्ता कुछ काम नहीं आती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि पवस꣣ आ꣢ सु꣣वो꣢र्ज꣣मि꣡षं꣢ च नः । आ꣣रे꣡ बा꣢धस्व दु꣣च्छु꣡ना꣢म् ॥१४६४॥
पदार्थःहे (अग्ने) चरित्र को ऊँचा उठानेवाले आचार्यवर ! आप शिष्यों के (आयूंषि) जीवनों को (पवसे) पवित्र करते हो। (नः) हम शिष्यों के लिए (ऊर्जम्) आत्मबल वा चरित्र-बल, (इषं च) और अभीष्ट विद्या (आसुव) प्रदान करो। (दुच्छुनाम्) दुर्गति करनेवाली अविद्या को (आरे) दूर (बाधस्व) बाधित कर दो ॥३॥
भावार्थःश्रेष्ठ आचार्य को प्राप्त कर विद्यार्थी पवित्रात्मा और विद्वान् होकर समावर्तन के अनन्तर घर आकर राष्ट्र को उन्नत करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
ता꣡ नः꣢ शक्तं꣣ पा꣡र्थि꣢वस्य म꣣हो꣢ रा꣣यो꣢ दि꣣व्य꣡स्य꣢ । म꣡हि꣢ वां क्ष꣣त्रं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ ॥१४६५॥
पदार्थःहे मित्र-वरुणो अर्थात् ब्राह्मण-क्षत्रियो ! (ता) वे तुम दोनों (नः) हमें (पार्थिवस्य) भौतिक और (दिव्यस्य) आध्यात्मिक (महः) महान् (रायः) ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए (शक्तम्) समर्थ बनाओ। (देवेषु) विद्वानों में (वाम्) तुम दोनों का (महि) महान् (क्षत्रम्) शत्रुजन्य प्रहार से वा अविद्या दुर्व्यसन आदि दोष से त्राण करने का सामर्थ्य है ॥१॥
भावार्थःजहाँ ब्राह्मण और क्षत्रिय मिलकर श्रेष्ठ विद्या, श्रेष्ठ धर्म आदि के प्रदान द्वारा और शत्रुओं से रक्षा द्वारा उपकारक होते हैं, वह राष्ट्र अत्यधिक उन्नत हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
ऋ꣣त꣢मृ꣣ते꣢न꣣ स꣡प꣢न्तेषि꣣रं꣡ दक्ष꣢꣯माशाते । अ꣣द्रु꣡हा꣢ दे꣣वौ꣡ व꣢र्धेते ॥१४६६॥
पदार्थःये मित्र-वरुण अर्थात् ब्राह्मण-क्षत्रिय (ऋतम्) राष्ट्र-यज्ञ की (ऋतेन) सत्य ब्रह्मबल वा सत्य क्षात्रबल से (सपन्ता) सेवा करते हुए (इषिरम्) प्रेरक (दक्षम्) उत्साह को (आशाते)प्राप्त करते हैं। (अद्रुहा) आपस में द्रोह न करनेवाले (देवौ) ब्रह्मवर्चस वा क्षात्र तेज से प्रकाशमान, दानादि गुणों से युक्त ये (वर्धेते) वृद्धि प्राप्त करते हैं ॥२॥
भावार्थःआपस में द्रोह न करते हुए, अपितु सहयोग करते हुए ब्राह्मण और क्षत्रिय ब्रह्मबल और क्षात्रबल का उपयोग करके स्वयं बढ़ते हुए राष्ट्र को भी बढ़ाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मित्रावरुणौ| स्वर - षड्जः
वृ꣣ष्टि꣡द्या꣢वा री꣣꣬त्या꣢꣯पे꣣ष꣢꣫स्पती꣣ दा꣡नु꣢मत्याः । बृ꣣ह꣢न्तं꣣ ग꣡र्त꣢माशाते ॥१४६७॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। जो योगी विद्वान् लोग (ब्रध्नम्) महान्, (अरुषम्) तेजस्वी, अहिंसक, करुणामय, (तस्थुषः) सब स्थावर पदार्थों वा दृढ स्वभाववाले मनुष्यों में (परिचरन्तम्) व्याप्त इन्द्र परमेश्वर का (युञ्जन्ति) अपने साथ योग करते हैं, वे (रोचना) दीप्तिमान् होते हुए (दिवि) प्रकाशमय मोक्षधाम में (रोचन्ते) शोभा पाते हैं ॥ द्वितीय—सूर्य के पक्ष में। जो पृथिवी, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, बृहस्पति आदि लोक (ब्रध्नम्) महान् (अरुषम्) आरोचमान, (तस्थुषः) सब स्थावर पदार्थों वा मनुष्यों को (परिचरन्तम्) अपनी किरणों से व्याप्त करते हुए इन्द्र नामक सूर्य को (युञ्जन्ति) अपने साथ जोड़ते हैं, वे (रोचना) दीप्तिमान् होते हुए (दिवि) आकाश में (रोचन्ते) चमकते हैं ॥ तृतीय—प्राण के पक्ष में। जो उपासक लोग (ब्रध्नम्) सब अङ्गों की वृद्धि करनेवाले महान् (अरुषम्) क्षति न पहुँचानेवाले, (तस्थुषः) शरीर में स्थित सब अङ्गों को (परिचरन्तम्) प्राप्त होनेवाले इन्दु नामक प्राण को (युञ्जन्ति) प्राणायाम की रीति से अपने अन्दर जोड़ते हैं, वे (रोचना) चमकनेवाले नक्षत्र जैसे (दिवि) आकाश में प्रकाशित होते हैं, वैसे ही (रोचन्ते) तेजस्वी होते हैं ॥ चतुर्थ—शिल्प के विषय में। जो शिल्पशास्त्र के ज्ञाता विद्वान् लोग (ब्रध्नम्) महान्, (तस्थुषः) स्थावर वनौषधि आदि को वा मनुष्यों को (परिचरन्तम्) प्राप्त होनेवाले इन्द्र नामक पार्थिव अग्नि, विद्युत्, वायु वा सूर्य को (युञ्जन्ति) भूयान, जलयान तथा विमानों में और यन्त्र-कलाओं में जोड़ते हैं, वे (दिवि) आकाश में (रोचना) चमकनेवाले नक्षत्रों के समान (रोचन्ते) यशस्वी होते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है, तृतीय, चतुर्थ व्याख्यानों में लुप्तोपमा भी है ॥१॥
भावार्थःजैसे योगियों को अपने आत्मा में परमेश्वर के योग से परमात्मा का प्रकाश प्राप्त होता है, और शरीर के अङ्गों में प्राण के योग से प्राणसिद्धि प्राप्त होती है, वैसे ही सूर्य-किरणों के योग से हमारे सौर मण्डल के सब ग्रह-उपग्रहों को भौतिक प्रकाश प्राप्त होता है और शिल्पियों को यान आदियों में अग्नि, वायु, बिजली, सूर्य के योग से यश प्राप्त होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
यु꣣ञ्ज꣡न्ति꣢ ब्र꣣ध्न꣡म꣢रु꣣षं꣡ चर꣢꣯न्तं꣣ प꣡रि꣢ त꣣स्थु꣡षः꣢ । रो꣡च꣢न्ते रोच꣣ना꣢ दि꣣वि꣢ ॥१४६८॥
पदार्थःप्रथम—प्राण-अपान के विषय में। विद्वान् योगी लोग (अस्य) इस इन्द्र नामक जीवात्मा के (रथे) शरीररूप रथ में (काम्या) चाहने योग्य, (विपक्षसा) प्राणक्रिया और अपानक्रिया रूप विशिष्ट पंखोंवाले, (शोणा) गतिशील, (धृष्णू) चतुर, (नृवाहसा) मनुष्य-देह को वहन करनेवाले (हरी) प्राण-अपान रूप दो घोड़ों को (युञ्जन्ति) प्राणायाम की विधि से उपयोग में लाते हैं ॥ द्वितीय—शिल्प के विषय में। शिल्पी लोग (अस्य) इस सूर्य या बिजली रूप अग्नि के (काम्या) कमनीय, (विपक्षसा) परस्पर विरुद्ध गुणवाले, (शोणा) गतिशील, (धृष्णू) घर्षणशील, (नृवाहसा) मनुष्यों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जानेवाले (हरी) ऋणात्मक विद्युत् तथा धनात्मक विद्युत् रूप दो घोड़ों को (युञ्जन्ति) भूयान, जलयान तथा विमानों में जोड़ते हैं ॥२॥
भावार्थःजैसे प्राणायाम का अभ्यास करनेवाले विद्वान् लोग प्राण-अपान रूप घोड़ों को नियुक्त करके शरीर-रथ को चलाते हैं,वैसे ही शिल्पी लोग ऋण और धन विद्युत् को यान आदि तथा घर आदि में लगाकर यात्रा और प्रकाश किया करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
यु꣣ञ्ज꣡न्त्य꣢स्य꣣ का꣢म्या꣣ ह꣢री꣣ वि꣡प꣢क्षसा꣣ र꣡थे꣢ । शो꣡णा꣢ धृ꣣ष्णू꣢ नृ꣣वा꣡ह꣢सा ॥१४६९॥
पदार्थःप्रथम—प्राण-अपान के विषय में। विद्वान् योगी लोग (अस्य) इस इन्द्र नामक जीवात्मा के (रथे) शरीररूप रथ में (काम्या) चाहने योग्य, (विपक्षसा) प्राणक्रिया और अपानक्रिया रूप विशिष्ट पंखोंवाले, (शोणा) गतिशील, (धृष्णू) चतुर, (नृवाहसा) मनुष्य-देह को वहन करनेवाले (हरी) प्राण-अपान रूप दो घोड़ों को (युञ्जन्ति) प्राणायाम की विधि से उपयोग में लाते हैं ॥ द्वितीय—शिल्प के विषय में। शिल्पी लोग (अस्य) इस सूर्य या बिजली रूप अग्नि के (काम्या) कमनीय, (विपक्षसा) परस्पर विरुद्ध गुणवाले, (शोणा) गतिशील, (धृष्णू) घर्षणशील, (नृवाहसा) मनुष्यों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जानेवाले (हरी) ऋणात्मक विद्युत् तथा धनात्मक विद्युत् रूप दो घोड़ों को (युञ्जन्ति) भूयान, जलयान तथा विमानों में जोड़ते हैं ॥२॥
भावार्थःजैसे प्राणायाम का अभ्यास करनेवाले विद्वान् लोग प्राण-अपान रूप घोड़ों को नियुक्त करके शरीर-रथ को चलाते हैं,वैसे ही शिल्पी लोग ऋण और धन विद्युत् को यान आदि तथा घर आदि में लगाकर यात्रा और प्रकाश किया करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
के꣣तुं꣢ कृ꣣ण्व꣡न्न꣢के꣣त꣢वे꣣ पे꣡शो꣢ मर्या अपे꣣श꣡से꣢ । स꣢मु꣣ष꣡द्भि꣢रजायथाः ॥१४७०॥
पदार्थःहे इन्द्र अर्थात् परमात्मन् सूर्य वा प्राण ! तुम (अकेतवे) प्रज्ञान-हीन और कर्म-हीन के लिए (केतुम्) प्रज्ञान और कर्म को (कृण्वन्) उत्पन्न करते हुए (उषद्भिः) उषाओं के साथ (सम् अजायथाः) प्रकट होते हो। हे (मर्याः) मनुष्यो ! तुम भी वैसा ही करो ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर के समान, सूर्य के समान और प्राण के समान मनुष्य भी यदि ज्ञानहीनों में ज्ञान, कर्महीनों में कर्म और रूपहीनों में रूप का विस्तार करें, तभी उनका जन्म सफल है ॥३॥ इस खण्ड में वेदवाणी, आचार्य, ब्राह्मण-क्षत्रिय तथा परमात्मा, सूर्य और प्राण के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ तेरहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
अ꣣य꣡ꣳ सोम꣢꣯ इन्द्र꣣ तु꣡भ्य꣢ꣳ सुन्वे꣣ तु꣡भ्यं꣢ पवते꣣ त्व꣡म꣢स्य पाहि । त्व꣢ꣳ ह꣣ यं꣡ च꣢कृ꣣षे꣡ त्वं व꣢꣯वृ꣣ष꣢꣫ इन्दुं꣣ म꣡दा꣢य꣣ यु꣡ज्या꣢य꣣ सो꣡म꣢म् ॥१४७१॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (अयं सोमः) यह ब्रह्मानन्द-रस (तुभ्यम्) तेरे लिए (सुन्वे) अभिषुत हो रहा है, (तुभ्यम्) तेरे लिए (पवते) प्रवाहित हो रहा है। (त्वम् अस्य पाहि) तू इसका पान कर, (यम्) जिस (इन्दुम्) भिगोनेवाले (सोमम्) ब्रह्मानन्द-रस को (मदाय) उत्साह के लिए, (युज्याय) और ब्रह्म के साथ मैत्री के लिए (त्वं ह) तूने ही (चकृषे) ब्रह्म के पास से उत्पन्न किया है और (त्वम्) तूने ही (ववृषे) उसके पास से अपने ऊपर उसकी वर्षा की है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के साथ अपने आत्मा का योग करते हुए योगी लोग उसके पास से परमानन्द प्राप्त करके कृतार्थ हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
स꣢ ई꣣ꣳ र꣢थो꣣ न꣡ भु꣢रि꣣षा꣡ड꣢योजि म꣣हः꣢ पु꣣रू꣡णि꣢ सा꣣त꣢ये꣣ व꣡सू꣢नि । आ꣢दीं꣣ वि꣡श्वा꣢ नहु꣣꣬ष्या꣢꣯णि जा꣣ता꣡ स्व꣢र्षाता꣣ व꣡न꣢ ऊ꣣र्ध्वा꣡ न꣢वन्त ॥१४७२॥
पदार्थः(सः ईम्) वह यह (भुरिषाट्) बहुत-से विघ्नों को परास्त करनेवाला, (महः) महान् सोम नामक जीवात्मा (पुरूणि वसूनि) बहुत से ऐश्वर्यों को (सातये) प्राप्त करने के लिए (रथः न) रथ के समान (अयोजि) परमात्मा के साथ जुड़ गया है। (आत् ईम्) तदनन्तर ही (विश्वा) सब (जाता) बलवान् बने हुए (नहुष्याणि) मनुष्य के मन, बुद्धि आदि (स्वर्षाता) प्रकाश की प्राप्ति हो जाने पर (वने) तेज में (ऊर्ध्वा) ऊर्ध्वगामी होकर (नवन्त) क्रियाशील हो गये हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे रथ जब बिजली रूप अग्नि के साथ जुड़ जाता है, तब तुरन्त सक्रिय हो जाता है, वैसे ही परमात्मा की मित्रता में जुड़ा हुआ जीवात्मा स्वयं पुरुषार्थी होकर मन, बुद्धि आदि को भी सक्रिय कर देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - धैवतः
शु꣣ष्मी꣢꣫ शर्धो꣣ न꣡ मारु꣢꣯तं पव꣣स्वा꣡न꣢भिशस्ता दि꣣व्या꣢꣫ यथा꣣ वि꣢ट् । आ꣢पो꣣ न꣢ म꣣क्षू꣡ सु꣢म꣣ति꣡र्भ꣢वा नः स꣣ह꣡स्रा꣢प्साः पृतना꣣षा꣢꣫ण् न य꣣ज्ञः꣢ ॥१४७३॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् शान्तिप्रिय मानव ! (शुष्मी) बलवान् तू (मरुतां शर्धः न) पवनों के गण के समान (पवस्व) क्रियाशील बन। (दिव्या विट्) दिव्य गुणोंवाली विदुषी प्रजा (यथा) जैसे (अनभिशस्ता) अनिन्दित होती है, वैसे ही तू अनिन्दित हो। (आपः न) नदियों के समान (मक्षु) शीघ्र (नः) हमारे लिए (सुमतिः) परोपकार की मतिवाला (भव) बन। (सहस्राप्साः) सहस्र रूपोंवाले (पृतनाषाट् न) सेनाओं को पराजित करनेवाले सेनापति के समान (यज्ञः) आत्म-बलिदान करनेवाला बन ॥३॥ यहाँ मालोपमा अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमनुष्य यदि पवनों के समान बलवान् विद्वानों के समान प्रशस्त, नदियों के समान परोपकारी और सेनापतियों के समान आत्म-बलिदान करनेवाले हों, तो निश्चित ही राष्ट्र सर्वोन्नत हो जाए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -वर्धमाना गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
त्व꣡म꣢ग्ने य꣣ज्ञा꣢ना꣣ꣳ हो꣢ता꣣ वि꣡श्वे꣣षाꣳ हि꣣तः꣢ । दे꣣वे꣢भि꣣र्मा꣡नु꣢षे꣣ ज꣡ने꣢ ॥१४७४॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनेता, ज्ञानी, सर्वान्तर्यामी, तेजस्वी, पापों को दग्ध करनेवाले परमेश्वर ! (त्वम्) सर्वोपकारी आप (यज्ञानाम्) देवपूजा, सङ्गतिकरण, दान रूप व्यवहारों के (होता) दाता हो और (विश्वेषाम्) सबके (हितः) हितकर्ता हो। साथ ही (मानुषे जने) मानव-समाज में (देवेभिः) सदाचारी विद्वानों द्वारा [उपासना किये जाते हो] ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर हमारा पिता होकर हमें सब व्यवहार सिखाता है, न्यायकारी और दयालु होकर सबका हित करता है, इस कारण सब लोगों को उसकी पूजा करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣡ नो꣢ म꣣न्द्रा꣡भि꣢रध्व꣣रे꣢ जि꣣ह्वा꣡भि꣢र्यजा म꣣हः꣢ । आ꣢ दे꣣वा꣡न्व꣢क्षि꣣ य꣡क्षि꣢ च ॥१४७५॥
पदार्थःहे अग्ने ! हे सबके अग्रनेता परमात्मन् ! (सः) वह आप (मन्द्राभिः) आनन्दायिनी (जिह्वाभिः) वेदवाणियों से (अध्वरे) जीवन-यज्ञ में (नः) हमें (महः) तेज (यज) प्राप्त कराओ और (देवान्) दिव्यगुणों को (आवक्षि) लाओ, (यक्षि च) और हमारे साथ सङ्गति करो ॥२॥
भावार्थःजगत्पिता परमेश्वर की यह बड़ी भारी कृपा है कि उसने हमारे लिए वेदवाणी प्रदान की है, जिससे हमें अपने कर्तव्य का बोध होता है तथा जिससे हम तेज, पुरुषार्थ आदि की प्रेरणा पाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
वे꣢त्था꣣ हि꣡ वे꣢धो꣣ अ꣡ध्व꣢नः प꣣थ꣡श्च꣢ दे꣣वा꣡ञ्ज꣢सा । अ꣡ग्ने꣢ य꣣ज्ञे꣡षु꣢ सुक्रतो ॥१४७६॥
पदार्थःहे (वेधः) जगत् के विधाता, (देव) सबको प्रकाशित करनेवाले, (सुक्रतो) शुभ प्रजा और शुभ कर्मोंवाले, (अग्ने) अग्रनायक, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी परमात्मन् ! आप (हि) निश्चय ही (यज्ञेषु) जीवनयज्ञों में (अञ्जसा) शीघ्र या सरलतापूर्वक, हमारे लिए (अध्वनः) अभ्युदय के (पथः) और निश्रेयस के मार्गों को (वेत्थ) जानते तथा जनाते हो ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर हमें, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्गों को जनाकर हमारा परम मित्र होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
हो꣡ता꣢ दे꣣वो꣡ अम꣢꣯र्त्यः पु꣣र꣡स्ता꣢देति मा꣣य꣡या꣢ । वि꣣द꣡था꣢नि प्रचो꣣द꣡य꣢न् ॥१४७७॥
पदार्थः(होता) कार्यसिद्धि को देनेवाला, (देवः) दिव्य गुणोंवाला, (अमर्त्यः) अमर अग्निनामक परमेश्वर (विदथानि) ज्ञानों, कर्मों और उच्च विचारों को (प्रचोदयन्) अन्तरात्मा में प्रेरित करता हुआ (मायया) ऋतम्भरा प्रज्ञा के साथ (पुरस्तात्) सम्मुख (एति) आता है ॥१॥
भावार्थःयोगाभ्यास द्वारा योगी लोग योगसिद्धि पाकर परमात्मा को बिलकुल सामने देखते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
वा꣣जी꣡ वाजे꣢꣯षु धीयतेऽध्व꣣रे꣢षु꣣ प्र꣡ णी꣢यते । वि꣡प्रो꣢ य꣣ज्ञ꣢स्य꣣ सा꣡ध꣢नः ॥१४७८॥
पदार्थः(वाजी) बलवान् अग्नि नामक परमेश्वर (वाजेषु) देवासुरसंग्रामों में (धीयते) अन्तरात्मा में धारण किया जाता है और (अध्वरेषु) हिंसारहित व्यवहारों में (प्रणीयते) आगे लाया जाता है। वह (विप्रः) विशेष पूर्णता प्रदान करनेवाला तथा (यज्ञस्य साधनः) जीवन-यज्ञ को सफल करनेवाला है ॥२॥
भावार्थःजो परमेश्वर सबको सिद्धि देनेवाला है, उसकी सब लोगों को मनोयोगपूर्वक आराधना करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
धि꣣या꣡ च꣢क्रे꣣ व꣡रे꣢ण्यो भू꣣ता꣢नां꣣ ग꣢र्भ꣣मा꣡ द꣢धे । द꣡क्ष꣢स्य पि꣣त꣢रं꣣ त꣡ना꣢ ॥१४७९॥
पदार्थः(वरेण्यः) वरणीय और श्रेष्ठ वह अग्नि नामक परमात्मा, अपने उपासक को (तना धिया) विस्तृत बुद्धि के दान द्वारा (दक्षस्य) मनोबल का (पितरम्) पिता (चक्रे) बना देता है। साथ ही (भूतानाम्) उत्पन्न प्रशस्त जनों में (गर्भम्) सद्गुणों के गर्भ को (आ दधे) स्थापित करता है ॥३॥
भावार्थःउपासना किया हुआ जगदीश्वर उपासक का सखा बनकर उसके बल, विज्ञान और अध्यात्म-धन को बढ़ाता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, आनन्दरसप्रवाह और मानव-प्रेरणा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ तेरहवें अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
आ꣢ सु꣣ते꣡ सि꣢ञ्च꣣त श्रि꣢य꣣ꣳ रो꣡द꣢स्योरभि꣣श्रि꣡य꣢म् । र꣣सा꣡ द꣢धीत वृष꣣भ꣢म् ॥१४८०॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (सुते) भक्तिरस के उमड़ने पर (रोदस्योः) द्युलोक और भूलोक के (अभिश्रियम्) शोभा-सम्पादक, (श्रियम्) आश्रय लेने योग्य अग्नि-नामक जगदीश्वर को (आ सिञ्चत) भक्तिरस से नहलाओ। (रसा) जगदीश्वर से निकली हुई आनन्दरस की नदी (वृषभम्) तुम्हारे ज्ञानसिक्त जीवात्मा को (दधीत) बल और पुष्टि प्रदान करे ॥१॥ यहाँ ‘श्रियम्’ की पुनरुक्ति में यमक अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजब परमेश्वर के उपासक उसके प्रति भक्तिरस की नदी प्रवाहित करते हैं, तब परमेश्वर उनके प्रति आनन्द-रस की नदी बहाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ते꣡ जा꣢नत꣣ स्व꣢मो꣣क्यं꣢३꣱सं꣢ व꣣त्सा꣢सो꣣ न꣢ मा꣣तृ꣡भिः꣢ । मि꣣थो꣡ न꣢सन्त जा꣣मि꣡भिः꣢ ॥१४८१॥
पदार्थः(ते) वे परमेश्वर के उपासक (स्वम्) अपने (ओक्यम्) हृदय-सदन में विद्यमान परमात्माग्नि को (जानत) उपास्य रूप में जानते हैं और फिर उस परमेश्वर को उपासने के लिए (मिथः) आपस में (जामिभिः) माँ-बहिन आदियों के साथ (सं नसन्त) मिलकर बैठते हैं, (वत्सासः न) जैसे बछड़े (मातृभिः) अपनी माताओं गौओं के साथ (सं नसन्त) मिलते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे बछड़े प्रेम से गौओं के साथ रहते हैं, वैसे ही घर के बालक से लेकर बूढ़े तक सब लोग आपस में एक साथ बैठकर परमात्मा की उपासना किया करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣢प꣣ स्र꣡क्वे꣢षु꣣ ब꣡प्स꣢तः कृण्व꣣ते꣢ ध꣣रु꣡णं꣢ दि꣣वि꣢ । इ꣡न्द्रे꣢ अ꣣ग्ना꣢꣫ नमः꣣꣬ स्वः꣢꣯ ॥१४८२॥
पदार्थःउपासक लोग (स्रक्वेषु) आत्मसमर्पण होने पर (उप बप्सतः) समीप आकर पापों को खा लेनेवाले परमात्मा का (दिवि) अपने आत्मा में (धरुणम्) धारण (कृण्वते) करते हैं और वे (इन्द्रे) परमैश्वर्यशाली, विघ्नविदारक (अग्ना) अग्रनायक परमात्मा में (नमः) नमस्कार समर्पित करके (स्वः) प्रकाश को पा लेते हैं ॥३॥
भावार्थःध्यान द्वारा परमात्मा को अपने आत्मा में धारण करके, श्रद्धा से नमस्कार करके उपासकों को परम ज्योति प्राप्त करनी योग्य है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
त꣡दिदा꣢꣯स भु꣡व꣢नेषु꣣ ज्ये꣢ष्ठं꣣ य꣡तो꣢ ज꣣ज्ञ꣢ उ꣣ग्र꣢स्त्वे꣣ष꣡नृ꣢म्णः । स꣣द्यो꣡ ज꣢ज्ञा꣣नो꣡ नि रि꣢꣯णाति꣣ श꣢त्रू꣣न꣢नु꣣ यं꣢꣫ विश्वे꣣ म꣢द꣣न्त्यू꣡माः꣢ ॥१४८३॥
पदार्थः(तत् इत्) वह ब्रह्म ही (भुवनेषु) सूर्य, नक्षत्र आदि लोकलोकान्तरों में (ज्येष्ठम्) ज्येष्ठ (आस) है, (यतः) जिससे (उग्रः) प्रचण्ड, (त्वेषनृम्णः) प्रदीप्त ज्योतिरूप धनवाला अथवा प्रदीप्त बलवाला सूर्य (शत्रून्) अन्धकार, मलिनता, रोग आदि शत्रुओं को (नि रिणाति) विनष्ट करता है, (यम् अनु) जिसकी अनुकूलता से (विश्वे) सब (ऊमाः) रक्षक पृथिवी, मङ्गल, बुध, चन्द्रमा आदि (मदन्ति) प्रकाश और प्राण को प्राप्त करते हैं ॥१॥
भावार्थःज्येष्ठ ब्रह्म ही सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, तारामण्डल आदि लोक-लोकान्तरों का निर्माण करके इस ब्रह्माण्ड का सञ्चालन कर रहा है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
वा꣣वृधानः꣡ शव꣢꣯सा꣣ भू꣡र्यो꣢जाः꣣ श꣡त्रु꣢र्दा꣣सा꣡य꣢ भि꣣य꣡सं꣢ दधाति । अ꣡व्य꣢नच्च व्य꣣न꣢च्च꣣ स꣢स्नि꣣ सं꣡ ते꣢ नवन्त꣣ प्र꣡भृ꣢ता꣣ म꣡दे꣢षु ॥१४८४॥
पदार्थः(शवसा) बल से (वावृधानः) अतिशय बढ़ा हुआ, (भूर्योजाः) बहुत प्रतापी, (शत्रुः) दुष्टों का विनाश करनेवाला इन्द्र परमेश्वर (दासाय) यज्ञ आदि सत्कर्मों का विध्वंस करनेवाले को (भियसम्) भय (दधाति) देता है। हे इन्द्र परमात्मन् ! (अव्यनच्च) निर्जीव (व्यनत् च) और सजीव जगत् (सस्नि) आपसे ही संस्नात होता अर्थात् शुद्ध किया जाता है। हे देव ! (ते) आपके द्वारा उत्पन्न (मदेषु) आनन्दों में (प्रभृता) प्रकृष्टरूप से धारण और पुष्ट किये गये सब प्राणी (सन्नवन्त) आपकी स्तुति करते हैं ॥२॥
भावार्थःअनन्त बलवाले जगदीश्वर से दुष्ट लोग भय खाते हैं और सज्जन उससे पालित-पोषित होकर श्रद्धा से उसकी बारम्बार स्तुति करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
त्वे꣢꣫ क्रतु꣣म꣡पि꣢ वृञ्जन्ति꣣ वि꣢श्वे꣣ द्वि꣢꣫र्यदे꣣ते꣢꣫ त्रिर्भव꣣न्त्यू꣡माः꣢ । स्वा꣣दोः꣡ स्वादी꣢꣯यः स्वा꣣दु꣡ना꣢ सृजा꣣ स꣢म꣣दः꣢꣫ सु मधु꣣ म꣡धु꣢ना꣣भि꣡ यो꣢धीः ॥१४८५॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! (यत् एते) जो ये (ऊमाः) रक्षक माता, पिता, अतिथि, संन्यासी आदि लोग (द्विः) दो बार, या (त्रिः) तीन बार (भवन्ति) जन्म लेते हैं, वे (त्वे) आपमें ही (क्रतुम्) किये जाते हुए सब कर्म को (अपि वृञ्जन्ति) समर्पित करते हैं। आप (स्वादुना) मेरे स्वादु आनन्द के साथ (स्वादोः स्वादीयः) अपने स्वादुतर आनन्द को (संसृज) मिला दो। (अदः) इस (सुमधु) अति मधुर अपने रस को (मधुना) मेरे मधुर जीवन के साथ (अभियोधीः) मिला दो ॥३॥ यहाँ स्वादोः, स्वादीय, स्वादु में वृत्त्यनुप्रास है, द, स और ध की आवृत्ति में भी वही अनुप्रास है। ‘मधु, मधु’ में छेकानुप्रास है ॥३॥
भावार्थःएक जन्म माता-पिता से और दूसरा जन्म आचार्य से पाकर मनुष्य द्विज बनता है और जो गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके सन्तान उत्पन्न करता है, वह इसका तृतीय जन्म होता है, क्योंकि ‘पिता स्वयं पुत्र के रूप में जन्म लेता है’ (निरु० ३।४) यह शास्त्र का वचन है। जो भी द्विज या त्रिज महापुरुष होते हैं, वे परमात्मा में ही अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं और परमात्मा उनके लिए अत्यन्त मधुर अपना आनन्द-रस बरसाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अष्टिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्रि꣡क꣢द्रुकेषु महि꣣षो꣡ यवा꣢꣯शिरं तुविशु꣣ष्म꣢स्तृ꣣म्प꣡त्सो꣢꣯ममपिब꣣द्वि꣡ष्णु꣢ना सु꣣तं꣡ य꣢थाव꣣श꣢म् । स꣡ ईं꣢ ममाद꣣ म꣢हि꣣ क꣢र्म꣣ क꣡र्त꣢वे म꣣हा꣢मु꣣रु꣡ꣳ सैन꣢꣯ꣳ सश्चद्दे꣣वो꣢ दे꣣व꣢ꣳ स꣣त्य꣡ इन्दुः꣢꣯ स꣣त्य꣡मिन्द्र꣢꣯म् ॥१४८६॥
पदार्थः(त्रिकद्रुकेषु) तीन ऋग्, यजुः, साम रूप साधनोंवाले उपासना-यज्ञों में (महिषः) महान् जीवात्मा (विष्णुना) सर्वव्यापक परमात्मा से (सुतम्) चुआए हुए, (यवाशिरम्) योगाभ्यास से परिपक्व, (तुविशुष्मम्) बहुत बलदायक (सोमम्) ब्रह्मानन्द-रस को (यथावशम्) यथेच्छ (अपिबत्) पीता है। (सः) वह ब्रह्मानन्द-रस (महाम्) महान्, (उरुम्) विस्तृत ज्ञानवाले (ईम्) इस जीवात्मा को (महि कर्म) महान् कर्म (कर्तवे) करने के लिए (ममाद) उत्साहित करता है। (सः) वह (देवः) प्रकाशक, (सत्यः) सत्य, (इन्दुः) उपासक को भिगोनेवाला ब्रह्मानन्द--रस (देवम्) दिव्य-गुण-युक्त, (सत्यम्) सत्य के प्रेमी (एनम् इन्द्रम्) इस जीवात्मा को (सश्चत्) निरन्तर प्राप्त होता रहता है ॥१॥
भावार्थःवेदमन्त्रों के गानपूर्वक मनुष्य जब परमात्मा को ध्याता है,तब परमात्मा के पास से धारा-प्रवाह में बहता हुआ परमानन्द-रस उसके आत्मा को निरन्तर नहलाता रहता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अतिशक्वरी| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
सा꣣कं꣢ जा꣣तः꣡ क्रतु꣢꣯ना सा꣣क꣡मोज꣢꣯सा ववक्षिथ सा꣣कं꣢ वृ꣣द्धो꣢ वी꣣꣬र्यैः꣢꣯ सास꣣हि꣢꣫र्मृधो꣣ वि꣡च꣢र्षणिः । दा꣢ता꣣ रा꣡ध꣢ स्तुव꣣ते꣢꣫ काम्यं꣣ व꣢सु꣣ प्र꣡चे꣢तन꣣ सै꣡न꣢ꣳ सश्चद्दे꣣वो꣢ दे꣣व꣢ꣳ स꣣त्य꣡ इन्दुः꣢꣯ स꣣त्य꣡मिन्द्र꣢꣯म् ॥१४८७॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! आप (क्रतुना) कर्म और प्रज्ञा के (साकम्) साथ और (ओजसा) बल के (साकम्) साथ (जातः) प्रसिद्ध हो। इसी कारण आप (ववक्षिथ) जगत् के भार को वहन कर रहे हो। आप (वीर्यैः साकम्) पराक्रमों के साथ (वृद्धः) प्रवृद्ध, (मृधः सासहिः) हिंसकों को परास्त करनेवाले, (विचर्षणिः) पुण्यकर्ताओं और अपुण्यकर्ताओं को विवेकपूर्वक देखनेवाले हो। हे (प्रचेतन) उत्कृष्टरूप से चेतानेवाले ! आप (स्तुवते) स्तुतिकर्ता जन के लिए (राधः) सफलता, और (काम्यं वसु) अभीष्ट ऐश्वर्य के (दाता) देनेवाले हो। (सः) वह (देवः) दिव्यगुणोंवाला, (सत्यः) सत्य का प्रेमी (इन्दुः) तेजस्वी स्तोता (एनम्) इस (देवम्) दिव्य गुणोंवाले, (सत्यम्) सत्य गुण, कर्म, स्वभाववाले (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् आप जगदीश्वर को (सश्चत्) प्राप्त कर लेवे ॥२॥
भावार्थःजो ज्ञान, कर्म, बल और पराक्रम में सर्वाधिक है और सदाचारी स्तोता के उत्तम मनोरथों को पूर्ण करनेवाला है, उस जगदीश्वर को ध्याकर और पाकर सब मनुष्य पूर्ण मनोरथोंवाले हों ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अतिशक्वरी| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢ध꣣ त्वि꣡षी꣢माꣳ अ꣣भ्यो꣡ज꣢सा꣣ कृ꣡विं꣢ यु꣣धा꣡भ꣢व꣣दा꣡ रोद꣢꣯सी अपृणदस्य म꣣ज्म꣢ना꣣ प्र꣡ वा꣢वृधे । अ꣡ध꣢त्ता꣣न्यं꣢ ज꣣ठ꣢रे꣣ प्रे꣡म꣢रिच्यत꣣ प्र꣡ चे꣢तय꣣ सै꣡न꣢ꣳ सश्चद्दे꣣वो꣢ दे꣣व꣢ꣳ स꣣त्य꣡ इन्दुः꣢꣯ स꣣त्य꣡मिन्द्र꣢꣯म् ॥१४८८॥
पदार्थः(अध) और (त्विषीमान्) प्रशस्त तेजवाला वह इन्द्र जगदीश्वर (ओजसा) बल से (युधा) युद्ध द्वारा (क्रिविम्) हिंसक जन को (अभि अभवत्) परास्त कर देता है। वही (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (आ पृणत्) जल, तेज आदि ऐश्वर्यों से भरपूर करता है। (अस्य) इस इन्द्र जगदीश्वर के (मज्मना) बल से, यह सब जगत् (प्र वावृधे) प्रवृद्ध होता है। वह जगदीश्वर (अन्यम्) किसी को अर्थात् दुष्टाचारी को (जठरे) भूकम्प आदि से भूमि को फाड़कर उसके पेट में (अधत्त) डाल देता है और (ईम्) कोई अर्थात् सदाचारी मनुष्य (प्र अरिच्यत) इसकी महिमा से बढ़ता है। (सः) वह (देवः) दिव्यगुणी, (सत्यः) सत्य का प्रेमी (इन्दुः) तेजस्वी उपासक (देवम्) प्रकाश देनेवाले, (सत्यम्) सत्य गुण, कर्म स्वभाववाले (एनम् इन्द्रम्) इस परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर को (सश्चत्) प्राप्त करे। हे जगदीश्वर ! आप उस उपासक को (प्रचेतय) प्रज्ञानयुक्त करो ॥३॥
भावार्थःजो सज्जनों को पीड़ित करते हैं, उन्हें जो जगत् का स्रष्टा, अपरिमित बलवाला, न जीता जा सकनेवाला जगदीश्वर यथायोग्य दण्डित करता है, उसकी सब लोग श्रद्धा और प्रेम से उपासना करके अपने अभीष्टों को पूर्ण करें ॥३॥ इस खण्ड में उपास्य-उपासक विषय का और परमात्मा की महिमा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ तेरहवें अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ तेरहवाँ अध्याय समाप्त॥ षष्ठ प्रपाठक में तृतीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ प्र गोप꣢꣯तिं गि꣣रे꣡न्द्र꣢मर्च꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ । सू꣣नु꣢ꣳ स꣣त्य꣢स्य꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥१४८९॥
पदार्थःहे मित्र ! तू (गोपतिम्) इन्द्रियों के स्वामी, (सत्यस्य सूनुम्) सत्यस्वरूप परमात्मा के पुत्र, (सत्पतिम्) श्रेष्ठ विचारों के रक्षक (इन्द्रम्) इन्द्र नामक जीवात्मा को (अभि) लक्ष्य करके (प्र अर्च) बहुत अधिक उद्बोधन-वाक्यों का उच्चारण कर, (यथा) जिससे वह (विदे) बोध प्राप्त कर ले ॥१॥
भावार्थःमनुष्य का अपना आत्मा यदि तीव्र उद्बोधन प्राप्त कर ले, तो जगत् में उसके लिए कुछ भी दुर्लभ न हो ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ ह꣢꣯रयः ससृज्रि꣣रे꣡ऽरु꣢षी꣣र꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । य꣢त्रा꣣भि꣢ सं꣣न꣡वा꣢महे ॥१४९०॥
पदार्थः(बर्हिषि अधि) यज्ञरूप इस देह में (अरुषीः) यज्ञ को न हिंसित करनेवाले (हरयः) मन और प्राणसहित ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़े (आ ससृज्रिरे) आकर जुड़े हुए हैं,(यत्र) जिस देह-यज्ञ में स्थित इन्द्र जीवात्मा को, हम (अभि संनवामहे) संस्तुत करते हैं, उद्बोधन देते हैं ॥२॥
भावार्थःजो लोग शरीर को यज्ञस्थल, उसमें स्थित इन्द्रियों को ऋत्विज् और जीवात्मा को यजमान मानकर पवित्र जीवन बिताते हैं, वे सफल होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ गा꣡व꣢ आ꣣शि꣡रं꣢ दुदु꣣ह्रे꣢ व꣣ज्रि꣢णे꣣ म꣡धु꣢ । य꣡त्सी꣢मुपह्व꣣रे꣢ वि꣣द꣢त् ॥१४९१॥
पदार्थः(वज्रिणे) वीर्यवान् (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (गावः) मन और बुद्धि सहित इन्द्रियरूप धेनुएँ (मधु) मधुर (आशिरम्) ज्ञानरूप दूध को (दुदुह्रे) दुहती हैं, (यत्) जिस ज्ञान-दुग्ध को वह इन्द्र जीवात्मा (सीम्) सब ओर से (उपह्वरे) अपने समीप (विदत्) लाता है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा ने जीवात्मा को मन, बुद्धि, इन्द्रियरूप श्रेष्ठ साधन प्रदान किये हैं, जिनसे वह सारा ज्ञान अर्जित कर सकता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
आ꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢सु꣣ ह꣢व्य꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣म꣡त्सु꣢ भूषत । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि꣣ स꣡व꣢नानि वृत्रहन्परम꣣ज्या꣡ ऋ꣢चीषम ॥१४९२॥
पदार्थःहे राष्ट्रवासी जनो ! तुम (विश्वासु समत्सु) सब देवासुरसंग्रामों में (नः) हम प्रजाजनों के (हव्यम्) आह्वान करने योग्य (इन्द्रम्) परमात्मा वा राजा को (आभूषत) स्वागत-गानों से अलङ्कृत करो। हे (वृत्रहन्) विघ्न-विदारक, पाप-दल के विध्वंसक, (ऋचीषम) स्तोताओं को मान देनेवाले परमात्मन् वा राजन् ! (परमज्याः) प्रबल आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को विनष्ट करनेवाले आप, हमारे (ब्रह्माणि) ब्रह्मयज्ञों में, तथा (सवनानि) सोमयाग के प्रातः-सवन, माध्यन्दिन-सवन और सायं-सवनों में (उप) आओ ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर नास्तिक पापियों को दण्ड देकर और धर्मात्मा आस्तिक लोगों से मित्रता करके धार्मिकता का पोषण करता है, वैसे ही राजा भी करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
त्वं꣢ दा꣣ता꣡ प्र꣢थ꣣मो꣡ राध꣢꣯साम꣣स्य꣡सि꣢ स꣣त्य꣡ ई꣢शान꣣कृ꣢त् । तु꣣विद्युम्न꣢स्य꣣ यु꣡ज्या वृ꣢꣯णीमहे पु꣣त्र꣢स्य꣣ श꣡व꣢सो म꣣हः꣢ ॥१४९३॥
पदार्थःहे इन्द्र अर्थात् परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर वा राजन् ! (त्वम्) आप (राधसाम्) ऐश्वर्यों के (प्रथमः) श्रेष्ठ (दाता) दाता, (सत्यः) सत्य के प्रेमी और (ईशानकृत्) निर्धनों को भी धन के स्वामी बना देनेवाले (असि) हो। (तुविद्युम्नस्य) बहुत धनी वा यशस्वी, (शवसः पुत्रस्य) बल के पुत्र अर्थात् अति बली, (महः) महान् आपके (युज्या) मित्रभाव को, सहयोग को (वृणीमहे) हम वरते हैं ॥२॥
भावार्थःपरमदानी, अतिशक्तिशाली परमात्मा और राजा की मैत्री को स्वीकार करके निर्धन भी धनवान्, कुछ करने में असमर्थ भी बहुत कार्य कर सकनेवाले, सेवक भी स्वामी और निन्दित भी यशस्वी हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -ऊर्ध्वा बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
प्र꣣त्नं꣢ पी꣣यू꣡षं꣢ पू꣣र्व्यं꣢꣫ यदु꣣꣬क्थ्यं꣢꣯ म꣣हो꣢ गा꣣हा꣢द्दि꣣व꣡ आ निर꣢꣯धुक्षत । इ꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ जाय꣢꣯मान꣣ꣳ स꣡म꣢स्वरन् ॥१४९४॥
पदार्थः(यत्) जो (प्रत्नम्) सनातन, (पूर्व्यम्) पूर्वजों से अनुभूत और (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय है, उस (पीयूषम्) पान करने योग्य ब्रह्मानन्द-रूप अमृत को (महः) महान्, (गाहात्) गहन (दिवः) प्रकाशमय परमेश्वर से (आ निरधुक्षत) उपासक लोग दुहकर प्राप्त कर लेते हैं। (इन्द्रम् अभि) जीवात्मा के प्रति (जायमानम्) उत्पन्न होते हुए उसकी (ते) वे उपासक जन (समस्वरन्) भली-भाँति स्तुति करते हैं ॥१॥
भावार्थःपरब्रह्म के पास से जीवात्मा के प्रति प्रवाहित होते हुए आनन्द-रस का उपासक लोग स्वागत-गानपूर्वक अभिनन्दन करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -ऊर्ध्वा बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
आ꣢दीं꣣ के꣢ चि꣣त्प꣡श्य꣢मानास꣣ आ꣡प्यं꣢ वसु꣣रु꣡चो꣢ दि꣣व्या꣢ अ꣣꣬भ्य꣢꣯नूषत । दि꣣वो꣡ न वार꣢꣯ꣳ सवि꣣ता꣡ व्यू꣢र्णुते ॥१४९५॥
पदार्थः(आत्) जब परब्रह्म के पास से बहता हुआ ब्रह्मानन्द-रस जीवात्मा को प्राप्त होने लगता है, उसके अनन्तर इस ब्रह्मानन्द के (आप्यम्) अपने साथ बन्धुत्व को (पश्यमानासः) देखते हुए, (वसुरुचः) अग्नि, बिजली और आदित्य के समान कान्तिवाले तेजस्वी (केचित्) कोई (दिव्याः) दीप्तिमान् ब्रह्म का साक्षात्कार करने में निपुण उपासक (ईम्) इस ब्रह्मानन्द-रस की (अभ्यनूषत) स्तुति करते हैं। (सविता) सूर्य (दिवः न वारम्) जैसे आकाश के शिशु चन्द्रमा को अपने प्रकाश से (व्यूर्णुते) आच्छादित करता है, वैसे ही (सविता) रस का प्रवाहक सोम परमेश्वर उन उपासकों को (व्यूर्णुते) आनन्द-रस से आच्छादित करता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमा स्नान करता है, वैसे ही परमात्मा के आनन्द-रस से जीव ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -ऊर्ध्वा बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
अ꣢ध꣣ य꣢दि꣣मे꣡ प꣢वमान꣣ रो꣡द꣢सी इ꣣मा꣢ च꣣ वि꣢श्वा꣣ भु꣡व꣢ना꣣भि꣢ म꣣ज्म꣡ना꣢ । यू꣣थे꣢꣫ न नि꣣ष्ठा꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ वि रा꣢꣯जसि ॥१४९६॥
पदार्थः(अध) और, हे (पवमान) क्रियाशील परमात्मन् ! आप (यत्) जब (इमे रोदसी) इन द्युलोक और भूलोक को (इमा च) तथा इन (विश्वा भुवना) सब भुवनों को (मज्मना) बल से (अभि) अभिभूत करते हो, तब (यूथे न) जैसे गौओं के झुण्ड में (निष्ठाः) स्थित (वृषभा) साँड शोभा पाता है, वैसे ही आप (विराजसि) शोभते हो ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे गौओं के झुण्ड में वृषभ अपने महत्व के कारण पृथक् शोभा पाता है, वैसे ही ब्रह्माण्ड के लोक-लोकान्तरों के मध्य जगत्स्रष्टा परमेश्वर सर्वाधिक महिमा के कारण पृथक् भासित होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
इ꣣म꣢मू꣣ षु꣢꣫ त्वम꣣स्मा꣡क꣢ꣳ स꣣निं꣡ गा꣢य꣣त्रं꣡ नव्या꣢꣯ꣳसम् । अ꣡ग्ने꣢ दे꣣वे꣢षु꣣ प्र꣡ वो꣢चः ॥१४९७॥
पदार्थःहे (अग्ने) विद्वन् जगदीश्वर वा आचार्य ! (त्वम् उ) आप (इमम्) इस (अस्माकं सनिम्) हमें बहुत बोध देनेवाले (गायत्रम्) गायत्री आदि छन्दों से युक्त वेदज्ञान को वा गायत्र नामक साम को (देवेषु) दिव्य गुणोंवाले सत्पात्रों में (सु प्रवोचः) भली-भाँति उपदेश करते हो ॥१॥
भावार्थःजैसे सृष्टि के आदि में जगदीश्वर अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा नामक ऋषियों के हृदय में चारों वेदों को प्रेरित करता है, वैसे ही गुरु लोग आजकल के सत्पात्र शिष्यों को वेदज्ञान का उपदेश करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
वि꣣भक्ता꣡सि꣢ चित्रभानो꣣ सि꣡न्धो꣢रू꣣र्मा꣡ उ꣢पा꣣क꣢ आ । स꣣द्यो꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ क्षरसि ॥१४९८॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (चित्रभानो) अद्भुत तेजवाले अग्नि नामक परमात्मन् ! आप (विभक्ता असि) अपने तेज को अन्य सूर्य आदि पदार्थों में बाँटनेवाले हो। आप (सिन्धोः) समुद्र वा नदी की (उर्मौ) लहर में विद्यमान हो। आप (उपाके) सबके समीप (आ) विराजमान हो। आप (दाशुषे) आत्मसमर्पणकर्ता उपासक के लिए (सद्यः) शीघ्र ही (क्षरसि) आनन्द को चुआते हो ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। हे (चित्रभानो) अद्भुत विद्या-प्रकाश से पूर्ण विद्वान् आचार्य ! आप (विभक्ता असि) अन्यों में विद्या को बांटनेवाले हो। (सिन्धोः उर्मौ उपाके) नदी के लहरोंवाले प्रवाह के निकट (आ) गुरुकुल आश्रम की स्थापना करके निवास करते हो और वहाँ (सद्यः) जल्दी-जल्दी (दाशुषे) आत्मसमर्पक शिष्य के लिए (क्षरसि) विद्या को बरसाते हो ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर सब वस्तुएँ अपनी प्रजाओं में बाँटते हैं, वैसे ही गुरु लोग सब विद्याएँ अपने शिष्यों में बाँटें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
आ꣡ नो꣢ भज पर꣣मे꣡ष्वा वाजे꣢꣯षु मध्य꣣मे꣡षु꣢ । शि꣢क्षा꣣ व꣢स्वो꣣ अ꣡न्त꣢मस्य ॥१४९९॥
पदार्थःहे अग्ने ! हे विद्वन् परमात्मन् वा आचार्य ! आप (परमेषु) परा-विद्या से उत्पन्न होनेवाले उच्च (वाजेषु) विज्ञानों में (नः आ भज) हमें भागी बनाओ, (मध्यमेषु) अपरा विद्या से उत्पन्न होनेवाले मध्यम (वाजेषु) विज्ञानों में (आ भज) भागी बनाओ और (अन्तमस्य) आपके समीप विद्यमान (वस्वः) सकल ऐश्वर्य का भी (शिक्ष) दान करो ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से तथा योग्य गुरुओं की शिक्षा से सब लोग ‘परा विद्या वह है, जिससे उस अविनश्वर परब्रह्म की प्राप्ति होती है (मु० २।५)’ इस लक्षणवाली परा विद्या को, ‘अपरा विद्या है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त छन्द, ज्योतिष (मु० २।५)’ इस लक्षणवाली अपरा विद्या को और सकल चाँदी, सोना, मणि, मोती आदि धन को प्राप्त करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣ह꣢꣫मिद्धि पि꣣तु꣡ष्परि꣢꣯ मे꣣धा꣢मृ꣣त꣡स्य꣢ ज꣣ग्र꣡ह꣢ । अ꣣ह꣡ꣳ सूर्य꣢꣯ इवाजनि ॥१५००॥
पदार्थः(अहम्) मैंने (इत् हि) निश्चय ही (पितुः परि) पालनकर्ता पिता, आचार्य वा परमेश्वर से (ऋतस्य) सत्य ज्ञान और सत्य आचरण की (मेधाम्) बुद्धि को (जग्रह) ग्रहण कर लिया है। (अहम्) सत्यज्ञान वा सत्य आचरण को प्राप्त मैं (सूर्यः इव) सूर्य के समान सर्वोन्नत, प्रकाशवान् और प्रकाशक (अजनि) हो गया हूँ ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजो माता, पिता वा आचार्य के पास से तथा परमेश्वर की प्रेरणा से सब विद्याओं और सदाचार को सीखकर उनका यथायोग्य सत्कार तथा पूजन करते हैं और दूसरों को विद्याएँ तथा सदाचार सिखाते हैं, वे प्रशंसित होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣हं꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना꣣ गि꣡रः꣢ शुम्भामि कण्व꣣व꣢त् । ये꣢꣫नेन्द्रः꣣ शु꣢ष्म꣣मि꣢द्द꣣धे꣢ ॥१५०१॥
पदार्थः(अहम्) मैं महत्वाकाङ्क्षी जन (प्रत्नेन जन्मना) आचार्य के पास से प्राप्त श्रेष्ठ जन्म से (कण्ववत्) मेधावी विद्वान् के समान (गिरः) अपनी वाणियों को (शुम्भामि) सत्य भाषण से अलङ्कृत करता हूँ, (येन) जिससे (इन्द्रः) मेरा जीवात्मा (शुष्मम् इत्) बल को ही (दधे) धारण करता है ॥२॥
भावार्थःआचार्य और सावित्री के पास से द्वितीय जन्म ग्रहण कर, द्विज होकर जो मन, वाणी और कर्म से सत्य का ही अनुष्ठान करता है, वह पवित्र आत्मावाला और सबल आत्मावाला होकर सबसे सत्कार पाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ये꣡ त्वामि꣢꣯न्द्र꣣ न꣡ तु꣢ष्टु꣣वु꣡रृष꣢꣯यो꣣ ये꣡ च꣢ तुष्टु꣣वुः꣢ । म꣡मे꣢꣯द्वर्धस्व꣣ सु꣡ष्टु꣢तः ॥१५०२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान्, दोषहन्ता, सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! (ये) जो निरीश्वरवादी लोग (त्वाम्) आपकी (न तुष्टुवुः) स्तुति नहीं करते हैं, (ये च ऋषयः) और जो तत्त्वदर्शी, वेदार्थवेत्ता, आपके स्वरूप का साक्षात्कार करनेवाले विद्वान् जन (तुष्टुवुः) महिमा-वर्णन द्वारा आपकी स्तुति करते हैं, वे अपनी इच्छा के अनुसार भले ही व्यवहार करें, किन्तु (मम) मेरे स्तोत्र से (सुष्टुतः) भली-भाँति आराधना किये गये आप, मेरे अन्तरात्मा में (वर्धस्व इत्) अवश्य वृद्धि को प्राप्त होओ ॥३॥
भावार्थःकोई लोग कहते हैं कि परमेश्वर नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, यदि है भी तो वह उपेक्षा योग्य है। भले ही वे उसकी स्तुति न करें। मेरी जीवन-नौका का तो वही कर्णधार है, इसलिए मैं बार-बार उसका वन्दन करता हूँ और अभिनन्दन करता हूँ ॥३॥ इस खण्ड में जीवात्मा, परमात्मा, ब्रह्मानन्द, राजा, आचार्य और स्तोता के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चौदहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - गान्धारः
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡श्वे꣢भिर꣣ग्नि꣢भि꣣र्जो꣢षि꣣ ब्र꣡ह्म꣢ सहस्कृत । ये꣡ दे꣢व꣣त्रा꣢꣫ य आ꣣यु꣢षु꣣ ते꣡भि꣢र्नो महया꣣ गि꣡रः꣢ ॥१५०३
पदार्थः(हे सहस्कृत) ध्यान-बल से प्रकट किये गये (अग्ने) विश्ववन्द्य परमात्मन् ! आप (विश्वेभिः) सब (अग्निभिः) तेजों के साथ (ब्रह्म) हमारे अन्तरात्मा को (जोषि) प्राप्त होओ। (ये) जो तेज (देवत्रा) प्रकाशक बिजली, सूर्य आदियों में हैं और (ये) जो तेज (आयुषु) मनुष्यों में हैं, (तेभिः) उनसे (नः) हमारी (गिरः) वाणियों को (महया) महिमामय करो ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा ने जो अग्नियाँ रची हैं, उनसे तेज के तत्त्व को लेकर हम अपने वाणी, मन, बुद्धि, आत्मा आदि को तेजस्वी बनायें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡ स विश्वे꣢꣯भिर꣣ग्नि꣡भि꣢र꣣ग्निः꣡ स यस्य꣢꣯ वा꣣जि꣡नः꣢ । त꣡न꣢ये तो꣣के꣢ अ꣣स्म꣢꣫दा स꣣म्य꣢꣫ङ्वाजैः꣢ प꣡री꣢वृतः ॥१५०४
पदार्थः(अग्निः) अग्नि नाम से प्रसिद्ध जगदीश्वर (सः) वह है, (यस्य) जिसके रचे हुए (वाजिनः) बलवान् मन, बुद्धि, प्राण, आदि और सूर्य, चन्द्र आदि हैं। (सः) वह (विश्वेभिः अग्निभिः) अपनी रची हुई आग, बिजली, सूर्य आदि सब अग्नियों के कारण (प्र) प्रशंसनीय बना हुआ है। (वाजैः) बलों से (परीवृतः) घिरा हुआ वह (अस्मत्) हममें और (तोके तनये) हमारे पुत्र, पौत्र आदियों में (सम्यङ्) भली-भाँति (आ) आये ॥२॥
भावार्थःन केवल हम, प्रत्युत हमारी भावी सन्ततियाँ भी अध्यात्ममार्ग की पथिक होवें ॥२॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - गान्धारः
त्वं꣡ नो꣢ अग्ने अ꣣ग्नि꣢भि꣣र्ब्र꣡ह्म꣢ य꣣ज्ञं꣡ च꣢ वर्धय । त्वं꣡ नो꣢ दे꣣व꣡ता꣢तये रा꣣यो꣡ दाना꣢꣯य चोदय ॥१५०५॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रणायक, ज्योतिप्रदायक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ जगदीश्वर ! (त्वम्) सर्वशक्तिमान् आप (अग्निभिः) अपनी ज्योतियों से (नः) हमारे (ब्रह्म) जीवात्मा को (यज्ञं च) और हमारे द्वारा किये जानेवाले उपासना, मानवसेवा आदि यज्ञ को (वर्धय) बढ़ाओ। आप (देवतातये) राष्ट्रोत्थानरूप यज्ञ की पूर्ति के लिए (नः) हमें (रायः) विद्या, सुवर्ण, धान्य आदि धन के (दानाय) दान के लिए (चोदय) प्रेरित करो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा के तेज से तेजस्वी होकर हम परमात्मा के समान परोपकार-यज्ञ में संलग्न होवें और विद्या, धन, धान्य आदि का दान करते हुए समाज को उन्नत करें ॥३॥
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छन्द -ऊर्ध्वा बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
त्वे꣡ सो꣢म प्रथ꣣मा꣢ वृ꣣क्त꣡ब꣢र्हिषो म꣣हे꣡ वाजा꣢꣯य श्र꣡व꣢से꣣ धि꣡यं꣢ दधुः । स꣡ त्वं नो꣢꣯ वीर वी꣣꣬र्या꣢꣯य चोदय ॥१५०६॥
पदार्थःहे (सोम) जगत् के उत्पादक, शुभ गुण-कर्म-स्वाभाव के प्रेरक, सबको आह्लाद देनेवाले परमात्मन् ! (प्रथमाः) श्रेष्ठ (वृक्तबर्हिषः) उपासना-यज्ञ में कुशाओं का आसन बिछाये हुए यजमान (महे वाजाय) महान् बल के लिए और (श्रवसे) यश के लिए (त्वे) आपमें (धियं दधुः) ध्यान लगाते हैं। (सः त्वम्) वह सब श्रेष्ठ जनों से ध्यान किये गये आप (नः) हम ध्यानकर्ताओं को (वीर्याय) वीर कर्म के लिए (चोदय) प्रेरित कीजिए ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के ध्यानकर्ता लोग बली होकर शुभ्र, लोकहितकारी कर्मों को करते हुए यशस्वी होते हैं ॥१॥
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छन्द -ऊर्ध्वा बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
अ꣣꣬भ्य꣢꣯भि꣣ हि꣡ श्रव꣢꣯सा त꣣त꣢र्दि꣣थो꣢त्सं꣣ न꣡ कं चि꣢꣯ज्जन꣣पा꣢न꣣म꣡क्षि꣢तम् । श꣡र्या꣢भि꣣र्न꣡ भर꣢꣯माणो꣣ ग꣡भ꣢स्त्योः ॥१५०७॥
पदार्थःहे सोम नामक जगत्पति परमात्मन् ! (श्रवसा) यश से प्रसिद्ध आप (अक्षितम् उत्सं न) अक्षय जल-स्रोत के समान(अक्षितं जनपानम्) मनुष्यों से पान करने योग्य अक्षय आनन्द-रस को (अभ्यभि हि) उपासकों के प्रति (ततर्दिथ) बहाते हो और (गभस्त्योः) बाहुओं की (शर्याभिः न) अंगुलियों से जैसे कोई मनुष्य किसी वस्तु को पकड़ता है, वैसे ही आपने (गभस्त्योः) द्यावापृथिवी की (शर्याभिः) किरणों से (भरमाणः) लोक लोकान्तरों को धारण किया हुआ है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे स्रोत से बहता हुआ जलप्रवाह भूभाग को आप्लावित कर देता है, वैसे ही परमात्मा के पास से बहता हुआ आनन्द-रस उपासकों के अन्तःकरण को आप्लावित करता है और जैसे बाहुओं की अंगुलियों से कोई किसी पदार्थ को धारण करता है, वैसे ही जगदीश्वर द्यावापृथिवी में व्याप्त सूर्य-रश्मियों से विभिन्न लोकों को धारण करता है ॥२॥
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छन्द -ऊर्ध्वा बृहती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
अ꣡जी꣢जनो अमृत꣣ म꣡र्त्या꣢य꣣ क꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ ध꣡र्म꣢न्न꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ चा꣡रु꣢णः । स꣡दा꣢सरो꣣ वा꣢ज꣣म꣢च्छा꣣ स꣡नि꣢ष्यदत् ॥१५०८॥
पदार्थःहे (अमृत) अमर सोम जगदीश्वर ! आपने (मर्त्याय) मनुष्य ले लिए (ऋतस्य धर्मन्) जल वा सत्यनियम के धारणकर्ता आकाश में (चारुणः) कल्याणकारी, (अमृतस्य) अमृतमय बादल वा सूर्य के (कम्) सुखकारी जल वा प्रकाश को (अजीजनः) उत्पन्न किया है। साथ ही (वाजम् अच्छ) बल प्राप्त कराने के लिए (सनिष्यदत्) प्रवृत्त होते हुए आप (सदा) हमेशा (असरः) धार्मिक उपासकों को प्राप्त होते हो ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर का हमारे प्रति कितना उपकार है कि वह हमारे लिए आकाश में जल बरसानेवाले बादल को और तेज के खजाने सूर्य को स्थापित करता है और वही सब विपदाओं तथा विघ्नों से मुकाबला करने के लिए हमें मनोबल भी देता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
ए꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य सिञ्चत꣣ पि꣡बा꣢ति सो꣣म्यं꣡ मधु꣢꣯ । प्र꣡ राधा꣢꣯ꣳसि चोदयते महित्व꣣ना꣢ ॥१५०९॥
पदार्थःहे साथियो ! तुम (इन्द्राय) अपने अन्तरात्मा के लिए (इन्द्रम्) सराबोर करनेवाले ब्रह्मानन्द-रस को (आ सिञ्चत) प्रवाहित करो। वह अन्तरात्मा (सोम्यम्) शान्तिकारी (मधु) उस मधुर ब्रह्मानन्द-रस को (पिबाति) पिये। पिया हुआ वह ब्रह्मानन्द-रस (महित्वना) अपनी महिमा से (राधांसि) ऐश्वर्यों को (प्रचोदयते) प्रेरित करे ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के पास से बहता हुआ आनन्द-रस जीवात्मा से पान किये जाने पर बहुत कल्याणकारी होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
उ꣢पो꣣ ह꣡री꣢णां꣣ प꣢ति꣣ꣳ रा꣡धः꣢ पृ꣣ञ्च꣡न्त꣢मब्रवम् । नू꣣न꣡ꣳ श्रु꣢धि स्तुव꣣तो꣢ अ꣣श्व्य꣡स्य꣢ ॥१५१०॥
पदार्थः(हरीणाम्) आकर्षण के गुण से एक-दूसरे के साथ बँधे हुए सूर्य, भूमण्डल, मङ्गल, बुध, चन्द्र, नक्षत्र आदियों के अथवा ज्ञान और कर्म का आहरण करनेवाली ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के (पतिम्) स्वामी, (राधः) ऐश्वर्य को (पृञ्चन्तम्) प्रदान करनेवाले इन्द्र परमात्मा के (उप) समीप होकर, मैं (अब्रवम्) स्तुतिवचन बोलता हूँ। हे इन्द्र परमात्मन् ! (स्तुवतः) स्तुति करनेवाले, (अश्व्यस्य) इन्द्रिय-रूपी घोड़ों को सन्मार्ग पर चलानेवाले मुझ उपासक के, उस प्रार्थना-वचन को, आप (नूनम्) अवश्य (श्रुधि) सुनो, पूर्ण करो ॥२॥
भावार्थःआपस में आकर्षण-बल से बिना आधार के आकाश में स्थित लोक-लोकान्तरों का और शरीर में यथास्थान स्थित अङ्ग-प्रत्यङ्गों का एवं मन, बुद्धि, प्राण तथा इन्द्रियों का जो व्यवस्थापक है, उस परमात्मा की सब लोग जितेन्द्रिय होकर पुनः-पुनः भली-भाँति स्तुति करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
न꣢ ह्या꣣꣬ꣳ३꣱ग꣢ पु꣣रा꣢ च꣣ न꣢ ज꣣ज्ञे꣢ वी꣣र꣡त꣢र꣣स्त्व꣢त् । न꣡ की꣢ रा꣣या꣢꣫ नैवथा꣣ न꣢ भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१५११॥
पदार्थःहे (अङ्ग) प्रिय परमेश्वर ! (पुरा च न) पहले भी (त्वत्) आपकी अपेक्षा (वीरतरः) अधिक वीर (न जज्ञे) कोई उत्पन्न नहीं हुआ, [अब नहीं है और भविष्य में नहीं होगा, इसका तो कहना ही क्या।] (न किः) न ही (राया) धन में(न एवथा) न गति कर्म व रक्षा में और (न) ही (भन्दना) कल्याण में आपसे अधिक कोई उत्पन्न हुआ है वा होगा ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर से अधिक वीर, धनी, कर्मण्य, रक्षक और कल्याणकारी अन्य कोई भी न हुआ, न है, न होगा। इसलिए अपने सुख और शान्ति के लिए उसी की वन्दना सबको करनी चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -निचृदुष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
न꣣दं꣢ व꣣ ओ꣡द꣢तीनां न꣣दं꣡ योयु꣢꣯वतीनाम् । प꣡तिं꣢ वो꣣ अ꣡घ्न्या꣢नां धेनू꣣ना꣡मि꣢षुध्यसि ॥१५१२॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (वः) तुम (ओदतीनाम्) प्रकाश से आप्लुत करनेवाली उषाओं के (नदम्) प्रकाशक जगदीश्वर की, (योयुवतीनाम्) स्वयं को अन्यों के साथ मिलानेवाली नदियों के (नदम्) कल-कल नाद करानेवाले जगदीश्वर की और (वः) तुम्हारी (अघ्न्यानाम्) न मारी जाने योग्य (धेनूनाम्) गायों के (पतिम्) रक्षक इन्द्र जगदीश्वर की स्तुति करो। हे इन्द्र जगदीश्वर ! आप अधार्मिक शत्रुओं पर (इषुध्यसि) बाण चलाते हो, अर्थात् उन्हें दण्डित करते हो ॥१॥ यहाँ ‘नद’ की आवृत्ति में यमक अलङ्कार है और ‘तीनों’ की आवृत्ति में छेकानुप्रास, नकार की आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर की उषाओं को चमकानेवाला, सूर्य को प्रदीप्त करनेवाला, बिजलियों को विद्योतित करनेवाला, पवन को चलानेवाला, नदियों में कल-कल निनाद करानेवाला, धेनुओं में दूध उत्पन्न करनेवाला और दुष्टों का दलन करनेवाला है ॥१॥ इस खण्ड में जगदीश्वर और जीवात्मा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चौदहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
दे꣣वो꣡ वो꣢ द्रविणो꣣दाः꣢ पू꣣र्णां꣡ वि꣢वष्ट्वा꣣सि꣡च꣢म् । उ꣡द्वा꣢ सि꣣ञ्च꣢ध्व꣣मु꣡प꣢ वा पृणध्व꣣मा꣡दिद्वो꣢꣯ दे꣣व꣡ ओह꣢ते ॥१५१३॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! (द्रविणोदाः) आरोग्यरूप धन वा बल देनेवाला, (देवः) प्रकाश से परिपूर्ण और प्रकाश देनेवाला यज्ञाग्नि (वः) तुम्हारी (पूर्णाम्) केसर, कस्तूरी आदि से मिश्रित घी से पूर्ण, (आसिचम्) सींचनेवाली सुव्रा को (विवष्टु) ग्रहण करे। तुम (उत्सिञ्चध्वं वा) सुगन्धित द्रव्यों से मिश्रित घृत की आहुतियों से उस अग्नि को सींचो, (उपपृणध्वं वा) और आहुति देने से खाली हुई स्रुवा को फिर घृत से भरो। (आत् इत्) तदनन्तर ही (देवः) प्रदीप्त यज्ञाग्नि (वः) तुम अग्निहोत्रियों को (ओहते) यज्ञ के लाभ प्राप्त करायेगा ॥१॥
भावार्थःबारम्बार आहुति देने से यज्ञाग्नि आरोग्य, दीप्ति आदि लाभों से याज्ञिकों का उपकार करता हुआ परमेश्वर की उपासना में भी सहायक होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
त꣡ꣳ होता꣢꣯रमध्व꣣र꣢स्य꣣ प्र꣡चे꣢तसं꣣ व꣡ह्निं꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢कृण्वत । द꣡धा꣢ति꣣ र꣡त्नं꣢ विध꣣ते꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म꣣ग्नि꣡र्जना꣢꣯य दा꣣शु꣡षे꣢ ॥१५१४॥
पदार्थः(प्रचेतसम्) चेतानेवाले (वह्निम्) अग्नि को (देवाः) विद्वान् अग्निहोत्री लोग (अध्वरस्य) हिंसारहित यज्ञ का (होतारम्) निष्पादक (अकृण्वत) करते हैं। वह (अग्निः) यज्ञाग्नि (विधते) परमेश्वर-पूजक, (दाशुषे जनाय) हवि देनेवाले अग्निहोत्री को (सुवीर्यम्) सुवीर्य से युक्त (रत्नम्) आरोग्य आदि रत्न (दधाति) प्रदान करता है ॥२॥
भावार्थःयज्ञाग्नि में रोग हरनेवाले सुगन्धित द्रव्यों की जो आहुति दी जाती है, वह अग्नि-ज्वालाओं द्वारा विच्छिन्न और सूक्ष्म की जाकर वायु के माध्यम से इधर-उधर फैलकर श्वास द्वारा प्राणियों के फेफड़ों में पहुँच कर वहाँ रक्तवाहिनी पतली-पतली केशिकाओं में खून से सम्बद्ध होकर खून में औषध को प्रविष्ट करा देती है और खून की मलिनता को हरकर साँस से बाहर निकाल देती है। इस प्रकार प्राणियों को स्वास्थ्य देती है। अग्निज्वालाओं की दीप्ति, उर्ध्वगति, दोष-दाहकता इत्यादि गुणों को देखकर यज्ञकर्ता अपने अन्दर भी इन गुणों को धारण करने का यत्न करता है। इस प्रकार अग्निहोत्र से बाह्य तथा आन्तरिक दोनों प्रकार के लाभ होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
अ꣡द꣢र्शि गातु꣣वि꣡त्त꣢मो꣣ य꣡स्मि꣢न्व्र꣣ता꣡न्या꣢द꣣धुः꣢ । उ꣢पो꣣षु꣢ जा꣣त꣡मार्य꣢꣯स्य꣣ व꣡र्ध꣢नम꣣ग्निं꣡ न꣢क्षन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ ॥१५१५॥
पदार्थः(गातुवित्तमः) कर्तव्य-मार्ग का अतिशय बोध करानेवाले जगदीश्वर वा राजा के (अदर्शि) हमने दर्शन किये हैं, (यस्मिन्) जिसके आश्रय में रहते हुए प्रजाजन (व्रतानि) अपने-अपने कर्तव्य कर्म (आदधुः) करते हैं। (उ सुजातम्) भली-भाँति अन्तरात्मा में प्रकट हुए अथवा निर्वाचन-पद्धति से राजा के पद पर अभिषिक्त हुए और (आर्यस्य वर्धनम्) श्रेष्ठ मनुष्य को बढ़ानेवाले (अग्निम्) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजा के पास (नः) हमारे (गिरः) प्रार्थना-वचन (उप नक्षन्तु) पहुँचें ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर कर्तव्यमार्ग का बोधक, आर्यों को प्रोत्साहन देनेवाला और दुर्जनों को दण्डित करनेवाला है, वैसे ही राजा को भी होना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
य꣢स्मा꣣द्रे꣡ज꣢न्त कृ꣣ष्ट꣡य꣢श्च꣣र्कृ꣡त्या꣢नि कृण्व꣣तः꣢ । स꣣हस्रसां꣢ मे꣣ध꣡सा꣢ताविव꣣ त्म꣢ना꣣ग्निं꣢ धी꣣भि꣡र्न꣢मस्यत ॥१५१६॥
पदार्थः(चर्कृत्यानि) अतिशय करने योग्य कर्मों को (कृण्वतः) करते हुए (यस्मात्) जिस जगदीश्वर वा राजा से (कृष्टयः) दुष्ट मनुष्य (रेजन्त) भय के मारे काँपते हैं, उस (सहस्रसाम्) सहस्र गुणों वा सहस्र पदार्थों के दाता (अग्निम्) अग्रनायक, जगदीश्वर वा राजा को, आप लोग (त्मना) स्वयं (धीभिः) बुद्धियों और कर्मों से (सपर्यत) पूजित वा सत्कृत करो, (मेधसातौ इव) जैसे यज्ञ में (अग्निम्) यज्ञाग्नि को याज्ञिक जन (धीभिः) आहुति-प्रदान आदि कर्मों से सत्कृत करते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे न्यायकारी परमेश्वर से वैसे ही न्यायकारी राजा से दण्ड के भय से पापी लोग काँपें। जैसे सज्जनों को परमेश्वर सहस्र गुण व बल प्रदान करता है, वैसे ही राजा राष्ट्रभक्तों को सहस्र लाभ प्रदान करे। प्रजाजन भी परमेश्वर के भक्त जैसे परमेश्वर की पूजा करते हैं वा याज्ञिक लोग जैसे यज्ञाग्नि का हवियों से सत्कार करते हैं, वैसे ही अपने राजा का सत्कार करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बृहती| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
प्र꣡ दैवो꣢꣯दासो अ꣣ग्नि꣢र्देव इन्द्रो न मज्मना । अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि ॥१५१७॥
पदार्थः(दैवोदासः) आनन्द का दाता, (देवः) प्रकाशक (अग्निः) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजा (इन्द्रः न) सूर्य के समान (मज्मना) बल से (मातरं पृथिवीम्) माता के समान पालन करनेवाली भूमि को (अनु विवावृते) अनुकूलता से पालता है और (नाकस्य) सुख की (शर्मणि) रक्षा में (तस्थौ) उद्यत रहता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर प्रजाओं को योगक्षेम प्रदान करता है और भूमि का पालन करता है, वैसे ही राजा भी करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः पवमानः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि पवस꣣ आसुवोर्जमिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम् ॥१५१८॥
पदार्थःहे (अग्ने) विद्वान् योगिराज ! आप (नः) हमारे लिए (ऊर्जम्) प्राणबल (इषं च) और इच्छासिद्धि को (आसुव) प्रदान करो। (दुच्छुनाम्) योगमार्ग में विघ्नभूत दुश्चरित्रता को (आरे) दूर (बाधस्व) धकेल दो ॥१॥
भावार्थःसिद्ध योगियों के निर्देशन में योगाभ्यास करने से जिज्ञासुओं का जीवन निष्कलङ्क हो जाता है और वे प्राणसिद्धियों तथा इच्छासिद्धियों को शीघ्र ही प्राप्त कर लेते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः पवमानः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣢꣫रृषिः꣣ प꣡व꣢मानः꣣ पा꣡ञ्च꣢जन्यः पुरोहितः । त꣡मी꣢महे महाग꣣य꣢म् ॥१५१९॥
पदार्थः(अग्निः) विद्वान् योगिराज (ऋषिः) परमात्मा का द्रष्टा, (पवमानः) अपने तथा दूसरों के जीवन को पवित्र करनेवाला, (पाञ्चजन्यः) प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान रूप पञ्च प्राणों का हितकारी, (पुरोहितः) और योग-प्रशिक्षण के लिए सम्मुख स्थापित होता है। (महागयम्) महाप्राण (तम्) उस योगिराज से हम (ईमहे) योगसिद्धि की याचना करते हैं ॥२॥
भावार्थःसिद्ध योगियों के समीप योगाभ्यास करने से योगसाधन में तत्पर शिष्यों की योग-साधना सफल होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः पवमानः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्ने꣣ प꣡व꣢स्व꣣ स्व꣡पा꣢ अ꣣स्मे꣡ वर्चः꣢꣯ सु꣣वी꣡र्य꣢म् । द꣡ध꣢द्र꣣यिं꣢꣫ मयि꣣ पो꣡ष꣢म् ॥१५२०॥
पदार्थःहे (अग्ने) योगविद्या के पण्डित योगिराज ! (स्वपाः) शुभ कर्मोंवाले आप (अस्मे) हमारे लिए (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ वीर्य से युक्त (वर्चः) योगजन्य तेज (पवस्व) प्राप्त कराओ और (मयि) मुझ योग के जिज्ञासु में (पोषम्) पोषक (रयिम्) विवेकख्यातिरूप अध्यात्म-ऐश्वर्य (दधत्) धारण कराओ ॥३॥
भावार्थःयोगप्रशिक्षक योगिराज स्वयं शुभकर्मों का कर्ता होता हुआ शिष्यों को भी शुभ कर्म करने का उपदेश दे और योगाभ्यास के द्वारा उन मुमुक्षु शिष्यों को वर्चस्वी तथा विवेकख्याति से सम्पन्न करके मोक्ष का अधिकारी बना दे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡ग्ने꣢ पावक रो꣣चि꣡षा꣢ म꣣न्द्र꣡या꣢ देव जि꣣ह्व꣡या꣢ । आ꣢ दे꣣वा꣡न्व꣢क्षि꣣ य꣡क्षि꣢ च ॥१५२१॥
पदार्थःहे (पावक) पवित्रताकारक, (देव) प्रकाशक (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर व विद्वान् आचार्य ! आप (रोचिषा) तेजोमय, (मन्द्रया) आनन्दप्रद (जिह्वया) वेद-वाणी के द्वारा, हमारे अन्दर (देवान्) दिव्य गुण (आ वक्षि) लाओ, (यक्षि च) और हमारे उपासना-यज्ञ वा शिक्षा-यज्ञ को सफल करो ॥१॥
भावार्थःवेदवाणी के माध्यम से परमेश्वर की उपासना करने से हृदय पवित्र होता है और गुरुमुख से वेदार्थ का अध्ययन करने से शिक्षा सफल होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
तं꣡ त्वा꣢ घृतस्नवीमहे꣣ चि꣡त्र꣢भानो स्व꣣र्दृ꣡श꣢म् । दे꣣वा꣢꣫ꣳ आ वी꣣त꣡ये꣢ वह ॥१५२२॥
पदार्थःहे (घृतस्नो) विद्या-रस तथा आनन्द-रस को बहानेवाले, (चित्रभानो) अद्भुत तेजवाले जगदीश्वर वा आचार्य ! (तम्) उन प्रसिद्ध (स्वर्दृशम्) विवेकरूप प्रकाश को दर्शानेवाले (त्वा) आपसे, हम (ईमहे) याचना करते हैं। आप (वीतये) हमारी प्रगति के लिए (देवान्) दिव्य गुणों को (आ वह) प्राप्त कराओ ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से और आचार्यकुल में निवास से आनन्दरस, विद्यारस तथा कर्तव्य और अकर्तव्य का प्रकाश और जीवन में प्रगति प्राप्त होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
वी꣣ति꣡हो꣢त्रं त्वा कवे द्यु꣣म꣢न्त꣣ꣳ स꣡मि꣢धीमहि । अ꣡ग्ने꣢ बृ꣣ह꣡न्त꣢मध्व꣣रे꣢ ॥१५२३॥
पदार्थःहे (कवे) क्रान्तदर्शी, (अग्ने) सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर वा विद्वान् आचार्य ! (वीतिहोत्रम्) जगत् के उत्पादनरूप यज्ञ को वा विद्यायज्ञ को करनेवाले, (द्युमन्तम्) तेजस्वी, (बृहन्तम्) गुणों में महान् (त्वा) आपको, हम (अध्वरे) उपासना-यज्ञ, जीवन-यज्ञ वा विद्याध्ययन-यज्ञ में (समिधीमहि) प्रदीप्त करते हैं ॥३॥
भावार्थःजो परमात्मा और आचार्य का सेवन करते हैं, वे विद्वान्, सदाचारी, गुणवान् और कर्मशूर होते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करते हैं ॥३॥ इस खण्ड में अग्निहोत्र, परमात्मा, राजा, योगिराज और आचार्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चौदहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡वा꣢ नो अग्न ऊ꣣ति꣡भि꣢र्गाय꣣त्र꣢स्य꣣ प्र꣡भ꣢र्मणि । वि꣡श्वा꣢सु धी꣣षु꣡ व꣢न्द्य ॥१५२४॥
पदार्थःहे (वन्द्य) वन्दनीय (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! आप (गायत्रस्य) गायत्री आदि छन्दों से युक्त वेदज्ञान के (प्रभर्मणि) प्रकृष्ट रूप से ग्रहण करने में और (विश्वासु धीषु) सब कर्मों में (ऊतिभिः) अपनी रक्षाओं के साथ (नः) हमें (अव) प्राप्त होओ ॥१॥
भावार्थःज्ञानप्राप्ति के समय और कर्म करते समय जो जगदीश्वर को नहीं भूलते, वे श्रेष्ठ ज्ञान के अनुकूल श्रेष्ठ कर्म ही सदा करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
आ꣡ नो꣢ अग्ने र꣣यिं꣡ भ꣢र सत्रा꣣सा꣢हं꣣ व꣡रे꣢ण्यम् । वि꣡श्वा꣢सु पृ꣣त्सु꣢ दु꣣ष्ट꣡र꣢म् ॥१५२५॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! आप (नः) हमारे लिए (सत्रासाहम्) एक साथ अनेक विपदाओं को दूर करनेवाले, (वरेण्यम्) वरणीय, विश्वासु पृत्सु) सब सङ्ग्रामों में (दुष्टरम्) दुस्तर, अच्छेद्य (रयिम्) वीरतारूप ऐश्वर्य को (आभर) प्रदान करो ॥३॥
भावार्थःपरमवीर परमेश्वर का ध्यान करके हम वीरगणों में अग्रगण्य होते हुए सब विपदाओं तथा सब आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को पराजित कर देवें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
आ꣡ नो꣢ अग्ने सुचे꣣तु꣡ना꣢ र꣣यिं꣢ वि꣣श्वा꣡यु꣢पोषसम् । मा꣣र्डीकं꣡ धे꣢हि जी꣣व꣡से꣢ ॥१५२६॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! आप (नः जीवसे) हमारे जीवन के लिए (सुचेतुना) शुभ ज्ञान के साथ (विश्वायुपोषसम्) सब मनुष्यों के पोषक, (मार्डीकम्) सुखदायक (रयिम्) ऐश्वर्य को (आधेहि) प्रदान करो ॥३॥
भावार्थःवह ज्ञान ज्ञान नहीं है और वह धन धन नहीं है, जो दूसरों के उपकार के लिए न हो ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣡ꣳ हि꣢न्वन्तु नो꣣ धि꣢यः꣣ स꣡प्ति꣢मा꣣शु꣡मि꣢वा꣣जि꣡षु꣢ । ते꣡न꣢ जेष्म꣣ ध꣡नं꣢धनम् ॥१५२७॥
पदार्थः(नः) हमारी (धियः) ध्यान-क्रियाएँ वा बुद्धियाँ (अग्निम्) अग्रनायक परमात्मा वा राजा को (हिन्वन्तु) प्रेरित करें, (आजिषु) युद्धों में (आशुं सप्तिम् इव) जैसे वेगवान् घोड़े को प्रेरित करते हैं। (तेन) उस परमात्मा वा राजा के द्वारा (धनं धनम्) प्रत्येक आध्यात्मिक वा भौतिक ऐश्वर्य को, हम (जेष्म) जीत लेवें ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःदिव्य सम्पदाओं और भौतिक सम्पदाओं की प्राप्ति के लिए परमेश्वर और राजा परम सहायक होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣢या꣣ गा꣢ आ꣣क꣡रा꣢महै꣣ से꣡न꣢याग्ने꣣ त꣢वो꣣त्या꣢ । तां꣡ नो꣢ हिन्व म꣣घ꣡त्त꣢ये ॥१५२८॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन् वा राजन् ! (तव यया ऊत्या सेनया) आपकी जिस रक्षक सेना के द्वारा, हम (गाः) अन्तःप्रकाश की किरणों को अथवा गाय आदि सम्पत्तियों को (आकरामहै) प्राप्त करते हैं, (ताम्) उस रक्षा को वा सेना को (मघत्तये) ऐश्वर्य के प्रदानार्थ (नः) हमारे लिए (हिन्व) प्रेरित करो ॥२॥
भावार्थःराजा की सेना से रक्षित प्रजाएँ जैसे भौतिक सम्पत्तियाँ प्राप्त करने में समर्थ होती हैं, वैसे ही परमात्मा के रक्षण-सामर्थ्य से रक्षित जन अध्यात्म- सम्पत्तियाँ प्राप्त कर लेते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
आ꣡ग्ने꣢ स्थू꣣र꣢ꣳ र꣣यिं꣡ भ꣢र पृ꣣थुं꣡ गोम꣢꣯न्तम꣣श्वि꣡न꣢म् । अ꣣ङ्धि꣢꣫ खं व꣣र्त꣡या꣢ प꣣वि꣢म् ॥१५२९॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजन् ! आप (गोमन्तम्) अन्तःप्रकाश से युक्त अथवा धेनु, पृथिवी आदि से युक्त, (अश्विनम्) प्राण-सम्पदा से युक्त अथवा श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त, (पृथुम्) अति विशाल, (स्थूरम्) अति स्थिर, (रयिम्) ऐश्वर्य (आभर) प्रदान करो। (खम्) ह्रदयाकाश को वा राष्ट्र के आकाश को (अङ्धि) तामसिकता हटाकर निर्मल कर दो। अन्तःशत्रुओं बाह्य शत्रुओं के विध्वंस के लिए (पविम्) पवित्रता का वा शस्त्रास्त्रों का (वर्तय) प्रयोग करो ॥३॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर आन्तरिक विघ्नों वा शत्रुओं को विनष्ट करके अन्तरात्मा को पवित्र करता है, वैसे ही राष्ट्र का राजा बाह्य उपद्रवकारियों को नष्ट करके राष्ट्र को निष्कण्टक करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣢ग्ने꣣ न꣡क्ष꣢त्रम꣣ज꣢र꣣मा꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । द꣢ध꣣ज्ज्यो꣢ति꣣र्ज꣡ने꣢भ्यः ॥१५३०॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (अग्ने) ज्योतिर्मय, प्रकाशक, जगन्नायक परमात्मन् ! (जनेभ्यः) उत्पन्न प्राणियों के लिए (ज्योतिः) प्रकाश (दधत्) प्रदान करते हुए आपने (नक्षत्रम्) गतिमय, अपनी धुरी पर घूमनेवाले, (अजरम्) सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक जीर्ण न हुए (सूर्यम्) सूर्य को (दिवि) आकाश में (आरोहयः) चढ़ाया हुआ है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे (अग्ने) राष्ट्रनायक राजन् ! (जनेभ्यः) प्रजाओं के लिए (ज्योतिः) विद्या का प्रकाश और बिजली का प्रकाश (दधत्) प्रदान करते हुए आपने (नक्षत्रम्) गतिमान्, (अजरम्) जीर्णता-रहित (सूर्यम्) विद्या और धर्म के सूर्य को (दिवि) राष्ट्र-गगन में (आरोहयः) चढ़ा दिया है ॥४॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर आकाश में वस्तुतः ही सूर्य को उत्पन्न करता है, वैसे ही जो राजा राष्ट्र में परा विद्या, अपरा विद्या और धर्म का प्रकाश करता है वह भी मानो सूर्य को उत्पन्न करता हैं ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡ग्ने꣢ के꣣तु꣢र्वि꣣शा꣡म꣢सि꣣ प्रे꣢ष्ठः꣣ श्रे꣡ष्ठ꣢ उपस्थ꣣स꣢त् । बो꣡धा꣢ स्तो꣣त्रे꣢꣫ वयो꣣ द꣡ध꣢त् ॥१५३१॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजन् ! आप (विशाम्) प्रजाओं के (केतुः) ज्ञानप्रदाता, (प्रेष्ठः) अत्यधिक प्यारे, (श्रेष्ठः) श्रेष्ठ और (उपस्थसत्) समीप विद्यमान (असि) हो। आप ( स्तोत्रे) स्तुतिकर्त्ता वा राष्ट्रभक्त के लिए (वयः) धन, अन्न, आयु आदि (दधत्) प्रदान करते हुए, उसे (बोध) बोध प्रदान करो, सदा कर्त्तव्य के प्रति जागरूक करो ॥५॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर सबका ज्ञानदाता, प्रियतम, प्रशस्यतम, सुखसम्पत्तिप्रदाता, आयु देनेवाला और जगानेवाला है, वैसे ही राष्ट्र में राजा को होना चाहिए ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣢र्मू꣣र्धा꣢ दि꣣वः꣢ क꣣कु꣡त्पतिः꣢꣯ पृथि꣣व्या꣢ अ꣣य꣢म् । अ꣣पा꣡ꣳ रेता꣢꣯ꣳसि जिन्वति ॥१५३२॥
पदार्थः(अग्निः) अग्नि ही, शरीर में (मूर्धा) मस्तिष्क है, क्योंकि मस्तिष्क अग्नि- प्रधान है। यही सूर्य रूप में (दिवः) द्युलोक का (ककुत्) राजा है। (अयम्) यही पार्थिव अग्नि के रूप में (पृथिव्याः) पृथिवी का (पतिः) पालनकर्ता है। अग्नि ही (अपाम्) जलों के (रेतांसि) सूक्ष्म अवयवों को (जिन्वति) भूमि से अन्तरिक्ष की ओर और अन्तरिक्ष से भूमि की ओर प्रेरित करता है अर्थात् वर्षा में कारण बनता है ॥१॥ यहाँ एक अग्नि का अनेक रूप में उल्लेख होने के कारण विषयभेदनिबन्धन उल्लेखालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःअग्नि ही सब चेतन-अचेतन जगत् की स्थिति का कारण है। वही आग, बिजली, सूर्य, जाठराग्नि, प्राणाग्नि, वाडवाग्नि आदि के रूप में अनेक प्रकार से विद्यमान होता हुआ हमारा उपकार करता है, जैसा की श्रुति कहती है—एक॑ ए॒वाग्निर्ब॑हु॒धा समि॑द्धः (ॠ० ८।५८।२) ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ई꣡शि꣢षे꣣ वा꣡र्य꣢स्य꣣ हि꣢ दा꣣त्र꣡स्या꣢ग्ने꣣꣬ स्वः꣢꣯पतिः । स्तो꣣ता꣢ स्यां꣣ त꣢व꣣ श꣡र्म꣢णि ॥१५३३॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगन्नायक, विश्ववन्द्य, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, तेजस्वी, दयालु परमेश ! (स्वः पतिः) आनन्द और दिव्य प्रकाश के अधिपति आप (वार्यस्य) वरणीय, (दात्रस्य) दातव्य ऐश्वर्य के (ईशिषे हि) स्वामी हो। (शर्मणि) आपकी शरण पाने के हेतु, मैं (तव) आपके (स्तोता) गुण-कर्म-स्वभावों का कीर्तन करनेवाला (स्याम्) होऊँ ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के गुण-कर्म-स्वभावों का चिन्तन करने से आंशिक रूप में मनुष्य भी वैसा हो सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡द꣢ग्ने꣣ शु꣡च꣢य꣣स्त꣡व꣢ शु꣣क्रा꣡ भ्राज꣢꣯न्त ईरते । त꣢व꣣ ज्यो꣡ती꣢ꣳष्य꣣र्च꣡यः꣢ ॥१५३४॥
पदार्थःहे (अग्ने) तेजस्वी परमात्मन् ! (तव) आपकी रची हुई (शुचयः) पवित्र, (शुक्राः) प्रदीप्त, (भ्राजन्तः) जगमगानेवाली (अर्चयः) बिजली, सूर्य आदि की प्रभाएँ (तव ज्योतींषि) आपकी ज्योतियों को (उदीरते) प्रकट कर रही हैं ॥ उपनिषद् के ऋषि ने भी कहा है—परमेश्वर की चमक के आगे न सूर्य की कुछ चमक है, न चाँद-तारों की चमक है, न बिजलियों की चमक है। उसी की चमक से जगत् का यह सब कुछ चमक रहा है (कठ० ५।१५) ॥३॥
भावार्थःइस ब्रह्माण्ड में आग, बिजली, सूर्य, तारे आदि जो भी ज्योतियाँ हैं, वे सब मिलकर भी ब्रह्म की महा-ज्योति की एक किनकी भी प्रकट करने में असमर्थ हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, राजा और अग्नि तत्त्व का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ चौदहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥ सप्तम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
क꣡स्ते꣢ जा꣣मि꣡र्जना꣢꣯ना꣣म꣢ग्ने꣣ को꣢ दा꣣꣬श्व꣢꣯ध्वरः । को꣢ ह꣣ क꣡स्मि꣢न्नसि श्रि꣣तः꣢ ॥१५३५॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगन्नायक परमेश्वर ! (जनानाम्) उत्पन्न मनुष्यों के मध्य (कः ते जामिः) कौन तेरा सहायक बन्धु है ? अर्थात् कोई नहीं है। (कः) मनुष्यों के मध्य कौन ऐसा है (दाश्वध्वरः) जिसका यज्ञ तेरे लिए कुछ फल देनेवाला हो ? अर्थात् कोई नहीं है, क्योंकि सब लोग अपने ही लाभ के लिए यज्ञ करते हैं, तेरे लाभ के लिए नहीं। (कः ह) तू कौन है ? (कस्मिन् श्रितः असि) किसके आश्रित है ? अन्तिम दोनों प्रश्नों का उत्तर है—तू (कः ह) निश्चय ही कमनीय, सबसे आगे बढ़ा हुआ और सुखस्वरूप है। (कस्मिन् असि श्रितः) भला किसके आश्रित हो सकता है, अर्थात् किसी के नहीं, क्योंकि तू आत्मनिर्भर है ॥१॥ यहाँ काकु वक्रोक्ति अलङ्कार है, तृतीय प्रश्न में श्लेष है। अथवा यह मन्त्र जिसमें उत्तर छिपा हुआ है, ऐसी पहेली है ॥१॥
भावार्थःसबसे महान् परमेश्वर जगत् के सञ्चालन के लिए किसी सहायक बन्धु की या किसी आश्रयदाता की अपेक्षा नहीं करता। न ही किसी के किसी भी कार्य से अपना लाभ चाहता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
त्वं꣢ जा꣣मि꣡र्जना꣢꣯ना꣣म꣡ग्ने꣢ मि꣣त्रो꣡ अ꣢सि प्रि꣣यः꣢ । स꣢खा꣣ स꣡खि꣢भ्य꣣ ई꣡ड्यः꣢ ॥१५३६॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगन्नायक परमेश्वर ! (त्वम्) सबके हितचिन्तक आप (जनानाम्) उत्पन्न मनुष्यों के (जामिः) सहायक बन्धु, (प्रियः मित्रः) और प्रिय मित्र (असि) हो। (सखिभ्यः) जो आपके साथ मित्रता चाहते हैं, उनके लिए (ईड्यः) स्तुतियोग्य (सखा) मित्र होते हो ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर का कोई सहायक नहीं है, प्रत्युत परमेश्वर ही दूसरों का सहायक बन्धु और प्यारा मित्र होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣡जा꣢ नो मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा꣣ य꣡जा꣢ दे꣣वा꣢ꣳ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् । अ꣢ग्ने꣣ य꣢क्षि꣣ स्वं꣡ दम꣢꣯म् ॥१५३७॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगन्नियन्ता परमेश्वर ! आप (नः) हमारे लिए (मित्रावरुणा) मैत्री का गुण और दोषनिवारण का गुण (यज) प्रदान करो। (देवान्) अन्य दिव्य गुणों को (बृहत् ऋतम्) और महान् सत्य को (यज) प्रदान करो। साथ ही (स्वं दमम्) अपने दमन करने के गुण को भी (यक्षि) प्रदान करो ॥३॥
भावार्थःजो परमेश्वर सब गुणों की निधि है, वह हमें भी दिव्य गुण प्रदान करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ई꣣डे꣡न्यो꣢ नम꣣꣬स्य꣢꣯स्ति꣣र꣡स्तमा꣢꣯ꣳसि दर्श꣣तः꣢ । स꣢म꣣ग्नि꣡रि꣢ध्यते꣣ वृ꣡षा꣢ ॥१५३८॥
पदार्थः(ईडेन्यः) स्तुति के योग्य, (नमस्यः) नमस्कार के योग्य, (तमांसि) तमोगुणों को (तिरः) दूर करनेवाला, (दर्शतः) दर्शनीय, (वृषा) सुखों की वर्षा करनेवाला (अग्निः) जगन्नायक परमेश्वर (समिध्यते) अन्तरात्मा में प्रदीप्त होता है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर को अपने आत्मा में प्रदीप्त करके उसके नेतृत्व को पाकर मनुष्यों को अपना जीवन उन्नत करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
वृ꣡षो꣢ अ꣣ग्निः꣡ समि꣢꣯ध्य꣣ते꣢ऽश्वो꣣ न꣡ दे꣢व꣣वा꣡ह꣢नः । त꣢ꣳ ह꣣वि꣡ष्म꣢न्त ईडते ॥१५३९॥
पदार्थः(वृषः) सुखों की वर्षा करनेवाला (अग्निः) जगन्नायक परमेश्वर (समिध्यते) उपासकों द्वारा अपने अन्तरात्मा में प्रदीप्त किया जाता है, जो (देववाहनः) विद्वानों के वाहन (अश्वः न) घोड़े के समान (देववाहनः) दिव्य गुणों का वाहक है। (तम्) उस परमेश्वर की (हविष्मन्तः) आत्मसमर्पण करनेवाले उपासक लोग (ईडते) आराधना करते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे रथ में नियुक्त किया हुआ वेगवान् घोड़ा शीघ्र ही मनुष्यों को लक्ष्य पर पहुँचा देता है, वैसे ही योगाभ्यास से अपने अन्तरात्मा में नियुक्त परमेश्वर दिव्य गुण प्राप्त करा कर उपासकों को शीघ्र ही उन्नत कर देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
वृ꣡ष꣢णं त्वा व꣣यं꣡ वृ꣢ष꣣न्वृ꣡ष꣢णः꣣ स꣡मि꣢धीमहि । अ꣢ग्ने꣣ दी꣡द्य꣢तं बृ꣣ह꣢त् ॥१५४०॥
पदार्थःहे (वृषन्) मनोरथों को पूर्ण करनेवाले (अग्ने) जगन्नायक परमेश्वर ! (वृषणः) भक्तिरस बरसानेवाले (वयम्) हम उपासक (वृषणम्) आनन्द-रस के वर्षक, (बृहत् दीद्यतम्) बहुत देदीप्यमान (त्वा) आपको (समिधीमहि) अपने अन्दर प्रदीप्त करते हैं ॥३॥
भावार्थःजो परमात्मा को भक्तिरस से भिगोता है, उसे वह आनन्द-रस से भिगो देता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡त्ते꣢ बृ꣣ह꣡न्तो꣢ अ꣣र्च꣡यः꣢ समिधा꣣न꣡स्य꣢ दीदिवः । अ꣡ग्ने꣢ शु꣣क्रा꣡स꣢ ईरते ॥१५४१॥
पदार्थःहे (दीदिवः) सत्य के प्रकाशक, (अग्ने) विज्ञानवान् जगन्नायक परमात्मन् ! (समिधानस्य) देदीप्यमान (ते) आपकी (बृहन्तः) महान्, (शुक्रासः) पवित्र (अर्चयः) दीप्तियाँ (उदीरते) उठ रही हैं ॥१॥
भावार्थःजब उपासक परमात्मा में तन्मय हो जाता है, तब भौतिक अग्नि की ज्वालाओं के समान उसका तेजस्वी रूप उसके सामने प्रकट हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ त्वा जु꣣ह्वो꣢३꣱म꣡म꣢ घृ꣣ता꣡ची꣢र्यन्तु हर्यत । अ꣡ग्ने꣢ ह꣣व्या꣡ जु꣢षस्व नः ॥१५४२॥
पदार्थःहे (अग्ने) ज्योतिर्मय परमेश ! हे (हर्यत) कमनीय ! (मम) मुझ स्तोता की (घृताचीः) स्नेह से आर्द्र वा तेज से युक्त (जुह्वः) वाणियाँ (त्वा) आपको (उप यन्तु) प्राप्त हों। आप (नः) हमारी (हव्या) आत्मसमर्पणरूप हवियों को (जुषस्व) प्रेम से स्वीकार करो ॥२॥
भावार्थःश्रद्धा और प्रेम से की गयी परमात्मा की स्तुति अवश्य फलदायक होती है ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
म꣣न्द्र꣡ꣳ होता꣢꣯रमृ꣣त्वि꣡जं꣢ चि꣣त्र꣡भा꣢नुं वि꣣भा꣡व꣢सुम् । अ꣣ग्नि꣡मी꣢डे꣣ स꣡ उ꣢ श्रवत् ॥१५४३॥
पदार्थः(मन्द्रम्) आनन्दमय, (होतारम्) सब पदार्थों के दाता, (ऋत्विजम्) ऋतुओं में सामञ्जस्य स्थापित करनेवाले अथवा प्रत्येक ऋतु में पूजनीय, (चित्रभानुम्) बहुरंगे सूर्य के रचयिता, (विभावसुम्) तेज रूप धन के धनी (अग्निम्) अग्रनेता जगदीश्वर की (ईडे) मैं स्तुति करता हूँ, वा उससे प्रार्थना करता हूँ। (सः उ) वह मेरी स्तुति वा प्रार्थना को (श्रवत्) सुने ॥३॥
भावार्थःजो सच्चिदानन्दस्वरूप, सकलसृष्टि का रचयिता, सारे ऋतुचक्र को चलानेवाला, तेजस्वी परमेश्वर है, उसकी सब मनुष्यों को प्रेम से वन्दना करनी चाहिए ॥३॥
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छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
पा꣣हि꣡ नो꣢ अग्न꣣ ए꣡क꣢या पा꣣ह्यू꣢३꣱त꣢ द्वि꣣ती꣡य꣢या । पा꣣हि꣢ गी꣣र्भि꣢स्ति꣣सृ꣡भि꣢रूर्जां पते पा꣣हि꣡ च꣢त꣣सृ꣡भि꣢र्वसो ॥१५४४॥
पदार्थःहे (अग्ने) विद्वान् आचार्य ! आप (एकया) धर्म का उपदेश करनेवाली एक वाणी से (नः) हमारी (पाहि) पालना करो, (उत) और (द्वितीयया) धर्मानुकूल धन कमाने का उपदेश करनेवाली दूसरी वाणी से (पाहि) हमारी पालना करो। हे (ऊर्जां पते) ब्रह्मबलों के अधिपति आचार्य। आप (तिसृभिः गीर्भिः) धर्म, अर्थ और काम का उपदेश करनेवाली तीन वाणियों से (पाहि) हमारी पालना करो। हे (वसो) सद्गुणों के निवासक आचार्य ! आप (चतसृभिः) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उपदेश करनेवाली चार वाणियों से (पाहि) हमारी पालना करो ॥१॥
भावार्थःआचार्य का यह कर्तव्य है कि वह शिष्यों को धर्म, धर्माविरोधि धन, धर्माविरोधि काम और मोक्ष के उपदेश से विद्वान् सदाचारी और मोक्ष का अधिकारी बनाये ॥१॥
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छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
पा꣣हि꣡ विश्व꣢꣯स्माद्र꣣क्ष꣢सो꣣ अ꣡रा꣢व्णः꣣ प्र꣢ स्म꣣ वा꣡जे꣢षु नोऽव । त्वा꣡मिद्धि नेदि꣢꣯ष्ठं दे꣣व꣡ता꣢तय आ꣣पिं꣡ नक्षा꣢꣯महे वृ꣣धे꣢ ॥१५४५॥
पदार्थःहे अग्ने ! हे विद्वान् आचार्य ! आप (विश्वस्मात्) सब (अराव्णः) अदानशील, स्वार्थपरायण (रक्षसः) राक्षस-भाव से (पाहि) हमें बचाओ, (वाजेषु) देवासुरसङ्ग्रामों में (नः) हमारी (प्र अव स्म) रक्षा करो। (त्वाम् इत् हि) आपको ही हम (देवतातये) दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए और (वृधे) आगे बढ़ने के लिए (नेदिष्ठम्) सबसे अधिक निकट के (आपिम्) बन्धुरूप में (नक्षामहे) प्राप्त करते हैं ॥२॥
भावार्थःआचार्य का यह कर्तव्य है कि वह शिष्यों की अन्तरात्मा में होनेवाले देवासुरसङ्ग्रामों में दिव्यभावों की विजय के लिए सहायक हो और स्वार्थ-वृत्तियों को विनष्ट करके परोपकार की वृत्तियाँ उत्पन्न करे ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा और आचार्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पन्द्रहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
इ꣣नो꣡ रा꣢जन्न꣣रतिः꣡ समि꣢꣯द्धो꣣ रौ꣢द्रो꣣ द꣡क्षा꣢य सुषु꣣मा꣡ꣳ अ꣢दर्शि । चि꣣कि꣡द्वि भा꣢꣯ति भा꣣सा꣡ बृ꣢ह꣣ता꣡सि꣢क्नीमेति꣣ रु꣡श꣢तीम꣣पा꣡ज꣢न् ॥१५४६॥
पदार्थःहे (राजन्) विश्व के राजा, सर्वान्तर्यामी परमात्मन् ! आप (इनः) सबके स्वामी, (अरतिः) सर्वव्यापक और (समिद्धः) स्वतः प्रकाशमान हो। आगे परोक्षरूप में कहते हैं—(रौद्रः) दुष्टों के लिए भयंकर, (सुषुमान्) सज्जनों के लिए रसमय वह परमात्मा (दक्षाय) बलप्राप्ति के लिए (अदर्शि) साक्षात्कार किया जाता है। (चिकित्) सर्वज्ञ वह (बृहता) महान् (भासा) दीप्ति से (विभाति) भासित होता है। (रुशतीम्) चमकीली उषा को (अपाजन्) व्यतीत कराता हुआ (असिक्नीम्) काली रात्रि को (एति) प्राप्त करता है। इसी प्रकार काली रात्रि को व्यतीत कराता हुआ चमकीली उषा को प्राप्त करता है, यह भी सूचित होता है। अभिप्राय यह है कि सारा दिन-रात्रि आदि का प्रपञ्च उसी का किया हुआ है ॥१॥
भावार्थःदिन, रात, पक्ष, मास, ऋतुएँ, उत्तरायण, दक्षिणायन, वर्ष इत्यादि सारा ही काल-विभाग और जल, स्थल, आकाश, चाँद, सूर्य, तारे इत्यादि सारा देश-विभाग परमेश्वर का ही किया हुआ है, जिसमें वह सम्राट् होकर सब व्यवस्था कर रहा है ॥१॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
कृ꣣ष्णां꣡ यदेनी꣢꣯म꣣भि꣡ वर्प꣢꣯सा꣣भू꣢ज्ज꣣न꣢य꣣न्यो꣡षां꣢ बृह꣣तः꣢ पि꣣तु꣢र्जाम् । ऊ꣣र्ध्वं꣢ भा꣣नु꣡ꣳ सूर्य꣢꣯स्य स्तभा꣣य꣢न्दि꣣वो꣡ वसु꣢꣯भिरर꣣ति꣡र्वि भा꣢꣯ति ॥१५४७
पदार्थः(यत्) जब (बृहतः पितुः) महान् पालनकर्ता सूर्य की (जाम्) पुत्री (योषाम्) उषा को (जनयन्) उत्पन्न करना चाहता हुआ अग्नि परमेश्वर (एनीम्) व्याप्त (कृष्णाम्) काली रात्रि को (वर्पसा) सूर्य के रूप से (अभिभूत्) तिरस्कृत करता है, तब (सूर्यस्य) सूर्य के (उर्ध्वम्) ऊपर स्थित (भानुम्) प्रकाश-मण्डल को (स्तभायन्) थामे हुए (अरतिः) सबका स्वामी वह परमेश्वर (दिवः) द्युलोक के (वसुभिः) ग्रह, नक्षत्र आदि लोकों से (विभाति) विशेष रूप से शोभित होता है ॥१॥
भावार्थःभूमि पर और आकाश में व्याप्त काली रात्रि को छिन्न-भिन्न करके चमकीली उषा को और उसके अनन्तर तीव्र प्रकाशवाले सूर्य को उत्पन्न करता हुआ जगदीश्वर महिमा से अत्यधिक शोभा पाता है ॥२॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
भ꣣द्रो꣢ भ꣣द्र꣢या꣣ स꣡च꣢मा꣣न आ꣢गा꣣त्स्व꣡सा꣢रं जा꣣रो꣢ अ꣣꣬भ्ये꣢꣯ति प꣣श्चा꣢त् । सु꣣प्रकेतै꣡र्द्युभि꣢꣯र꣣ग्नि꣢र्वि꣣ति꣢ष्ठ꣣न्रु꣡श꣢द्भि꣣र्व꣡र्णै꣢र꣣भि꣢ रा꣣म꣡म꣢स्थात् ॥१५४८॥
पदार्थः(भद्रः) श्रेष्ठ सूर्य (भद्रया) श्रेष्ठ दीप्ति से (सचमानः) संयुक्त होता हुआ (आगात्) आया है। (जारः) रात्रि को जीर्ण करता हुआ वह (स्वसारम्) भली-भाँति अन्धकार को दूर फेंकनेवाली उषा के (पश्चात्) पीछे (अभ्येति) आता है। (अग्निः) अग्रनायक जगदीश्वर (सुप्रकेतैः) सुप्रकाशमान (द्युभिः) तेजों से (वितिष्ठन्) व्याप्त होता हुआ (रुशद्भिः वर्णैः) सूर्य के चमकीले रंगों से (रामम्) काले अँधेरे को (अभि अस्थात्) दूर करता है ॥३॥
भावार्थःरात्रि के बाद उषा, उषा के बाद दिन, दिन के बाद सन्ध्या, सन्ध्या के बाद फिर रात्रि, रात्रि के बाद फिर उषा, यह जो चक्र चल रहा है, उसका चलानेवाला जगदीश्वर के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है, क्योंकि मनुष्य में ऐसा सामर्थ्य नहीं है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
क꣡या꣢ ते अग्ने अङ्गिर꣣ ऊ꣡र्जो꣢ नपा꣣दु꣡प꣢स्तुतिम् । व꣡रा꣢य देव म꣣न्य꣡वे꣢ ॥१५४९॥
पदार्थःहे (अङ्गिरः) प्राणप्रिय, (ऊर्जः नपात्) बल और प्राणशक्ति को न गिरने देनेवाले, (देव) प्रकाशक (अग्ने) जगन्नायक परमेश्वर! (वराय) वरणीय, श्रेष्ठ (मन्यवे) मनन करने योग्य वा तेजस्वी (ते) आपके लिए (कया) किस रीति से, हम (उपस्तुतिम्) स्तोत्र को करें ? यह प्रश्न है। इसका उत्तर है कि वेदोक्त रीति से ही स्तुति करनी चाहिए ॥१॥
भावार्थःसच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर की स्तुति वैदिक पद्धति से ही करनी चाहिए, न कि साकार मूर्तिपूजा के प्रकार से ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
दा꣡शे꣢म꣣ क꣢स्य꣣ म꣡न꣢सा य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ सहसो यहो । क꣡दु꣢ वोच इ꣣दं꣡ नमः꣢꣯ ॥१५५०॥
पदार्थःहे (सहसः यहो) बल के पुत्र अर्थात् अत्यन्त बली परमेश्वर ! (कस्य यज्ञस्य मनसा) किस यज्ञ के मन से, हम आपको (दाशेम) आत्मसमर्पण करें ? (कत् उ) कैसे मैं (इदं नमः) इस नमस्कार को (वोचे) आपके प्रति कहूँ ? ॥२॥
भावार्थःअनेक सकाम यज्ञ और निष्काम यज्ञ प्रचलित हैं। पर मैं तो हे जगदीश्वर ! आपकी उपासना ही जिसका प्रयोजन है, ऐसे यज्ञ से ही आपको आत्मसमर्पण करता हूँ, किसी स्वार्थ को मन में रखकर नहीं। कैसे मैं आपको नमस्कार करूँ ? कुछ लोग साष्टाङ्ग प्रणाम करते हैं, कोई अञ्जलि बाँधकर प्रणाम करते हैं, कोई मूर्ति पर सिर नवाकर प्रणाम करते हैं, पर मैं तो चित्त को ही तेरे प्रति नवाता हूँ, शरीर के अङ्गों को नहीं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡धा꣣ त्वं꣢꣫ हि न꣣स्क꣢रो꣣ वि꣡श्वा꣢ अ꣣स्म꣡भ्य꣢ꣳ सुक्षि꣣तीः꣢ । वा꣡ज꣢द्रविणसो꣣ गि꣡रः꣢ ॥१५५१॥
पदार्थःहे अग्ने ! हे विश्वनायक जगदीश ! (अध) अब (त्वं हि) आप (नः) हमारी (विश्वाः गिरः) सब वाणियों को (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (सुक्षितीः) उत्तम निवास देनेवाली और (वाजद्रविणसः) बल रूप धन से युक्त अर्थात् बलवती (करः) कर दो ॥३॥
भावार्थःश्रद्धा के साथ परमात्मा की उपासना करने से ऐसा वाणी का बल पाया जा सकता है, जो श्रोताओं के मन पर प्रभाव उत्पन्न करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
अ꣢ग्न꣣ आ꣡ या꣢ह्य꣣ग्नि꣢भि꣣र्हो꣡ता꣢रं त्वा वृणीमहे । आ꣡ त्वाम꣢꣯नक्तु꣣ प्र꣡य꣢ता ह꣣वि꣡ष्म꣢ती꣣ य꣡जि꣢ष्ठं ब꣣र्हि꣢रा꣣स꣡दे꣢ ॥१५५२॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनेता परमात्मन् ! आप (अग्निभिः) तेजों के साथ (आ याहि) आओ। (होतारम्) दाता (त्वा) आपको, हम (वृणीमहे) भजते हैं। (यजिष्ठं त्वाम्) हमारे साथ अतिशय सङ्गम करनेवाले आपको, हमारी (हविष्मती) समर्पणयुक्त (प्रयता) पवित्र प्रज्ञा (बर्हिः) हृदयासन पर (आसदे) बैठने के लिए (अनक्तु) प्रकट करे ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर जब स्तोता के अन्तरात्मा में प्रबल संकल्प, उत्साह, वीरता और आशावाद की अग्नियों के साथ आता है, तब स्तोता के मार्ग से सब विघ्न हट जाते हैं और लक्ष्यप्राप्ति सुनिश्चित हो जाती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢च्छा꣣ हि꣡ त्वा꣢ सहसः सूनो अङ्गिरः꣣ स्रु꣢च꣣श्च꣡र꣢न्त्यध्व꣣रे꣢ । ऊ꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯तं घृ꣣त꣡के꣢शमीमहे꣣ऽग्निं꣢ य꣣ज्ञे꣡षु꣢ पू꣣र्व्य꣢म् ॥१५५३॥
पदार्थःहे (सहसः सूनो) बल और साहस के प्रेरक, (अङ्गिरः) प्राणप्रिय परमेश्वर ! (अध्वरे) उपासना-यज्ञ में (त्वा अच्छ) आपके प्रति (हि) निश्चय ही (स्रुचः) मेरी वाणियाँ (चरन्ति) प्रवृत्त हो रही हैं। हम (यज्ञेषु) अपने जीवन-यज्ञों में (ऊर्जः नपातम्) बल और प्राणशक्ति के न गिरने देनेवाले, (घृतकेशम्) प्रदीप्त तेजवाले, (पूर्व्यम्) सनातन (अग्निम्) आप अग्रनेता परमात्मा से (ईमहे) बल की याचना करते हैं ॥२॥
भावार्थःउपासना का यही लाभ है कि उपासक बल के खजाने परमात्मा के पास से अपरिमित बल प्राप्त करके लक्ष्यसिद्धि में सफल हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
अ꣡च्छा꣢ नः शी꣣र꣡शो꣢चिषं꣣ गि꣡रो꣢ यन्तु दर्श꣣त꣢म् । अ꣡च्छा꣢ य꣣ज्ञा꣢सो꣣ न꣡म꣢सा पुरू꣣व꣡सुं꣢ पुरुप्रश꣣स्त꣢मू꣣त꣡ये꣢ ॥१५५४॥
पदार्थः(नः) हमारी (गिरः) वाणियाँ (शीरशोचिषम्) व्याप्त तेजवाले, (दर्शतम्) दर्शनीय अग्रनायक परमात्मा के (अच्छ) प्रति (यन्तु) प्रवृत्त हों। साथ ही, हमारे (यज्ञासः) उपासना-यज्ञ (ऊतये) रक्षा के लिए (नमसा) नमस्कार के साथ (पुरूवसुम्) बहुत धनवाले, (पुरुप्रशस्तम्) बहुत श्लाघ्य उस अग्नि नामक परमात्मा के (अच्छ) प्रति (यन्तु) पहुँचें ॥१॥
भावार्थःश्रद्धा के साथ नमस्कारपूर्वक की गयी ही परमात्मा की उपासना सफल होती है, बेमन से की गयी नहीं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣣ग्नि꣢ꣳ सू꣣नु꣡ꣳ सह꣢꣯सो जा꣣त꣡वे꣢दसं दा꣣ना꣢य꣣ वा꣡र्या꣢णाम् । द्वि꣣ता꣢꣫ यो भूद꣣मृ꣢तो꣣ म꣢र्त्ये꣣ष्वा꣡ होता꣢꣯ म꣣न्द्र꣡त꣢मो वि꣣शि꣢ ॥१५५५॥
पदार्थः(सहसः सूनुम्) बल के प्रेरक, (जातवेदसम्) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, ज्ञान और धन के उत्पादक, (अग्निम्) अग्रनायक जगदीश्वर की (वार्याणाम्) वरणीय सद्गुणों और श्रेष्ठ ऐश्वर्यों के (दानाय) दान के लिए, मैं स्तुति करता हूँ। (मर्त्येषु) मरणधर्मा प्राणियों के मध्य में (अमृतः) अमर और (विशि) मनुष्य-प्रजा में (मन्द्रतमः) अतिशय आनन्दप्रदाता, (होता) जीवनयज्ञ का निष्पादक (यः) जो अग्नि जगदीश्वर (द्विता) दोनों स्थानों में अर्थात् इहलोक में और मोक्षलोक में (आ भूत्) सहायक होता है ॥२॥
भावार्थःन केवल इस जीवन में, अपितु जन्म-जन्मान्तरों में और मोक्षलोक में भी जो जगदीश्वर हमारे साथ मित्रता का निर्वाह करता है, वह वन्दनीय क्यों न हो ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ पन्द्रहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣡दा꣢भ्यः पुरए꣣ता꣢ वि꣣शा꣢म꣣ग्नि꣡र्मानु꣢꣯षीणाम् । तू꣢र्णी꣣ र꣢थः꣣ स꣢दा꣣ न꣡वः꣢ ॥१५५६॥
पदार्थः(अग्निः) जगन्नायक सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (अदाभ्यः) किसी से दबाया या पराजित न किया जा सकनेवाला और (मानुषीणां विशाम्) मानवी प्रजाओं के (पुर एता) आगे पहुँचनेवाला है। (रथः) इससे रचा हुआ मानव-शरीर रूप रथ (तूर्णिः) शीघ्रगामी और (सदा नवः) सदा स्तुतियोग्य होता है ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर कैसा विलक्षण शिल्पकार है कि उससे रचा हुआ आत्मा से अधिष्ठित मानव-देह-रूप रथ चेतन होता हुआ स्वयं ही चलता है, स्वयं ही रुकता है और स्वयं ही कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣡ प्रया꣢꣯ꣳसि꣣ वा꣡ह꣢सा दा꣣श्वा꣡ꣳ अ꣢श्नोति꣣ म꣡र्त्यः꣢ । क्ष꣡यं꣢ पाव꣣क꣡शो꣢चिषः ॥१५५७॥
पदार्थः(दाश्वान्) आत्मसमर्पण करनेवाला (मर्त्यः) मनुष्य (वाहसा) परमेश्वर के प्रति किये गए स्तोत्र से (प्रयांसि) आनन्द-रसों को (अभि अश्नोति) पा लेता है। साथ ही (पावक-शोचिषः) पवित्रकारी ज्योतिवाले उस परमेश्वर के (क्षयम्) मोक्षधाम को भी प्राप्त कर लेता है ॥२॥
भावार्थःमनुष्य को योग्य है कि तेजस्वी जगदीश्वर की स्तुति से स्वयं भी उसके गुणों को धारण करके अभ्युदय तथा निःश्रेयस प्राप्त करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
सा꣣ह्वा꣡न्विश्वा꣢꣯ अभि꣣यु꣢जः꣣ क्र꣡तु꣢र्दे꣣वा꣢ना꣣म꣡मृ꣢क्तः । अ꣣ग्नि꣢स्तु꣣वि꣡श्र꣢वस्तमः ॥१५५८॥
पदार्थः(विश्वाः अभियुजः) सब आक्रमणकारी काम, क्रोध आदियों को (साह्वान्) अपने बल से तिरस्कृत करता हुआ, (देवानाम्) दिव्य गुणों का (क्रतुः) उत्पादक, (अमृक्तः) किसी से शुद्ध न किया गया अर्थात् स्वतः शुद्ध (अग्निः) तेजस्वी परमेश्वर (तुविश्रवस्तमः) बहुत अधिक यशस्वी है ॥३॥
भावार्थःअनन्त गुणों से युक्त होने के कारण जगदीश्वर की कीर्ति सबसे अधिक बढ़ी हुई है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुबुष्णिक्, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
भ꣣द्रो꣡ नो꣢ अ꣣ग्नि꣡राहु꣢꣯तो भ꣣द्रा꣢ रा꣣तिः꣡ सु꣢भग भ꣣द्रो꣡ अ꣢ध्व꣣रः꣢ । भ꣣द्रा꣢ उ꣣त꣡ प्रश꣢꣯स्तयः ॥१५५९॥
पदार्थः(आहुतः) जिसमें आहुति डाली गयी है, ऐसी (अग्निः) राष्ट्रियता की अग्नि (नः) हमारे लिए (भद्रः) शुभ हो। (रातिः) राष्ट्र के लिए की गयी दान की क्रिया (भद्रा) शुभ हो। हे (सुभग) सौभाग्यवान् राजन् ! (अध्वरः) तुम्हारे और हमारे द्वारा किया गया राष्ट्र-यज्ञ (भद्रः) शुभ हो। (उत) और (प्रशस्तयः) राष्ट्र की उन्नति से प्राप्त प्रशस्तियाँ (भद्राः) शुभ हों ॥१॥
भावार्थःसब प्रजाजन और राजा, मन्त्री आदि राज्याधिकारी राष्ट्रभक्त होकर मातृभूमि के लिए अपना बलिदान भी करने के लिए सदा तैयार रहें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुबुष्णिक्, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
भ꣣द्रं꣡ मनः꣢꣯ कृणुष्व वृत्र꣣तू꣢र्ये꣣ ये꣡ना꣢ स꣣म꣡त्सु꣢ सास꣣हिः꣢ । अ꣡व꣢ स्थि꣣रा꣡ त꣢नुहि꣣ भू꣢रि꣣ श꣡र्ध꣢तां व꣣ने꣡मा꣢ ते अ꣣भि꣡ष्ट꣢ये ॥१५६०॥
पदार्थःहे मनुष्य ! तू (वृत्रतूर्ये) जिसमें उपद्रवियों का वध किया जाता है, ऐसे सङ्ग्राम में (मनः) अपने मन को (भद्रम्) भद्र (कृणुष्व) बना, (येन) जिस मन से, तू (समत्सु) युद्धों में (सासहिः) शत्रुओं के छक्के छुड़ानेवाला होता है। (शर्धताम्) उपद्रवी शत्रुओं के (भूरि) बहुत से (स्थिरा) स्थिर बलों को (अवतनुहि) नीचा दिखा दे। हम (ते) तेरी (अभिष्टये) अभीष्ट-प्राप्ति के लिए (वनेम) मिलकर प्रयत्न करें ॥२॥
भावार्थःभद्र मन से ही युद्ध करके ऐसा यत्न करना चाहिए कि शत्रु भी भद्र हो जाएँ, यदि भद्र न हों तो उन्हें विश्वहित के लिए बाँधकर कारागार में डाल दे या उनका वध कर दे ॥२॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
अ꣢ग्ने꣣ वा꣡ज꣢स्य꣣ गो꣡म꣢त꣣ ई꣡शा꣢नः सहसो यहो । अ꣣स्मे꣡ दे꣢हि जातवेदो꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥१५६१॥
पदार्थःहे (अग्ने) छात्रों को उन्नत करनेवाले विद्वान् आचार्यवर ! हे (सहसः यहो) आत्मबल के पुत्र अर्थात् अतिशय आत्मबल से युक्त ! हे (जातवेदः) उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता ! (गोमतः वाजस्य) वेदवाणी से युक्त ऐश्वर्य के (ईशानः) अधीश्वर आप (अस्मे) हमारे लिए (महि श्रवः) महान् शास्त्रज्ञान और उससे उत्पन्न यश (देहि) प्रदान करो ॥१॥
भावार्थःआचार्य के पास से विविध विद्याओं का ज्ञान पाकर शिष्य विद्वान् और कीर्तिमान् बनें ॥१॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
स꣡ इ꣢धा꣣नो꣡ वसु꣢꣯ष्क꣣वि꣢र꣣ग्नि꣢री꣣डे꣡न्यो꣢ गि꣣रा꣢ । रे꣣व꣢द꣣स्म꣡भ्यं꣢ पुर्वणीक दीदिहि ॥१५६२॥
पदार्थःहे (पुर्वणीक) बहुत-सी सेनावाले परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (इधानः) प्रकाश देते हुए, (वसुः) निवास-प्रदाता, (कविः) मेधावी और क्रान्तद्रष्टा, (गिरा ईडेन्यः) वाणी से स्तुति करने योग्य (अग्निः) उन्नति करानेवाले (सः) वे आप (अस्मभ्यम्) हम उपासकों, शिष्यों वा प्रजाजनों के लिए (रेवत्) शोभा के साथ (दीदिहि) चमको ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा और आचार्य सद्गुणों की सेना से और राजा योद्धाओं की सेना से बढ़ता है और अपने उपासकों, शिष्यों और प्रजाजनों को बढ़ाता है ॥२॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
क्ष꣣पो꣡ रा꣢जन्नु꣣त꣢꣫ त्मनाग्ने꣣ व꣡स्तो꣢रु꣣तो꣡षसः꣢꣯ । स꣡ ति꣢ग्मजम्भ र꣣क्ष꣡सो꣢ दह꣣ प्र꣡ति꣢ ॥१५६३॥
पदार्थःहे (राजन्) सम्राट् (तिग्मजम्भ) तीक्ष्ण दण्डवाले (अग्ने) परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (सः) वह विविध गुणों और कर्मों से सुशोभित आप (त्मना) स्वयम् (क्षपः) रात्रि में, (वस्तोः) दिन में, (उत) और (उषसः) उषाकालों में (रक्षसः) ब्रह्मचर्य-विरोधी, विद्या-विरोधी और सच्चरित्र-विरोधी दुष्ट विचारों को (प्रति दह) भस्म कर दो ॥३॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर दिन-रात जागरूक होकर उपासकों के सच्चरित्र की रक्षा करता हुआ उनके काम, क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा आदि के भावों को विनष्ट करता है, वैसे ही आचार्य शिष्यों के लिए और राजा प्रजाओं के लिए करे ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, राष्ट्र, मानवोद्बोधन, राजा और आचार्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पन्द्रहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -आनुष्टुभः प्रगाथः| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
वि꣣शो꣡वि꣢शो वो꣣ अ꣡ति꣢थिं वाज꣣य꣡न्तः꣢ पुरुप्रि꣣य꣢म् । अ꣣ग्निं꣢ वो꣣ दु꣢र्यं꣣ व꣡च꣢ स्तु꣣षे꣢ शू꣣ष꣢स्य꣣ म꣡न्म꣢भिः ॥१५६४॥
पदार्थःहे मित्रो ! (वाजयन्तः) बल, आरोग्य और आध्यात्मिक ऐश्वर्य की कामना करते हुए (वः) तुम (विशः विशः) प्रत्येक मनुष्य के (अतिथिम्) अतिथि के समान सत्कार करने योग्य, (पुरुप्रियम्) बहुत प्यारे, (वः) तुम्हें (दुर्यम्) घर के समान शरण देनेवाले (अग्निम्) यज्ञाग्नि के प्रति (वचः) वचन को प्रेरित करो। मैं भी (शूषस्य) बलवान् ज्ञानी परमेश्वर के रचे हुए (मन्मभिः) वेदमन्त्रों से, यज्ञाग्नि की (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥१॥
भावार्थःघर में आये हुए अतिथि के समान यज्ञाग्नि को आहुति देकर सबको सत्कार करना चाहिए ॥१॥
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छन्द -आनुष्टुभः प्रगाथः (गायत्री)| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
यं꣡ जना꣢꣯सो ह꣣वि꣡ष्म꣢न्तो मि꣣त्रं꣢꣫ न स꣣र्पि꣡रा꣢सुतिम् । प्र꣣श꣡ꣳस꣢न्ति꣣ प्र꣡श꣢स्तिभिः ॥१५६५॥
पदार्थः(सर्पिरासुतिम्) जिसमें घृत की आहुति दी जाती है, ऐसे (यम्) जिस यज्ञाग्नि की (हविष्मन्तः) सुगन्धित, मीठे, पुष्टिवर्धक, आरोग्यवर्धक, कस्तूरी, केसर, घी, दूध, शक्कर, शहद, गुडूची आदि हव्यों से युक्त (जनासः) याज्ञिक मनुष्य (मित्रं न) मित्र के समान (प्रशस्तिभिः) प्रशस्तियों से (प्रशंसन्ति) प्रशंसा करते हैं, उस अग्नि की मैं भी (स्तुषे) स्तुति करता हूँ । [यहाँ ‘स्तुषे’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है] ॥२॥
भावार्थःआध्यात्मिक जीवन बिताने के इच्छुक मनुष्यों को चाहिए कि वे अग्निहोत्र से परमात्माग्नि में अपनी आत्मा के होम की प्रेरणा ग्रहण करें ॥२॥
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छन्द -आनुष्टुभः प्रगाथः (गायत्री)| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
प꣡न्या꣢ꣳसं जा꣣त꣡वे꣢दसं꣣ यो꣢ दे꣣व꣢ता꣣त्यु꣡द्य꣢ता । ह꣣व्या꣡न्यै꣢꣯रयद्दि꣣वि꣢ ॥१५६६॥
पदार्थः(यः) जो यज्ञाग्नि (देवताति) यज्ञ में (उद्यता) डाली गयी (हव्यानि) हवियों को (दिवि) अन्तरिक्ष में (ऐरयत्) पहुँचा देता है, उस (पन्यांसम्) अतिशय आदान-प्रदान का व्यवहार करनेवाले अर्थात् हवि लेकर बदले में आकाश से वर्षा देनेवाले (जातवेदसम्) प्रकाशित यज्ञाग्नि की, मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ। [यहाँ स्तुषे पद पहले से चला आ रहा है।] ॥३॥
भावार्थःवर्षा के लिए अग्नि में डाली हुई आहुति अग्नि द्वारा अलग-अलग सूक्ष्म अवयवों में विभक्त होकर गरम वायु के साथ ऊपर आकाश में पहुँचती है। तब ऊपर स्थित पवनों में गति उत्पन्न हो जाती है, जिससे मेघस्थ जल-वाष्पों से जब शीतल पवन टकराते हैं, तब वर्षा होती है ॥३॥
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छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
स꣡मि꣢द्धम꣣ग्निं꣢ स꣣मि꣡धा꣢ गि꣣रा꣡ गृ꣢णे꣣ शु꣡चिं꣢ पाव꣣कं꣢ पु꣣रो꣡ अ꣢ध्व꣣रे꣢ ध्रु꣣व꣢म् । वि꣢प्र꣣ꣳ हो꣡ता꣢रं पुरु꣣वा꣡र꣢म꣣द्रु꣡हं꣢ क꣣वि꣢ꣳ सु꣣म्नै꣡री꣢महे जा꣣त꣡वे꣢दसम् ॥१५६७॥
पदार्थः(समिद्धम्) तेजस्वी (अग्निम्) अग्रनायक जगदीश्वर की (समिधा गिरा) तेजोमयी वाणी से, मैं (गृणे) स्तुति करता हूँ। (शुचिम्) पवित्र, (पावकम्) पवित्रकर्ता (पुरः) सामने (अध्वरे) उपासना-यज्ञ में (ध्रुवम्) स्थिररूप में विद्यमान, (विप्रम्) विशेषरूप से पूर्णता प्रदान करनेवाले, (होतारम्) सुख आदि देनेवाले, (पुरुवारम्) बहुत वरणीय अथवा बहुत से दोषों का निवारण करनेवाले, (कविम्) क्रान्तद्रष्टा, मेधावी, (जातवेदसम्) सर्वज्ञ, सर्वव्यापक जगदीश्वर से हम (सुम्नैः) सुखकारी स्तोत्रों के द्वारा (ईमहे) याचना करते हैं ॥१॥ यहाँ विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजो तेजस्वी, पवित्र, पवित्रकर्ता, स्थिर, छिद्रों को भरनेवाला, सद्गुणों का दाता, दुर्गुणों को दूर करनेवाला, भक्तवत्सल, क्रान्तद्रष्टा, सर्वज्ञ सर्वान्तर्यामी परमेश्वर है, उसका श्रद्धा से सबको भजन करना चाहिए और उससे सद्गुणों की याचना करनी चाहिए ॥१॥
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छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
त्वां꣢ दू꣣त꣡म꣢ग्ने अ꣣मृ꣡तं꣢ यु꣣गे꣡यु꣢गे हव्य꣣वा꣡हं꣢ दधिरे पा꣢यु꣡मीड्य꣢꣯म् । दे꣣वा꣡स꣢श्च꣣ म꣡र्ता꣢सश्च꣣ जा꣡गृ꣢विं वि꣣भुं꣢ वि꣣श्प꣢तिं꣣ न꣡म꣢सा꣣ नि꣡ षे꣢दिरे ॥१५६८॥
पदार्थःहे (अग्ने) स्वयं प्रकाशमान, जगन्नायक, प्रकाशप्रदाता परमात्मन् ! (दूतम्) दुःखों को दग्ध करनेवाले, (अमृतम्) अमर, (हव्यवाहम्) दातव्य पदार्थों वा गुणों को प्राप्त करानेवाले, (पायुम्) पालनकर्ता, (ईड्यम्) स्तुतियोग्य, (जागृविम्) जागरूक, (विभुम्) व्यापक, (विश्पतिम्) प्रजापालक (त्वाम्) आप जगदीश्वर को (देवासः च) विद्वान् योगी लोग भी (मर्तासः च) और सामान्य मनुष्य भी (दधिरे) अपने आत्मा में धारण करते हैं और (नमसा) नमस्कार के साथ (निषेदिरे च) आपके समीप बैठते हैं ॥२॥ यहाँ विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार है, अनुप्रास भी है ॥२॥
भावार्थःसब गुणों से समृद्ध, परोपकारी परमात्मा को छोड़कर अन्य किसी की परब्रह्म के रूप में उपासना करनी उचित नहीं है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
वि꣣भू꣡ष꣢न्नग्न उ꣣भ꣢या꣣ꣳ अ꣡नु꣢ व्र꣣ता꣢ दू꣣तो꣢ दे꣣वा꣢ना꣣ꣳ र꣡ज꣢सी꣣ स꣡मी꣢यसे । य꣡त्ते꣢ धी꣣ति꣡ꣳ सु꣢म꣣ति꣡मा꣢वृणी꣣म꣡हेऽध꣢꣯ स्म नस्त्रि꣣व꣡रू꣢थः शि꣣वो꣡ भ꣢व ॥१५६९॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगत् के नायक, सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! (उभयान्) पूर्वमन्त्रोक्त विद्वान् योगियों तथा सामान्य मनुष्यों दोनों को (विभूषन्) सद्गुण आदियों से अलङ्कृत करते हुए, (देवानाम्) विद्वानों को (दूतः) धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्त करानेवाले आप (व्रता अनु) अपने नियमों का अनुसरण करते हुए (रजसी) द्यावापृथिवी को (समीयसे) व्याप्त करते हो। (यत्) क्योंकि (ते) आपकी (धीतिम्) धारणा वा ध्यान को और (सुमतिम्) सुमति को (आ वृणीमहे) हम प्राप्त करते हैं, (अध) इसलिए (त्रिवरुथः) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, तीनों में घर के समान निवास करनेवाले अथवा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों दुःखो को दूर करनेवाले आप (नः) हमारे लिए (शिवः) मङ्गलकारी (भव स्म) होओ ॥३॥
भावार्थःध्यान किया गया परमेश्वर उपासकों को सुख-शान्ति देता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ त्वा जा꣣म꣢यो꣣ गि꣢रो꣣ दे꣡दि꣢शतीर्हवि꣣ष्कृ꣡तः꣢ । वा꣣यो꣡रनी꣢꣯के अस्थिरन् ॥१५७०॥
पदार्थःहे अग्ने ! हे प्रकाशमय जगदीश्वर ! (हविष्कृतः) आत्मसमर्पणकर्ता उपासक की (जामयः) बहिनों के समान हितकारिणी, (त्वा देदिशतीः) आपके गुणों का निर्देश करती हुई (गिरः) वेदवाणियाँ (वायोः) प्राणप्रिय आपके (अनीके) समीप (उप अस्थिरन्) उपस्थित हो रही हैं ॥ अन्यत्र कहा भी है—ऋचाएँ उसी अविनाशी सर्वोच्च परमेश्वर का प्रतिपादन करती हैं, जिसमें सब दिव्यगुण अवस्थित हैं। जिसने उसे नहीं जाना, उसे वेद से क्या लाभ ? जो उसे जान लेते हैं, वे मोक्ष पद में समासीन हो जाते हैं (ऋ० १।१६४।३९) ॥१॥
भावार्थःजो परमेश्वर अग्नि के समान स्तोता के हृदय में दिव्य ज्योति प्रज्वलित कर देता है और वायु के समान उसे धौंकता रहता है, उसी की महिमा को सब वेद एक स्वर से गाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣡स्य꣢ त्रि꣣धा꣡त्ववृ꣢꣯तं ब꣣र्हि꣢स्त꣣स्था꣡वस꣢꣯न्दिनम् । आ꣡प꣢श्चि꣣न्नि꣡ द꣢धा प꣣द꣢म् ॥१५७१॥
पदार्थः(यस्य) जिस जगदीश्वर का (त्रिधातु) वायु, बिजली और सूर्य, इन तीनों धातुओं से युक्त, (अवृतम्) न समेटा हुआ अर्थात् विस्तृत (बर्हिः) अन्तरिक्ष (असन्दिनम्) खुला हुआ (तस्थौ) स्थित है, जिस अन्तरिक्ष में (आपः चित्) मेघ-जल भी (पदम्) स्थिति को (नि दध) धारण किये हुए हैं। [हे मनुष्यो ! उसकी महिमा को तुम जानो] ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर से रचे हुए अन्तरिक्ष आदि की महिमा से परमेश्वर की ही महिमा प्रकाशित होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
प꣣दं꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ मी꣣ढु꣡षोऽना꣢꣯धृष्टाभिरू꣣ति꣡भिः꣢ । भ꣣द्रा꣡ सूर्य꣢꣯ इवोप꣣दृ꣢क् ॥१५७२॥
पदार्थः(मीढ़ुषः) सुख को सींचनेवाले (देवस्य) प्रकाशक जगदीश्वर का (पदम्) प्राप्तव्य मोक्षपद (अनाधृष्टाभिः) अपराजित (ऊतिभिः) रक्षाओं से युक्त है और उसकी (उपदृक्) कृपादृष्टि (सूर्यः इव) सूर्य के समान (भद्रा) शुभ है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की शरण में जाकर मनुष्य उसकी कभी क्षीण न हो सकनेवाली रक्षा को और अमृतमयी कृपादृष्टि को पा लेता है ॥३॥ इस खण्ड में यज्ञाग्नि और परमेश्वर के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ पन्द्रहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ पन्द्रहवां अध्याय समाप्त ॥ सप्तम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ पू꣣र्व꣡पी꣢तय꣣ इ꣢न्द्र꣣ स्तो꣡मे꣢भिरा꣣य꣡वः꣢ । स꣣मीचीना꣡स꣢ ऋ꣣भ꣢वः꣣ स꣡म꣢स्वरन्रु꣣द्रा꣡ गृ꣢णन्त पू꣣र्व्य꣢म् ॥१५७३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य ! (पूर्वपीतये) श्रेष्ठ विद्यारस के पान के लिए (आयवः) विद्यार्थी जन (स्तोमेभिः) स्तोत्रों द्वारा (त्वा) आपसे (अभि) अभ्यर्थना कर रहे हैं। आपके ही निर्देशन में (ऋभवः) मेधावी छात्र (समीचीनासः) आपस में मिलकर (समस्वरन्) वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हैं और (रुद्राः) प्राणवान् ब्रह्मचारीगण (पूर्व्यम्) पूर्व कवियों वा ऋषियों से रचे हुए स्तोत्र आदि काव्य का भी (गृणन्त) गान करते हैं ॥१॥
भावार्थःसुयोग्य ब्रह्मवेत्ता गुरुओं से सुयोग्य शिष्यों द्वारा पढ़ी हुई भौतिक विद्या और ब्रह्मविद्या फलदायक होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣣स्ये꣡दिन्द्रो꣢꣯ वावृधे꣣ वृ꣢ष्ण्य꣣ꣳश꣢वो꣣ म꣡दे꣢ सु꣣त꣢स्य꣣ वि꣡ष्ण꣢वि । अ꣣द्या꣡ तम꣢꣯स्य महि꣣मा꣡न꣢मा꣣य꣡वोऽनु꣢꣯ ष्टुवन्ति पू꣣र्व꣡था꣢ ॥१५७४॥
पदार्थः(इन्द्रः) विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य (अस्य) इस शिष्य के (वृष्ण्यम्) आत्मिक (शवः) बल को (इत्) निश्चय ही (वावृधे) बढ़ाता है। वह शिष्य (सुतस्य) प्राप्त ज्ञान के (विष्णवि) व्यापक (मदे) आनन्द में वृद्धि को प्राप्त करता है। (अस्य) इस आचार्य की (तम् महिमानम्) उस महिमा की (आयवः) मनुष्य (पूर्वथा) पूर्व की तरह (अद्य) आज भी (अनुष्टुवन्ति) प्रशंसा करते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःआचार्य शिष्य का जो आत्मबल बढ़ाता है वह उस शिष्य की अपूर्व निधि होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
प्र꣡ वा꣢मर्चन्त्यु꣣क्थि꣡नो꣢ नीथा꣣वि꣡दो꣢ जरि꣣ता꣡रः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ इ꣢ष꣣ आ꣡ वृ꣢णे ॥१५७५॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) जीवात्मन् और परमात्मन् ! (उक्थिनः) गुणों के प्रशंसक, (नीथाविदः) नीतिज्ञ (जरितारः) स्तोता लोग (वाम्) आप दोनों की (प्र अर्चन्ति) भली-भाँति स्तुति करते हैं। मैं आप दोनों की सहायता से (इषः) आनन्द-रसों और ज्ञान-रसों को (आवृणे) ग्रहण करता हूँ ॥१॥
भावार्थःमनुष्य जीवात्मा को उद्बोधन देकर और परमात्मा की पूजा करके दिव्य ज्ञान तथा आनन्द को पाकर महान् उन्नति कर सकते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी नव꣣तिं꣡ पुरो꣢꣯ दा꣣स꣡प꣢त्नीरधूनुतम् । सा꣣क꣡मेके꣢꣯न꣣ क꣡र्म꣢णा ॥१५७६॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) जीवात्मन् और परमात्मन् ! (एकेन) अद्वितीय (कर्मणा) पुरुषार्थ के (साकम्) साथ (दासपत्नीः) काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रूप दास जिनके स्वामी हैं, ऐसी (नवतिं पुरः) नव्वे शत्रु-नगरियों को—पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय, पाँच कर्मेन्द्रियों के विषय और उन-उनमें आनेवाले व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व—ये नौ योगमार्ग के विघ्न इस प्रकार नव्वे हो जाते हैं, वे ही नव्वे शत्रु-नगरियाँ हैं, उन्हें तुम दोनों (अधूनुतम्) कँपा डालते हो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की मित्रता पाकर और जीवात्मा को उद्बोधन देकर योगाभ्यास में संलग्न मनुष्य को सब योग-विघ्नों को दूर करके योगमार्ग में सफलता पाना योग्य है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ अ꣡प꣢स꣣स्प꣢꣯र्युप꣣ प्र꣡ य꣢न्ति धी꣣त꣡यः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ प꣣थ्या꣢३ अ꣡नु꣢ ॥१५७७॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) जीवात्मन् और परमात्मन् ! (धीतयः) ध्यानकर्ता लोग (ऋतस्य) सत्य के (पथ्याः) मार्गों का (अनु) अनुसरण करते हुए (अपसः परि) धर्म कर्मों के पार पहुँच कर, तुम दोनों को (उप प्र यन्ति) प्राप्त कर लेते हैं ॥३॥
भावार्थःजीवन में सत्य मार्ग का अनुसरण और परमेश्वर की प्राप्ति, यह मनुष्य का लक्ष्य है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी तवि꣣षा꣡णि꣢ वाꣳ स꣣ध꣡स्था꣢नि꣣ प्र꣡या꣢ꣳसि च । यु꣣वो꣢र꣣प्तू꣡र्य꣢ꣳ हि꣣त꣢म् ॥१५७८॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) जीवात्मन् और परमात्मन् ! (वाम्) तुम दोनों के (तविषाणि) बल (प्रयांसि च) और प्रयत्न (सधस्थानि) साथ-साथ होते हैं। (युवोः) तुम दोनों में (अप्तूर्यम्) कर्म के अनुष्ठान की शीघ्रता (हितम्) निहित है ॥४॥
भावार्थःजीवात्मा और परमात्मा एक-दूसरे के साथी हैं। परमात्मा की मित्रता में जीव महान् उन्नति कर सकता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
श꣣ग्ध्यू꣢३꣱षु꣡ श꣢चीपत꣣ इ꣢न्द्र꣣ वि꣡श्वा꣢भिरू꣣ति꣡भिः꣢ । भ꣢गं꣣ न꣡ हि त्वा꣢꣯ य꣣श꣡सं꣢ वसु꣣वि꣢द꣣म꣡नु꣢ शूर꣣ च꣡रा꣢मसि ॥१५७९॥
पदार्थःहे (शचीपते) प्रज्ञा और कर्म के स्वामिन् ! (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! तू (विश्वाभिः) सब (ऊतिभिः) प्रगतियों से (उ सु) भली-भाँति (शग्धि) सशक्त हो। हे (शूर) शूरवीर ! (भगं न) सूर्य के समान (यशसम्) यशस्वी और (वसुविदम्) ऐश्वर्यों को पानेवाले (त्वा) तेरा, हम (अनु चरामसि) सेवन करते हैं ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःअपने आत्मा को प्रबुद्ध करके ही मनुष्य उन्नति कर सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
पौ꣣रो꣡ अश्व꣢꣯स्य पुरु꣣कृ꣡द्गवा꣢꣯मस्यु꣡त्सो꣢ देव हि꣣रण्य꣡यः꣢ । न꣢ कि꣣र्हि꣡ दानं꣢꣯ परि꣣म꣡र्धि꣢ष꣣त् त्वे꣢꣫ यद्य꣣द्या꣢मि꣣ त꣡दा भ꣢꣯र ॥१५८०॥
पदार्थःहे इन्द्र ! हे परमैश्वर्यशाली जगदीश्वर ! आप (अश्वस्य) सूर्य वा प्राण को (पौरः) पूर्ण करनेवाले (गवाम्) सूर्यकिरणों, पृथिवियों, इन्द्रियों वा धेनुओं की (बहुकृत्) बहुतायत करनेवाले (असि) हो। हे (देव) दान आदि गुणों से युक्त ! आप सम्पदाओं के (हिरण्ययः) ज्योतिर्मय (उत्सः) स्रोत हो। (त्वे) आपमें विद्यमान (दानम्) दान के गुण को (न किः हि) कोई भी नहीं (परि मर्धिषत्) नष्ट कर सकता है। इसलिए मैं (यत् यत्) जो-जो (यामि) आपसे माँगता हूँ (तत्) वह (आभर) मुझे प्रदान कर दो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से और अपने पुरुषार्थ से मनुष्य सारी दिव्य और लौकिक सम्पदा प्राप्त कर सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्व꣢꣫ꣳ ह्येहि꣣ चे꣡र꣢वे वि꣣दा꣢꣫ भगं꣣ व꣡सु꣢त्तये । उ꣡द्वा꣢वृषस्व मघव꣣न् ग꣡वि꣢ष्टय꣣ उ꣢दि꣣न्द्रा꣡श्व꣢मिष्टये ॥१५८१॥
पदार्थःहे (इन्द्र) परमैश्वर्यशालिन् परमात्मन् ! (त्वं हि) आप (चेरवे) मुझ योगाभ्यासी के लिए (एहि) आओ। (वसुत्तये) योग के ऐश्वर्य का दान करने के इच्छुक मेरे लिए (भगम्) योग का ऐश्वर्य (विदाः) प्राप्त कराओ। हे (मघवन्) दानी ! आप (गविष्टये) अध्यात्मप्रकाश की किरणों के इच्छुक मेरे ऊपर (उद् वावृषस्व) अध्यात्मप्रकाश की किरणों को सींच दो। (अश्वमिष्टये) प्राणों के इच्छुक मेरे ऊपर (उद् वावृषस्व) प्राण-बल की वर्षा कर दो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर के प्रति ध्यान से योगाभ्यासी मनुष्य प्राणों को ऊपर चढ़ाता हुआ तरह-तरह के अध्यात्मप्रकाशों को और विविध योग-सिद्धियों को पा सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
त्वं꣢ पु꣣रू꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢णि श꣣ता꣡नि꣢ च यू꣣था꣢ दा꣣ना꣡य꣢ मꣳहसे । आ꣡ पु꣢रन्द꣣रं꣡ च꣢कृम꣣ वि꣡प्र꣢वचस꣣ इ꣢न्द्रं꣣ गा꣢य꣣न्तो꣡ऽव꣢से ॥१५८२॥
पदार्थःहे इन्द्र ! हे परमैश्वर्यशालिन् परमात्मदेव ! (त्वम्) परम दानी आप (पुरू) बहुत से (सहस्राणि) हजार, (शतानि च) और सौ हजार अर्थात् लाख (यूथा) गौओं के झुण्डों को अर्थात् अध्यात्मप्रकाश के समूहों को (दानाय) अन्यों को देने के लिए, हम योगाभ्यासियों को (मंहसे) देते हो। (विप्रवचसः) बुद्धिपूर्वक वचनोंवाले, हम (गायन्तः) आपकी स्तुति का गान करते हुए (अवसे) रक्षा के लिए (पुरुन्दरम्) विपत्तिरूप नगरियों को तोड़-फोड़ देनेवाले (इन्द्रम्) वीर आपको (आ चकृम) अपना सखा बना लेते हैं ॥२॥
भावार्थःनिरन्तर योगाभ्यास की साधना से, परमात्मा के ध्यान से, प्रणव-जप आदि से अनन्त प्रकाश के समूह सामने आते हैं, जिनकी चकमक से चमत्कृत हुआ साधक परम स्थिति को पा लेता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
यो꣢꣫ विश्वा꣣ द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ जना꣢꣯नाम् । म꣢धो꣣र्न꣡ पात्रा꣢꣯ प्रथ꣣मा꣡न्य꣢स्मै꣣ प्र꣡ स्तोमा꣢꣯ यन्त्व꣣ग्न꣡ये꣢ ॥१५८३॥
पदार्थः(होता) ब्रह्माण्ड-यज्ञ वा शिक्षा-यज्ञ का कर्ता, (जनानाम्) मनुष्यों को (मन्द्रः) आनन्द देनेवाला (यः) जो परमात्मा वा आचार्य (विश्वा वसु) सब आध्यात्मिक धनों को वा विद्या-धनों को (ददाति) देता है, (अस्मै अग्नये) ऐसे अग्रनायक परमात्मा वा आचार्य के लिए (प्रथमानि) श्रेष्ठ (मधोः पात्रा न) मधुपूर्ण पात्रों के समान (स्तोमाः) धन्यवाद के वचन (प्र यन्तु) पहुँचें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर पुरुषार्थी को भौतिक और आध्यात्मिक धन प्रदान करता है, वैसे ही आचार्य शिष्यों को विद्या-धन देता है, इसलिए वे दोनों सबके द्वारा अभिनन्दन करने योग्य हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢श्व꣣ न꣢ गी꣣र्भी꣢ र꣣꣬थ्य꣢꣯ꣳ सु꣣दा꣡न꣢वो मर्मृ꣣ज्य꣡न्ते꣢ देव꣣य꣡वः꣢ । उ꣣भे꣢ तो꣣के꣡ तन꣢꣯ये दस्म विश्पते꣣ प꣢र्षि꣣ रा꣡धो꣢ म꣣घो꣡ना꣢म् ॥१५८४॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (देवयवः) दिव्य गुणों की कामनावाले (सुदानवः) भली-भाँति आत्मसमर्पण करनेवाले उपासक (रथ्यम् अश्वं न) रथ को खींचनेवाले घोड़े के समान (रथ्यम्) ब्रह्माण्ड-रथ को खींचनेवाले परमात्मा को (गीर्भिः) स्तुति-वाणियों से (मर्मृज्यन्ते) अलङ्कृत करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हे (दस्म) दर्शनीय (विश्पते) प्रजापति परमात्मन् ! आप हमारे (तोके तनये) पुत्र-पौत्रों (उभे) दोनों में (मघोनाम्) धनियों के (राधः) धन के समान (राधः) अध्यात्मधन को, भौतिक धन को और सफलता को (पर्षि) सींचो, बहुत रूप में प्रदान करो ॥ द्वितीय—आचार्य के पक्ष में। (देवयवः) अपने पुत्रों को विद्वान् बनाना चाहते हुए (सुदानवः) उत्तम दानी गृहस्थ लोग (रथ्यम् अश्वं न) रथ को खींचनेवाले घोड़े के समान (रथ्यम्) विद्या-रूप रथ को चलानेवाले आचार्य को (गीर्भिः) प्रशंसा-वचनों से (मर्मृज्यन्ते) अलङ्कृत करते हैं और कहते हैं कि हे (दस्म) दोषों को दूर करनेवाले, (विश्पते) शिष्य रूप प्रजाओं के पालक आचार्य ! आप हमारे (तोके तनये) पुत्र और पौत्र (उभे) दोनों में (मघोनाम्) विद्या-धन के धनी गुरुजनों के (राधः) विद्यारूप धन को (पर्षि) सींचो, बहुत रूप में प्रदान करो ॥२॥ इस मन्त्र में उपमा और श्लेष अलङ्कार हैं ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा और आचार्य की कृपा से हमारी सन्तानें परमेश्वर-पूजक, पुरुषार्थी, विद्यावान् और धार्मिक हों ॥२॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य, परमात्मा-जीवात्मा और मनुष्य के उद्बोधन के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ सोलहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -वरुणः| स्वर - षड्जः
इ꣣मं꣡ मे꣢ वरुण श्रुधी꣣ ह꣡व꣢म꣣द्या꣡ च꣢ मृडय । त्वा꣡म꣢व꣣स्यु꣡रा च꣢꣯के ॥१५८५॥
पदार्थःहे (वरुण) दोष-निवारक वरणीय परमात्मन्, राजन् व आचार्य ! (इमं मे हवम्) इस मेरी पुकार को (श्रुधि) सुनो। और (अद्य) आज, मुझे (मृडय च) आनन्दित कर दो। (अवस्युः) आपकी रक्षा का इच्छुक मैं (त्वाम्) आपको (आचके) चाह रहा हूँ ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि यथायोग्य परमात्मा, राजा और आचार्य से प्रार्थना करके, अपने दोषों का निवारण करके, सद्गुण और सत्कर्मों को स्वीकार करके उन्नति करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
क꣢या꣣ त्वं꣡ न꣢ ऊ꣣त्या꣡भि प्र म꣢꣯न्दसे वृषन् । क꣡या꣢ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१५८६॥
पदार्थःहे (वृषन्) मनोरथों को पूर्ण करनेवाले, मार्ग के विघ्नों को हटानेवाले जगदीश्वर, राजन् वा आचार्य ! (त्वम्) आप ही (कया) सुखदायिनी (ऊत्या) रक्षा द्वारा (नः अभि) हमारे अभिमुख होकर (प्र मन्दसे) हमें भली-भाँति आनन्दित करते हो। (कया) उसी सुखदायिनी रक्षा द्वारा, आप (स्तोतृभ्यः) आपके गुण-कर्म-स्वभाव का कीर्तन करनेवाले स्तोताओं को (आभर) आनन्द प्रदान करो ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर, राजा और आचार्य अविद्या, दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन, शत्रु आदियों से यदि हमारी रक्षा करें तो वैयक्तिक और सामाजिक महान् उन्नति हो सकती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣢न्द्र꣣मि꣢द्दे꣣व꣡ता꣢तय꣣ इ꣡न्द्रं꣢ प्र꣣꣬यत्य꣢꣯ध्व꣣रे꣢ । इ꣡न्द्र꣢ꣳ समी꣣के꣢ व꣣नि꣡नो꣢ हवामह꣣ इ꣢न्द्रं꣣ ध꣡न꣢स्य सा꣣त꣡ये꣢ ॥१५८७॥
पदार्थः(इन्द्रम् इत्) जगदीश्वर को ही (देवतातये) यज्ञ के आरम्भ के लिए, (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (अध्वरे) यज्ञ के (प्रयति) प्रवृत्त होने पर, (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (समीके) यज्ञ समाप्त होने पर (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (धनस्य) यज्ञफल की (सातये) प्राप्ति के लिए (वनिनः) भक्ति में तन्मय होकर हम (हवामहे) पुकारते हैं ॥१॥
भावार्थःअग्निहोत्र से लेकर अश्वमेधपर्यन्त अथवा देवपूजा, सङ्गतिकरण और दानरूप जो भी यज्ञ आयोजित किया जाता है, उसमें सदा परमेश्वर का स्मरण रखने से वह सफल होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
इ꣡न्द्रो꣢ म꣣ह्ना꣡ रोद꣢꣯सी पप्रथ꣣च्छ꣢व꣣ इ꣢न्द्रः꣣ सू꣡र्य꣢मरोचयत् । इ꣡न्द्रे꣢ ह꣣ वि꣢श्वा꣣ भु꣡व꣢नानि येमिर꣣ इ꣡न्द्रे꣢ स्वा꣣ना꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥१५८८॥
पदार्थः(इन्द्रः) जगदीश्वर ने (मह्ना) अपनी महिमा से (रोदसी) द्यावापृथिवी को और (शवः) उनके बल को (पप्रथत्) फैलाया है। (इन्द्रः) जगदीश्वर ने ही (सूर्यम्) सूर्य को (अरोचयत्) चमकाया है। (इन्द्रे ह) जगदीश्वर के आश्रय में ही (विश्वा भुवनानि) सब लोक (येमिरे) नियन्त्रित हैं। (इन्द्रे) जगदीश्वर के आश्रय में ही (स्वानासः) बहते हुए (इन्दवः) जल (येमिरे) नियन्त्रित हैं ॥२॥
भावार्थःग्रह, उपग्रह, सूर्य, नक्षत्र, नीहारिका आदि सभी लोक जगत्स्रष्टा परमेश्वर की ही महिमा से धारित और नियन्त्रित होकर ठहरे हुए हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -विश्वकर्मा| स्वर - धैवतः
वि꣡श्व꣢कर्मन्ह꣣वि꣡षा꣢ वावृधा꣣नः꣢ स्व꣣यं꣡ य꣢जस्व त꣣न्व꣢३ꣳ स्वा꣡ हि ते꣢꣯ । मु꣡ह्य꣢न्त्व꣣न्ये꣢ अ꣣भि꣢तो꣣ ज꣡ना꣢स इ꣣हा꣡स्माकं꣢꣯ म꣣घ꣡वा꣢ सू꣣रि꣡र꣢स्तु ॥१५८९॥
पदार्थःहे (विश्वकर्मन्) शारीरिक सब कर्मों के कर्त्ता जीव ! (हविषा) सद्गुणों के आधान द्वारा (वावृधानः) समृद्ध हुआ तू (स्वयम्) अपने आप ही (तन्वम्) शरीर को (यजस्व) यज्ञ-कर्मों में नियुक्त कर, (हि) क्योंकि, वह (ते) तेरी (स्वा) अपनी है, उस पर तेरा अधिकार है। (अभितः) सब ओर स्थित (अन्ये) दूसरे (जनासः) उत्पन्न बाह्य तथा आन्तरिक शत्रु (मुह्यन्तु) मोह को प्राप्त हो जाएँ। (मघवा) ऐश्वर्यशाली जगदीश्वर (इह) इस जगत् में (अस्माकम्) हमारा (सूरिः) प्रेरक (अस्तु) होवे ॥१॥
भावार्थःजीव का यह कर्तव्य है कि वह अपने देह को शुभकर्मों में लगाकर परमात्मा की पूजा करते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣣या꣢ रु꣣चा꣡ हरि꣢꣯ण्या पुना꣣नो꣢꣫ विश्वा꣣ द्वे꣡षा꣢ꣳसि तरति स꣣यु꣡ग्व꣢भिः꣣ सू꣢रो꣣ न꣢ स꣣यु꣡ग्व꣢भिः । धा꣡रा꣢ पृ꣣ष्ठ꣡स्य꣢ रोचते पुना꣣नो꣡ अ꣢रु꣣षो꣡ हरिः꣢꣯ । वि꣢श्वा꣣ य꣢द्रू꣣पा꣡ प꣢रि꣣या꣡स्यृक्व꣢꣯भिः स꣣प्ता꣡स्ये꣢भि꣣रृ꣡क्व꣢भिः ॥१५९०॥
पदार्थःयह सोम नामक परमेश्वर (अया) इस (हरिण्या) कष्टों को हरनेवाली (रुचा) कान्ति से (पुनानः) पवित्रता देता हुआ (सयुग्वभिः) सहयोगी मन, बुद्धि आदियों द्वारा उपासक के (विश्वा द्वेषांसि) सब दोषों को (तरति) दूर कर देता है। कैसे ? (सूरः न) सूर्य जैसे (सयुग्वभिः) सहयोगी किरणों द्वारा (विश्वा द्वेषांसि) सब अन्धकारों को (तरति) दूर करता है। (पृष्ठस्य) आनन्द सींचनेवाले परमेश्वर की (धारा) पवित्रता की रस-धार (रोचते) मन को भाती है। हे परमेश्वर ! (अरुषः) तेजस्वी, (हरिः) दुःखहर्ता आप, उस धारा से (पुनानः) पवित्र करते हो, (यत्) जब (ऋक्वभिः) वेदपाठियों से तथा (सप्तास्यैः ऋक्वभिः) गायत्र्यादि सात छन्दोंवाले वेदमन्त्रों से गाये जाते हुए आप (विश्वा रूपा) विभिन्न रूपों को (परि यासि) प्राप्त करते हो, अर्थात् विभिन्न रूपों में वर्णित किये जाते हो ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार और यमक है ॥१॥
भावार्थःजैसे सूर्य अन्धकारों को दूर करता है, वैसे ही जगदीश्वर पुरुषार्थी उपासकों के दुःख, दुर्व्यसन आदि को दूर करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प्रा꣢ची꣣म꣡नु꣢ प्र꣣दि꣡शं꣢ याति꣣ चे꣡कि꣢त꣣त्स꣢ꣳ र꣣श्मि꣡भि꣢र्यतते दर्श꣣तो꣢꣫ रथो꣣ दै꣡व्यो꣢ दर्श꣣तो꣡ रथः꣢꣯ । अ꣡ग्म꣢न्नु꣣क्था꣢नि꣣ पौ꣢꣫ꣳस्येन्द्रं꣣ जै꣡त्रा꣢य हर्षयन् । व꣡ज्र꣢श्च꣣ य꣡द्भव꣢꣯थो꣣ अ꣡न꣢पच्युता स꣣म꣡त्स्वन꣢꣯पच्युता ॥१५९१॥
पदार्थःपरमेश्वर की मित्रता प्राप्त करके जीव (चेकितत्) विज्ञानवान् होता हुआ (प्राचीं प्रदिशम्) प्रकृष्ट दिशा की ओर (अनुधावति) अग्रसर होने लगता है। (दर्शतः) द्रष्टा वह (रथः) रथ के समान वेगवान् होता हुआ (रश्मिभिः) तेज की किरणों से (संयतते) संयुक्त हो जाता है। इसका (रथः) देहरूप रथ (दैव्यः) सज्जनों का हित करनेवाला और (दर्शतः) दर्शनीय हो जाता है। शुभगुणप्रेरक, सोम परमात्मा की उपासना से (उक्थानि) प्रशंसनीय (पौंस्या) बल (इन्द्रम्) जीवात्मा को (अग्मन्) प्राप्त होते हैं और उसे (जैत्राय) विजय के लिए (हर्षयन्) उत्साहित करते हैं, (यत्) क्योंकि, हे सद्गुणों की प्रेरणा करनेवाले जगदीश्वर ! आप (वज्रः च) और आपका व्रजतुल्य दण्ड देने का सामर्थ्य दोनों (अनपच्युता) अडिग होते हुए (समत्सु) देवासुरसङ्ग्रामों में (अनपच्युता) अटूट बलवाले (भवथः) होते हो ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर का सखा शत्रुओं से अपराजित होता हुआ सदा ही उत्कर्ष प्राप्त करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
त्व꣢ꣳ ह꣣ त्य꣡त्प꣢णी꣣नां꣡ वि꣢दो꣣ व꣢सु꣣ सं꣢ मा꣣तृ꣡भि꣢र्मर्जयसि꣣ स्व꣡ आ दम꣢꣯ ऋ꣣त꣡स्य꣢ धी꣣ति꣢भि꣣र्द꣡मे꣢ । प꣣राव꣢तो꣣ न꣢꣫ साम꣣ त꣢꣫द्यत्रा꣣ र꣡ण꣢न्ति धी꣣त꣡यः꣢ । त्रि꣣धा꣡तु꣢भि꣣र꣡रु꣢षीभि꣣र्व꣡यो꣢ दधे꣣ रो꣡च꣢मानो꣣ व꣡यो꣢ दधे ॥१५९२॥
पदार्थःहे सोम अर्थात् शान्त उपासक ! (त्वं ह) तू (पणीनां त्यत् वसु) दुर्विचाररूप दस्युओं से चुरा लिये गए सद्विचाररूप धन को (विदः) फिर प्राप्त कर लेता है। (मातृभिः) मातारूप वेद-वाणियों से स्वयं को (संमर्जयसि) संशोधित वा अलङ्कृत कर लेता है। (स्वे) अपने (दमे) इन्द्रियों के दमनरूप कार्य में (आ) तत्पर रहता है। (ऋतस्य) सत्य की (धीतिभिः) धारणाओं के साथ (दमे) घर में (आ) आता है, (यत्र) जिस घर में (परावतः) दूर देश से (न) जैसे (साम) साम का संगीत सुनाई देता है, वैसे ही (धीतयः) स्तुति-वाणियाँ (रणन्ति) शब्दायमान होती हैं। वह उपासक (त्रिधातुभिः) पूर्व-पूर्व जिनमें बलवान् हैं, ऐसे सत्त्व, रजस् और तमस् गुणों से युक्त (अरुषीभिः) चमकीली दीप्तियों से (वयः) आनन्द-रस को (दधे) अपने अन्दर धारण करता है और (रोचमानः) तेजस्वी होता हुआ (वयः) जीवन को (दधे) धारण करता है ॥३॥ यहाँ यमक और उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर का उपासक अन्तःप्रकाश, जितेन्द्रियता और आनन्द-रस प्राप्त करके चिरकाल तक प्रसन्न रहता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, राजा, आचार्य, आत्म-प्रबोधन और उपासक की उपलब्धि का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सोलहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पूषा| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣡ नो꣢ गो꣣ष꣢णिं꣣ धि꣡य꣢मश्व꣣सां꣡ वा꣢ज꣣सा꣢मु꣣त꣢ । नृ꣣व꣡त्कृ꣢णुह्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१५९३॥
पदार्थःहे पूषन् ! हे पुष्टिप्रदाता जगदीश्वर ! आप (ऊतये) रक्षार्थ (नः) हमारे लिए (गोषणिम्) अन्तःप्रकाश को प्राप्त करनेवाली, (उत) और (अश्वसाम्) इन्द्रिय-बलों को प्राप्त करनेवाली, (उत) और (वाजसाम्) प्राण-बलों को प्राप्त करनेवाली, तथा (नृवत्) पुरुषार्थयुक्त (धियम्) प्रज्ञा को (कृणुहि) प्रदान करो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से मनुष्यों को आत्मबल, इन्द्रिय-बल, प्राण-बल, प्रज्ञा-बल और पुरुषार्थ-बल प्राप्त करना योग्य है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -मरुतः| स्वर - षड्जः
श꣣शमान꣡स्य꣢ वा नरः꣣ स्वे꣡द꣢स्य सत्यशवसः । वि꣣दा꣡ काम꣢꣯स्य꣣ वे꣡न꣢तः ॥१५९४॥
पदार्थःहे (नरः) नेता मरुतो ! विद्वान् लोगो ! तुम (शशमानस्य) शीघ्रता से प्रयत्न करते हुए, (स्वेदस्य) पसीने से तर-बतर शरीरवाले, (सत्यशवसः) सत्य बलवाले (वेनतः वा) और महत्वाकाङ्क्षा से युक्त मनुष्य के (कामस्य) मनोरथ को (विद) जानो और पूर्ण करो ॥१॥
भावार्थःपरिश्रम के पसीने से नहाये शरीरवाले, सत्य विज्ञानवाले, सत्य बलवाले और सत्य कर्मवाले मनुष्य की ही महत्वाकाङ्क्षाएँ सिद्ध होती हैं, आलसी की नहीं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ नः सू꣣न꣢वो꣣ गि꣡रः꣢ शृ꣣ण्व꣢न्त्व꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ ये꣢ । सु꣣मृडीका꣡ भ꣢वन्तु नः ॥१५९५॥
पदार्थः(यः) जो (नः) हमारे (सूनवः) सन्तान हों, वे (अमृतस्य) अविनाशी परमेश्वर वा नित्य वेद की (गिरः) वाणियों को (उप शृण्वन्तु) अर्थज्ञानपूर्वक गुरुमुख से सुनें। इस प्रकार विद्वान् होकर (नः) हमारे लिए (सुमृडीकाः) अति सुखकारी (भवन्तु) होवें ॥१॥
भावार्थःआचार्य के मुख से सब वेद आदि शास्त्रों को पढ़कर सब व्यावहारिक विद्याओं में जो पारंगत हो जाते हैं, वे ही स्वयं को और समाज को सुखी कर सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -द्यावापृथिव्यौ| स्वर - षड्जः
प्र꣢ वां꣣ म꣢हि꣣ द्य꣡वी꣢ अ꣣भ्यु꣡प꣢स्तुतिं भरामहे । शु꣢ची꣣ उ꣢प꣣ प्र꣡श꣢स्तये ॥१५९६॥
पदार्थःहे द्यावापृथिवी ! हे आत्मा और बुद्धि ! हम (प्रशस्तये) प्रशस्ति करने के लिए (द्यवी) तेजस्वी, (शुची) पवित्र (वाम् अभि) तुम दोनों के प्रति (महि) बहुत अधिक (उपस्तुतिम्) तुम्हारे गुण-कर्मों की प्रशंसा (प्र उप भरामहे) करते हैं ॥१॥
भावार्थःआत्मा और बुद्धि दोनों ही अपना-अपना महत्त्व रखते हैं। उनसे उपकार सबको लेना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -द्यावापृथिव्यौ| स्वर - षड्जः
पु꣣नाने꣢ त꣣꣬न्वा꣢꣯ मि꣣थः꣢꣫ स्वेन꣣ द꣡क्षे꣢ण राजथः । ऊ꣣ह्या꣡थे꣢ स꣣ना꣢दृ꣣त꣢म् ॥१५९७॥
पदार्थः(तन्वा) स्वरूप से (मिथः) एक-दूसरे को (पुनाने) पवित्र करते हुए तुम दोनों आत्मा और बुद्धि (स्वेन) अपने (दक्षेण) बल से (राजथः) शोभित होते हो, (सनात्) चिरकाल से (ऋतम्) सत्य को (ऊह्याथे) चरितार्थ करते हो ॥२॥
भावार्थःआत्मा और बुद्धि आकाश और भूमि के समान एक-दूसरे के उपकारक होते हुए मनुष्य को अभ्युदय और निःश्रेयस के मार्ग पर भली-भाँति चलाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -द्यावापृथिव्यौ| स्वर - षड्जः
म꣣ही꣢ मि꣣त्र꣡स्य꣢ साधथ꣣स्त꣡र꣢न्ती꣣ पि꣡प्र꣢ती ऋ꣣त꣢म् । प꣡रि꣢ य꣣ज्ञं꣡ नि षे꣢꣯दथुः ॥१५९८॥
पदार्थःहे आत्मा और बुद्धि ! (मही) महान् तुम दोनों (मित्रस्य) मित्र उपासक की (साधथः) योगसाधना को पूर्ण करते हो। (तरन्ती) योग के विघ्नों को पार करते हुए, (ऋतम्) सत्य को (पिप्रती) पूर्ण करते हुए तुम दोनों (यज्ञम्) योगी के योग-यज्ञ को (परि निषेदथुः) चारों ओर से व्याप्त करते हो ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा के बिना बुद्धि और बुद्धि के बिना जीवात्मा योग सिद्ध नहीं कर सकते। दोनों आपस में मिलकर ही योगयज्ञ की पूर्ति करते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣣य꣡मु꣢ ते꣣ स꣡म꣢तसि क꣣पो꣡त꣢ इव गर्भ꣣धि꣢म् । व꣢च꣣स्त꣡च्चि꣢न्न ओहसे ॥१५९९॥
पदार्थःहे उपासक ! (अयम् उ) यह इन्द्र नामक परमेश्वर (ते) तेरा ही है, जिसे तू (समतसि) भली-भाँति प्राप्त करता है। कैसे प्राप्त करता है ? (कपोतः इव) जैसे कबूतर (गर्भधिम्) नन्हे-नन्हे शिशुओं को धारण करनेवाले अपने घोंसले को प्राप्त करता है। (तत् चित्) इस (नः) हमारे (वचः) वचन पर, हे उपासक ! तू (ओहसे) विचार कर ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर के साथ अन्तरङ्ग सम्बन्ध स्थापित करके उपासक को परमेश्वर के गुण अपने में धारण करने का प्रयत्न करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स्तो꣣त्र꣡ꣳ रा꣢धानां पते꣣ गि꣡र्वा꣢हो वीर꣣ य꣡स्य꣢ ते । वि꣡भू꣢तिरस्तु सू꣣नृ꣡ता꣢ ॥१६००॥
पदार्थःहे (राधानां पते) ऐश्वर्यों के स्वामिन् ! (गिर्वाहः) वेदवाणियों से प्राप्त करने योग्य (वीर) शूरवीर परमात्मन् ! (यस्य ते) जिन आपका (स्तोत्रम्) स्तुतिकीर्तन सब जगह होता है, उन आपकी (सूनृता) सत्य, प्रिय और मधुर वेदवाणी, हमारे लिए (विभूतिः) वैभव देनेवाली (अस्तु) होवे ॥२॥
भावार्थःवेदों को पढ़कर, उनमें विद्यमान सब विद्याओं को जानकर सब मनुष्य वैभवशाली और ब्रह्म का साक्षात्कार करनेवाले होवें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ऊ꣣र्ध्व꣡स्ति꣢ष्ठा न ऊ꣣त꣢ये꣣ऽस्मि꣡न्वाजे꣢꣯ श꣢त꣣क्र꣡तो꣢ । स꣢म꣣न्ये꣡षु꣢ ब्रवावहै ॥१६०१॥
पदार्थःहे (शतक्रतो) अनन्त ज्ञानी और अनन्त कर्मों को करनेवाले इन्द्र परमात्मन् ! आप (अस्मिन् वाजे) इस देवासुरसङ्ग्राम में (नः ऊतये) हमारी रक्षा के लिए (ऊर्ध्वः) सजग (तिष्ठ) रहो।(अन्येषु) दूसरे अवसरों पर भी, आप और मैं (संब्रवावहै)आपस में अन्तरङ्ग संलाप किया करें ॥३॥
भावार्थःजब-जब बाहरी या आन्तरिक देवासुर सङ्ग्राम उपस्थित होते हैं, तब-तब परमेश्वर-विश्वास को अपने अन्दर बलवान् करके, आत्मोद्बोधन पाकर सब विघ्नों को विफल करके विजय पानी चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निर्हवींषि वा| स्वर - षड्जः
गा꣢व꣣ उ꣡प꣢ वदाव꣣टे꣢ म꣣ही꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ र꣣प्सु꣡दा꣢ । उ꣣भा꣡ कर्णा꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡या꣢ ॥१६०२॥
पदार्थःहे मानव ! उपासना-यज्ञ में तू (अवटे) आनन्द-रसों के कूप अग्नि परमेश्वर के विषय में (गावः) वेद-वाणियों को (उपवद) समीपता के साथ उच्चारण कर। (मही) महान् द्यावापृथिवी(यज्ञस्य) पूजनीय परमात्मा की (रप्सु-दा) कीर्ति गान करनेवाली हैं, (उभा) जो दोनों (कर्णा) विविध ऐश्वर्यों को बिखेरनेवाली तथा (हिरण्यया) ज्योतिर्मय हैं ॥१॥
भावार्थःऐश्वर्यों से परिपूर्ण देदीप्यमान द्यु-लोक और पृथिवी-लोक जगदीश्वर की ही महिमा का गान करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निर्हवींषि वा| स्वर - षड्जः
अ꣣भ्या꣢र꣣मि꣡दद्र꣢꣯यो꣣ नि꣡षि꣢क्तं꣣ पु꣡ष्क꣢रे꣣ म꣡धु꣢ । अ꣣व꣡ट꣢स्य वि꣣स꣡र्ज꣢ने ॥१६०३॥
पदार्थःअग्नि नामक परमात्मा की ही महिमा से (अद्रयः) बादल(अभ्यारम् इत्) आपस में टकराते हैं। तब (अवटस्य) मेघरूप जलभण्डार के (विसर्जने) बरसने पर (पुष्करे) भूमि के सरोवर में (मधु) मधुर वर्षा-जल (निषिक्तम्) सिंच जाता है ॥२॥
भावार्थःजो यह भूमि पर स्थित जल सूर्य के ताप से अन्तरिक्ष में जाकर मेघ बनता है और फिर भूमि पर बरस जाता है, वह सब जगदीश्वर का ही कर्तृत्व है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निर्हवींषि वा| स्वर - षड्जः
सि꣣ञ्च꣡न्ति꣢ न꣡म꣢साव꣣ट꣢मु꣣च्चा꣡च꣢क्रं꣣ प꣡रि꣢ज्मानम् । नी꣣ची꣡न꣢वार꣣म꣡क्षि꣢तम् ॥१६०४॥
पदार्थःपरमेश्वर की ही महिमा से सूर्य-किरणें (उच्चाचक्रम्) उच्च विद्युत्-रूप चक्रवाले, (नीचीनवारम्) नीचे की ओर द्वारवाले, (अक्षितम्) अक्षय (अवटम्) मेघ-रूप कुएँ को (परिज्मानम्) भूमि पर चारों ओर फैलाने के लिए (नमसा) बिजली-रूप वज्र से (सिञ्चन्ति) सींचती हैं ॥३॥
भावार्थःजिस परमेश्वर की व्यवस्था से मेघों का निर्माण होता है और उनसे वर्षा होती है, उसे हृदय में धारण करके योगी लोग धर्ममेघ समाधि को प्राप्त करें ॥३॥ इस खण्ड में परमेश्वर, विद्वान्, सन्तान, आत्मा-बुद्धि, उपासक तथा वृष्टि का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सोलहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
मा꣡ भे꣢म꣣ मा꣡ श्र꣢मिष्मो꣣ग्र꣡स्य꣢ स꣣ख्ये꣡ तव꣢꣯ । म꣣ह꣢त्ते꣣ वृ꣡ष्णो꣢ अभि꣣च꣡क्ष्यं꣢ कृ꣣तं꣡ पश्ये꣢꣯म तु꣣र्व꣢शं꣣ य꣡दु꣢म् ॥१६०५॥
पदार्थःहे इन्द्र परमात्मन् ! (उग्रस्य) अधार्मिकों के प्रति उग्रता दिखानेवाले (तव) आपकी (सख्ये) मित्रता में रहते हुए हम(मा भेम) किसी से भयभीत न हों, (मा श्रमिष्म) थकें नहीं।(वृष्णः ते) सुख आदि की वर्षा करनेवाले आपका (महत्) महान् (कृतम्) कर्म (अभिचक्ष्यम्) प्रशंसनीय है। आपकी कृपा से हम अपने राष्ट्र में (तुर्वशम्) हिंसकों को वश में करनेवाले तथा (यदुम्) संयमशील मनुष्य-समाज को(पश्येम) देखें ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर से मित्रता स्थापित करनेवाले लोग न कभी डरते हैं, न थकते हैं, प्रत्युत सत्कर्मों को करते हुए सदा ही उन्नति के मार्ग पर अग्रसर रहते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
स꣣व्या꣡मनु꣢꣯ स्फि꣣꣬ग्यं꣢꣯ वावसे꣣ वृ꣢षा꣣ न꣢ दा꣣नो꣡ अ꣢स्य रोषति । म꣢ध्वा꣣ सं꣡पृ꣢क्ताः सार꣣घे꣡ण꣢ धे꣣न꣢व꣣स्तू꣢य꣣मे꣢हि꣣ द्र꣢वा꣣ पि꣡ब꣢ ॥१६०६॥
पदार्थःहे परमात्मा के उपासक ! (वृषा) बलवान् तू (सव्याम्) बायीं (स्फिग्यम्) टाँग को आगे करके और दाहिनी टाँग को पीछे करके (वावसे) दौड़ लगाने के लिए खड़ा रह, अर्थात् सदा विक्रमशील रह। (अस्य) ऐसे विक्रमशील तेरी(दानः) कोई भी हिंसक (न रोषति) हिंसा नहीं कर सकेगा। हे उपासक ! (सारघेण मध्वा) मधुमक्खियों से प्राप्त मधु से (संपृक्ताः) संयुक्त (धेनवः) गोदुग्ध आदि तैयार हैं। तू (तूयम्) शीघ्र (एहि) आ, (द्रव) क्रियाशील हो, (पिब) पान कर ॥२॥
भावार्थःजैसे दोड़ की प्रतिस्पर्धा में प्रतिस्पर्धी लोग घुटने पर मुड़ी हुई बायीं टाँग को आगे करके और दाहिनी को पीछे करके आकृति-विशेष में दौड़ने के लिए तैयार खड़े रहते हैं, वैसे ही परमेश्वर का उपासक सदा ही पुरुषार्थ के लिए तैयार रहता है। इसलिए उसके रास्ते में कोई बाधा नहीं डाल सकता, प्रत्युत उसका सभी अभिनन्दन करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
इ꣣मा꣡ उ꣢ त्वा पुरूवसो꣣ गि꣡रो꣢ वर्धन्तु꣣ या꣡ मम꣢꣯ । पा꣣वक꣡व꣢र्णाः꣣ शु꣡च꣢यो विप꣣श्चि꣢तो꣣ऽभि꣡ स्तोमै꣢꣯रनूषत ॥१६०७॥
पदार्थःहे (पुरूवसो) बहुत ऐश्वर्य से युक्त परमात्मन् वा बहुत विद्याधन से सम्पन्न आचार्य ! (इमाः उ) ये (याः मम गिरः) जो मेरी वाणियाँ हैं, वे (त्वा) आपको (वर्धन्तु) बढ़ायें अर्थात् आपकी महिमा को प्रकाशित करें। (पावकवर्णाः) अग्नि के समान उज्ज्वल वर्णवाले, तेजस्वी, (शुचयः) पवित्र (विपश्चितः) विद्वान् लोग (स्तोमैः) स्तोत्रों से, आपकी (अभ्यनूषत) स्तुति कर रहे हैं ॥१॥ यहाँ ‘पावकवर्णाः’ में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर वेदज्ञान के प्रदान द्वारा वैसे ही आचार्य वेदादि शास्त्रों के शिक्षण द्वारा सबका उपकार करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣣य꣢ꣳ स꣣ह꣢स्र꣣मृ꣡षि꣢भिः꣣ स꣡ह꣢स्कृतः समु꣣द्र꣡ इ꣢व पप्रथे । स꣣त्यः꣡ सो अ꣢꣯स्य महि꣣मा꣡ गृ꣢णे꣣ श꣡वो꣢ य꣣ज्ञे꣡षु꣢ विप्र꣣रा꣡ज्ये꣢ ॥१६०८॥
पदार्थः(अयम्) यह परमेश्वर वा आचार्य (सहस्रम्) सहस्र बार (ऋषिभिः) तत्वदर्शी जनों द्वारा (सहस्कृतः) बल के साथ स्तुति किया गया (समुद्रः इव) समुद्र के समान (पप्रथे) यश से प्रख्यात होता है। (सः) वह (अस्य) इस परमेश्वर वा आचार्य की (महिमा) महिमा (सत्यः) सत्य है। मैं (विप्रराज्ये) विद्वानों के राज्य में (यज्ञेषु) उपासना-यज्ञों वा शिक्षा-यज्ञों में (शवः) इसके बल की (गृणे) स्तुति करता हूँ ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे समुद्र जल से विस्तीर्ण होता है, वैसे ही जगदीश्वर और आचार्य यश से प्रख्यात होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣢स्या꣣यं꣢꣫ विश्व꣣ आ꣢र्यो꣣ दा꣡सः꣢ शेवधि꣣पा꣢ अ꣣रिः꣢ । ति꣣र꣡श्चि꣢द꣣र्ये꣢ रु꣣श꣢मे꣣ प꣡वी꣢रवि꣣ तु꣡भ्येत्सो अ꣢꣯ज्यते र꣣यिः꣢ ॥१६०९॥
पदार्थः(यस्य) जिस तुझ इन्द्र परमात्मा का (अयम्) यह प्रत्यक्ष दिखाई देता हुआ (विश्वः) सम्पूर्ण संसार है, जो तू (आर्यः)श्रेष्ठ, (दासः) दुष्टों का क्षय करनेवाला, (शेवधिपाः) निधियों का रक्षक और (अरिः) समर्थ है और जो तू (अर्ये) जीवनाधार पवन में, (रुशमे) चमकीले सूर्य में तथा(पवीरवि) बिजली-युक्त बादल में (तिरः चित्) विद्यमान है, ऐसे (तुभ्य इत्) तेरे लिए ही (सः) वह जगत् में सर्वत्र बिखरा हुआ (रयिः) धन (अज्यते) समर्पित है ॥१॥
भावार्थःविश्व का सम्राट्, श्रेष्ठ, सज्जनों का रक्षक, दुष्टों का दलन करनेवाला, भूगर्भ में निहित निधियों का रक्षक, सब कुछ करने में समर्थ, सर्वान्तर्यामी जो परमेश्वर है, उसी का सब धन है, इस हेतु से ईश्वरापर्ण-बुद्धि से उसका सेवन करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
तु꣣रण्य꣢वो꣣ म꣡धु꣢मन्तं घृत꣣श्चु꣢तं꣣ वि꣡प्रा꣢सो अ꣣र्क꣡मा꣢नृचुः । अ꣣स्मे꣢ र꣣यिः꣡ प꣢प्रथे꣣ वृ꣢ष्ण्य꣣ꣳ श꣢वो꣣ऽस्मे꣢ स्वा꣣ना꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥१६१०॥
पदार्थः(तुरण्यवः) सत्कर्मों में शीघ्रता करनेवाले, (विप्रासः) विद्वान् लोग (मधुमन्तम्) मधुर आनन्द से युक्त, (घृतश्चुतम्) तेज वा स्नेह को प्रवाहित करनेवाले (अर्कम्) अर्चनीय इन्द्र परमेश्वर को (आनृचुः) पूजते हैं। उस की कृपा से (अस्मे) हमारे लिए(रयिः) ऐश्वर्य (पप्रथे) सर्वत्र फैला हुआ है, (वृष्ण्यम्) सुखों की वर्षा करनेवाला (शवः) बल भी फैला हुआ है, उसी से (अस्मे) हमारे लिए (स्वानासः) अभिषुत किये जाते हुए (इन्दवः) आनन्द-रस हमें प्राप्त होते हैं ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर ही हमें तेज, धन, बल, आनन्द आदि प्रदान करता है, इस कारण सबको श्रद्धापूर्वक उसकी वन्दना करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
गो꣡म꣢न्न इन्दो꣣ अ꣡श्व꣢वत्सु꣣तः꣡ सु꣢दक्ष धनिव । शु꣡चिं꣢ च꣣ व꣢र्ण꣣म꣢धि꣣ गो꣡षु꣢ धारय ॥१६११॥
पदार्थःहे (सुदक्ष) श्रेष्ठ बल से युक्त (इन्दो) तेजस्वी जीवात्मन् वा परमात्मन् ! (सुतः) शरीर में जन्मा वा अन्तरात्मा में प्रेरित तू(नः) हमारे लिए (गोमत्) गाय, पृथिवी आदि से युक्त तथा(अश्ववत्) घोड़े, आग, बिजली आदि से युक्त धन को(धनिव) प्राप्त करा। (गोषु च) और इन्द्रियों में (शुचिं वर्णम्) पवित्र सात्त्विक रूप को (अधिधारय) धारण करा ॥१॥
भावार्थःभली-भाँति उद्बोधन दिया हुआ मनुष्य का आत्मा और भली-भाँति आराधना किया हुआ परमात्मा समस्त ऐश्वर्य प्राप्त कराने और मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदियों में पवित्रता का सञ्चार करने के लिए समर्थ होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
स꣡ नो꣢ हरीणां पत꣣ इ꣡न्दो꣢ दे꣣व꣡प्स꣢रस्तमः । स꣡खे꣢व꣣ स꣢ख्ये꣣ न꣡र्यो꣢ रु꣣चे꣡ भ꣢व ॥१६१२॥
पदार्थःहे (हरीणां पते) इन्द्रियों के अथवा आकर्षणगुणयुक्त सूर्य, चन्द्र, भूममण्डल आदियों के स्वामिन्, (इन्दो) तेजस्वी जीवात्मन् वा परमात्मन् ! (देवप्सरस्तमः) देहस्थ, मन, बुद्धि आदि देवों को वा ब्रह्माण्डस्थ सूर्य, चन्द्र आदि देवों को अतिशय रूप देनेवाला, (नर्यः) मनुष्यों का हितकर्ता (सः) वह तू (नः) हमें (रुचे) तेज देने के लिए (भव) हो, (सख्ये) मित्र को (सखा इव) मित्र जैसे तेज देता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा जैसे शरीर में स्थित सब मन, बुद्धि, प्राण आदियों को अपने-अपने कर्म में सञ्चालित करता हुआ और उन्हें शक्ति देता हुआ शरीर का सम्राट् होता है, वैसे ही परमेश्वर ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, चाँद, नक्षत्र आदियों को सञ्चालित करता हुआ और उन्हें शक्ति देता हुआ ब्रह्माण्ड का सम्राट् होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - ऋषभः
स꣡ने꣢मि꣣ त्व꣢म꣣स्म꣡दा अदे꣢꣯वं꣣ कं꣡ चि꣢द꣣त्रि꣡ण꣢म् । सा꣣ह्वा꣡ꣳ इ꣢न्दो꣣ प꣢रि꣣ बा꣢धो꣣ अ꣡प꣢ द्व꣣यु꣢म् ॥१६१३॥
पदार्थःहे (इन्दो) तेजस्वी जीवात्मन् वा परमात्मन् ! (त्वम्) शक्तिशाली तू (सनेमि) पुरानी मित्रता को (अस्मत्) हमारे प्रति (आ) ला।(अदेवम्) न देनेवाले, सहायता न करनेवाले (कंचित्) किसी भी(अत्रिणम्) भक्षक पाप, दुर्व्यसन आदि को वा दुर्जन को (अप) दूर कर दे। (साह्वान्) शत्रुओं को पराजित करनेवाला तू (बाधः) बाधकों को (परि) चारों ओर विनष्ट कर, (द्वयुम्) सत्य-असत्य दोनों से युक्त अथवा पीछे कुछ और सामने कुछ या मन में कुछ और वचन में कुछ इस द्विविध आचरणवाले, छल-छद्म का व्यवहार करनेवाले मनुष्य को (अप) दूर कर दे ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा को प्रोत्साहन देकर और परमात्मा की उपासना करके सब लोग दुष्टों तथा छद्म का आचरण करनेवालों को दूर हटाकर, सज्जनों की सङ्गति करके स्वयं को और समाज को उन्नत करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣣ञ्ज꣢ते꣣꣬ व्य꣢꣯ञ्जते꣣ स꣡म꣢ञ्जते꣣ क्र꣡तु꣢ꣳ रिहन्ति꣣ म꣢ध्वा꣣꣬भ्य꣢꣯ञ्जते । सि꣡न्धो꣢रुऽच्छ्वा꣣से꣢ प꣣त꣡य꣢न्तमु꣣क्ष꣡ण꣢ꣳ हिरण्यपा꣣वाः꣢ प꣣शु꣢म꣣प्सु꣡ गृ꣢भ्णते ॥१६१४॥
पदार्थःपरमेश्वर के उपासक विद्वान् लोग (अञ्जते) स्वयं का मार्जन करते हैं, (व्यञ्जते) स्तुति-वाणियों को व्यक्त करते हैं, (समञ्जते) परमात्मा के साथ सङ्गम करते हैं, (क्रतुम्) श्रेष्ठ ज्ञान और श्रेष्ठ कर्म का (रिहन्ति) आस्वादन करते हैं, (मध्वा) मधुर ब्रह्मानन्द से (अभ्यञ्जते) अपने आत्मा में सद्गुणों का उबटन लगाते हैं, अर्थात् अपने आत्मा को संस्कृत करते हैं (सिन्धोः) रक्त के सिन्धु हृदय के (उच्छ्वासे) स्पन्दन में (पतयन्तम्) गति देते हुए, (उक्षणम्) बल को सींचनेवाले, (पशुम्) द्रष्टा जीवात्मा को (हिरण्यपावाः) ज्योति के रक्षक उपासक लोग (अप्सु) अपने कर्मों में (गृभ्णते) ग्रहण कर लेते हैं अर्थात् उसकी प्रेरणा के अनुसार कर्म करते हैं ॥१॥ यहाँ एक कर्ता कारक के अनेक क्रियाओं से सम्बन्ध होने के कारण दीपक अलङ्कार है, जैसा कि साहित्यदर्पण में इसका लक्षण किया गया है— ‘अनेक क्रियाओं में एक कारक हो तो दीपक होता है। (सा० द० १०।४९)’ ‘ञ्जते’ के चार बाद पठित होने से वृत्त्यनुप्रास है ॥१॥
भावार्थःशरीर में हृदय का स्पन्दन, धमनियों और शिराओं में रक्त का सञ्चार, फेफड़ों में रक्त का शोधन इत्यादि जो कुछ भी कार्य है, वह सब जीवात्मा के अधीन है और जीवात्मा भी परमात्मा के अधीन है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
वि꣣पश्चि꣢ते꣣ प꣡व꣢मानाय गायत म꣣ही꣡ न धारात्यन्धो꣢꣯ अर्षति । अ꣢हि꣣र्न꣢ जू꣣र्णा꣡मति꣢꣯ सर्पति꣣ त्व꣢च꣣म꣢त्यो꣣ न꣡ क्रीड꣢꣯न्नसर꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रिः꣢ ॥१६१५॥
पदार्थःहे मनुष्यो ! तुम (विपश्चिते) मेधावान्, (पवमानाय) मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदि को पवित्र करनेवाले जीवात्मा के लिए (गायत) गाओ, उसके महत्त्व को वर्णित करो। वह (अन्धः) अन्धेरे को, तमोगुण को (अत्यर्षति) लाँघ जाता है, (मही न धारा) जैसे बड़ी जलधारा मार्ग में आयी हुई शिला आदि की बाधा को लाँघ जाती है। वह जीवात्मा (जूर्णाम्) पुरानी, बूढ़ी (त्वचम्) त्वचा को, त्वचा-युक्त शरीर को (अतिसर्पति) छोड़कर चला जाता है, (अहिः न) जैसे साँप (जूर्णाम्) पुरानी (त्वचम्) केंचुली को (अति सर्पति) छोड़कर चला जाता है। साथ ही (वृषा) बलवान्, (हरिः) शरीर-रथ का वाहक वह जीवात्मा (अत्यः न) रथ में जुड़े घोड़े के समान (क्रीडन्) क्रीड़ा करता हुआ (असरत्) शरीर-रथ को धारण किये हुए चलता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःन जाने कब जीव शरीर को छोड़कर चला जाए। इसलिए शीघ्र ही धर्म- कर्मों में मन लगाना चाहिए, नहीं तो पीछे पछतावा होगा ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -जगती| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - निषादः
अ꣣ग्रेगो꣡ राजाप्य꣢꣯स्तविष्यते वि꣣मा꣢नो꣣ अ꣢ह्नां꣣ भु꣡व꣢ने꣣ष्व꣡र्पि꣢तः । ह꣡रि꣢र्घृ꣣त꣡स्नुः꣢ सु꣣दृ꣡शी꣢को अर्ण꣣वो꣢ ज्यो꣣ती꣡र꣢थः पवते रा꣣य꣢ ओ꣣꣬क्यः꣢꣯ ॥१६१६॥
पदार्थः(अग्रेगः) आगे-आगे चलनेवाला, (राजा) विश्व का राजा, (अप्यः) प्राणों के लिए हितकर, (अह्नां विमानः) दिनों का निर्माण करनेवाला, (भुवनेषु अर्पितः) लोक-लोकान्तरों में व्यापक सोम परमेश्वर (तविष्यते) महिमा-गान द्वारा बढ़ेगा।(घृतस्नुः) वृष्टि-जल को बरसानेवाला, (सुदृशीकः) भली-भाँति दर्शन करने योग्य, (अर्णवः) सद्गुणों का समुद्र, (ज्योतीरथः) सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि ज्योतिष्मान् पदार्थों को वेग से चलानेवाला, (ओक्यः) गृहरूप देह के लिए हितकर (हरिः) वह हृदयकारी जगदीश्वर (राये) ऐश्वर्य देने के लिए (पवते)प्राप्त होता है ॥३॥
भावार्थःदिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, दक्षिणायन, उत्तरायण, वर्ष आदि का और सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि का बनानेवाला सबका हितकर्ता परमेश्वर सबके द्वारा वन्दनीय है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा, राजा और आचार्य का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ सोलहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ सोलहवाँ अध्याय समाप्त ॥ सप्तम प्रपाठक में तृतीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
वि꣡श्वे꣢भिरग्ने अ꣣ग्नि꣡भि꣢रि꣣मं꣢ य꣣ज्ञ꣢मि꣣दं꣡ वचः꣢꣯ । च꣡नो꣢ धाः सहसो यहो ॥१६१७॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगन्नायक परमात्मन् ! आप (विश्वेभिः) सब (अग्निभिः) संकल्प, उत्साह, महत्वाकाञ्क्षा, वीरता आदि की अग्नियों के साथ (इमम्) इस (यज्ञम्) हमारे जीवन यज्ञ में आओ। (इदम्) इस (वचः) वचन को सुनो। हे (सहसः यहो) बल के पुत्र अर्थात् अतिबली परमात्मन् ! आप हमें (चनः) आनन्द का अमृत (धाः) प्रदान करो ॥१॥
भावार्थःअग्निहीन मनुष्य मृत के तुल्य होता है। इसलिए हृदय में अग्नियों को प्रज्वलित कर आशावाद के साथ कर्मयोग का सहारा लेकर विजयश्री सबको प्राप्त करनी चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣢च्चि꣣द्धि꣡ शश्व꣢꣯ता꣣ त꣡ना꣢ दे꣣वं꣡दे꣢वं꣣ य꣡जा꣢महे । त्वे꣡ इद्धू꣢꣯यते ह꣣विः꣢ ॥१६१८॥
पदार्थः(यत् चित् हि) यद्यपि (शश्वता) प्रचुर (तना) धन से, हम (देवं देवम्) प्रत्येक विद्वान् का (यजामहे) सत्कार करते हैं, तो भी हे अग्ने ! हे जगन्नायक परमात्मन् ! वस्तुतः (हविः) समर्पणीय आत्मा, मन, बुद्धि आदि तथा सब कर्म (त्वे इत्) आपमें ही (हूयते) हमारे द्वारा समर्पित हैं ॥२॥
भावार्थःयथोचित सत्कार माता, पिता, अतिथि, राजा, आचार्य,उपदेशक, वानप्रस्थी, संन्यासी आदि सभी का करना चाहिए, किन्तु जगत् के उत्पत्तिकर्ता, धारणकर्ता, संहारकर्ता आदि रूप में एक परमेश्वर की ही पूजा करनी योग्य है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
प्रि꣣यो꣡ नो꣢ अस्तु वि꣣श्प꣢ति꣣र्हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ वरे꣢꣯ण्यः । प्रि꣣याः꣢ स्व꣣ग्न꣡यो꣢ व꣣य꣢म् ॥१६१९॥
पदार्थः(विश्वपतिः) प्रजापालक राजा के समान सब मनुष्यों का पालनकर्ता, (होता) देने योग्य वस्तुओं को देनेवाला, (मन्द्रः) आनन्द-प्रदाता, (वरेण्यः) वरणीय जगदीश्वर (नः) हमारा (प्रियः) प्यारा (अस्तु) होवे। (स्वग्नयः) शुभ संकल्प, उत्साह, राष्ट्रियता, वीरता आदि अथवा आहवनीय आदि अग्नियोंवाले (वयम्) हम उपासक जन भी उस जगदीश्वर के (प्रियाः) प्यारे होवें ॥३॥ यहाँ अन्योन्यालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजब मनुष्य परमात्मा से प्रीति करते हैं तब वह भी उनसे प्रीति करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रं꣢ वो वि꣣श्व꣢त꣣स्प꣢रि꣣ ह꣡वा꣢महे꣣ ज꣡ने꣢भ्यः । अ꣣स्मा꣡क꣢मस्तु꣣ के꣡व꣢लः ॥१६२०॥
पदार्थःहे साथियो ! (विश्वतः परि) सबसे ऊपर, हम (इन्द्रम्) विघ्ननाशक, परमैश्वर्यवान् परमात्मा को (जनेभ्यः वः) आप प्रजाजनों के लिए (हवामहे) पुकारते हैं। वह (अस्माकम्)हम श्रोताओं का (केवलः) अद्वितीय सखा (अस्तु) होवे ॥१॥
भावार्थःभले ही माता, पिता, राजा आदि हमें सुख देनेवाले होते हैं, परन्तु सदा सहायक, सदा अशरण-शरण, सदा धैर्यप्रदाता सखा तो जगदीश्वर ही है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स꣡ नो꣢ वृषन्न꣣मुं꣢ च꣣रु꣡ꣳ सत्रा꣢꣯दाव꣣न्न꣡पा꣢ वृधि । अ꣣स्म꣢भ्य꣣म꣡प्र꣢तिष्कुतः ॥१६२१॥
पदार्थःहे (वृषन्) सुखों की वर्षा करनेवाले, (सत्रादावन्) एक साथ दान देनेवाले, सत्य के प्रेरक वा सृष्टियज्ञ के सम्पादक जगदीश्वर ! (अप्रतिष्कुतः) अविचल (सः) वह आप(अस्मभ्यम्) आपकी आज्ञा में और पुरुषार्थ में वर्तमान हम उपासकों के लिए (अमुं चरुम्) सूर्य के प्रतिबन्धक मेघ के समान इस मोक्षमार्ग में रुकावट डालनेवाले अविद्या, दुराचार आदि को (अपावृधि) दूर कर दो ॥२॥
भावार्थःजैसे सूर्य अपने प्रकाश के सञ्चार में बाधा डालनेवाले मेघ रूप कपाट को खोलकर भूमण्डल को प्रकाशित करता है, वैसे ही जगदीश्वर हमारे मोक्ष में बाधक अविद्या, दुष्कर्म आदि को हटाकर हमें मोक्ष प्राप्त कराते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
वृ꣡षा꣢ यू꣣थे꣢व꣣ व꣡ꣳस꣢गः कृ꣣ष्टी꣡रि꣢य꣣र्त्यो꣡ज꣢सा । ई꣡शा꣢नो꣣ अ꣡प्र꣢तिष्कुतः ॥१६२२॥
पदार्थः(वंसगः) शान से चलनेवाला (वृषा) साँड (यूथा इव) जैसे गौओं के झुण्ड में जाता है, वैसे ही (वृषा) शुभगुणों की वर्षा करनेवाला, (वंसगः) धर्मसेवी के पास जानेवाला (ईशानः) जगदीश्वर (अप्रतिष्कुतः) किसी से न रोका जाता हुआ (ओजसा) बल के साथ (कृष्टीः) उपासक मनुष्यों के पास (इयर्ति) पहुँच जाता है ॥३॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजो श्रद्धा से परमेश्वर की उपासना करते हैं, परमेश्वर भी उन धर्मात्मा लोगों की अवश्य सहायता करता है और उन्हें बल देता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
त्वं꣡ न꣢श्चि꣣त्र꣢ ऊ꣣त्या꣢꣫ वसो꣣ रा꣡धा꣢ꣳसि चोदय । अ꣣स्य꣢ रा꣣य꣡स्त्वम꣢꣯ग्ने र꣣थी꣡र꣢सि वि꣣दा꣢ गा꣣धं꣢ तु꣣चे꣡ तु नः꣢꣯ ॥१६२३॥
पदार्थःहे (वसो) निवासक परमेश्वर वा आचार्य ! (चित्रः) अद्भुत गुणोंवाले (त्वम्) आप (ऊत्या) रक्षा के साथ (नः) हमारे लिए(राधांसि) विद्या-धन, सच्चरित्रता आदि के धन और आध्यात्मिक ऐश्वर्य (चोदय) प्रेरित करो। हे (अग्ने) विद्वान्, अग्रनायक, तेजस्वी परमेश्वर वा आचार्य ! (त्वम्) आप (अस्य) इस (रायः) विद्या, सदाचार आदि धन के (रथीः) स्वामी (असि) हो। इसलिए (नः) हमारी (तुचे) सन्तान के लिए (तु) शीघ्र ही(गाधम्) तलस्पर्शी पाण्डित्य (विदाः) प्राप्त कराओ ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर सबके आत्मा में ज्ञान, सद्गुण आदि प्रेरित करता है, वैसे ही विद्वान् गुरुजन गृहस्थों को भली-भाँति उपदेश करें और उनके पुत्र, पौत्र आदियों को गुरुकुल में सब विद्याएँ पढ़ाकर विद्वान् तथा चरित्रवान् बनायें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
प꣡र्षि꣢ तो꣣कं꣡ तन꣢꣯यं प꣣र्तृ꣢भि꣢ष्ट्व꣡मद꣢꣯ब्धै꣣र꣡प्र꣢युत्वभिः । अ꣢ग्ने꣣ हे꣡डा꣢ꣳसि꣣ दै꣡व्या꣢ युयोधि꣣ नो꣡ऽदे꣢वानि꣣ ह्व꣡रा꣢ꣳसि च ॥१६२४॥
पदार्थःहे (अग्ने) परमात्मन् वा आचार्य ! (त्वम्) आप (अदब्धैः) अबाध, (अप्रयुत्वभिः) अलग न होनेवाले (पर्तृभिः) पालन-पूरण के प्रकारों से (तोकं तनयम्) पुत्र-पौत्र की (पर्षि) पालना करो और उन्हें विद्या आदि से भरपूर करो। (नः) हमारे (दैव्या) धार्मिक विद्वानों के प्रति किये जानेवाले(हेडांसि) अनादररूप अपराधों को, (अदेवानि च) और अवाञ्छनीय (ह्वरांसि) कुटिल कर्मों को (युयोधि) हमसे अलग करो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की प्रेरणा से और गुरुओं की शिक्षा से सब मनुष्यों को दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि छोड़ने चाहिएँ और सद्गुणों तथा सत्कर्मों को प्राप्त करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -विष्णुः| स्वर - धैवतः
कि꣡मित्ते꣢꣯ विष्णो परि꣣च꣢क्षि꣣ ना꣢म꣣ प्र꣡ यद्व꣢꣯व꣣क्षे꣡ शि꣢पिवि꣣ष्टो꣡ अ꣢स्मि । मा꣡ वर्पो꣢꣯ अ꣣स्म꣡दप꣢꣯ गूह ए꣣त꣢꣫द्यद꣣न्य꣡रू꣢पः समि꣣थे꣢ ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥
पदार्थःहे (विष्णो) सर्वव्यापक जगदीश्वर ! (किम् इत् ते) क्या यही आपका (परिचक्षि) चारों ओर प्रकाशनीय स्वरूप है (यत्) जो आप (प्र ववक्षे) कहते हो कि मैं (शिपिविष्टः) किरणों से घिरा हुआ अर्थात् तेजस्वी (अस्मि) हूँ ? उससे अतिरिक्त भी आपका स्वरूप है, यह कहते हैं— (एतत् वर्पः) इस रूप को (अस्मत्) हमसे (मा अप गूहः) मत छिपाओ (यत्) कि आप (समिथे) उपासना-यज्ञ में (अन्यरूपः) जगत्प्रपञ्च में अधिष्ठितरूप से भिन्न (बभूथ) होते हो ॥१॥
भावार्थःसूर्य आदि जगत्प्रञ्च में परमात्मा का जो तेजोमय रूप है, वह सबको दृष्टिगोचर होता है, परन्तु उसका जगत्प्रपञ्चातीत जो वास्तविक रूप है, उसका योगी लोग ही साक्षात्कार करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -विष्णुः| स्वर - धैवतः
प्र꣡ तत्ते꣢꣯ अ꣣द्य꣡ शि꣢पिविष्ट ह꣣व्य꣢म꣣र्यः꣡ श꣢ꣳसामि व꣣यु꣡ना꣢नि वि꣣द्वा꣢न् । तं꣡ त्वा꣢ गृणामि त꣣व꣢स꣣म꣡त꣢व्या꣣न्क्ष꣡य꣢न्तम꣣स्य꣡ रज꣢꣯सः परा꣣के꣢ ॥१६२६॥
पदार्थःहे (शिपिविष्ट) तेज की किरणों से घिरे हुए अर्थात् तेजस्वी सर्वव्यापक विष्णु जगदीश्वर ! (अर्यः) स्तुतियों का ईश्वर और(वयुनानि विद्वान्) कर्तव्य कर्मों को जाननेवाला मैं (अद्य) आज(ते) आपके (तत्) उस प्रसिद्ध (हव्यम्) दान की (प्र शंसामि)प्रशंसा करता हूँ। (अतव्यान्) अमहान् मैं (तवसम्) महान् और(अस्य रजसः) इस रजोगुण के (पराके) परे (क्षयन्तम्) निवास करनेवाले (तम्) उस प्रसिद्ध (त्वा) आपकी (गृणामि) स्तुति करता हूँ ॥२॥
भावार्थःअल्पशक्तिवाला मनुष्य महाशक्तिवाले परमात्मा के गुणों के स्मरण से निरभिमान होकर महान् कार्यों को करने के लिए अपने आत्मा में बल सञ्चित करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -विष्णुः| स्वर - धैवतः
व꣡ष꣢ट् ते विष्णवा꣣स꣡ आ कृ꣢꣯णोमि꣣ त꣡न्मे꣢ जुषस्व शिपिविष्ट ह꣣व्य꣢म् । व꣡र्ध꣢न्तु त्वा सु꣣ष्टु꣢त꣣यो गि꣡रो꣢ मे यू꣣यं꣡ पा꣢त स्व꣣स्ति꣢भिः꣣ स꣡दा꣢ नः ॥१६२७॥
पदार्थःहे (विष्णो) सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! मैं (आसः) मुख से (ते) आपके लिए (वषट्) स्तुति को (आकृणोमि) करता हूँ। (तत् मे हव्यम्) उस मेरे समर्पण को, आप (जुषस्व) प्रेमपूर्वक स्वीकार करो। (मे) मेरी (सुष्टुतयः) उत्कृष्ट स्तुतिवाली (गिरः) वाणियाँ (त्वा वर्धन्तु) आपकी महिमा को बढ़ायें, प्रचारित करें। हे विष्णु जगदीश्वर। (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) कल्याणों द्वारा (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करते रहो ॥३॥
भावार्थःजन-जन में जगदीश्वर की महिमा के प्रचार से सब धार्मिक होकर अपने और समाज के जीवन को उन्नत करें ॥३॥ इस खण्ड में जगदीश्वर, आचार्य और उपास्य-उपासक के सम्बन्ध का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सत्रहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -वायुः| स्वर - गान्धारः
वा꣡यो꣢ शु꣣क्रो꣡ अ꣢यामि ते꣣ म꣢ध्वो꣣ अ꣢ग्रं꣣ दि꣡वि꣢ष्टिषु । आ꣡ या꣢हि꣣ सो꣡म꣢पीतये स्पा꣣र्हो꣡ दे꣢व नि꣣यु꣡त्व꣢ता ॥१६२८॥
पदार्थःहे (वायो) सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! (दिविष्टिषु) विवेक-प्रकाश की प्राप्तियों के हो जाने पर (शुक्रः) पवित्र मैं (ते) आपके (मध्वः) आनन्द-रस के (अग्रम्) श्रेष्ठ भाग को (अयामि) पा रहा हूँ। हे (देवः) मोदमय ! (स्पार्हः) स्पृहणीय आप (सोमपीतये) मेरे श्रद्धा-रस के पानार्थ (नियुत्वता) नियुक्त रथ से जैसे कोई आता है, वैसे (आयाहि) आओ ॥१॥ यहाँ ‘नियुत्वता’ में लुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे उपासक परमेश्वर के आनन्द-रसों का प्यासा होता है, वैसे ही परमेश्वर भी उपासक के भक्ति-रसों का प्यासा होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रवायू| स्वर - गान्धारः
इ꣡न्द्र꣢श्च वायवेषा꣣ꣳ सो꣡मा꣢नां पी꣣ति꣡म꣢र्हथः । यु꣣वा꣡ꣳ हि यन्तीन्द꣢꣯वो नि꣣म्न꣢꣫मापो꣣ न꣢ स꣣꣬ध्र्य꣢꣯क् ॥१६२९॥
पदार्थःहे (वायो) प्राण ! तू (इन्द्रः च) और जीवात्मा, तुम दोनों (एषां सोमानाम्) इन शान्त-रसों के (पीतिम् अर्हथः) पान के योग्य हो। (युवाम् हि) तुम दोनों की ओर (इन्दवः) प्रकाशपूर्ण शान्त-रस (सध्र्यक्) एक साथ (यन्ति) आते हैं, (आपः न) जैसे जल (निम्नम्) निचले भूभाग की ओर आते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा प्राणायाम से और योगसाधना से परमेश्वर के साथ मित्रता संस्थापित करके उससे मधुर शान्त-रस प्राप्त कर सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रवायू| स्वर - गान्धारः
वा꣢य꣣वि꣡न्द्र꣢श्च शु꣣ष्मि꣡णा꣢ स꣣र꣡थ꣢ꣳ शवसस्पती । नि꣣यु꣡त्व꣢न्ता न ऊ꣣त꣢य꣣ आ꣡ या꣢तं꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥१६३०॥
पदार्थःहे (वायो) प्राण ! तू (इन्द्रः च) और जीवात्मा (शुष्मिणा) बलवान् (शवसः पती) बल के रक्षक और (नियुत्वन्ता) सदा कार्य-तत्पर रहते हुए (नः ऊतये) हमारी रक्षा के लिए(सरथम्) एक ही देह-रथ पर चढ़कर (सोमपीतये) शान्त रस के पानार्थ (आयातम्) आओ ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा प्राण के ही साथ देह में आता है और उसी के साथ जीवन में सब कार्य सिद्ध करता हुआ योगाभ्यास द्वारा शान्ति प्राप्त करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
अ꣡ध꣢ क्ष꣣पा꣡ परि꣢꣯ष्कृतो꣣ वा꣡जा꣢ꣳ अ꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯हसे । य꣡दी꣢ वि꣣व꣡स्व꣢तो꣣ धि꣢यो꣣ ह꣡रि꣢ꣳ हि꣣न्व꣢न्ति꣣ या꣡त꣢वे ॥१६३१॥
पदार्थःहे मानव ! (यदि) जब (विवस्वतः) तमोगुणों को हटानेवाले परमेश्वर की (धियः) प्रज्ञाएँ (हरिम्) तुझ मनुष्य को (यातवे) पुरुषार्थ करने के लिए (हिन्वन्ति) प्रेरित करती हैं, तब (क्षपा)परमेश्वर की दोष क्षीण करने की शक्ति से (परिष्कृतः)संस्कृत हुआ तू (वाजान्) विविध ऐश्वर्यों में (अभि प्र गाहसे) अवगाहन अर्थात् रमण करने लगता है ॥१॥
भावार्थःआत्मशुद्धि और पुरुषार्थ से ही मनुष्य विविध सम्पदाएँ पा सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
त꣡म꣢स्य मर्जयामसि꣣ म꣢दो꣣ य꣡ इ꣢न्द्र꣣पा꣡त꣢मः । यं꣡ गाव꣢꣯ आ꣣स꣡भि꣢र्द꣣धुः꣢ पु꣣रा꣢ नू꣣नं꣡ च꣢ सू꣣र꣡यः꣢ ॥१६३२॥
पदार्थः(अस्य) इस स्तोता मनुष्य का (यः) जो (इन्द्रपातमः) परमेश्वर द्वारा अतिशय पान करने योग्य (मदः) हर्षदायक भक्ति-रस है, (तम्) उसे, हम (मर्जयामसि) शुद्ध करते हैं, (यम्) जिसे(पुरा नूनं च) पहले और आज भी (सूरयः) विद्वान् (गावः)स्तोता लोग (आसभिः) मुखों से (दधुः) प्रकट करते रहे हैं ॥२॥
भावार्थःआडम्बर से रहित, निश्छल, शुद्ध उपासना ही जगदीश्वर को स्वीकार होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
तं꣡ गाथ꣢꣯या पुरा꣣ण्या꣡ पु꣢ना꣣न꣢म꣣꣬भ्य꣢꣯नूषत । उ꣣तो꣡ कृ꣢पन्त धी꣣त꣡यो꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ ना꣢म꣣ बि꣡भ्र꣢तीः ॥१६३३॥
पदार्थः(पुनानम्) पवित्र करनेवाले (तम्) उस सोम की अर्थात् शुभ गुण-कर्मों की प्रेरणा करनेवाले परमात्मा की, स्तोता लोग(पुराण्या) सनातन (गाथया) वेद-गाथा से (अभ्यनूषत) स्तुति करते हैं। (उत उ) और (नाम) परमात्मा के प्रति नमन को(बिभ्रतीः) धारण करती हुई (देवानाम्) विद्वानों की (धीतयः) बुद्धियाँ और क्रियाएँ (कृपन्त) शक्तिशालिनी हो जाती हैं ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की स्तुति से स्तोताओं की वाणियाँ, प्रज्ञाएँ और क्रियाएँ बलवती होकर जीवन में उन्हें सफल करती हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣢श्वं꣣ न꣢ त्वा꣣ वा꣡र꣢वन्तं व꣣न्द꣡ध्या꣢ अ꣣ग्निं꣡ नमो꣢꣯भिः । स꣣म्रा꣡ज꣢न्तमध्व꣣रा꣡णा꣢म् ॥१६३४॥
पदार्थः(वारवन्तम्) मलिनता-निवारक किरण रूप बालों से युक्त (अश्वं न) सूर्य के समान (वारवन्तम्) दोष-निवारण के सामर्थ्य से युक्त, (अध्वराणाम्) सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति आदि यज्ञों के वा शिक्षा-यज्ञों के (राजन्तम्) सम्राट् (अग्निं त्वाम्) आप नायक परमात्मा वा आचार्य को (नमोभिः) नमस्कारों से (वन्दध्यै) वन्दना करने के लिए, मैं बुलाता हूँ ॥१॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे सूर्य अपने किरण-समूह से भूमि पर स्थित मलिनता आदि को दूर करता है, वैसे ही परमेश्वर और आचार्य अपने स्वच्छ करने के सामर्थ्य से मनुष्यों के पाप, दुर्गुण, दुर्व्यसन, दुःख आदि दूर करते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣡ घा꣢ नः सू꣣नुः꣡ शव꣢꣯सा पृ꣣थु꣡प्र꣢गामा सु꣣शे꣡वः꣢ । मी꣣ढ्वा꣢ꣳ अ꣣स्मा꣡कं꣢ बभूयात् ॥१६३५॥
पदार्थः(सः घ) वह निश्चय ही (सूनुः) शुभ गुण, कर्म, विद्या, आदि का प्रेरक, (पृथुप्रगामा) विस्तृत कर्तव्यमार्ग का उपदेश करनेवाला, (सुशेवः) उत्तम सुख देनेवाला परमेश्वर वा आचार्य (नः) हमें (मीढ़्वान्) विद्या, धन आदि की वर्षाओं से सींचनेवाला (बभूयात्) होवे ॥२॥
भावार्थःभली-भाँति उपासना किया गया परमेश्वर और भली-भाँति सेवा किया गया आचार्य विद्या, शुभ गुण-कर्म आदि के उपदेश से मनुष्यों को सुखी करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣡ नो꣢ दू꣣रा꣢च्चा꣣सा꣢च्च꣣ नि꣡ मर्त्या꣢दघा꣣योः꣢ । पा꣣हि꣢꣫ सद꣣मि꣢द्वि꣣श्वा꣡युः꣢ ॥१६३६॥
पदार्थःहे परमात्मन् वा आचार्य ! (विश्वायुः) सौ वर्ष की पूर्ण आयु की प्राप्ति का उपदेश देनेवाले (सः) वह आप (दूरात् च) दूर से (आसात् च) और समीप से (अघायोः) दूसरों को पापी बनाना चाहनेवाले (मर्त्यात्) मनुष्य से (सदम् इत्) सदा ही (अस्मान्) हमें (नि पाहि) निरन्तर बचाते रहो ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की प्रेरणा से और सद्गुरुओं के उपदेश से सब लोग पापात्माओं की कुसङ्गति छोड़कर, सत्सङ्ग करके नैतिक नियमों और स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हुए सदाचारी और दीर्घायु होवें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्व꣡मि꣢न्द्र꣣ प्र꣡तू꣢र्तिष्व꣣भि꣡ विश्वा꣢꣯ असि꣣ स्पृ꣡धः꣢ । अ꣣शस्तिहा꣡ ज꣢नि꣣ता꣡ वृ꣢त्र꣣तू꣡र꣢सि꣣ त्वं꣡ तू꣢र्य तरुष्य꣣तः꣢ ॥१६३७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) विघ्नों को दूर करनेवाले परमात्मन् वा जीवात्मन् ! तुम (प्रतूर्तिषु) वेगवाले देवासुरसङ्ग्रामों में (विश्वाः) सब(स्पृधः) प्रतिस्पर्धा करनेवाली काम, क्रोध आदि की सेनाओं को (अभि असि) परास्त कर देते हो। तुम (अशस्तिहा) अप्रशस्तियों को मारनेवाले, (जनिता) प्रशस्ति कारक श्रेष्ठ गुणों तथा कर्मों को जन्म देनेवाले और (वृत्रतूः) पापों की हिंसा करनेवाले (असि) हो। (त्वम्) तुम (तरुष्यतः) हिंसकों को (तूर्य) विनष्ट करो ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को योग्य है कि परमात्मा से प्रार्थना करके और अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर सभी आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को जीतकर अपने उन्नति के मार्ग को निष्कण्टक करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
अ꣡नु꣢ ते꣣ शु꣡ष्मं꣢ तु꣣र꣡य꣢न्तमीयतुः क्षो꣣णी꣢꣫ शिशुं꣣ न꣢ मा꣣त꣡रा꣢ । वि꣡श्वा꣢स्ते꣣ स्पृ꣡धः꣢ श्नथयन्त म꣣न्य꣡वे꣢ वृ꣣त्रं꣡ यदि꣢न्द्र꣣ तू꣡र्व꣢सि ॥१६३८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) शूर परमात्मन् वा जीवात्मन् ! (ते) तुम्हारे (तुरयन्तम्) शीघ्र कार्य करनेवाले (शुष्मम्) बल को (क्षोणी) आकाश-भूमि वा मन-बुद्धि (अनु ईयतुः) अनुसरण करते हैं। (तुरयन्तम्) तेजी से चलते हुए (शिशुं न) शिशु को जैसे (मातरा) माता-पिता अनुसरण करते हैं, अभिप्राय यह है कि जैसे शिशु के पीछे-पीछे चलने में माता-पिता किसी महान् आनन्द का अनुभव करते हैं, वैसे ही परमात्मा के बल का अनुसरण करने से द्यावापृथिवी और जीवात्मा के बल का अनुसरण करने से मन-बुद्धि विशेष शक्ति प्राप्त करते हैं। हे इन्द्र परमात्मन् वा जीवात्मन् ! (यत्) जब, तुम (वृत्रम्) काम आदि शत्रु को वा विघ्न समूह को (तूर्वसि) नष्ट करते हो, तब (ते) तुम्हारे (मन्यवे) तेज के सम्मुख (विश्वाः) सब (स्पृधः) शत्रु-सेनाएँ वा विघ्नों की सेनाएँ (श्नथयन्त) हतप्राय वा दुर्बल हो जाती हैं ॥२॥
भावार्थःद्यावापृथिवी आदि सब कुछ परमात्मा के बल से ही बलवान् दिखायी देते हैं, इसी प्रकार शरीरस्थ मन-बुद्धि आदि जीवात्मा के बल से बलवान् होते हैं। मन में परमात्मा के चिन्तन से और अपने अन्तरात्मा के उद्बोधन से सब विघ्न और बाह्य तथा आन्तरिक शत्रु जड़समेत उखाड़े जा सकते हैं ॥२॥ इस खण्ड में उपास्य-उपासक, जीवात्मा, प्राण, परमात्मा, आचार्य और राजा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सत्रहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣣ज्ञ꣡ इन्द्र꣢꣯मवर्धय꣣द्य꣢꣯द्भूमिं꣣ व्य꣡व꣢र्तयत् । च꣣क्राण꣡ ओ꣢प꣣शं꣢ दि꣣वि꣢ ॥१६३९॥
पदार्थः(यज्ञः) परमात्मा की सङ्गति करना रूप यज्ञ (इन्द्रम्) जीवात्मा को (अवर्धयत्) बढ़ाता है, शक्तिशाली बनाता है, (यत्) क्योंकि, वह जीवात्मा (दिवि) तेजस्वी परमात्मा में (ओपशम्) निवास(चक्राणः) करता हुआ (भूमिम्) पार्थिव शरीर को (व्यवर्तयत्) भली-भाँति चलाता है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के पास से ही बल प्राप्त करके जीवात्मा शरीररूप राज्य के मस्तिष्क-संस्थान, रक्त-संस्थान, पाचन-संस्थान, श्वास-संस्थान, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों सबका भली-भाँति सञ्चालन करने में समर्थ होता है। इसलिए उसे चाहिए कि परमात्मा को कभी न भूले ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
व्या꣢३꣱न्त꣡रि꣢क्षमतिर꣣न्म꣢दे꣣ सो꣡म꣢स्य रोच꣣ना꣢ । इ꣢न्द्रो꣣ य꣡दभि꣢꣯नद्व꣣ल꣢म् ॥१६४०॥
पदार्थः(इन्द्रः) बलवान् जीवात्मा (सोमस्य) भक्तिरस के (मदे) उत्साह में(यत्) जब (वलम्) आवरण डालनेवाले अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति के बाधक अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष आदि, काम-क्रोध आदि और व्याधि-स्त्यान-संशय-प्रमाद-आलस्य आदि विघ्न-समूह को(अभिनत्) छिन्न-भिन्न कर देता है, तब (अन्तरिक्षम्) मध्यस्थ मनोमय और विज्ञानमय आकाश को तथा (रोचना) उसमें प्रकाशमन सद्भाव-रूप नक्षत्रों को (वि-अतिरत्) फैला देता है ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा के पास से प्राप्त बल से ही मनुष्य का आत्मा पग-पग पर आये हुए विघ्नों का विध्वंस करके लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣡द्गा आ꣢꣯ज꣣द꣡ङ्गि꣢रोभ्य आ꣣वि꣢ष्कृ꣣ण्व꣡न्गुहा꣢꣯ स꣣तीः꣢ । अ꣣र्वा꣡ञ्चं꣢ नुनुदे व꣣ल꣢म् ॥१६४१॥
पदार्थःइन्द्र नामक बलवान् जीवात्मा (अर्वाञ्चम्) अपने सामने आये हुए (वलम्) पूर्व मन्त्र में कह गए आवरण डालनेवाले विघ्न-समूह को (नुनुदे) परे धकेल देता है और (गुहा सतीः) गुफा में छिपी हुई (गाः) अध्यात्म-प्रकाश की किरणों को(अड़्गिरोभ्यः) प्राणायाम के अभ्यासियों के लिए (उद् आजत्) बाहर निकाल लाता है ॥३॥
भावार्थःजिन विघ्न-जालों से घिरे हुए योगाभ्यासी लोग विवेक-ख्याति के प्रकाश को वा परमात्मा के प्रकाश को नहीं प्राप्त कर पाते उन विघ्नों को प्रयत्नशील जीवात्मा परमात्मा की कृपा से पराजित करके लक्ष्य-प्राप्ति में सफल हो जाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्य꣡मु꣢ वः सत्रा꣣सा꣢हं꣣ वि꣡श्वा꣢सु गी꣣र्ष्वा꣡य꣢तम् । आ꣡ च्या꣢वयस्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१६४२॥
पदार्थःहे भाई ! तू (त्यम् उ) उसी (सत्रासाहम्) एक साथ सब विघ्नों को पराजित कर देनेवाले, (विश्वासु गीर्षु) सब वाङ्मयों में (आयतम्) व्याप्त परमात्मा वा जीवात्मा को (वः) वरण कर और (ऊतये) रक्षा के लिए (आच्यावयसि) अपनी ओर झुका ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर सब वेद-वाणियों में व्याप्त है, क्योंकि श्रुति कहती है कि ‘जिसने उसे नहीं जाना, वह ऋचा से भला क्या लाभ उठा सकेगा (ऋ० १।१६४।३९)’। जीवात्मा का भी वेदादि वाणियाँ पद-पद पर वर्णन करती हैं। परमात्मा की शरण में जाकर और अपने अन्तरात्मा को भली-भाँति उद्बोधन देकर मनुष्य रक्षित तथा समुन्नत हो सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
यु꣣ध्म꣡ꣳ सन्त꣢꣯मन꣣र्वा꣡ण꣢ꣳ सोम꣣पा꣡मन꣢꣯पच्युतम् । न꣡र꣢मवा꣣र्य꣡क्र꣢तुम् ॥१६४३॥
पदार्थः(युध्मं सन्तम्) योद्धा होते हुए (अनर्वाणम्) किसी दूसरे पर आश्रित न रहनेवाले, (सोमपाम्) वीररस का पान करनेवाले, (अनपच्युतम्) विघ्नों से विचलित न होनेवाले (नरम्) नेता (अवार्यक्रतुम्) जिसके संकल्प वा कर्म को कोई रोक नहीं सकता, ऐसे परमात्मा वा जीवात्मा को, हे मानव ! तू (आ च्यावयसि) अपनी ओर झुका। [यहाँ 'आच्यावयसि’ पद पूर्व मन्त्र से लाया गया है] ॥२॥ यहाँ ‘युध्मं सन्तम् अनर्वाणम्’ जो योद्धा होते हुए भी आक्रमणकारी नहीं है—यह अर्थ प्रतीत होने से विरोध भासित होता है, भाष्य में दी गयी व्याख्या से उस विरोध का परिहार हो जाता है। अतः विरोधाभास अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर अधार्मिक, दूसरों को सतानेवाले लोगों से मानो युद्ध करके उन्हें पराजित और दण्डित करता है। देहधारी जीव भी वीरतापूर्वक दुर्विचारों और दुष्ट जनों से युद्ध करके अदम्य संकल्प-बल से सब शत्रुओं को जीतकर उन्नति की सबसे उपरली सीढ़ी पर पहुँचने में समर्थ हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
शि꣡क्षा꣢ ण इ꣣न्द्र꣢꣫ राय आ पु꣣रु꣢ वि꣣द्वा꣡ꣳ ऋ꣡चीषम । अ꣡वा꣢ नः꣣ पा꣢र्ये꣣ ध꣡ने꣢ ॥१६४४॥
पदार्थःहे (ऋचीषम) वेदवागीशों का मान करनेवाले (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् परमात्मा वा जीवात्मा ! (पुरु) बहुत (विद्वान्) विद्वान् तुम (नः) हमें (रायः) भौतिक और आध्यात्मिक ऐश्वर्य(आ शिक्ष) प्रदान करो। (पार्ये) मार्ग के पार जाकर प्राप्त करने योग्य (धने) धन के निमित्त (नः) हमारी (अव) रक्षा करो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की प्रेरणा और जीवात्मा के पुरुषार्थ से मनुष्य निर्धारित मार्ग के पार पहुँच कर महान् ऐश्वर्यों को प्राप्त कर सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त꣢व꣣ त्य꣡दि꣢न्द्रि꣣यं꣢ बृ꣣ह꣢꣫त्तव꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣡ क्रतु꣢꣯म् । व꣡ज्र꣢ꣳ शिशाति धि꣣ष꣢णा꣣ व꣡रे꣢ण्यम् ॥१६४५॥
पदार्थःहे इन्द्र परमैश्वर्यवन् विघ्नविनाशक वीर परमात्मन् ! (तव धिषणा) आपकी बुद्धि (तव) आपके (त्यत्) उस प्रसिद्ध(वरेण्यम्) श्रेष्ठ वा वरणीय, (बृहत्) महान् (इन्द्रियम्) इन्द्रत्व को, परमैश्वर्य को, (दक्षम्) बल को, (क्रतुम्) प्रज्ञान, कर्म, सङ्कल्प व यज्ञ को (उत) और (वज्रम्) न्यायरूप वज्र को वा दण्ड-सामर्थ्य को (शिशाति) सदैव तीक्ष्ण करती रहती है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के परमैश्वर्य, बल, प्रज्ञान, कर्म, श्रेष्ठ संकल्प, यज्ञ-भावना, न्याय-प्रदान और दण्ड-सामर्थ्य कभी घटते नहीं, प्रत्युत सदा बढ़े हुए और सदा तीक्ष्ण रहते हैं, जिससे सब लोग लाभान्वित होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त꣢व꣣ द्यौ꣡रि꣢न्द्र꣣ पौ꣡ꣳस्यं꣢ पृथि꣣वी꣡ व꣢र्धति꣣ श्र꣡वः꣢ । त्वा꣢꣫मापः꣣ प꣡र्व꣢तासश्च हिन्विरे ॥१६४६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (तव) आपके (पौंस्यम्) बल को और(श्रवः) यश को (द्यौः) द्युलोक और (पृथिवी) भूलोक (वर्धति) बढ़ाते हैं, गाते हैं। (त्वाम्) आपको (आपः) नदियाँ (पर्वतासः च) और पर्वत (हिन्विरे) कीर्तिगान से बढ़ाते हैं ॥२॥
भावार्थःसूर्य, बादल, बिजली, वायु, पृथिवी, नदियाँ, पहाड़, समुद्र, लताएँ, ऋतुएँ, तारावलि, मनुष्य, पशु, पक्षी सभी परमेश्वर की ही महिमा को गा रहे हैं, और गाते-गाते थकते नहीं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
त्वां꣡ विष्णु꣢꣯र्बृ꣣ह꣡न्क्षयो꣢꣯ मि꣣त्रो꣡ गृ꣢णाति꣣ व꣡रु꣢णः । त्वा꣡ꣳ शर्धो꣢꣯ मद꣣त्य꣢नु꣣ मा꣡रु꣢तम् ॥१६४७॥
पदार्थःहे इन्द्र ! हे परम सम्राट् जगदीश ! (त्वाम्) आप महाबली की (विष्णुः) किरणों से व्याप्त सूर्य (बृहन् क्षयः) विस्तीर्ण अन्तरिक्षरूप घर, (मित्रः) वायु और (वरुणः) अग्नि(गृणाति) स्तुति कर रहे हैं। (मारुतं शर्धः) मानसून पवनों की सेना भी (त्वाम् अनु) आपकी ही अनुकूलता होने पर(मदति) हर्ष को प्राप्त करती है ॥३॥
भावार्थःसंसार में जो कोई भी पदार्थ अपना-अपना कार्य करते हैं, वे सभी परमेश्वर से ही शक्ति पाते हैं ॥३॥ इस खण्ड में जीवात्मा और परमात्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ सत्रहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
न꣡म꣢स्ते अग्न꣣ ओ꣡ज꣢से गृ꣣ण꣡न्ति꣢ देव कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मै꣢र꣣मि꣡त्र꣢मर्दय ॥१६४८॥
पदार्थःहे (देव) दान आदि गुणों से युक्त (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन्,राजन् वा योगिराज ! (ते ओजसे) तुम्हारे बल और प्रताप के लिए(कृष्टयः) मनुष्य (नमः गृणन्ति) नमस्कार करते हैं अर्थात् तुम्हारे बल और प्रताप की प्रशंसा करते हैं। तुम (अमैः) अपने बलों से(अमित्रम्) योग-मार्ग वा जीवन-मार्ग में आते हुए शत्रु को (अर्दय) पीड़ित कर डालो ॥१॥
भावार्थःपग-पग पर हमारे निर्धारित लक्ष्य में जो विघ्न आते हैं, वे परमेश्वर की प्रेरणा से, राजा की सहायता से और योग-प्रशिक्षक के योग्य प्रशिक्षण से सरलतापूर्वक दूर किये जा सकते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
कु꣣वि꣢꣫त्सु नो꣣ ग꣡वि꣢ष्ट꣣ये꣡ऽग्ने꣢ सं꣣वे꣡षि꣢षो र꣣यि꣢म् । उ꣡रु꣢कृदु꣣रु꣡ ण꣢स्कृधि ॥१६४९॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन्, राजन् वा योगिराज ! आप(नः) हमारे (गविष्टये) विवेकख्याति के प्रकाशों की प्राप्ति के लिए अथवा विविध विद्याओं में गवेषणा के लिए(कुवित्) बहुत (रयिम्) आध्यात्मिक ऐश्वर्य वा भौतिक धन(सु संवेषिषः) भलीभाँति प्राप्त कराओ। (उरुकृत्) बहुत देनेवाले आप (नः) हमारे लिए (उरु) बहुत (कृधि) दो ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से और योग-प्रशिक्षक के योग्य मार्गदर्शन से योगाभ्यासी शिष्य आध्यात्मिक धन प्राप्त करके मोक्ष के अधिकारी होवें और राजा विविध विज्ञानों में अनुसन्धान के इच्छुकों को धन प्राप्त करा कर राष्ट्र में विद्यासूर्य के उदय में सहायक हो ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
मा꣡ नो꣢ अग्ने महाध꣣ने꣡ परा꣢꣯ वर्ग्भार꣣भृ꣡द्य꣢था । सं꣣व꣢र्ग꣣ꣳ स꣢ꣳ र꣣यिं꣡ ज꣢य ॥१६५०॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन्, राजन् वा योगिराज ! (महाधने) जीवन-सङ्ग्राम में आप (नः) हमें (मा परावर्ग्) बीच में ही मत छोड़ दीजिए, (भारभृत् यथा) जैसे जिसने रक्षा का भार लिया हुआ है, वह रक्षणीय को बीच में ही नहीं छोड़ देता, अथवा जैसे बोझ को दूसरे स्थान पर पहुँचाने के लिए नियुक्त किया हुआ मनुष्य भार को बीच में ही नहीं छोड़ देता। साथ ही आप (संवर्गम्) जिससे पाप-ताप आदि कटते हैं, ऐसे (रयिम्) आध्यात्मिक धन को, अथवा (संवर्गम्)जिससे दीन जनों के दुःख कटते हैं, ऐसे (रयिम्) भौतिक धन को (संजय) प्राप्त कराइये ॥३॥
भावार्थःजो परमात्मा वा योगिराज की शरण में जाते हैं, उन्हें वह बीच में ही न छोड़कर देवासुरसङ्ग्राम में विजयी करता है। वैसे ही राजा को भी चाहिए कि प्रजाजनों द्वारा प्रारम्भ किये गये महान् कार्यों में उन्हें बीच में ही न छोड़कर धन आदि से उनकी सहायता करके उन्हें सफलता तक पहुँचाये ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स꣡म꣢स्य म꣣न्य꣢वे꣣ वि꣢शो꣣ वि꣡श्वा꣢ नमन्त कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡ये꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः ॥१६५१॥
पदार्थःजैसे (अस्य) इस इन्द्र राजा के (मन्यवे) क्रोध के सम्मुख (विश्वाः) सब (कृष्टयः) विनाशक (विशः) शत्रु-सेनाएँ (सं नमन्त) झुक जाती हैं, वैसे ही (अस्य) इस इन्द्र परमात्मा के (मन्यवे) तेज के सम्मुख (विश्वाः) सब (कृष्टयः) योगाभ्यासरूप कृषि करनेवाली (विशः) प्रजाएँ (सं नमन्त) नम्र हो जाती हैं, (समुद्राय इव) जैसे समुद्र को प्राप्त करने के लिए (सिन्धवः) नदियाँ (सं नमन्त) नम्र अर्थात् नीचे की ओर बहनेवाली हो जाती हैं ॥१॥ यहाँ उपमा और श्लेष अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजगदीश्वर का प्रताप, प्रभाव और महत्त्व सबसे महान् है, जिसके संमुख सभी नतमस्तक होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
वि꣡ चि꣢द्वृ꣣त्र꣢स्य꣣ दो꣡ध꣢तः꣣ शि꣡रो꣢ बिभेद वृ꣣ष्णि꣡ना꣢ । व꣡ज्रे꣢ण श꣣त꣡प꣢र्वणा ॥१६५२॥
पदार्थःजैसे (वृष्णिना) गोली बरसानेवाली बन्दूक से अथवा (शतपर्वणा) सौ कीलोंवाली (वज्रेण) गदा से, इन्द्र अर्थात् शूरवीर राजा वा सेनापति (दोधतः) सज्जनों को कँपानेवाले (वृत्रस्य) दुष्ट शत्रु का(शिरः) सिर (वि बिभेद) तोड़ देता है, वैसे ही (वृष्णिना) सुखवर्षक, (शतपर्वणा) बहुतों का पालन करनेवाले (वज्रेण) दण्डसामर्थ्य से इन्द्र अर्थात् वीर परमेश्वर (दोधतः) कँपानेवाले(वृत्रस्य) पाप के (शिरः) सिर को अर्थात् प्रभाव को (वि बिभेद चित्) नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ॥२॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से सब विघ्न और सब पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे राजा या सेनापति के शस्त्रास्त्रों से सब शत्रु ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ओ꣢ज꣣स्त꣡द꣢स्य तित्विष उ꣣भे꣢꣫ यत्स꣣म꣡व꣢र्तयत् । इ꣢न्द्र꣣श्च꣡र्मे꣢व꣣ रो꣡द꣢सी ॥१६५३॥
पदार्थः(यत्) जो (इन्द्रः) परमेश्वर ने (चर्म इव) सन्ध्या-वन्दन के लिए जैसे मृगचर्म कोई फैलाता है, वैसे ही (उभे रोदसी) दोनों द्यावापृथिवी के समान अपरा और परा नामक दोनों विद्याओं को (समवर्त्तयत्) फैलाया है, (तत्) वह (अस्य) इस परमेश्वर का (ओजः) ज्ञान-बल (तित्विषे) प्रदीप्त हो रहा है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःयह जगदीश्वर की महान् कृपा है कि वह सत्पात्र ऋषियों के हृदय में पराविद्या और अपरा विद्या के ज्ञान को द्यावापृथिवी के समान फैलाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -एकपदा पङ्क्तिः| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
सु꣣म꣢न्मा꣣ व꣢स्वी꣣ र꣡न्ती꣢ सू꣣न꣡री꣢ ॥१६५४
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! आपकी शक्ति वा वेदवाणी (सुमन्मा) शुभ ज्ञान देनेवाली, (वस्वी) निवासप्रद, (रन्ती) रमणीय और (सूनरी)उत्तम नेतृत्व करनेवाली है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की शक्ति का ध्यान करने से और उसकी वेदवाणी का अध्ययन करने तथा श्रवण करने से मनुष्य ज्ञानवान्, अपने आत्मा में सद्गुणों का निवास करानेवाले, श्रेष्ठ मार्ग पर चलनेवाले और सुखी होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
स꣡रू꣢प वृष꣣न्ना꣡ ग꣢ही꣣मौ꣢ भ꣣द्रौ꣡ धुर्या꣢꣯व꣣भि꣢ । ता꣢वि꣣मा꣡ उप꣢꣯ सर्पतः ॥१६५५
पदार्थःहे (सरूप) विविध रूपों से युक्त, (वृषन्) सुखों की वर्षा करनेवाले इन्द्र जगदीश्वर ! आप (इमौ) इन (भद्रौ) कल्याणकारी, (धुर्यौ) देह के धुरे को वहन करनेवाले आत्मा और मन के (अभि) प्रति (आगहि) आओ। (तौ इमौ) ये वे दोनों आत्मा और मन, (उपसर्पतः) आपके समीप पहुँच रहे हैं ॥२॥
भावार्थःजगदुत्पादकत्व, जगद्धारकत्व, जगत्संहारकत्व, न्यायकारित्व, दयालुत्व, निराकारत्व, अजरत्व, अमरत्व, अभयत्व, पवित्रत्व आदि परमात्मा के अनेक रूप हैं, इसीलिए उसे ‘सरूप’ सम्बोधन किया गया है। स्तोता के आत्मा और मन जब स्वयं परमात्मा को पाने का यत्न करते हैं, तब वहीँ छिपा बैठा वह उनके लिए प्रकट हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -एकाहपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
नी꣢꣯व शी꣣र्षा꣡णि꣢ मृढ्वं꣣ म꣢ध्य꣣ आ꣡प꣢स्य तिष्ठति । शृ꣡ङ्गे꣢भिर्द꣣श꣡भि꣢र्दि꣣श꣢न् ॥१६५६
पदार्थःइन्द्र जगदीश्वर (दशभिः) दस (शृङ्गेभिः) सींगों से अर्थात् पृथिवी, अप्, तेजस्, वायु, आकाश इन पञ्च स्थूलभूतों तथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द इन पाँच सूक्ष्मभूतों से (दिशन्) जगत्प्रपञ्च का सर्जन करता हुआ (आपस्य) व्याप्त ब्रह्माण्ड के (मध्ये) अन्दर(तिष्ठति) विद्यमान है। हे मनुष्यो ! तुम उसकी सत्ता में विश्वास करके (शीर्षाणि) अपने मस्तिष्कों को (नि मृढ़्वम् इव) माँज लो ॥३॥
भावार्थःचर्मचक्षुओं से जगत् के सञ्चालनकर्ता किसी को न देखते हुए जो लोग परमेश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते, वे व्यर्थ ही भ्रम में पड़े हुए हैं। जो श्रद्धा का दीप प्रज्वलित कर लेते हैं, वे कण-कण में परमेश्वर को देखते हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, राजा और योगी के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ सत्रहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥ अष्टम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
प꣡न्यं꣢पन्य꣣मि꣡त्सो꣢तार꣣ आ꣡ धा꣢वत꣣ म꣡द्या꣢य । सो꣡मं꣢ वी꣣रा꣢य꣣ शू꣡रा꣢य ॥१६५७॥
पदार्थःहे (सोतारः) ज्ञानरस को अभिषुत करनेवाले मनुष्यो ! तुम(मद्याय) आनन्दित किये जाने योग्य, (वीराय) काम-क्रोध आदि षड् रिपुओं को विशेषरूप से प्रकम्पित करनेवाले, (शूराय) शूरवीर जीवात्मा के लिए (पन्यम् पन्यम् इत्) प्रशंसनीय-प्रशंसनीय ही (सोमम्) अध्यात्म ज्ञान-रस को (आ धावत) पहुँचाओ ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि वे प्रशंसा-योग्य ही भौतिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान का आत्मा में सञ्चय करें, जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस के मार्ग को भली-भाँति पार कर सकें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ए꣡ह꣢ हरी꣢꣯ ब्रह्म꣣यु꣡जा꣢ श꣣ग्मा꣡ व꣢क्षतः꣣ स꣡खा꣢यम् । इ꣡न्द्रं꣢ गी꣣र्भि꣡र्गिर्व꣢꣯णसम् ॥१६५८॥
पदार्थः(ब्रह्मयुजा) परमात्मा द्वारा शरीर में जोड़े गए, (शग्मा)सुखदायक वा शक्तिशाली (हरी) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप वा प्राण-अपान रूप दो घोड़े (सखायम्) अपने सखा, (गिर्वणसम्) प्रशस्त वाणियों से सेवित (इन्द्रम्) जीवात्मा को(इह) इस देह-रथ में (गीर्भिः) वाणियों के साथ (आवक्षतः) वहन करते हैं ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर की ही यह महिमा है कि उसके द्वारा जोड़े गये ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप अथवा प्राण-अपान रूप घोड़े देह-रथ को निर्विघ्न चलाते हैं, जिससे उसमें बैठा हुआ जीव जीवन-यात्रा को करता हुआ योगाभ्यास द्वारा मोक्ष-पद का अधिकारी हो जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
पा꣡ता꣢ वृत्र꣣हा꣢ सु꣣त꣡मा घा꣢꣯ गम꣣न्ना꣢꣫रे अ꣣स्म꣢त् । नि꣡ य꣢मते श꣣त꣡मू꣢तिः ॥१६५९॥
पदार्थः(वृत्रहा) विघ्नों को दूर करनेवाला, (सुतम्) अभिषुत किये हुए श्रद्धा-भक्ति के रस को (पाता) पीनेवाला इन्द्र जगदीश्वर (घ) निश्चय ही (आ गमत्) हमारे पास आये। (अस्मत् आरे) हमसे दूर(न) न रहे। (शतमूतिः) अनन्त रक्षाओंवाला वह (नि यमते) हमें नियन्त्रणपूर्वक चलाये ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर को अपने समीप अनुभव करके स्तोता जीव नियमपूर्वक ही जीवन बिताता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
आ꣡ त्वा꣢ विश꣣न्त्वि꣡न्द꣢वः समु꣣द्र꣡मि꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः । न꣢꣫ त्वामि꣣न्द्रा꣡ति꣢ रिच्यते ॥१६६०॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (इन्दवः) आचार्य से प्राप्त ज्ञान-रस और परमात्मा से प्राप्त आनन्द-रस (त्वा) तुझमें (आ विशन्तु) प्रवेश करें, (समुद्रम् इव) समुद्र में जैसे (सिन्धवः) नदियाँ प्रवेश करती हैं। देह में कोई भी मन, प्राण आदि (त्वाम्) तुझ जीवात्मा से (न अतिरिच्यते) महत्ता में अधिक नहीं है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजीवात्मा शरीर का सम्राट् है। मन, बुद्धि, प्राण, मस्तिष्क,हृदय आदि सब उसी के अनुशासन में है। वह यदि जागरूक है, तो सारे अभ्युदय या निःश्रेयस को वह प्राप्त कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
वि꣣व्य꣡क्थ꣢ महि꣣ना꣡ वृ꣢षन्भ꣣क्ष꣡ꣳ सोम꣢꣯स्य जागृवे । य꣡ इ꣢न्द्र ज꣣ठ꣡रे꣢षु ते ॥१६६१॥
पदार्थःहे (वृषन्) बलवान् (जागृवे) जागरूक (इन्द्र) जीवात्मन् ! तू(महिना) अपनी महिमा से (सोमस्य) ज्ञान-रस और आनन्द-रस के (भक्षम्) भाग को (विव्यक्थ) विस्तारित कर, (यः) जो भाग (ते) तेरे (जठरेषु) अन्दर है ॥२॥
भावार्थःमनुष्य जिस भी ज्ञान वा आनन्द को सञ्चित करता है, उसका विस्तार उसे निरन्तर करते रहना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
अ꣡रं꣢ त इन्द्र कु꣣क्ष꣢ये꣣ सो꣡मो꣢ भवतु वृत्रहन् । अ꣢रं꣣ धा꣡म꣢भ्य꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥१६६२॥
पदार्थःहे (वृत्रहन्) विघ्नविनाशक (इन्द्र) जीवात्मन् ! (सोमः) ज्ञान-रस और आनन्द-रस (ते कुक्षये) तेरे पेट के लिए अर्थात् तेरे अपने लिए(अरम्) पर्याप्त (भवतु) होवे और (इन्दवः) सराबोर करनेवाले ज्ञान-रस और आनन्द-रस (धामभ्यः) अन्य धामों के लिए भी (अरम्) पर्याप्त होवें ॥३॥
भावार्थःस्वयं गुरुजनों से ज्ञान लेकर और जगदीश्वर की उपासना से आनन्द पाकर उस ज्ञान तथा उस आनन्द का प्रसार जन-जन में, घर-घर में और प्रत्येक समाज में करना चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ज꣡रा꣢बोध꣣ त꣡द्वि꣢विड्ढि वि꣣शे꣡वि꣢शे य꣣ज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢ꣳ रु꣣द्रा꣡य꣢ दृशी꣣क꣢म् ॥१६६३॥
पदार्थःहे (जराबोध) स्तुतिविज्ञ मानव ! तू (विशे विशे) प्रत्येक मनुष्य के हितार्थ (यज्ञियाय) पूजनीय (रुद्राय) दुःखहर्ता परमात्मा के लिए (तत्) उस उज्ज्वल (दृशीकम्) रमणीय(स्तोमम्) स्तोत्र को, गुण-गान को (विविड्ढि) कर ॥१॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि जगदीश्वर का गुणगान करके यथाशक्ति उसके गुणों को अपने अन्दर धारण करने का प्रयत्न करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣡ नो꣢ म꣣हा꣡ꣳ अ꣢निमा꣣नो꣢ धू꣣म꣡के꣢तुः पुरुश्च꣣न्द्रः꣢ । धि꣣ये꣡ वाजा꣢꣯य हिन्वतु ॥१६६४॥
पदार्थः(सः) वह प्रसिद्ध, (महान्) गुणों में महान्, (अनिमानः) देश और काल से असीमित, (धूमकेतुः) फहराती हुई ओ३म् की ध्वजावाला, (पुरुश्चन्द्रः) बहुत आह्लाददायक अग्रनायक परमेश्वर (नः) हमें (धिये) ज्ञान और कर्म के लिए तथा (वाजाय) बल के लिए (हिन्वतु) प्रेरित करे ॥२॥
भावार्थःसच्ची परमात्मा की स्तुति वही है, जिससे मनुष्य ज्ञान कमाने, बल सञ्चित करने तथा पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरणा प्राप्त करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣢ रे꣣वाँ꣡ इ꣢व वि꣣श्प꣢ति꣣र्दै꣡व्यः꣢ के꣣तुः꣡ शृ꣢णोतु नः । उ꣣क्थै꣢र꣣ग्नि꣢र्बृ꣣ह꣡द्भा꣢नुः ॥१६६५॥
पदार्थः(रेवान् इव) महाधनाढ्य के समान (विश्पतिः) प्रजाओं का पालनकर्त्ता, (दैव्यः) विद्वानों का हितकर्ता, (केतुः) ज्ञान देनेवाला, (बृहद्भानुः) महान् तेजवाला (सः) वह प्रसिद्ध (अग्निः) जगत् का नेता परमेश्वर (उक्थैः) स्तोत्रों के द्वारा (नः) हमें अर्थात् हमारे प्रार्थना-वचनों को (शृणोतु) सुने, पूर्ण करे ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे कोई प्रशस्त धनवाला मनुष्य प्रजाओं का पालन करता हुआ, विद्वानों को सम्मान देता हुआ, ज्ञान और तेजस्विता का प्रसार करता हुआ, याचकों के वचनों को सुनता हुआ सबका हित करता है, वैसे ही जगदीश्वर भी करता है। परन्तु इतनी विशेषता है कि परमेश्वर का वैसा करने में कोई स्वार्थ नहीं होता ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त꣡द्वो꣢ गाय सु꣣ते꣡ सचा꣢꣯ पुरुहू꣣ता꣢य꣣ स꣡त्व꣢ने । शं꣢꣫ यद्गवे꣣ न꣢ शा꣣कि꣡ने꣢ ॥१६६६॥
पदार्थःहे साथी ! (वः) तू (सुते) श्रद्धा-रस के उत्पन्न होने पर (सचा) अन्य स्तोताओं के साथ (पुरुहूताय) बहुतों से बुलाये गये, (सत्वने) बलशाली इन्द्र परमात्मा के लिए (तत् गाय) उसी गीत को गा (यत्) जो गीत (शाकिने गवे न) घास-भक्षी बैल के समान (शाकिने) शक्तिमान् (गवे) तुझ स्तोता के लिए (शम्) शान्तिदायक हो ॥१॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःश्रद्धा से भरे हुए चित्त से जिस स्तुति-गीत का उपहार जगदीश्वर को दिया जाता है, वह स्तोता के लिए बहुत कल्याणकारी होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
न꣢ घा꣣ व꣢सु꣣र्नि꣡ य꣢मते दा꣣नं꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢तः । य꣢त्सी꣣मु꣢प꣣श्र꣢व꣣द्गि꣡रः꣢ ॥१६६७॥
पदार्थः(वसुः) बसानेवाला इन्द्र परमेश्वर (गोमतः) अध्यात्म-प्रकाश से युक्त (वाजस्य) बल के (दानम्) दान को (न घ) कभी नहीं (नि यमते) रोकता है, (यत् सीम्) जब कि वह (गिरः) श्रद्धा से भरी हुई स्तुति-वाणियों को (उप श्रवत्) सुन लेता है ॥२॥
भावार्थःश्रद्धालुओं के श्रद्धा से सिंचे हुए, प्रेम से भरे स्तोत्रों से द्रवित होकर जगदीश्वर नये-नये आध्यात्मिक ऐश्वर्य के उपहार स्तोता की भेंट करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
कु꣣वि꣡त्स꣢स्य꣣ प्र꣢꣫ हि व्र꣣जं꣡ गोम꣢꣯न्तं दस्यु꣣हा꣡ गम꣢꣯त् । श꣡ची꣢भि꣣र꣡प꣢ नो वरत् ॥१६६८॥
पदार्थःप्रथम—परमात्मा के पक्ष में। जो (दस्युहा) विघ्नों का विनाशक इन्द्र जगदीश्वर (कुवित्सस्य) बहुत दान देनेवाले को (गोमन्तं व्रजम्) उत्कृष्ट धेनुओं से युक्त गोशाला वा अध्यात्म-प्रकाश का समूह (प्र गमत्) प्राप्त कराता है, वह (शचीभिः) अपने कर्मों से (नः) हमारे लिए भी (अप वरत्) गाय आदि धनों वा अध्यात्म-प्रकाशों का द्वार खोल दे ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (दस्युहा) दुष्टों का वधकर्ता इन्द्र राजा (कुवित्सस्य) गोघातक की (गोमन्तं व्रजम्) धेनुओं से युक्त गोशाला में (प्र गमत् हि) पहुँचे और (शचीभिः) अपनी सेनाओं से, उसकी गौओं को (नः) हम धार्मिकों के लिए (अप वरत्) छीन लाये ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा दानियों का ही सहायक होता है। दुष्ट गोहत्यारों को यही दण्ड है कि उनकी गौएँ छीनकर सज्जनों को भेंट कर दी जाएँ ॥३॥ इस खण्ड में ज्ञानरस, जगदीश्वर, जीवात्मा और राजा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अठारहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -विष्णुः| स्वर - षड्जः
इ꣣दं꣢꣫ विष्णु꣣र्वि꣡ च꣢क्रमे त्रे꣣धा꣡ नि द꣢꣯धे प꣣द꣢म् । स꣡मू꣢ढमस्य पाꣳसु꣣ले꣢ ॥१६६९॥
पदार्थः(विष्णुः) सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (इदम्) इस ब्रह्माण्ड वा मानव-शरीर में (विचक्रमे) व्याप्त है। उसने (त्रेधा) तीन स्थानों में अर्थात् पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यौ में तथा शरीर के प्राण, मन और आत्मा में (पदम्) पग (निदधे) रखा हुआ है। तो भी (अस्य) इस परमेश्वर का वह पग (पांसुले) धूलि के ढेर में (समूढम्) छिपे हुए के समान है, अर्थात् चर्म- चक्षुओं से दिखाई नहीं देता है ॥१॥ यहाँ लुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःयहाँ निराकार भी परमेश्वर में पग रखने का वर्णन गौण है। अभिप्राय यह है कि जैसे कोई देहधारी कदम भर कर भूमि के किसी प्रदेश को अपने अधीन कर लेता है, वैसे ही जगदीश्वर ने सारे ब्रह्माण्ड को और सारे मानवदेह को अपने अधीन किया हुआ है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -विष्णुः| स्वर - षड्जः
त्री꣡णि꣢ प꣣दा꣡ वि च꣢꣯क्रमे꣣ वि꣡ष्णु꣢र्गो꣣पा꣡ अदा꣢꣯भ्यः । अ꣢तो꣣ ध꣡र्मा꣢णि धा꣣र꣡य꣢न् ॥१६७०॥
पदार्थः(गोपाः) रक्षक, (अदाभ्यः) किसी से भी हिंसित, पराजित या अपमानित नहीं किया जा सकनेवाला, (विष्णुः) सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर (त्रीणि पदा) प्रकृति, जगत्प्रपञ्च और जीवात्माएँ इन तीनों में (विचक्रमे) व्याप्त है। (अतः) इसी कारण से, वह(धर्माणि) सब पदार्थों में उनके गुण-कर्म-स्वाभाव की(धारयन्) व्यवस्था कर रहा है ॥२॥
भावार्थःजो परमात्मा ब्रह्माण्ड के सब पदार्थों में व्याप्त है, वही उनको धारण करनेवाला भी है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -विष्णुः| स्वर - षड्जः
वि꣢ष्णोः꣣ क꣡र्मा꣢णि पश्यत꣣ य꣡तो꣢ व्र꣣ता꣡नि꣢ पस्प꣣शे꣢ । इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ यु꣢ज्यः꣣ स꣡खा꣢ ॥१६७१॥
पदार्थः(विष्णोः) सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर के (कर्माणि) जगत्प्रपञ्च की उत्पत्ति करना, व्यवस्था करना आदि कर्मों को (पश्यत) देखो, (यतः) क्योंकि उसने उन्हें करने के लिए (व्रतानि) व्रत(पस्पशे) ग्रहण किये हुए हैं। वह जगत्पति (इन्द्रस्य) जीवात्मा का (युज्यः) साथ रहनेवाला (सखा) मित्र है ॥३॥
भावार्थःजैसे व्रती जगदीश्वर इस जगत् में महान् कर्मों को कर रहा है, वैसे ही उसका सखा जीव भी उससे बल पाकर बहुत से कार्य करने में समर्थ समर्थ होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -विष्णुः| स्वर - षड्जः
त꣡द्विष्णोः꣢꣯ पर꣣मं꣢ प꣣द꣡ꣳ सदा꣢꣯ पश्यन्ति सू꣣र꣡यः꣢ । दि꣣वी꣢व꣣ च꣢क्षु꣣रा꣡त꣢तम् ॥१६७२॥
पदार्थः(विष्णोः) सर्वव्यापक जगदीश्वर के (तत्) उस प्रसिद्ध, (परमम्) अति उत्कृष्ट (पदम्) प्राप्त करने योग्य स्वरूप को (सूरयः) विद्वान् उपासक लोग (सदा) हमेशा (पश्यन्ति) वैसे ही स्पष्ट रूप में देखते हैं (दिवि इव) जैसे सूर्य के प्रकाश में (आततम्) फैली हुई वस्तु को (चक्षुः) आँख देखती है ॥४॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥४॥
भावार्थःभले ही स्थूल दृष्टिवाले लोगों को परमात्मा न दिखायी दे, परन्तु सूक्ष्म दृष्टिवाले विद्वान् स्तोता जन तो उसका वैसे ही साक्षात्कार करते हैं, जैसे सूर्य के प्रकाश में कोई मनुष्य किसी विशाल मूर्त पदार्थ को देखता है ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -विष्णुः| स्वर - षड्जः
त꣡द्विप्रा꣢꣯सो विप꣣न्य꣡वो꣢ जागृ꣣वा꣢ꣳसः꣢ स꣡मि꣢न्धते । वि꣢ष्णो꣣र्य꣡त्प꣢र꣣मं꣢ प꣣द꣢म् ॥१६७३॥
पदार्थः(विपन्यवः) विविध रूप में जगदीश्वर के गुणों की स्तुति करनेवाले, (जागृवांसः) जागरूक (विप्रासः) विप्रजन(यत्) जो (विष्णोः) सर्वव्यापक परमेश्वर का (परमम्) सर्वोत्कृष्ट (पदम्) प्राप्तव्य स्वरूप है, (तत्) उसे(समिन्धते) अपने अन्तरात्मा में भली-भाँति प्रकाशित कर लेते हैं ॥५॥
भावार्थःजो मनुष्य अविद्या, आलस्य, अधर्माचरण रूप नींद को छोड़कर विद्या, धर्म, योगाभ्यास आदि के आचरण में जागरूक हैं, वे ही सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वोत्तम, सर्वव्यापी, सबसे प्राप्त करने योग्य जगदीश्वर को पाने में समर्थ होते हैं ॥५॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -विष्णुर्देवो वा| स्वर - षड्जः
अ꣡तो꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢वन्तु नो꣣ य꣢तो꣣ वि꣡ष्णु꣢र्विचक्र꣣मे꣢ । पृ꣣थिव्या꣢꣫ अधि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१६७४॥
पदार्थः(यतः) क्योंकि (विष्णुः) व्यापक जगदीश्वर (पृथिव्याः) पार्थिव शरीर के (सानवि अधि) उच्च प्रदेश मस्तिष्क में (विचक्रमे) व्याप्त है, (अतः) इसी कारण (देवाः) विद्वान्, जन, उसकी कृपा से मस्तिष्क द्वारा ज्ञान पाकर (नः) हमारी (अवन्तु) रक्षा करें ॥६॥
भावार्थःपरमेश्वर ही शरीर के मस्तिष्क आदि अङ्गों में स्थित हुआ उनके द्वारा सब ज्ञान-ग्रहण आदि करवाता है ॥६॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
मो꣡ षु त्वा꣢꣯ वा꣣घ꣡त꣢श्च꣣ ना꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्नि री꣢꣯रमन् । आ꣣रा꣡त्ता꣢द्वा सध꣣मा꣡दं꣢ न꣣ आ꣡ ग꣢ही꣣ह꣢ वा꣣ स꣡न्नु꣢꣯प श्रुधि ॥१६७५॥
पदार्थःहे इन्द्र ! हे मेरे मन ! (वाघतः च न) आकर्षक भी पदार्थ (त्वा)तुझे (अस्मत् आरे) हमसे दूर (मा उ सु) न (नि रीरमन्) क्रीडा करायें। (आरात्तात्) सुदूर देश से भी (नः) हमारे (सधमादम्) उपासना-यज्ञ में (आ गहि) आ जा, (इह वा सन्) और यहीं रहता हुआ (उप श्रुधि) हमारे आदेश को सुन ॥१॥
भावार्थःमनुष्य का मन दूर से दूर दौड़ता रहता है और अनेक संकल्प-विकल्प करता रहता है। उसकी यह चेष्टा परमात्मा के ध्यान में बाधक होती है। अतः साधक दूर गये हुए अपने मन को यहाँ वापस लौटा रहा है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
इ꣣मे꣡ हि ते꣢꣯ ब्रह्म꣣कृ꣡तः꣢ सु꣣ते꣢꣫ सचा꣣ म꣢धौ꣣ न꣢꣫ मक्ष आ꣡स꣢ते । इ꣢न्द्रे꣣ का꣡मं꣢ जरि꣣ता꣡रो꣢ वसू꣣य꣢वो꣣ र꣢थे꣣ न꣢꣫ पाद꣣मा꣡ द꣢धुः ॥१६७६॥
पदार्थःहे जगदीश्वर ! (इमे हि) ये (ते) तेरे लिए (ब्रह्मकृतः) स्तोत्र-पाठ करनेवाले उपासक (सुते) उपासना-यज्ञ में (सचा) एक साथ मिलकर (आसते) बैठे हुए हैं, (मधौ न) शहद के छत्ते पर जैसे (मक्षः) मधु-मक्खियाँ (सचा) मिलकर (आसते) बैठी होती हैं। (वसूयवः) अध्यात्म धन के इच्छुक (जरितारः) स्तोता गण (इन्द्रे) परमैश्वर्यशाली तुझ जगदीश्वर में (कामम्) अपनी अभिलाषा को (आदधुः) रखे हुए हैं, संजोये हुए हैं, (वसूयवः) भौतिक धन के इच्छुक लोग (रथे न) जैसे रथ में (पादम्) अपना पैर रखते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःमधु बनानेवाली मधुमक्खियाँ जैसे मधु के छत्ते पर बैठती हैं, वैसे ही उपासना करनेवाले लोग उपासनागृह में बैठते हैं और जैसे भौतिक धन-धान्य आदि अन्य स्थान से लाने के इच्छुक लोग रथ में अपना पैर रखते हैं, वैसे ही सत्य, अहिंसा, योगैश्वर्य आदि के अभिलाषी लोग परमात्मा में अपनी कामना को रख देते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
अ꣡स्ता꣢वि꣣ म꣡न्म꣢ पू꣣र्व्यं꣡ ब्रह्मेन्द्रा꣢꣯य वोचत । पू꣣र्वी꣢रृ꣣त꣡स्य꣢ बृह꣣ती꣡र꣢नूषत स्तो꣣तु꣢र्मे꣣धा꣡ अ꣢सृक्षत ॥१६७७॥
पदार्थः(पूर्व्यम्) सनातन (मन्म) वेद-स्तोत्र, मेरे द्वारा (अस्तावि) प्रस्तुत किया जा रहा है। हे साथियो ! तुम भी (इन्द्राय) जगदीश्वर के लिए (ब्रह्म) स्तोत्र (वोचत) पाठ करो। (ऋतस्य) सत्यमय वेद की(पूर्वीः) श्रेष्ठ (बृह्तीः) बृहती छन्दवाली ये ऋचाएँ (अनूषत) जगदीश्वर की स्तुति कर रही हैं। (स्तोतुः) स्तोता की (मेधाः)धारणावती बुद्धियाँ (असृक्षत) उत्पन्न हो रही हैं ॥१॥
भावार्थःसामगान द्वारा परमेश्वर की स्तुति करने से स्तोताओं की ऋतम्भरा प्रज्ञाएँ उत्पन्न हो जाती हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
स꣢꣫मिन्द्रो꣣ रा꣡यो꣢ बृह꣣ती꣡र꣢धूनुत꣣ सं꣢ क्षो꣣णी꣢꣫ समु꣣ सू꣡र्य꣢म् । स꣢ꣳ शु꣣क्रा꣢सः꣣ शु꣡च꣢यः꣣ सं꣡ गवा꣢꣯शिरः꣣ सो꣢मा꣣ इ꣡न्द्र꣢ममन्दिषुः ॥१६७८॥
पदार्थः(इन्द्रः) जगदीश्वर (बृहतीः) विस्तीर्ण (रायः) सम्पदाओं को (सम् अधूनुत) भली-भाँति प्रेरित करता है, (क्षोणी) द्युलोक और भूलोक को (सम्) भली-भाँति प्रेरित करता है, (उ) और (सूर्यम्)सूर्य को (सम्) भली-भाँति प्रेरित करता है, (शुक्रासः) तेजस्वी, (शुचयः) पवित्र आचरणवाले लोग (इन्द्रम्) जगदीश्वर को (सम् अमन्दिषुः) भली-भाँति आनन्दित करते हैं और (गवाशिरः) तेजों से परिपक्व (सोमाः॑) श्रद्धारस (इन्द्रम्) जगदीश्वर को (सम् अमन्दिषुः) भली-भाँति आनन्दित करते हैं ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर ने ही सब सम्पदाएँ हमें प्रदान की हैं और वही सूर्य, पवन, द्यावापृथिवी आदि की व्यवस्था को सञ्चालित कर रहा है। अतः सबको चाहिए कि पवित्र अन्तः करणवाले होकर श्रद्धा से उसकी उपासना करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ पा꣡त꣢वे वृत्र꣣घ्ने꣡ परि꣢꣯ षिच्यसे । न꣡रे꣢ च꣣ द꣡क्षि꣢णावते वी꣣रा꣡य꣢ सदना꣣स꣡दे꣢ ॥१६७९॥
पदार्थःहे (सोम) मेरे भक्तिरस ! तू (वृत्रघ्ने) पाप-विनाशक, (दक्षिणावते) दानी, (वीराय) काम आदि षड़् रिपुओं को विशेष रूप से कम्पायमान करनेवाले, (सदनासदे) हृदय-सदन में स्थित (नरे च) और नेतृत्व करनेवाले (इन्द्राय) जगदीश्वर के (पातवे) पान करने के लिए (परिषिच्यसे) प्रवाहित किया जा रहा है ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा के भक्त लोग पाप-कर्मों का परित्याग करके, प्रचुर ऐश्वर्य प्राप्त करके सब आन्तरिक और बाह्य विघ्नों को नष्ट करने में समर्थ हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
त꣡ꣳ स꣢खायः पुरू꣣रु꣡चं꣢ व꣣यं꣢ यू꣣यं꣢ च꣢ सू꣣र꣡यः꣢ । अ꣣श्या꣢म꣣ वा꣡ज꣢गन्ध्यꣳ स꣣ने꣢म꣣ वा꣡ज꣢पस्त्यम् ॥१६८०॥
पदार्थःहे (सखायः) साथियो ! (वयं यूयं च सूरयः) हम और तुम मेधावी उपासक (तम्) उस प्रसिद्ध, (पुरूरुचम्) बहुत तेजस्वी, (वाजगन्ध्यम्) आत्मबल को ग्रहण करानेवाले रसागार सोम प्रभु को (अश्याम) प्राप्त कर लें, (वाजपस्त्यम्) विज्ञान की प्राप्ति करानेवाले शुभगुणकर्मप्रेरक सोम जगदीश्वर को (सनेम) भज लें ॥२॥
भावार्थःसब साथी मिलकर श्रद्धा से तरङ्गित होते हुए यदि परमात्मा की उपासना करते हैं, तो तेज, बल, विज्ञान आदि की प्राप्ति निरन्तर होती रहती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - गान्धारः
प꣢रि꣣ त्य꣡ꣳ ह꣢र्य꣣त꣡ꣳ हरिं꣢꣯ ब꣣भ्रुं꣡ पु꣢नन्ति꣣ वा꣡रे꣢ण । यो꣢ दे꣣वा꣢꣫न्विश्वाँ꣣ इ꣢꣯त्परि꣣ म꣡दे꣢न स꣣ह गच्छ꣢꣯ति ॥१६८१॥
पदार्थःयोगाभ्यासी लोग (त्यम्) उस (हर्यतम्) चाहने योग्य, (बभ्रुम्) इन्द्रियों को विषय ग्रहण में सहायता देनेवाले, (हरिम्) ज्ञान के ग्रहण में साधनभूत मन को (वारेण) अशुद्धि-निवारक योगानुष्ठान से (परि पुनन्ति) पवित्र करते हैं, (यः) जो मन (मदेन सह) उत्साह के साथ (विश्वान् देवान् इत्) सभी इन्द्रियों में (परि गच्छति) उन-उनके विषय को ग्रहण कराने के लिए परिव्याप्त होता है, [क्योंकि मन का व्यापार न हो तो इन्द्रियां विषय को ग्रहण नहीं कर सकतीं] ॥३॥
भावार्थःमनुष्यों का मन यदि दूषित हो तो वह इन्द्रियों को कुमार्ग पर ही ले जाता है। इसलिए अध्यात्म-जीवन के लिए और परमात्मा के दर्शन के लिए उसका शोधन अत्यन्त आवश्यक है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
कस्तमि꣢꣯न्द्र त्वावस꣣वा मर्त्यो꣢꣯ दधर्षति । श्र꣣द्धा हि ते꣢꣯ मघव꣣न् पा꣡र्ये꣢ दि꣣वि꣢ वा꣣जी वाजं꣢꣯ सिषासति ॥१६८२॥
पदार्थः(त्वावसो) तुम स्वयं ही जिस के धन हो, ऐसे (इन्द्र) हे जगदीश! (तम्) आपमें श्रद्धा रखनेवाले आपके भक्त को (कः मर्त्यः)भला कौन मनुष्य (आ दधर्षति) पराजित कर सकता है, अर्थात् कोई नहीं। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् ! (ते) आपमें(श्रद्धा) श्रद्धावान् मनुष्य (हि) निश्चय ही (पार्ये दिवि) पार करने योग्य सम्पूर्ण दिन में (वाजी) बल, विज्ञान, अन्न, धन आदि से युक्त होता हुआ (वाजम्) बल, विज्ञान, अन्न, धन आदि (सिषासति) अन्यों को बाँटना चाहता है ॥१॥
भावार्थःवही वस्तुतः परमात्मा का श्रद्धालु होता है, जो उसकी प्रेरणा से श्रेष्ठ कर्म करे और उसकी कृपा से प्राप्त ऐश्वर्य से दीनों की सहायता करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
म꣣घो꣡नः꣢ स्म वृत्र꣣ह꣡त्ये꣢षु चोदय꣣ ये꣡ दद꣢꣯ति प्रि꣣या꣡ वसु꣢꣯ । त꣢व꣣ प्र꣡णी꣢ती हर्यश्व सू꣣रि꣢भि꣣र्वि꣡श्वा꣢ तरेम दुरि꣣ता꣢ ॥१६८३॥
पदार्थःहे (हर्यश्व) परस्पर आकर्षण से युक्त व्याप्त सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि लोकों के स्वामी जगदीश्वर ! आप (मघोनः) धनी मनुष्यों को (वृत्रहत्येषु) जिनमें पापों वा पापी दुष्ट शत्रुओं की हत्या की जाती है, ऐसे देवासुरसङ्ग्रामों में (चोदय) प्रेरित करो, (ये) जो धनी मनुष्य (प्रिया वसु) प्रिय धनों को (ददति) परोपकार के लिए दान करते हैं। (तव प्रणीती) आपके श्रेष्ठ मार्गदर्शन से, हम (सुरिभिः) विद्वान् स्तोताओं सहित (विश्वा दुरिता) सब दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि को (तरेम) तर जाएँ ॥२॥
भावार्थःव्यक्तियों तथा समाज की उन्नति के लिए धन और दान के साथ पापों का संहार तथा विघ्नों पर विजय भी अपेक्षित होती है ॥२॥ इस खण्ड में परमात्मा, मन और श्रद्धा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ अठारहवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
ए꣢दु꣣ म꣡धो꣢र्म꣣दि꣡न्त꣢रꣳ सि꣣ञ्चा꣡ध्व꣢र्यो꣣ अ꣡न्ध꣢सः । ए꣣वा꣢꣫ हि वी꣣र꣡ स्तव꣢꣯ते स꣣दा꣡वृ꣢धः ॥१६८४॥
पदार्थःहे (अध्वर्यो) ब्रह्माण्ड-यज्ञ के सञ्चालक इन्द्र परमात्मन् ! आप(मधोः) मधुर (अन्धसः) आनन्द के (मदिन्तरम्) अतिशय तृप्ति देनेवाले रस को (इत्) निश्चय ही (आ सिञ्च उ) उपासक के अन्तरात्मा में सींचो। (एव हि) इसी प्रकार (वीरः) शूरवीर उपासक (सदावृधः) सदा उन्नत होता हुआ (स्तवते) प्रशंसा पाता है ॥१॥
भावार्थःब्रह्मानन्द-रस से पूर्णतः तृप्त हुआ उपासक सदा वृद्धि और उन्नति पाता हुआ सबका प्रशंसापात्र होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
इ꣡न्द्र꣢ स्थातर्हरीणां꣣ न꣡ कि꣢ष्टे पू꣣र्व्य꣡स्तु꣢तिम् । उ꣡दा꣢नꣳश꣣ श꣡व꣢सा꣣ न꣢ भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१६८५॥
पदार्थः(हरीणाम्) एक-दूसरे का आकर्षण करनेवाले सूर्य, ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र आदि लोकों के और विषयों को ग्रहण करनेवाली देह-स्थित इन्द्रियों के (स्थातः) अधिष्ठाता, हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (ते)आपकी (पूर्व्यस्तुतिम्) श्रेष्ठ स्तुति को (नः किः) न कोई (शवसा) बल से, (न भन्दना) न कल्याण से (उदानंश) लाँघ पाता है ॥२॥
भावार्थःजगदीश्वर से अधिक बलवान् और बल-प्रदाता, कल्याणवान् और कल्याणकर्ता संसार भर में कोई नहीं है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -इन्द्रः| स्वर - ऋषभः
तं꣢ वो꣣ वा꣡जा꣢नां꣣ प꣢ति꣣म꣡हू꣢महि श्रव꣣स्य꣡वः꣢ । अ꣡प्रा꣢युभिर्य꣣ज्ञे꣡भि꣢र्वावृ꣣धे꣡न्य꣢म् ॥१६८६॥
पदार्थःहे साथियो ! (श्रवस्यवः) कीर्ति के इच्छुक हम (वः) तुम्हारे(वाजानाम्) बल, विज्ञान, अन्न, धन आदियों के (पतिम्) स्वामी वा पालनकर्ता और (अप्रायुभिः) बिना प्रमाद के किये जानेवाले(यज्ञेभिः) सृष्टि के उत्पादन, धारण, पालन, न्याय आदि यज्ञों से(वावृधेन्यम्) बढ़ी हुई महिमावाले (तम्) उस इन्द्र जगदीश्वर को(अहूमहि) बुलाते हैं ॥३॥
भावार्थःसबको चाहिए कि संसार में विद्यमान सब ऐश्वर्यों के स्वामी, सदा परोपकाररूप यज्ञ में संलग्न, महामहिम, राजराजेश्वर जगदीश को पुकारें तथा उसकी स्तुति और उपासना करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
तं꣡ गू꣢र्धया꣣꣬ स्व꣢꣯र्णरं दे꣣वा꣡सो꣢ दे꣣व꣡म꣢र꣣तिं꣡ द꣢धन्विरे । दे꣣वत्रा꣢ ह꣣व्य꣡मू꣢हिषे ॥१६८७॥
पदार्थःहे मानव ! तू (तम्) उस प्रसिद्ध, (स्वर्णरम्) ब्रह्मानन्द वा दिव्य प्रकाश को प्राप्त करानेवाले जगन्नायक परमात्मा की(गूर्धय) अर्चना कर। (देवासः) विद्वान्, दिव्य गुणोंवाले लोग, उस (देवम्) प्रकाशक, (अरतिम्) सबके स्वामी जगदीश्वर को (दधन्विरे) अपने आत्मा में धारण करते हैं। हे ज्योतिर्मय देव ! आप (देवत्रा) विद्वान् जनों में (हव्यम्) देने योग्य सद्गुण-समूह को (ऊहिषे) प्राप्त कराओ ॥१॥
भावार्थःजो मनुष्य श्रेष्ठ गुण-कर्म-स्वभाववाले परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे स्वयं भी वैसे हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
वि꣡भू꣢तरातिं विप्र चि꣣त्र꣡शो꣢चिषम꣣ग्नि꣡मी꣢डिष्व य꣣न्तु꣡र꣢म् । अ꣣स्य꣡ मेध꣢꣯स्य सो꣣म्य꣡स्य꣢ सोभरे꣣ प्रे꣡म꣢ध्व꣣रा꣢य꣣ पू꣡र्व्य꣢म् ॥१६८८॥
पदार्थःहे (सोभरे) भले प्रकार स्तोत्रों का उपहार लानेवाले (विप्र) विद्वन् ! तू (विभूतरातिम्) व्यापक दानवाले, (चित्रशोचिषम्) अद्भुत तेजवाले, (अस्य) इस (सोम्यस्य) ब्रह्मानन्द-रूप सोम के सम्पादक (मेधस्य) उपासना-यज्ञ का (यन्तुरम्) नियन्त्रण करनेवाले, (पूर्व्यम्) सनातन (ईम्) इस (अग्निम्) अग्रनेता जगदीश्वर के (अध्वराय) जीवन-यज्ञ की सफलता के लिए (प्र ईडिष्व) भली-भाँति स्तुति का पात्र बना ॥२॥
भावार्थःजीवन-यज्ञ की पूर्णता के लिए मनुष्यों को उपासना-यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - मध्यमः
आ꣡ सो꣢म स्वा꣣नो꣡ अद्रि꣢꣯भिस्ति꣣रो꣡ वारा꣢꣯ण्य꣣व्य꣡या꣢ । ज꣢नो꣣ न꣢ पु꣣रि꣢ च꣣꣬म्वो꣢꣯र्विश꣣द्ध꣢रिः꣣ स꣢दो꣣ व꣡ने꣢षु दध्रिषे ॥१६८९॥
पदार्थःहे (सोम) ज्ञानरस का आस्वादन करनेवाले जीवात्मन् ! (अद्रिभिः) आदर के योग्य गुरुजनों से (स्वानः) प्रेरणा किया जाता हुआ तू (अव्यया) भौतिक (वाराणि) आच्छादक विघ्न आदि को (तिरः) तिरस्कृत कर दे। आगे परोक्ष रूप में कहते हैं—यह (हरिः) ज्ञान का आहरण करनेवाला जीवात्मा (चम्वोः) मस्तिष्क और हृदय में (विशत्) प्रवेश करता है, (जनः न) जैसे कोई मनुष्य (पुरि) नगरी में प्रविष्ट होता है। आगे फिर प्रत्यक्ष रूप में कहते हैं—हे जीवात्मन् ! तू (वनेषु) सेवनीय इन्दिर्यों और प्राणों में (सदः) निवास को (दध्रिषे) धारण करता है ॥१॥
भावार्थःजो यह जीवात्मा देह में प्रविष्ट होकर अणु परिमाण वाला भी होता हुआ अपने सामर्थ्य से अङ्ग-अङ्ग में प्रवेश किये रहता है, उसे चाहिए कि जीवन में वा योग-मार्ग में आये हुए सब विघ्नों को दूर करके विजय प्राप्त करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - पञ्चमः
स꣡ मा꣢मृजे ति꣣रो꣡ अण्वा꣢꣯नि मे꣣꣬ष्यो꣢꣯ मी꣣ढ्वा꣢꣫न्त्सप्ति꣣र्न꣡ वा꣢ज꣣युः꣢ । अ꣣नु꣢माद्यः꣣ प꣡व꣢मानो मनी꣣षि꣢भिः꣣ सो꣢मो꣣ वि꣡प्रे꣢भि꣣रृ꣡क्व꣢भिः ॥१६९०॥
पदार्थः(वाजयुः) अन्न के इच्छुक (सप्तिः न) घोड़े के समान (वाजयुः) बल और विज्ञान का इच्छुक, (मीढ्वान्) अन्यों पर सुख सींचनेवाला, (मेष्यः) ज्ञान का सिञ्चन करनेवाली वेदवाणी के (अण्वानि) सूक्ष्म विज्ञान-तत्त्वों को (तिरः) प्राप्त करके (पवमानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (सः) वह (सोमः) जीवात्मा (मनीषिभिः) मननशील (ऋक्वभिः) वेदज्ञ (विप्रेभिः) विद्वानों के द्वारा (अनुमाद्यः) हर्षित किये जाने योग्य होता हुआ (मामृजे) श्रेष्ठ गुण-कर्मों से अलङ्कृत किया जाता है ॥२॥ यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि वेद पढ़कर, अपने आत्मा की शक्ति को जान कर, सदाचारी विद्वानों के सङ्ग से अपनी उन्नति निरन्तर किया करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
व꣣य꣡मे꣢नमि꣣दा꣡ ह्योऽपी꣢꣯पेमे꣣ह꣢ व꣣ज्रि꣡ण꣢म् । त꣡स्मा꣢ उ अ꣣द्य꣡ सव꣢꣯ने सु꣣तं꣢ भ꣣रा꣢ नू꣣नं꣡ भू꣢षत श्रु꣣ते꣢ ॥१६९१॥
पदार्थः(वयम्) हम कर्मयोगी लोगों ने (एनम्) इस (वज्रिणम्) वाणी-रूप वज्र से युक्त अपने अन्तरात्मा को (इदा) इस काल में और(ह्यः) बीते काल में (इह) इस जीवन-यज्ञ में (अपीपेम) बढ़ाया है। हे भाई ! तू भी (तस्मै उ) उस अन्तरात्मा के लिए (अद्य) आज (सवने) कर्मयोग-रूप यज्ञ में (सुतम्) अभिषुत वीर रस को (भर) अर्पित कर। हे साथियो ! तुम सभी (नूनम्) निश्चय ही(श्रुते) शास्त्र-ज्ञान में, अपने अन्तरात्मा को (आभूषत) अलङ्कृत करो ॥१॥
भावार्थःसब मनुष्यों को चाहिए कि अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर वीरता पूर्ण कर्म करें और विविध विद्याओं के ज्ञान का सञ्चय करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
वृ꣡क꣢श्चिदस्य वार꣣ण꣡ उ꣢रा꣣म꣢थि꣣रा꣢ व꣣यु꣡ने꣢षु भूषति । से꣢꣫मं न꣣ स्तो꣡मं꣢ जुजुषा꣣ण꣢꣫ आ ग꣣ही꣢न्द्र꣣ प्र꣢ चि꣣त्र꣡या꣢ धि꣣या꣢ ॥१६९२॥
पदार्थः(वारणः) रोग आदि के निवारक, (उरामथिः) फैले हुए अँधेरे को नष्ट करनेवाले (वृकःचित्) सूर्य के समान (अस्य) इन आप जगदीश्वर का (वारणः) दुःख आदि का निवारक प्रताप (वयुनेषु) आपके कर्मों में (आ भूषति) भूषण-रूप है। (सः) वह आप, हे (इन्द्र) परमात्मन् ! (नः) हमारे (इमम्) इस (स्तोमम्) स्तोत्र को (जुजुषाणः) सेवन करते हुए (चित्रया धिया) अद्भुत प्रज्ञा वा क्रिया के साथ (प्र आ गहि) भली-भाँति हमारे पास आओ ॥२॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजिस जगदीश्वर का प्रताप सूर्य के प्रकाश के समान सर्वत्र फैल रहा है, उसकी सबको श्रद्धा के साथ उपासना करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी रोच꣣ना꣢ दि꣣वः꣢꣫ परि꣣ वा꣡जे꣢षु भूषथः । त꣡द्वां꣢ चेति꣣ प्र꣢ वी꣣꣬र्य꣢꣯म् ॥१६९३॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (युवाम्) तुम दोनों (वाजेषु) देवासुरसङ्ग्रामों में (दिवः) प्रकाशक परमात्मा की (रोचना)ज्योति को (परि भूषथः) चारों ओर से प्राप्त करते हो। (तत्) वह प्रसिद्ध (वाम्) तुम दोनों का (वीर्यम्) बल (प्र चेति) सब के द्वारा प्रकृष्टरूप से जाना जाता है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य के आत्मा और मन को योग्य है कि आन्तरिक देवासुरसङ्ग्रामों में सब आसुरी भावों को पराजित करके परमात्मा की प्राप्ति के लक्ष्य तक पहुँचें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ अ꣡प꣢स꣣स्प꣢꣫र्युप꣣ प्र꣡ य꣢न्ति धी꣣त꣡यः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ प꣣थ्या꣢३ अ꣡नु꣢ ॥१६९४॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (धीतयः) ज्ञान (अपसः परि) कर्मों में ही (उप प्रयन्ति) परिसमाप्त हुआ करते हैं। अतः तुम दोनों(ऋतस्य) सत्य कर्म के (पथ्याः) मार्गों का (अनु) अनुसरण करो ॥२॥
भावार्थःकर्महीन अकेले ज्ञान शोभा नहीं पाते ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी तवि꣣षा꣡णि꣢ वां स꣣ध꣡स्था꣢नि꣣ प्र꣡याँ꣢सि च । यु꣣वो꣢र꣣प्तू꣣र्यं꣢ हि꣣त꣢म् ॥१६९५॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (वाम्) तुम दोनों के (तविषाणि) बल (प्रयांसि च) और प्रयत्न (सधस्थानि) साथ मिलकर होते हैं।(युवोः) तुम दोनों का (अप्तूर्यम्) कर्मों की शीघ्रता का गुण(हितम्) हितकर होता है ॥३॥
भावार्थःमनुष्य का आत्मा और मन परस्पर मिलकर ही ज्ञान एकत्र करके, पुरुषार्थ करके बल तथा कर्मों में सिद्धि प्राप्त करते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
क꣡ ईं꣢ वेद सु꣣ते꣢꣫ सचा꣣ पि꣡ब꣢न्तं꣣ कद्वयो꣢꣯ दधे । अ꣣यं यः पुरो꣢꣯ विभि꣣नत्त्योज꣢꣯सा मन्दा꣣नः꣢ शि꣣प्र्य꣡न्ध꣢सः ॥१६९६॥
पदार्थः(सुते) उपासक के भक्ति-रस के अभिषुत होने पर (सचा) एक साथ (ईम्) इस भक्ति-रस को (पिबन्तम्) पीते हुए इन्द्र परमात्मा को (कः वेद) कौन जानता है? (कत्) कब, वह उपासक के अन्तरात्मा में (वयः) आनन्द-रस को (दधे) रख देता है, यह भी (कः वेद) कौन जानता है? आगे इसका उत्तर दिया गया है—(अयं यः) यह जो (शिप्री) विस्तीर्ण बलवाला उपासक (अन्धसः) आनन्द-रस से (मन्दानः) उत्साह प्राप्त करता हुआ (ओजसा) आत्म-बल से (पुर) आन्तरिक असुरों की किलेबन्दियों को (विभिनत्ति) तोड़-फोड़ देता है, वही जानता है ॥१॥
भावार्थःकैसे परमात्मा भक्त के भक्तिरस में डूब जाता है और कैसे उपासक भगवान् के ब्रह्मानन्द-रस में डूबता है, इस बात को आत्मसमर्पक भगवद्-भक्त ही जानता है, दूसरा कोई, जिसने भक्त्ति का प्रसाद अनुभव नहीं किया, इस बात को नहीं जान सकता ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
दा꣣ना꣢ मृ꣣गो꣡ न वा꣢꣯र꣣णः꣡ पु꣢रु꣣त्रा꣢ च꣣र꣡थं꣢ दधे । न꣡ कि꣢ष्ट्वा꣣ नि꣡ य꣢म꣣दा꣢ सु꣣ते꣡ ग꣢मो म꣣हा꣡ꣳश्च꣢र꣣स्यो꣡ज꣢सा ॥१६९७॥
पदार्थः(वारण) हाथी (मृगः) पशु (न) जैसे (चरथम्) गण्डस्थलों पर बहनेवाले (दाना) मदजल को (दधे) धारण करता है, वैसे ही (वारणः) विपत्तियों का निवारणकर्ता, (मृगः) सज्जनों को खोजनेवाला इन्द्र जगदीश्वर (पुरुत्रा) बहुत अधिक (चरथम्) सञ्चार करनेवाले (दाना) आनन्द-दान को (दधे) धारण करता है। हे इन्द्र जगदीश्वर ! आप (सुते) हमारे भक्तिरस के उमड़ने पर (आ गमः) आओ। (त्वा) आते हुए आपको (न किः) कोई नहीं (नि यमत्) रोक सके। (महान्) महान् आप (ओजसा) प्रताप के साथ (चरसि) सर्वत्र व्याप्त हो ॥२॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे हाथी गण्डस्थलों पर मदजल प्रवाहित करता है, वैसे ही परमेश्वर उपासकों के प्रति आनन्द-रस को बहाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣢ उ꣣ग्रः꣡ सन्ननि꣢꣯ष्टृतः स्थि꣣रो꣡ रणा꣢꣯य꣣ स꣡ꣳस्कृ꣢तः । य꣡दि꣢ स्तो꣣तु꣢र्म꣣घ꣡वा꣢ शृ꣣ण꣢व꣣द्ध꣢वं꣣ ने꣡न्द्रो꣢ योष꣣त्या꣡ ग꣢मत् ॥१६९८॥
पदार्थः(यः) जो इन्द्र जगदीश्वर (उग्रः सन्) अधार्मिकों के लिए प्रचण्ड होता हुआ (अनिष्टृतः) उनसे अहिंसित रहता है और (स्थिरः) अविचल होता हुआ (रणाय) असुरों के साथ युद्ध के लिए (संस्कृतः) सज्जित हो जाता है, वह (मघवा) ऐश्वर्यवान् (इन्द्रः) जगदीश्वर (यदि) यदि (स्तोतुः) उपासक के (हवम्) आह्वान को (शृणवत्) सुन ले, तो (न योषति) उससे अलग न खड़ा रहे, प्रत्युत (आ गमत्) उसके अन्तःकरण में आ जाए ॥३॥
भावार्थःउपासक के हृदय से निकली हुई पुकार को जगदीश्वर अवश्य सुनता है और दस्युओं के साथ युद्ध में उसे बल देकर उसकी सहायता करता है ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा, उपास्य-उपासक का सम्बन्ध, आत्मा और मन, इन विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ अठारहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢माना असृक्षत꣣ सो꣡माः꣢ शु꣣क्रा꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः । अ꣣भि꣡ विश्वा꣢꣯नि꣣ का꣡व्या꣢ ॥१६९९॥
पदार्थः(पवमानाः) स्वयं को तथा दूसरों को पवित्र करते हुए, (शुक्रासः)तेजस्वी, (इन्दवः) अपने काव्य-रस से सहृदयों को भिगोनेवाले(सोमाः) शान्त विद्वान् कविजन ही (विश्वानि काव्या) सब भक्तिरस के काव्यों की (असृक्षत) सर्जना करते हैं ॥१॥
भावार्थःभगवान् के उपासक कविजन ही भक्तिरस के काव्यों की सर्जना में समर्थ होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢माना दि꣣व꣢꣫स्पर्य꣣न्त꣡रि꣢क्षादसृक्षत । पृ꣣थिव्या꣢꣫ अधि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१७००॥
पदार्थःपरमात्मा से रची हुई (पवमानाः) पवित्र करनेवाली सूर्य-रश्मियाँ(दिवः परि) द्युलोक से और (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष से(पृथिव्याः) भूमि के (सानवि अधि) उच्च प्रदेशों पर (असृक्षत) सूर्य-ताप और मेघ-जल को बरसाती हैं ॥२॥
भावार्थःयदि सूर्य न हो तो भूमि पर प्रकाश, ताप, वर्षा, ऋतुओं आदि का निर्माण कुछ भी न हो, सब जगह घोर अँधेरा व्यापा रहे। ऐसा अद्भुत सूर्य परमात्मा ने ही रचा है, इसलिए उसी की वह महिमा है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢मानास आ꣣श꣡वः꣢ शु꣣भ्रा꣡ अ꣢सृग्र꣣मि꣡न्द꣢वः । घ्न꣢न्तो꣣ वि꣢श्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥१७०१॥
पदार्थः(पवमानासः) पवित्र करनेवाले, (आशवः) वेगगामी, (शुभ्राः) निर्मल (इन्दवः) सराबोर करनेवाले ब्रह्मानन्द-रस (विश्वाः) सब (द्विषः) द्वेष-वृत्तियों को (अप घ्नन्तः) विनष्ट करते हुए (असृग्रम्) अन्तरात्मा में बह रहे हैं ॥३॥
भावार्थःजब परमात्मा की उपासना से ब्रह्मानन्द-रस स्तोता के अन्तरात्मा में आते हैं, तब सब द्वेष-वृत्तियाँ स्वयं समाप्त हो जाती हैं और विश्व-मैत्री की भावना जाग जाती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
तो꣣शा꣡ वृ꣢त्र꣣ह꣡णा꣢ हुवे स꣣जि꣢त्वा꣣ना꣡प꣢राजिता । इ꣣न्द्राग्नी꣡ वा꣢ज꣣सा꣡त꣢मा ॥१७०२॥
पदार्थः(तोशा) तेजस्वी वा बढ़ानेवाले, (वृत्रहणा) पाप को नष्ट करनेवाले, (सजित्वाना) साथ मिलकर विजय लाभ करनेवाले, (अपराजिता) पराजित न होनेवाले, (वाजसातमा) बल के अतिशय दाता (इन्द्राग्नी) ब्रह्म और क्षत्र को, मैं (हुवे) बुलाता हूँ ॥१॥
भावार्थःसमष्टि रूप से राष्ट्र में और व्यष्टि रूप से व्यक्ति में विद्यमान, प्रवृद्ध, ब्रह्मबल और क्षात्रबल से राष्ट्र तथा मनुष्य बाह्य और आन्तरिक शत्रुओं को पराजित करके सदा विजयी होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
प्र꣡ वा꣢मर्चन्त्यु꣣क्थि꣡नो꣢ नीथाविदो जरितारः । इन्द्राग्नी इष आ वृणे ॥१७०३
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) ब्राह्मण-क्षत्रियो ! (उक्थिनः) गुणों के प्रशंसक, (नीथाविदः) नीतिज्ञ, (जरितारः) ज्ञानवृद्ध लोग (वाम्) तुम्हारी (प्र अर्चन्ति) प्रशंसा करते हैं। मैं तुमसे (इषः) अभीष्ट लाभों को (आवृणे) ग्रहण करता हूँ ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों के चाहिए कि उत्कृष्ट ब्राह्मणों और क्षत्रियों को एकत्र करके राष्ट्र को उन्नत करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्राग्नी| स्वर - षड्जः
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी नव꣣तिं꣡ पुरो꣢꣯ दासपत्नीरधूनुतम् । साकमेकेन कर्मणा ॥१७०४॥
पदार्थःहे (इन्द्राग्नी) ब्राह्मणो और क्षत्रियो ! (एकेन) अद्वितीय (कर्मणा) पुरुषार्थ से (साकम्) एक साथ तुम दोनों (दासपत्नीः) विनाशक काम-क्रोध आदि वा अधार्मिक दुष्ट जन जिनके स्वामी हैं, ऐसी (नवतिं पुरः) नव्वे शत्रु-नगरियों को (अधूनुतम्) कम्पायमान कर दो ॥३॥
भावार्थःब्राह्मणों को विद्या तथा ब्रह्मवर्चस का प्रसार करके और क्षत्रियों को शत्रुओं से रक्षा करके राष्ट्र की उन्नति करनी चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ त्वा र꣣ण्व꣡सं꣢दृशं꣣ प्र꣡य꣢स्वन्तः सहस्कृत । अ꣡ग्ने꣢ ससृ꣣ज्म꣢हे꣣ गि꣡रः꣢ ॥१७०५॥
पदार्थःहे (सहस्कृत) आत्मबल से हृदय में प्रकट किये गये (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! (प्रयस्वन्तः) प्रयत्नवान् हम (रण्वसन्दृशम्) रमणीय दर्शनवाले (त्वा) आपके प्रति (गिरः) स्तुति-वाणियों को (उप ससृज्महे) उच्चारण करते हैं ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की स्तुति के साथ मनुष्यों को प्रयत्न भी करना चाहिए, तभी अभीष्ट कामनाएँ पूर्ण होती हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ च्छा꣣या꣡मि꣢व꣣ घृ꣢णे꣣र꣡ग꣢न्म꣣ श꣡र्म꣢ ते व꣣य꣢म् । अ꣢ग्ने꣣ हि꣡र꣢ण्यसन्दृशः ॥१७०६॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक, सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! (वयम्) हम आपके उपासक (हिरण्यसंदृशः) सोने के समान रमणीय (ते) आपकी (शर्म) शरण में (अगन्म) पहुँच गये हैं, (घृणेः) सूर्य के ताप से हटकर (छायाम् इव) जैसे छाया में पहुँचते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२
भावार्थःजैसे सूर्य की धूप से तपे हुए सिरवाला, पसीने से तर-बतर शरीरवाला, गर्मी से व्याकुल कोई मनुष्य विश्राम के लिए वृक्ष आदि की छाया का आश्रय लेता है, वैसे ही आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक विविध कष्टों से व्याकुल लोग विश्राम पाने के उद्देश्य से यदि परमात्मा की शरण में पहुँचते हैं, तो वे सब दुःखों से छूटकर अत्यन्त आनन्दवान् हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣢ उ꣣ग्र꣡ इ꣢व शर्य꣣हा꣢ ति꣣ग्म꣡शृ꣢ङ्गो꣣ न꣡ वꣳस꣢꣯गः । अ꣢ग्ने꣣ पु꣡रो꣢ रु꣣रो꣡जि꣢थ ॥१७०७॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक, तेजस्वी जगदीश ! (यः) जो आप (उग्रः इव) प्रचण्ड धनुर्धारी के समान (शर्यहा) वध करने योग्य काम, क्रोध आदि शत्रुओं के और व्याधि, स्त्यान आदि योग-विघ्नों के विनाशक, (तिग्मश्रृङ्गः न) तीक्ष्ण किरणोंवाले सूर्य के समान (वंसगः) चारु गतिवाले तथा सेवनीय होते हुए (पुरः) शत्रु की नगरियों वा किलेबन्दियों को (रुरोजिथ) तोड़-फोड़ डालते हो, ऐसी आपकी शरण में हम पहुँचते हैं ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना से बल पाकर मनुष्य सब आन्तरिक शत्रुओं तथा योग के विघ्नों को पराजित करके लक्ष्य के प्रति जागरूक होता हुआ अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त कर लेता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ऋ꣣ता꣡वा꣢नं वैश्वान꣣र꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ ज्यो꣡ति꣢ष꣣स्प꣡ति꣢म् । अ꣡ज꣢स्रं घ꣣र्म꣡मी꣢महे ॥१७०८॥
पदार्थः(ऋतावानम्) सत्यमय, (वैश्वानरम्) सब मनुष्यों के हितकर्ता, (ऋतस्य) जल वा धन के और (ज्योतिषः) ज्योति के (पतिम्) स्वामी वा पालक जगदीश्वर से हम (अजस्रम्) अक्षय (घर्मम्) तेज वा प्रताप को (ईमहे) माँगते हैं ॥१॥
भावार्थःजो स्वयं प्रतापी, तेजस्वी और सत्यमय होता है, वही दूसरों को वैसा बना सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
य꣢ इ꣣दं꣡ प्र꣢तिपप्र꣣थे꣢ य꣣ज्ञ꣢स्य꣣꣬ स्व꣢꣯रुत्ति꣣र꣢न् । ऋ꣣तू꣡नुत्सृ꣢꣯जते व꣣शी꣢ ॥१७०९
पदार्थः(यः) जो जगदीश्वर (इदम्) इस ब्रह्माण्ड को (प्रतिपप्रथे) फैलाता है और (यज्ञस्य) प्रकाश प्रदाता सूर्य के (स्वः) प्रकाश को (उत्तिरन्) बिखेरता हुआ, (वशी) जगत् की व्यवस्था को चाहता हुआ (ऋतून) वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा आदि ऋतुओं को (उत्सृजते) रचता है, उस जगदीश्वर से हम [‘अजस्रं घर्मम् ईमहे’] अक्षय प्रताप वा तेज माँगते हैं। [यहाँ ‘अजस्रं घर्मम् ईमहे’ यह अंश वाक्यपूर्ति के लिए पूर्व मन्त्र से लाया गया है] ॥२॥
भावार्थःअहो ! जगत्पति की यह कैसी अद्भुत महिमा है कि वह सूर्य को उत्पन्न करके उसके द्वारा सारे सौरमण्डल को भली-भाँति सञ्चालित कर रहा है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्निः꣢ प्रि꣣ये꣢षु꣣ धा꣡म꣢सु꣣ का꣡मो꣢ भू꣣त꣢स्य꣣ भ꣡व्य꣢स्य । स꣣म्रा꣢꣫डेको꣣ वि꣡रा꣢जति ॥१७१०॥
पदार्थः(भूतस्य) जो उत्पन्न हो चुका है, उसे और (भवस्य) जो भविष्य में उत्पन्न होता है, उसे (कामः) इच्छाशक्ति द्वारा पञ्चभूतों से रचनेवाला (अग्निः) अग्रनायक जगदीश्वर (प्रियेषु) प्रिय (धामसु) लोकों में (एकः) एक अद्वितीय (सम्राट्) चक्रवर्ती राजा होता हुआ (वि राजति) विशेष रूप से शोभा पा रहा है ॥३॥
भावार्थःएक परमेश्वर ही सब भूत, वर्तमान और भावी पदार्थों का शिल्पी तथा सब लोकों का चक्रवर्ती सम्राट् होता हुआ ब्रह्माण्ड की सब व्यवस्था का सञ्चालन करता है ॥३॥ इस खण्ड में भक्त्तिकाव्य, सूर्य-किरण, ब्रह्म-क्षत्र तथा जगदीश्वर के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ अठारहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ अष्टम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्निः꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना꣣ शु꣡म्भा꣢नस्त꣣न्वा३ꣳ स्वा꣢म् । क꣣वि꣡र्विप्रे꣢꣯ण वावृधे ॥१७११॥
पदार्थः(कविः) मेधावी, क्रान्तद्रष्टा जीवात्मा (प्रत्नेन जन्मना) पुरातन जन्म से अर्थात् पूर्व जन्म में किये हुए कर्मों के संस्कारवश (स्वाम्) अपने इस जन्म में प्राप्त (तन्वम्) शरीर को (शुम्भानः) सुशोभित करता हुआ (विप्रेण) विशेषतया ज्ञान से पूर्ण करनेवाले आचार्य के द्वारा (वावृधे) उन्नति प्राप्त करता है ॥१॥
भावार्थःपूर्व जन्म में किये हुए कर्मों का फल भोगने के लिए और नवीन कर्म करने के लिए जीव मानव-जन्म प्राप्त करता है। माता के गर्भ से उत्पन्न होकर, माता-पिता से यथायोग्य पालित और शिक्षित हो, गुरुकुल में प्रवेश पाकर, आचार्य से विद्या ग्रहण कर, कर्तव्य-अकर्तव्य जान कर, सत्कर्म करके वह अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
ऊ꣣र्ज्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣मा꣡ हु꣢वे꣣ऽग्निं꣡ पा꣢व꣣क꣡शो꣢चिषम् । अ꣣स्मि꣢न्य꣣ज्ञे꣡ स्व꣢ध्व꣣रे꣢ ॥१७१२॥
पदार्थःमैं (अस्मिन्) इस (स्वध्वरे) शुभ अहिंसाव्रताचारवाले (यज्ञे) जीवन-यज्ञ में (ऊर्जः) आत्मबल और प्राणशक्ति को (नपातम्) न गिरने देनेवाले, प्रत्युत बढ़ानेवाले, (पावकशोचिषम्) शोधक ज्योतिवाले (अग्निम्) अग्रनायक परमेश्वर को (आहुवे) पुकारता हूँ ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि वे परमात्मा की उपासना से सत्प्रेरणा लेकर अपने जीवन को पवित्र और उन्नत करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣡ नो꣢ मित्रमह꣣स्त्व꣡मग्ने꣢꣯ शु꣣क्रे꣡ण꣢ शो꣣चि꣡षा꣢ । दे꣣वै꣡रा स꣢꣯त्सि ब꣣र्हि꣡षि꣢ ॥१७१३॥
पदार्थः(मित्रमहः) जिसका तेज हमारा मित्र बनता है ऐसे, हे (अग्ने) अग्रनायक परमेश ! (सः) वह (नः) हमारे सखा (त्वम्) आप जगदीश (शुक्रेण) पवित्र (शोचिषा) ज्योति के साथ और (देवैः) दिव्य गुणों के साथ (बर्हिषि) हमारे हृदयान्तरिक्ष में (आ सत्सि) आकर बैठो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से मनुष्य प्रकाश को और दिव्य गुणों को प्राप्त कर सकते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣢त्ते꣣ शु꣡ष्मा꣢सो अस्थू꣣ र꣡क्षो꣢ भि꣣न्द꣡न्तो꣢ अद्रिवः । नु꣣द꣢स्व꣣ याः꣡ प꣢रि꣣स्पृ꣡धः꣢ ॥१७१४॥
पदार्थःहे (अद्रिवः) किसी से विदीर्ण न किये जा सकने योग्य पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक सद्गुणकर्मप्रेरक जगदीश ! (ते) आपके (शुष्मासः) बल (रक्षः) काम, क्रोध, आदि छहों रिपुओं को और व्याधि, स्त्यान, संशय आदि योग-मार्ग के विघ्नों को (भिन्दन्तः) तोड़ते-फोड़ते हुए (अस्थुः) दृढ़ता से स्थित रहते हैं। (याः परिस्पृधः) जो स्पर्धाशील आन्तरिक वा बाह्य शत्रु-सेनाएँ हैं उन्हें आप (नुदस्व) परे खदेड़ दो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर की आराधना से मनुष्य सब आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को जीतने के लिए अपार बल, साहस और उद्बोधन प्राप्त करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣या꣡ नि꣢ज꣣घ्नि꣡रोज꣢꣯सा रथस꣣ङ्गे꣡ धने꣢꣯ हि꣣ते꣢ । स्त꣢वा꣣ अ꣡बि꣢꣯भ्युषा हृ꣣दा꣢ ॥१७१५॥
पदार्थःहे पवमान सोम ! हे पवित्रतादायक सर्वान्तर्यामी जगदीश ! आप (अया) इस (ओजसा) बल से (निजघ्निः) काम-क्रोध आदि शत्रुओं को विनष्ट करनेवाले हो। (रथसङ्गे) मानव-देह रूप रथ की प्राप्ति होने पर (धने हिते) दिव्य ऐश्वर्य को पाने के लिए, मैं (अबिभ्युषा) निर्भय (हृदा) हृदय से, (स्तवै) आपकी स्तुति करता हूँ ॥२॥
भावार्थःहार्दिक श्रद्धा से स्तुति किया गया जगदीश्वर स्तोता को आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को विनष्ट करने के लिए बल प्रदान करके उसका उपकार करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡स्य꣢ व्र꣣ता꣢नि꣣ ना꣢꣫धृषे꣣ प꣡व꣢मानस्य दू꣣꣬ढ्या꣢꣯ । रु꣣ज꣡ यस्त्वा꣢꣯ पृत꣣न्य꣡ति꣢ ॥१७१६॥
पदार्थः(अस्य) इस (पवमानस्य) गतिमान् पुरुषार्थी जीव के (व्रतानि) व्रत वा कर्म (दूढ्या) दुर्बुद्धि शत्रु के द्वारा (आधृषे न) दबाये नहीं जा सकते। हे मेरे अन्तरात्मन् ! (यः) जो भी आन्तरिक वा बाहरी शत्रु (त्वा) तुझ पर (पृतन्यति) सेना से धावा करता है, उसे (रुज) नष्ट-भ्रष्ट कर दे ॥३॥
भावार्थःमनुष्य के अन्तरात्मा को योग्य है कि वह प्रबोध और उद्बोधन प्राप्त करके अपनी शक्ति से सब अन्दर के और बाहर के शत्रुओं को परास्त करके देवासुरसङ्ग्राम में विजयी हो ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
त꣡ꣳ हि꣢न्वन्ति मद꣣च्यु꣢त꣣ꣳ ह꣡रिं꣢ न꣣दी꣡षु꣢ वा꣣जि꣡न꣢म् । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य मत्स꣣र꣢म् ॥१७१७॥
पदार्थःप्रबोध को प्राप्त जागरूक उपासक लोग (मदच्युतम्) उत्साहवर्षी, (हरिम्) पापहर्ता, (वाजिनम्) बलवान् (मत्सरम्) तृप्तिप्रद (तम्) उस अद्भुत (इन्दुम्) ब्रह्मानन्द-रस को (नदीषु) धाराओं के रूप में (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (हिन्वन्ति) प्रेरित करते हैं ॥४॥
भावार्थःजो लोग परमात्मा की उपासना द्वारा ब्रह्मानन्द की धाराओं से अपने आत्मा को तृप्त करते हैं, वे धन्य हो जाते हैं ॥४॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
आ꣢ म꣣न्द्रै꣡रि꣢न्द्र꣣ ह꣡रि꣢भिर्या꣣हि꣢ म꣣यू꣡र꣢रोमभिः । मा꣢ त्वा꣣ के꣢ चि꣣न्नि꣡ ये꣢मु꣣रि꣢꣫न्न पा꣣शि꣢꣫नोऽति꣣ ध꣡न्वे꣢व꣣ ता꣡ꣳ इ꣢हि ॥१७१८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) मेरे अन्तरात्मन् ! तू (मन्द्रैः) तृप्ति देनेवाले, (मयूररोमभिः) मोरों के रोमों के समान आकर्षक जिनके रोम अर्थात् विषय-ग्रहण सामर्थ्य हैं, ऐसे (हरिभिः) मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों के साथ (आयाहि) आ, अर्थात् ज्ञानक्षेत्र और कर्मक्षेत्र में उतर। आने की इच्छावाले (त्वा) तुझे (केचित्) कोई भी बाधक शत्रु वा विघ्न (मा नियेमुः) रोक न सकें, (पाशिनः) जाल हाथ में लिए व्याध आदि (इत् न) जैसे गतिशील पक्षी आदि को जाल में रोक लेते हैं। तू (धन्वा इव) धनुर्धारी के समान (तान्) उन बाधकों को (अति इहि) लाँघ जा ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को यह योग्य है कि वे अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर बाधक शत्रुओं वा विघ्नों को पराजित करके अपनी उन्नति करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
वृ꣣त्रखादो꣡ व꣢लꣳ रु꣣जः꣢ पु꣣रां꣢ द꣣र्मो꣢ अ꣣पा꣢म꣣जः꣢ । स्था꣢ता꣣ र꣡थ꣢स्य꣣ ह꣡र्यो꣢रभिस्व꣣र꣡ इन्द्रो꣢꣯ दृ꣣ढा꣡ चि꣢दारु꣣जः꣢ ॥१७१९॥
पदार्थः(इन्द्रः) मनुष्य का आत्मा (वृत्रखादः) पापों का भक्षक, (वलंरुजः) धर्म पर पर्दा डालनेवाले काम, क्रोध आदि को चकनाचूर करनेवाला, (पुरां दर्मः) शत्रु की नगरियों को विदीर्ण करनेवाला, (अपाम् अजः) कर्मों को गति देनेवाला, (हर्योः) ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय रूप घोड़ों के (रथस्य) शरीररूप रथ का (स्थाता) अधिष्ठाता और (अभिस्वरे) देवासुरसङ्ग्राम में (दृढा चित्) दृढ से दृढ विघ्न आदि को (आ रुजः) चकनाचूर कर देनेवाला होवे ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि वे अपने आत्मा की शक्ति को समझ कर, उसका प्रयोग करके, सब बाधाओं का उन्मूलन करके अभ्युदय और निःश्रेयसरूप लक्ष्य को प्राप्त करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -बृहती| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
ग꣣म्भीरा꣡ꣳ उ꣢द꣣धी꣡ꣳरि꣢व꣣ क्र꣡तुं꣢ पुष्यसि꣣ गा꣡ इ꣢व । प्र꣡ सु꣢गो꣣पा꣡ यव꣢꣯सं धे꣣न꣡वो꣢ यथा ह्र꣣दं꣢ कु꣣ल्या꣡ इ꣢वाशत ॥१७२०॥
पदार्थःहे पवमान सोम ! हे पवित्रकर्ता जगदीश्वर ! (गम्भीरान्) अगाध (उदधीन् इव) समुद्रों को जैसे आप पुष्ट करते हो और (गाः इव) जैसे पृथिवी आदि लोकों को वा धेनुओं को आप पुष्ट करते हो, वैसे ही (क्रतुम्) कर्मकर्ता जीवात्मा को (पुष्यसि) पुष्ट करते हो। हे जीवात्मन् ! (यवसम्) घास-चारे को (धेनवः यथा) जैसे गायें और (हृदम्) सरोवर को (कुल्याः इव) जैसे शुद्ध जल की नालियाँ प्राप्त होती हैं, वैसे ही (सुगोपाः) सुरक्षा करनेवाले आनन्द-रस, तुझे (प्र आशत) प्रकृष्ट रूप से प्राप्त होते हैं ॥३॥ यहाँ चार उपमाएँ हैं, अतः उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर जैसे जलों से समुद्रों को, दूध से धेनुओं को और विविध ऐश्वर्यों से पृथिवी आदि लोकों को परिपूर्ण करते हैं, वैसे ही जीवात्मा को सद्गुणों से परिपूर्ण करते हैं। गौएँ जैसे घास के पास पहुँचती हैं और छोटी-छोटी नहरें जैसी महान् जलाशय को भरने के लिए उनमें पहुँचती हैं, वैसे ही जगदीश्वर के पास से ब्रह्मानन्द-रस जीवात्मा को प्राप्त होते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡था꣢ गौ꣣रो꣢ अ꣢पा꣣ कृ꣣तं꣢꣫ तृष्य꣣न्ने꣡त्यवेरि꣢꣯णम् । आ꣣पित्वे꣡ नः꣢ प्रपि꣣त्वे꣢꣫ तूय꣣मा꣡ ग꣢हि꣣ क꣡ण्वे꣢षु꣣ सु꣢꣫ सचा꣣ पि꣡ब꣢ ॥१७२१॥
पदार्थः(यथा) जैसे (तृष्यन्) प्यासा (गौरः) गौर मृग (इरिणम्) मरूस्थल को (अव) छोड़कर (अपा कृतम्) जल से पूर्ण सरोवर को (एति) प्राप्त करता है, वैसे ही हे विद्यार्थी ! तू (नः) हम गुरुओं से (आपित्वे) सम्बन्ध (प्रपित्वे) प्राप्त होने पर, हमारे पास (तूयम्) शीघ्र (आ गहि) आ जा और (कण्वेषु) हम मेधावियों के सान्निध्य में (सचा) दूसरे सहाध्यायियों के साथ मिलकर (सु पिब) भली-भाँति लौकिक विद्याओं के रस का तथा अध्यात्म-विद्याओं के रस का पान कर ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे प्यासा मृग जलरहित प्रदेश को छोड़कर जलप्रचुर प्रदेश को चला जाता है, वैसे ही विद्या के प्यासे लोग मूर्खों का सङ्ग छोड़ कर विद्वानों का सङ्ग करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
म꣡न्द꣢न्तु त्वा मघवन्नि꣣न्द्रे꣡न्द꣢वो राधो꣣दे꣡या꣢य सुन्व꣣ते꣢ । आ꣣मु꣢ष्या꣣ सो꣡म꣢मपिबश्च꣣मू꣢ सु꣣तं꣢꣫ ज्येष्ठं꣣ त꣡द्द꣢धिषे꣣ स꣡हः꣢ ॥१७२२॥
पदार्थःहे (मघवन्) ऐश्वर्यशाली (इन्द्र) जगत्पति परमेश्वर ! (इन्दवः) भक्तिरस (सुन्वते) भक्त को (राधोदेयाय) ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए (त्वा) आपको (मन्दन्तु) प्रसन्न करें। आप (चमू) आत्मा और मनरूप कटोरों में (सुतम्) अभिषुत किये हुए (सोमम्) भक्तिरस को (आमुष्य) उत्सुकता से हर कर (अपिबः) पीते हो, (तत्) उसके बदले में (जयेष्ठम्) अतिशय प्रशस्य और वृद्ध (सहः) बल को (दधिषे) उपासक में रख देते हो ॥२॥
भावार्थःभक्तिरस से तृप्त परमेश्वर भक्त को पुरुषार्थ और दिव्य शक्ति प्रदान करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
त्व꣢म꣣ङ्ग꣡ प्र श꣢꣯ꣳसिषो दे꣣वः꣡ श꣢विष्ठ꣣ म꣡र्त्य꣢म् । न꣢꣫ त्वद꣣न्यो꣡ म꣢घवन्नस्ति मर्डि꣣ते꣢न्द्र꣣ ब्र꣡वी꣢मि ते꣣ व꣡चः꣢ ॥१७२३॥
पदार्थःहे (शविष्ठ) आत्मबल से बलिष्ठ जगदीश्वर वा आचार्य ! (देवः) प्रकाशक और विद्या आदि के दाता (त्वम्) आप (अङ्ग) शीघ्र ही (मर्त्यम्) उपासक मनुष्य वा शिष्य को (प्र शंसिषः) प्रशंसा का पात्र बनाओ। हे (मघवन्) सकल ऐश्वर्यों से युक्त जगदीश्वर वा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य ! (त्वत् अन्यः) आपसे भिन्न कोई (मर्डिता) मोक्ष-प्रदान वा विद्या आदि के प्रदान के द्वारा सुखदाता (न अस्ति) नहीं है। हे (इन्द्र) जगदीश्वर वा आचार्य ! मैं (ते) आपके लिए (वचः) प्रार्थना-वचन (ब्रवीमि) उच्चारण कर रहा हूँ ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर की उपासना करके और आचार्य के समीप शिष्यभाव से पहुँच कर मनुष्यों को सब अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
मा꣢ ते꣣ रा꣡धा꣢ꣳसि꣣ मा꣢ त꣢ ऊ꣣त꣡यो꣢ वसो꣣ऽस्मा꣡न्कदा꣢꣯ च꣣ना꣡ द꣢भन् । वि꣡श्वा꣢ च न उपमिमी꣣हि꣡ मा꣢नुष꣣ व꣡सू꣢नि चर्ष꣣णि꣢भ्य꣣ आ꣢ ॥१७२४॥
पदार्थःहे (वसो) निवासप्रद जगदीश्वर वा आचार्य ! (मा) न तो (ते) आपके (राधांसि) अहिंसा, सत्य आदि ऐश्वर्य और (मा) न ही (ते) आपकी (ऊतयः) रक्षाएँ (अस्मान्) हम आपके उपासकों वा आपके शिष्यों को (कदा चन) कभी भी (आदभन्) अपनी प्राप्ति से वञ्चित करें। हे (मानुष) मनुष्यों के हितकर्ता ! (चर्षणिभ्यः नः) हम मानवों को, आप (विश्वा च वसूनि) सभी ऐश्वर्य धन, धान्य, विद्या, दीर्घायुष्य, अभ्युदय, निःश्रेयस आदि (आ उपमिमीहि) चारों ओर से प्राप्त कराओ ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि परमात्मा और आचार्य का सेवन करके सब दिव्य ऐश्वर्य, सब योगविभूतियाँ और सब रक्षाएँ प्राप्त करें ॥२॥ इस खण्ड में जीवात्मा, परमात्मा, उपासक और गुरु-शिष्यों के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ उन्नीसवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -उषाः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ति꣣ ष्या꣢ सू꣣न꣢री꣣ ज꣡नी꣢ व्यु꣣च्छ꣢न्ती꣣ प꣢रि꣣ स्व꣡सुः꣢ । दि꣣वो꣡ अ꣢दर्शि दुहि꣣ता꣢ ॥१७२५॥
पदार्थःप्रथम—प्राकृतिक उषा के पक्ष में। (सूनरी) उत्तम नेत्री, (जनी) प्रकाश की जननी, (स्वसुः) बहिन रात्रि के (परि) समाप्तिकाल में (व्युच्छन्ती) अँधेरे को हटाती हुई, (दिवः) द्युलोक की (दुहिता) पुत्री (स्या) वह उषा (प्रति अदर्शि) पूर्व दिशा में दिखायी दे रही है ॥ द्वितीय—दिव्य उषा के पक्ष में। (सूनरी) योगमार्ग में उत्तम नेतृत्व करनेवाली, (जनी) मोक्ष की जननी, (स्वसुः) संसारमार्ग पर डालनेवाली अविद्या की (परि) समाप्ति पर (व्युच्छन्ती) उदित होती हुई, (दिवः) प्रकाशमय सविकल्पक समाधि की (दुहिता) पुत्री-तुल्य (स्या) वह ऋतम्भरा प्रज्ञा (प्रति अदर्शि) साक्षात् अनुभव में आ रही है ॥१॥ यहाँ श्लेष और स्वभावोक्ति अलङ्कार हैं ॥१॥
भावार्थः१. ऋ० ४।५२।१। २. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रेऽस्मिन्नुषस इव स्त्रिया गुणानाह।
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -उषाः| स्वर - षड्जः
अ꣡श्वे꣢व चि꣣त्रा꣡रु꣢षी मा꣣ता꣡ गवा꣢꣯मृ꣣ता꣡व꣢री । स꣡खा꣢ भूद꣣श्वि꣡नो꣢रु꣣षाः꣡ ॥१७२६॥
पदार्थःप्रथम—प्राकृतिक उषा के पक्ष में। (अश्वा इव) आकाश-व्यापी बिजली के समान (चित्रा) चित्र-विचित्र रंगवाली, (अरुषी) चमकीली, (गवां माता) किरणों की जननी, (ऋतावरी) सत्य नियमवाली (उषाः) उषा (अश्विनोः) आकाश और भूमि की (सखा) सहचरी (अभूत्) हो गयी है ॥ द्वितीय—दिव्य उषा के पक्ष में। (अश्वा इव) व्याप्त विद्युत् के समान (चित्रा) अद्भुत, (अरुषी) हिंसा न करनेवाली, (गवां माता) अध्यात्म-रश्मियों की माता (ऋतावरी) सत्यमयी (उषाः) ऋतम्भरा प्रज्ञा (अश्विनोः) आत्मा और मन की (सखा) सहचरी (अभूत्) हो गयी है ॥२॥ यहाँ श्लेष और उपमा अलङ्कार हैं ॥२॥
भावार्थःजैसे अटल नियम से प्रतिदिन उदित होती हुई प्रकाशवती प्राकृतिक उषा आकाश-भूमि में व्याप जाती है, वैसे ही योगमार्ग में सत्यमयी ऋतम्भरा प्रज्ञा योगसाधक के आत्मा और मन को व्याप लेती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -उषाः| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣡ सखा꣢꣯स्य꣣श्वि꣡नो꣢रु꣣त꣢ मा꣣ता꣡ गवा꣢꣯मसि । उ꣣तो꣢षो꣣ व꣡स्व꣢ ईशिषे ॥१७२७॥
पदार्थःप्रथम—प्राकृतिक उषा के पक्ष में। (उत) और, हे (उषः) उषा ! तू (अश्विनोः) द्यावापृथिवी की (सखा) सहचरी (असि) है (उत) और (गवाम्) किरणों की (माता) माता (असि) है। (उत) और, तू (वस्वः) प्रकाशरूप धन की (ईशिषे) अधीश्वरी है ॥ द्वितीय—दिव्य उषा के पक्ष में। (उत) और, हे (उषः) उषा के समान वर्तमान ऋतम्भरा प्रज्ञा ! तू (अश्विनोः) योगी के आत्मा और मन की (सखा) सहचरी (असि) है, (उत) और (गवाम्) ईश्वरीय प्रकाशों की (माता) माता (असि) है। (उत) और तू (वस्वः) योग-समाधि रूप धन की (ईशिषे) अधिष्ठात्री है ॥३॥ यहाँ श्लेष अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे प्राकृतिक उषा द्यावापृथिवी में व्याप्त होकर ज्योतिरूप धन से सबको धनवान् कर देती है, वैसे ही योगमार्ग में ऋतम्भरा प्रज्ञा आत्मा और मन में व्याप्त होकर योगसिद्धियों के धन से योगियों को कृतार्थ करती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अश्विनौ| स्वर - षड्जः
ए꣣षो꣢ उ꣣षा꣡ अपू꣢꣯र्व्या꣣꣬ व्यु꣢꣯च्छति प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣡ वा꣢मश्विना बृ꣣ह꣢त् ॥१७२८॥
पदार्थः(एषा उ) यह (अपूर्व्या) अपूर्व, (प्रिया) प्रिय (उषाः) प्रकाशमयी ऋतम्भरा प्रज्ञा (दिवः) देदीप्यमान आत्मलोक से (व्युच्छति) प्रकट हो रही है। हे (अश्विनौ) उस ऋतम्भरा प्रज्ञा से चमत्कृत मन और आत्मा ! मैं (वाम्) तुम दोनों की (बृहत्) बहुत अधिक (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥१॥
भावार्थःजब योगी के मानस आकाश में ऋतम्भरा प्रज्ञारूप दिव्य उषा प्रकट होती है, तब शरीर में स्थित आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदि सभी दिव्य ज्योति से प्रदीप्त हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अश्विनौ| स्वर - षड्जः
या꣢ द꣣स्रा꣡ सिन्धु꣢꣯मातरा मनो꣣त꣡रा꣢ रयी꣣णा꣢म् । धि꣣या꣢ दे꣣वा꣡ व꣢सु꣣वि꣡दा꣢ ॥१७२९॥
पदार्थः(या) जो मन-आत्मा रूप अश्वीयुगल (दस्रा) दोषों को नष्ट करनेवाले, (सिन्धुमातरा) आनन्दस्राविणी जगदम्बा जिनका माता के समान पालन करनेवाली है, ऐसे (रयीणाम्) सत्य, अहिंसा आदि वा स्वास्थ्य, दीर्घायुष्य आदि ऐश्वर्यों को (मनोतरा) अतिशय दीप्त करनेवाले, (देवा) बल के दाता और (धिया) प्रज्ञा तथा कर्म से (वसुविदा) योगसिद्धिरूप ऐश्वर्य को प्राप्त करानेवाले हैं, उनकी मैं (स्तुषे) स्तुति करता हूँ। [यहाँ ‘स्तुषे’ पद पूर्व मन्त्र से लिया गया है] ॥२॥
भावार्थःमन और आत्मा को साधने से दोषों का क्षय, स्वास्थ्य, दीर्घायुष्य, बल, सत्य-अहिंसा आदि ऐश्वर्य और योगसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अश्विनौ| स्वर - षड्जः
व꣣च्य꣡न्ते꣢ वां ककु꣣हा꣡सो꣢ जू꣣र्णा꣢या꣣म꣡धि꣢ वि꣣ष्ट꣡पि꣢ । य꣢द्वा꣣ꣳ र꣢थो꣣ वि꣢भि꣣ष्प꣡ता꣢त् ॥१७३०॥
पदार्थःहे मन और आत्मा रूप अश्वी-युगल ! (वाम्) तुम दोनों के (ककुहासः) महान् स्तोत्र (वच्यन्ते) गान किये जाते हैं, (यत्) क्योंकि (जूर्णायाम्) वृद्ध (विष्टपि अधि) अवस्था में भी (विभिः) इन्द्रिय-रूप अश्वों द्वारा (वाम्) तुम्हारा (रथः) शरीररूप रथ (पतात्) चलता है ॥३॥
भावार्थःवृद्धावस्था में भी जो शरीर भली-भाँति कार्य करता है, वह सब प्राण-अपान सहित मन और आत्मा का ही प्रताप है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -उषाः| स्वर - ऋषभः
उ꣢ष꣣स्त꣢च्चि꣣त्र꣡मा भ꣢꣯रा꣣स्म꣡भ्यं꣢ वाजिनीवति । ये꣡न꣢ तो꣣कं꣢ च꣣ त꣡न꣢यं च꣣ धा꣡म꣢हे ॥१७३१॥
पदार्थःहे (वाजिनीवति) विवेकपूर्ण क्रियावाली (उषः) तेजोमयी जगन्माता ! तू (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (तत्) वह प्रसिद्ध (चित्रम्) अद्भुत भौतिक तथा दिव्य ऐश्वर्य (आ भर) ला, (येन) जिससे, हम (तोकं च तनयं च) पुत्र और पौत्र को (धामहे) परिपुष्ट करें ॥१॥
भावार्थःउषा के समान तेजस्विनी जगन्माता जगत् की व्यवस्था के लिए सब क्रियाओं को करती हुई अपनी सन्तानों को सब आध्यात्मिक और भौतिक ऐश्वर्य प्रदान करती हुई सुखकारिणी होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -उषाः| स्वर - ऋषभः
उ꣡षो꣢ अ꣣द्ये꣡ह गो꣢꣯म꣣त्य꣡श्वा꣢वति विभावरि । रे꣣व꣢द꣣स्मे꣡ व्यु꣢च्छ सूनृतावति ॥१७३२॥
पदार्थः(गोमति) गौओं और दिव्य प्रकाशोंवाली, (अश्वावति) घोड़ों और प्राणबलोंवाली, (विभावरि) ज्योतिर्मयी, (सूनृतावति) प्रिय, सत्य, मधुर वेदवाणीवाली, (उषः) हे जगन्माता ! तू (अद्य) आज (इह) इस हमारे जीवन में (अस्मे) हमारे लिए (रेवत्) दिव्य ऐश्वर्य के साथ उदित होती हुई (व्युच्छ) तमोगुण की अधिकता का निवारण कर दे ॥२॥
भावार्थःजैसे ज्योतिर्मयी उषा रात्रि के अन्धकार को हटाती है, वैसे ही जगन्माता स्तोताओं के मानस-पटल से तमोगुण के साम्राज्य को दूर करके उन्हें सत्त्वगुण की प्रधानतावाला कर देती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -उष्णिक्| देवता -उषाः| स्वर - ऋषभः
यु꣣ङ्क्ष्वा꣡ हि वा꣢꣯जिनीव꣣त्य꣡श्वा꣢ꣳ अ꣣द्या꣢रु꣣णा꣡ꣳ उ꣢षः । अ꣡था꣢ नो꣣ वि꣢श्वा꣣ सौ꣡भ꣢गा꣣न्या꣡ व꣢ह ॥१७३३॥
पदार्थःहे (वाजिनीवति) प्रशस्त क्रियावाली (उषः) उषा के समान तेजोमयी जगन्माता ! तू (अद्य) आज (अरुणान्) तेजस्वी (अश्वान्) इन्द्रिय-रूप घोड़ों को (युङ्क्ष्व हि) ज्ञान के ग्रहण और कर्मों के करने में नियुक्त कर। (अथ) तदनन्तर (नः) हमारे लिए (विश्वा) सब (सौभगानि) सौभाग्य (आवह) प्राप्त करा ॥३॥
भावार्थःवही माता श्रेष्ठ मानी जाती है, जो सन्तान को ज्ञान और कर्म में प्रेरित करे, क्योंकि उसी से सौभाग्य की वृद्धि होती है ॥३॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -अश्विनौ| स्वर - ऋषभः
अ꣡श्वि꣢ना व꣣र्ति꣢र꣣स्म꣡दा गोम꣢꣯द्दस्रा꣣ हि꣡र꣢ण्यवत् । अ꣣र्वा꣢꣫ग्रथ꣣ꣳ स꣡म꣢नसा꣣ नि꣡ य꣢च्छतम् ॥१७३४॥
पदार्थःहे (दस्रा) दोषों का क्षय करनेवाले (अश्विना) शरीर में व्याप्त प्राणापानो ! (अस्मत्) हमारा (वर्तिः) घर (आ) चारों ओर से (गोमत्) धेनुओं से युक्त और (हिरण्यवत्) सुवर्ण आदि धनों से युक्त होवे, इस हेतु से तुम (समनसा) मन से संयुक्त होकर (रथम्) हमारे शरीर-रूप रथ को (अर्वाक्) अनुकूल रूप में (नियच्छतम्) नियन्त्रित करो ॥१॥
भावार्थःदेह के स्वस्थ होने पर ही पुरुषार्थ करके गाय, सुवर्ण आदि धन प्राप्त किये जा सकते हैं और स्वास्थ्य प्राप्त करने का प्राणायाम मुख्य साधन है ॥१॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -अश्विनौ| स्वर - ऋषभः
ए꣢꣫ह दे꣣वा꣡ म꣢यो꣣भु꣡वा꣢ द꣣स्रा꣡ हिर꣢꣯ण्यवर्त्तनी । उ꣣षर्बु꣡धो꣢ वहन्तु꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥१७३५॥
पदार्थः(उषर्बुधः) जो उषा-काल में बोध प्राप्त करते हैं, वे लोग (सोमपीतये) सुख, स्वास्थ्य, दीर्घायुष्य, शान्ति आदि की रक्षा के लिए, (इह) इस शरीर में (देवा) गमन-आगमन करनेवाले, (मयोभुवा) सुख देनेवाले (दस्रा) दोषों को क्षीण करनेवाले, (हिरण्यवर्त्तनी) शारीरिक और मानसिक तेज को देनेवाले प्राण-अपान रूप अश्विनों को (आ वहन्तु) लायें, अर्थात् प्राणायाम को साधें ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि योग के अङ्ग प्राणायाम के द्वारा सब शारीरिक व मानसिक दोषों को जलाकर, योगसिद्धि प्राप्त करके अभ्युदय और निःश्रेयस को सिद्ध करें ॥२॥
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छन्द -उष्णिक्| देवता -अश्विनौ| स्वर - ऋषभः
या꣢वि꣣त्था꣢꣫ श्लोक꣣मा꣢ दि꣣वो꣢꣫ ज्योति꣣र्ज꣡ना꣢य च꣣क्र꣡थुः꣢ । आ꣢ न꣣ ऊ꣡र्जं꣢ वहतमश्विना यु꣣व꣢म् ॥१७३६॥
पदार्थःहे (अश्विनौ) जीवन में व्याप्त प्राणापानो ! (यौ) जो तुम दोनों (इत्था) सचमुच (जनाय) योगसाधक मनुष्य के लिए (दिवः) तेजस्वी जीवात्मा की (श्लोकम्) स्तुतियोग्य (ज्योतिः) ज्योति (चक्रथुः) उत्पन्न करते हो, वे (युवम्) तुम दोनों (नः) हमें (ऊर्जम्) बल (आवहतम्) प्राप्त कराओ ॥३॥
भावार्थःप्राणायाम द्वारा प्रकाश पर पड़े हुए आवरण के क्षय से ज्योति की प्राप्ति और आत्मा तथा प्राण के बल की प्राप्ति होने पर धारणाओं में मन की योग्यता हो जाती है ॥३॥ इस खण्ड में प्राकृतिक और दिव्य उषा, ॠतम्भरा प्रज्ञा, आत्मा-मन, जगदम्बा और प्राण-अपान के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ उन्नीसवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣣ग्निं꣡ तं म꣢꣯न्ये꣣ यो꣢꣫ वसु꣣र꣢स्तं꣣ यं꣡ यन्ति꣢꣯ धे꣣न꣡वः꣢ । अ꣢स्त꣣म꣡र्व꣢न्त आ꣣श꣢꣫वोऽस्तं꣣ नि꣡त्या꣢सो वा꣣जि꣢न꣣ इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१७३७॥
पदार्थःमैं (अग्निम्) अग्नि नामक जगदीश्वर (तं मन्ये) उसे मानता हूँ,(यः वसुः) जो धर्मात्माओं को निवास देनेवाला है, (अस्तं यम्) शरण-रूप जिसके पास (धेनवः) दुधारू गायें (यन्ति) मातृत्व की प्राप्ति के लिए पहुँचती हैं, (अस्तम्) शरण-रूप जिसके पास (आशवः) शीघ्रगामी (अर्वन्तः) घोड़े (यन्ति) वेग की प्राप्ति के लिए पहुँचते हैं, (अस्तम्) शरण-रूप जिसके पास (नित्यासः) अनादि और अनन्त (वाजिनः) जीवात्मा (यन्ति) बल के लिए पहुँचते हैं। हे अग्ने जगदीश्वर ! आप (स्तोतृभ्यः) स्तोताओं को, आपके गुण-कर्म-स्वभाव का कीर्तन करनेवाले मनुष्यों को (इषम्) अभीष्ट अभ्युदय और निःश्रेयस रूप फल (आ भर) प्रदान करो ॥१॥
भावार्थःसभी अपनी-अपनी शक्ति को प्राप्त करने के लिए जिसकी शरण में पहुँचते हैं, वह परमेश्वर ही मुख्यतः अग्निशब्दवाच्य है ॥१॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣣ग्नि꣢꣫र्हि वा꣣जि꣡नं꣢ वि꣣शे꣡ ददा꣢꣯ति वि꣣श्व꣡च꣢र्षणिः । अ꣣ग्नी꣢꣯ रा꣣ये꣢ स्वा꣣भु꣢व꣣ꣳ स꣢ प्री꣣तो꣡ या꣢ति꣣ वा꣢र्य꣣मि꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१७३८॥
पदार्थः(विश्वचर्षणिः) विश्व का द्रष्टा (अग्निः हि) अग्निशब्दवाच्य जगदीश्वर ही (विशे) प्रजा को (वाजिनम्) बलवान् प्राण (ददाति) देता है। (अग्निः) वह अग्निशब्दवाच्य जगदीश्वर ही (सु आभुवम्) भली-भाँति शरीर में जन्म ग्रहण किये हुए जीव को (राये) ऐश्वर्य के लिए प्रेरित करता है। (प्रीतः) शुभ कर्मों से प्रसन्न हुआ (सः) वह अग्नि जगदीश्वर (वार्यम्) वरणीय उपासक को (याति) प्राप्त होता है। हे जगदीश ! (स्तोतृभ्यः) आपके गुण-कर्म-स्वभाव की स्तुति करनेवाले मनुष्यों को आप (इषम्) अभीष्ट अभ्युदय और निःश्रेयसरूप फल (आ भर) प्रदान करो ॥२॥
भावार्थःकोई सम्राट् जैसे प्रजाओं को शुभ कर्मों में प्रेरित करता हुआ उन्हें सुख और ऐश्वर्य प्रदान करता है, वैसे ही जगदीश्वर उपासकों को अभ्युदय और मोक्षरूप फल देकर उनका कल्याण करता है ॥२॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
सो꣢ अ꣣ग्नि꣡र्यो वसु꣢꣯र्गृ꣣णे꣢꣫ सं यमा꣣य꣡न्ति꣢ धे꣣न꣡वः꣢ । स꣡म꣢꣯र्वन्तो रघु꣣द्रु꣢वः꣣ स꣡ꣳ सु꣢जा꣣ता꣡सः꣢ सू꣣र꣢य꣣ इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१७३९॥
पदार्थः(सः) वही (अग्निः) अग्निशब्दवाच्य जगदीश्वर है, (यः) जो (वसुः) सबको ढकनेवाला अर्थात् सर्वव्यापक है, उसकी मैं (गृणे) स्तुति करता हूँ, (यम्) जिसके पास (धेनवः) स्तोताओं की वाणियाँ (समायन्ति) पहुँचती हैं, (रघुद्रुवः) वेगगामी (अर्वन्तः) पृथिवी, चन्द्र आदि लोक (सम्) पहुँचते हैं, (सुजातासः) सुप्रसिद्ध (सूरयः) विद्वान् लोग (सम्) पहुँचते हैं। हे जगदीश्वर ! आप (स्तोतृभ्यः) आपके गुण-कर्म-स्वभाव की स्तुति करनेवालों को (इषम्) अभीष्ट अभ्युदय और निःश्रेयस रूप फल (आ भर) प्रदान करो ॥३॥
भावार्थःगायें, घोड़े, मनुष्य, सूर्य, चाँद, तारे, पृथिवी, मङ्गल, बुध, बृहस्पति आदि लोक, नदियाँ, पहाड़, समुद्र, झरने, वृक्ष, लताएँ सभी अपने-अपने गुण जिससे पाते हैं, वही अग्निशब्दवाच्य जगदीश्वर है ॥३॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -उषाः| स्वर - पञ्चमः
म꣣हे꣡ नो꣢ अ꣣द्य꣡ बो꣢ध꣣यो꣡षो꣢ रा꣣ये꣢ दि꣣वि꣡त्म꣢ती । य꣡था꣢ चिन्नो꣣ अ꣡बो꣢धयः स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥१७४०॥
पदार्थःहे (सुजाते) सुप्रसिद्ध, (अश्वसूनृते) व्यापक प्रिय सत्य वेदवाणीवाली (उषः) उषा के समान जगानेवाली जगन्माता ! (दिवित्मती) दिव्य प्रकाश से देदीप्यमान तू (नः) हमें (महे राये) महान् अभ्युदय और मोक्ष रूप ऐश्वर्य के लिए (अद्य) आज भी (बोधय) वैसे ही जगा (यथा चित्) जैसे, (सत्यश्रवसि) सच्ची कीर्तिवाले, (वाय्ये) खड्डी में धागों के समान फैलाने योग्य हमारे पूर्व जीवन में (नः) हमें (अबोधयः) जगाती रही है ॥१॥
भावार्थःजैसे प्राकृतिक उषा सब प्राणियों को और कोई माँ अपनी सन्तानों को जगाती और श्रेष्ठ कर्मों में लगाती हैं, वैसे ही जगदीश्वरी माँ हम अबोधों को जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त अपने कर्तव्य-पालन के लिए दिन-रात जगाती रहे, जिससे हम कीर्ति, अभ्युदय और मोक्ष प्राप्त करें ॥१॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -उषाः| स्वर - पञ्चमः
या꣡ सु꣢नी꣣थे꣡ शौ꣢चद्र꣣थे꣡ व्यौच्छो꣢꣯ दुहितर्दिवः । सा꣡ व्यु꣢च्छ꣣ स꣡ही꣢यसि स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥१७४१॥
पदार्थःहे (सुजाते) सुप्रसिद्ध, (अश्वसूनृते) व्यापक प्रिय सत्य वेदवाणीवाली (दिवः दुहितः) दिव्य प्रकाश को दुह कर देनेवाली जगन्माता ! (या) जो प्रसिद्ध तू (शौचद्रथे) अतिशय पवित्र आत्मा रूप रथवाले, (सुनीथे) उत्तम नेतृत्व करनेवाले मनुष्य में (व्यौच्छः) प्रकाश देती है, (सा) वह तू (सहीयसि) अतिशय सहनशील, (सत्यश्रवसि) सच्ची कीर्तिवाले (वाय्ये) खड्डी में धागों के समान फैलाने योग्य मेरे जीवन में भी (व्युच्छ) विवेकख्याति का प्रकाश कर ॥२॥
भावार्थःजो पवित्र आचरणवाले नेता लोग होते हैं, उनमें पवित्रता और नेतृत्व का बल जगन्माता ही निहित करती है, वैसे ही वह हमारा भी जीवन पवित्र करके, विवेकख्याति का प्रकाश उत्पन्न कर हमें मोक्ष का अधिकारी बना देवे ॥२॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -उषाः| स्वर - पञ्चमः
सा꣡ नो꣢ अ꣣द्या꣢भ꣣र꣡द्व꣢सु꣣꣬र्व्यु꣢꣯च्छा दुहितर्दिवः । यो꣢꣫ व्यौच्छः꣣ स꣡ही꣢यसि स꣣त्य꣡श्र꣢वसि वा꣣य्ये꣡ सुजा꣢꣯ते꣣ अ꣡श्व꣢सूनृते ॥१७४२॥
पदार्थःहे (सुजाते) सुप्रसिद्ध, (अश्वसूनृते) व्यापक प्रिय सत्य वेदवाणीवाली, (दिवः दुहितः) दिव्यप्रकाश को दुह कर देनेवाली जगन्माता ! (आभरद्वसुः) दिव्यधनों को लानेवाली (सा) वह तू (अद्य) आज (नः) हमारे लिए (व्युच्छ) तमोगुण वा अविद्या के अन्धकार को दूर करके विवेकख्याति का प्रकाश फैला, (या उ) जो तू (सहीयसि) अति सहनशील, (सत्यश्रवसि) सत्य यशवाले, (वाय्ये) सत्सङ्ग के लिए प्राप्तव्य किसी महापुरुष में (व्यौच्छः) प्रकाश उत्पन्न करती है ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वरी माँ जैसे महापुरुषों के हृदय में प्रकाश उत्पन्न करती है, वैसे ही हमें भी दिव्य प्रकाश से अनुगृहीत करे ॥३॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अश्विनौ| स्वर - पञ्चमः
प्र꣡ति꣢ प्रि꣣य꣡त꣢म꣣ꣳ र꣢थं꣣ वृ꣡ष꣢णं वसु꣣वा꣡ह꣢नम् । स्तो꣣ता꣡ वा꣢मश्विना꣣वृ꣢षि꣣ स्तो꣡मे꣢भिर्भूषति꣣ प्र꣢ति꣣ मा꣢ध्वी꣣ म꣡म꣢ श्रुत꣣ꣳ ह꣡व꣢म् ॥१७४३॥
पदार्थःहे (अश्विनौ) योगशास्त्र के अध्यापक और योगक्रिया के प्रशिक्षक ! (प्रियतमम्) अतिशय प्रिय, (वृषणम्) बलवान्, (वसुवाहनम्) निवासक मन, प्राण, इन्द्रियों आदि से चलाये जानेवाले (रथम्) आत्मा से अधिष्ठित शरीर-रथ को (प्रति) लक्ष्य करके अर्थात् अध्यात्म और शरीर-योग का प्रशिक्षण देने के लिए (स्तोता) तुम्हारा प्रशंसक (ऋषिः) तत्त्वदर्शी आचार्य (स्तोमेभिः) प्रशंसा-वचनों से (वाम्) तुम दोनों को (प्रतिभूषति) अलंकृत कर रहा है अर्थात् तुम्हारी प्रशंसा कर रहा है। हे (माध्वी) प्राणों की मधुविद्या जाननेवालो ! तुम (मम) मुझ योग-प्रशिक्षण चाहनेवाले की (हवम्) पुकार को (श्रुतम्) सुनो ॥१॥
भावार्थःजो योग-प्रशिक्षण पाने के इच्छुक हों, उन्हें चाहिए कि वे योगकला में कुशल, प्राणविद्या के ज्ञाता योगशास्त्र पढ़ानेवाले और योग-क्रियाओं का प्रशिक्षण देनेवाले के पास जाकर अष्टाङ्गयोग की विधि से योगाभ्यास करके सब दुःखों से मुक्ति प्राप्त करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अश्विनौ| स्वर - पञ्चमः
अ꣣त्या꣡या꣢तमश्विना ति꣣रो꣡ विश्वा꣢꣯ अ꣣ह꣡ꣳ सना꣢꣯ । द꣢स्रा꣣ हि꣡र꣢ण्यवर्तनी꣣ सु꣡षु꣢म्णा꣣ सि꣡न्धु꣢वाहसा꣣ मा꣢ध्वी꣣ म꣡म꣢ श्रुत꣣ꣳ ह꣡व꣢म् ॥१७४४॥
पदार्थःहे (अश्विना) योग के अध्यापक और योग-क्रिया के प्रशिक्षक ! तुम दोनों (अत्यायातम्) विघ्नों को दूर करके हमें योग सिखाने के लिए आओ ! मैं भी योग सीखने के लिए (सना) सदा (विश्वाः) सब बाधाओं को (तिरः) तिरस्कृत कर देता हूँ। हे (दस्रा) योग-विघ्नों को नष्ट करनेवाले, (हिरण्यवर्तनी) प्रशस्त मार्ग का अवलम्बन करनेवाले, (सुषुम्णा) उत्कृष्ट सुख देनेवाले, (सिन्धुवाहसा) ज्ञान की नदियों को बहानेवाले, (माध्वी) प्राणों की मधुविद्या जाननेवाले योग के अध्यापक और योग-प्रशिक्षको ! तुम दोनों (मम) मुझ योग-जिज्ञासु की (हवम्) पुकार को (श्रुतम्) सुनो ॥२॥
भावार्थःवे ही योग के अध्यापक और योग-प्रशिक्षक प्रशस्त माने जाते हैं, जो योगमार्ग में आये हुए व्याधि, स्त्यान, संशय, आलस्य आदि विघ्नों को सरल विधि से दूर करना सिखाते हैं और मधुविद्या नामक प्राणविद्या को देने में तथा अष्टाङ्ग योग के प्रशिक्षण में चतुर होते हैं ॥२॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -अश्विनौ| स्वर - पञ्चमः
आ꣢ नो꣣ र꣡त्ना꣢नि꣣ बि꣡भ्र꣢ता꣣व꣡श्वि꣢ना꣣ ग꣡च्छ꣢तं यु꣣व꣢म् । रु꣢द्रा꣣ हि꣡र꣢ण्यवर्तनी जुषा꣣णा꣡ वा꣢जिनीवसू꣣ मा꣢ध्वी꣣ म꣡म꣢ श्रुत꣣ꣳ ह꣡व꣢म् ॥१७४५॥
पदार्थःहे (अश्विना) योगशास्त्र के अध्यापक और योग-विधियों के प्रशिक्षक ! (रत्नानि) योगसिद्धि के रमणीय ऐश्वर्यों को (बिभ्रतौ) धारण करनेवाले (युवम्) तुम दोनों (नः) हम योग-जिज्ञासुओं के पास (आगच्छतम्) आओ। हे (रुद्रा) रोदक योग-विघ्न आदि को दूर करनेवाले, (हिरण्य-वर्तनी) तेजस्वी मार्ग का अवलम्बन करनेवाले (जुषाणा) प्रीति करनेवाले (वाजिनीवसू) योगाभ्यास-क्रिया ही जिनका धन है ऐसे, (माध्वी) मधुर प्राणविद्या को जाननेवाले योगाध्यापक और योगप्रशिक्षको ! तुम दोनों (मम) मुझ योग-जिज्ञासु की (हवम्) पुकार को (श्रुतम्) सुनो ॥३॥
भावार्थःवे ही योगाध्यापक और योग-प्रशिक्षक योगविद्या देने में सफल होते हैं, जो स्वयं योग-सिद्धियों से युक्त और योगविद्या के धुरंधर होते हैं ॥३॥ इस खण्ड में जगदीश्वर, जगन्माता और योगाभ्यास के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ उन्नीसवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣡बो꣢ध्य꣣ग्निः꣢ स꣣मि꣢धा꣣ ज꣡ना꣢नां꣣ प्र꣡ति꣢ धे꣣नु꣡मि꣢वाय꣣ती꣢मु꣣षा꣡स꣢म् । य꣣ह्वा꣡ इ꣢व꣣ प्र꣢ व꣣या꣢मु꣣ज्जि꣡हा꣢नाः꣣ प्र꣢ भा꣣न꣡वः꣢ सस्रते꣣ ना꣢क꣣म꣡च्छ꣢ ॥१७४६॥
पदार्थः(धेनुम् इव) दुधारू गाय के समान (आयतीम्) आती हुई (उषासम् प्रति) उषा को लक्ष्य करके (जनानाम्) यजमानों की (समिधा) समिधाओं के होम से (अग्निः) यज्ञाग्नि (अबोधि) प्रबुद्ध हुआ है। (वयाम्) शाखा को (प्र उज्जिहानाः) ऊपर उठाते हुए (यह्वाः इव) बड़े-बड़े वृक्षों के समान (भानवः) अग्नि-ज्वालाएँ (नाकम् अच्छ) सूर्य की ओर (प्र सस्रते) उठ रही हैं ॥१॥ यहाँ स्वभावोक्ति और उपमा अलङ्कार हैं ॥१॥
भावार्थःजैसे उषा के आने पर यज्ञाग्नि सूर्य की ओर उठती है, वैसे ही उपासकों की आत्मा रूप अग्नि परमात्मा की ओर उठती है ॥१॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣡बो꣢धि꣣ हो꣡ता꣢ य꣣ज꣡था꣢य दे꣣वा꣢नू꣣र्ध्वो꣢ अ꣣ग्निः꣢ सु꣣म꣡नाः꣢ प्रा꣣त꣡र꣢स्थात् । स꣡मि꣢द्धस्य꣣ रु꣡श꣢ददर्शि꣣ पा꣡जो꣢ महा꣢न्दे꣣व꣡स्तम꣢꣯सो꣣ नि꣡र꣢मोचि ॥१७४७॥
पदार्थः(होता) होम के साधन अग्नि ने (यजथाय) यज्ञ करने के लिए (देवान्) विद्वान् यजमानों को (अबोधि) जगा दिया है। (प्रातः) प्रभात में (सुमनाः) मनों को शुभ बनानेवाला (अग्निः) यज्ञाग्नि (ऊर्ध्वः) ऊर्ध्वोन्मुख (अस्थात्) स्थित हो गयी है। (समिद्धस्य) प्रज्वलित हुए इस यज्ञाग्नि का (रुशत्) चमकता हुआ (पाजः) रूप (अदर्शि) दिखायी दे रहा है। (महान्) महान् (देवः) प्रकाशक अग्नि ने (तमसः) अन्धकार से (निरमोचि) छुड़ा दिया है ॥२॥ इस मन्त्र में भी स्वभावोक्ति अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे प्रज्वलित, ऊँची ज्वालाओंवाली, चमकती हुई यज्ञाग्नि अँधेरे से छुड़ाती है, वैसे ही देदीप्यमान ऊर्ध्वयात्री, तेजस्वी आत्मा मन-बुद्धि आदि को तमोगुण से छुड़ाता है ॥२॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
य꣡दीं꣢ ग꣣ण꣡स्य꣢ रश꣣ना꣡मजी꣢꣯गः꣣ शु꣡चि꣢रङ्क्ते꣣ शु꣡चि꣢भि꣣र्गो꣡भि꣢र꣣ग्निः꣢ । आ꣡द्दक्षि꣢꣯णा युज्यते वाज꣣य꣡न्त्यु꣢त्ता꣣ना꣢मू꣣र्ध्वो꣡ अ꣢धयज्जु꣣हू꣡भिः꣢ ॥१७४८॥
पदार्थः(यत्) जब (ईम्) यह उपासक (गणस्य) स्तुति-समूह की (रशनाम्) शृङ्खला को (अजीगः) ध्वनित करता है, तब (शुचिः) पवित्र और देदीप्यमान (अग्निः) परमेश्वर (शुचिभिः) पवित्र और देदीप्यमान (गोभिः) तेजों से (अङ्क्ते) उसे प्रकाशित करता है। (आत्) तदनन्तर (वाजयन्ति) उपासक को बलवान् करती हुई (दक्षिणा) आत्मसमर्पण की क्रिया (युज्यते) प्रवृत्त होती है। (ऊर्ध्वः) सर्वोन्नत जगदीश्वर (जुहूभिः) वाणियों से (उत्तानाम्) उच्चारण की हुई स्तुति को (अधयत्) पान करता है ॥३॥
भावार्थःउपासक के हृदय से निकली हुई पवित्र स्तुति को जगदीश्वर अवश्य स्वीकार करता है और उपासक को कृतकृत्य कर देता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -उषाः| स्वर - धैवतः
इ꣣द꣢꣫ꣳ श्रेष्ठं꣣ ज्यो꣡ति꣢षां꣣ ज्यो꣢ति꣣रा꣡गा꣢च्चि꣣त्रः꣡ प्र꣢के꣣तो꣡ अ꣢जनिष्ट꣣ विभ्वा꣢ । य꣢था꣣ प्र꣡सू꣢ता सवि꣣तुः꣢ स꣣वा꣢यै꣣वा꣢꣫ रात्र्यु꣣ष꣢से꣣ यो꣡नि꣢मारैक् ॥१७४९॥
पदार्थः(इदम्) यह (ज्योतिषाम्) अग्नि, विद्युत आदि ज्योतियों में (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठ (ज्योतिः) ज्योति उषा (आगात्) आयी है। (चित्रः) अद्भुत (विभ्वा) व्यापक (प्रकेतः) प्रकाश (अजनिष्ट) उत्पन्न हो गया है। (यथा) जिस प्रकार (प्रसूता) उत्पन्न यह उषा (सवितुः) सूर्य के (सवाय) जन्म के लिए आकाश को खाली कर देती है, (एवा) इसी प्रकार (रात्रि) रात्रि ने (उषसे) उषा के जन्म के लिए (योनिम्) आकाश को (आरैक्) खाली कर दिया है ॥१॥ यहाँ उपमा और स्वभावोक्ति अलङ्कार हैं। ‘ज्योति’ की आवृत्ति में यमक और ‘सवि सवा’ में छेकानुप्रास है। प्राकृतिक उषा के वर्णन से आध्यात्मिक उषा की व्यञ्जना हो रही है ॥१॥
भावार्थःजैसे रात्रि के अँधेरे को समाप्त करके ज्योतिष्मती उषा आकाश में प्रकट होती है और अपने से अधिक ज्योतिष्मान् सूर्य को प्रकट करती है, वैसे ही अविद्या के घोर अँधेरे को चीर कर ज्योतिष्मती आत्म-प्रभा प्रकट होकर अपने से अधिक ज्योतिर्मयी परमात्म-प्रभा को प्रकट करती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -उषाः| स्वर - धैवतः
रु꣡श꣢द्वत्सा꣣ रु꣡श꣢ती श्वे꣣त्या꣢गा꣣दा꣡रै꣢गु कृ꣣ष्णा꣡ सद꣢꣯नान्यस्याः । स꣣मान꣡ब꣢न्धू अ꣣मृ꣡ते꣢ अनू꣣ची꣢꣫ द्यावा꣣ व꣡र्णं꣢ चरत आमिना꣣ने꣢ ॥१७५०॥
पदार्थः(रूशद्वत्सा) जिसका चमकीला सूर्य रूप बछड़ा है ऐसी, (रुशती) लाल वर्णवाली, (श्वेत्या) उज्ज्वल उषा (आगात्) आयी है। (कृष्णा) काली रात्रि ने (अस्याः) इस उषा के (सदनानि) सदनों को (आरैक् उ) खाली कर दिया है। ये रात्रि और उषा (समानबन्धू) सूर्य रूप समान बन्धुवाली, (अमृते) प्रवाह रूप से अमर, (अनूची) एक-दूसरे के बाद आनेवाली, (द्यावा) अपने-अपने प्रकाश से प्रकाशित, (वर्णम्) अपने-अपने रूप को (आमिनाने) एक-दूसरे में प्रविष्ट करानेवाली होकर (चरतः) गगन-प्राङ्गण में विचर रही हैं ॥२॥ यहाँ स्वभावोक्ति अलङ्कार है। उषा और रात्रि में काली-गोरी दो बहिनों के व्यवहार का समारोप होने से समासोक्ति भी है। दोनों का अङ्गाङ्गिभाव- सङ्कर है। उषा और रात्रि के वर्णन से परा और अपरा विद्या का अर्थ भी ध्वनित हो रहा है ॥२॥
भावार्थःजैसे रात्रि के बाद चमकीले सूर्य-रूप बछड़ेवाली उषा आती है, वैसे ही अपरा विद्या के अनन्तर ज्योतिर्मय ब्रह्म-रूप बछड़ेवाली परा विद्या आती है। रात्रि और उषा के समान ये दोनों विद्याएँ भी मनुष्यों का कल्याण करनेवाली हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -उषाः| स्वर - धैवतः
स꣣मानो꣢꣫ अध्वा꣣ स्व꣡स्रो꣢रन꣣न्त꣢꣫स्तम꣣न्या꣡न्या꣢ चरतो दे꣣व꣡शि꣢ष्टे । न꣡ मे꣢थेते꣣ न꣡ त꣢स्थतुः सु꣣मे꣢के꣣ न꣢क्तो꣣षा꣢सा꣣ स꣡म꣢नसा꣣ वि꣡रू꣢पे ॥१७५१॥
पदार्थः(स्वस्रोः) रात्रि और उषा-रूप इन दोनों बहिनों का (समानः) एक ही (अनन्तः) अनन्त (अध्वा) मार्ग है। (तम्) उस आकाशरूप मार्ग पर (देवशिष्टे) जगदीश्वर के अनुशासन में रहती हुई (अन्यान्या) एक-दूसरी की गलबहियाँ लेकर (चरतः) विचर रही हैं। ये (सुमेके) भली-भाँति नियमों में बँधी हुई, (विरूपे) काले-गोरे विभिन्न रूपोंवाली और (समनसा) समान मन वालियों जैसी (नक्तोषासा) रात्रि और उषा (न मेथेते) एक-दूसरी की हिंसा नहीं करतीं, (न तस्थतुः) न कार्य से विरत होती हैं, प्रत्युत सृष्टि से लेकर विश्राम-प्रदान और प्रकाश-प्रदान-रूप अपने-अपने कार्य में संलग्न हैं ॥३॥ यहाँ रात्रि और उषा में बहिनों का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥ ‘समनसा’ में लुप्तोपमा है ॥३॥
भावार्थःरात्री और उषा के समान अपरा और परा विद्या को भी मनुष्य यदि सामञ्जस्यपूर्वक ग्रहण करें तो निश्चय ही अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि हो सकती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अश्विनौ| स्वर - धैवतः
आ꣡ भा꣢त्य꣣ग्नि꣢रुष꣣सा꣢म꣣नी꣡क꣢मु꣣द्वि꣡प्रा꣢꣯णां देव꣣या꣡ वाचो꣢꣯ अस्थुः । अ꣣र्वा꣡ञ्चा꣢ नू꣣न꣡ꣳ र꣢थ्ये꣣ह꣡ या꣢तं पीपि꣣वा꣡ꣳस꣢मश्विना घ꣣र्म꣡मच्छ꣢꣯ ॥१७५२॥
पदार्थः(अग्निः) यज्ञाग्नि (आ भाति) आभासित हो रही है, (उषसाम्) उषाओं की (अनीकम्) किरण-सेना भी (आ भाति) आभासित हो रही है। (विप्राणाम्) मेधावी उपासकों की (देवयाः) परमात्माराधना की इच्छुक (वाचः) वाणियाँ (उद् अस्थुः) उठ रही हैं। हे (रथ्या) शरीर-रथ को चलानेवाले (अश्विना) प्राणापानो ! तुम दोनों (अर्वाञ्चा) हमारे अभिमुख होते हुए (नूनम्) निश्चय ही (इह) यहाँ (पीपिवांसम्) समृद्ध (घर्मम्) प्रातःकालीन ब्रह्मयज्ञ के (अच्छ) प्रति (आ यातम्) आओ ॥१॥
भावार्थःउषाकाल में स्वच्छ प्राभातिक वायु में ब्रह्मयज्ञ में किया गया प्राणायाम अपूर्व, तेज, जागृति, स्फूर्ति, आरोग्य और बल प्रदान करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अश्विनौ| स्वर - धैवतः
न꣡ स꣢ꣳस्कृ꣣तं꣡ प्र मि꣢꣯मीतो꣣ ग꣢मि꣣ष्ठा꣡न्ति꣢ नू꣣न꣢म꣣श्वि꣡नोप꣢꣯स्तुते꣣ह꣢ । दि꣡वा꣢भिपि꣣त्वे꣢ऽव꣣सा꣡ग꣢मिष्ठा꣣ प्र꣡त्यव꣢꣯र्त्तिं दा꣣शु꣢षे꣣ श꣡म्भ꣢विष्ठा ॥१७५३॥
पदार्थः(उपस्तुता) महत्त्व-वर्णन द्वारा प्रशंसा किये गये, (नूनम्) निश्चय ही (इह) इस शरीर में (अन्ति) समीप होकर (गमिष्ठा) अतिशय गमन-आगमन करनेवाले (अश्विना) प्राणापान (संस्कृतम्) संस्कृत जीवन-यज्ञ की (न प्र मिमीतः) हिंसा नहीं करते हैं। (दिवा अभिपित्वे) दिन के प्राप्त होने पर अर्थात् प्रातःकाल (अवसा) रक्षा के साथ (आगमिष्ठा) आनेवाले प्राणापान (अवर्तिम्) आधि, व्याधि, दुर्गति, दुर्बलता आदि को (प्रति) रोक कर (दाशुषे) हवि देनेवाले अग्निहोत्री के लिए (शम्भविष्ठा) अतिशय सुख देनेवाले होते हैं ॥२॥
भावार्थःभली-भाँति सेवित प्राणापान रोग आदि के पाशों से मनुष्य का उद्धार करके उसे दीर्घायु करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अश्विनौ| स्वर - धैवतः
उ꣣ता꣡ या꣢तꣳ संग꣣वे꣢ प्रा꣣त꣡रह्नो꣢꣯ म꣣ध्य꣡न्दि꣢न꣣ उ꣡दि꣢ता꣣ सू꣡र्य꣢स्य । दि꣢वा꣣ न꣢क्त꣣म꣡व꣢सा꣣ श꣡न्त꣢मेन꣣ ने꣡दानीं꣢꣯ पी꣣ति꣢र꣣श्वि꣡ना त꣢꣯तान ॥१७५४॥
पदार्थःहे (अश्विना) प्राणापानो ! तुम (अह्नः) दिन के (सङ्गवे) गोदोहनकाल में अर्थात् ब्राह्ममुहूर्त्त में, (प्रातः) प्रातःकाल में, (मध्यन्दिने) मध्याह्न में (उत) और (सूर्यस्य) सूर्य के (उदिता) अस्त होने के काल में, (दिवा) दिन में और (नक्तम्) रात्रि में (शन्तमेन) अतिशय सुखदायक (अवसा) रक्षा के साथ (आयाताम्) आओ। (इदानीम्) इस समय (पीतिः) मृत्यु (न आ ततान) अपना फन्दा न फैलाये, अर्थात् हमारा वध न करे ॥३॥
भावार्थःविधिपूर्वक प्रातः-सायं किया गया प्राणायाम दिन-रात सब कालों में कष्ट और मृत्यु से प्राणायाम करनेवाले की रक्षा करता है ॥३॥ इस खण्ड में यज्ञाग्नि, परमात्मा, उपास्य-उपासक, उषा, आध्यात्मिक प्रभा, रात्रि-उषा, अपरा-परा-विद्या तथा प्राणापान के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ उन्नीसवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -उषाः| स्वर - निषादः
ए꣣ता꣢ उ꣣ त्या꣢ उ꣣ष꣡सः꣢ के꣣तु꣡म꣢क्रत꣣ पू꣢र्वे꣣ अ꣢र्धे꣣ र꣡ज꣢सो भा꣣नु꣡म꣢ञ्जते । नि꣣ष्कृण्वाना꣡ आयु꣢꣯धानीव धृ꣣ष्ण꣢वः꣣ प्र꣢ति꣣ गा꣡वोऽरु꣢꣯षीर्यन्ति मा꣣त꣡रः꣢ ॥१७५५॥
पदार्थः(एताः उ) इन (त्याः) उन (उषसः) उषाओं ने (केतुम्) प्रज्ञान को (अक्रत) उत्पन्न कर दिया है। ये (रजसः) अन्तरिक्षलोक के (पूर्वे अर्धे) पूर्व के आधे भाग में (भानुम्) प्रकाश को (अञ्जते) व्यक्त्त कर रही हैं। (धृष्णवः) शत्रुओं को घर्षण करनेवाले योद्धा लोग (आयुधानि इव) जैसे शस्त्रास्त्रों को चमकाते हैं, वैसे ही भूप्रदेशों को (निष्कृण्वानाः) चमकाती हुई, (गावः) गमनशील, (अरुषीः) देदीप्यमान (मातरः) माता उषाएँ (प्रतियन्ति) जाती-आती हैं ॥१॥ यहाँ उषाओं में मातृत्व का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है, ‘निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णवः’ में उपमा है। ये दोनों स्वभावोक्ति के अङ्ग हैं, अतः अङ्गाङ्गिभाव-रूप सङ्कर है। प्राकृतिक उषा के वर्णन से आध्यात्मिक उषा की व्यञ्जना हो रही है ॥१॥
भावार्थःजैसे प्राकृतिक उषा रात्रि के अँधेरे को छिन्न-भिन्न करके भूमि पर प्रकाश उत्पन्न करती है, वैसे ही आध्यात्मिक ज्योतिष्मती प्रज्ञा तमोभाव को दूर करके चित्तप्रसाद उत्पन्न करती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -उषाः| स्वर - निषादः
उ꣡द꣢पप्तन्नरु꣣णा꣢ भा꣣न꣢वो꣣ वृ꣡था꣢ स्वा꣣यु꣡जो꣢ अ꣡रु꣢षी꣣र्गा꣡ अ꣢युक्षत । अ꣡क्र꣢न्नु꣣षा꣡सो꣢ व꣣यु꣡ना꣢नि पू꣣र्व꣢था꣣ रु꣡श꣢न्तं भा꣣नु꣡मरु꣢꣯षीरशिश्रयुः ॥१७५६॥
पदार्थः(अरुणाः) लालिमावाले (भानवः) प्रकाश (वृथा) अनायास (उदपप्तन्) उठ रहे हैं। (अरुषीः) चमकीली उषाओं ने (स्वायुजः) सुख से जुड़नेवाली (गाः) किरणों को (अयुक्षत) पूर्व दिशा के आकाश में जोड़ दिया है। (उषासः) उषाएँ (पूर्वथा) पूर्व दिनों की भाँति (वयुनानि) लोक-जागरण के कर्मों को (अक्रन्) कर रही हैं। (अरुषीः) लालिमावाली ये उषाएँ (रुशन्तम्) चमकीले (भानुम्) सूर्य का (अशिश्रयुः) आश्रय लिये हुए हैं ॥२॥ यहाँ स्वभावोक्ति अलङ्कार है। ‘पूर्वथा’ में उपमा है ॥२॥
भावार्थःजैसे उषाओं के उदय होने पर आकाश और भूतल प्रकाशित हो जाता है, तथा मनुष्य जागृति अनुभव करते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक ज्योतिष्मती प्रज्ञाओं के आविभार्व होने पर चित्तपटल निर्मल हो जाता है और आत्मा, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियाँ आदि सब योगसिद्धि के लिए सचेष्ट हो जाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -उषाः| स्वर - निषादः
अ꣡र्च꣢न्ति꣣ ना꣡री꣢र꣣प꣢सो꣣ न꣢ वि꣣ष्टि꣡भिः꣢ समा꣣ने꣢न꣣ यो꣡ज꣢ने꣣ना꣡ प꣢रा꣣व꣡तः꣢ । इ꣢षं꣣ व꣡ह꣢न्तीः सु꣣कृ꣡ते꣢ सु꣣दा꣡न꣢वे꣣ वि꣢꣫श्वेदह꣣ य꣡ज꣢मानाय सु꣣न्व꣢ते ॥१७५७॥
पदार्थः(अपसः) कर्मण्य (नारीः न) नारियाँ जैसे (आ परावतः) दूरदेश से भी आकर (समानेन योजनेन) समान योजना बनाकर (विष्टिभिः) कर्मों द्वारा (सुकृते) धर्मात्मा (सुदानवे) उत्तम दानी मनुष्य को (इषम्) अन्न आदि पदार्थ और (सुन्वते) भक्तिरस प्रवाहित करनेवाले तथा (यजमानाय) यज्ञ करनेवाले पुरुष को (अह) निश्चय ही (विश्वा इत्) सभी अभीष्ट वस्तुएँ (वहन्तीः) प्राप्त कराती हुई, उसका (अर्चन्ति) सत्कार करती हैं, वैसे ही ये प्राकृतिक और आध्यात्मिक उषाएँ भी करती हैं ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजो शुभ कर्म करनेवाले धर्मात्मा, परोपकारी परमेश्वर के उपासक यज्ञकर्ता जन होते हैं, उनका जैसे नारियाँ सत्कार करती हैं, वैसे ही रात्रि के अन्त में लालिमा के साथ छिटकती हुई प्राकृतिक उषाएँ तथा योगमार्ग में अनुभव की हुई ज्योतिष्मती प्रजाएँ भी उनका अभिनन्दन करती हैं अर्थात् प्रेय-मार्ग तथा श्रेय-मार्ग में उनकी सहायता करती हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अश्विनौ| स्वर - निषादः
अ꣡बो꣢ध्य꣣ग्नि꣡र्ज्म उदे꣢꣯ति꣣ सू꣢र्यो꣣ व्यु꣢३꣱षा꣢श्च꣣न्द्रा꣢ म꣣꣬ह्या꣢꣯वो अ꣣र्चि꣡षा꣢ । आ꣡यु꣢क्षाताम꣣श्वि꣢ना꣣ या꣡त꣢वे꣣ र꣢थं꣣ प्रा꣡सा꣢वीद्दे꣣वः꣡ स꣢वि꣣ता꣢꣫ जग꣣त्पृ꣡थ꣢क् ॥१७५८॥
पदार्थः(अग्निः) यज्ञाग्नि (अबोधि) यज्ञकुण्ड में प्रबुद्ध हुआ है। पूर्व दिशा में (ज्मः) क्षितिज से (सूर्यः) सूर्य (उदेति) उदित हो रहा है। (चन्द्रा) आह्लाददायिनी (मही) महती (उषाः) उषा (अर्चिषा) प्रभा के साथ (वि आवः) आविर्भूत हो गयी है। (अश्विना) प्राणापानों ने (यातवे) चलने के लिए (रथम्) शरीर-रथ को (आयुक्षाताम्) नियुक्त कर दिया है। (देवः) प्रकाशक (सविता) सूर्य ने (जगत्) जड़-चेतन जगत् को (पृथक्) अलग-अलग (प्रासावीत्) प्रकट कर दिया है ॥१॥ यहाँ स्वभावोक्ति अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःप्रभात के रमणीय, स्वच्छ, स्फूर्तिदायक काल में सब स्त्री-पुरुषों को प्राणायाम की विधि से अष्टाङ्गयोग का अभ्यास करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अश्विनौ| स्वर - निषादः
य꣢द्यु꣣ञ्जा꣢थे꣣ वृ꣡ष꣢णमश्विना꣣ र꣡थं꣢ घृ꣣ते꣡न꣢ नो꣣ म꣡धु꣢ना क्ष꣣त्र꣡मु꣢क्षतम् । अ꣣स्मा꣢कं꣣ ब्र꣢ह्म꣣ पृ꣡त꣢नासु जिन्वतं व꣣यं꣢꣫ धना꣣ शू꣡र꣢साता भजेमहि ॥१७५९॥
पदार्थःहे (अश्विना) प्राणापानो ! (यत्) जब, तुम (वृषणम्) बलवान् (रथम्) शरीर-रथ को (युञ्जाथे) चलने के लिए नियुक्त करते हो तब (नः) हमारे (क्षत्रम्) क्षात्रबल को (घृतेन) तेज से और (मधुना) माधुर्य से (उक्षतम्) सींचो (अस्माकम्) हम वीरों की (पृतनासु) सेनाओं में (ब्रह्म) ब्रह्मबल को (जिन्वतम्) प्रेरित करो। (वयम्) हम वीर (शूरसाता) देवासुरसङ्ग्राम में (धना) दिव्य और भौतिक ऐश्वर्यों को (भजेमहि) प्राप्त करें ॥२॥
भावार्थःक्षत्रियों में केवल क्षात्रबल ही नहीं, प्रत्युत ब्रह्मबल भी अपेक्षित होता है। वैसे ही ब्राह्मणों में ब्रह्मबल के अतिरिक्त क्षात्रबल भी अभीष्ट होता है। दोनों के समन्वय से ही व्यक्तियों और राष्ट्रों की उन्नति होती है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -सत्रपर्व
छन्द -जगती| देवता -अश्विनौ| स्वर - निषादः
अ꣣र्वा꣡ङ्त्रि꣢च꣣क्रो꣡ म꣢धु꣣वा꣡ह꣢नो꣣ र꣡थो꣢ जी꣣रा꣡श्वो꣢ अ꣣श्वि꣡नो꣢र्यातु꣣ सु꣡ष्टु꣢तः । त्रि꣣वन्धुरो꣢ म꣣घ꣡वा꣢ वि꣣श्व꣡सौ꣢भगः꣣ शं꣢ न꣣ आ꣡ व꣢क्षद्द्वि꣣प꣢दे꣣ च꣡तु꣢ष्पदे ॥१७६०॥
पदार्थः(अश्विनोः) प्राणापानों का (त्रिचक्रः) आत्मा, मन और प्राण इन तीन चक्रोंवाला, (मधुवाहनः) मधुर गतिवाला, (जीराश्वः) वेगवान् इन्द्रिय-रूप घोड़ोंवाला, (सुष्टुतः) सुप्रंशसित, (त्रिबन्धुरः) सत्त्व, रजस्, तमस् इन तीन बन्धनोंवाला, (मघवा) ब्रह्मबल और क्षात्रबल रूप धनवाला, (विश्वसौभगः) सब सौभाग्यों से युक्त (रथः) देह-रूप रथ (अर्वाङ्) हमारे अनुकूल (यातु) चले। साथ ही (नः) हमारे (द्विपदे) दोपायों और (चतुष्पदे) चौपायों को (शम्) सुख (आवक्षत्) प्राप्त कराये ॥३॥
भावार्थःप्राणापानों के ही सामर्थ्य से मनुष्यों का शरीर-रथ सबल, सफल क्रियावाला, सज्जनों का हितकारी, गाय-घोड़े आदि उपयोगी पशुओं को सुख देनेवाला और दुष्टों का विध्वंस करनेवाला होता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्र꣢ ते꣣ धा꣡रा꣢ अस꣣श्च꣡तो꣢ दि꣣वो꣡ न य꣢꣯न्ति वृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣢च्छा꣣ वा꣡ज꣢ꣳ सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥१७६१॥
पदार्थःहे पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेवाले रसागर परमेश्वर ! (असश्चतः) किसी से भी रुकावट न डाली गई (ते) आपकी (धाराः) आनन्द-धाराएँ (सहस्रिणम्) सहस्र संख्यावाले (वाजम्) बल को (अच्छ) प्राप्त कराने के लिए (प्र यन्ति) उपासक के पास पहुँचती हैं, (दिवः) न जैसे आकाश से (वृष्टयः) वर्षाएँ (वाजम्) अन्न को (अच्छ) प्राप्त कराने के लिए (प्रयन्ति) भूतल पर पहुँचती हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजैसे मेघ से वर्षा की धाराएँ अन्न उत्पन्न करने के लिए खेतों पर बरसती हैं, वैसे ही जगदीश्वर से आनन्द की धाराएँ बल उत्पन्न करने के लिए उपासकों के अन्तरात्मा में बरसती हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣣भि꣢ प्रि꣣या꣢णि꣣ का꣢व्या꣣ वि꣢श्वा꣣ च꣡क्षा꣢णो अर्षति । ह꣡रि꣢स्तुञ्जा꣣न꣡ आयु꣢꣯धा ॥१७६२॥
पदार्थः(हरिः) मनोहर तथा दोषों को हरनेवाला परमेश्वर (विश्वा) सब (प्रियाणि) प्रिय (काव्या) हितकर वचनों को (चक्षाणः) बोलता हुआ और (आयुधा) शस्त्रास्त्रों को, अर्थात् काम-क्रोध आदि शत्रुओं के पराजय के लिए शत्रु-दलन-सामर्थ्यों को (तुञ्जानः) देता हुआ (अभि अर्षति) हमारे प्रति आ रहा है, अन्तरात्मा में प्रकट हो रहा है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर हमारे लिए हितकारी सन्देशों को प्रेरित करता है और शत्रुओं को हराने के लिए बल देता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡ म꣢र्मृजा꣣न꣢ आ꣣यु꣢भि꣣रि꣢भो꣣ रा꣡जे꣢व सुव्र꣣तः꣢ । श्ये꣣नो꣡ न वꣳसु꣢꣯ षीदति ॥१७६३॥
पदार्थःमनुष्यों को (आयुभिः) आयु के वर्षों से (मर्मृजानः) अलंकृत करता हुआ और (राजा इव) राजा के समान (इभः) निर्भय तथा (सुव्रतः) शुभ कर्मोंवाला (सः) वह पवमान सोम अर्थात् जगत् का उत्पत्तिकर्ता, शुभ गुणकर्मों को प्रेरित करनेवाला, शान्त परमेश्वर (वंसु) जिन्हें उसकी लौ लगी हुई है, उनके अन्दर (सीदति) बैठता है, (श्येनः न) जैसे बाज पक्षी (वंसु) वनों में (सीदति) बैठता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है। पहली पूर्णोपमा है और दूसरी शिलष्ट पूर्णोपमा, दोनों की संसृष्टि है ॥३॥
भावार्थःजिन्हें परमात्मा की चाह होती है, उनके प्रेम से परवश हुआ वह उनके हृदय में स्थित होकर निरन्तर शुभ प्रेरणा करता रहता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢ दि꣣वो꣢꣫ वसू꣣तो꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ अधि꣢꣯ । पु꣣नान꣡ इ꣢न्द꣣वा꣡ भ꣢र ॥१७६४॥
पदार्थःहे (इन्दो) आनन्द-रस से भिगोनेवाले रसागार जगदीश ! (पुनानः) पवित्र करते हुए (सः) वे धनाधीश आप (दिवः) आत्मलोक से (उत उ) और (पृथिव्याः अधि) पार्थिव देह से (विश्वा वसु) सब आत्मबल, योगसिद्धि, आरोग्य आदि धनों को (नः) हमारे लिए (आ भर) लाओ ॥४॥
भावार्थःपरमेश्वर की कृपा से हम शारीरिक उन्नति और आत्मिक उन्नति करते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस के अधिकारी हों ॥४॥ इस खण्ड में प्राकृतिक और आध्यात्मिक उषाओं, प्राणापानों से चालित शरीर-रथ, परमेश्वर और परमेश्वर से होनेवाली आनन्द-वर्षाओं का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ उन्नीसवें अध्याय में पाँचवाँ खण्ड समाप्त ॥ उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ अष्टम प्रपाठक में तृतीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प्रा꣢स्य꣣ धा꣡रा꣢ अक्षर꣣न्वृ꣡ष्णः꣢ सु꣣त꣡स्यौज꣢꣯सः । दे꣣वा꣡ꣳ अनु꣢꣯ प्र꣣भू꣡ष꣢तः ॥१७६५॥
पदार्थः(वृष्णः) मनोरथों को पूर्ण करनेवाले, (सुतस्य) प्रकट किये हुए, (ओजसः) ओजस्वी, (देवान्) विद्वान् उपासकों को (अनु) अनुकूलतापूर्वक (प्र भूषतः) दिव्य गुणों से अलंकृत करते हुए (अस्य) इस पवित्र करनेवाले रसागार परमात्मा की (धाराः) आनन्द-धाराएँ (प्र अक्षरन्) बरस रही हैं ॥१॥
भावार्थःमेघ से पवित्र जल-धाराओं के समान रसमय परमेश्वर से जो पवित्र और पवित्रतादायिनी परमानन्द की धाराएँ बरसती हैं, उनमें सबको चाहिए कि वे अपने आत्मा को नहलाएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
स꣡प्तिं꣢ मृजन्ति वे꣣ध꣡सो꣢ गृ꣣ण꣡न्तः꣢ का꣣र꣡वो꣢ गि꣣रा꣢ । ज्यो꣡ति꣢र्जज्ञा꣣न꣢मु꣣꣬क्थ्य꣢꣯म् ॥१७६६॥
पदार्थः(गिरा) वाणी से (गृणन्तः) अर्चना करते हुए (वेधसः) मेधावी (कारवः) स्तोता लोग (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय (ज्योतिः) प्रकाश को (जज्ञानम्) उत्पन्न करनेवाले (सप्तिम्) सप्तरश्मि सूर्य के समान विद्यमान सोम परमात्मा को (सृजन्ति) अपने आत्मा में प्रकट करते हैं ॥२॥
भावार्थःसूर्य के समान प्रकाशक परमेश्वर की उपासना से उपासक के आत्मा में दिव्य ज्योति का प्रकाश फैल जाता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
सु꣣ष꣡हा꣢ सोम꣣ ता꣡नि꣢ ते पुना꣣ना꣡य꣢ प्रभूवसो । व꣡र्धा꣢ समु꣣द्र꣡मु꣢क्थ्य ॥१७६७॥
पदार्थः(हे प्रभूवसो) प्रचुर ऐश्वर्यवाले (सोम) जगत्पति, सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ! (पुनानाय) स्वयं को पवित्र करनेवाले उपासक के लिये (ते) आपके (तानि) वे प्रसिद्ध तेज (सुषहा) भली-भाँति काम, क्रोध आदि रिपुओं को परास्त करनेवाले होवें। हे (उक्थ्य) प्रशंसनीय सोम अर्थात् चन्द्रमा के समान आह्लादक परमात्मदेव ! आप (समुद्रम्) ऐश्वर्य के समुद्र को (वर्ध) बढ़ाओ ॥३॥
भावार्थःपूर्ण चन्द्रमा-रूप सोम जैसे पानी के समुद्र को बढ़ाता है, वैसे ही भक्ति के उपहारों से पूर्ण सोम परमेश्वर उपासक के लिए भौतिक और दिव्य ऐश्वर्य के समुद्र को बढ़ाता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
ए꣣ष꣢ ब्र꣣ह्मा꣢꣫ य ऋ꣣त्वि꣢य꣣ इ꣢न्द्रो꣣ ना꣡म꣢ श्रु꣣तो꣢ गृ꣣णे ॥१७६८॥
पदार्थः(एषः) यह जगदीश्वर वा आचार्य (ब्रह्मा) चारों वेदों का ज्ञाता है, (यः) जो (ऋत्वियः) ऋतुओं का स्वामी वा ऋतु-ऋतु में विद्या की वर्षा करनेवाला है, उस जगदीश्वर वा आचार्य का (इन्द्रः नाम) इन्द्र नाम है। उसके द्वारा मैं (श्रुतः) कीर्तिमान् वा बहुश्रुत किया गया हूँ। उसकी मैं (गृणे) अर्चना वा स्तुति करता हूँ ॥१॥
भावार्थःजैसे सृष्टि के आदि में चारों वेदों का प्रकाशक, सब ऋतुओं को रचनेवाला परमेश्वर सबके द्वारा पूजा करने योग्य है, वैसे ही वेद-वेदाङ्गों को पढ़ानेवाला, प्रत्येक ऋतु में विद्या की वर्षा करनेवाला आचार्य भी सत्कार के योग्य है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्वा꣡मिच्छ꣢꣯वसस्पते꣣ य꣢न्ति꣣ गि꣢रो꣣ न꣢ सं꣣य꣡तः꣢ ॥१७६९॥
पदार्थःहे (शवसः पते) अध्यात्म-बल, ब्रह्मबल वा विद्याबल के स्वामी परमेश्वर वा आचार्य ! (गिरः न) वाणियों के समान (संयतः) प्रत्यनशील प्रजाएँ भी (त्वाम् इत्) आपको ही (यन्ति) प्राप्त होती हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजैसे वेदवाणियाँ जगदीश्वर के गुणों का वर्णन करती हैं और पुरुषार्थी प्रजाएँ उसे पाने का यत्न करती हैं, वैसे ही आचार्य की भी वाणियों से स्तुति करनी चाहिए तथा प्रयत्नशील विद्यार्थियों को शिष्यभाव से उसके समीप पहुँचना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
वि꣢ स्रु꣣त꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थ꣢꣫ इन्द्र त्वद्यन्तु रातयः ॥१७७०॥
पदार्थः(यथा) जिस प्रकार (पथः) राजमार्ग से (सुतयः) छोटे-छोटे मार्ग विविध दिशाओं में जाते हैं, उसी प्रकार हे (इन्द्र) जगदीश्वर वा आचार्य ! (त्वत्) आपके पास से (रातयः) ऐश्वर्यों के दान वा विद्या-दान (वियन्तु) विविध लोगों के पास जाएँ ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे राजमार्ग से विविध छोटे-छोटे मार्ग निकल कर पथिकों का उपकार करते हैं, वैसे ही परमेश्वर और आचार्य से दिव्य गुण-कर्म और विविध विद्याएँ निकल कर उपासकों वा शिष्यों को उपकृत करें ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣢ त्वा꣣ र꣢थं꣣ य꣢थो꣣त꣡ये꣢ सु꣣म्ना꣡य꣢ वर्तयामसि । तु꣣विकूर्मि꣡मृ꣢ती꣣ष꣢हमि꣡न्द्रं꣢ शविष्ठ꣣ स꣡त्प꣢तिम् ॥१७७१॥
पदार्थःहे (शविष्ठ) बलिष्ठ परमेश्वर वा जीवात्मन् ! (तुविकूर्मिम्) बहुत-से कर्मों के कर्ता, (ऋतीषहम्) आक्रामक शत्रु-सेनाओं को पराजित करनेवाले, (सत्पतिम्) सज्जनों के पालनकर्ता (इन्द्रं त्वा) सत्य, अहिंसा आदि ऐश्वर्यों से युक्त, विघ्नों को दूर करने में समर्थ आप परमेश्वर वा जीवात्मा को, हम (ऊतये) रक्षा के लिए और (सुम्नाय) सुख के लिए (आवर्तयामसि) अपनी ओर प्रवृत्त करते हैं, (यथा) जिस प्रकार (रथम्) रथ को प्रवृत्त किया जाता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्य यदि परमेश्वर की उपासना करे और उसका आत्मा यदि जागरूक तथा सक्रिय हो जाए, तो वह महान् उत्कर्ष और मोक्ष को भी प्राप्त कर सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
तु꣡वि꣢शुष्म꣣ तु꣡वि꣢क्रतो꣣ श꣡ची꣢वो꣣ वि꣡श्व꣢या मते । आ꣡ प꣢प्राथ महित्व꣣ना꣢ ॥१७७२॥
पदार्थःहे (तुविशुष्म) बहुत बलवान्, (तुविक्रतो) बहुत प्रज्ञावाले वा बहुत-से यज्ञों को करनेवाले, (शचीवः) कर्मवान् (मते) मननशील परमेश्वर वा जीवात्मन् ! आप (विश्वया) बहुत प्रकार के (महित्वना) महत्त्वों से (आ पप्राथ) परिपूर्ण हो ॥२॥
भावार्थःयद्यपि महत्त्व में परमेश्वर जीवात्मा से अधिक है, तो भी दोनों ही बलवान् बुद्धिमान्, मननशील और कर्मण्य हैं। जैसे परमेश्वर के बिना ब्रह्माण्ड की व्यवस्था नहीं चल सकती, वैसे ही जीवात्मा के बिना शरीर की व्यवस्था नहीं होती ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡स्य꣢ ते महि꣣ना꣢ म꣣हः꣡ परि꣢꣯ ज्मा꣣य꣡न्त꣢मी꣣य꣡तुः꣢ । ह꣢स्ता꣣ व꣡ज्र꣢ꣳ हिर꣣ण्य꣡य꣢म् ॥१७७३॥
पदार्थःहे इन्द्र ! हे परमेश्वर वा जीवात्मन् ! (महः) महान् (यस्य ते) जिस तेरी (महिना) महिमा से (हस्ता) मनुष्य के दोनों हाथ (ज्मायन्तम्) पृथिवी के समान आचरण करनेवाले अर्थात् विशाल, (हिरण्ययम्) ज्योतिर्मय (वज्रम्) व को (परि ईयतुः) ग्रहण करते हैं, वह तू (महित्वना आपप्राथ) महिमा से परिपूर्ण है। [यहाँ ‘महित्वना आपप्राथ’ यह वाक्यपूर्ति के लिए पूर्व मन्त्र से लिया गया है] ॥३॥
भावार्थःमनुष्य जो विविध शस्त्रास्त्रों का ग्रहण, उन्हें चलाना, शत्रु को जीतना आदि महान् कर्मों को करने में समर्थ होता है, वह महिमा परमेश्वर और जीवात्मा की ही है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
आ꣢꣯ यः पुरं꣣ ना꣡र्मि꣢णी꣣म꣡दी꣢दे꣣द꣡त्यः꣢ क꣣वि꣡र्न꣢भ꣣न्यो꣢३ ना꣡र्वा꣢ । सू꣢रो꣣ न꣡ रु꣢रु꣣क्वा꣢ञ्छ꣣ता꣡त्मा꣢ ॥१७७४॥
पदार्थः(यः) जो अग्नि अर्थात् नेता जीवात्मा (नार्मिणीम्) हास-विलास युक्त (पुरम्) देह-नगरी को (आ अदीदेत्) तेज से दीप्तिमान् करता है, वह (अत्यः) एक शरीर से दूसरे शरीर में जानेवाला अथवा मोक्ष को प्राप्त करनेवाला (कविः) दूरदर्शी प्रज्ञावाला, (नभन्यः न) आकाशवर्ती वायु के समान (अर्वा) दोषों का हिंसक और (सूरः न) सूर्य के समान (रुरुक्वान्) तेजस्वी तथा (शतात्मा) शरीर से शतायु होवे ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजीवात्मा पूर्वजन्म में किये हुए शुभ कर्मों के अनुसार मानव-देह प्राप्त करके बुद्धि के विवेक से कर्त्तव्य कर्मों को करता हुआ वायु के समान सब दोषों को विनष्ट करके सूर्य के समान तेजस्वी होता हुआ उत्कर्ष को प्राप्त करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
अ꣣भि꣢ द्वि꣣ज꣢न्मा꣣ त्री꣡ रो꣢च꣣ना꣢नि꣣ वि꣢श्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि शुशुचा꣣नो꣡ अ꣢स्थात् । हो꣢ता꣣ य꣡जि꣢ष्ठो अ꣣पा꣢ꣳ स꣣ध꣡स्थे꣢ ॥१७७५॥
पदार्थः(द्विजन्मा) एक जन्म माता-पिता से और दूसरा जन्म आचार्य तथा विद्या से, इस प्रकार जिसने दो जन्म प्राप्त किये हैं, वह (त्री रोचनानि) दैहिक, आत्मिक और समाजिक तीन तेजों को (अभि) प्राप्त करके (विश्वा रजांसि) सब रजोगुणों को (शुशुचानः) सत्त्व गुण से प्रकाशित करता हुआ, (होता) होम करनेवाला, (अपां सधस्थे) नदियों के सङ्गम पर (यजिष्ठः) अतिशय परमेश्वर-पूजा रूप यज्ञ को करनेवाला होकर (अस्थात्) निवास करता है ॥२॥
भावार्थःमनुष्य माता-पिता से जन्म पाकर यथासमय गुरुकुल में प्रविष्ट होकर, विद्याएँ पढ़कर, तेज प्राप्त करके, आचार्य के गर्भ से दूसरा जन्म पाकर, समावर्तन संस्कार करा कर, स्नातक बनकर, घर जाकर ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ आदि शुभकर्मों को करता हुआ और दूसरे मनुष्यों को उपदेश द्वारा धार्मिक बनाता हुआ जीवन व्यतीत करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
अ꣣य꣢꣫ꣳ स होता꣣ यो꣢ द्वि꣣ज꣢न्मा꣣ वि꣡श्वा꣢ द꣣धे꣡ वार्या꣢꣯णि श्रव꣣स्या꣢ । म꣢र्तो꣣ यो꣡ अ꣢स्मै सु꣣तु꣡को꣢ द꣣दा꣡श꣢ ॥१७७६॥
पदार्थः(यः द्विजन्मा) जो माता-पिता से एक और आचार्य से दूसरा इस प्रकार दो जन्म प्राप्त करके द्विज हो जाता है, (सः अयम्) वह यह (होता) सबको विद्या, सुख आदि देनेवाला और होम करनेवाला होता है। साथ ही (विश्वा) सब (श्रवस्या) यश के योग्य (वार्याणि) वरणीय यम, नियम आदि कर्मों को (दधे) अपने जीवन में धारण कर लेता है। (यः) और जो (मर्तः) मनुष्य अर्थात् आचार्य (अस्मै) इसे (ददाश) विद्या देता है, वह उस सुशिक्षित विद्वान् द्विज से (सुतुकः) सुपुत्रवान् हो जाता है ॥३॥
भावार्थःआचार्य से विद्या पढ़कर, स्नातक हो, द्विज बनकर ऐसा आचरण करे, जिससे उसका यश सब जगह फैले। ऐसे गुणवान् द्विज से सचमुच आचार्य भी स्वयं को सुपुत्रवान् मानता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -पदपङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢ग्ने꣣ त꣢म꣣द्या꣢श्वं꣣ न꣢꣫ स्तोमैः꣣ क्र꣢तुं꣣ न꣢ भ꣣द्र꣡ꣳ हृ꣢दि꣣स्पृ꣡श꣢म् । ऋ꣣ध्या꣡मा꣢ त꣣ ओ꣡हैः꣢ ॥१७७७॥
पदार्थःहे (अग्ने) जीवननायक परमेश्वर ! (अद्य) आज (अश्वं न) व्यापक सूर्य के समान प्रकाशमान और (क्रतुं न) यज्ञ-कर्म के समान (भद्रम्) भद्र, (हदिस्पृशम्) हृदय में निवास करनेवाले (तम्) उस शरीरवर्ती अपने अन्तरात्मा को (ते ओहैः) तेरे द्वारा प्रेरित (स्तोमैः) वेदमन्त्रों से, हम (ऋध्याम) बढ़ायें, उद्बोधन दें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःजो तेजस्वी और कर्मण्य जीवात्मा सबके ह्रदय में स्थित है,उसे उद्बोधक वेदमन्त्रों से अधिकाधिक उद्बोधन देना चाहिए तथा गुणगरिमा से बढ़ाना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -पदपङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢धा꣣꣬ ह्य꣢꣯ग्ने꣣ क्र꣡तो꣢र्भ꣣द्र꣢स्य꣣ द꣡क्ष꣢स्य सा꣣धोः꣢ । र꣣थी꣢रृ꣣त꣡स्य꣢ बृह꣣तो꣢ ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१७७८॥
पदार्थः(अध) और हे (अग्ने) जीवन को उन्नत करनेवाले परमात्मदेव ! आप (भद्रस्य क्रतोः) शुभकर्म के, (साधोः दक्षस्य) साधु बल के और (बृहतः ऋतस्य) महान् सत्य के (रथीः) स्वामी (हि) निश्चय ही (बभूथ) हो ॥२॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर श्रेष्ठ कर्म, बल और सत्य का अधिपति है, वैसे ही मनुष्यों को भी होना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -पदपङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
ए꣣भि꣡र्नो꣢ अ꣣र्कै꣡र्भवा꣢꣯ नो अ꣣र्वा꣢ङ् स्वा३꣱र्ण꣡ ज्योतिः꣢꣯ । अ꣢ग्ने꣣ वि꣡श्वे꣢भिः सु꣣म꣢ना꣣ अ꣡नी꣢कैः ॥१७७९॥
पदार्थःहे (अग्ने) जीवनाधार, सर्वान्तर्यामी जगदीश ! आप (एभिः) इन (अर्कैः) अर्चना के साधन वेदमन्त्रों द्वारा (नः अर्वाङ्) हमारे अभिमुख (भव) होओ ! आप (स्वः न) सूर्य के समान (ज्योतिः) ज्योतिःस्वरूप हो। (सुमनाः) प्रसन्न मनवाले आप (विश्वेभिः) सब (अनीकैः) सद्गुणों की सेनाओं के साथ वा तेजों के साथ (नः अर्वाङ् भव) हमारे अभिमुख होओ ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे सूर्य अपनी किरणों से हमारे अभिमुख होता है, वैसे ही जगदीश्वर सब सद्गुणों और तेजों के साथ हमें प्राप्त हो ॥३॥ इस खण्ड में आनन्द-धाराओं, परमेश्वर, जीवात्मा और द्विजन्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ संगति है ॥ बीसवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - मध्यमः
अ꣢ग्ने꣣ वि꣡व꣢स्वदु꣣ष꣡स꣢श्चि꣣त्र꣡ꣳ राधो꣢꣯ अमर्त्य । आ꣢ दा꣣शु꣡षे꣢ जातवेदो वहा꣣ त्व꣢म꣣द्या꣢ दे꣣वा꣡ꣳ उ꣢ष꣣र्बु꣡धः꣢ ॥१७८०॥
पदार्थःहे (अमर्त्य) अमर कीर्तिवाले, (जातवेदः) योग का ज्ञान देनेवाले (अग्ने) योगिराज ! (त्वम्) आप (अद्य) आज (दाशुषे) आत्मसमर्पणकर्ता मेरे लिए (विवस्वत्) तामस वृत्तियों के अन्धकार को दूर करनेवाले, (उषसः) योगमार्ग में उदित हुई ज्योतिष्मती प्रज्ञा के (चित्रम्) अद्भुत (राधः) ऐश्वर्य को और (उषर्बुधः देवान्) उषाकाल में जागनेवाले दिव्य गुणों को (आ वह) प्राप्त कराओ ॥१॥
भावार्थःपरमात्मा की कृपा से, जीवात्मा के निरन्तर किये जानेवाले प्रयत्न से और योग सिखानेवाले गुरु की शिक्षा से उत्तरोत्तर नवीन-नवीन उपलब्धियाँ योगाभ्यासी को होती हैं और विवेकख्याति द्वारा मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
जु꣢ष्टो꣣ हि꣢ दू꣣तो꣡ असि꣢꣯ हव्य꣣वा꣢ह꣣नो꣡ऽग्ने꣢ र꣣थी꣡र꣢ध्व꣣रा꣡णा꣢म् । स꣣जू꣢र꣣श्वि꣡भ्या꣢मु꣣ष꣡सा꣢ सु꣣वी꣡र्य꣢म꣣स्मे꣡ धे꣢हि꣣ श्र꣡वो꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥१७८१॥
पदार्थःहे (अग्ने) मार्गदर्शक योगिराज ! (जुष्टः) सेवन किये हुए आप (हि) निश्चय ही (दूतः) दोषों को तपा डालनेवाले, (हव्यवाहनः) प्राप्तव्य योगसिद्धियों को प्राप्त करानेवाले और (अध्वराणाम्) किये जानेवाले अष्टाङ्गयोग रूप यज्ञों के (रथीः) चालक (असि) हो। आप (अश्विभ्याम्) प्राणापानों से (उषसा) तथा ज्योतिष्मती प्रज्ञा से (सजूः) सहायवान् होकर (अस्मे) हमें (सुवीर्यम्) सुवीर्ययुक्त (बृहत् श्रवः) योगशास्त्र का महान् ज्ञान और उससे मिलनेवाला यश (धेहि) प्रदान करो ॥२॥
भावार्थःअष्टाङ्गयोग का अभ्यास करनेवाले मनुष्य के लिए प्रणव-जप, परमेश्वर की उपासना और योग के गुरु द्वारा बताये हुए मार्ग का अनुसरण करना लक्ष्यप्राप्ति में परम सहायक होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
वि꣣धुं꣡ द꣢द्रा꣣ण꣡ꣳ सम꣢꣯ने बहू꣣नां꣢ युवा꣢꣯न꣣ꣳ स꣡न्तं꣢ पलि꣣तो꣡ ज꣢गार । दे꣣व꣡स्य꣢ पश्य꣣ का꣡व्यं꣢ महि꣣त्वा꣢꣫द्या म꣣मा꣢र꣣ स꣡ ह्यः समा꣢꣯न ॥१७८२॥
पदार्थः(समने) सङ्ग्राम में (बहूनाम्) अनेक शत्रुओं को (विधुम्) बींधनेवाले, (दद्राणम्) उनकी दुर्गति करनेवाले (युवानं सन्तम्) युवा होते भी किसी वीर को (पलितः) बूढ़ा काल (जगार) निगल लेता है। (देवस्य) क्रीडा करनेवाले जगत्पति इन्द्र परमेश्वर के (महित्वा) महान् (काव्यम्) जगत्-रूप दृश्य काव्य को (पश्य) देखो, कि (सः) वह (अद्य) आज (ममार) मरा पड़ा है (यः) जो (ह्यः) कल (समान) भली-भाँति साँस ले रहा था, जीवित था ॥१॥
भावार्थःबड़ी भारी शक्ति जिनके पास होती है, वे भी मृत्यु के मुख में जाने से नहीं बच पाते, यह देखकर धर्म-कर्मों में और परमात्मा के चिन्तन में मन लगाना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
शा꣡क्म꣢ना शा꣣को꣡ अ꣢रु꣣णः꣡ सु꣢प꣣र्ण꣢꣫ आ यो म꣣हः꣡ शूरः꣢꣯ स꣣ना꣡दनी꣢꣯डः । य꣢च्चि꣣के꣡त꣢ स꣣त्य꣢꣫मित्तन्न मोघं꣣ व꣡सु꣢ स्पा꣣र्ह꣢मु꣣त꣢꣫ जेतो꣣त꣡ दाता꣢꣯ ॥१७८३॥
पदार्थः(शाक्मना) शक्ति से (शाकः) शक्तिमान्, (अरुणः) तेज से देदीप्यमान, (सुपर्णः) उत्कृष्ट पालनकर्ता इन्द्र जगदीश्वर (आ) हमारे पास आये, (यः) जो (महः) महान्, (शूरः) वीर (सनात्) सदा से (अनीडः) बिना घरवाला है। वह (यत् चिकेत) जो कुछ जानता है (तत् सत्यम् इत) वह सत्य ही होता है, (न मोघम्) असत्य नहीं। वह (स्पार्हम्) चाहने योग्य (वसु) आध्यात्मिक और भौतिक ऐश्वर्य का (उत जेता) विजेता भी होता है। (उत दाता) और दाता भी ॥२॥
भावार्थःजो इन्द्र परमेश्वर सर्वशक्तिमान्, तेजस्वी, मनस्वी, पालनकर्ता, पूर्णकर्ता, महान्, शूर, सत्य ज्ञानवाला, ऐश्वर्यशाली और ऐश्वर्य का दाता है, उसकी उपासना और उसका अभिनन्दन सबको करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
ऐ꣡भि꣢र्ददे꣣ वृ꣢ष्ण्या꣣ पौ꣡ꣳस्या꣢नि꣣ ये꣢भि꣣रौ꣡क्ष꣢द्वृत्र꣣ह꣡त्या꣢य व꣣ज्री꣢ । ये꣡ कर्म꣢꣯णः क्रि꣣य꣡मा꣢णस्य म꣣ह्न꣡ ऋ꣢ते क꣣र्म꣢मु꣣द꣡जा꣢यन्त दे꣣वाः꣢ ॥१७८४॥
पदार्थः(मह्नः कर्मणः) महान् सृष्टयुत्पत्ति आदि कर्म के किये जाते समय (ये देवाः) जो दिव्यगुण, इन्द्र परमेश्वर में (ऋते कर्मम्) बिना प्रयत्न के स्वभावतः (उदजायन्त) प्रकट हुए, (येभिः) जिन दिव्य गुणों से (वज्री) वज्रधारी के समान उस जगदीश्वर ने (वृत्रहत्याय) विघ्नों के विनाशार्थ (औक्षत्) जीवात्मा को सींचा, (एभिः) उन दिव्य गुणों से वह, आज भी (वृष्ण्या) सुखवर्षक (पौंस्यानि) बलयुक्त कर्मों को (आददे) करता है ॥३॥
भावार्थःपरमेश्वर में स्वभावतः सदा रहनेवाले जो गुण हैं, उन्हीं से वह सारे सृष्टि के कार्य को करता है। उन गुणों में से कुछ अंश वह मनुष्यों में भी निहित कर देता है, जिससे वे विघ्न, पाप, दोष आदि के विनाश में समर्थ होते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣢स्ति꣣ सो꣡मो꣢ अ꣣य꣢ꣳ सु꣣तः꣡ पिब꣢꣯न्त्यस्य म꣣रु꣡तः꣢ । उ꣣त꣢ स्व꣣रा꣡जो꣢ अ꣣श्वि꣡ना꣢ ॥१७८५॥
पदार्थः(अयम्) यह (सोमः) आनन्द-रस (सुतः अस्ति) परमेश्वर के पास से परिस्रुत किया गया है। (स्वराजः अस्य) निज दीप्तिवाले इस रस को (मरुतः) प्राण (उत) और (अश्विनौ) आत्मा तथा मन (पिबन्ति) पीते हैं ॥१॥
भावार्थःउपासकों द्वारा परमात्मा के ध्यान से जो ब्रह्मानन्द-रस प्राप्त किया जाता है, उससे आत्मा, मन, प्राण आदि सभी तरङ्गित हो जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -सोमः| स्वर - षड्जः
पि꣡ब꣢न्ति मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣡ तना꣢꣯ पू꣣त꣢स्य꣣ व꣡रु꣢णः । त्रि꣣षधस्थ꣢स्य꣣ जा꣡व꣢तः ॥१७८६॥
पदार्थः(तना) विस्तृत रूप से (पूतस्य) पवित्र, (त्रिषधस्थस्य) आत्मा, मन, प्राण इन तीन स्थानों में स्थित (जावतः) वेगयुक्त ब्रह्मानन्द-रस को (मित्रः) मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा वृत्तियों से युक्त योगी, (अर्यमा) सूर्यवत् तेजस्वी एवं ज्योतिष्मती प्रज्ञा से युक्त योगी और (वरुणः) व्याधि, स्त्यान, संशय आदि विघ्नों का जिसने निवारण कर दिया है, ऐसे योगी (पिबन्ति) पान करते हैं ॥२॥
भावार्थःपरिपक्व योगी ही समाधि में स्थित होकर पवित्र ब्रह्मानन्द-रस का आस्वादन करते हैं ॥२॥
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छन्द -गायत्री| देवता -सोमः| स्वर - षड्जः
उ꣣तो꣡ न्व꣢स्य꣣ जो꣢ष꣣मा꣡ इन्द्रः꣢꣯ सु꣣त꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तः । प्रा꣣त꣡र्होते꣢꣯व मत्सति ॥१७८७॥
पदार्थः(उत उ नु) और (प्रातः) प्रातःकाल (सुतस्य) ब्रह्मयज्ञ द्वारा परिस्रुत, (गोमतः) प्रकाशयुक्त (अस्य) इस ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस के (जोषम्) सेवन की (इन्द्रः) योगी मनुष्य (मत्सति) स्तुति करता है, (होता इव) जैसे होम करनेवाला मनुष्य अग्नि की स्तुति करता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे प्रातःकाल देवयज्ञ में अग्नि में होम करनेवाला पुरुष अग्नि की स्तुति करता है, वैसे ही योगी ब्रह्मयज्ञ में परमात्मा की सङ्गति से प्राप्त आनन्द की स्तुति करता है ॥३॥
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छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -सूर्यः| स्वर - मध्यमः
ब꣢ण्म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि सूर्य꣣ ब꣡डा꣢दित्य म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि । म꣣ह꣡स्ते꣢ स꣣तो꣡ म꣢हि꣣मा꣡ प꣢निष्टम म꣣ह्ना꣡ दे꣢व म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि ॥१७८८॥
पदार्थः(बट्) सचमुच, हे (सूर्य) सूर्य ! तू (महान् असि) विशाल है, (बट्) सचमुच हे (आदित्य) आदित्य ! तू (महान् असि) महान् है। हे (पनिष्टम) सौरमण्डल में सबसे अधिक स्तुति योग्य ! (महः सतः ते) तुझ तेजस्वी की (महिमा) महिमा अद्भुत है। हे (देव) प्रकाशक ! तू (मह्ना) महिमा से (महान् असि) महान् है—यह सूर्य की अन्योक्ति से जीवात्मा को कहा गया है ॥१॥ यहाँ अन्योक्ति अलङ्कार है ॥१॥
भावार्थःसूर्य परिणाम में महान् है, क्योंकि उसकी परिधि आठ लाख कोस की लम्बाई से भी अधिक है; कर्म से महान् है, क्योंकि सब ग्रहोपग्रहों का प्रकाशक और जीवनाधार है; गुरुत्वाकर्षण में महान् है, क्योंकि सब आकाशीय पिण्डों को अपने आकषर्ण से धारण किये हुए है; ज्योति में महान् है, क्योंकि ज्योति का पुञ्ज ही है। इसी प्रकार मनुष्य के आत्मा में भी बहुत बड़ी शक्ति निहित है, उसे पहचानकर वह महान् कर्मों को करे, यह उसे उद्बोधन दिया गया है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -प्रायश्चित्तपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -सूर्यः| स्वर - पञ्चमः
ब꣡ट् सू꣢र्य꣣ श्र꣡व꣢सा म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि स꣣त्रा꣡ दे꣢व म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि । म꣣ह्ना꣢ दे꣣वा꣡ना꣢मसु꣣꣬र्यः꣢꣯ पु꣣रो꣡हि꣢तो वि꣣भु꣢꣫ ज्योति꣣र꣡दा꣢भ्यम् ॥१७८९॥
पदार्थः(बट्) सचमुच हे (सूर्य) सूर्य ! तू (श्रवसा) यश से (महान् असि) महान् है। (सत्रा) सचमुच ही, हे (देव) ज्योतिर्मय ! तू (महान् असि) महान् है। (असुर्यः) प्राणियों का हितकर्त्ता तू (मह्ना) महिमा से (देवानाम्) भूमण्डल, सोम, मङ्गल, बुध आदि प्रकाशनीयों के (पुरोहितः) सामने निहित है, जिससे उन्हें प्रकाशित कर सके। तू (विभु) व्यापक, (अदाभ्यम्) हिंसा न किये जा सकने योग्य (ज्योतिः) ज्योति है—यह सूर्य की अन्योक्ति से जीवात्मा को कहा गया है ॥२॥ यहाँ भी अन्योक्ति अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा भी सूर्य के समान यशस्वी, गुणों में महान्, अग्रणी और ज्योतिष्मान् है, इसलिए वह अपने गुणों को पहचान कर महान् कर्मों को करता हुआ अभ्युदय और निःश्रेयस को प्राप्त करे ॥२॥ इस खण्ड में अध्यात्मयोग, मृत्यु की अवश्यंभाविता, परमात्मा, ब्रह्मानन्द-रस, आत्मोद्बोधन इन विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ संगति है ॥ बीसवें अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣तं꣢ या꣣हि꣡ म꣢दानां पते । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१७९०॥
पदार्थःहे (मदानां पते) आनन्ददायक ज्ञानों और कर्मों के स्वामी जीवात्मन् ! तू (नः) हमारी (हरिभिः) ज्ञानेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पन्न किये ज्ञान को (उप याहि) प्राप्त कर, (नः) हमारी (हरिभिः) कर्मेन्द्रियों से (सुतम्) किये गये कर्म को (उप याहि) प्राप्त कर ॥१॥
भावार्थःमनसहित ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय रूप साधनों से निष्पन्न किये गये ज्ञान और कर्म का सङ्ग्रह करके मनुष्य का जीवात्मा अध्यात्ममार्ग में पग रख कर उन्नति प्राप्त करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
द्वि꣣ता꣡ यो वृ꣢꣯त्र꣣ह꣡न्त꣢मो वि꣣द꣡ इन्द्रः꣢꣯ श꣣त꣡क्र꣢तुः । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१७९१॥
पदार्थः(यः इन्द्रः) जो जीवात्मा (वृत्रहन्तमः) काम, क्रोध आदि शत्रुओं का तथा व्याधि, स्त्यान आदि योग-विघ्नों का अतिशय विनाशक (शतक्रतुः) और बहुत से यज्ञ करनेवाला, इस प्रकार (द्विता) दो रूपों में (विदे) जाना जाता है, वह (नः) हमारे (हरिभिः) ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पन्न किये गये ज्ञान और कर्म को (उप) समीपता से प्राप्त करे ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा के दो प्रकार के कर्म हैं, एक शत्रुओं का वध और दूसरा योग आदि यज्ञ की पूर्ति। उन्हें करने के लिए वह ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का उपयोग करके उन्नति के शिखर पर चढ़े ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
त्व꣡ꣳ हि वृ꣢꣯त्रहन्नेषां पा꣣ता꣡ सोमा꣢꣯ना꣣म꣡सि꣢ । उ꣡प꣢ नो꣣ ह꣡रि꣢भिः सु꣣त꣢म् ॥१७९२॥
पदार्थःहे (वृत्रहन्) काम, क्रोध आदि छह रिपुओं के और योगमार्ग में आये हुए विघ्नों के विनाशक जीवात्मन् ! (त्वं हि) तू निश्चय ही (एषाम्) इन (सोमानाम्) ज्ञान-रसों और कर्म-रसों का (पाता) पान करनेवाला (असि) है। (नः) हमारे (हरिभिः) मनसहित ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से (सुतम्) उत्पन्न किये गये ज्ञान और कर्म को (उप) समीपता से प्राप्त कर ॥३॥
भावार्थःजीवात्मा को योग्य है कि वह शुभ ज्ञान और कर्म का सम्पादन करके योग की विधि से परमात्मा के साक्षात्कार द्वारा मोक्ष प्राप्त करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
प्र꣡ वो꣢ म꣣हे꣡ म꣢हे꣣वृ꣡धे꣢ भरध्वं꣣ प्र꣡चे꣢तसे꣣ प्र꣡ सु꣢म꣣तिं꣡ कृ꣢णुध्वम् । वि꣡शः꣢ पू꣣र्वीः꣡ प्र च꣢꣯र चर्षणि꣣प्राः꣢ ॥१७९३॥
पदार्थःहे विद्यार्थियो वा प्रजाओ ! तुम (महेवृधे) महत्त्व के लिए बढ़ानेवाले, (महे) महान् इन्द्र अर्थात् आचार्य वा परमात्मा के लिए (प्र भरध्वम्) उत्तम उपहार लाओ। (प्रचेतसे) प्रकृष्ट चित्त वा प्रकृष्ट ज्ञानवाले उसके लिए (सुमतिम्) उत्तम स्तुति (प्र कृणुध्वम्) भली-भाँति करो। हे आचार्य वा परमात्मन्! (चर्षणिप्राः) मनुष्यों को विद्या,धन, धान्य और सद्गुणों से पूर्ण करनेवाले आप (विशः) विद्यार्थियों वा प्रजाओं को (पूर्वीः) श्रेष्ठ (प्रचर) करो ॥१॥
भावार्थःजैसे जगदीश्वर मनुष्यों को सुखी करता है, वैसे ही आचार्य का भी यह कर्तव्य है कि वह छात्रों को विद्या आदि से पूर्ण करके सुखी करे और उनमें योगाभ्यास आदि की अभिरुचि उत्पन्न करके उन्हें अध्यात्म-मार्ग का पथिक बनाये ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
उ꣣रुव्य꣡च꣢से म꣣हि꣡ने꣢ सुवृ꣣क्ति꣢मिन्द्रा꣢꣯य꣣ ब्र꣡ह्म꣢ जनयन्त꣣ वि꣡प्राः꣢ । त꣡स्य꣢ व्र꣣ता꣢नि꣣ न꣡ मि꣢नन्ति꣣ धी꣡राः꣢ ॥१७९४॥
पदार्थः(उरुव्यचसे) विद्या आदि में बहुत व्याप्तिवाले (महिने) महान् (इन्द्राय) परमात्मा वा आचार्य के लिए अर्थात् उनकी प्रसन्नता के लिए (विप्राः) विद्वान् जन (सुवृक्त्तिम्) उत्तम क्रिया और (ब्रह्म) ज्ञान-सङ्ग्रह (जनयन्त) करते हैं। (धीराः) बुद्धिमान् वे (तस्य) उस परमात्मा वा आचार्य के (व्रतानि) नियमों को (न मिनन्ति) नहीं तोड़ते हैं ॥२॥
भावार्थःबुद्धिमान् मनुष्यों को चाहिए कि वे परमात्मा और आचार्य से निर्धारित नियमों का सदैव पालन करें और उसके द्वारा प्रेय मार्ग और श्रेय मार्ग में अपनी उन्नति करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
इ꣢न्द्रं꣣ वा꣢णी꣣र꣡नु꣢त्तमन्युमे꣣व꣢ स꣣त्रा꣡ राजा꣢꣯नं दधिरे꣣ स꣡ह꣢ध्यै । ह꣡र्य꣢श्वाय बर्हया꣣ स꣢मा꣣पी꣢न् ॥१७९५॥
पदार्थः(अनुत्तमन्युम्) अबाधित तेजवाले (राजानम्) यश से प्रदीप्त (इन्द्रम् एव) परमात्मा वा आचार्य को ही (वाणीः) स्तोताओं वा शिष्यों की वाणियाँ (सहध्यै) विघ्नों वा दोषों को निष्प्रभाव करने के लिए (सत्रा) उपासना-सत्र में वा विद्या-सत्र में (दधिरे) नेता-रूप से स्थापित करती हैं। हे मनुष्य! तू (हर्यश्वाय) जिसके बनाये हुए सूर्य, चन्द्र, भूमण्डल आदि लोक आपस में आकर्षण से युक्त हैं, ऐसे परमात्मा को पाने के लिए वा जितेन्द्रिय आचार्य को पाने के लिए (आपीन्) बन्धुओं को (संबर्हय) भली-भाँति प्रेरित कर ॥३॥
भावार्थःविद्या-यज्ञ में गुरु को और उपासना-यज्ञ में परमेश्वर को प्राप्त करके मनुष्यों को अपने अभीष्ट सिद्ध करने चाहिए ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - मध्यमः
य꣡दि꣢न्द्र꣣ या꣡व꣢त꣣स्त्व꣢मे꣣ता꣡व꣢द꣣ह꣡मीशी꣢य । स्तो꣣ता꣢र꣣मि꣡द्द꣢धिषे रदावसो꣣ न꣡ पा꣢प꣣त्वा꣡य꣢ रꣳसिषम् ॥१७९६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (यावतः) जितने धन के (त्वम्) आप अधीश्वर हो (एतावत्) उतने धन का यदि (अहम्) मैं (ईशीय) अधीश्वर हो जाऊँ, तो (रदावसो) हे धनदाता ! मैं (स्तोतारम् इत्) आपके उपासक का ही, उस धन से (दधिषे) धारण-पोषण करूँ, (पापत्वाय) पाप कर्म के लिए (न रंसिषम्) दान न करूँ ॥१॥
भावार्थःमनुष्य को चाहिए कि सत्पात्र को ही धन आदि का दान करे, पाप की वृद्धि के लिए कभी दान न दे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)| देवता -इन्द्रः| स्वर - पञ्चमः
शि꣡क्षे꣢य꣣मि꣡न्म꣢हय꣣ते꣢ दि꣣वे꣡दि꣢वे रा꣣य꣡ आ कु꣢꣯हचि꣣द्वि꣡दे꣢ । न꣢꣯ हि त्वद꣣न्य꣡न्म꣢घवन्न꣣ आ꣢प्यं꣣ व꣢स्यो꣣ अ꣡स्ति꣢ पि꣣ता꣢ च꣣ न꣢ ॥१७९७॥
पदार्थःयदि मैं धनपति हो जाऊँ तो (कुहचिद्विदे) जहाँ कहीं भी विद्यमान (महयते) परमेश्वरपूजक समाजसेवी मनुष्य को (दिवेदिवे) प्रतिदिन (रायः) धन (आ शिक्षेयम् इत्) अवश्य ही दान किया करूँ। हे (मघवन्) धनपति परमात्मन् ! (त्वत् अन्यत्) आपसे भिन्न कोई भी (नः) हमारा (आप्यम्) प्राप्तव्य और (वस्यः) अतिशय शरण देनेवाला (नहि) नहीं (अस्ति) है, (पिता च) और पिता के समान पालक भी (न) नहीं है ॥२॥
भावार्थःदान सदा सुपात्र को ही देना चाहिए, कुपात्र को नहीं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
श्रु꣣धी꣡ हवं꣢꣯ विपिपा꣣न꣢꣫स्याद्रे꣣र्बो꣢धा꣣ वि꣢प्र꣣स्या꣡र्च꣢तो मनी꣣षा꣢म् । कृ꣣ष्वा꣢꣫ दुवा꣣ꣳस्य꣡न्त꣢मा꣣ स꣢चे꣣मा꣢ ॥१७९८॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश्वर ! आप (विपिपानस्य) जिसने विशेषरूप से ज्ञान-रस और कर्म-रस का पान कर लिया है, ऐसे (अद्रेः) अविनाशी जीवात्मा की (हवम्) प्रार्थना को (श्रुधि) सुनो, (अर्चतः) पूजक (विप्रस्य) मेधावी विद्वान् की (मनीषाम्) स्तुति को (बोध) जानो। आगे स्तोता को सम्बोधन करते हैं—हे स्तोता ! तू (सचा) अन्य स्तोताओं के साथ मिलकर (इमा) इन (अन्तमा) निकटतम (दुवांसि) पूजाओं को (कृष्व) इन्द्र जगदीश्वर के लिए कर ॥१॥
भावार्थःहार्दिक निश्छल उपासनाओं को ही परमेश्वर स्वीकार करता है, छल-छिद्रों से युक्त, बनावटी उपासनाओं को नहीं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
न꣢ ते꣣ गि꣢रो꣣ अ꣡पि꣢ मृष्ये तु꣣र꣢स्य꣣ न꣡ सु꣢ष्टु꣣ति꣡म꣢सु꣣꣬र्य꣢꣯स्य वि꣣द्वा꣢न् । स꣡दा꣢ ते꣣ ना꣡म꣢ स्वयशो विवक्मि ॥१७९९॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश ! (तुरस्य) दोषों के हिंसक (ते) आपकी (गिरः) कर्तव्य का उपदेश करनेवाली वाणियों को, मैं (न अपि मृष्ये) नहीं छोड़ता अर्थात् उनकी उपेक्षा नहीं करता। आपके (असुर्यस्य) बल का (विद्वान्) ज्ञाता मैं (सुष्टुतिम्) आपकी उत्कृष्ट स्तुति को भी (न) नहीं छोड़ता। (सदा) हमेशा (ते) आपके (स्वयशः) निज कीर्तिवाले (नाम) नाम को (विवक्मि) जपता रहता हूँ ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर का नाम स्मरण करने से और उसकी उपासना करने से सब दोष नष्ट हो जाते हैं और सद्गुण, तेज, बल तथा यश प्राप्त होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -विराडनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
भू꣢रि꣣ हि꣢ ते꣣ स꣡व꣢ना꣣ मा꣡नु꣢षेषु꣣ भू꣡रि꣢ मनी꣣षी꣡ ह꣢वते꣣ त्वा꣢मित् । मा꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्म꣢घव꣣ञ्ज्यो꣡क्कः꣢ ॥१८००॥
पदार्थःहे इन्द्र जगदीश ! (मानुषेषु) मनुष्यों में (ते) आपके (सवना) आनन्द-प्रदान (भूरि हि) बहुत हैं। (मनीषी) मनस्वी जन (त्वाम् इत्) आपको ही (भूरि) बहुत-बहुत (हवते) पुकारता है। हे (मघवन्) धनों के अधीश्वर ! आप स्वयं को (अस्मत्) हमसे (ज्योक्) देर तक (आरे) दूर (मा कः) मत रखो ॥३॥
भावार्थःउपास्य और उपासक की समीपता से ही उपासना सफल होती है ॥३॥ इस खण्ड में जीवात्मा, परमात्मा, आचार्य, धनदान तथा उपास्य-उपासक के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बीसवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त।
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -शक्वरी| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
प्रो꣡ ष्व꣢स्मै पुरोर꣣थ꣡मिन्द्रा꣢꣯य शू꣣ष꣡म꣢र्चत । अ꣣भी꣡के꣢ चिदु लोक꣣कृ꣢त्स꣣ङ्गे꣢ स꣣म꣡त्सु꣢ वृत्र꣣हा꣢ । अ꣣स्मा꣡कं꣢ बोधि चोदि꣣ता꣡ नभ꣢꣯न्तामन्य꣣के꣡षां꣢ ज्या꣣का꣢꣫ अधि꣣ ध꣡न्व꣢सु ॥१८०१॥
पदार्थःहे साथियो ! (अस्मै इन्द्राय) इस जगदीश्वर के महिमा-गान के लिए, (पुरोरथम्) रथ को सबसे आगे रखनेवाले (शूषम्) इसके बल की (प्र अर्चत उ) प्रशंसा करो। वह (अभीके चित् उ) अपने सखा के ऊपर आक्रमण होने पर (लोककृत्) उसे विजय दिलानेवाला होता है। (समत्सु) देवासुरसङ्ग्रामों में (सङ्गे) मुठभेड़ होने पर (वृत्रहा) पाप आदि शत्रुओं का वधकर्ता होता है। वह जगदीश्वर (अस्माकम्) हम वीरों का (चोदिता) प्रेरक होता हुआ (बोधि) हमें उद्बोधन देवे। (धन्वसु अधि) धनुषों पर चढ़ायी हुई (अन्यकेषाम्) शत्रुओं की (ज्याकाः) डोरियाँ (नभन्ताम्) टूट जाएँ, अर्थात् वे साधनहीन होकर पराजित हो जाएँ ॥१॥ यहाँ श्लेष से जीवात्मापरक और सेनापतिपरक अर्थ भी जानना चाहिए ॥१॥
भावार्थःजैसे वीर सेनापति आक्रान्ता शत्रुओं को मारकर अपने राष्ट्र को विजय दिलाता है, वैसे ही परमेश्वर पाप, विघ्न आदि रूप वैरियों को विनष्ट करके अपने उपासकों को विजयी करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -शक्वरी| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
त्व꣢꣫ꣳ सिन्धू꣣ꣳर꣡वा꣢सृजोऽध꣣रा꣢चो꣣ अ꣢ह꣣न्न꣡हि꣢म् । अ꣣शत्रु꣡रि꣢न्द्र जज्ञिषे꣣ वि꣡श्वं꣢ पुष्यसि꣣ वा꣡र्य꣢म् । तं꣢ त्वा꣣ प꣡रि꣢ ष्वजामहे꣣ न꣡भ꣢न्तामन्य꣣के꣡षां꣢ ज्या꣣का꣢꣫ अधि꣣ ध꣡न्व꣢सु ॥१८०२॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (अहिम्) आनन्द-वर्षा में बाधक विघ्न-समूह को (अहन्) नष्ट करते हो और फिर (सिन्धून्) आनन्द के प्रवाहों को (अधराचः) जीवात्मा के अभिमुख करके (अवासृजः) छोड़ देते हो। आप (अशत्रुः) शत्रु-रहित (जज्ञिषे) हो। आप (विश्वम्) सब (वार्यम्) वरणीय उपासक-समाज को (पुष्यसि) पुष्टि देते हो। (तं त्वा) उन आपका, हम (परिष्वजामहे) आलिङ्गन करते हैं। ऐसा करो, जिससे (अन्येषाम्) शत्रुओं की (धन्वसु अधि) धनुषों पर चढ़ायी हुई (ज्याकाः) डोरियाँ (नभन्ताम्) टूट जाएँ ॥२॥
भावार्थःजैसे सूर्य वर्षा की रुकावट को नष्ट करके बादलों से जल-धाराएँ छोड़कर सब प्राणियों और ओषधि आदि को पुष्टि देता है, अथवा जैसे कोई सेनापति ऐश्वर्य-प्रतिबन्धक शत्रु को मार कर राष्ट्र में ऐश्वर्य की धाराएँ प्रवाहित करके प्रजा को पोषण देता है, वैसे ही जगदीश्वर आनन्द के प्रतिबन्धक विघ्नों को दूर करके उपासक के अन्तरात्मा में आनन्द की धाराएँ बहाकर उसे परिपुष्ट करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -शक्वरी| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
वि꣢꣯ षु विश्वा꣣ अ꣡रा꣢तयो꣣ऽर्यो꣡ न꣢शन्त नो꣣ धि꣡यः꣢ । अ꣡स्ता꣢सि꣣ श꣡त्र꣢वे व꣣धं꣡ यो न꣢꣯ इन्द्र꣣ जि꣡घा꣢ꣳसति । या꣡ ते꣢ रा꣣ति꣢र्द꣣दि꣢꣫र्वसु꣣ न꣡भ꣢न्तामन्य꣣के꣡षां꣢ ज्या꣣का꣢꣫ अधि꣣ ध꣡न्व꣢सु ॥१८०३॥
पदार्थः(विश्वाः) सब (अर्यः) आक्रमण करनेवाली; (अरातयः) दान-हीन शत्रु-सेनाएँ और विघ्न-सेनाएँ (सु) पूर्णरूप से (विनशन्त) विनष्ट हो जाएँ, (नः) हमें (धियः) योग की धारणा, ध्यान और समाधियाँ प्राप्त हों। हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (यः) जो शत्रु (नः) हमारा (जिघांसति) वध कर देना चाहता है, उस (शत्रवे) काम, क्रोध आदि शत्रु पर, आप (वधम्) मौत (अस्ता असि) डालनेवाले हो। (या) जो (ते) आपकी (रातिः) दान की प्रवृत्ति है, वह हमारे लिए (वसु) निवासक दिव्य ऐश्वर्य की (ददिः) देनेवाली हो। (अन्यकेषाम्) शत्रुओं की (धन्वसु अधि) धनुषों पर चढ़ायी हुई (ज्याकाः) डोरियाँ (नभन्ताम्) टूट जाएँ, अर्थात् वे साधनहीन असहाय होकर विनष्ट हो जाएँ ॥३॥
भावार्थःजैसे राजा वा सेनापति शत्रुओं को मार कर प्रजाओं को धन आदि देता है, वैसे ही अध्यात्ममार्ग में बाधा डालनेवाले विघ्नों और काम, क्रोध आदि शत्रुओं को विनष्ट करके जगदीश्वर उपासक को दिव्य ऐश्वर्य प्रदान करता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
रे꣣वा꣢꣫ꣳ इद्रे꣣व꣡त꣢ स्तो꣣ता꣡ स्यात् त्वाव꣢꣯तो म꣣घो꣡नः꣢ । प्रे꣡दु꣢ हरिवः सु꣣त꣡स्य꣢ ॥१८०४॥
पदार्थःहे (हरिवः) दोषों को हरनेवाले इन्द्र जगदीश्वर ! (सुतस्य) अन्तरात्मा में प्रकट किये गए, (रेवतः) ऐश्वर्यवान् (मघोनः) दानी (त्वावतः) आप जैसे ही आपका अर्थात् जिसके तुल्य या जिससे बढ़कर संसार में अन्य कोई नहीं है, ऐसे आपका (स्तोता) उपासक (इत् उ) अवश्यमेव (रेवान् इत्) ऐश्वर्यवान् ही (प्र स्यात्) होवे ॥१॥ ‘त्वावतः’ में अनन्वय अलङ्कार है। ‘रेवाँ इद् रेवतः स्तोता’ में समालङ्कार व्यङ्ग्य है ॥१॥
भावार्थःऐश्वर्यवान् परमेश्वर अपने उपासक को भी ऐश्वर्यवान् कर देता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
उ꣣क्थं꣢ च꣣ न꣢ श꣣स्य꣡मा꣢नं꣣ ना꣡गो꣢ र꣣यि꣡रा चि꣢꣯केत । न꣡ गा꣢य꣣त्रं꣢ गी꣣य꣡मा꣢नम् ॥१८०५॥
पदार्थः(अगोः) सर्वव्यापक इन्द्र जगदीश्वर में श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य का (न) न तो (शस्यमानम्) बोला जाता हुआ (उक्थम्) स्तोत्र, (न) न (रयिः) दिया जाता हुआ धन, (न) और न ही (गीयमानम्) गाया जाता हुआ (गायत्रम्) गायत्र नामक सामगान (आ चिकेत) किसी से आदर किया जाता है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर में श्रद्धा न करनेवाले मनुष्य का स्त्रोत्रपाठ, धनदान, सामगान आदि सब निष्फल होता है, क्योंकि वह किसी स्वार्थ से ही प्रेरित होकर उन कार्यों को करता है। सब सत्कर्म ईश्वरार्पण-बुद्धि से ही शोभा पाते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
मा꣡ न꣢ इन्द्र पीय꣣त्न꣢वे꣣ मा꣡ शर्ध꣢꣯ते꣣ प꣡रा꣢ दाः । शि꣡क्षा꣢ शचीवः꣣ श꣡ची꣢भिः ॥१८०६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! आप (नः) हमें (मा) न तो (पीयत्नवे) हिंसक काम, क्रोध, लोभ आदि के लिए और (मा) न ही (शर्धते) बलवान् किसी मानव शत्रु के लिए (परा दाः) छोड़ो। हे (शचीवः) शक्तिशाली परमात्मन् ! आप (शचीभिः) अपनी शक्तियों से (शिक्ष) हमें शक्तिशाली बनाने की इच्छा करो ॥३॥ यहाँ शकार की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है। ‘शची’ के दो बार पाठ में लाटानुप्रास अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजो परमात्मा में श्रद्धावान् होते हैं, उनकी न हिंसक हिंसा कर पाते हैं, न हरानेवाले शत्रु उन्हें हरा पाते हैं। परमात्मा की प्रेरणा से शक्तिमान् मेधावी और कर्मयोगी होते हुए वे सभी विपदाओं का हनन कर देते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
ए꣡न्द्र꣢ याहि꣣ ह꣡रि꣢भि꣣रु꣢प꣣ क꣡ण्व꣢स्य सुष्टु꣣ति꣢म् । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥१८०७॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! आप (हरिभिः) आनन्द-रसों के साथ (कण्वस्य) मेधावी उपासक की (सुष्टुतिम्) उत्कृष्ट स्तुति में (उप-आयाहि) आओ। हे (दिवावसो) दीप्तिधन जगदीश ! (दिवः) तेजोमयी देह-रूप अयोध्या पुरी के (शासतः) शासक (अमुष्य) इस मेधावी उपासक की (दिवम्) तेजोमयी देह-पुरी में, आप (यय) पहुँचो ॥१॥
भावार्थःजैसे परमेश्वर ब्रह्माण्ड का शासक है, वैसे ही जीवात्मा देह का शासक है। वह चक्रवर्त्ती सम्राट् जगदीश्वर स्तोता की देहपुरी में आकर आतिथ्य स्वीकार करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
अ꣢त्रा꣣ वि꣢ ने꣣मि꣡रे꣢षा꣣मु꣢रां꣣ न꣡ धू꣢नुते꣣ वृ꣡कः꣢ । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥१८०८॥
पदार्थः(वृकः) सूर्य (उरां न) जैसे अन्धकार से ढकनेवाली रात्रि को (वि धूनुते) विकम्पित करता है, वैसे ही (अत्र) इस देह-पुरी में (एषाम्) इन मरुतों अर्थात् प्राणों का (नेमिः) नेता जीवात्मा (उराम्) आच्छन्न करनेवाली अविद्या-रूपिणी रात्रि को (वि धूनुते) विकम्पित करता है। उस (दिवः) देह-पुरी के (शासतः) शासक (अमुष्य) इस जीवात्मा की (दिवम्) तेजोमयी देह-पुरी में, हे (दिवावसो) दीप्तिधन परमात्मन् ! आप (यय) आओ ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है। दिवो, दिवं, दिवा में वृत्त्यनुप्रास है ॥२॥
भावार्थःसूर्य के समान तेजस्वी जीवात्मा जहाँ स्थित होता हुआ अज्ञान, पाप आदि की रात्रि का विदारण करता है, वह देह-पुरी निश्चय ही प्रशंसायोग्य और परमात्मा के निवासयोग्य है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊहगान| गानपर्व -क्षुद्रपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
आ꣢ त्वा꣣ ग्रा꣢वा꣣ व꣡द꣢न्नि꣣ह꣢ सो꣣मी꣡ घोषे꣢꣯ण वक्षतु । दि꣣वो꣢ अ꣣मु꣢ष्य꣣ शा꣡स꣢तो꣣ दि꣡वं꣢ य꣣य꣡ दि꣢वावसो ॥१८०९॥
पदार्थःहे जगदीश्वर ! (इह) इस देहपुरी में (सोमी) श्रद्धारस से भरा हुआ (ग्रावा) पूजक जीवात्मा (वदन्) स्तोत्रों का उच्चारण करता हुआ (घोषेण) स्वागत-शब्द से (त्वा) आपको (आ वक्षतु) अपने पास लाये। हे (दिवावसो) दीप्तिधन परमात्मन् ! (दिवः) तेजोमयी देहपुरी के (शासतः) शासक (अमुष्य) इस जीवात्मा की (दिवम्) तेजोमयी देहपुरी में, आप (यय) आओ ॥३॥
भावार्थःजो हार्दिक स्वागत-वचनों के साथ परमात्मा को पुकारता है, उसकी प्रार्थना को वह अवश्य सुनता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
प꣡व꣢स्व सोम म꣣न्द꣢य꣣न्नि꣡न्द्रा꣢य꣣ म꣡धु꣢मत्तमः ॥१८१०॥
पदार्थःहे (सोम) ब्रह्मानन्द-रस ! (मधुमत्तमः) अतिशय मधुर तू (इन्द्राय) जीवात्मा को (मन्दयन्) मोद प्रदान करता हुआ (पवस्व) प्रवाहित हो ॥१॥
भावार्थःब्रह्मानन्द का माधुर्य वही जानता है, जो उसका अनुभव करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
ते꣢ सु꣣ता꣡सो꣢ विप꣣श्चि꣡तः꣢ शु꣣क्रा꣢ वा꣣यु꣡म꣢सृक्षत ॥१८११॥
पदार्थः(सुतासः) परमात्मा द्वारा प्रेरित, (विपश्चितः) मेधायुक्त, (शुक्राः) पवित्र (ते) वे प्रसिद्ध ब्रह्मानन्द-रस रूप सोम (वायुम्) प्राण को (असृक्षत) ऊपर की ओर प्रेरित करते हैं ॥२॥
भावार्थःप्राप्त हुए ब्रह्मानन्द योगी के प्राणों को ऊपर की ओर प्रेरित करते हुए उसे मोक्ष प्रदान करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -द्विपदा गायत्री| देवता -पवमानः सोमः| स्वर - षड्जः
अ꣡सृ꣢ग्रं दे꣣व꣡वी꣢तये वाज꣣य꣢न्तो꣣ र꣡था꣢ इव ॥१८१२॥
पदार्थः(मैं) इन ब्रह्मानन्द-रूप सोम-रसों को (देववीतये) दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए (असृग्रम्) अपने अन्तरात्मा में प्रवाहित कर रहा हूँ। ये (वाजयन्तः) अन्न प्रदान करते हुए (रथाः इव) रथों के समान (वाजयन्तः) बल प्रदान कर रहे हैं ॥३॥ यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःजैसे रथ अन्न आदि को लाने में साधन बनते हैं, वैसे ही ब्रह्मानन्द-रस अध्यात्म-बल अदि की प्राप्ति में साधन होते हैं ॥३॥ इस खण्ड में जगदीश्वर और ब्रह्मानन्द-रस के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बीसवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
अ꣣ग्नि꣡ꣳ होता꣢꣯रं मन्ये꣣ दा꣡स्व꣢न्तं꣣ व꣡सोः꣢ सू꣣नु꣡ꣳ सह꣢꣯सो जा꣣त꣡वे꣢दसं꣣ वि꣢प्रं꣣ न꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसम् । य꣢ ऊ꣣र्ध्व꣡या꣢ स्वध्व꣣रो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣वा꣡च्या꣢ कृ꣣पा꣢ । घृ꣣त꣢स्य꣣ वि꣡भ्रा꣢ष्टि꣣म꣡नु꣢ शु꣣क्र꣡शो꣢चिष आ꣣जु꣡ह्वा꣢नस्य स꣣र्पि꣡षः꣢ ॥१८१३॥
पदार्थःमैं (अग्निम्) जगन्नायक परमेश्वर को (होतारम्) श्रद्धा का उपहार ग्रहण करनेवाला (वसोः) दिव्य तथा भौतिक धन का (दास्वन्तम्) दाता, (सहसः) बल, उत्साह और उद्बोधन का (सूनुम्) प्रेरक, (जातवेदसम्) प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान, सर्वान्तर्यामी, (विप्रं न) और विद्वान् मनुष्य के समान (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों का ज्ञाता (मन्ये) मानता हूँ, (यः देवः) जो प्रकाशक परमेश्वर (ऊर्ध्वया) उन्नत, (देवाच्या) प्रकाशक अग्नि, बिजली, सूर्य आदियों में व्यक्त हुई (कृपा) शक्ति से (स्वध्वरः) उत्कृष्ट जगत्प्रपञ्च-रूप यज्ञ का सञ्चालक है, साथ ही जो (आजुह्वानस्य) यज्ञाग्नि में होमे जानेवाले, (शुक्रशोचिषः) चमकीली चमकवाले, (सर्पिषः) पिघले हुए (घृतस्य) घृत की (विभ्राष्टिम्) विशिष्ट दीप्ति में भी (अनु) अनुप्रविष्ट है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है। ‘जातवेदसं’ की आवृत्ति में यमक और ‘देवो, देवा’ में छेकानुप्रास है, सकार आदि की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥१॥
भावार्थःसूर्य, चन्द्र, बिजली, तारे आदियों में और घृत की आहुति से प्रदीप्त अग्नि-ज्वालाओं में जो प्रभा दृष्टिगोचर होती है, वह जगदीश्वर की ही दी हुई है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
य꣡जि꣢ष्ठं त्वा꣣ य꣡ज꣢माना हुवेम꣣ ज्ये꣢ष्ठ꣣म꣡ङ्गि꣢रसां विप्र꣣ म꣡न्म꣢भि꣣र्वि꣡प्रे꣢भिः शुक्र꣣ म꣡न्म꣢भिः । प꣡रि꣢ज्मानमिव꣣ द्या꣡ꣳ होता꣢꣯रं चर्षणी꣣ना꣢म् । शो꣣चि꣡ष्के꣢शं꣣ वृ꣡ष꣢णं꣣ य꣢मि꣣मा꣢꣫ विशः꣣ प्रा꣡व꣢न्तु जू꣣त꣢ये꣣ वि꣡शः꣢ ॥१८१४॥
पदार्थःहे (विप्र) विशेष रूप से पूर्णता करनेवाले जगदीश ! (यजमानाः) उपासना-यज्ञ के याज्ञिक हम (यजिष्ठम्) सबसे बड़े यज्ञकर्ता, (अङ्गिरसां जयेष्ठम्) तपस्वियों में श्रेष्ठ (त्वा) आपको (मन्मभिः) वेदमन्त्रों से (हुवेम) पुकारें। हे (शुक्र) तेजस्वी और पवित्र परमात्मन् ! (मन्मभिः) मननशील (विप्रेभिः) विद्वान् उपासकों के साथ मिलकर आपको पुकारें। (द्याम्) आकाश को (परिज्मानम् इव) मानो सूर्य द्वारा मापनेवाले और (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के (होतारम्) सुखप्रदाता, (शोचिष्केशम्) तेजों से प्रकाशमान, (वृषणम्) वृष्टिकर्ता (यम्) जिन आपकी (इमाः) ये (विशः) प्रजाएँ उपासना करती हैं, उन आपको (विशः) वे प्रजाएँ, (जूतये) बल, वेग आदि की प्राप्ति के लिए (प्रावन्तु) प्राप्त कर लें ॥२॥ यहाँ ‘परिज्मानमिव द्याम्’ में उत्प्रेक्षालङ्कार, ‘मन्मभिः’ की आवृत्ति में यमक और ‘विप्र, विप्रे’ में छेकानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःविप्रजनों के साथ मिलकर सामूहिक उपासना से सबको उस परमात्मा की पूजा करनी चाहिए, जो सृष्टियज्ञ का सञ्चालक, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, सर्वाधिक तेजस्वी और मनोरथों को पूर्ण करनेवाला है तथा जो सूर्य को पूर्व से पश्चिम तक यात्रा कराता हुआ उसके द्वारा मानो आकाश को मापता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -अत्यष्टिः| देवता -अग्निः| स्वर - गान्धारः
स꣢꣫ हि पु꣣रू꣢ चि꣣दो꣡ज꣢सा वि꣣रु꣡क्म꣢ता꣣ दी꣡द्या꣢नो꣣ भ꣡व꣢ति द्रु꣢ह꣣न्त꣡रः प꣢र꣣शु꣡र्न द्रु꣢꣯हन्त꣣रः꣢ । वी꣣डु꣢ चि꣣द्य꣢स्य꣣ स꣡मृ꣢तौ꣣ श्रु꣢व꣣द्व꣡ने꣢व꣣ य꣢त्स्थि꣣र꣢म् । नि꣣ष्ष꣡ह꣢माणो यमते꣣ ना꣡य꣢ते धन्वा꣣स꣢हा꣣ ना꣡य꣢ते ॥१८१५॥
पदार्थः(विरुक्मता) दीप्तियुक्त (ओजसा) प्रताप से (पुरु चित्) बहुत अधिक (दीद्यानः) द्युतिमान् (स हि) वह अग्नि अर्थात् अग्रनायक जीवात्मा (द्रुहन्तरः) द्रोह करनेवाले काम, क्रोध आदि शत्रु को पार करनेवाला (भवति) हो जाता है, (परशुः न) परशु के समान (द्रुहन्तरः) द्रोहकर्ता का वध करनेवाला हो जाता है, (यस्य) जिस जीवात्मा की (समृतौ) टक्कर होने पर (वीडु चित्) बलवान् भी, (वना इव) वन के समान (यत् स्थिरम्) जो स्थिर है, वह भी (श्रुवत्) विनष्ट हो जाता है या डगमगा जाता है, जो (निष्षहमाणः) शत्रुओं को तिरस्कृत करता हुआ, उन्हें (यमते) युद्ध से हटा देता है, (न अयते) स्वयं युद्ध से पलायन नहीं करता, अपितु (धन्वसहा न) धनुर्धारी के समान (अयते) देवासुरसङ्ग्राम में जाता है ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है, तीन उपमाएँ हैं। ‘द्रुहन्तरः’ और ‘नायते’ की आवृत्ति में यमक है ॥३॥
भावार्थःदेहधारी जीवात्मा जड़ जमाये हुए भी आन्तरिक तथा बाह्य सब शत्रुओं का उन्मूलन करके रणकुशल सेनापति के समान देवासुरसङ्ग्राम में विजयी हो ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा और जीवात्मा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ नवम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -विष्टारपङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
अ꣢ग्ने꣣ त꣢व꣣ श्र꣢वो꣣ व꣢यो꣣ म꣡हि꣢ भ्राजन्ते अ꣣र्च꣡यो꣢ विभावसो । बृ꣡ह꣢द्भानो꣣ श꣡व꣢सा꣣ वा꣡ज꣢मु꣣क्थ्य꣢ꣳ३ द꣡धा꣢सि दा꣣शु꣡षे꣢ कवे ॥१८१६॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगन्नायक परमेश ! (तव) आपका (श्रवः) यश और (वयः) ऐश्वर्य (महि) महान् है। हे (विभावसो) दीप्तिधन ! आप ही की (अर्चयः) दीप्तियाँ (भ्राजन्ते) अग्नि, सूर्य, नक्षत्र आदियों में चमक रही हैं। हे (बृहद्भानो) महातेजस्वी ! हे (कवे) क्रान्तद्रष्टा ! आप (दाशुषे) आत्मसमर्पण करनेवाले को (शवसा) बल के साथ (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय (वाजम्) आनन्द-रूप ऐश्वर्य (दधासि) देते हो ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर स्वयं प्रकाशमान होता हुआ दूसरों को प्रकाशित करता है, स्वयं बलवान् होता हुआ दूसरों को बल देता है, स्वयं यशस्वी होता हुआ दूसरों को यशस्वी करता है, स्वयं आनन्दवान् होता हुआ दूसरों को आनन्दित करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -विष्टारपङ्क्तिः| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
पा꣣वक꣡व꣢र्चाः शु꣣क्र꣡व꣢र्चा꣣ अ꣡नू꣢नवर्चा꣣ उ꣡दि꣢यर्षि भा꣣नु꣡ना꣢ । पु꣣त्रो꣢ मा꣣त꣡रा꣢ वि꣣च꣢र꣣न्नु꣡पा꣢वसि पृ꣣ण꣢क्षि꣣ रो꣡द꣢सी उ꣣भे꣢ ॥१८१७॥
पदार्थःहे अग्रनायक जगदीश्वर ! (पावकवर्चाः) पवित्रकारी तेजवाले, (शुक्रवर्चाः) उज्ज्वल और पवित्र तेजवाले, (अनूनवर्चाः) अन्यून तेजवाले आप (भानुना) ज्योति के साथ, उपासकों के अन्तरात्मा में (उदियर्षि) उदित होते हो। (मातरा) माता-पिता के समीप (विचरन्) विचरण करते हुए (पुत्रः) पुत्र के समान (मातरा) द्युलोक और भूलोक में (विचरन्) विचरण करते हुए आप उनकी (उपावसि) रक्षा करते हो। साथ ही (रोदसी) द्युलोक और भूलोक (उभे) दोनों को (पृणक्षि) आपस में संयुक्त करते हो ॥२॥ यहाँ तीसरे चरण में शिलष्ट लुप्तोपमा अलङ्कार है। ‘वर्चा’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास है ॥२॥
भावार्थःपरमेश्वर सूर्य के समान अपने दिव्य तेज से स्तोताओं के हृदय को पवित्र करता है, द्यावापृथिवी की रक्षा करता है और उनके मध्य आपस का सामञ्जस्य स्थापित करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -सतोबृहती| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
ऊ꣡र्जो꣢ नपाज्जातवेदः सुश꣣स्ति꣢भि꣣र्म꣡न्द꣢स्व धी꣣ति꣡भि꣢र्हि꣣तः꣢ । त्वे꣢꣫ इषः꣣ सं꣡ द꣢धु꣣र्भू꣡रि꣢वर्पसश्चि꣣त्रो꣡त꣢यो वा꣣म꣡जा꣢ताः ॥१८१८॥
पदार्थःहे (ऊर्जः नपात्) बल और प्राणशक्ति को न गिरने देनेवाले, प्रत्युत बढ़ानेवाले (जातवेदः) सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी जगत्पति परमात्मन् ! (धीतिभिः) ध्यान-क्रियाओं से (हितः) हृदय में धारण किये हुए आप (सुशस्तिभिः) उत्तम प्रशस्तियों से (मन्दस्व) हमें आनन्दित करो। (भूरिवर्पसः) बहुत से रूपों अर्थात् गुणोंवाले, (चित्रोतयः) मञ्जुल आचरणोंवाले (वामजाताः) सेवनीय आचार्य से श्रेष्ठ जन्म को प्राप्त उपासक (त्वयि) आप में (इषः) अपनी अभिलाषाओं को (संदधुः) सञ्जोये हुए हैं ॥३॥
भावार्थःजो मनुष्य अपने आपको परमात्मा में समर्पित कर देते हैं, वे सुप्रशस्तिमान् और सुकीर्तिमान् होते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -संवत्सरपर्व
छन्द -सतोबृहती| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
इ꣣रज्य꣡न्न꣢ग्ने प्रथयस्व ज꣣न्तु꣡भि꣢र꣣स्मे꣡ रायो꣢꣯ अमर्त्य । स꣡ द꣢र्श꣣त꣢स्य꣣ व꣡पु꣢षो꣣ वि꣡ रा꣢जसि पृ꣣ण꣡क्षि꣢ दर्श꣣तं꣡ क्रतु꣢꣯म् ॥१८१९॥
पदार्थःहे (अमर्त्य) अमर (अग्ने) मार्गदर्शक परमात्मन् ! (इरज्यन्) सबके ईश्वर होते हुए आप (जन्तुभिः) उत्पन्न अभ्यास, वैराग्य, प्रणव-जप, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा, ज्योतिष्मती प्रज्ञा, ऋतम्भरा प्रज्ञा, समाधि आदियों से (अस्मे) हमारे लिए (रायः) अभ्युदय-निःश्रेयस रूप ऐश्वर्यों का (प्रथयस्व) विस्तार करो। (सः) वह प्रसिद्ध आप (दर्शतस्य) दर्शनीय वा आपके दर्शन में सहायक (वपुषः) अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय रूप पञ्च शरीरों के (वि राजसि) विशिष्ट राजा हो। आप ही हमारे मन में (दर्शतम्) ज्ञान-दर्शन के साधन (क्रतुम्) सङ्कल्प को (पृणक्षि) संयुक्त करते हो ॥४॥
भावार्थःजगदीश्वर की ही सहायता से योगसाधना में संलग्न उपासक अपने लक्ष्य की पूर्ति में सफल होते हैं ॥४॥
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छन्द -सतोबृहती| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
इ꣣ष्कर्त्ता꣡र꣢मध्व꣣रस्य꣣ प्र꣡चे꣢तसं꣣ क्ष꣡य꣢न्त꣣ꣳ रा꣡ध꣢सो म꣣हः꣢ । रा꣣तिं꣢ वा꣣म꣡स्य꣢ सु꣣भ꣡गां꣢ म꣣ही꣢꣯मिषं꣣ द꣡धा꣢सि सान꣣सि꣢ꣳ र꣣यि꣢म् ॥१८२०॥
पदार्थःहे जगदीश्वर ! (अध्वरस्य) जीवन-यज्ञ के (इष्कर्तारम्) संस्कृत करनेवाले, (प्रचेतसम्) जागृति प्रदान करनेवाले, (महः) महान् (राधसः) दिव्य धन के (क्षयन्तम्) ईश्वर, (वामस्य) सेवनीय सुरम्य ऐश्वर्य के (रातिम्) दाता आपकी हम उपासना करते हैं, आप (सुभगाम्) सौभाग्यकारिणी, (महीम्) महती (इषम्) अभीष्ट दुःखमुक्ति को और (सानसिम्) संभजनीय (रयिम्) भौतिक तथा दिव्य ऐश्वर्य को (दधासि) प्रदान करते हो ॥५॥
भावार्थःआराधना किया हुआ परमेश्वर उपासकों को जागरूक करके और उन्हें सारी अभीष्ट लौकिक तथा दिव्य सम्पदा प्रदान करके कृतार्थ करता है ॥५॥
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छन्द -उपरिष्टाज्ज्योतिस्त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
ऋ꣣ता꣡वा꣢नं महि꣣षं꣢ वि꣣श्व꣡द꣢र्शतम꣣ग्नि꣢ꣳ सु꣣म्ना꣡य꣢ दधिरे पु꣣रो꣡ जनाः꣢꣯ । श्रु꣡त्क꣢र्णꣳ स꣣प्र꣡थ꣢स्तमं त्वा गि꣣रा꣢꣫ दैव्यं꣣ मा꣡नु꣢षा यु꣣गा꣢ ॥१८२१॥
पदार्थः(ऋतावानम्) सत्यवान्, (महिषम्) महान् (विश्वदर्शतम्) सबके द्वारा दर्शनीय (अग्निम्) अग्रनायक आप जगदीश्वर को (सुम्नाय) सुख पाने के लिए (जनाः) स्तोता लोग (पुरः) अपने सम्मुख (दधिरे) धारण करते हैं। (श्रुत्कर्णम्) सुननेवाले कानों से युक्त, (सप्रथस्तमम्) अतिशय कीर्तिमान् (दैव्यम्) विद्वान् उपासकों का हित करनेवाले (त्वा) आपको (मानुषा युगा) पति-पत्नी-रूप मनुष्य-युगल भी (गिरा) स्तुति-वाणी से (सुम्नाय) सुखार्थ (पुरः) अपने सम्मुख (दधिरे) धारण करते हैं ॥६॥
भावार्थःयहाँ निराकार परमेश्वर को भी सुननेवाले कानों से युक्त कहा गया है, इससे उसका श्रोता के समान स्तोताओं के मनोरथों को पूर्ण करने का गुण सूचित होता है। जैसे कानोंवाला कोई मनुष्य कानों से स्तोता के निवेदन को सुन कर उसकी कामना को पूर्ण करता है, वैसे ही परमेश्वर बिना कानों के भी कर देता है, यह अभिप्राय है। कहा भी है, ‘वह बिना आँख के देखता है, बिना कान के सुनता है’ (श्वेता० ३।१९)। सबको चाहिए कि सत्य के प्रेमी, महान्, यशस्वी परमेश्वर को हृदय में धारण करें ॥६॥ इस खण्ड में जगदीश्वर और जीवात्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बीसवें अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - ऋषभः
प्र꣡ सो अ꣢꣯ग्ने꣣ त꣢वो꣣ति꣡भिः꣢ सु꣣वी꣡रा꣢भिस्तरति꣣ वा꣡ज꣢कर्मभिः । य꣢स्य꣣ त्व꣢ꣳ स꣣ख्य꣡मावि꣢꣯थ ॥१८२२॥
पदार्थःहे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! (सः) वह मनुष्य (सुवीराभिः) श्रेष्ठ वीरों को प्राप्त करानेवाली, (वाजकर्मभिः) बल एवम् उत्साह उत्पन्न करनेवाली (तव ऊतिभिः) आपकी रक्षाओं से (प्र तिरति) वृद्धि पा लेता है अथवा दुःखों को सर्वथा तर जाता है, (यस्य) जिसकी (त्वम्) महाबली आप (सख्यम्) मित्रता को (आविथ) स्वीकार कर लेते हो ॥१॥
भावार्थःकौन उसे बाधा पहुँचाने वा दुःख देने में समर्थ हो सकता है, जिसका जगदीश सखा हो ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती)| देवता -अग्निः| स्वर - पञ्चमः
त꣡व꣢ द्र꣣प्सो꣡ नील꣢꣯वान्वा꣣श꣢ ऋ꣣त्वि꣢य꣣ इ꣡न्धा꣢नः सिष्ण꣣वा꣡ द꣢दे । त्वं꣢ म꣣ही꣡ना꣢मु꣣ष꣡सा꣢मसि प्रि꣣यः꣢ क्ष꣣पो꣡ वस्तु꣢꣯षु राजसि ॥१८२३॥
पदार्थःहे (सिष्णो) प्रेमपाश में बाँधनेवाले जगदीश्वर ! (नीलवान्) आधारभूत, (वाशः) प्रियः, (ऋत्वियः) जिसे प्राप्त करने का समय आ गया है ऐसा, (इन्धानः) तेज प्रदान करनेवाला (तव) आपका (द्रप्सः) आनन्द-रस (आददे) हमसे ग्रहण किया जा रहा है। (त्वम्) आप (महीनाम्) महती (उषसाम्) उषाओं के (प्रियः) प्यारे सखा (असि) हो। आप (क्षपः) रात्रि के (वस्तुषु) आच्छादक अन्धकारों में भी (राजसि) प्रदीप्त होते हो ॥२॥
भावार्थःजो जगदीश्वर रात्रियों में, उषाओं में, सूर्योदयों में, मध्याह्न-कालों में सायंकालीन संध्याओं में सर्वत्र अपनी महिमा से विराजमान है, उसके साथ मैत्री करके उसके पास के अति मधुर आनन्द-रस सबको प्राप्त करना चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -जगती| देवता -अग्निः| स्वर - निषादः
त꣡मो꣢꣯षधीर्दधिरे꣣ ग꣡र्भ꣢मृ꣣त्वि꣢यं꣣ त꣡मापो꣢꣯ अ꣣ग्निं꣡ ज꣢नयन्त मा꣣त꣡रः꣢ । त꣡मित्स꣢꣯मा꣣नं꣢ व꣣नि꣡न꣢श्च वी꣣रु꣢धो꣣ऽन्त꣡र्व꣢तीश्च꣣ सु꣡व꣢ते च वि꣣श्व꣡हा꣢ ॥१८२४॥
पदार्थः(तम्) उस जगदीश्वर को (ओषधीः) ओषधियाँ (ऋत्वियं गर्भम्) सब ऋतुओं में रहनेवाले गर्भ के रूप में (दधिरे) धारण किये हुए हैं अर्थात् सब ऋतुओं में वह जगदीश्वर ओषधियों के अन्दर निहित रहता है। (तम्) उसी जगदीश्वर को (मातरः आपः) मातृतुल्य नदियाँ (जनयन्त) प्रकट कर रही हैं। (तम् इत्) उसी जगदीश्वर को (समानम्) समान रूप से (वनिनः च) वन के वृक्ष (अन्तर्वतीः वीरुधः च) और गर्भवती लताएँ (दधिरे) अपने अन्दर धारण किये हुए हैं और (विश्वहा) सदा, उसी के नियमों के अनुसार (सुवते च) फल भी उत्पन्न करती हैं ॥१॥
भावार्थःओषधियों के गर्भों में, कल-कल बहती हुई नदियों के जलों में, फलों के भार से झुके हुए सघन वन-वृक्षों के फलों में, फूलती हुई वन-वल्लरियों के चित्र-विचित्र पुष्पों में वही जगत् का रचयिता परमेश्वर प्रतिमूर्त्त हुआ दिखायी देता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣡रिन्द्रा꣢꣯य पवते दि꣣वि꣢ शु꣣क्रो꣡ वि रा꣢꣯जति । म꣡हि꣢षीव꣣ वि꣡ जा꣢यते ॥१८२५
पदार्थः(अग्निः) संसार का नायक सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए अर्थात् जीव का हित करने के लिए (पवते) उसे प्राप्त होता है। (शुक्रः) पवित्र और तेजस्वी वह (दिवि) चमकीले द्युलोक में, सूर्य, तारामण्डल आदि में (वि राजति) विशेषरूप से चमक रहा है। वह (महिषी इव) पूज्या माता के समान (वि जायते) प्रसिद्ध होता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःपरमेश्वर हमारा पिता और माता भी है। पिता होता हुआ वह मनुष्य-शरीर की और ब्रह्माण्ड की व्यवस्था करता है, माता के रूप में वह सबका लालन-पालन करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣡मृचः꣢꣯ कामयन्ते꣣ यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣢मु꣣ सा꣡मा꣢नि यन्ति । यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣢म꣣य꣡ꣳ सोम꣢꣯ आह꣣ त꣢वा꣣ह꣡म꣢स्मि स꣣ख्ये꣡ न्यो꣢काः ॥१८२६॥
पदार्थःसब विद्वानों के मध्य में (यः) जो मनुष्य (जागार) जागरूक होता है (तम्) उसे (ऋचः) ऋचाएँ (कामयन्ते) चाहती हैं। (यः) जो मनुष्य (जागार) जागरूक होता है (तम् उ) उसी को (सामानि) साम-मन्त्र वा साम-गान (यन्ति) सहायता के लिए प्राप्त होते हैं। (यः) जो मनुष्य (जागार) जागरूक होता है (तम्) उसे (अयं सोमः) यह जगदीश्वर (आह) कहता है कि (अहम्) मैं (तव सख्ये) तेरी मित्रता में (न्योकाः) घर बनाये हुए (अस्मि) हूँ ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों में जो अविद्या, आलस्य, मोह आदि की नींद को छोड़कर जाग जाता है, वही बाह्य जीवन और अध्यात्म-जीवन में सफल होता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
अ꣣ग्नि꣡र्जा꣢गार꣣ त꣡मृचः꣢꣯ कामयन्ते꣣ऽग्नि꣡र्जा꣢गार꣣ त꣢मु꣣ सा꣡मा꣢नि यन्ति । अ꣣ग्नि꣡र्जा꣢गार꣣ त꣢म꣣य꣡ꣳ सोम꣢꣯ आह꣣ त꣢वा꣣ह꣡म꣢स्मि स꣣ख्ये꣡ न्यो꣢काः ॥१८२७॥
पदार्थः(अग्निः) अग्नि के समान तेजस्वी विद्वान् (जागार) जागरूक होता है, (तम्) उसे (ऋचः) ऋचाएँ (कामयन्ते) चाहती हैं। (अग्निः) अग्नि के समान पुरुषार्थी विद्वान् (जागार) जागरूक होता है, (तम् उ) उसी के पास (सामानि) साम-मन्त्र वा साम-गान (यन्ति) सहायता के लिए पहुँचते हैं। (अग्निः) अग्नि के समान उन्नतिशील विद्वान् (जागार) जागरूक होता है, (तम्) उसे (अयं सोमः) यह जगदीश्वर (आह) कहता है कि (अहम्) मैं (तव सख्ये) तेरी मित्रता में (न्योकाः) घर बनाये हुए (अस्मि) हूँ ॥१॥
भावार्थःजो विद्वान् लोग आलस्य-रहित, निर्भय, पुरुषार्थी, आगे बढ़नेवाले, स्फूर्तिमान्, धार्मिक, परोपकारी होते हैं, वे ही लोकप्रिय तथा सफल होते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
न꣡मः꣢ स꣣खि꣡भ्यः꣢ पूर्व꣣स꣢द्भ्यो꣣ न꣡मः꣢ साकन्नि꣣षे꣡भ्यः꣢ । यु꣣ञ्जे꣡ वाच꣢꣯ꣳ श꣣त꣡प꣢दीम् ॥१८२८
पदार्थः(पूर्वसद्भ्यः) जो पहले हो चुके हैं, उन (सखिभ्यः) सखाओं को (नमः) नमस्कार हो, (साकंनिषेभ्यः) साथ रहनेवाले सखाओं को (नमः) नमस्कार हो। अग्नि के समान तेजस्वी मैं (शतपदीम्) अनेक पादोंवाली (वाचम्) वेदवाणी को (युञ्जे) प्रयोग में लाता हूँ ॥१॥
भावार्थःजो हमसे पहले उत्पन्न हुए वृद्धजन हैं और जो सहयोगी मित्र हैं, उन सबको यथायोग्य सत्कार देना चाहिए। धार्मिक कार्यों में तथा परमात्मा की स्तुति में सदा वेदमन्त्रों का प्रयोग करना उचित है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
यु꣣ञ्जे꣡ वाच꣢꣯ꣳ श꣣त꣡प꣢दीं꣣ गा꣡ये꣢ स꣣ह꣡स्र꣢वर्तनि । गा꣣यत्रं꣡ त्रैष्टु꣢꣯भं꣣ ज꣡ग꣢त् ॥१८२९
पदार्थःमैं (शतपदीम्) अनेक पादोंवाली (वाचम्) वेदवाणी को (युञ्जे) प्रयोग में लाता हूँ। साथ ही, (गायत्रम्) गायत्री छन्दवाले साम को, (त्रैष्टुभम्) त्रिष्टुप् छन्दवाले साम को और (जगत्) जगती छन्दवाले साम को और (सहस्रवर्तनि) सहस्र मार्गों से (गाये) गाता हूँ ॥२॥
भावार्थःऋचाओं पर आश्रित सामों के गान से हृदय और सामाजिक वातावरण पवित्र होता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
गा꣣यत्रं꣡ त्रैष्टु꣢꣯भं꣣ ज꣢ग꣣द्वि꣡श्वा꣢ रू꣣पा꣢णि꣣ स꣡म्भृ꣢ता । दे꣣वा꣡ ओका꣢꣯ꣳसि चक्रि꣣रे꣢ ॥१८३०
पदार्थः(गायत्रम्) गायत्री छन्दवाला साम, (त्रैष्टुभम्) त्रिष्टुप् छन्दवाला साम, (जगत्) और जगती छन्दवाला साम, इनमें (विश्वा रूपाणि) दूसरे सामों के भी सब रूप (सम्भृता) समाविष्ट हैं। जो इन सामों को गाता है, उसमें (देवाः) दिव्य गुण (ओकांसि) घर (चक्रिरे) कर लेते हैं ॥३॥
भावार्थःआठ अक्षरों का गायत्र पाद, ग्यारह अक्षरों का त्रैष्टुभ पाद और बारह अक्षरों का जागत पाद होता है। प्रायः सभी वैदिक छन्द इन्हीं पादों से बनते हैं। इनमें से किसी एक दो या तीनों पादों से गुँथी हुई ऋचाओं पर सामगान करने से गायक के अन्तरात्मा में अनेक दिव्यगुण समाविष्ट हो जाते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
अ꣣ग्नि꣢꣫र्ज्योति꣣र्ज्यो꣡ति꣢र꣣ग्नि꣢꣫रिन्द्रो꣣ ज्यो꣢ति꣣र्ज्यो꣢ति꣣रि꣡न्द्रः꣢ । सू꣢र्यो꣣ ज्यो꣢ति꣣र्ज्यो꣢तिः꣣ सू꣡र्यः꣢ ॥१८३१
पदार्थः(अग्निः) पार्थिव अग्नि (ज्योतिः) एक ज्योति है, (ज्योतिः) वह ज्योति ही (अग्निः) वस्तुतः अग्नि है। (इन्द्रः) बिजली (ज्योतिः) एक ज्योति है, (ज्योतिः) वह ज्योति ही (इन्द्रः) वस्तुतः बिजली है। (सूर्यः) सूर्य (ज्योतिः) एक ज्योति है, (ज्योतिः) वह ज्योति ही (सूर्यः) वस्तुतः सूर्य है ॥१॥
भावार्थःयद्यपि अग्नि, विद्युत् और सूर्य ये सब पृथिवी, जल, वायु, तेज और आकाश इन पञ्च तत्त्वों से मिलकर बने हुए हैं, तो भी अग्नि का अग्नित्व, विद्युत् का विद्युत्त्व और सूर्य का सूर्यत्व ज्योति के कारण से ही है, ज्योति के बिना उनमें कुछ भी महत्त्व अवशिष्ट नहीं रहेगा। इसी प्रकार मनुष्य का भी मनुष्यत्व अध्यात्म-ज्योति के कारण से ही है। इसलिए सब मनुष्यों को चाहिए कि अध्यात्म-ज्योति के सञ्चय का प्रयत्न करें ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
पु꣡न꣢रू꣣र्जा꣡ नि व꣢꣯र्तस्व꣣ पु꣡न꣢रग्न इ꣣षा꣡यु꣢षा । पु꣡न꣢र्नः पा꣣ह्य꣡ꣳह꣢सः ॥१८३२॥
पदार्थःहे (अग्ने) प्रकाशकों के प्रकाशक, जगन्नायक, सर्वान्तर्यामी परमेश ! आप (पुनः) फिर-फिर (ऊर्जा) बल और प्राणशक्ति के साथ, (पुनः) फिर-फिर (इषा) अभीष्ट आनन्द के साथ (आयुषा) और दीर्घायुष्य के साथ (नि वर्तस्व) हमें निरन्तर प्राप्त होते रहो। (पुनः) फिर-फिर (नः) हमें (अंहसः) पाप से (पाहि) बचाते रहो ॥२॥
भावार्थःमनुष्य निर्बल होने से पुनः पुनः निरुत्साह, दैन्य, दुःख, अज्ञान, पाप आदियों से लिप्त होता रहता है। वह परमात्मा की उपासना से पुनः पुनः बल, प्राण, सुख, सद्विद्या, धर्म, दीर्घायुष्य आदि प्राप्त कर सकता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -अग्निः| स्वर - षड्जः
स꣣ह꣢ र꣣य्या꣡ नि व꣢꣯र्त꣣स्वा꣢ग्ने꣣ पि꣡न्व꣢स्व꣣ धा꣡र꣢या । वि꣣श्व꣡प्स्न्या꣢ वि꣣श्व꣢त꣣स्प꣡रि꣢ ॥१८३३॥
पदार्थःहे (अग्ने) जगन्नायक, सर्वप्रकाशक, रसागार परमात्मन् ! आप (रय्या सह) दिव्य ऐश्वर्य के साथ (निवर्तस्व) हमें निरन्तर प्राप्त होते रहो। (विश्वप्स्न्या) सब योगियों से आस्वाद ली जानेवाली (धारया) आनन्द-धारा से, हमें (विश्वतः) सब ओर से (परिपिन्वस्व) सींचते रहो ॥३॥
भावार्थःआनन्द-रस का पुञ्ज परमेश्वर अपने उपासकों को आनन्द-धारा से सींचता और दिव्य ऐश्वर्यों से सनाथ करता है ॥३॥ इस खण्ड में जगदीश्वर, जागरण, नमस्कार, सामगान और ज्योति के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बीसवें अध्याय में छठा खण्ड समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
य꣡दि꣢न्द्रा꣣हं꣢꣫ यथा꣣ त्वमीशी꣢꣯य꣣ व꣢स्व꣣ ए꣢क꣢ इ꣢त् । स्तो꣣ता꣢ मे꣣ गो꣡स꣢खा स्यात् ॥१८३४॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर आचार्य वा राजन् ! (यत्) यदि (यथा त्वम्) जैसे आप हो वैसे (अहम्) मैं (वस्वः) दिव्य ऐश्वर्य का, विद्या-धन का वा भौतिक धन का (एकः इत्) अद्वितीय (ईशीय) स्वामी हो जाऊँ तो (मे) मेरा (स्तोता) प्रशंसक (गोसखा) दिव्य प्रकाशों का, समस्त वाङ्मय का वा धेनुओं का सखा (स्यात्) हो जाए ॥१॥
भावार्थःयदि मैं जगदीश के समान सत्य, अहिंसा, योगसिद्धि आदि दिव्य धनों का स्वामी हो जाऊँ तो सत्पात्रों को दिव्य धन बाटूँ, यदि मैं आचार्य के समान विद्या-धनों का स्वामी हो जाऊँ तो शिष्यों को विविध विद्याओं का अध्यापन करूँ, यदि मैं राजा के समान चाँदी, सोना, गाय आदि धनों का स्वामी हो जाऊँ तो निर्धनों को सोना, गाय आदि धन वितीर्ण करूँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
शि꣡क्षे꣢यमस्मै꣣ दि꣡त्से꣢य꣣ꣳ श꣡ची꣢पते मनी꣣षि꣡णे꣢ । य꣢द꣣हं꣡ गोप꣢꣯तिः꣣ स्या꣢म् ॥१८३५॥
पदार्थःहे (शचीपते) सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर ! (यदि अहम्) यदि मैं (गोपतिः) भूमियों वा धेनुओं का स्वामी हो जाऊँ, तो उन भूमियों वा धेनुओं को (दित्सेयम्) मैं दान करने का सङ्कल्प लूँ और (अस्मै मनीषिणे) इस मेधावी विद्वान् को (शिक्षेयम्) उनका दान कर दूँ ॥२॥
भावार्थःधनपतियों का यह कर्तव्य है कि वे जिस धन के स्वामी हों,उस धन का कम से कम शतांश सत्पात्रों को अवश्य दान करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -इन्द्रः| स्वर - षड्जः
धे꣣नु꣡ष्ट꣢ इन्द्र सू꣣नृ꣢ता꣣ य꣡ज꣢मानाय सुन्व꣣ते꣢ । गा꣡मश्वं꣢꣯ पि꣣प्यु꣡षी꣢ दुहे ॥१८३६॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जगदीश्वर ! ते आपकी (सूनृता) सत्य और मधुर, (धेनुः) तृप्ति देनेवाली वेदवाणी (सुन्वते) भक्ति-रस प्रवाहित करनेवाले (यजमानाय) उपासक के लिए (पिप्युषी) बढ़ानेवाली होती हुई (गाम्) अन्तःप्रकाश को और (अश्वम्) प्राण-बल को (दुहे) दुहती है ॥३॥
भावार्थःवेद पढ़ने से मनुष्यों को परमेश्वरोपासना में प्रवृति होती है और उससे अन्तःप्रकाश, प्राणबल और पुरुषार्थ के लिए प्रेरणा मिलती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आपः| स्वर - षड्जः
आ꣢पो꣣ हि꣡ ष्ठा म꣢꣯यो꣣भु꣢व꣣स्ता꣡ न꣢ ऊ꣣र्जे꣡ द꣢धातन । म꣣हे꣡ रणा꣢꣯य꣣ च꣡क्ष꣢से ॥१८३७॥
पदार्थःहे (आपः) ब्रह्मानन्द-रस की धाराओ ! तुम (हि) निश्चय ही (मयोभुवः) शान्ति देनेवाली (स्थ) हो। (ताः) वे तुम (नः) हमें (ऊर्जे) ब्रह्मबल के लिए, (महे) महत्ता के लिए (रणाय) देवासुरसङ्ग्राम के लिए और (चक्षसे) अन्तःप्रकाश के लिए (दधातन) धारण करो ॥१॥
भावार्थःउपासक जब परमात्मा के पास से आनन्द की धाराओं को प्राप्त करता है, तब ब्रह्मबल, आत्मोत्कर्ष और विजय आदि स्वयं ही आ जाते हैं ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आपः| स्वर - षड्जः
यो꣡ वः꣢ शि꣣व꣡त꣢मो꣣ र꣢स꣣स्त꣡स्य꣢ भाजयते꣣ह꣡ नः꣢ । उ꣣शती꣡रि꣢व मा꣣त꣡रः꣢ ॥१८३८॥
पदार्थःहे ब्रह्मानन्द की धाराओ ! (यः) जो (वः) तुम्हारा (शिवतमः) अतिशय शान्तिदायक (रसः) रस है, (तस्य) उसका (इह) इस जीवन में (नः) हमें (भाजयत) भागी बनाओ, पान कराओ, (उशतीः) सन्तान से प्रेम करती हुई (मातरः इव) माताएँ जैसे अपने स्तनों का दूध अपनी सन्तान को पिलाती हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःमाता के स्तन के दूध में जो माधुर्य है, वही ब्रह्म के पास से प्राप्त आनन्द-धाराओं में है, ऐसा विद्वान् उपासक लोग अनुभव करते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -आपः| स्वर - षड्जः
त꣢स्मा꣣ अ꣡रं꣢ गमाम वो꣣ य꣢स्य꣣ क्ष꣡या꣢य꣣ जि꣡न्व꣢थ । आ꣡पो꣢ ज꣣न꣡य꣢था च नः ॥१८३९॥
पदार्थःहे (आपः) ब्रह्मानन्द की धाराओ ! (तस्मै) उस प्रयोजन के लिए, हम (वः) तुम्हें (अरम्) पर्याप्त रूप से (गमाम) प्राप्त कर लें, (यस्य) जिस अभ्युदय और निःश्रेयस रूप प्रयोजन के (क्षयाय) हमारे अन्दर निवास कराने के लिए, तुम (जिन्वथ) गति करती हो। तुम (नः) हमें (जनयथ च) नवजीवन से अनुप्राणित भी कर दो ॥३॥
भावार्थःपरमात्मा की उपासना से जो दिव्य आनन्द प्राप्त होता है,उससे मनुष्य अपने जीवन में परम उत्कर्ष और मोक्ष भी पा सकता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -वायुः| स्वर - षड्जः
वा꣢त꣣ आ꣡ वा꣢तु भेष꣣ज꣢ꣳ श꣣म्भु꣡ म꣢यो꣣भु꣡ नो꣢ हृ꣣दे꣢ । प्र꣢ न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि तारिषत् ॥१८४०॥
पदार्थः(वातः) जीवात्मा सहित प्राण (भेषजम्) औषध को (आ वातु) प्राप्त कराये, जो (नः) हमारे (हृदे) हृदय के लिए (शम्भु) रोगों को शान्त करनेवाली तथा (मयोभु) सुखकारी हो। (नः) हमारे (आयूंषि) आयु के वर्षों को (प्र तारिषत्) बढ़ाये ॥१॥
भावार्थःदेह में स्थित जीवात्मा जब पूरक, कुम्भक और रेचन की विधि से शुद्ध वायुमण्डल में प्राणायाम का अभ्यास करता है, तब रक्त की शुद्धि द्वारा रोगशान्ति और दीर्घ आयु प्राप्त होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -वायुः| स्वर - षड्जः
उ꣣त꣡ वा꣢त पि꣣ता꣡सि꣢ न उ꣣त꣢꣫ भ्रातो꣣त꣢ नः꣣ स꣡खा꣢ । स꣡ नो꣢ जी꣣वा꣡त꣢वे कृधि ॥१८४१॥
पदार्थः(उत) और, हे (वात) जीवात्मा-सहित प्राण ! तू (नः) हमारा (पिता) पिता के समान पालनकर्ता (असि) है, (उत) और (नः) हमारा (भ्राता) भाई के समान भरणपोषणकर्ता, (उत) तथा (सखा) सखा के समान सहायक है। (सः) वह तू (नः) हमें (जीवातवे) स्वस्थ जीवन के लिए (कृधि) समर्थ कर ॥२॥ यहाँ वात में पितृत्व, भ्रातृत्व और सखित्व के आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥२॥
भावार्थःजीवात्मा-सहित प्राण के द्वारा ही प्राणियों के जन्म, वृद्धि, क्षतिपूर्ति, आरोग्य और दीर्घायुष्य आदि होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -गायत्री| देवता -वायुः| स्वर - षड्जः
य꣢द꣣दो꣡ वा꣢त ते गृ꣣हे꣢३꣱ऽमृ꣢तं꣣ नि꣡हि꣢तं꣣ गु꣡हा꣢ । त꣡स्य꣢ नो देहि जी꣣व꣡से꣢ ॥१८४२॥
पदार्थःहे (वात) जीवात्मा-सहित प्राण ! (यत् ते गृहे) जो तुम्हारे शरीर रूप घर में (गुहा) हृदय-गुहा के अन्दर (अदः) यह (अमृतम्) अक्षय परमात्मा-रूप ज्योति (निहितम्) रखी हुई है, (जीवसे) जीवन के लिए (तस्य नः धेहि) उसकी हमें प्राप्ति कराओ ॥३॥
भावार्थःप्राणायाम द्वारा प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाने पर, मन में धारणाओं की योग्यता उत्पन्न हो जाने पर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हृदय में निहित परमात्म-ज्योति प्रकाशित हो जाती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣣भि꣢ वा꣣जी꣢ वि꣣श्व꣡रू꣢पो ज꣣नि꣡त्र꣢ꣳ हि꣣र꣢ण्य꣣यं बि꣢भ्र꣣द꣡त्क꣢ꣳ सुप꣣र्णः꣢ । सू꣡र्य꣢स्य भा꣣नु꣡मृ꣢तु꣣था꣡ वसा꣢꣯नः꣣ प꣡रि꣢ स्व꣣यं꣡ मेध꣢꣯मृ꣣ज्रो꣡ ज꣢जान ॥१८४३
पदार्थः(वाजी) बलवान् (विश्वरूपः) सब रूपों को देनेवाला, (सुपर्णः) श्रेष्ठ पालनकर्ता, (ऋज्रः) सर्वव्यापक वह अग्निनामक परमेश्वर (जनित्रम्) वृष्टि के उत्पादक, (हिरण्ययम्) सुनहरे (अत्कम्) विद्युद्रूप वज्र को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ, (ऋतुथा) ऋतुओं के अनुकूल (सूर्यस्य) सूर्य के (भानुम्) तेज को (वसानः) बसाता हुआ (स्वयम्) अपने आप (मेघम्) सृष्टि-यज्ञ को (जजान) चला रहा है ॥१॥
भावार्थःसंसार में जो कुछ भी प्राकृतिक घटना-चक्र चल रहा है, उस सबको परमेश्वर ही सञ्चालित करता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣣प्सु꣡ रेतः꣢꣯ शिश्रिये वि꣣श्व꣡रू꣢पं꣣ ते꣡जः꣢ पृथि꣣व्या꣢꣫मधि꣣ य꣡त्स꣢म्ब꣣भू꣡व꣢ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षे꣣ स्वं꣡ म꣢हि꣣मा꣢नं꣣ मि꣡मा꣢नः꣣ क꣡नि꣢क्रन्ति꣣ वृ꣢ष्णो꣣ अ꣡श्व꣢स्य꣣ रे꣡तः꣢ ॥१८४४
पदार्थः(अप्सु) नदियों में जो (विश्वरूपम्) सब रूपोंवाला (रेतः) जल (शिश्रिये) आश्रित है, (यत्) और जो (पृथिव्याम् अधि) भूमि के अन्दर (तेजः) तेज (संबभूव) उत्पन्न हुआ है, उस सबको (ऋज्रः) सर्वव्यापक अग्नि नामक जग्दीश्वर ने ही (जजान) उत्पन्न किया है। [यहाँ ‘ऋज्रः’ और ‘जजान’ ये दोनों पद पूर्व मन्त्र से लाये गये हैं।] वही जगदीश्वर (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (स्वम्) अपनी (महिमानम्) महिमा को (मिमानः) प्रकट कर रहा है। उसी की महिमा से (वृष्णः) वर्षा करनेवाले (अश्वस्य) व्यापक बादल का (रेतः) जल (कनिक्रन्ति) बहुत अधिक गरजता है ॥२॥
भावार्थःनदियों में, भूमि पर, अन्तरिक्ष में, द्युलोक में, सूर्य में, बादल में सभी जगह जगदीश्वर की ही महिमा दृग्गोचर हो रही है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अग्निः| स्वर - धैवतः
अ꣣य꣢ꣳ स꣣ह꣢स्रा꣣ प꣡रि꣢ यु꣣क्ता꣡ वसा꣢꣯नः꣣ सू꣡र्य꣢स्य भा꣣नुं꣢ य꣣ज्ञो꣡ दा꣢धार । स꣣हस्रदाः꣡ श꣢त꣣दा꣡ भू꣢रि꣣दा꣡वा꣢ ध꣣र्त्ता꣢ दि꣣वो꣡ भुवन꣢꣯स्य वि꣣श्प꣡तिः꣢ ॥१८४५
पदार्थः(यज्ञः) पूजनीय यह अग्नि नामक जगदीश्वर (युक्ताः) आकर्षण के बल से आपस में जुड़े हुए (सहस्रा) सहस्रों नक्षत्रों को (वसानः) बसाता हुआ (सूर्यस्य) सूर्य के (भानुम्) तेज को (दाधार) धारण कर रहा है। यह जगदीश्वर (सहस्रदाः) सहस्र वस्तुओं का दाता, (शतदा) सौ रत्नों का दाता, (भूरिदावा) बहुत-बहुत दूध-दही-मक्खन आदि का और विद्या-धर्म आदि का दाता, (दिवः धर्ता) द्युलोक का धारणकर्ता और (भुवनस्य) ब्रह्माण्ड का (विश्पतिः) प्रजापति है ॥३॥
भावार्थःजगदीश्वर ही हमारे सौरमण्डल को, असंख्य तारों को, सारे ही ब्रह्माण्ड को धारण करता हुआ हमें सब सम्पदाएँ देता है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -वेनः| स्वर - धैवतः
ना꣡के꣢ सुप꣣र्ण꣢꣫मुप꣣ य꣡त्पत꣢꣯न्तꣳ हृ꣣दा꣡ वेन꣢꣯न्तो अ꣣भ्य꣡च꣢क्षत त्वा । हि꣡र꣢ण्यपक्षं꣣ व꣡रु꣢णस्य दू꣣तं꣢ य꣣म꣢स्य꣣ यो꣡नौ꣢ शकु꣣नं꣡ भु꣢र꣣ण्यु꣢म् ॥१८४६॥
पदार्थःहे वेन ! हे परमेश्वर की कामना करनेवाले जीवात्मन् ! (हिरण्यपक्षम्) ज्ञान-कर्म-रूप सुनहरे पंखोंवाले, (वरुणस्य दूतम्) वरणीय मन को सन्मार्ग पर प्रेरित करनेवाले, (यमस्य) नियन्ता प्राण के (योनौ) देहरूप घर में (शकुनम्) शक्ति से शोभित, (भुरण्युम्) देह के धारक-पोषक, (सुपर्णम्) अष्टाङ्गयोग-रूप शुभ पंखों से युक्त तथा (नाके) मोक्ष के निमित्त (उपपतन्तम्) प्रयत्नशील (त्वा) तुझे (यत्) जब (अभ्यचक्षत) प्रभु-प्रेमी लोग देखते हैं, तब वे (हृदा) हृदय से (वेनन्तः) तुमसे प्रेम करने लगते हैं ॥१॥
भावार्थःदेह के अधिष्ठाता जीवात्मा की जब अध्यात्म-मार्ग में रूचि हो जाती है, तब वह अष्टाङ्गयोग के अभ्यास से मोक्ष पा सकता है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -वेनः| स्वर - धैवतः
ऊ꣣र्ध्वो꣡ ग꣢न्ध꣣र्वो꣢꣫ अधि꣣ ना꣡के꣢ अस्थात्प्र꣣त्य꣢ङ्चि꣣त्रा꣡ बिभ्र꣢꣯द꣣स्या꣡यु꣢धानि । व꣡सा꣢नो꣣ अ꣡त्क꣢ꣳ सुर꣣भिं꣢ दृ꣣शे꣢ कꣳ स्वा३र्ण꣡ नाम꣢꣯ जनत प्रि꣣या꣡णि꣢ ॥१८४७॥
पदार्थः(ऊर्ध्वः) जागरूक और उन्नत, (गन्धर्वः) वाणी वा इन्द्रियों को धारण करनेवाला जीवात्मा (नाके अधि) मोक्षावस्था में (अस्थात्) स्थित होता है। वेन अर्थात् कमनीय परमेश्वर (अस्य) इस जीवात्मा के (प्रत्यङ्) अभिमुख होकर (चित्रा) विविध (आयुधा) रक्षा-साधनों को (बिभ्रत्) धारण करता है। तब मोक्षावस्था में जीवात्मा (दृशे कम्) परमात्मा के दर्शन के लिए (सुरभिम्) सद्गुणों से सुरभित (अत्कम्) स्वरूप को (वसानः) धारण करता हुआ (स्वः न) सूर्य के समान (प्रियाणि नाम) प्रिय तेजों को (जनत) प्रकट करता है ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःमुक्तावस्था में जीवात्मा की लौकिक आकाङ्क्षाएँ समाप्त हो जाती हैं, तेजोमय होकर वह परमात्मा के साहचर्य से दिव्य आनन्द का अनुभव करता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -वेनः| स्वर - धैवतः
द्र꣣प्सः꣡ स꣢मु꣣द्र꣢म꣣भि꣡ यज्जिगा꣢꣯ति꣣ प꣢श्य꣣न्गृ꣡ध्र꣢स्य꣣ च꣡क्ष꣢सा꣣ वि꣡ध꣢र्मन् । भा꣣नुः꣢ शु꣣क्रे꣡ण꣢ शो꣣चि꣡षा꣢ चका꣣न꣢स्तृ꣣ती꣡ये꣢ चक्रे꣣ र꣡ज꣢सि प्रि꣣या꣡णि꣢ ॥१८४८॥
पदार्थः(द्रप्सः) पानी की बूँद के सदृश अणु परिमाणवाला जीवात्मा (यत्) जब (समुद्रम् अभि) आनन्द के सागर परमात्मा की ओर (जिगाति) जाता है, तब (विधर्मन्) विशेष रूप से धारक मोक्षलोक में वह जीव उस परमात्मा को (गृध्रस्य चक्षसा) गिद्ध जैसी तीव्र दृष्टि से (पश्यन्) देखता है। (तृतीये रजसि) तृतीय धाम मोक्ष-लोक में (शुक्रेण) पवित्र (शोचिषा) तेज से (चकानः) प्रदीप्त होता हुआ (भानुः) परमात्मा-रूप सूर्य उस जीवात्मा के (प्रियाणि) आनन्द-वर्षा के प्रदान आदि अभीष्टों को (चक्रे) सिद्ध करता है ॥३॥ इस मन्त्र में परमात्मा में भानुत्त्व का आरोप होने से रूपक अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थःमोक्ष के लिए प्रयत्न करता हुआ जीव रस सींचनेवाले तेजस्वी जगदीश्वर को प्राप्त करके रस-सिक्त और तेजस्वी हो जाता है ॥३॥ इस खण्ड में मनुष्य की आकाङ्क्षा, वेदवाणी, ब्रह्मानन्द-धारा, प्राण और जीवात्मा की मोक्षप्राप्ति का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ बीसवें अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥ बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ नवम प्रपाठक का द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
आ꣣शुः꣡ शिशा꣢꣯नो वृष꣣भो꣢꣫ न भी꣣मो꣡ घ꣢नाघ꣣नः꣡ क्षोभ꣢꣯णश्चर्षणी꣣ना꣢म् । स꣣ङ्क्र꣡न्द꣢नोऽनिमि꣣ष꣡ ए꣢कवी꣣रः꣢ श꣣त꣢ꣳ सेना꣢꣯ अजयत्सा꣣क꣡मिन्द्रः꣢꣯ ॥१८४९॥
पदार्थः(आशुः) शीघ्रकारी, (शिशानः वृषभः न) तीक्ष्ण सींगोंवाले बैल के समान (भीमः) विघ्न डालनेवालों के लिए भयङ्कर, (घनाघनः) द्वेषियों का वध करनेवाला, (चर्षणीनाम्) बाधा डालनेवाले मनुष्यों को (क्षोभणः) विक्षुब्ध कर देनेवाला, (सङ्क्रन्दनः) शत्रुओं को रुलानेवाला, (अनिमिषः) लक्ष्य पर अपलक दृष्टि रखनेवाला, (एकवीरः) अद्वितीय वीर, (इन्द्रः) सेनापति के तुल्य जीवात्मा (साकम्) एक साथ (शतं सेनाः) सौ आन्तरिक और बाह्य सेनाओं को (अजयत्) जीत सकता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार तथा वीर रस है ॥१॥
भावार्थःजैसे राष्ट्र में वीर सेनापति अपने पराक्रम से सब शत्रु सेनाओं को जीत लेता है, वैसे ही शरीर में जीवात्मा आन्तरिक और बाह्य देवासुरसङ्ग्राम में सब विघ्नकारियों को जीत कर अपना साम्राज्य स्थापित करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
स꣣ङ्क्र꣡न्द꣢नेनानिमि꣣षे꣡ण꣣ जि꣣ष्णु꣡ना꣢ युत्का꣣रे꣡ण꣢ दुश्च्यव꣣ने꣡न꣢ धृ꣣ष्णु꣡ना꣢ । त꣡दिन्द्रे꣢꣯ण जयत꣣ त꣡त्स꣢हध्वं꣣ यु꣡धो꣢ नर꣣ इ꣡षु꣢हस्तेन꣣ वृ꣡ष्णा꣢ ॥१८५०॥
पदार्थःहे (युधः नरः) योद्धा नरो ! तुम (सङ्क्रन्दनेन) शत्रुओं को रुलानेवाले, (अनिमिषेण) लक्ष्य पर अपलक दृष्टि रखनेवाले, (जिष्णुना) विजयशील, (युत्कारेण) युद्ध करनेवाले, (दुश्च्यवनेन) विपक्षियों से विचलित न किये जा सकनेवाले, (धृष्णुना) स्वयं विपक्षियों को विचलित कर देनेवाले, (इषुहस्तेन) हाथ में बाण आदि शस्त्रास्त्र धारण करनेवाले, (वृष्णा) अस्त्रों की वर्षा करनेवाले, (इन्द्रेण) सेनापति के समान वीर जीवात्मा के द्वारा (तत्) उस युद्ध को (जयत) जीत लो, (तत्) उस आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुदल को (सहध्वम्) पराजित कर दो ॥२॥
भावार्थःजैसे शस्त्रास्त्रधारी वीर सेनापति के नेतृत्व में योद्धा लोग सङ्ग्राम को जीत लेते हैं, वैसे ही अपने जीवात्मा को उद्बोधन देकर, उसे नेता बनाकर सब आन्तरिक तथा बाहरी युद्धों को सब लोग जीतें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
स꣡ इषु꣢꣯हस्तैः꣣ स꣡ नि꣢ष꣣ङ्गि꣡भि꣢र्व꣣शी꣡ सꣳस्र꣢꣯ष्टा꣣ स꣢꣫ युध꣣ इ꣡न्द्रो꣢ ग꣣णे꣡न꣢ । स꣣ꣳसृष्टजि꣡त्सो꣢म꣣पा꣡ बा꣢हुश꣣र्ध्यू꣢३꣱ग्र꣡ध꣢न्वा꣣ प्र꣡ति꣢हिताभि꣣र꣡स्ता꣢ ॥१८५१॥
पदार्थः(सः) वह देह में जन्मा हुआ जीवात्मा (इषुहस्तैः) शरपाणि योद्धाओं द्वारा, (सः) वह जीवात्मा (निषङ्गिभिः) तूणीरधारी योद्धाओं द्वारा (वशी) शत्रुओं को वश में करनेवाला होता है। (स इन्द्रः) वह वीर जीवात्मा (युधः) युद्धकर्ता शत्रु के (गणेन) दल के साथ (संस्रष्टा) टक्कर लेनेवाला होता है। (संसृष्टजित्) मुठभेड़ करनेवालों का विजेता, (सोमपाः) वीररस का पान करनेवाला, (बाहुशर्धी) बाहुबल से युक्त, (उग्रधन्वा) प्रचण्ड धनुषवाला और (प्रतिहिताभिः) प्रेरित बाणों से (अस्ता) शत्रुओं को धराशायी कर देनेवाला होता है ॥३॥
भावार्थःकुशल सेनाध्यक्ष जैसे अपने शस्त्रास्त्रधारी योद्धाओं द्वारा बलवान् भी शत्रुओं को धराशायी कर देता है, वैसे ही देहधारी वीर जीवात्मा अपने पक्ष के वीरों को उद्बोधन देकर आन्तरिक और बाह्य सङ्ग्राम को शीघ्र ही जीत ले ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -बृहस्पतिः| स्वर - धैवतः
बृ꣡ह꣢स्पते꣣ प꣡रि꣢ दीया꣣ र꣡थे꣢न रक्षो꣣हा꣡मित्रा꣢꣯ꣳ अप꣣बा꣡ध꣢मानः । प्र꣣भ꣡ञ्जन्सेनाः꣢꣯ प्रमृ꣣णो꣢ यु꣣धा꣡ जय꣢꣯न्न꣣स्मा꣡क꣢मेध्यवि꣣ता꣡ रथा꣢꣯नाम् ॥१८५२॥
पदार्थःहे (बृहः पते) दिव्यगुणों की विशाल सेना के अधिपति जीवात्मन् ! (रक्षोहा) पाप वा दुर्जन रूप राक्षसों का वधकर्ता तू (अमित्रान्) विघ्नों और शत्रुओं को (अपबाधमानः) तिरस्कृत करता हुआ (रथेन) शरीर-रथ से (परि दीय) चारों ओर पहुँच। (सेनाः) काम-क्रोध आदि की और दुर्जनों की सेनाओं को (प्रभञ्जन्) तोड़ता-फोड़ता हुआ, (प्रमृणः) हत्यारे दुर्विचारों वा हिंसक मनुष्यों को (युधा) आन्तरिक और बाह्य देवासुरसङ्ग्राम से (जयन्) जीतता हुआ (अस्माकम्) हम सदाचारी, धार्मिक, न्यायकारी जनों के (रथानाम्) रथों का (अविता) रक्षक एधि हो ॥१॥
भावार्थःजीवात्मा को चाहिए कि सेनापति के समान उत्साह बटोर कर आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को खदेड़ता हुआ सद्भावों और सज्जनों की रक्षा करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
ब꣣लविज्ञायः꣡ स्थवि꣢꣯रः꣣ प्र꣡वी꣢रः꣣ स꣡ह꣢स्वान्वा꣣जी꣡ सह꣢꣯मान उ꣣ग्रः꣢ । अ꣣भि꣡वी꣢रो अ꣣भि꣡स꣢त्वा सहो꣣जा꣡ जैत्र꣢꣯मिन्द्र꣣ र꣢थ꣣मा꣡ ति꣢ष्ठ गो꣣वि꣢त् ॥१८५३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (बलविज्ञायः) ब्रह्मबल का ज्ञाता, (स्थविरः) अनुभव में वृद्ध, (प्रवीरः) अतिशय वीर, (सहस्वान्) उत्साही, (वाजी) विज्ञानवान् (सहमानः) सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करनेवाला, (उग्रः) प्रतापी, (अभिवीरः) मन, प्राण, आदि वीरों से युक्त, (सहोजाः) बल में प्रसिद्ध, (गोवित्) विवेक की किरणों को और श्रेष्ठ वाणियों को प्राप्त तू (जैत्रम्) विजयशील (रथम्) रथ पर (आतिष्ठ) बैठ ॥२॥
भावार्थःजैसे स्वयं वीर तथा वीर योद्धाओं से युक्त सेनापति जयशील रथ पर चढ़कर भयङ्कर युद्ध को भी जीत लेता है, वैसे ही वेदज्ञ, ब्रह्मज्ञ, सहनशील, मन-बुद्धि-प्राण आदि वीरों से युक्त, प्रभाववान्, प्रतापी, देह-रथ के अधिष्ठाता जीवात्मा को योग्य है कि अपने प्रौढ़ मनोबल से सभी बाह्य और आन्तरिक सङ्ग्रामों को जीत लेवे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
गो꣣त्रभि꣡दं꣢ गो꣣वि꣢दं꣣ व꣡ज्र꣢बाहुं꣣ ज꣡य꣢न्त꣣म꣡ज्म꣢ प्रमृ꣣ण꣢न्त꣣मो꣡ज꣢सा । इ꣣म꣡ꣳ स꣢जाता꣣ अ꣡नु꣢ वीरयध्व꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ सखायो꣣ अ꣢नु꣣ स꣡ꣳ र꣢भध्वम् ॥१८५४॥
पदार्थः(गोत्रभिदम्) अविद्या, अस्मिता आदि क्लेश रूप पर्वतों को तोड़नेवाले, (गोविदम्) विवेक-प्रकाश की किरणों को प्राप्त करनेवाले, (वज्रबाहुम्) अशुद्धि के क्षय तथा ज्ञान की दीप्ति के लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि रूप वज्र को ग्रहण करनेवाले, (अज्म) देवासुरसङ्ग्राम को (जयन्तम्) जीतनेवाले, (अजोसा) बल से (प्रमृणन्तम्) आन्तरिक शत्रुओं को कुचलनेवाले (इमम् अनु) इस जीवात्मा का अनुसरण करके, हे (सजाताः) शरीर के साथ उत्पन्न मन, बुद्धि, प्राण, आदियो ! तुम (वीरयध्वम्) वीरता दिखाओ। हे (सखायः) मित्रो ! तुम (इन्द्रम् अनु) जीवात्मा का अनुसरण करते हुए (संरभध्वम्) वीरतापूर्ण कार्यों को आरम्भ करो ॥३॥
भावार्थःशरीर के अन्दर जीवात्मा नाम का महापराक्रमी सेनापति पूरी रणसज्जा के साथ विद्यमान है, जिसे सब विघ्नों को पराजित करके देवासुरसङ्ग्राम में विजय पाना योग्य है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
अ꣣भि꣢ गो꣣त्रा꣢णि꣣ स꣡ह꣢सा꣣ गा꣡ह꣢मानोऽद꣣यो꣢ वी꣣रः꣢ श꣣त꣡म꣢न्यु꣣रि꣡न्द्रः꣢ । दु꣣श्च्यवनः꣡ पृ꣢तना꣣षा꣡ड꣢यु꣣ध्यो꣢३ऽस्मा꣢क꣣ꣳ से꣡ना꣢ अवतु꣣ प्र꣢ यु꣣त्सु꣢ ॥१८५५॥
पदार्थः(सहसा) आत्मबल से (गोत्राणि) व्याधि, स्त्यान, संशय आदि योग-विघ्नों के तथा बाह्य विघ्नों के किलों का (अभि गाहमानः) अवगाहन करता हुआ, (अदयः) आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं पर दया न दिखानेवाला, (वीरः) वीर, (शतमन्युः) अनन्त तेजवाला, (दुश्च्यवनः) शत्रुओं से विचलित न किया जा सकनेवाला, (पृतनाषाट्) शत्रुसेनाओं को पराजित कर देनेवाला, (अयुध्यः) शत्रुओं के लिए जिससे युद्ध कर पाना असम्भव होता है ऐसा (इन्द्रः) जीवात्मा-रूप सेनापति (युत्सु) आन्तरिक तथा बाह्य देवासुरसङ्ग्रामों में (अस्माकं सेनाः) हमारी यम-नियम आदि की सेनाओं को और धार्मिक योद्धाओं की सेनाओं को (प्र अवतु) भली-भाँति रक्षित करे ॥१॥
भावार्थःजैसे राष्ट्र में कोई वीर सेनापति स्वपक्षीय सेनाओं की शत्रुओं से रक्षा करता है और दुष्ट शत्रुओं का शस्त्रास्त्रों से वधॄ करता है, वैसे ही देह में स्थित जीवात्मा प्रबोध प्राप्त करके अपने सङ्कल्प के बल से और भुजाओं के बल से सब आन्तरिक तथा बाहरी शत्रुओं को पराजित करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
इ꣡न्द्र꣢ आसां ने꣣ता꣢꣫ बृह꣣स्प꣢ति꣣र्द꣡क्षि꣢णा य꣣ज्ञः꣢ पु꣣र꣡ ए꣢तु꣣ सो꣡मः꣢ । दे꣣वसेना꣡ना꣢मभिभञ्जती꣣नां꣡ जय꣢꣯न्तीनां म꣣रु꣡तो꣢ य꣣न्त्व꣡ग्र꣢म् ॥१८५६॥
पदार्थः(बृहः पतिः) महान् शरीर-रूप राष्ट्र का रक्षक (इन्द्रः) वीर जीवात्मा-रूप सेनापति (आसाम्) इन देव-सेनाओं का (नेता) नेता हो। (दक्षिणा) त्याग की भावना, (यज्ञः) परमेश्वरपूजारूप यज्ञ (सोमः) और शान्ति का व्रत (पुरः एतु) आगे-आगे चले। (अभिभञ्जतीनाम्) अदिव्य भावों तथा अधार्मिक दुष्ट-जनों को तोड़ती-फोड़ती-कुचलती हुई, (जयन्तीनाम्), विजय का उत्कर्ष प्राप्त करती हुई (देवसेनानाम्) दिव्यभावों तथा सदाचारी विद्वान् जनों की सेनाओं के (अग्रम्) आगे-आगे (मरुतः) प्राण तथा वायुवत् बलिष्ठ शूरवीर लोग (यन्तु) चलें ॥२॥
भावार्थःसबको चाहिए कि अपने जीवात्मा को सेनापति बनाकर त्याग, परमात्मा की उपासना और विश्वशान्ति का आदर्श सामने रख कर, सत्य-अहिंसा आदि दिव्य गुणों की तथा बलिष्ठ योद्धाओं की सेना लेकर, प्राणपण से युद्ध करके देवासुरसङ्ग्राम में विजय प्राप्त करें ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ वृ꣢ष्णो꣣ व꣡रु꣢णस्य꣣ रा꣡ज्ञ꣢ आदि꣣त्या꣡नां꣢ म꣣रु꣢ता꣣ꣳ श꣡र्ध꣢ उ꣣ग्र꣢म् । म꣣हा꣡म꣢नसां भुवनच्य꣣वा꣢नां꣣ घो꣡षो꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ ज꣡य꣢ता꣣मु꣡द꣢स्थात् ॥१८५७॥
पदार्थः(वृष्णः) महाबली (इन्द्रस्य) विघ्नविदारक जीवात्मा का, (राज्ञः) सङ्कल्प बल से राजित (वरुणस्य) श्रेष्ठ मन का और (आदित्यानाम्) दोषापहारी (मरुताम्) प्राणों का (उग्रम्) उग्र (शर्धः) बल (उदस्थात्) ऊपर उठे। (महामनसाम्) बड़े हौसलेवाले, (भुवनच्यवानाम्) ब्रह्माण्ड को डिगा देनेवाले, (जयताम्) विजय-लाभ करनेवाले (देवानाम्) दिव्य भावों का और धर्मात्मा रण-बाँके वीरों का (घोषः) विजय-घोष (उदस्थात्) ऊपर उठे ॥३॥ यहाँ ‘भुवनच्यवानाम्’ में असम्बन्ध में सम्बन्धरूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है। वीर रस है ॥३॥
भावार्थःउत्साही आत्मा, मन, प्राण आदि शरीरस्थ रण-बाँके वीरों की और राष्ट्र के सेनापति आदि वीरोद्भटों की देवासुरसङ्ग्राम में विजय निश्चित होती है ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
उ꣡द्ध꣢र्षय मघव꣣न्ना꣡यु꣢धा꣣न्यु꣡त्सत्व꣢꣯नां माम꣣का꣢नां꣣ म꣡ना꣢ꣳसि । उ꣡द्वृ꣢त्रहन्वा꣣जि꣢नां꣣ वा꣡जि꣢ना꣣न्यु꣡द्रथा꣢꣯नां꣣ ज꣡य꣢तां यन्तु꣣ घो꣡षाः꣢ ॥१८५८॥
पदार्थःहे (मघवन्) शरीर के अधिष्ठाता ऐश्वर्यशाली जीवात्मन् ! (आयुधानि) शस्त्रास्त्रों को (उद्धर्षय) ऊपर उठाओ, (मामकानाम्) मेरे (सत्वनाम्) वीरों के (मनांसि) मनों को (उत्) ऊपर उठाओ, उत्साहित करो। हे (वृत्रहन्) पापहन्ता, विघ्नहन्ता, शत्रुहन्ता जीवात्मन् ! (वाजिनाम्) बलवान् योद्धाओं के (वाजिनानि) रण-कौशल (उद् यन्तु) ऊपर उठें, (जयताम्) विजय-लाभ करते हुए (रथानाम्) रथारोहियों के (घोषाः) विजय-घोष (उद् यन्तु) ऊपर उठें ॥१॥ यहाँ वीर रस है। ‘उद्’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास, ‘वाजिनां, वाजिना’ में यमक और यकार, नकार, मकार, तकार का अनुप्रास है ॥१॥
भावार्थःजो कोई राजा या सेनापति शस्त्रास्त्रों को तेज करता है, अपने पक्ष के वीरों के मनों को उत्साहित करता है, विजय-दुन्दुभि बजाता है, वह सब कार्य उसके शरीर में स्थित जीवात्मा का ही होता है। इसलिए उसी को सम्बोधन किया गया है। आत्मा के उद्बोधन से ही बाह्य विजय के समान ही आन्तरिक विजय भी प्राप्त होती है ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
अ꣣स्मा꣢क꣣मि꣢न्द्रः꣣ स꣡मृ꣢तेषु ध्व꣣जे꣢ष्व꣣स्मा꣢कं꣣ या꣡ इष꣢꣯व꣣स्ता꣡ ज꣢यन्तु । अ꣣स्मा꣡कं꣢ वी꣣रा꣡ उत्त꣢꣯रे भवन्त्व꣣स्मा꣡ꣳ उ꣢ देवा अवता꣣ ह꣡वे꣢षु ॥१८५९॥
पदार्थः(अस्माकम् इन्द्रः) हमारा सेनापति-तुल्य जीवात्मा (ध्वजेषु समृतेषु) हमारे ध्वजों के शत्रु-ध्वजों से टकराने पर (जयतु) विजय-लाभ करे। (अस्माकं याः इषवः) हमारे जो बाण हैं,(ताः जयन्तु) वे विजय-लाभ करें। (अस्माकं वीराः) हमारे रण-कुशल वीर योद्धा (उत्तरे भवन्तु) विजयी हों। हे (देवाः) जीतने के अभिलाषी मन, बुद्धि आदियो ! (अस्मान् उ) हमारी (हवेषु) देवासुरसङ्ग्रामों में (अवत) रक्षा करो ॥२॥
भावार्थःजैसे सेनापति से प्रोद्बोधन पाकर रणबाँकुरे सैनिक शीघ्र ही शत्रुओं को जीत लेते हैं, वैसे ही अपनी अन्तरात्मा को प्रोत्साहन देना वीरों के विजय में हेतु बनता है ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -मरुतः| स्वर - धैवतः
अ꣣सौ꣡ या सेना꣢꣯ मरुतः꣣ प꣡रे꣢षाम꣣भ्ये꣡ति꣢ न꣣ ओ꣡ज꣢सा꣣ स्प꣡र्ध꣢माना । तां꣡ गू꣢हत꣣ त꣢म꣣सा꣡प꣢व्रतेन꣣ य꣢थै꣣ते꣡षा꣢म꣣न्यो꣢ अ꣣न्यं꣢꣫ न जा꣣ना꣢त् ॥१८६०॥
पदार्थःहे (मरुतः) प्राणो वा वीर सैनिको ! (असौ या) यह जो (ओजसा) अपने बल से (स्पर्धमाना) हमसे स्पर्धा करती हुई (परेषाम्) शत्रुओं की (सेना) सेना (नः अभ्येति) हमारी ओर बढ़ी आ रही है, (ताम्) उस सेना को (अपव्रतेन) जिसमें कार्य बन्द हो जाते हैं, ऐसे (तमसा) अन्धकार से (गूहत) आच्छन्न कर दो, (यथा) जिससे (एतेषाम्) इनमें (अन्यः) एक (अन्यम्) दूसरे को (न जानात्) न जान सके ॥३॥
भावार्थःजैसे युद्ध में सम्मोहनास्त्र के प्रयोग द्वारा घोर अन्धकार के व्याप्त हो जाने पर शत्रु एक-दूसरे को ही नहीं देख पाते, वैसे ही जीवात्मा के प्राणायाम द्वारा प्रयुक्त सम्मोहन से सभी आन्तरिक काम-क्रोध आदि वा अविद्या-अस्मिता आदि शत्रु सर्वथा मोह को प्राप्त हो जाएँ ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -अप्वा| स्वर - धैवतः
अ꣣मी꣡षां꣢ चि꣣त्तं꣡ प्र꣢तिलो꣣भ꣡य꣢न्ती गृहा꣣णा꣡ङ्गा꣢न्यप्वे꣣ प꣡रे꣢हि । अ꣣भि꣢꣫ प्रेहि꣣ नि꣡र्द꣢ह हृ꣣त्सु꣡ शोकै꣢꣯र꣣न्धे꣢ना꣣मि꣢त्रा꣣स्त꣡म꣢सा सचन्ताम् ॥१८६१॥
पदार्थःहे (अप्वे) व्याधि वा भीति ! (परेहि) शत्रुदल में जा। (अमीषाम्) इन शत्रुओं के (चित्तम्) चित्त को (मोहयन्ती) मोहित करती हुई (अङ्गानि) इनके अङ्गों को (गृहाण) जकड़ दे। (अभिप्रेहि) शत्रुओं के प्रति जा, उनके (हृत्सु) हृदयों में (शोकैः) शोकों से (निर्दह) दाह उत्पन्न कर दे। (अमित्राः) शत्रु (अन्धेन) घने (तमसा) मोह के अन्धकार से (सचन्ताम्) संयुक्त हो जाएँ ॥१॥
भावार्थःजैसे व्याधि वा भय से ग्रस्त शत्रु किंकर्तव्यविमूढ़ और दग्ध हृदयवाले होकर पराजित हो जाते हैं वैसे ही आन्तरिक देवासुरसङ्ग्राम में काम-क्रोध-लोभ-मोह आदि वा व्याधि स्त्यान-संशय-प्रमाद-आलस्य आदि रिपु व्याधि-ग्रस्त वा भयोद्विग्न से होकर झट विनष्ट हो जाएँ ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रो मरुतो वा| स्वर - गान्धारः
प्रे꣢ता꣣ ज꣡य꣢ता नर꣣ इ꣡न्द्रो꣢ वः꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु । उ꣣ग्रा꣡ वः꣢ सन्तु बा꣣ह꣡वो꣢ऽनाधृ꣣ष्या꣡ यथास꣢꣯थ ॥१८६२॥
पदार्थःहे (नरः) वीर-पुङ्गव योद्धाओ ! (प्रेत) आगे बढ़ो, (जयत) विजय पाओ। (इन्द्रः) तुम्हारा वीर अन्तरात्मा (वः) तुम्हें (शर्म) कल्याण (यच्छतु) प्रदान करे। (वः) तुम्हारी (बाहवः) भुजाएँ (उग्राः) उग्र (सन्तु) हों, (यथा) जिससे, तुम (अनाधृष्याः) अपराजेय (असथ) हो जाओ ॥२॥ इस मन्त्र में वीर रस है ॥२॥
भावार्थःमनुष्यों को उद्बोधन तभी मिल सकता है यदि उनका आत्मा बलवान् हो। इसलिए अपने आत्मा को बली बनाकर, उद्बोधन पाकर जीवन-सङ्ग्राम में सबको विजय प्राप्त करनी चाहिए ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इषवः| स्वर - गान्धारः
अ꣡व꣢सृष्टा꣣ प꣡रा꣢ पत꣣ श꣡र꣢व्ये꣣ ब्र꣡ह्म꣢सꣳशिते । ग꣢च्छा꣣मि꣢त्रा꣣न्प्र꣡ प꣢द्यस्व꣣ मा꣢꣫मीषां꣣ कं꣢ च꣣ नो꣡च्छि꣢षः ॥१८६३॥
पदार्थःहे (ब्रह्मसंशिते) धनुर्वेद के ज्ञाता सेनापति द्वारा तीक्ष्ण अर्थात् उत्साहित की हुई (शरव्ये) शस्त्रास्त्र चलाने में कुशल सेना ! (अवसृष्टा) प्रेरित की हुई तू (परापत) शत्रुओं पर टूट पड़। (गच्छ) जा, (अमित्रान्) शत्रुओं को (प्रपद्यस्व) प्राप्त कर। (अमीषाम्) इनके मध्य (कंचन) किसी को भी (न उच्छिषः) बचा न रहने दे ॥३॥
भावार्थःजैसे सेनापति से प्रेरित वीरों की सेना शत्रुओं को जीत लेती है, वैसे ही शरीर के अध्यक्ष जीवात्मा से प्रेरित सात्त्विक वीर भावों की सेना तामस दुर्भावों पर विजय पा लेती है। तामस भावों को निःशेष कर देना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि नाममात्र भी वे यदि बचे रहें, तो फिर बढ़ जाते हैं ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
क꣣ङ्काः꣡ सु꣢प꣣र्णा꣡ अनु꣢꣯ यन्त्वेना꣣न्गृ꣡ध्रा꣢णा꣣म꣡न्न꣢म꣣सा꣡वस्तु꣣ से꣡ना꣢ । मै꣡षां꣢ मोच्यघहा꣣र꣢श्च꣣ ने꣢न्द्र꣣ व꣡या꣢ꣳस्येनाननु꣣सं꣡य꣢न्तु꣣ स꣡र्वा꣢न् ॥१८६४
पदार्थः(सुपर्णाः) सुदृढ़ पङ्खोंवाली (कङ्काः) चीलें (एनान्) इन शत्रुओं का (अनुयन्तु) पीछा करें। (असौ सेना) वह शत्रु-सेना (गृध्राणाम्) गिद्धों का (अन्नम् अस्तु) भोजन बने। हे (इन्द्र) सेनापतितुल्य जीवात्मन् ! (एषाम्) इन शत्रुओं में से (अघहारः च न) पाप का भागी कोई भी (मा मोचि) जिन्दा न छूटे। (एनान् सर्वान्) इन सबका (वयांसि) माँसभक्षी पक्षी (अनु संयन्तु) पीछा करें, इन्हें खा जाएँ ॥१॥
भावार्थःजैसे बाह्य युद्ध में मारे गये शत्रु गिद्ध आदि माँसभक्षक पक्षियों से समाप्त किये जाते हैं, वैसे ही आन्तरिक देवासुरसङ्ग्राम में जीवात्मा से मारे गये काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाम भी न बचे, ऐसा प्रयत्न मनुष्यों को करना चाहिए ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
अ꣣मित्रसेनां꣡ म꣢घवन्न꣣स्मा꣡ञ्छ꣢त्रुय꣣ती꣢म꣣भि꣢ । उ꣣भौ꣡ तामि꣢꣯न्द्र वृत्रहन्न꣣ग्नि꣡श्च꣢ दहतं꣣ प्र꣡ति꣢ ॥१८६५॥
पदार्थःहे (मघवन्) दिव्य ऐश्वर्यवाले, (वृत्रहन्) शत्रुहन्ता (इन्द्र) वीर जीवात्मन् ! (अस्मान् अभि) हमारे प्रति (शत्रुयतीम्) शत्रुता का आचरण करनेवाली (ताम्) उस विकराल (अमित्रसेनाम्) रिपु-सेना को, तू (अग्निः च) और तैजस मन (उभौ) दोनों (प्रतिदहतम्) भस्म कर दो ॥२॥
भावार्थःजैसे राजा और सेनापति के उद्योग से सब बाह्य शत्रु निःशेष हो जाते हैं, वैसे ही आन्तरिक देवासुरसङ्ग्राम में जीवात्मा और मन सब विघ्नों और रिपुओं को दग्ध करने में समर्थ होते हैं ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -पङ्क्तिः| देवता -संग्रामशिषः| स्वर - पञ्चमः
य꣡त्र꣢ बा꣣णाः꣢ स꣣म्प꣡त꣢न्ति कुमा꣣रा꣡ वि꣢शि꣣खा꣡ इ꣢व । त꣡त्र꣢ नो꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣢ति꣣र꣡दि꣢तिः꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु वि꣣श्वा꣢हा꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु ॥१८६६॥
पदार्थः(यत्र) जिस समराङ्गण में (बाणाः) बाण आदि अस्त्र (सम्पतन्ति) गिरते हैं, (विशिखाः कुमाराः इव) जैसे चूड़ाकर्म संस्कार कराये हुए शिखा-रहित बालक चलने का अभ्यास करते हुए पग-पग पर गिरते हैं, (तत्र) उस समराङ्गण में (ब्रह्मणः पतिः) ज्ञान का रक्षक जीवात्मा और महान् राष्ट्र का रक्षक सेनापति तथा (अदितिः) कुतर्कों से खण्डित न होनेवाली बुद्धि और राष्ट्रभूमि (नः) हमें (शर्म) कल्याण (यच्छतु) प्रदान करे, (विश्वाहा) सदा (शर्म) कल्याण (यच्छतु) प्रदान करे। [निरुक्त्त (१०।४०) में कहा गया है कि किसी वाक्य को दोहराने में बहुत सा चमत्कारिक अर्थ प्रकट होता है। जैसे-‘अहो, दर्शनीय है, अहो दर्शनीय है’, इस वाक्य में। उसी के अनुसार यहाँ ‘शर्म यच्छतु’ वाक्य को दुहराने में बहुत-सा अर्थ समाविष्ट है।] ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थःबाह्य सङ्ग्राम में सेनापति प्रतिपक्षी योद्धाओं को तेज बाणों से काट कर अपने पक्षवालों जैसे को सुख देवे, वैसे ही आध्यात्मिक देवासुरसङ्ग्राम में जीवात्मा काम-क्रोध आदि रिपुओं का छेदन-भेदन करके मनोभूमि को शत्रु-रहित करे ॥३॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
वि꣢꣯ रक्षो꣣ वि꣡ मृधो꣢꣯ जहि꣣ वि꣢ वृ꣣त्र꣢स्य꣣ ह꣡नू꣢ रुज । वि꣣ म꣣न्यु꣡मि꣢न्द्र वृत्रहन्न꣣मि꣡त्र꣢स्याभि꣣दा꣡स꣢तः ॥१८६७॥
पदार्थःहे (वृत्रहन् इन्द्र) पापहन्ता जीवात्मन् और शत्रुहन्ता सेनापति !तुम (रक्षः) राक्षसी स्वभाव को वा राक्षसी स्वभाववाले दुर्जन को (विजहि) विनष्ट करो, (मृधः) सङ्ग्रामकारी काम-क्रोध आदियों को वा हिंसक मानवी शत्रुओं को (विजहि) विनष्ट करो, (वृत्रस्य) पुण्य पर पर्दा डालनेवाले पाप वा पापी के (हनू) आक्रमण और बचाव के उपायों को वा जबड़ों को (विरुज) चूर-चूर कर दो। (अभिदासतः) दंशन-छेदन-भेदन करनेवाले (अमित्रस्य) शत्रु के (मन्युम्) प्रदीप्त-प्रभाव को वा क्रोध को (वि) विध्वस्त कर दो ॥१॥
भावार्थःजैसे राष्ट्र में सेनापति संहारकारी शत्रुओं का मर्दन करता है, वैसे ही शरीर में जीवात्मा राक्षसी स्वभाव को, हिंसक काम-क्रोध आदियों को, धर्म पर पर्दा डालनेवाले पाप को और बिच्छू के समान काटनेवाली कुटिलता को विध्वस्त करे ॥१॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -अनुष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - गान्धारः
वि꣡ न꣢ इन्द्र꣣ मृ꣡धो꣢ जहि नी꣣चा꣡ य꣢च्छ पृतन्य꣣तः꣢ । यो꣢ अ꣣स्मा꣡ꣳ अ꣢भि꣣दा꣢स꣣त्य꣡ध꣢रं गमया꣣ त꣡मः꣢ ॥१८६८॥
पदार्थःहे (इन्द्र) जीवात्मन् वा सेनापति ! तुम (नः) हमारे (मृधः) हिंसकों को (विजहि) विनष्ट करो, (पृतन्यतः) सेना से आक्रमण करनेवाले काम-क्रोध आदि को वा बाहरी शत्रुओं को (नीचा यच्छ) नीचा दिखाओ। (यः) जो आन्तरिक वा बाहरी शत्रु (अस्मान्) हम धार्मिकों को (अभिदासति) सर्वथा क्षीण करना चाहता है, उसे (अधरं तमः गमय) घोर दुर्गति प्राप्त कराओ वा निचले कारागार में डाल दो ॥२॥
भावार्थःजैसे सेनापति दुष्ट शत्रुओं का वध कर देता है अथवा उन्हें कारागार में डाल देता है, वैसे ही शरीर का अधिष्ठाता जीवात्मा सब आन्तरिक शत्रुओं की घोर दुर्गति करके वा उन्हें विनष्ट करके अपने निष्कण्टक साम्राज्य को स्थापित करे ॥२॥
काण्ड -| गान -ऊह्यगान| गानपर्व -अहीनपर्व
छन्द -विराड् जगती| देवता -इन्द्रः| स्वर - निषादः
इ꣡न्द्र꣢स्य बा꣣हू꣡ स्थवि꣢꣯रौ꣣ यु꣡वा꣢नावनाधृ꣣ष्यौ꣡ सु꣢प्रती꣣का꣡व꣢स꣣ह्यौ꣢ । तौ꣡ यु꣢ञ्जीत प्रथ꣣मौ꣢꣫ योग꣣ आ꣡ग꣢ते꣣ या꣡भ्यां꣢ जि꣣त꣡मसु꣢꣯राणा꣣ꣳ स꣡हो꣢ म꣣ह꣢त् ॥१८६९॥
पदार्थः(इन्द्रस्य) सेनापति-तुल्य जीवात्मा की (बाहू) प्राण-अपान रूप भुजाएँ (स्थविरौ) स्थिर, (युवानौ) तरुण, (अनाधृष्यौ) मन और शरीर के मलों से अपराजेय, (सुप्रतीकौ) शत्रु के प्रति भली-भाँति आगे बढ़नेवाली और (असह्यौ) रोग आदियों से असह्य हैं। (योगे आगते) अष्टाङ्ग योग के उपस्थित होने पर, योग-साधक (तौ) उन प्राण-अपान-रूप भुजाओं का (युञ्जीत) प्रयोग करे, (याभ्याम्) जिनसे (असुराणाम्) आधि-व्याधि-रूप दैत्यों का (महत् सहः) विशाल बल (जितम्) जीत लिया जाता है ॥३॥ यहाँ उपमेय प्राण-अपान के निगरणपूर्वक उपमानभूत बाहुओं का वर्णन होने से अतिशयोक्ति अलङ्कार है। ‘स्थविर’ अर्थात् बूढ़े होने पर भी ‘युवा’ यह विरोधालङ्कार ध्वनित होता है। ऊपर की व्याख्या से उस विरोध का परिहार हो जाता है ॥३॥
भावार्थःयोगाभ्यास में पूरक, कुम्भक आदि प्राणायाम से इन्द्रियों के सब दोष नष्ट हो जाते हैं और प्रकाश के आवरण का क्षय हो जाने पर धारणाओं में मन की योग्यता हो जाती है। इसलिए प्राण-अपान सेनापति की बाहुओं के समान सहायक होते हैं ॥३॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -संग्रामशिषः| स्वर - धैवतः
म꣡र्मा꣢णि ते꣣ व꣡र्म꣢णा च्छादयामि꣣ सो꣡म꣢स्त्वा꣣ रा꣢जा꣣मृ꣢ते꣣ना꣡नु꣢ वस्ताम् । उ꣣रो꣡र्वरी꣢꣯यो꣣ व꣡रु꣢णस्ते कृणोतु꣣ ज꣡य꣢न्तं꣣ त्वा꣡नु꣢ दे꣣वा꣡ म꣢दन्तु ॥१८७०॥
पदार्थःहे अध्यात्म पथ के पथिक जीवात्मन् ! (ते) तेरे (मर्माणि) मन, बुद्धि, चक्षु आदि मर्म-स्थलों को (वर्मणा) ब्रह्म-रूप कवच से (छादयामि) ढकता हूँ। (राजा) विश्व का सम्राट् (सोमः) जगदीश्वर (त्वा) तुझे (अमृतेन) आनन्द-रस से (अनुवस्ताम्) आच्छादित करे। (वरुणः) दोषनिवारक, वरणीय, विद्वान् आचार्य (ते) तेरे लिए (उरोः) विस्तृत अध्यात्म ज्ञान के (वरीयः) अतिशय उत्कृष्ट तत्त्व को (कृणोतु) प्रदान करे। (जयन्तं त्वा) अध्यात्म-क्षेत्र में और बाह्य-क्षेत्र में विजयलाभ करते हुए तेरे (अनु) पीछे-पीछे (देवाः) मन, प्राण आदि भी (मदन्तु) लहलहायें ॥१॥
भावार्थःयोगमार्ग में पैर रखता हुआ मनुष्य ब्रह्मकवच से रक्षित होकर, गुरुजनों का मार्गनिर्देश पाकर, ब्रह्मानन्द का अनुभव करता हुआ मन, बुद्धि, प्राण आदियों के साथ अतिशय विजयी होता है ॥१॥
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छन्द -अनुष्टुप्| देवता -संग्रामशिषः| स्वर - गान्धारः
अ꣣न्धा꣡ अ꣢मित्रा भवताशीर्षा꣣णो꣡ऽह꣢य इव । ते꣡षां꣢ वो अ꣣ग्नि꣡नु꣢न्नाना꣣मि꣡न्द्रो꣢ हन्तु꣣ व꣡रं꣢वरम् ॥१८७१
पदार्थःहे (अमित्राः) आन्तरिक और बाह्य शत्रुओ ! तुम (अन्धाः) अन्धे और (अशीर्षाणः अहयः इव) फन-कटे साँपों के समान प्रभाव-रहित (भवत) हो जाओ। (अग्निनुन्नानां तेषां वः) अग्नि के समान ज्वलन्त दृढ सङ्कल्प से दूर किये हुए उन तुम शत्रुओं में से (वरं-वरम्) प्रधान-प्रधान को चुन-चुन कर (इन्द्रः) हमारा अन्तरात्मा (हन्तु) विनष्ट कर दे ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थःभयङ्कर फटाटोप दिखानेवाले विषधर भी फन कट जाने पर कुछ भी कर सकने में असमर्थ हो जाते हैं। वैसे ही प्रबल सङ्कल्प से जिनका बल हर लिया गया है, ऐसे आन्तरिक और बाह्य सब शत्रु निष्क्रिय और मृत हो जाएँ ॥२॥
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छन्द -पङ्क्तिः| देवता -संग्रामशिषः| स्वर - पञ्चमः
यो꣢ नः꣣ स्वो꣡ऽर꣢णो꣣ य꣢श्च꣣ नि꣢ष्ट्यो꣣ जि꣡घा꣢ꣳसति । दे꣣वा꣡स्तꣳ सर्वे꣢꣯ धूर्वन्तु꣣ ब्र꣢ह्म꣣ व꣢र्म꣣ ममान्त꣢꣯र꣣ꣳ श꣢र्म꣣ व꣢र्म꣣ म꣡मा꣢न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥
पदार्थः(यः) जो (नः) हमें (स्वः) अपना दुर्भाव, (अरणः) पराया दुर्भाव, (यः च) और जो (निष्ठ्यः) शत्रु का दुर्भाव (जिघांसति) नष्ट करना चाहता है, (तम्) उस काम-क्रोध आदि दुर्भाव का (सर्वे) सब (देवाः) दिव्यगुण वा सदाचारी विद्वान् जन (धूर्वन्तु) वध कर दें। (ब्रह्म) महान् जगदीश्वर (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए, (शर्म) जगदीश की शरण (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए ॥३॥
भावार्थःकभी मनुष्य निज मन से उत्पन्न पाप में प्रवृत्त होता है और कभी परिचित जन से प्रेरित वा शत्रु से प्रेरित पाप में लिप्त होता है। दिव्य विचारों से, विद्वानों के सङ्ग से और परमेश्वर के ध्यान-चिन्तन से उन पापों को नष्ट करके वह निष्पाप और सच्चरित्र हो सकता है ॥३॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -इन्द्रः| स्वर - धैवतः
मृ꣣गो꣢꣫ न भी꣣मः꣡ कु꣢च꣣रो꣡ गि꣢रि꣣ष्ठाः꣡ प꣢रा꣣व꣢त꣣ आ꣡ ज꣢गन्था꣣ प꣡र꣢स्याः । सृ꣣क꣢ꣳ स꣣ꣳशा꣡य꣢ प꣣वि꣡मि꣢न्द्र ति꣣ग्मं꣡ वि शत्रू꣢꣯न् ताढि꣣ वि मृधो꣢꣯ नुदस्व ॥१८७३॥
पदार्थःहे (इन्द्र) वीर मानव ! तू (भीमः) भयङ्कर, (कुचरः) भूमि पर विचरनेवाले, (गिरिष्ठाः) पर्वत की गुफा में निवास करनेवाले (मृगः न) शेर के समान (भीमः) दुष्टों के लिए भयङ्कर, (कुचरः) भू-विहारी और (गिरिष्ठाः) पर्वत के सदृश उन्नत पद पर प्रतिष्ठित हो। (परावतः) सुदूर देश से (परस्याः) और दूर दिशा से (आ जगन्थ) शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिए आ। (सृकम्) गतिशील, (तिग्मम्) तीक्ष्ण (पविम्) वज्र को, शस्त्रास्त्रसमूह को (संशाय) और अधिक तीक्ष्ण करके (शत्रून्) शत्रुओं को (वि ताढि) विताड़ित कर, (मृधः) हिंसकों को (वि नुदस्व) दूर भगा दे ॥१॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थःमनुष्यों को चाहिए कि वीरता का सञ्चय करके जैसे बाहरी शत्रुओं को पराजित करें वैसे ही आन्तरिक शत्रुओं को भी निर्मूल करें ॥१॥
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छन्द -त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
भ꣣द्रं꣡ कर्णे꣢꣯भिः शृणुयाम देवा भ꣣द्रं꣡ प꣢श्येमा꣣क्ष꣡भि꣢र्यजत्राः । स्थि꣣रै꣡रङ्गै꣢꣯स्तुष्टु꣣वा꣡ꣳस꣢स्त꣣नू꣢भि꣣꣬र्व्य꣢꣯शेमहि दे꣣व꣡हि꣢तं꣣ य꣡दायुः꣢꣯ ॥१८७४॥
पदार्थःहे (देवाः) विद्वानो ! हम (कर्णेभिः) कानों से (भद्रम्) भद्र वचन (शृणुयाम) सुनें। हे (यजत्राः) पूजनीय माता, पिता, आचार्य, वानप्रस्थ, संन्यासी आदि जनो ! हम (अक्षभिः) आँखों से (भद्रम्) भद्र दृश्य (पश्येम) देखें। (तुष्टुवांसः) जगदीश्वर की स्तुति करनेवाले हम लोग (स्थिरैः) दृढ (अङ्गैः) सिर आदि अङ्गों से वा ब्रह्मचर्य आदि अङ्गों से और (तनूभिः) अन्नमय, प्राणमय, मनोमय आदि शरीरों से (यत्) जो (देवहितम्) सज्जनों का हित करनेवाली वा परमात्मदेव द्वारा निहित कम से कम सौ वर्ष की (आयुः) आयु है, वह (व्यशेमहि) प्राप्त करें ॥२॥
भावार्थःमन, बुद्धि, प्राण, आँख, कान आदि जो अनुपम साधन मनुष्यों को परमात्मा ने दिये हैं, उनके सदुपयोग से भद्र जीवन बिताते हुए पूर्ण आयु प्राप्त करके आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति निरन्तर करनी चाहिए ॥२॥
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छन्द -विराट्स्थाना त्रिष्टुप्| देवता -विश्वे देवाः| स्वर - धैवतः
स्व꣣स्ति꣢ न꣣ इ꣡न्द्रो꣢ वृ꣣द्ध꣡श्र꣢वाः स्व꣣स्ति꣡ नः꣢ पू꣣षा꣢ वि꣣श्व꣡वे꣢दाः । स्व꣣स्ति꣢ न꣣स्ता꣢र्क्ष्यो꣣ अ꣡रि꣢ष्टनेमिः स्व꣣स्ति꣢ नो꣣ बृ꣢ह꣣स्प꣡ति꣢र्दधातु ॥ ॐ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥१८७५॥
पदार्थः(वृद्धश्रवाः) महान् कीर्तिवाला (इन्द्रः) जगत्पति परमेश्वर (नः) हमें (स्वस्ति) मङ्गल (दधातु) प्रदान करे। (विश्ववेदाः) सब धन का स्वामी (पूषा) पुष्टिप्रदाता जगदीश्वर (नः) हमें (स्वस्ति) मङ्गल (दधातु) प्रदान करे। (अरिष्टनेमिः) जिसकी व्याप्तिरूप परिधि कभी टूटती नहीं ऐसा (तार्क्ष्यः) सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी परमपिता (नः) हमें (स्वस्ति) मङ्गल (दधातु) प्रदान करे। (बृहस्पतिः) महती वेदवाणी का अधीश्वर, सर्वज्ञानमय, प्राचीनों का भी गुरु सर्वेश (नः) हमें (स्वस्ति) मङ्गल (दधातु) प्रदान करे ॥३॥
भावार्थःइन्द्र आदि विविध नामों से वेद में वर्णित, प्रसिद्ध कीर्तिवाले, सुपुष्टिदायक, सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ, लयसहित सामगानों द्वारा गाये गये जगदीश्वर के ध्यान से यथाशक्ति यथासम्भव उसके गुणों को अपने आत्मा में धारण करके सब मनुष्य ऐहिक और पारमार्थिक श्रेष्ठ अस्तित्व, श्रेष्ठ मङ्गल और श्रेष्ठ पूजा को निरन्तर प्राप्त करें ॥३॥ इस अध्याय में जीवात्मा को प्रोद्बोधन देते हुए देवासुरसङ्ग्राम में विजयार्थ प्रेरित करने, आशीर्वाद देने तथा स्वस्ति की प्रार्थना होने से इस अध्याय की पूर्व अध्याय के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिए ॥ इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ नवम प्रपाठक मेँ तृतीय अर्ध समाप्त ॥ नवम प्रपाठक और उत्तरार्चिक समाप्त ॥ संवत् २०४६ के चैत्र मास के शुक्लपक्ष में पञ्चमी तिथि सोमवार को यह भाष्य पूर्ण हुआ ॥